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मुलाकात : ‘पद्म श्री’ बेकल उत्साही जी के साथ..!

बि बेकल उत्साही जी कै नाव परिचय कै मोहताज नाहीं अहै। कबि बेकल उन गिने चुने सायरन मा हैं जिनकी कबिताई मा माटी कै महक भरपूर है। इनकी सायरी के सामे अवध की हसीन छाँव मा सुनैया/पढ़ैया देर तक मगन मन सुँहुताय सकत है। संजोग से यही महीना की ६ तारीख का बेकल जी से मुलाकात भै। यहि मुलाकात का इसमिरिति के आधार पै यहि पोस्ट मा उकेरित अहन:
      साल भर पहिले अवधी सम्मेलन / साहित्य अकादमी-दिल्ली मा पहिली बार बेकल जी से मुलाकात भै रही। तबै से इच्छा रही बैठि के कुछ बात करै क मौका लागत, संजोग से दिल्लिन मा ई मौका फिर बना। लगभग तिरासी साल के बादौ यतनी सक्रियता कमै देखै क मिलत है, जस बेकल जी मा देखान। ठाट-बाटू साहित्तकारन से अलग बेकल जी बिना कौनौ औपचारिकता के मिले। वही सदासयता के साथ मिले जेस यक अच्छे सायर मा हुवै क चही। पहिले नाव-धाव काम-धाम आद बातैं पूछिन, वहिके बाद तौ जैसे पूरे अवध कै भूगोल उनकी आँखिन मा खिंचा हुवै, यही तरह यक से यक बात करत चला गये।
     कौनौ बहुतै नाक-भौं सिकोड़ू पछिमहा कबौ बोला रहा कि इन पूरब के साकिनन से बतुवाव तौ जबान खराब होइ जात है। साइद परफूम सुँघैयन का माटी कै महक जँचत नाय, यही बात रही होये अस सोचै के पीछे। बहरहाल बेकल जी का खूब गरब है पूरब पै, यहिकी भासा पै, यहिकी सखसियतन पै, यहिकी कल्चर पै, यहिकी माटी पै। यक्कै साँस मा जाने केतना नाव गिनाय डारिन – राम , बुद्ध , तुलसी , कबीर , च्यवन रिसि , मियाँ सलार , घाघ , भड्डरी , बिरगेडियर उसमान , अब्दुल हमीद , बिनय कुमार , जिगर साहेब .. .. .. आद आद। हरदोई औ’ लखीमपुर खीरी मिलाइके यहिरी कै सगरौ इलाका पूरब मानत हैं। कहनाय है कि बस्ती के बाद फिर गोरखपुर-देवरिया मा भोजपुरी झाँकय लागत है। सन १९८६ मा जब राजसभा/संसद मा चुनि के गये तौ पहिली बार ‘पूर्वान्चल राज्य’ कै माँग रखिन, जेहिकै सबै बिरोध किहिन सिवाय दुइ-तीन जने का छोड़ि के। जाहिर है कि आजौ ई माँग चलति अहै जेहमा सियासी नखड़ा ढेर है, न कि संसकिरितिक सोच। राजनीतिक सफर कै कुछ बातौ बताइन। गौरतलब इहौ है कि ‘उत्साही’ नाव १९५२ मा पं. जवाहर लाल नेहरू काब्य-पाठ पै खुस होइके दिहे रहे।
      बेकल जी का अवधी से बड़ा लगाव है। यही वजह से उनकी खड़ी बोली की सायरिउ मा अवधी रची बसी है। ब्यापक तौर पै बेकल जी अवधिउ मा लिखिन। अउर ई काम वै अपने कबिताई के सुरुआत से निबाहत अहैं। १९५२ से मंच पै अवधी कबिताई सुनावत अहैं। यहि समय वै यक तिकड़ी के रूप मा बहुत लोकप्रिय रहे। तीनौ जने रहे: १- खुद बेकल जी , २- मोती बी.ए. , अउर ३- गोपाल सिंह ’नेपाली’। बेकल जी अवधी मा पढ़त रहे, मोती बी.ए. भोजपुरी मा, अउर नेपाली जी खड़ी बोली मा। बेकल जी यक वाकया बताइन। यक बार स्याम नरायन पाड़े निराला जी से कहिन कि “ इन लोगन से कहौ कि बेकार का देहाती मा सुनावत अहैं ! ” निराला जी कहिन कि “ देखौ , तोहार ई ‘चित्तौड़’,‘हल्दीघाटी’ रहे न रहे , मुला इनकै कविताई रहे, यै माटी कै सायर हैं ! ” बेकल जी रमई काका , बंसीधर सुकुल जैसे अवधी कवियन के साथे यक लम्बा दौर गुजारिन। काका जी के साथे आकासबानिउ मा आपन भूमिका निभाइन । हम काका जी के साथ बिताये दिनन के बारे मा संस्मरन लिखै कै निबेदन किहेन। बेकल जी बतावत हैं कि पहिली बार जब वै लन्दन गये रहे, तौ हवाई अड्डा पै बीबीसी वालेन से इन्टर्ब्यू मा अपनी बात कै सुरुआत अपनी मादरे-जुबान अवधी से किहिन:
