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पाहीमाफी [७] : परदेसी कै चिट्ठी-पाती

आशाराम जागरथ रचित ग्रामगाथा ‘पाहीमाफी’ के  “पहिला भाग” ,  “दुसरका भाग”  , तिसरका भाग , चौथा भाग , पंचवाँ भाग , ६-वाँ भाग , के सिलसिले मा हाजिर हय आज ई ७-वाँ भाग:

‘पाहीमाफी’ अब काफी उठान पै आइगा बाय। जे रचना से लगातार जुड़ा होइहैँ ते जानत होइहैं कि जौन हियाँ अहै ऊ अन्तै नाहीं। कयिउ उत्साह बढ़ावै वाली टिप्पनिउ मिलति अहयँ। आज हम ऐसनै यक टीप का हियाँ रखित अही, जेहिमा पाहीमाफी के रचनात्मक खूबी का हिगारा गा अहय:
capture-20170319-125648         “बहुतै गंभीर विवेचना क माँग करत है आशाराम जागरथ जी कै इ छोटी सी कविता। ई बतावत है कि ऊँच-नीच, भेद-भाव अउर छुआछूत के जवन धारा हमरे सब के निजी जीवन औ संस्कृति के करिखा अउर जहरीली कीचड़ से बोरत हजारन साल से बहत जात बा, ओकर अंत करै के समय नजदीक आवत बा। एतना गनीमत रहे प्रकृति के कि जेकरे कपड़ा-लत्ता , घर-दुआर के बोरत ई गंदगी के धारा बहावे क जतन किहा गा ओकर कपड़ा गंदा होइ गा मुदा ओकर हृदय बिलकुल साफ सोना एस रहि गा, अउर जे आपन कपड़ा साफ चमाचम राखे खातिर गंदगी दुसरे के तरफ बहाएस ओकर हृदय गंदगी अवर बदबू के घर होइ गा। पाहीमाफी के ई सब कविता कुसुम ओही कीचड़ आ गंदगी के दर्द के बयान हौ। अउर एहि बात के सबूत हौ कि कल जब नये भारत के निर्माण में एही कीचड़ वाले हाथ जुटिहैं तो जौने कुसुम के सुगंध से दिशा दिशा महकी ऊ गंध अब से पहले केहू के नसीब ना रही। जागरथ जी के बहुत बहुत बधाई कि आपन गांव अउर गांव के खुशबू अपने भीतर जिआये हएन।” (टीप-कार : ओमप्रकाश मिश्र

आज जवन अंक हियाँ रखा जात अहय वहिमा रचनाकार अपने चिट्ठी-लिखायी कय अनुभव बाँटे अहय। चिट्ठी के माध्यम से भीतरखाने कय ऊ सच आवा अहय जेहका बहुत कमै देखा गा अहय। रचनाकार कय निजी अनुभव हुवय के कारन बात बहुत पते पै बैठत चली गय हय। ई समझौ कि चिट्ठी लिखी गय है आपके दिलो-दिमाग मा सनेस पहुँचेक्‌ ताईं। : संपादक 
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  • परदेसी कै चिट्ठी-पाती

काहे गुलरी कै फूल भया
लागत बा रस्ता भूलि गया
बहुतै दिन बाद भेटान्या है
का हो काका ! तू भले हया
बोले, कुलि हाल ठीक बाटै
बचि गयन बेमारी से ज़िंदा
अपने घर सुखी हईं बिटियै
यकठू बेटवा कै बा चिंता
सोचिअ थै अबकी पठय देई
कुछ जाय कमाय बम्बई मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

परदेसी परदेस कमायं
लौटैं गाँव बघारैं सान
लाल अँगोछा मूड़े बान्हें
लिहें रेडियो अइठें कान
नई साइकिल, लाल रुमाल
दांत मा सोना, मुँह मा पान 
बम्बहिया लाठी कान्हें पै
विरहा गावैं टेरे तान
तहमद-बंडी पहिर कै घूमैं
चमकै घड़ी कलाई मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

