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यक संबाद अवधी के बर्तमान दसा क लयिके

44106521_2751698151522941_1129920941124485120_nअवधी कय आज काहे यतना बे-पहिचान होइगा अहय, यहि बाति क लयिके यक संबाद फेसबुक के अवधी पेज पै भा रहा। संबाद के आधार मा अमरेन्द्र अवधिया कै यक पोस्ट रही। अवधी सीनियरन क संबोधित कीनि गय रही। ओहपै टिप्पनी करत ‘अवधी ज्योति’ अवधी पत्रिका केर संपादक रामबहादुर मिसिर सीनियरन के ऊपर धरे सारे आरोपन के जवाब मा युवा लोगन क बयान बीर औ जाने काव-काव कहिन। वहिके जवाब मा शैलेन्द्र शुक्ल औ अमरेन्द्र अवधिया आपन जवाब रखिन। ई बतकही यक दस्तावेज के रूप मा सहेजी जाति अहय। बाति अवधी पेज पै भय रही। यही आठ अक्टूबर का। पेज से अनुमति लयिके संबाद हियाँ पेस कीन जात अहय। : संपादक 
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  • यक संबाद अवधी के बर्तमान दसा क लयिके

अवधी Awadhi :  ई पोस्ट पढ़ा जाय….. दुसरे के वाल से लीन गय अहय, यहिलिये ओही केरी भासा, खड़ी बोली-हिन्दी मा, अहय! मुला बात मार्के कय कही गय अहय…..

यह सवाल उन अवधी सीनियरों से पूछिए जो आज अवधी युवाओं के सामने आने पर खदबदा जाते हैं, जद्द-बद्द बकते फिरते हैं…पूछिये कि :

जब दिल्ली में मैथिली-भोजपुरी अकादमी बन रही थी तब आपने अपनी अवधी के लिए अवधी अकादमी का सवाल क्यों नहीं उठाया? भारत की राजधानी में आपको अपनी भाषा के लिए अकादमिक प्रतिनिधित्व की जरूरत क्यों नहीं महसूस हुई?

अवध के अमेठी और रायबरेली ने भारतीय राजनीति में कितने प्रधानमंत्री दिए, किससे छुपा है! फिर भी आप राजधानी दिल्ली में अपना भाषिक-सांस्कृतिक प्रतिनिधित्व कभी नहीं सुनिश्चित कर पाए?

तब आप ‘कभी अवधी कभी हिंदी’ का गेम व्यक्तिगत लाभ के लिए खेल रहे थे, तब आप मारीसस, सूरिनाम, रूस…घूमने का मजा ले रहे थे, तब आप पुरस्कारों की घटिया राजनीति कर रहे थे, खास कर उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान में, तब आप यश लोलुप होकर व्यक्ति से आगे बढ़ कर साहित्य की सामाजिक भूमिका नहीं समझा पा रहे थे, सरकार से निजी लाभ ले रहे थे। कुछ तो गांधी-गांधी-गांधी करते पेट्रोल टंकी तक जुगड़िया लिए।

तब आप, अवधी सीनियर, अवधी ग्रंथावली जैसे छद्म-सम्पादकीय-प्रकाशकीय उत्पाद को उस नेता से लोकार्पित करवा रहे थे जिसे अवधी का अ भी नहीं आता। लेकिन वह आपकी लोलुप राजनीति की चिरकुट गोटियों के लिए तो सही था ना!

तो आज जब आप कभी-कभी चिहुंकते हैं कि भोजपुरी वाले फला-फला अवधी को अपना क्लेम कर रहे हैं, तो आप एक जोकर या जमूरे से अधिक कुछ नहीं लगते। आप जैसों का दिया हुआ रूग्ण व गतिहीन परिवेश ही था जिसमें पिछले कई दशकों में अवध की भाषिक-सांस्कृतिक चेतना इतनी खौर-भौर हो गयी कि अवध का व्यक्ति अपनी मातृभाषा भी न पहचान सके। फिर आपका भकुवाना एक स्वांग से अधिक कुछ नहीं कि यह देखो, अवध इलाके का व्यक्ति अपनी मातृभाषा को भोजपुरी काहे बोल रहा है!

