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पाहीमाफी [९] : उलौहल-कनफुसौवल

आशाराम जागरथ रचित ग्रामगाथा ‘पाहीमाफी’ के  “पहिला भाग” ,  “दुसरका भाग”  , तिसरका भाग , चौथा भाग , पंचवाँ भाग , ६-वाँ भाग७-वाँ भाग८-वाँ भाग के सिलसिले मा हाजिर हय आज ई ९-वाँ भाग :   17439871_399423837084206_1780308018_n

अछूते अहसासन क समाउब पाहीमाफी-कार कय खूबी हय। धरम-परपंच, बिरादराना अहंकार, सासन-सत्ता कय नाकामी जईस बातन कय चर्चा तौ आये दिन होतिन रहत हय मुला संवेदना के धरातल पै नये अहसासन से  यहिकय मर्म रखय कय काम खासी चुनौती से भरा अहय। ई चुनौती जागरथ स्वीकार करत हयँ। हियाँ इन बिसयन पै जौने प्रसंगन कय चर्चा कीन गय अहय; वय केहू गाँव के रहवैया कय सच होइ सकत हयँ। यहि प्रस्तुति के स्टैंजन क पढ़त के कयिउ चेहरै आप केरी आंखी के तरे से गुजरि जैहैँ। कयिउ चपरहन कय नाव याद आवय लागे। यहि बिन्यास मा ई सब आउब अवध सहित समूच्चै भारत कय संवेदना क झकझोरब आय। ढेर का कहा जाय, आप सीधे कविता से रूबरू हुआ जाय। : संपादक

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  • उलौहल-कनफुसौवल

तू वनके साथे खड़ी रह्यू
हँसि-हँसि काहे बतियात रह्यू
बोलिस, बड़कऊ तू चला जाव
नाहीं पइबा मुँह भरि कै तू
घूमौ तू  बाग़-बगीचे  मा
मुँह देख लिहौ तनि सीसे मा
जो करत हया ऊ करत रहौ
बोल्यो  जिन हमरे बीचे मा
सब जानअ थै तू काव हया
हल्ला बा देश-जवारी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

‘भागौ तू बहिनी नीक हयू
हमरे बारे मा बात कह्यू !’
वोरहन लइकै ‘उतरहा’ गयिन
काहे तू अइसन कहत रह्यू ?
‘नाहीं कुछ बोलेन मान जाव
तुहुँसे ना कउनौ बैर-भाव’
तब कहिन कि गंगा जल लइकै
बड़के बेटवा कै कसम खाव
बोलिस ‘पहिले वन्हैं लावा जे
आग लगाइस बीचे मा’
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

हम कहत हई कि झूठ हुवै
हमारौ भी कहा मान जात्यू
सतुवा-पिसान लइकै हमरे
पीछे तू बहुत परी बाट्यू
यक्कै बेटवा हमरे बाटै
वोकर किरिया हम ना खाबै
वनकां हम ढंग से जानिअ थै
जे कान तोहार भरत बाटै
अल्गट्टे मिल्यू तो बतलायिब
जिन आयू वनके बाती मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

अब काव कही मन हुलरत बा
बतिया पेटवा मा पचत न बा
बइठब ना बहिनी जाय दियौ
बटुली मा अदहन खौलत बा
काने मा कइकै खुसुर-पुसुर
वै हुवां से जल्दी भाग लिहिन
ठोकैं माई माथा आपन
सुनतै ही खड़े झुराय गइन
यक बिटिया रही कुँवारी लेकिन
लरिका वोकरे पेटे मा
यक तनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

भूले नहीं भुलाये जात
काली थान्हें वाली बात
जहाँ पे राही सीस झुकावैं
लोगै जल कै धार चढ़ावैं
चढ़ै कड़ाही पूड़ी-लपसी
लोगै जाय मनौती मानैं
लाल लँगोटी चन्दन धारी
गाँवै कै यक सुन्दर नारी
दूनौ जन माई के कोठरी
राती के अन्हियारी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

हल्ला होय गय कानो-कान
लोगै बोलैं दबी जुबान
पकरि गयीं वै रंगे हाथन
काव करैं जब रहीं जवान
महादेव कां धार चढ़ावैं
धरम-करम कै पाठ पढ़ावैं
भीतर पाकै खूब गुलगुला
बाहर छूआछूत मनावैं
के मनई बान्ही कुदरत कां
जात – पात के रसरी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

बहिनी ! अब तुहुंसे काव कही
यक बात सुनेन अपने काने
हरवाहे साथे भागि रहीं
बइठाई बाटीं वै थाने
घर तरी-तापड़ी, नगद धरा
लइ भागा, हाथ सफा कइगै
उप्पर से नमक हराम चपरहा
पाँव बहुत भारी कइगै
अब होई काव दयू जानै
भै काम बुरा नादानी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

ऊ सुवर चरावै आय रही
पेड़े के तरे छहाँत रही
लहचोरा, पिपरे कै गोदा
चटकारा दइकै खात रही
यक बड़ा-बड़कवा आय गये
सन्हें से सनकारै लागै
जब बात सुनिस नाहीं वनकै
छपकी लइकै मारै लागे
बोले तू हियाँ से भाग जाव
फिर गोड़ धरिव न खेते मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

बतिया मन-भीतर धरे रही
बस खाली मौका तड़त रही
रोवाँ केवांच कै पुड़िया मा
धोती-कोने गठियाये रही
ऊ रहा, चपरहा जात रहा
मुँह-दाबे पान चबात रहा
कपड़ा निकारि जुट्टा उप्पर
ताले मा खूब नहात रहा
चल दिहिस पहिरि उज्जर कपड़ा
खजुवाय लाग कुछ देहीं मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

यक जने बहुत उधिरान रहे
परिसहिजै खेत चराय लियैं
लुलिउ-लंगड़ी कां ना छोडै
वै छेड़ दियैं, गरियाय दियैं
बउदही, कलूटी, मति-मारी
गन्धाय उमर यकदम बारी
चितपावन पंडित जी अधेड़
भुखमरी म पाँव किहिन भारी
तब्बौ सब वनकै गोड़ छुवैं
वै कथा सुनावैं घर-घर मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा.

__आशाराम जागरथ

[जारी….]