कच्छा तीनै मा पढ़त रहेन
कागज़–पाती सब बचवावैं
पाई न पकरि कलम ढंग से
तब्बौ सब चिट्ठी लिखिवावैं
मुल काव करैं वनहीं सबहीं
पढ़वइया गाँव मा कमै रहे
जे रहा तनी बड़वरकन मा
छोटवरकै जात डेरात रहे
घर आवैं मेल-मेल मनई
भिनसारे–संझा–राती मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

खत लिखा सिरी उपमा जोगे
कि हियाँ पै सब कुछ कुसल बाय
ईस्सर से नेक मनाई थै
वंहकै नीकै उम्मीद बाय
आगे कै हो मालूम हाल
कातिक मा करिया जात हये
वनके हाथे कुछ सर-समान
पइसा–कौड़ी बाटी पठये
पंहुचिहैं तौ जाय कै लइ आयू
वकरे ना रह्यू भरोसे मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

करिया-करिया धगरिन काकी
पहुँचीं लइकै यक पोसकाड
बेटवा कमात बा डिल्ली मा
थोरै मा लिखि द्‌या हाल-चाल
बिचकावत मुंह वै देखि लिहिन 
बोलिन अच्छा हम जाई थै
तू पढ़ा–लिखा बाट्या बचवा !
तब्बै चिट्ठी लिखिवाई थै
हम कहेन बिहान इतवार हुवै
निस्चिंते आयू छुट्टी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

चिट्ठी लिखवावै यस बइठिन
झौवा भै गऊवाई गावैं
आंसू पै आंसू बहा जाय
बोलत–बोलत रोवै लागैं
“हाँड़ी–गगरी ठन-ठन गोपाल
अपुवां कामे नाहीं जाते
पंडित कै लरिका मारे बा
घर हीं लंगड़ात चलत बाटे
कुछ पइसा जल्दी भेजि दिहा
यक्कै धोती बा देहीं मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

जूड़ी बोखार हमरे बाटै
लिखि द्‌या बाकी ठीकै बाटै
भैं’सिया बियानी बा पड़िया
गइया बिकात नाहीं बाटै
सुरसतिया सरियारिग होइ गै
कसि मा नाहीं बाटै हमरे
अब वोकर गवन जरूरी बा
निबकावै क् बा निबरे-पतरे
समधी अबकी मागैं अइहैं
तौ मान जाब हम अगहन मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

पकरे हाथे अन्तरदेसी
मुस्की मारैं नइकी भउजी
चुप्पे अइसन पाती लिखि द्‌या
घर भागा आवैं परदेसी
लिखि द्या कि बहुत अगोरी थै
ससुरे मा नाहीं लागै मन
दस दिन कां ताईं आइ जायँ
नाहीं, चलि जाब नइहरे हम
बुढ़ऊ कै मुंह फूला बाटै
मनिआडर पाइन देरी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

लिखि द्‌या घर कां जब्बै आया
खुब नीक-नीक साड़ी–साया
अन्दर वाली दुइ ठू बंडी
यक लाल लिपिस्टिक लइ आया
सेंनुर औ’ टिकुली ना लइहैं
बस क्रीम-पाउडर लइ अइहैं
महकौवा साबुन यक दरजन
पाये पइहैं तौ लइ अइहैं
यक बहुत खुसी कै बात बाय
लेकिन लिखिबै ना पाती मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

चिट्ठी न केहू कां दिखलाया
ना सास-ससुर कां बतलाया
धइ ल्या किताब के बीचे मा
सीधे डाखाना लइ जाया
वै खड़ी–खड़ी अँगिरायं बहुत
बोलिन अच्छा अब जात हई
चुप्पै बिहान हम दइ जाबै
यक कलम नीक कै धरे हई
माई बोलिन हरजाई बा
ना आया यकरे बाती मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