भोजपुरियों को अवधी साहित्य कब्जियाने वाला कहना उनके कब्जे से अधिक आपकी अपनी नाकामयाबी, लापरवाही और निजी लाभ तक केंद्रित रहने को दर्शाता है। इसकी ईमानदार समीक्षा के लिए आप अपनी गिरेबान में झांके तो आपको शायद चुल्लू भर पानी की दरकार हो! लेकिन आपका काला दिल-दिमाग यह भी न कर सकेगा।

आभार – Amrendra Nath Tripathi केरी फेसबुल वाल.

तौ भैया, आप सब जरूर यहि बात पै सोचौ.!

रामबहादुर मिसिर  – बनिया के बगचा पै झींगुर दलाल, अइसनै लोग अवधी के बैरी हैं।उनके बरे तौ यहै कहा चाहित है.बतिया हैं करतुतिया नाही, मेहरी हैं घर खटिया नाही।सीनियर्स पै सवाल उठावै के पहिले अपने गिरेबान म झांकै।ई फेसबुकिया पहलवान दूरै से ताल ठोंकत है,आखाड़ा म कूदै क नानी मरत है।25 साल से अवधी कै खालिस पत्रिका हैदरगढ़ से छपि रही है,5-6अंक उनके लगे पठवा मुला वहिकै जिकिर को कहै नाम लेब गुनाह समझिन,अइसनै बयान बहादुर अवधी कै लोटिया बोरै म लाग हैं।जिहसे जौन सपरत है तौन करत है,तुमहू कुछ कैके देखाऊ तौ जानी बस भूसा म लाठी खोंसै जानेउ

Shailendra Kumar Shukla – का हो मिसिर जी तोहरी नजर मा अवधी बनिया कै बगचा है ?

Shailendra Kumar Shukla – “तुम करौ कवितई बंद
बुढ़उनू जगु बदला

तुम तौ पुरान बकवादी
नायिका भेद के आदी
का भूलि गएउ भारत मा
है मनइन का आजादी ?

कविता हुइ गै स्वच्छंद
बुढ़उनू जगु बदला ।”

मृगेश जी कहिन रहे…

रामबहादुर मिसिर – पहिले ई कहकुति कै भाव समझौ,मृगेश कै तू नाव सुने होब्या हम पचासन बैठकी म बतियावा है।ई कविता पर वंशीधर शुकुल दादा उनका अवधी कविता म जौन जबाब दिया हिन रहै वहौ हमरे लगे है

 Shailendra Kumar Shukla – अरे महाराज तू भावै लिखा करौ कहकूति तोहके सोभा न देत है। नेक सुझाव है ई।

Shailendra Kumar Shukla – भाषा कै भाव तोहरे बखार की तौ जजमानी न मानी जाई। बाकी तौ हम समझत अही। भले मनईन के संग 50 बैठकी ते जरूरी नाय है की बैठकबाज महान हुइ जाई। अउर बताई कि चेत जाउ की हम नाव सुनि के तोहरे सीनियरन जैसन बकैती करे वालेन म नाय हन। और न ऐसा नई पीढ़ी म कोई बकैत है।

रामबहादुर मिसिर – जौने तेवर म तू बात करत हौ ऊ उमिर ३० साल। बीते भै।तोहरी नजर म सब पुरनिया बकैत है तौ माना करौ।कूकुर भूंकै हजार, हाथी चलै बजार।अब यही बात कहिके बकैती बंद करत अही

Shailendra Kumar Shukla – अरे मिसिर जी 30 की हमारि उमिर जउन तोहके बड़ी ओछी लागत है। लेकिन असिलियत यह है कि सभ्यता की उमिर म हम तोहसे वहे तीस साल आगे हन जउन तोहके छोट सूझात है। चेत जा महाराज।

Shailendra Kumar Shukla – फिर कहकूति में मनुष्यता विरोधी धृष्टता निखर आई। छोटे लोगों से सीख लो क्या दिक्कत है, लेकिन बड़प्पन का का कीन जाय, ऊ का मानी

Shailendra Kumar Shukla – वंशीधर शुक्ल और मृगेश के बीच कविता में तोहके तोहरे पर्याप्त दिमाग भर दीखी।

Shailendra Kumar Shukla तोहरी हर ‘कहकूति’ तोहरे स्वभाव के खोल देत है प्रभू

Amrendra Nath Tripathi  – रामबहादुर मिसिर जी, अपने करतूत पै एतनौ गुमान नाय हुवय क चाही कि अंगुरी डारि-डारि के देखायौ पै आप आपन दोख न देखि पावैं। अवधी कै भला कौनौ चापलूस, दृष्टिहीन औ स्वारथी नाहीं कयि सकत। ऊ नकारात्मक माहौल भले बनवाय सकत हय। हम इन अवधी के लंपट घाघ बुढ़वन का ललकारित हय, जौन बरदास काहे होये! यहिलिये हम आप लोगन कय छिछलहर-छरछरात प्रतिक्रिया कारण समझित हय।