पाहीमाफी [८] : बियाह-गवन, गीत-गवनई

आशाराम जागरथ रचित ग्रामगाथा ‘पाहीमाफी’ के  “पहिला भाग” ,  “दुसरका भाग”  , तिसरका भाग , चौथा भाग , पंचवाँ भाग , ६-वाँ भाग७-वाँ भागके सिलसिले मा हाजिर हय आज ई ८-वाँ भाग :

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अनायासपन क पहीमाफी कय खासियत समझौ। कौनौ जबरी कय बौद्धिक कसरत न तौ कवि अपने वारी से करे अहय न दुसरे पढ़ैयन से यहि कय माँग करत हय। सादगी मा जागरथ कमाल करत हयँ। कवितन से गुजरत के लागत हय, जे गाँव से अहय वहिका ढेर, कि अरे वाह, ई सब तौ होतय रहा, देखव हम केतना भुलाइ ग अहन। यादन   कय बिजुरी जहाँ-तहाँ चमकय लागत हय। पढ़त के हम हुवयँ पहुँचि जाइत हय जहाँ कय बाति औ बरनन कीन जात हय। मजेदार बाति ई अहय कि जागरथ कविता मा तमाम चीजन कय नाव भर नाहीं गिनौते, ओन का रखय मा कविताई कय छीज-बट्टा हुवय से बचायेउ रहत हयँ। चीजन कय जिक्र, नउनौ, उबियावत नाहीं बल्कि अपने साथे ‘कविताई कय कुतूहल’ लिहे पढ़ैया कय चित्त लोभाय लियत हय। जइसे, फोंफी कय जिक्र वै अस करत हयँ कि कयिउ फोंफी वाले चेहरय आपके निगाही मा नाचि जायँ। फूलगोभी से वहिकय उपमा केतनी नयी अहय :

सोने कै बड़ी- बड़ी फोंफी
जैसन डड़ियाय फूल गोभी

उपमा तौ उपमा, डड़ियाब – क्रियौ आपन ब्यंजक असर छोड़त हय! : संपादक
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  • बियाह-गवन, गीत-गवनई

हमरे घर मा परा बियाह
चहल-पहल औ’ खुसी-उछाह
नात-बाँत औ जात बिरादर
गावैं थरिया-सूप बजाय
घर मा मेहरारुन कै भीर
गावैं लचारी धोबिया गीत
चमकै सेनुर, टिकुली माथे
कमर मा करधन नाके कील
मिल-जुल कै सब रोटी पोवैं
गारी गावैं आड़े मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

कड़ा-छड़ा गोड़े मा लच्छा
काने तरकी लागै अच्छा
केहू के होठे झुलनी झूलै
करियहियाँ चाँदी कै गुच्छा
सोने कै बड़ी- बड़ी फोंफी
जैसन डड़ियाय फूल गोभी
हाथे मा टड़िया गले हवेल
गुलुबन्द–मुनरी औ पहुँची
हँसुली-बिछिया अउर पछेला
पहिरैं कामे काजे मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

बड़के घर मा परा बियाह
बदला मालिक कै व्यवहार
लगा रहैं सब मनई-तनई
बाहर-भीतर नाऊ-कहार
मीठ-मीठ बोलैं बतियावैं
हरवाहे कां काम बतावैं
कबहुं-कबहुं झक्काय जायँ तौ
बड़के बेटवा कां गरियावैं
ई ससुरा अब नाक कटाई
घुसा रहअ थै चूल्ही मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

वनके शादी म बहुतै खरचा
जबकि बेगार करैं परजा
घर से लइकै जनवासे तक
वै साफ करैं लइकै कुचरा
बस खाय के बदले काम करैं
अपने घर काम अकाज करैं
काटैं लकड़ी, चीरैं चइला
नाची ताँईं ढोवैं तखता
चाहे अपुवां भुइयैं सोवैं
खटिया दइ दियैं बराती कां
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

तेलवानी भतवानी बाद
आय वियाहे दिन बारात
हाथी चढ़ि कै दुलहा आय
लइकै साथ पतुरिया नाच
पहिले भवा दुवारे क चार
गायिन समधिन घूँघुट काढ़ि
गाँव कै बिटियै औ मेहरारू
मारैं मिलि बीरा दुइ-चार
परि गै झीन भरे कय जौ
सहिबाला के आँखी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

होत वियाह भवा भिनसार
बड़हारे दिन शिष्टाचार
परिचय पावैं दूनौ पच्छै
जनवासे मा करैं विचार
कुआँ पड़ा केवड़ा-जल महकै
अतर कै खुशबू गम-गम गमकै
मिसिरी, पान, गरी कै गोला
बाटैं मेवा थोड़ा-थोड़ा
हमहूँ टुकुर-टुकुर सब देखी
बइठा यकदम कोने मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

बहुत बाय खजुवात गदोरी
पंडित बाबा दियौ मजूरी
हमहूँ अपने घर कां जाई
ना करवावा बहुत चिरौरी
बड़की बिटिया क गवन ठना बा
घर मा यक्कौ दाना न बा
मिट्टी मा इज्ज़त मिलि जाई
तोहरे दया से जवन बना बा
पाँच जने कुलि अइहैं आनैं
पठइब यक ठू धोती मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

दौरा-दौरा बड़कना आय
बोला कि गयन रहा घासी
बम्बई से मौसा आवत हैं
साथे मा मौसी भी बाटीं
बक्सा मूड़े लादे-लादे
केव आउर बा वनके साथे
चमकौवा कपड़ा लाल-लाल
पहिरे मुनिया बइठी कांधे
घर जल्दी चला बोलाइन हैं
दीदी भेजे बाटीं हमकां
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

बहुतै कम उमर हमार बाय
दादा के सिर पै बोझ बाय
गवने कै चीज जुहान बाय
गोड़े मा चप्पल नाहीं बा
यक तौ डर ऊपर से शरम
हम कहिबै वै ज़रूर डटिहैं
काकी तू कहि द्या दादा से
नीकै-बेकार खरीद लइहैं
माई हमरे ज़िंदा होतीं
ई दिन ना होतै झंखै कां
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

लोक-नृत्य चाहे संगीत
सूद-चमार , निभावैं रीत
अहिरौवा-चमरौवा नाच
धोबी गावैं धोबिया गीत
राम बकस साथिन के साथ
नाचैं खूब कहरवा नाच
डुग-डुग-डुग-डुग हुड़का बोलै
झन-झनाझन बाजै झांझ
कउनौ लोक-कला ना देखा
बाभन-ठाकुर-बनिया मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

धनरोपनी, निरवाई गीत
‘जंतसारा’ जाँता-संगीत
मेर- मेर कय होय गवनई
जइसन मौसम, वइसन रीत
‘मल्लहिया’ मल्लाहे गावैं
गंगा-गीत कै राग सुनावैं
गावैं झूमि चमार ‘चनैनी’
‘नौवा- झक्कड़’ नाऊ गावैं

‘बंजरवा’ औ तान ‘नयकवा’
तेली टेरैं रागी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

__आशाराम जागरथ

[जारी….]