भउजाई कै गदरान गाल
हथवा-गोड़वा कुल लाल-लाल
बोलैं तौ मुंह से फूल झरै
पायल झनकावत चलैं चाल
चिट्ठी लिखवाइन तब जानेन
अंदरखाने कै बुरा हाल
पहिले खुब छटकत चलत रहीं
अब तौ बिलकुल भीगी बिलार
बैरंग वै पाती लिखवावैं
पइसा नाहीं जब जेबी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

छोटकना पढ़ै नाहीं जातै
बड़कनी सयान हुवत बाटै
गोहूँ सीचै ताईं पइसा
फूटी कौड़ी नाहीं बाटै
घर कै बटवारा भवा बाय
यक ठू पाये बाटी कोठरी
बाटै वोरान रासन-पानी  
कुछ पइसा भेज दियौ जल्दी
बड़कऊ कै नीयत बिगड़ी बाे
वै बहुत सतावत हैं हमकां
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

लेकिन तू फिकर न किह्यौ कभौं
दहकच्चर-करकच झेल लियब
जिउ-जान से ठान लिहे बाटी
लरिकन ताईं अब जियब-मरब
दीवार फोरि कै रहत हई
कोठरी मा दरवज्जा नाहीं
बस साल-खांड़ दिन काटै क् बा
यहि घर मा अब रहिबै नाहीं
माटी कै भीत उठाइब हम
सरिया के बगल जमीनी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

लिखि द्‌या भइया कसि कै लिखि द्‌या
लिखि द्‌या कि जल्दी आइ जांय
अम्मा बीमार अवाची हैं
गटई बोलअ थै सांय-सांय
हम अपने घर लइ आयन हैं
बड़कऊ की वोरी रहत रहीं
अब चला-चली कै बेरा बा
कुच्छै दिन कै मेहमान हईं 
आवा मुंह देखि लिया जीतै
अटका परान बा तूहीं मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा.

__आशाराम जागरथ

[जारी….]

पाहीमाफी [६] : तीज-तिउहार (होली)

आशाराम जागरथ रचित ग्रामगाथा ‘पाहीमाफी’ के  “पहिला भाग” ,  “दुसरका भाग”  , तिसरका भाग , चौथा भाग , पंचवाँ भाग के सिलसिले मा हाजिर हय आज ई ६-वाँ भाग:

ई भाग तिउहार क लयिके रचा गा बाय। होरी क लयिके। होरी के सिलसिले मा जे होलियात हय ऊ बहुत कमय सोचत होये कि समाज कय यक हिस्सा हय जौन होरिउ जेस खुसी कय तिउहार नाहीं मनाय सकत। वहिका कब्बौ ई मौका नाहीं मिला कि सबके साथ वहू जिंदगी के रंग मा रँगि सकय। भेदभाव वाली बेवस्था उल्लासौ मा भेदभाव बनाये रहत हय। मतलब पूरी जिंदगी दुख कय, अपमान कय, जिल्लत कय, दूसर नाव बनी रहय। ‘अछूत की होरी’ लिखत के १९३६ मा वंसीधर सुकुल लिखे रहे:

खेत बनिज ना गोरू गैया ना घर दूध न पूत।
मड़ई परी गाँव के बाहर, सब जन कहैं अछूत॥
द्वार कोई झँकइउ ना आवइ।
..हमैं यह होरिउ झुरसावइ। 

हियाँ आसाराम जागरथ विस्तार से ‘भोगे सच’ क रखे अहयँ। कयिसे दूसर जाति वाले खुसी-उल्लास के मौके पै ई महसूस करावत हयँ कि ‘ई तुहुँहा नाहीं चाही।’

पढ़ा जाय ई भाग। साथे बना रहा जाय रचना के। आपनि राइयु बतावा जाय। : संपादक
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  • तीज-तिउहार (होली)

लइकै उपरी-करसी- कंडा
छोटका- बड़का, लोहरी-लरिका
फागुन म बसन्त पञ्चमी के दिन
गाडैं रेंड़, बनावैं होलिका
उखुड़ी औ आमे कै पाती
सरपत-झाँखर- टिलठा-रहँठा
ढोय- ढाय सब ढूह लगावैं
ऊँचा खूब सजावैं होलिका
बाजै ढोलक रोज ढमाढम
गाना गावैं राती मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