हां आप अवध ज्योति कै कुछ भाग हमरे लगे भेजे रहे। मुला कयिउ चीजन पै हम नाहीं लिखि सका हन। हमयं जौन तुरंत जादा जरूरी लागत हय, ऊ करय लागित हय। सोचव आप कय निगाह केतनी पतित होइ गय अहय कि अवधी के ताईं केहू कुछ करत अहय, यहिकै आकलन आप यहिसे करिहैं कि ऊ ‘आपकय लिखी चीजन’ पै केतना बोला। हद है यहि स्वार्थीपन कय!

आप यतना संकुचित अवधी बड़प्पन(?) देखावत हव कि कहय क परत हय :
“तुम बड़े भयेव तौ ताड़ भयेव… नाहक खंबा अस ठाढ़ भयौ…!’
यहि बड़प्पन के सामने हम जैसे करतूत-हीन कुकुरमुत्तै कौन खराब अहयं :
“तुम्हते तौ नीकि कुकुरमुत्ता / जो भुइं मा छतुरी गाड़े है…’
(काका केरी कविता क याद के आधार पै लिखित अहन, अनुमान कयि लिहेव!)

आपसे बहुत उम्मीद कयिके सात-आठ साल पहिले मिलत रहेन। बहुत कम लोगन के घरे जाइत हय। आपके गांव आपसे मिलै गा रहे। सोचेव तनिका कि कौन सनेह रहा होये हमरे अंदर आपके ताई! मुला आप तौ हमरे निरदोख मन क थोर चूतिया नाहीं बनायेव। आपसे मांगेन अवधी कै बुनियादी किताबन क कि अच्छे से पढ़ि सकी, आप हमका ‘बौरही कुकुरिया’, कोहड़ा, बिलार पाथर, बज्जर… जैसे लेबल कै चीज दयि के बौरहा बनाये जात रहेव। का आप वहि सनेह कै पात्र रहेव? हम तब कौन गलती किहेन रहा?

जारी … १/३

Amrendra Nath Tripathi – रामबहादुर मिसिर जी, आप अपने साथ के कयिउ मठाधीसन के साथ पिछले कयिउ सालन से मजा मारत अहयं। अपनेन मा बूड़ेव-बाढ़ेव! यहिसे केतनी प्रतिभन क पिछले दसकन मा निकरै कै मौका नाहीं बना, कब्बौ सोचेव! अवधी के चेतना कै अस्तर तुलसीदास के पूजा तक सीमित काहे अहय। बतावत हौ कि पचीस साल से पत्रिका निकारत अहव मुला अवधी के ताईं भासायी पहिचान बनावै के ताई, राजनीतिक प्रशासनिक और सामाजिक, का किहेव? भोजपुरी क बस गरियावो! आठवीं अनुसूची के ताईं हम सब बाति उठाइत हय तौ आपकै, आप जैसे अवधी मठाधीसन कै, कपार फाटय लागत है!

पूछत अहौ कि हम आप कै केतना जिक्र किहेन? सरम नाहीं आवत? हम तौ आपका २०१२ मा लखनऊ मा ‘अवधी-कल, आज और कल’ कार्यक्रम मा सादर बलुवायेन। आयोजकन से हमहीं कहे रहेन कि रामबहादुर जी कै राय जरूर लीनि जाय। ओनका सुनब जरूरी अहय। मुला आप वहि कार्यक्रम मा कौन लच्छन देखायौ। पूरे कार्यक्रम मा हमहिन क जद्द-बद्द सुनावय लागेव। आपन किताब निकारि-निकारि के नुमाइस देखावै लागेव कि जौन किहेन हमहीं किहेन। (जैसे हियौं बोलत अहौ) हमैं कहेव कि हम दिल्ली से आवा नासमझ होई। कहेव कि हमयं अवधी कै कुच्छ नाहीं आवत। काहे से कि आपसे तार्किक मतभेद रक्खत रहेन। आत्मालोचना करै कै बाति करत रहेन। कहेव कि यक ‘लउंडा’ अब हमयं सिखाये! पत्रकार अवनीश अवस्थी बताय सकत हयं, वै हुवां रहे।