पाहीमाफी [७] : परदेसी कै चिट्ठी-पाती

आशाराम जागरथ रचित ग्रामगाथा ‘पाहीमाफी’ के  “पहिला भाग” ,  “दुसरका भाग”  , तिसरका भाग , चौथा भाग , पंचवाँ भाग , ६-वाँ भाग , के सिलसिले मा हाजिर हय आज ई ७-वाँ भाग:

‘पाहीमाफी’ अब काफी उठान पै आइगा बाय। जे रचना से लगातार जुड़ा होइहैँ ते जानत होइहैं कि जौन हियाँ अहै ऊ अन्तै नाहीं। कयिउ उत्साह बढ़ावै वाली टिप्पनिउ मिलति अहयँ। आज हम ऐसनै यक टीप का हियाँ रखित अही, जेहिमा पाहीमाफी के रचनात्मक खूबी का हिगारा गा अहय:
capture-20170319-125648         “बहुतै गंभीर विवेचना क माँग करत है आशाराम जागरथ जी कै इ छोटी सी कविता। ई बतावत है कि ऊँच-नीच, भेद-भाव अउर छुआछूत के जवन धारा हमरे सब के निजी जीवन औ संस्कृति के करिखा अउर जहरीली कीचड़ से बोरत हजारन साल से बहत जात बा, ओकर अंत करै के समय नजदीक आवत बा। एतना गनीमत रहे प्रकृति के कि जेकरे कपड़ा-लत्ता , घर-दुआर के बोरत ई गंदगी के धारा बहावे क जतन किहा गा ओकर कपड़ा गंदा होइ गा मुदा ओकर हृदय बिलकुल साफ सोना एस रहि गा, अउर जे आपन कपड़ा साफ चमाचम राखे खातिर गंदगी दुसरे के तरफ बहाएस ओकर हृदय गंदगी अवर बदबू के घर होइ गा। पाहीमाफी के ई सब कविता कुसुम ओही कीचड़ आ गंदगी के दर्द के बयान हौ। अउर एहि बात के सबूत हौ कि कल जब नये भारत के निर्माण में एही कीचड़ वाले हाथ जुटिहैं तो जौने कुसुम के सुगंध से दिशा दिशा महकी ऊ गंध अब से पहले केहू के नसीब ना रही। जागरथ जी के बहुत बहुत बधाई कि आपन गांव अउर गांव के खुशबू अपने भीतर जिआये हएन।” (टीप-कार : ओमप्रकाश मिश्र

आज जवन अंक हियाँ रखा जात अहय वहिमा रचनाकार अपने चिट्ठी-लिखायी कय अनुभव बाँटे अहय। चिट्ठी के माध्यम से भीतरखाने कय ऊ सच आवा अहय जेहका बहुत कमै देखा गा अहय। रचनाकार कय निजी अनुभव हुवय के कारन बात बहुत पते पै बैठत चली गय हय। ई समझौ कि चिट्ठी लिखी गय है आपके दिलो-दिमाग मा सनेस पहुँचेक्‌ ताईं। : संपादक 
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  • परदेसी कै चिट्ठी-पाती

काहे गुलरी कै फूल भया
लागत बा रस्ता भूलि गया
बहुतै दिन बाद भेटान्या है
का हो काका ! तू भले हया
बोले, कुलि हाल ठीक बाटै
बचि गयन बेमारी से ज़िंदा
अपने घर सुखी हईं बिटियै
यकठू बेटवा कै बा चिंता
सोचिअ थै अबकी पठय देई
कुछ जाय कमाय बम्बई मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

परदेसी परदेस कमायं
लौटैं गाँव बघारैं सान
लाल अँगोछा मूड़े बान्हें
लिहें रेडियो अइठें कान
नई साइकिल, लाल रुमाल
दांत मा सोना, मुँह मा पान 
बम्बहिया लाठी कान्हें पै
विरहा गावैं टेरे तान
तहमद-बंडी पहिर कै घूमैं
चमकै घड़ी कलाई मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

कच्छा तीनै मा पढ़त रहेन
कागज़–पाती सब बचवावैं
पाई न पकरि कलम ढंग से
तब्बौ सब चिट्ठी लिखिवावैं
मुल काव करैं वनहीं सबहीं
पढ़वइया गाँव मा कमै रहे
जे रहा तनी बड़वरकन मा
छोटवरकै जात डेरात रहे
घर आवैं मेल-मेल मनई
भिनसारे–संझा–राती मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

खत लिखा सिरी उपमा जोगे
कि हियाँ पै सब कुछ कुसल बाय
ईस्सर से नेक मनाई थै
वंहकै नीकै उम्मीद बाय
आगे कै हो मालूम हाल
कातिक मा करिया जात हये
वनके हाथे कुछ सर-समान
पइसा–कौड़ी बाटी पठये
पंहुचिहैं तौ जाय कै लइ आयू
वकरे ना रह्यू भरोसे मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

करिया-करिया धगरिन काकी
पहुँचीं लइकै यक पोसकाड
बेटवा कमात बा डिल्ली मा
थोरै मा लिखि द्‌या हाल-चाल
बिचकावत मुंह वै देखि लिहिन 
बोलिन अच्छा हम जाई थै
तू पढ़ा–लिखा बाट्या बचवा !
तब्बै चिट्ठी लिखिवाई थै
हम कहेन बिहान इतवार हुवै
निस्चिंते आयू छुट्टी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

चिट्ठी लिखवावै यस बइठिन
झौवा भै गऊवाई गावैं
आंसू पै आंसू बहा जाय
बोलत–बोलत रोवै लागैं
“हाँड़ी–गगरी ठन-ठन गोपाल
अपुवां कामे नाहीं जाते
पंडित कै लरिका मारे बा
घर हीं लंगड़ात चलत बाटे
कुछ पइसा जल्दी भेजि दिहा
यक्कै धोती बा देहीं मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