होलिका जरै चाँदनी रात
ऊँची लपटि उठै आकाश
सन्नाटे मा दहकै आग
देहियाँ चुन-चुन लागै आँच
भूज-भाज गोबरे कै छल्ला
गुहि कै, जौ के पेड़ कै बल्ला
सब अपने घर मा लइ आवैं
दरवाजा ऊपर लटकावैं
बोलैं जय होलिका माई कै
फूकैं वन्हैं आगी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

कुछ लरिकै, कुछ बूढ़-ज़वान
सबकै सब दिन भै बौरांय
गावैं कबिरा सा-रा-रा-रा
तनिकौ ना झेपैं, सरमांय
जवन-जवन गारी गरियावैं
केउ मेहरारू सहि न पावैं
कबहुं-कबहुं पंडोहे क पानी
कीचड़-गोबर मारि भगावैं
खीस निपोरे, दांत चियारे
हँसैं लोग मन ही मन मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

जेकरी खेती ऊ बलवान
रहै गाँव कै ऊ धनवान
बाभन-ठाकुर- बनिया के घर
पाकै नीक-नीक पकवान
मेंड़ुवा कै लपसी, गुलबरिया
बनै सोहारी औ दलभरिया
आलू कै पापड़, रसियाव
बरिया अउर फुलौरी-गोझिया
पौनी-परजा खाना पावैं
थरिया भै तिउहारी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

घूमि-घूमि नाचैं सब गावैं
बीच म ढोलिहा ढोल बजावैं
चमरौटी कां छोड़ि कै बाकी
घर-घर जाइ कै फगुआ गावैं
वनकै लरिकै घूमैं साथे
पितरी कै पिचकारी हाथेे
हमरे घर ना रंग-अबीर
टीका काव लगावै माथे
माई बोलिन सेंनुर लइ जा
के देखत बा राती मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

यक साल ‘अबीर’ कै सौक चढ़ा
मांगेन दुई पइसा अइया से
बोलिन जा ! थोरै मांग लिया
बम्बहिया वाले भइया से
हरियर ‘अबीर’ जब पाय गयन
फूटै मन लड्डू अजब-गजब
‘पंडित जी हमैं पढ़ावत हैं
वनकै हम आसिरबाद लियब’
सोचिहैं हमार ई सिस्य हुवै
कम से कम मानअ थै हमकां
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

पुड़िया मा धरे ‘अबीर’ रहेन
पंडित जी राही मिलिन गये
हम हाथ जोरि पैलगी किहेन
बिन बोले वै आसीस दिहे
जब चलेन अबीर लगावै कां
सोचेन मुराद अब मिलि जाई
झट ‘बाभन-माथा’ झिटिक दिहिन
बोले ‘तुहंका नाहीं चाही’
आपन मुँह लइकै खड़ा रहेन
बहुतै देरी तक राही मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा.

__आशाराम जागरथ

[जारी….]

‘पाहीमाफी’ [२] : दसा-दुरदसा औ दयू कै रिसियाब-मानब

उहै निमिया.

उहै निमिया.

सिसिलेवार ढंग से पोस्ट कीन जाति, आशाराम ‘जागरथ’ कय रचना, ‘पाहीमाफी’ कय ई दुसरका हिस्सा आपके सामने रखा जात अहय। यहिके पहिले केरी कड़ी पढ़य खातिर यहिपै क्लिक करैं : “पहिला भाग” । तौ आज यहि दुसरे हिस्सा कय पाठ कीन जाय औ अपने बिचार से अवगत करावा जाय। : संपादक
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  • दसा-दुरदसा