“ नाचै ठुमुक ठुमुक पुरवाई
खेतवन बाँह लियत अँगराई
            देवी देउता सोवैं फूल की सेजरिया,
            निराला मोरा गाँव सजनी।
बन उपवन हरियाली हुमसै
माटी सुघर बहुरिया।
बँसवाटी लौचा झकझोरै
यौवन मस्त बयरिया।
पेड़न पंछी चाँदी टोरै
नदिया बीच मछरिया
            बरसै झूम झूम के सोने कै बदरिया,
            निराला मोरा गाँव सजनी। ”
                                 [ ~ बेकल उत्साही ]
बेकल जी की अवधी कबितन कै सँगरह डाइमंड पबलिकेसन से जलदियै आवै वाला है। अवधी गजल कै स्वाद लियै बरे हम सब इन्तिजारी मा अहन। अपने मा समाहित करै की अद्भुत छमता के चलते बेकल जी अवधी का बेजोड़ भासा कहत हैं। मुल्ला दाउद के चंदायन से लैके आज तक की अवधी केरि काब्य जात्रा का यहिकै परमान मानत हैं। 
      तुलसी , कबीर , जायसी जैसे कबियन के जन-जुड़ाव कै बेकल जी घनघोर तारीफ करत हैं। फिराक साहब का याद करत हैं अउर उनकी कही बात बतावत है:
“ तुलसी सायरी कै खुदा हैं अउर कबीर सायरी कै पैगम्बर ..!  ” [ ~ फिराक गोरखपुरी ]
हुजूर केर कबीर की पसंदगी पै यनही कै लिखा सेर याद आवत है:
“ छिड़ेगी दैरो हरम में ये बहस मेरे बाद,
कहेंगे लोग कि बेकल कबीर जैसा था। ”
साहब तुलसी के सबद परयोग कै क्लासिकी का बरबस सराहत हैं। कहत हैं कि ‘नज़दीक’ फारसी कै सबद रहा लेकिन वहिका ‘नगीच’ बनाय के जनता के और नगीचे पहुँचाय दियब तुलसी कै काबिले-तारीफ कमाल है। ‘गरीबन नेवाजू’ सबद मा बहुवचन बनवै कै कला देखी जाय सकत है। तुलसी भासा के अस्तर पै दुनिया भर की अच्छाई का अइस मिलाइन कि वनकी रचना कै बिस्व ब्यापक परभाव परा अउर अवधी कै आपन भासाई आधारौ बखूबी बना रहिगा। बेकल जी कै कहब है कि भासा का लैके जे बहुत फर्चई-पसन्दी ( प्योरीटैरियन एप्रोच ) करत है वहका तुलसी से कुछ सिखै क चही। कहत हैं कि अंग्रेजी तक कै सबद जिनका जनता सुतारे लै चुकी हुवै, वन्हैं कबियन का अपनी भासा मा परयोग करै क चही। जिन भक्त कबियन कै जनम अस्थान पै विवाद है, उनमा तुलसिउ जी हैं। कुछ लोगै तुलसी जनम का बाँदा जिला से जोड़त हैं, मुला बेकल जी कहत हैं कि तुलसी गोन्डा जिला मा पैदा भा रहे। गोन्डा के पसका/राजापुर गाँव मा। कहनाय है कि यनके बाद तौ जइसे तुलसी नाव धरै कै परंपरै परि गै। तुलसीपुर मा यक संत तुलसीदास भये जे जानकी विजय लिखिन। सौरव/एटा मा यक तुलसी दास भये, रतना कै तालुक यनही से रहा। गोन्डा वाले तुलसीदास देखै-सुनै मा थोरक्‌ कम ठीक रहे अउर बिन बियाहेन रहि गा रहे। यनही तुलसीदास कै सिस्य गोन्डा कै रहवैया जगत दास रहे, जे बरवै मा खूब सायरी किहिन। बेकल जी तुलसी की कबिताई का साहित्तिक बनाव-सिंगार के तौर पै देखै कै हिमायती हैं, न कि केवल आस्था के तौर पै।