जूड़ी बोखार हमरे बाटै
लिखि द्‌या बाकी ठीकै बाटै
भैं’सिया बियानी बा पड़िया
गइया बिकात नाहीं बाटै
सुरसतिया सरियारिग होइ गै
कसि मा नाहीं बाटै हमरे
अब वोकर गवन जरूरी बा
निबकावै क् बा निबरे-पतरे
समधी अबकी मागैं अइहैं
तौ मान जाब हम अगहन मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

पकरे हाथे अन्तरदेसी
मुस्की मारैं नइकी भउजी
चुप्पे अइसन पाती लिखि द्‌या
घर भागा आवैं परदेसी
लिखि द्या कि बहुत अगोरी थै
ससुरे मा नाहीं लागै मन
दस दिन कां ताईं आइ जायँ
नाहीं, चलि जाब नइहरे हम
बुढ़ऊ कै मुंह फूला बाटै
मनिआडर पाइन देरी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

लिखि द्‌या घर कां जब्बै आया
खुब नीक-नीक साड़ी–साया
अन्दर वाली दुइ ठू बंडी
यक लाल लिपिस्टिक लइ आया
सेंनुर औ’ टिकुली ना लइहैं
बस क्रीम-पाउडर लइ अइहैं
महकौवा साबुन यक दरजन
पाये पइहैं तौ लइ अइहैं
यक बहुत खुसी कै बात बाय
लेकिन लिखिबै ना पाती मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

चिट्ठी न केहू कां दिखलाया
ना सास-ससुर कां बतलाया
धइ ल्या किताब के बीचे मा
सीधे डाखाना लइ जाया
वै खड़ी–खड़ी अँगिरायं बहुत
बोलिन अच्छा अब जात हई
चुप्पै बिहान हम दइ जाबै
यक कलम नीक कै धरे हई
माई बोलिन हरजाई बा
ना आया यकरे बाती मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

भउजाई कै गदरान गाल
हथवा-गोड़वा कुल लाल-लाल
बोलैं तौ मुंह से फूल झरै
पायल झनकावत चलैं चाल
चिट्ठी लिखवाइन तब जानेन
अंदरखाने कै बुरा हाल
पहिले खुब छटकत चलत रहीं
अब तौ बिलकुल भीगी बिलार
बैरंग वै पाती लिखवावैं
पइसा नाहीं जब जेबी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

छोटकना पढ़ै नाहीं जातै
बड़कनी सयान हुवत बाटै
गोहूँ सीचै ताईं पइसा
फूटी कौड़ी नाहीं बाटै
घर कै बटवारा भवा बाय
यक ठू पाये बाटी कोठरी
बाटै वोरान रासन-पानी  
कुछ पइसा भेज दियौ जल्दी
बड़कऊ कै नीयत बिगड़ी बाे
वै बहुत सतावत हैं हमकां
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

लेकिन तू फिकर न किह्यौ कभौं
दहकच्चर-करकच झेल लियब
जिउ-जान से ठान लिहे बाटी
लरिकन ताईं अब जियब-मरब
दीवार फोरि कै रहत हई
कोठरी मा दरवज्जा नाहीं
बस साल-खांड़ दिन काटै क् बा
यहि घर मा अब रहिबै नाहीं
माटी कै भीत उठाइब हम
सरिया के बगल जमीनी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

लिखि द्‌या भइया कसि कै लिखि द्‌या
लिखि द्‌या कि जल्दी आइ जांय
अम्मा बीमार अवाची हैं
गटई बोलअ थै सांय-सांय
हम अपने घर लइ आयन हैं
बड़कऊ की वोरी रहत रहीं
अब चला-चली कै बेरा बा
कुच्छै दिन कै मेहमान हईं 
आवा मुंह देखि लिया जीतै
अटका परान बा तूहीं मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा.

__आशाराम जागरथ

[जारी….]

पाहीमाफी [६] : तीज-तिउहार (होली)

आशाराम जागरथ रचित ग्रामगाथा ‘पाहीमाफी’ के  “पहिला भाग” ,  “दुसरका भाग”  , तिसरका भाग , चौथा भाग , पंचवाँ भाग के सिलसिले मा हाजिर हय आज ई ६-वाँ भाग:

ई भाग तिउहार क लयिके रचा गा बाय। होरी क लयिके। होरी के सिलसिले मा जे होलियात हय ऊ बहुत कमय सोचत होये कि समाज कय यक हिस्सा हय जौन होरिउ जेस खुसी कय तिउहार नाहीं मनाय सकत। वहिका कब्बौ ई मौका नाहीं मिला कि सबके साथ वहू जिंदगी के रंग मा रँगि सकय। भेदभाव वाली बेवस्था उल्लासौ मा भेदभाव बनाये रहत हय। मतलब पूरी जिंदगी दुख कय, अपमान कय, जिल्लत कय, दूसर नाव बनी रहय। ‘अछूत की होरी’ लिखत के १९३६ मा वंसीधर सुकुल लिखे रहे:

खेत बनिज ना गोरू गैया ना घर दूध न पूत।
मड़ई परी गाँव के बाहर, सब जन कहैं अछूत॥
द्वार कोई झँकइउ ना आवइ।
..हमैं यह होरिउ झुरसावइ। 

हियाँ आसाराम जागरथ विस्तार से ‘भोगे सच’ क रखे अहयँ। कयिसे दूसर जाति वाले खुसी-उल्लास के मौके पै ई महसूस करावत हयँ कि ‘ई तुहुँहा नाहीं चाही।’

पढ़ा जाय ई भाग। साथे बना रहा जाय रचना के। आपनि राइयु बतावा जाय। : संपादक
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  • तीज-तिउहार (होली)

लइकै उपरी-करसी- कंडा
छोटका- बड़का, लोहरी-लरिका
फागुन म बसन्त पञ्चमी के दिन
गाडैं रेंड़, बनावैं होलिका
उखुड़ी औ आमे कै पाती
सरपत-झाँखर- टिलठा-रहँठा
ढोय- ढाय सब ढूह लगावैं
ऊँचा खूब सजावैं होलिका
बाजै ढोलक रोज ढमाढम
गाना गावैं राती मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

होलिका जरै चाँदनी रात
ऊँची लपटि उठै आकाश
सन्नाटे मा दहकै आग
देहियाँ चुन-चुन लागै आँच
भूज-भाज गोबरे कै छल्ला
गुहि कै, जौ के पेड़ कै बल्ला
सब अपने घर मा लइ आवैं
दरवाजा ऊपर लटकावैं
बोलैं जय होलिका माई कै
फूकैं वन्हैं आगी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

कुछ लरिकै, कुछ बूढ़-ज़वान
सबकै सब दिन भै बौरांय
गावैं कबिरा सा-रा-रा-रा
तनिकौ ना झेपैं, सरमांय
जवन-जवन गारी गरियावैं
केउ मेहरारू सहि न पावैं
कबहुं-कबहुं पंडोहे क पानी
कीचड़-गोबर मारि भगावैं
खीस निपोरे, दांत चियारे
हँसैं लोग मन ही मन मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

जेकरी खेती ऊ बलवान
रहै गाँव कै ऊ धनवान
बाभन-ठाकुर- बनिया के घर
पाकै नीक-नीक पकवान
मेंड़ुवा कै लपसी, गुलबरिया
बनै सोहारी औ दलभरिया
आलू कै पापड़, रसियाव
बरिया अउर फुलौरी-गोझिया
पौनी-परजा खाना पावैं
थरिया भै तिउहारी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

घूमि-घूमि नाचैं सब गावैं
बीच म ढोलिहा ढोल बजावैं
चमरौटी कां छोड़ि कै बाकी
घर-घर जाइ कै फगुआ गावैं
वनकै लरिकै घूमैं साथे
पितरी कै पिचकारी हाथेे
हमरे घर ना रंग-अबीर
टीका काव लगावै माथे
माई बोलिन सेंनुर लइ जा
के देखत बा राती मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

यक साल ‘अबीर’ कै सौक चढ़ा
मांगेन दुई पइसा अइया से
बोलिन जा ! थोरै मांग लिया
बम्बहिया वाले भइया से
हरियर ‘अबीर’ जब पाय गयन
फूटै मन लड्डू अजब-गजब
‘पंडित जी हमैं पढ़ावत हैं
वनकै हम आसिरबाद लियब’
सोचिहैं हमार ई सिस्य हुवै
कम से कम मानअ थै हमकां
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

पुड़िया मा धरे ‘अबीर’ रहेन
पंडित जी राही मिलिन गये
हम हाथ जोरि पैलगी किहेन
बिन बोले वै आसीस दिहे
जब चलेन अबीर लगावै कां
सोचेन मुराद अब मिलि जाई
झट ‘बाभन-माथा’ झिटिक दिहिन
बोले ‘तुहंका नाहीं चाही’
आपन मुँह लइकै खड़ा रहेन
बहुतै देरी तक राही मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा.

__आशाराम जागरथ

[जारी….]

पाहीमाफी [५] : विद्या-विद्यालय-छूतछात

आशाराम जागरथ रचित ग्रामगाथा ‘पाहीमाफी’ के  “पहिला भाग” ,  “दुसरका भाग”  , तिसरका भाग , चौथा भाग , के सिलसिले मा हाजिर हय आज ई ५-वाँ भाग:     16838136_1774772422548857_416297774_n

  • विद्या-विद्यालय-छूतछात

ज्यादा ना गुन गावा साथी
अपने आँखी देखे बाटी
पेड़े-पालव कै जात हुवै पर
मनई मा बस यक्कै जाती
मुला काव कहै अध्यापक कां
स्कूल म जाति कै जड़ खोदैं
ठाकुरे कां वै ‘बावू साहब’
बाभन कां ‘पंडित जी’ बोलैं
सब कहैं ‘मौलवी’ मुसलमान कां
‘मुंशी’ बाकी जाती कां
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

जो जाति-पाँति कै ज़हर रहा
कुलि इस्कूलेन मा भरा रहा
जे पढ़त रहा वोकरे माथे पै
ऊँच-नीच भी लिखा रहा
देखतै हमकां छाती फाटै
तिरछी आँखी रहि-रहि ताकै
‘हमरे बेटवा के बगल बइठ
ई धोबिया सार पढ़त बाटै’
वै तौ कहि कै बस खिसिक लिहिन
यक तीर लाग हमरे दिल मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

देखा यक दिन कि हद होइ गय
कलुवा चमार कै भद पिटि गय
अँजुरी से पानी पियत रहा
यक उंगुरी लोटा मा छुइ गय
कछ्छा दुइ मा ऊ पढ़त रहा
दुनिया-समाज से सिखत रहा
इस्कूले मा हल्ला होइ गय
कि जान-बूझ कै छुवत रहा
झाऊ कै डंडा घपर-घपर-घप
सिच्छा पाइस पीठी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

खुब सुबुक-सुबुक कलुवा रोवै
रहि-रहि मुँह हाथे पोछि लियै
लइकै तख्ती- झोरा-बोरा
पेड़े के नीचे खड़ा रहै
रोवत-सोवत फिर जाग गवा
जइसै कि रस्ता पाय गवा
यक ढेला जोर से पटक दिहिस
औ भूईं थुकि कै भाग गवा
वहि दिन के बाद से ना देखा
वोकाँ कउनौ इसकूले मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

जे जहाँ रहा ऊ वहीँ खड़ा
आतंकी लोटा रहा पड़ा
पिपरे कै चैली बीन-चून
सब ढूह लगाइन बहुत बड़ा
खुब नीक आग दहकाय लिहिन
डंडा से लोटा डारि दिहिन
जब लाल-लाल लोटा होइ गय
बाहर निकारि ठंढाय लिहिन
यक बड़ी समिस्या दूर भवा
जंग जीत लिहिन मैदाने मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

पूछैं सवाल देखैं जब भी
पावैं जवाब वै सही-सही
तब सीधे मुँह बोली बोलैं
केतनौ पढ़बा रहिबा धोबी
जियरा मा सीधै तीर लगै
हम मन मसोस चुप रहि जाई
माई बोलिन यक काम करा
अबसे ना दिहा जवाब सही
नाहीं तौ अइसन नज़र लगी
कि लागी आग पढ़ाई मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

खेतिहर ठकुरे कै यक लरिका
खुद पढ़ै न पढ़ै दियै हमकां
यक दिन कसि कै झगरा होइ गै
बोलिस बाहर पीटब तुंहकां
समझअ थ्या काव तू अपुवां कां
मुंह लाग्या न हम जाईअ थै
जेतना तोहार औकात बाय
वतनां तौ दारू पी लीअ थै
हम रहेन डेरान घरे आयन
माई समझाइन तब हमकां
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

कहूँ से आवत रहा करेठा
हमसे बोला कहौ बरेठा
पढ़ि लेबा के कपड़ा धोई
फांदौ ना किस्मत कै रेखा
बोलेन हम बोली बोलत हौ
जो कहत हया ऊहै करिबै
दस बिगहा खेत नावं लिख द्या
आजै से हम नाहीं पढ़िबै
ऊ बोला बहुत चलांक हवा
अंगारा तोहरे बाती मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

दादा कहैं कि चला घाट पै
बइठा हया बना धमधूसर
तबौ सवेरे करी पढ़ाई
कउनौ काम करी ना दूसर
माई  तब वन्हैं समझावैं
बहुत काम बा वकरे ऊपर
करै द्या वोकां जवन करत बा
गठरी धइ द्या हमरे ऊपर
काम करे के वोकर संती
के जाई  इसकूले मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

तू लिहें किताब खाट तूरा
औ’ काम करैं बूढ़ी-बूढ़ा
खबवा बनि कै तइयार भये
कूँड़ा यस पेट भरा पूरा
पहिरै कां नीक-नीक चाही
काटी उँगरी मुत त्या नाहीं
नोखे मा हया पढ़ैया तू
देहियाँ धुनियात तोर नाहीं
आगम देखात बाटै हमकां
सूअर पलबा तू घारी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

पँचवां दरजा जब पास किहेन
माई कै चेहरा खिला-खिला
बोलिन मेहनत से खूब पढ़ा
औ गाँव छोड़ि बाहर निकरा
यहि गाँव म काव धरा बाटै
सीधे कै मुँह कूकुर चाटै
खेती ना धन-दौलत-पूँजी
खाली गँहकिन कै मुँह ताकै
पढ़ि-लिखि लेत्या दिन बहुरि जात
उजियार हुअत हमरे कुल मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

पढ़वइया नीक रहा साथी
जाती मा नीचे से अछूत
पहिरे फटही जन्घिहा-आगाँ
सथवैं उ जाय रोज इस्कूल
बोला अब कइसै काव करी
गवने आई  बाटीं मेहरी
कच्छा नौ नाहीं पास किहेन
गटई ठेंकुर कै फाँस परी
जिउ कै खंइहस–कपछई बहुत
बाटैं घनघोर गरीबी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

माई तोहार दुलरुवा लरिका
पढ़ी न अबसे लइ ल्या बस्ता
लावा परसा खाना खाई
आज दिमाग बहुत बा खट्टा
कागज़-कलम कां पइसा नाहीं
देहीं ढंग कै कपड़ा नाहीं
बाभन-ठाकुर रहत हैं अइंठे
काव करी घर बइठे-बइठे
जाबै हम परदेश कमाय
आग लगै हरवाही मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

माई रोवैं कहि ना पावैं
अपने शकि भै खुब समझावैं
सोचत रहेन कि पढ़ि-लिखि लेबा
जिनगी  नाहीं  होई  रेंगा
बाप कहैं कुछ करै क चाही
कब तक करिबै हम हरवाही
मुन्नी बोलिस भइया जाया
हम्मै ताईं खेलौना लाया
ठौरिग होय कै सोच लिया तू
दुविधा ना पाल्या मन मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

भिनसारे यक दिन उड़ी हवा
‘तेजू खां’ चुप्पे भाग गवा
मेहरारू घूंघुट मा सुसकै
महतारी बोलै गजब भवा
केव कहै कि लरिका रहा नीक
परदेश चला गै भवा ठीक
पढ़वइया बनत रहे सरऊ
अब जाय क् मागयँ हुवां भीख
केव कहै कहूं न गै होई
गइ होई नाते-बाते मा 
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

__आशाराम जागरथ

[जारी….]

पाहीमाफी [४] : मौज-मस्ती, काम-काज

sssssसिसिलेवार ढंग से पोस्ट कीन जाति, आशाराम ‘जागरथ’ कय रचना, ‘पाहीमाफी’ कय ई चौथा हिस्सा आपके सामने रखा जात अहय। यहिके पहिले केरी कड़ियन क पढ़य खातिर यहिपै क्लिक करैं : “पहिला भाग” ,  “दुसरका भाग”  , तिसरका भाग। तौ आज यहि चौथे हिस्सा कय पाठ कीन जाय औ अपने बिचार से अवगत करावा जाय। : संपादक
_____________________

मौज-मस्ती, काम-काज

हल्ला होत भोरहरी होय
दोगला चलै सिंचाई होय
थोरै देर चलाई हमहूँ
देहियाँ खूब पसीना होय
सूख जाय कुछ ताल कै पानी
लइकै धोती मछरी छानी
कनई मा जब पाई सुतुही
जियरा गद-गद काव बखानी
घर सइतै कां चिक्कन माटी
ढोय कै लाई पलरी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

बरहा ऊँच बनावा जाय
ढेंकुर–कूँड़ चलावा जाय
गोहूँ अउर केराव कय खेत
हाथा से हथियावा जाय
अन्नासै काँ दीहन बोय
पानी आवत बाटै रोय
हाली-हाली जाय कै देखा
बरहा कहूँ कटा न होय
कउनौ खानी फसल जो होई
आधा मिली बटाई मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

फरवारे मा दँवरी नाधे
लोगै गोहूँ दाँवै साथे
करैं बैल मिलि घुमरपरैया
मुँह मा जाबा बांधे-बांधे
अखनी-पैना-पाँची-पाँचा
झौवा-झौली-खाँची-खाँचा
बभनन के खरही पै खरही
बोझै-बोझ अलग से गाँजा
बाकी जात बेचारे ताकैं
लेहना पीटैं कोने मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

चलै न पछुवा ना पुरवाई
मारि परौता करी ओसाई
भूसा चमकै ढूह सोहाय
दमकैं अन्नपूर्णा माई
कुचरा लेहें बटोरी  कूँटी
कूँटी मा गूंठी ही गूंठी
छूटै खुलरा ताकै दाना
जब मुंगरी से वोका कूटी
कुछ छिटका कुछ गिरा अनाज
बीन धरी हम मौनी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

गड़ही मा खोदा गय चोंड़ा
फूटा पानी छाती चौड़ा
फरवारे कै बैल पियासा
पानी पीयैं जोड़य-जोड़ा
कोहा भै बारी-फुलवारी
वहमां खूब हुवै तरकारी
ढोय-ढोय चोंड़ा से पानी
सींचैं बेटवा औ महतारी
उज्जर-हरियर अउर बैगनी
भाटा लउकै पाती मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

गरमी कै बेहाल महीना
माथे तल-तल चुवै पसीना
‘ढोलिहा’ साथे भइंस चराई
छाँहे बइठे गप्प लड़ाई
लाठी बजा-बजा वै गावैं
हमहूँ साथे तान भिड़ाई
गोरु चरत दूर जो जावैं
वन्हैं हाँक नगीचे लाई
बगिया सुर्र-कबड्डी खेली
भंइस जुड़ावैं पानी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

गले जुआठा नाक नकेल
हर नाधी औ जोती खेत
‘वा-वा’ कहे दाहिना समझै
‘तता-तता’ से बाँवा बैल
कुर्ह कै मूंठ पकरि यक हाथे
सीधी कूड़ रही हम साधे
पाछे-पाछे गोहूँ बोवत
माई चलैं सिकहुली लादे
दुइयै बाँह जो दियै हेंगाय
चमकै खेत दुपहरी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

सरसइया पै चढ़ै केराव
मेर-मेर कै फूल फुलाय
पोपटा से गदराई छीमी
मौनी लइकै तूरा जाय
आपन खेत रखावा जाय
चिरई हुर्र, उड़ावा जाय
अक्सा अउर केराव कै फुनगी
खोंट-खांट कै खावा जाय
छौंकी घुघुरी, भात-निमोना
रोजै रोज बनै घर मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

चैत माह कटिया भदराय
झुर-झुर-झुर-झुर बहै बयार
बड़े भोरहरी खेते जाई
कुर-कुर-कुर-कुर करी कटाई
ऊपर चटक चनरमा चमकै
दूर-दूर तक गोहूँ दमकै
दुई-यक पहँटा काटी हमहूँ
बोझा बान्ही रसरी लइकै
घर भै मिलि कै खरही गांजी
ढोय-ढोय फरवारे मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

हमरौ छपरा लिऔ छवाय
काव कहत बाट्या तू भाय
हूँड़-भाँड़ मा हमहूँ तोहरे
कामे कबहूँ जाबै आय
बटवारा मा भीत उठाइन
दादा वोकां रहे छवाइन
पाँच साल के उप्पर होई गै
छपरा मा बस बाय कराइन
अबकी नाहीं होई गुजारा
पातर-पुतर पलानी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

ताले बीचे कनई म् जाय
रहंठा दबा के दिहिन भिगाय
भूसा ताईं एक मंडिला
पांडे ऊंचे दिहिन छवाय
पांच जगह रहंठा कै बाती
कौंची अइंठ बनाइन टाटी
गोल-गोल लम्मा कै गोला
आरी-आरी पाटिन माटी
चुरकी वाला टोपा पहिरे
खड़ा मंडिला घामे मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

का हो तू काव करत बाट्या
मेला नाहीं देखै जाब्या
भिनसारे से देखत बाटी
खटिया कै बाध बरत बाट्या
वै झारि कै बिड़वा डारि दिहिन
बोले नियरे आवा बइठा
फिर बोले बोली ना बोलौ
माचिस लइ ल्या बीड़ी दागा
तोहरे माफिक कउनौ हमार
बेटवा कमात ब दिल्ली मा ?
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

घासी ताँईं खेते  जाई
मेंड़े बइठा गाना गायी
सरसौ कै कँड़री तूरि-तूरि
छिलका निकारि कच्चै खाई
‘गुलुरू’ गोहराइंन आय जाव
झौवा लै हमरे खेत चलौ
सरसौ-केराव कां छोड़ि-छोड़ि
अंकरा- बहलोलिया छोल लियौ
सरसइया वोहरी गझिन बाय
थोरै उखारि ल्या सागी कां
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

बिन खाये गयन खेत गोड़य
दुपरिया भये घरे आयन
निकरी बिलार चूल्ही मा से
दरवज्जा खुल्ला हम पायन
बरतन-कुरतन छितरान परा
घर मा ना रहे परानी क्यौ
बटुली बोलिस ठन-ठन गोपाल
कुछ काछि-कूछ कै खाय लियौ
मोटकी रोटिया बा तुहै अगोरत
उप्पर धरी सिकहुली मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा
unnamed गन-गन जेठ दुपहरी बाय
बइठा येक गपोड़ी बाय
आवा, छाँहें बइठ बगल मा
घेरि-घेरि बतियावा जाय
वत्ते चला ना बइठा हीयाँ
गिरत बाय पेड़े से कीयाँ
गोटी खेल ल्या हमरे साथे
धरे हई इमली कय चीयाँ
मजे-मजे अब जूड़ हुवत बा
चलै का चाही घासी कां
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

 __आशाराम जागरथ

[जारी….]

‘पाहीमाफी’ [३] : मन लरिकइयाँ कै नरम-नरम

16002909_368661613493762_7146674138761624111_nसिसिलेवार ढंग से पोस्ट कीन जाति, आशाराम ‘जागरथ’ कय रचना, ‘पाहीमाफी’ कय ई तिसरका हिस्सा आपके सामने रखा जात अहय। यहिके पहिले केरी कड़ियन क पढ़य खातिर यहिपै क्लिक करैं : “पहिला भाग” ,  “दुसरका भाग” । तौ आज यहि तिसरके हिस्सा कय पाठ कीन जाय औ अपने बिचार से अवगत करावा जाय। : संपादक
______________________

मन लरिकइयाँ कै नरम-नरम

गोरहर झुर्री करिया गोदना
आजी कै लम्बा डील-डौल
बित्ता से बेसी यक घेंघा
गटई मा लटकै गोल-गोल
झिर्री यस धोती मारकीन
पहिरे कमीज हरियर-हरियर
चाँदी कै हँसुली पौवा भै
घेंघा म् बाझै करिया-उज्जर
महकै घिउ-दूध-दही गम-गम
बइठी जब वनके गोदी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

बगल धरे कजरौटा-डोकवा
बूढ़ी माई लगावैं बुकवा
कहैं दूध ई गुट कै जाव
नाहीं तौ आ जाई बिगवा
‘कीचर-काचर कौवा खाय
दूध-भात मोर भैया खाय’
दइ कै काजर दूनौ आँखी
एक डिठौना दियैं लगाय
जुरतै भाग हुवां से जाई
खेली धूरी-माटी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

गोड़ मोड़ि आजी बैठावैं
घंता-मंता खूब खेलावैं
गोदी मा दुपकाय लियैं औ
पौंढ़े-पौंढ़े गीत सुनावैं
घोरतइयाँ तांई नंगाई
डांट दियैं तौ चुप होय जाई
सुबुक-सुबुक कै बीदुर काढ़े
रोय-रोय हम करी ढिठाई
गरम जलेबी छनै छना-छन
सपना देखी राती मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

ऊ दिन अबहूँ बाटै याद
मेला देखै कै फरियाद
घर मा फूटी कौड़ी नाही
रोई हम समझी न बात
ना रोवो अब जाओ मान
नाहीं तौ कउवा काटी कान
कनियाँ लइकै बूआ हमकां
उंगुरी-सीध देखावैं चाँद
‘लकड़सुन्घौवा पकरि लेअ थै
मेला वाली राही मा’ 
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

गाँव म् जब केउ परै बेमार
होय जरूरी काम अकाज
खाय-खाय खरखोदवा घर मा
बइठे रोग ठीक होय जाय
लेकिन अगर रोग गंभीर
गलि कै ठठरी हुवै सरीर
कहाँ से लावै पइसा-कौड़ी
दवा से सस्ता मरै फकीर
कहँरै अउर महिन्नौँ झेलै
खटिया लधा ओसारे मा 
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

हमरी आजी जब मरी रहीं
घेंघा मा पाका भवा रहा
कउनौ ना दवा–दवाई भै
बस खाली सेवा भवा रहा
भैया रहे ‘राम लौट’ बड़के
पेटे मा दर्द उठै वनके
रहि-रहि चिल्लायं रात भै वै
रोवैं माई बइठे–बइठे
चलि बसे रोग पथरी लइकै
जिनगी के सोरह साली मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

तप्ता बारि सब सेकैं आँच
हम खेली औ खाई डांट
खूब लगै कसि कै जब जाड़ा
कट-कट-कट-कट बोलै दांत
पैरा बिछै के ओढ़ी कथरी
जाड़ लगै होइ जाई गठरी
टी० बी० रोगी माई खांसैं
पूरी देहियाँ खाली ठठरी
सिकहर टांगी रोटी खाई
स्वाद रहा खुब बासी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

मासा लागैं सोय न जाय
काटैं उडुस बहुत खजुवाय
यक्कै बेना के-के हाँकै
लागै गरमी सहि न जाय
उठी रात खुब पानी पीई
छींटा मारि बिछौना भेई
कबहुं-कबहुं तौ रात म उठि कै
फरवारे मा जाय कै सोई
ढुरुक-ढुरुक कै चलै बयार
रहि – रहि लागै देहीं मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

सूरज का लुकुवावै बदरी
बहुत जोर जब घेरै कजरी
बरसै तड़-तड़, चूवै छप्पर
अरगन टाँगी भीजै कथरी
दस-दस दिन बरखा न जाय
सूखै ना कपड़ा गन्धाय
कीच-काच मा आवत जात
गोड़ कै उंगुरी सरि-सरि जाय
चुवै ओरौनी झर-झर-झर-झर
उठै बुलबुला पानी मा 
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

गौधुरिया घेरै अन्हियार
कंडी लइकै माँगी आग
तान टेर बोलै करकच्ची
हुआँ-हुआँ चिल्लाय सियार
जुगुनू उडै  गिनी हम तरई
बदरा लागै भागत मनई
झूरा परि गै खतम अनाज
सुनतै खून घटा यक परई
पढ़ी तो ढिबरी बुत-बुत जाय
तेल दिया न बाती मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

एक रात अन्हियारी घरिया
गाभिन भइस बियाइस पड़िया
जुगुर-जुगुर ढिबरी मा लौकै
नान्ह कै लेरुआ करिया-करिया
खुटुर-पुटुर कुछ साफ-सफाई
टूटी नींद नाहिं फिर आई
पेउस दूध गारि बल्टी भै
इनरी ढेर बनाइन माई
नेसुहा कोयर बालैं दादा
लाय हरेरा खाँची मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

सुबह-सुबह मकलाय पड़उवा
दूध पियै घरिया मा लेरुआ
घड़- घड़- घड़- घड़ जाँता बोलै
कड़िया मा घप-घप्प पहरूवा
सानी-पानी, हौदी-नादा
तापैं तपता बारे आजा
उखुड़ी छोलै कां गोहरावैं
पहँटैं हँसिया अउर गड़ासा
भुजिया धिकवैं बूढ़ी माई
बुज्जा फूलै हांड़ी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

यक ठू गीत सुनावत बाटी
वोकर अरथ बतावा साथी
वोका-बोका तीन तिलोका
लइया लाठी चन्दन काठी
अमुनिक जमुनी पनिया पचक
खेलैं कुल लरिके मटक-मटक
चिउँटा-चिउँटी, हाथी- घोड़ा
तू का लेबा झट-पट बोला
हाथ पे हाथ धरे तर ऊपर
मूड़ भिड़ाये मूड़ी मा 
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

होत भिनौखा यक ठू भाट
खझरी बजा के गावत जाय
‘उवा सुकौवा भय भिनसार
टटिया खोला हे जजमान
सुन्दर मौनी सुंदर दान
सुन्दर पूत दियैं भगवान’
सोची काहे ई मांगत बा
हट्टा-कट्ठा एक किसान
दादा बोले तू न बुझबौ
भिच्छा यकरे जाती मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

नियति-स्थिति औ लाचारी
लियै परिच्छा बारी-बारी
पीकै घूँट खून कै जब-तब
सोची-समझी अउर विचारी
ऊँच-नीच के दिहिस बनाय़  
धन-धरती कां बाँटिस नाहि
काम करै सगरौ दिन केऊ
केऊ खाली बइठे खाय
कबहूँ कहूँ मिलै ना उत्तर
ढूढ़ी रोज किताबी मा 
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

unnamedपूजेन पहाड़ तब्बौ ना पायन
काव मिला जब हम सधुवायन
कइसे कही झूठ बा दुनिया
दूइ दिन से कुच्छौ ना खायन
‘गीता’ बोलै बस काम करा
फल-वल कै चिंता छोड़ि चला
वहि राही चले बाप – दादा
भुखमरी औ छूआछूत मिला
भेड़िया – धसांन मा ना रहिबै
कूदब ना कूआँ – खाई मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

 __आशाराम जागरथ

[जारी….]