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नास्ति येषां यशः काये जरामरणजं भयम्!

आज पूरा दिन अजीब खामोस-धूसर उदासी मा बीता. लेट से उठेन औ कम्पूटर खोलेन तौ फेस्बुकियन से जानकारी पायेन कि गजल गायकी कै हिमालय मेहदी हसन साहिब यहि संसार मा नाय रहिगे. मन पै दुःख कै बोझ उठाये दिन कै सुरुआत भै. कयिउ साल से साहिब बीमार चलत रहे फिर अंत मा जाइके कराची के आगा खान अस्पताल मा दम तोड़ दिहिन. आवाज की दुनिया कै भगवान चला गा. अस गायक न केहू अबहीं ले भा न आगे होये. 

जइसे ताजमहल दुइ नाय होइ सकते, चँदरमा दुइ नाय होइ सकते, मलिकाये-गजल(बेगम अख्तर साहिबा) दुइ नाय होइ सकतीं, वइसनै साहंसाहे-गजल दुइ नाय होइ सकते! यक्कै हैं औ यक्कै रहिहैं – मेहदी हसन साहिब! यनकी आवाज क जे यक दाँय सुनि लिहिस ऊ हमेसा के लिए मुरीद होइगा. जे प्यार के दिनन मा रहा ऊ इन सुरन के साये मा हसीन राति काटिस. जे बिछोह मा रहा ऊ इन सुरन के सहारे करेजे मा लागि कटार कै दरद सहि डारिस. जे नास्टाल्जिक भा ऊ इन सुरन के माहौल मा अपने कल्पना-लोक मा सम्थाय लिहिस. मेहदी साहिब अपने बेमिसाल कुदरती फन के जरिये जाने केतने लोगन कै हिरदय छुइन, ढाढस बंधाइन. मनई भले चला गा मुला ई आवाज हमेसा रहे, पुरअसर! जइसे फूल के मरे के बादउ सुगंध नाय मरत! नास्ति येषां यशः काये जरामरणजं भयम्!

बरबस ऊ पहिला दिन याद आवत अहै जब यहि आवाज से पहिली मुलाक़ात भै रही. घाम रहा औ हम कयिउ कोस सैकिली से पार कैके यक सरकारी बम्बा पै पानी पियै आवा रहेन. पानी पियेन औ बैठिके सम्थाय लागेन. नगिचवै एक बाजा बाजत रहा जेहिपै अस गौनई आवत रही – ”सामने आके तुझको पुकारा नहीं / तेरी रुसवाई मुझको गंवारा नहीं..”. सुनतै-खन गीत दिलो-दिमाग मा बैठि गा. तबले हम नाही जानत रहेन कि मेहदी हसन नाव कै केहू गायक हवैं. ई गीत भुलाय नाय सकेन, हाँ जब घर छोड़ के पढ़ाई बदे दिल्ली आयेन तौ जानेन कि जौन गाना वहि दुपहरिया मा जुड़वाये रहा वहिकै गायक मेहदी हसन साहिब हैं. हियाँ आये पै यनही कै गाई औरउ गीत-गजल सुनेन औ यहि अफ़सोस पै सिर धुनेन कि अब तक हम यहि गायक से अनजान काहे रहेन. आवाज से जानि गा रहेन कि ‘सामने आके तुझको पुकारा नहीं’ मेहदी साहब गाइन हैं लेकिन वहि दिन के बाद तब तक फिर कहूं सुनै क नाही पाइ सका रहेन. अउर तमाम गाना सुनेन लेकिन ई गाना सुनै कै प्यास बनी रहि गै रही. कुछ कैसिट दुकानन पै पूछेन मुला ई गीत नाही पाइ सकेन. एक दिन बिन मांगे ई गीत सुनै कै सौभाग्य मिल गा. कुछ साल पहिले ‘वर्ड स्पेस सैटेलाईट रेडियो’ कै कनेक्सन लिहे रहेन, जेहिपै यक दिन अचानक ई गाना सुनै क मिलि गवा. भूली बिसरी लाइनन क तुरंत नोट किहेन. वहिके बाद सौभाग्य से चल-तस्बीर के साथ मेहदी साहिब क ई गीत गावत यू-ट्यूब पै पायेन. अब का रहा फिर! ‘मुदित छुधित जनु पाइ सुनाजू’! तब से जाने केतनी दाँय सुनेन! 

आज तक हम जिन दुइ गजल गायकन क सबसे ज्यादा पसंद करित है वहिमा एक हसन साहिब है औ दुसरकी बेगम अख्तर साहिबा. गजल जौन लेखन की दुनिया मा चलत रही वाहिका मौसिकी की दुनिया कै अमानत बनावे मा इन दुइ गायकन कै अमिट योगदान है. मेहदी हसन साहब से पहिले गजलन का क्लासिकी पै गावै कै ढर्रा उस्ताद बरकत अली औ बेगम अख्तर साहिबा के जरिये निकर चुका रहा. यहि ढर्रा क पोढ़ करै कै काम हसन साहिब किहिन. कौनौ दुइ राय नाही न कि यहि काम क पूरी सफलता के साथ मेहदी साहब अंजाम तक पहुंचाइन औ आवै वाले समय मा गजल गायकन के ताई चुनौती रखि गये कि होइ सकै तौ यहि ढर्रा का आगे बढ़ाओ, निखारौ! मुला, यहौ सच है कि अब न तौ केहू बेगम अख्तर होइ पाये, न मेहदी हसन! हजार सालन मा अस केहू यक पैदा हुअत है अउर अपने जाये के साथ दुनिया क हसरत भरी आंखन के साथ छोडि जात है. 

मेहदी साहिब भारत मा १९२७ क पैदा भा रहे. राजस्थान मा. १९४७ मा देस कै बटवारा भा अउर मेहदी साहिब पाकिस्तान चला गये. इतनी दूर कि जाने केतने लोगन कै उनका देखै कै हुलास कबौ न पूरी होइ सकै. अस न हुअत तौ हमहूँ अब तक मेहदी साहिब कै दरसन किहे होइत! लेकिन चलौ, सुर क, आवाज क, हवा क भला कौन सरहद बांटि सकत है! हम नाचीज हुजूर की सान मा जादा काव कहिन सकित है, बस यही कि साहिब क जन्नत मिलै! हमार सरधांजलि पहुंचै! [अमरेन्द्र/१३-६-२०१२] 

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