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अहै के मोरे तोहरे सेवाइ मइया_‘उन्मत्त’

manआधुनिक अवधी कविता के खास कवियन मा गिना जाय वाले आद्या प्रसाद ‘उन्मत्त’ कै जनम १३ जुलाई १९३५ ई. मा प्रतापगढ़ जिला के ‘मल्हूपुर’ गाँव मा भा रहा। यै अवधी अउर खड़ी बोली दुइनौ भासा मा लिखिन। ‘माटी अउर महतारी’ उन्मत्त जी की अवधी कबितन कै संग्रह है। अवधी गजलन और दोहन के माध्यम से काफी रचना किहिन। इनकै काब्य-तेवर ललकारू किसिम कै है: “तू आला अपसर बना आजु घरवै मूसै मा तेज अहा, / अंगरेज चला गे देसवा से तू अबौ बना अंगरेज अहा।”

आजु महतारी-दिवस है, यहि मौके पै उन्मत्त जी कै ई रचना हाजिर है:

अहै के मोरे तोहरे सेवाइ मइया!__आद्या प्रसाद ‘उन्मत्त’ 

चाहे जँघिया प लोटे बुकउना मले,
चाहे धुरिया लपेटे बेकैयाँ चले,
मुहा चूमू है गोदिया उठाइ मइया,
अहै के मोरे तोहरे सेवाइ मइया।

चाहे पहिला परगवा फनावत गिरे,
चाहे तोहरे अँगनवा मा धावत गिरे,
चलू अगवा अँगुरिया धराइ मइया,
अहै के मोरे तोहरे सेवाइ मइया।

फुसिलाइउ बजाइ घुनघुनवा तुहीं,
टिकटोरिउ है गूँगा बोलनवा तुहीं,
दुइनौ हथवा चुटुकिया बजाइ मइया,
अहै के मोरे तोहरे सेवाइ मइया।

भूख देखू तौ बावन करमवा किहू,
माई पूरा तू आपन धरमवा किहू,
मोरे डेकरे गइउ तू अघाइ मइया,
अहै के मोरे तोहरे सेवाइ मइया।

चाहे दुनिया कै आफत बिपति गरसै,
चाहे उपरा से कौनौ बलाइ बरसै,
तोहरे कोरवै म जाबै लुकाइ मइया,
अहै के मोरे तोहरे सेवाइ मइया।

__आद्या प्रसाद ‘उन्मत्त’