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राजू श्रीवास्तव का स्वागत करें, ट्रोलिंग नहीं.

राजू श्रीवास्तव का स्वागत करें, ट्रोलिंग नहीं : अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी 

राजू श्रीवास्तव के जिस वीडियो को लेकर अवधी पेज, या दूसरी जगहों, पर उनकी ट्रोलिंग की जा रही है (उसका लिंक इस पोस्ट के आखिरी में दिया गया है, उसे देख लें) वह अनुचित है। आपका उनकी कामेडी कला को न समझ पाने का प्रमाण है यह। यह भी साबित होता है कि आप कामेडी देखते हुए एक ‘टाइप’ को ज्यादा देखते हैं, उसे पसंद करते हैं, कंटेंट को नहीं।

44249928_2761128750579881_3972386411365007360_nराजू श्रीवास्तव से आपको शिकायत है कि वे रमेश दूबे ‘रमेशवा’ की नकल कर रहे हैं। नकल कंटेंट की मारी जाती तो मैं इसे नकल कहता। ‘फार्म’ में उन्होंने बेशक रमेशवा से प्रेरणा ली है। दुपट्टा रखकर, माहौल बनाने की। लेकिन पूरी कामेडी सुनिये। उनकी स्क्रिप्ट पूरी अलग है। ओरिजनल है। वैसी स्क्रिप्ट रमेशवा की नहीं हो सकती।

फार्म के लेने को आप नकल बोल रहे हैं। इसका मतलब आपको नकल का मतलब भी ठीक से नहीं आता। रमेशवा ने एक बीडियो गब्बर वाला बनाया है। जाइये उसे देखिये। आप इसी पैमाने पर उसे राजू श्रीवास्तव की नकल कहेंगे क्या? क्योंकि शोले के कामेडी फार्म को पेश करने का शुरुआती काम तो राजू श्रीवास्तव का है।

अगर इस तरह से देखेंगे तो पाएंगे कि इक्कीसवीं सदी में हिन्दी में कई कामेडी करने वाले, जिनमें कुछ अच्छे भी हैं, वे राजू श्रीवास्तव के नकल कहे जाएंगे। कई ने फार्म छोड़िये, कंटेंट के स्तर पर भी राजू की नकल की है। कुछ तो उनकी जेब से निकली खनकती अठन्नियों की तरह।

जिस बात के लिए मैंने राजू श्रीवास्तव को धन्यवाद दिया है उसे यहाँ बताना चाहूंगा। अब के पहले राजू अवधी लहजे, अवधी मुहावरे, अवधी पद-बंध और अवधी चरित्रों को सामने ला रहे थे। पहली बार वे ‘अवधी भाषा’ में कामेडी लेकर आये हैं। भाषा की पूरी पहचान को रखने की कोशिश पहली बार उनके कामेडी प्रयास में दिखी है।

उनके पहले के प्रयासों को अवधी भाषा की दृष्टि से अनावश्यक नहीं कहूंगा। उसके साथ दो बातें रहीं। एक बात जिसे सीमा कह सकते हैं वह थी कि भाषा टुकड़े में जा रही थी लेकिन, दूजी बात, एक शक्ति भी भाषा के साथ जुड़ रही थी कि अवधी अखिल भारतीय स्तर पर, भारत के बाहर विश्व भर में भी, जा रही थी। यह काम भी जरूरी था।

अब वे जो कर रहे हैं, वह भी जरूरी है। आज का समय आनलाइन का समय है। इंटरनेट का खुला इलाका है। इससे लोकभाषा को लोकतंत्र मिला है। इसमें भाषा के खांटी और पूर्ण रूप को पसंद करने वाले भी बहुत आ गये हैं। वे उसे दिलचस्पी के साथ देखते-सुनते हैं। आज जो दर्शक वर्ग बना है, बढ़ा है, उसे पिछले दस सालों से देख रहा हूँ। साक्षी हूँ। अवधी का काम करते हुए। इसलिए खुशी होती है। अब कोई भी कलाकार देखा-सुना जाएगा। इसलिए मुमकिन है राजू इस दौर में अवधी की पूरी अस्मिता के साथ बीडियो लाते। और उन्होंने लाया। उम्मीद है आगे भी लाते रहेंगे। यह उनका एक सराहनीय कार्य होगा।