जहाँ जाति बसै हर जाती मा
जाती के बोली – बाती मा
जाने, अनजाने, कारन मा
यक दूजे  के व्यहारन म़ा
जहाँ बसै हिकारत, भेदभाव 
कनखी नजरन की आँखी मा
भुखमरी – गरीबी फरै जहाँ
खेती  के काल – कलाही मा
ऊ गाँव कबहुँ बिसरत नाहीं
जहाँ लोटेन धुरी – माटी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

बसा रहैं चाहे अगल-बगल
पर जाति-जाति कै काम अलग
वइसै देखय मा एक गाँव
पर अन्दर-अन्दर अलग-थलग
केव ऊँच रहै केव नीच रहै
केउ ऊँच-नीच के बीच रहै
केउ सबके बीच मा पूजनीय
केउ सबके लिये अछूत रहै
मरनी-करनी, सादी-ब्याहे
इक कौम दिखै इक जाती मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

नजर-नजर मा बसै हिकारत
पहिया’ भेद-भाव कै भारत
पैदा करैं जाति मेहरारू
मरद वैमनस-इर्खा-स्वारथ
ऊपर देखे मा सदभाव
अन्दर-अन्दर गहिरा घाव
बसै गाँव मा जाति-समूह
सबमा छूत-छात कै भाव
काम न आवैं गैर-बिरादर
सादी अउर बियाहे मा 
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

बाभन-ठाकुर कै धाक रहै
मेहनत कै काम हराम रहै
हर कै मुठिया जौ पकरि लियैं
तौ पूरे गाँव मजाक उडै
खेलैं-कूदैं औ मौज करैं
चुरकी पै बहुत गुमान करैं
दुसरे कै हिस्सा खाय-खाय
कुछ लोगै बहुत मोटान रहैं
कुछ रहैं अकेलै दीन-हीन
बस चन्दन – टीका माथे मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

बढ़ई-धोबी-नाऊ-लोहार
गाँव भरेन कै सेवादार
लेहना अउर तिहाई बदले
काम करैं वै सालौंसाल
बस बिगहा दुइ बिगहा खेत
खेती होय बटइया जोत
भूमिहीन बन रहैं चमार
बभनन के खेतै ही खेत
तेली-तमोली-अहिर-कहार
करैं गुजारा जाती मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

जेतने मा जे जेस जहां रहै
वतनै मा ऊ परेसान रहै
केव कहै बिना घी ना खाबै
केहू के घर ना नोन रहै
तब्बौ लोगै खुसहाल रहैं
हँसि-हँसि कै खूब मजाक करैं
खाना-कपड़ा के आगे वै
कउनौ ना सोच-विचार करैं
भगवान भरोसे जियत रहे 
कोसैं सब खाली किस्मत का
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

धोबी पासी कोरी चमार
वोऊ करैं जाति कै मान
यक दूजे से छूत मनावैं
अपुआँ दियैं ऊँच अस्थान 
अधोगति पै सब चुपचाप
भीतर-भीतर रहैं निरास
बोलै कै हिम्मत ना होय
बाभन-ठाकुर खड़े हों पास
हीन भावना तुनकमिजाजी
बाढ़ै खूब गरीबी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा                   

चूल्हा काव चढ़ा बा माई ?
जात हई खोदै बिरवाही
पेटे मा चूहा कूदत बा
दइ द्या रोटी सुक्खै खाई
बथुआ जाय खोंटि लायू तू
सगपहिता कय दाल बनायू
कोदई क् भात ज्वार कै रोटी
देसी घी से छौंक खियायू
नीक-सूक दिन जल्दी बहुरे
गल्ला होई खेती मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

गाँव-गाँव मा नसा तमाम
बीड़ी-खैनी, गाँजा-भाँग
कहूँ पै गुड़-गुड़ हुक्का बोलै
कहूँ खाय केव दोहरा-पान
एक दसहुनी बाभन गांवै
महुआ-दारू नीक बनावैं
छूत-अछूत कां यक्कै घाटे
खटिया पै बैठाय पियावैं
चिलम-चुनौटी अउर सरौता
झूलै थैली-थैली मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

