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अवधिउ वाले अइसनै अहयँ!

 संजीव तिवारी छत्तीसगढ़ी कय समर्पित वेब-संपादक हयँ। सबसे बड़ी बाति ई हय कि अपनी भासा और संसकिरिति के ताईं बहुत सक्रिय रहत हयँ। वय ‘अवधी कय अरघान’ क लयिके यक बात लिखे अहयँ जेहका हम हियाँ रखत अहन। उनहिन केरी बात, बिना काट छाँटि के। संजीव जी अवधी के मुकाबले, छत्तीसगढ़ी मा यहि मानसिकता क देखत हयँ कि लोगय हिन्दी मा तौ लिखत हयँ मुला अपनी मादरी जुबान मा नाहीं। उन कय दर्द बहुत सालय वाला हय। सच कही तौ अवधिउ मा ई बाति लागू हुअत हय। छत्तीसगढ़ी के मुकाबले लागि सकत हय कि अवधी मा बेहतर स्थिति अहय, मुला अवधिउ वाले अइसनै अहयँ। अपनी मातरी भासा क लयिके कुंठा औ हीनभावना कय सिकार। नाहीं तौ अवधी कय मौजूदा हालात अऊर हुअत। : संपादक
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”छत्‍तीसगढ़ी की अहमियत__संजीव तिवारी

आज ‘अवधी कै अरघान’ पर ठहरते हुए फिर, बहुत से प्रश्‍न मुह बाये खड़े हुए, बहुत से अनुत्‍तरित प्रश्‍न, चारो तरफ घूमकर वापस मुझ पर, गंदी-भद्दी गालियों के मानिंद पिल पड़े।

खड़ी बोली हिन्‍दी की जगत स्‍थापना हो जाने के बाद भी अवधी भाषा में साहित्‍य रचने वाले साहित्‍यकारों में तरक्कीपसंद कवि त्रिलोचन शास्त्री और रमई काका जैसे अनेक लोग रहे जो मातृ भाषा या क्षेत्रीय भाषा में भी लिखते रहे। ऐसे ही हिन्‍दी के कुछ साहित्‍यकार हैं जो प्रादेशिक भाषा में भी थोड़ा-बहुत रच कर धरती का कर्ज उतारते हैं। ऐसा भारत के सभी प्रदेशों में होता है, नहीं होता तो सिर्फ छत्‍तीसगढ़ में। यहॉं हिन्‍दी का बड़ा साहित्‍यकार छत्‍तीसगढ़ी में रचना तो दूर, उससे अपने आप को अपरिचित रखना ज्‍यादा पसंद करता है।

छत्‍तीसगढ़ हरा-भरा चारागाह होने के कारण यहां चारा चरने देश के अन्‍य हिस्‍से से लोग यहां आते रहे हैं और बड़े पइसेवाले के साथ ही बड़ा साहित्‍यकार भी बनते रहे हैं। छत्‍तीसगढ़ के ये प्रतिष्ठित हिन्‍दी के साहित्‍यकार, जिन्‍हें हिन्‍दी में उंचाईयां मिली हो वे छत्‍तीसगढ़ी के प्रति स्‍नेह ही रख लें तो छत्‍तीसगढ़ी धन्‍य हो जायेगी किन्‍तु कुछेक को छोड़ दें तो, ऐसा नहीं हो रहा है। कैलाश बनवासी एवं डॉ.परदेशीराम वर्मा की रचनायें हिन्‍दी में होते हुए भी जैसे छत्‍तीसगढ़ी में बोलती हैं, उसी तरह ये साहित्‍यकारों की रचनायें बोलने का उद्यम करते भी लगे तो कोई बात थी।

किन्‍तु नहीं, उन्‍हें छत्‍तीसगढ़ी नहीं आती, वे सीखना भी नहीं चाहते क्‍योंकि तुमने उनका तलुआ चांटकर उन्‍हें सदा उंचे ओहदे पर बैठाया है, राज्‍य की सुविधा और सम्‍मान दिलवाया है। जो सम्‍मान-पुरस्‍कार, सुविधा और अधिकार आपको मिल सकता था उसे भी आपने उनको मिलने दिया है, कभी विरोध नहीं किया है। ऐसी बात नहीं है कि वे छत्‍तीसगढ़ी समझते नहीं या बोलते नहीं। यह बात भी नहीं है कि वे छत्‍तीसगढ़ी की इज्‍जत नहीं करते। वे छत्‍तीसगढ़ी की भरपूर इज्‍जत करते हैं, उसकी अहमियत तो बहुत अच्‍छी तरह से समझते हैं क्‍योंकि उनके घरो में कामवाली बाई, नौकर या ड्राईवर भी हैं। छत्‍तीसगढ़ी की अहमियत उनके घरों में और दिलो में, यही है।”