जहाँ तक रमेशवा की बात है, उन्हें इसके लिए खुश होना चाहिए कि राजू श्रीवास्तव ने उनके फार्म को विस्तार दिया। उसे स्वीकार किया। यह रमेशवा की, उनके कामेडी फार्म की, जीत है। लेकिन उल्टे वह उनपर गलत-सलत बोल रहे। उनके इलाकाई ट्रोलर्स यही कर रहे। बोल रहे कि उन्हें अवधी नहीं आती। ऐसा वे कह रहे हैं जिन्हें खुद दो वाक्य अवधी में लिखना नहीं आता। होना तो यह चाहिए कि अब एक स्वस्थ प्रतियोगिता का माहौल हो, इसलिए ऐसे प्रयासों को प्रमोट किया जाना चाहिए।

स्वस्थ प्रतियोगिता से रमेशवा भी बेहतर करने की ओर बढ़ेंगे। नहीं तो पिछली कई प्रस्तुतियों से वे चक्कर काट कर वहीं पहुंच जा रहे हैं जहाँ से उन्होंने अपनी बात कहनी शुरू की थी। एक टाइप होते जा रहे। कंटेट का नयापन व पैनापन जैसा उनके दो-तीन शुरुआती वीडियोज में था, वह बाद में नहीं दिख रहा। इस दृष्टि से राजू श्रीवास्तव का आना, इस दिशा में प्रयास करना सभी के लिए लाभदेय है। एक स्वस्थ प्रतियोगिता के माहौल को बनायें तो बेहतर।

एकाध लोग बकवास कर रहे हैं कि मैंने रमेशवा को प्रमोट नहीं किया। वे थोड़ा रिसर्च करें। रमेशवा पर पहला उत्साहवर्धक आलेख मैंने ही लिखा। मैंने ही लल्लनटाप को रमेशवा के लिए सबसे पहले टैग किया। फोन करके उनकी तारीफ की। दूर-दूर तक, जितना संभव हुआ, उन्हें शेयर किया। पचासों ने मुझसे उनका नंबर पाकर उनसे बात की। तब जब उनके यू-ट्यूब सब्सक्राइबर तीन हजार ही थे। मैंने ही उनसे कहा कि आप ‘अवधी कामेडी शो’ लिखकर अपने काम को आगे बढ़ाएं। उन्होंने यह बात मानी।

लेकिन जैसे-जैसे मैं उनकी सीमा उन्हें बताने लगा वे कन्नी काटने लगे। खास कर गब्बर वाली प्रस्तुति से। उन्हें अब सिर्फ़ तारीफ सुनने की आदत पड़ चुकी थी। वे दिल्ली आये तो मेरे साथ एक इंटर्व्यू जिसे उन्हें अवधी में देना था, समय तय करके भी बिना सूचना के नहीं दिखे। मुझे थोड़ा अखरा भी। उसके बाद वे मिलना चाहे तो मेरे पास समय नहीं था। अब उनसे मिलने की मेरी कोई इच्छा नहीं।

मुझे न रमेशवा से कुछ लेना है, न राजू श्रीवास्तव से। जिसका जैसा काम है, उसे वैसा ही बोलना पसंद करूंगा। रमेशवा से जब संवाद था तो भी उनका भला चाहा। जो ठीक लगा, उन्हें बताया। अब नहीं संवाद है तो भी उनके बेहतर भविष्य की कामना है। प्रमोट नहीं किया, यह बोलने वाले अपना बकवास बंद करें।

रमेशवा का अभिनय उस ‘फार्म’ की मौलिकता लिये हुए है जिसमें राजू ने भी अवधी कामेडी की है। उस ‘फार्म’ में राजू श्रीवास्तव उनकी तुलना में अ-मौलिक लगें, संभव है। इसलिए भी, क्योंकि उस फार्म को रमेशवा ने शुरू किया है। लेकिन ज्यों ही आप कंटेंट की तरफ से देखेंगे आपको राजू की मौलिकता समझ में आयेगी। और यह भी समझ में आयेगा ‘फार्म’ की मौलिकता के बावजूद रमेशवा की कुछ सीमाएं/दिक्कतें हैं जिनसे वह निकल नहीं पा रहा। जबकि राजू श्रीवस्तव में ‘कंटेंट’ की क्षमता अधिक है। समझ का पुख्तापन अधिक है। जिससे वे भारत के किसी भी कामेडियन को हमेशा पीछे छोड़ देते हैं। यह राजू की मौलिकता है। जिसका ‘फार्म’ के बावजूद स्वागत किया जाना चाहिए। यद्यपि अभी उनके और अवधी बीडियोज का इंतिजार है…

राजू श्रीवास्तव और रमेशवा दोनों को मेरी शुभकामनाएँ! रमेशवा को चाहिए कि अपने लोगों से ट्रोलिंग न करवाएं। राजू श्रीवास्तव ने तो आपकी तारीफ की है, यह कह कर कि “मैं तो आपका फैन हो गया हूँ।’’ कुछ उनसे भी सीखें। धन्यवाद.

राजू श्रीवास्तव के अवधी कॉमेडी शो का लिंक –  https://www.youtube.com/watch?v=ntmRnJFEJ28

— अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी
#अवधी_कामेडी_शो ॥ Raju Srivastava ॥

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‘अवधी कामेडी सो’ केरी सुरुआत ‘रमेश दूबे’ से

ई बहुत खुसी केरी बाति हय कि अब अपनी अवधिउ भासा मा, निउ मीडिया मा, ‘कामेडी सो’ केरी सुरुआत होइ गय हय। ई जिम्मा उठाये अहयँ रमेश दूबे ‘रमेश्वा’। यहि आसय कय यक पोस्ट फेसबुक पै लिखे रहेन जेहिका हुयौँ रखित अही। आप सब रमेश दूबे केरी यहि कोसिस क सराहैँ औ ओनकै उत्साह बढ़ावैँ। : संपादक
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रमेश दूबे ‘रमेश्वा’

AWADHI COMEDY SHOW – का पहला प्रयास शुरू हो गया है। हिन्दी और दूसरी भाषाओं में कामेडी शो होते रहते हैं। लेकिन गाँव-देहात की तस्वीर तभी जिन्दा हो पाती है, जब उस परिवेश की भाषा में कामेडी शो किए जाएं। लोकभाषाओं में कामेडी शो हों। अवधी में यह प्रयास शुरू हुआ जो बहुत सराहनीय है।

Ramesh Dubey की एक हास्य-व्यंग्य प्रस्तुति को कुछ दिन पहले मैंने देखा था। प्रस्तुति इतनी मोहक थी कि मैंने, कई दूसरों ने भी, उसे कई-कई बार देखा। नशा यों चढ़ा कि कलाकार से बात करके ही मन माना। बात करने के दौरान मैंने उनसे कहा कि आप ‘अवधी कामेडी शो’ के, नये मीडिया में, आरंभकर्ता हैं, इसे इसी रूप में आगे बढ़ाइये। भाषा की पहचान के साथ आपकी कोशिश और महकेगी। उन्हें बात जमी। अपने अगले एपीसोड (८-वें) को उन्होंने ‘अवधी कामेडी शो’ के साथ पेश किया।

रमेश के कामेडी की सबसे बड़ी खासियत है माहौल को उतार देना। आप थोड़ी देर के लिए भूल जाते हैं कि आप किसी महानगर/नगर के किसी कमरे में हैं। उस वक्त आप वहीं होते हैं, जहाँ कामेडी पेश करने वाला आपको ले जाता है। आपका डूबना (साधारणीकरण) ऐसा होता है कि अगर आप उस माहौल में कभी रहे-जिये हैं तो उन स्मृतियों और चरित्रों को अपने नजदीक धड़कते हुए महसूस करते हैं। फिर, जैसे एक सुन्दर कविता आपसे कहती है कि आप उसे कई-कई बार पढ़ें वैसे ही यह कामेडी भी आपसे कहती है कि इससे फिर-फिर गुजरें।

कंटेंट (अंतर्वस्तु) का नयापन अपनी प्रस्तुतियों में रमेश लाते जा रहे हैं। मुझे उम्मीद है कि अपनी प्रतिभा के दम पर जिस नयी चीज़ को उन्होंने शुरू किया है और जितनी लगन से कर रहे हैं, उसे बहुत आगे ले जाएंगे। दूसरे भी इस तरह के प्रयासों को करने की कोशिश करेंगे।

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हम सबका कर्तव्य है कि रमेश दूबे जो प्रयास कर रहे हैं उसमें उनका उत्साह बढ़ाएँ। उनका सहयोग करें। उनके कामेडी एपीसोड्स को और लोगों तक पहुंचाएँ। कलाकार के लिए जन-जुड़ाव व जन-फैलाव आक्सीजन का काम करता है। इससे रमेश और ऊर्जावान होंगे। The Lallantop ऐसा नया मीडिया चैनल है जो लोक-प्रिय-रंगों को अपने अभियान में शामिल करता रहा है। मेरा अनुरोध है कि जैसे आपने हिन्दी के कामेडी शो वालों के साक्षात्कार आदि किये, उन पर नजर मारी, वैसे ही रमेश दूबे के इस आरंभिक कार्य को लखें। ~अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी.

कल रमेश दूबे का जो अवधी कामेडी शो यू-ट्यूब पर आया है, और वाइरल है, उसे आप सबके देखने के लिए यहाँ रख रहा हूँ। यू-ट्यूब लिंक यह रहा – https://www.youtube.com/watch?v=9f5epJvfwho