बरगद तरे मदारी आवा
डुग-डुग-डुग-डुग करै दिखावा
नाचै बानर लाठी लइकै
बंदरिया कै करै मनावा
ना मानें पै लाठी भांजै
हियाँ-हुवाँ बंदरिया भागै
सबके आगे जाय-जाय फिर
लिहें कटोरा पइसा मागै
वोकरे पहले खिसक लेई जब
कौड़ी नाहीं जेबी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

कातिक कै जोता खेत रहा
जाड़ा मन माफिक होत रहा
दुइ गाँव के हुम्मा-हुम्मी मा
वहि रोज कबड्डी होत रहा
हमरी ओरी कै यक पट्ठा
गोड़छन्हिया बहुतै नीक रहा
जेका ऊ पकरि कै छान लियै
समझौ फिर पाला दूर भवा
इरखा मा गोड़वै तूरि दिहिन
यक जने जानि कै खेलत मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

  • दयू रिसियाने – मनाये माने

बोलअ थै चिरई चौं-चौं-चौं
भूँकत बा कुकुरौ भौं-भौं-भौं
पगुराब छोड़ि अनकत बाटे
कनवा पारे बैलै दूनौं
उपराँ बादर बा लाल-लाल
घेरत बा बहुत डरावत बा
लागत बाटै लंगडी आन्हीं
पच्छू वोरी से आवत बा
चूल्हा कै आग बुझाय दियौ
ईंहन धइ लेत्यू छाहें मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

आइस लंगडी आन्हीं चढ़ि कै
खर-खुद्दुर-धुंध-धूलि-धक्कड़
दिन कै उजियारा आन्हर भै
चौतरफा अन्धियारा – अंधड़
टोवैं मनई तगड़े-तगड़े
सूझै ना लगहीं खड़े-खड़े
हमहूँ यक जगहाँ फँसा रहेन
बाँसे के कोठी मा जकड़े
यक पेड़ महा कै उखरि परा
गिरि परा धड़ाम से बगली मा 
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

परलय टरि गै, अन्हियारा कम
बचि गयन मौत के मुंह से हम
पूरे देहीं गर्दय – गरदा
जिउ आन भवा आन्हीं  गै थम
खरिहान से कुलि भूसा उड़ि गै
कपड़ा – लत्ता – खरही – छपरा
गिरि परे तमाम पेड़-पालव
सीवाने मा सारस पटरा
यक बूढ़ा उड़ि कै परी रहिन
डहरी के बगले गड़ही मा 
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

बिजुरी चमकै, गरजै  बादर
बरसै पहिला पानी असाढ़
गड़ही-गुड़हा उफनाय जाय
भरि जाय लबालब खेत-ताल
रतिया बीतै भिन्नहीं होय
लाली वाले सूरज निकरैं
पीयर-पीयर धोती पहिरे
खुब टर्र-टर्र मेघा बोलैं
हफ्तन गूंजै काने अवाज़
बसि जाय नज़ारा आँखी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

पानी ना बरसै सावन जब 
टोटका सब लोग तमाम करैं
लरिकन कै टोली निकरि जाय
सीधा पिसान घर-घर उगहैं
मिलि लोट-पोट गावैं लरिके
उल्टा मेघा हाथे पकरे
काल–कलौटी, उज्जर धोती
कारे मेघा पानी दइ दे’
पोखरा मा जायं नहांय, बनै
भौरी–भर्ता तब बगिया मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

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कुछ बड़े घरन कै मेहरारू
राती मा खेते हर नाधैं
केव बैल बनै दहिना, बावां
केऊ हर कै मुठिया थाम्हैं
धइ लियैं जुआठा कान्हें पै
जोतैं निकारि कै पहिरावा
‘बड़कऊ’, ‘फलाने’ कहाँ हया
पानी लइकै जल्दी आवा
आये डेरात मुला भागि लिहिन
धइ गगरा दूर जमीनी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

 __आशाराम जागरथ

[जारी….]