      बरवै छन्द कै सौरभ अवधी साहित्त मा बिखरा परा है। बरवै छंद पै रहीम से जुड़ी घटना कै जिक्र बेकल जी किहिन। यहिकी कहानी बतायिन। रहीम दास कै नौकर छुट्टी पै चला गा रहा, नयी बियाहिता मेहरारू के लगे ढ़ेर दिन रहिगा, आवै लाग तौ चिन्ता हुवै लाग कि अब तौ रहीम बहुत बिगड़िहैं। मेहरारू दुइ लाइन लिखि के उन्हैं भेजिस:
“ प्रेम रीत कै बिरवा, लगेहु लगाय।
सीचन की सुधि लेउ, मुरझि न जाय॥ ”
जब रहीम इन लाइनैं का देखिन तौ यहि छंद पै रीझि बैठे। बड़े उत्साह मा नौकर का सजा दिहिनJ कहिन कि तोहार सजा है कि जाय के ई छंद तुलसीदास का दियौ, अउर कहौ कि रहीम भेजिन हैं, यहिमा कुछ लिखैं। गौरतलब है कि तुलसीदास रामायन यहू छंद मा लिखिन जेहिका बरवै रामायन कहत हैं।
      आज के लेखन मा मुक्त छंद की बयार का बेकल जी बहुत ठीक नाय मनते। कहत हैं कि जौने देस मा बिटिया के बिदाई के समय कै रोवायिउ तरन्नुम मा हुवत है, वहि देस के लेखन का लय-छंद से यतना मुक्त हुअब बहुत अच्छा नाहीं है। आज की हिन्दी कविता कै जनता से दूरी कै यक वजह इहौ है। यही सिलसिले मा बेकल जी अपने ‘दोहिकू’ परयोग का बतायिन कि यहिमा १३-१६-१३ मात्रा पै हम भाव का साधेन। ई दोहिकू देखै लायक है:
“ गोरी तेरे गाँव में
पीपल बरगद टहल रहे हैं
मौसम बाँधे पाँव में। ”
      अपनी सूरीनाम जात्रा के यक वाकये कै जिक्र किहिन। कहिन कि सूरीनाम मा यक बुढ़वा मनई खेते मा कुछ करत रहा, हम वकरे लगे गयेन और कहेन कि “ दादा , काव निरावत अहौ? ” एतना सुनतै दौरा दौरा लगे चला आवा और कहिस, “ हमरे देस से आवा हौ का? ” फिर मारे सनेह के रोवै लाग। “ जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी ! ”
बेकल जी के साथ..
     बेकल जी का कुछ बातन कै अफसोसउ है, लोगन के मन मा परत मजहबी फाट बहुत दुखद है। कहत हैं कि मिलवा कल्चर का न समझ पाउब आज के समय कै बड़ी खामी है, जेहिकै लाभ दुइनौ तरफ कै मजहबी लोग उठाय रहे हैं अउर लोग गुमराह हुवत हैं। साहित्त कै जनता से दूर हुअब नुकसानदेय मानत हैं, कहत हैं कि हिन्दी का भासाई तौर पै गँवईं रंग-ढ़ंग से परहेज करब ठीक नहीं। अवधी का नयी तकनीकी से दूर रहै कै उन्हैं दुख है, कहत हैं कि जइसे भोजपुरी कै ‘महुआ’ आद चैनल बन रहे हैं, अवधिउ का यही तिना आगे आवै का चाही। ग्लोबल समय मा अवधी अपनी महान समरिधि का तकनीकी से हाजिर न कै सकै, ई बहुत बड़े दुख कै बात है। लोगन का यहि काम का जोर-सोर से सुरू करै क चाही।  
      यहितरह जेतना कुछ याद आवा वहका लिखेन। खुदा से दुवा करित है कि बेकल जी दीर्घायु हुवैं, यही तरह सक्रिय रहैं, अवधी केर औरउ सँगरह आवैं, हम सबकी पीढ़ी का प्रेरना दियत रहैं ! आमीन !!
      
       लगे हाथ बेकल जी की आवाज मा ई गीतौ सुना जाय , जेहका हम बीबीसी से मोबाइल रिकार्ड के जरिये लिहेन है: 

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सादर;
अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी