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बाबा निमिया कै पेड़ जिनि काटेउ

village_india_scene_paintings_nature_hut_street_agriculture_farmers_एक दिन फिर जाता है और सारी स्थितियाँ बदल जाती हैं। विवाह के परोजन में, विदाई के पहले वाली रात तक कितनी चहल-पहल रहती है! जिस दिन कन्या की विदाई होती है, उस दिन का सूरज ही कुछ मायूसी लिए उगता है। कुछ पहर ही बीतते हैं, हालात ‘यू-टर्न’ ले लेते हैं। स्त्रियों के जिन कंठों ने उल्लास में ‘गारियाँ’ गायीं, वे अब बेबस हो कर विरह के दुख को सबद दे रहे होते हैं। विदाई का ऐन वक्त! बुक्का फार कर रोता परिवेश! मानव का सुख-दुख कितना परिवेशी है, जड़-चेतन सब अपनी भाषा में कूकते हैं। गाँवों में लोग ही नहीं, गोरू-बछरू भी इस विदाई के दुख को महसूस करते हैं। वे कान उटेर-उटेर कर पूरे परिवेश को अपने ढ़ंग से समझने की कोशिश करते हैं। वे निराशा के साथ देखते हैं कि इन इंसानी कायदों में उनका कोई दखल नहीं है। विदाई के बाद उनकी आँखें अँसुवाई रहती हैं। कई दिनों तक। एक गाय का सत्याग्रह मुझे याद है जिसने कई दिनों तक पानी की बाल्टी की ओर देखा तक नहीं। वह उन हाथों की प्रतीक्षा में थी जो मेहदी लगा के ससुराल चले गये, जिन्होंने पानी की बाल्टी भर-भर इनकी प्यास बुझाई थी। प्रकृति इतनी कृतघ्न कहाँ हो सकती है!

विदा होती लड़की भी परिवेश के महत्व को खूब जानती है। उसे घर के इन पशुओं का ही नहीं, पेड़ों-पौधों की भी भूमिका का पता है। वह अपने घर के नीम के पेड़ और उस पर आने वाली, कूजने वाली चिड़ियों में जीवन का फैलाव देखती है। उसे अपने विदा होने पर पूरे परिवार की चिन्ता है। खास कर माँ की। बेटियों के बिना घर कितना वीरान होता है, यह वह जानती है। इस वीरानेपन में माँ कितनी अकेली पड़ जाएगी, इसको लेकर वह चिंतित है। विदाई के समय वह अपने पिता से इस नीम के पेड़ को न काटने का अनुरोध करती हुई बड़ी करुणा के साथ कहती है –

बाबा निबिया कै पेड़ जिनि काटेउ,
निबिया चिरैया बसेर, बलैया लेहु बीरन की।
बिटियन जिनि दुख देहु मोरे बाबा,
बिटिया चिरैया की नाँय, बलैया लेहु बीरन की।
बाबा सगरी चिरैया उड़ि जइहैं,
रहि जइहैं निबिया अकेलि, बलैया लेहु बीरन की।
बाबा सगरी बिटियवै जइहैं ससुरे,
रहि जइहैं अम्मा अकेलि, बलैया लेहु बीरन की।

विदा होते हुए अपने कठिन दुख में उसे चिड़ियों की याद आ रही है। चिड़ियों की याद क्यों? ससुराल की चौहद्दी में खुद को सीमित होते देख उसे आकाश में उन्मुक्त उड़ान करने में समर्थ चिड़ियों की याद स्वाभाविक है। उड़ान कहीं की भी हो, बसेरा तो नीम पर ही है। बसेरे से अलग होने में उड़ान भरने का हौसला भी खत्म। इस बात को माँ ही सबसे ज्यादा समझ सकती है क्योंकि पितृसत्ता के क़ायदों से उसने भी कभी अपना आँगन छोड़ा है! अब एक एक करके सारी बेटियों के जाने के बाद यह का नीम का पेड़ और उस पर बसेरा लिये चिड़ियाँ ही उन बेटियों की अनुपस्थिति को भरेंगी। दिल को दिलासा दिलाना होगा कि अब इन चिड़ियों के कूजने, चहचहाने और उड़ने में बेटियों की आरजूएँ भी जाहिर हो रहीं!

लेकिन निरुपायता तो देखिये, आँगन के इस पेड़ के भविष्य पर भी माँ का कोई अधिकार नहीं है। अतः बेटी विदा होते वक्त अपने बप्पा से अनुरोध कर रही है कि बड़ी मेहरबानी करके इसे मत काटियेगा। फिर भी कहीं उसे संशय है। तो क्या किया जाय! पिता का सबसे प्यारा कौन है? कोई बेटी नहीं, बेटा है। तो उसी को आगे करके बात की जाय। बेटी कहती है कि हे पिता जी मैं बीरन(भाई) की बलैया लेती हूँ(यानी, मंगलकामना करती हुई उसके रोग-दोख सबको अपने ऊपर लेती हूँ), लेकिन इस पेड़ को मत काटना। उसे यकीन है कि बेटे के ज़िक्र के बाद इस बात को पिता जी गंभीरता से लेंगे और नीम का पेड़ बचा रहेगा। ‘बिटियन जिनि दुख देहु मोरे बाबा’ – में कितना कातर स्वर है! अब तक जो हुआ, सो हुआ, अब आगे जो बिटियाँ बची हैं और आख़िर उन्हें भी तो चिड़ियों की तरह चली ही जाना है, तो उन्हें इन बचे हुए दिनों में भला क्यों दुख देना।

इस गीत पर थोड़ा रुक कर सोचने पर मन करुणा से भर जाता है। इसमें एक ओर पितृसत्ता के सामने लाचार-सी स्त्रियों की व्यथा है तो दूसरी ओर दुख-दर्द की प्राकृतिक साझेदारी। क्या अब भी यह प्राकृतिक साझेदारी है हमारे बीच? पेड़ों-पक्षियों के साथ आज हमारे रिश्ते कैसे हो गये हैं। हम कितना कट चुके हैं उनसे जो हमारे गाढ़े के साथी रहे और जिन्होंने सदियों से अपनी प्राकृतिक बाहों में हमें संभाले रखा। लोक-रसिक विद्यानिवास मिश्र की इस गीत के प्रसंग में यह टिप्पणी महत्वपूर्ण है कि ‘पेड़ों के साथ उन आदमियों का जो रिश्ता है वह रिश्ता आज हमने तोड़ दिया। पेड़ अब बाज़ार के अंग बन गये हैं। उनकी जो निर्मम कटाई हुई है वह उस प्रज्ञा के विरुद्ध है जो लोगों के अंदर मौजूद है।’ आज शहर हर तरफ़ अपना अपने हाथ-पाँव पसारता जा रहा है, शहरी प्रवृत्तियों का बोलबाला दिनोंदिन बढ़ता जा रहा है। अब ज़रूरत है कि इस स्वभाव और प्रभाव से अलग हट कर गाँवो में, ग्राम-भाषा में और गाँव के परिवेश में जाकर हम फिर से अपने जीवन पर सोचें। यकीनन हमारा हृदय अधिक विशाल होगा और मस्तिष्क अधिक प्रखर।
~अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी

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