हमयं पता नाहीं रहा कि आप अस परफारमेंस करिहौ, नाहीं तौ आपसे पहिलेन से बचय लागित! तब्बो हम बादि मा आपसे बातचीत के मौके पै सहज होइके मिलेन। मुला आपकै ऐंठि मानय वाली कहां। चाहत हौ सब युवा लोगय आपका भगवान मानिके पूजयं। आरती उतारयं। हमसे ई ना होये। कुछ जने करत अहयं। ओनका छापौ अपनी अवधी ज्योति मा। हमयं बख्से रहौ! बस गरियावै कै किरपा किहे रहौ, हमार भला यही से करिहैं आप।

अवध ज्योति क केतनी दाईं आपसे कहेन कि हम खरीदा चाही तौ कहां से खरीदी? कुछ नाहीं बतायेव। छापि के अपने तक धरै कै आदति अहय साइद। जैसे अवधी के तमाम बढ़िया आधुनिक कवियन के साहित्य पै आप सब मठाधीस कुंडली मारे बैठा अहयं, कुछ वैसनै!

जारी….. २/३

Amrendra Nath Tripathi – रामबहादुर मिसिर जी, अब आप लोगन कै छटपटी समझी जाय सकत हय। सोसल मीडिया आये से पहिले के तुलना मा अवधी कै यक बड़ा दायरा बनय लाग। आठवीं अनुसूची के ताईं अवधिउ वाले कुनमुनाय लागे। आप सबकै चौधराहट उपेच्छित हुवय लागि। ‘अपने मुंह ते आपन करनी’ आप बार-बार बजावैं तब्बो यहि बाजा क लोग सुनयं, जरूरी नाय। कठकरेजी के साथ अब लोगय वहि समय मा अवधी के ग्राफ के डाउन हुवय पै बोलय लाग अहयं जौनी समय मा आप सब अवधी के नाम पै केवल मठाधीसी किहेव, अवधी केर चेनता-प्रसार नाहीं किहेव। यहीते सात-आठ करोड़ अवधी जनता अपनी भासै क नाहीं पहिचानि पावति अहय। ऊ भोजपुरी कहि दियत हय तौ आप भोजपुरी क गरियावै लागत हौ। अपने गिरेबान मा नाहीं झकतेव।

आप आज ईमानदार होइके सोचौ, तौ साइद आपौ समझि पावो कि हम अवधी लोगन कै चिन्ता का हय! तब नये सवालन के साथे न्याय कयि पउबो। नाहीं तौ नये युवा लोगन कय पीढ़ी आवति अहय। ऊ बेचैनी से राह खोजे। Shailendra Kumar Shukla जैसे युवा यही पीढ़ी कय प्रतिभासाली नाव हयं, जेहसे आप अनाहूतै क उलझत अहौ। अस समझदार बेटवा अवधी माई केरी कोखी मा बहुत समय बादि जनमा होये! साधनहीन-कठिन जिंदगी जियै के बादौ अवधी पै यतनी दुरुस्त समझ औ अवधी बरे कुछ करै कै जज्बा काव हुअत हय, आप जइसे सीनियरन क यहि सपूत से कुछ सीखेक चाही।

हम कब्बौ सोचे नाहीं रहेन कि हमयं आपसे अस संबाद करेक परे। मुला आप अपनी बुजिर्गियत केरी हनक मा हर जगहीं सामने वाले कय मुंह बंद करवावै कै जेस कोसिस करत हयं ओहसे कहे बिना रहि ना गवा! यतना कहे के बाद हमरे भीतर दुख अहय। अपने भीतर झांका जये, अगर आपकै आत्मा तनिकौ बची होये, तौ यहि दुख क थोर-मोर आपौ समझि पइहैं। आभार!

३/३…..समाप्त।

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कविता : आजादी की बरसी पर (शैलेन्द्र कुमार शुक्ल)

20882701_1151646808268447_4269061318397321434_nआजादी की बरसी पर

करिया अच्छर खुनियाय गये
कागद आंसुन ते गये भीजि
जे कलमइ फांसी दीहिन रहे
बड़ नेता उन पर गए रीझि।

जे देसवा खातिर भिंजरि गये
उनकी उम्मीदय सुलगि रहीं
सपने सब जिनके बिथरि गये
औलादी उनकी रिरिकि रहीं

जे खून बहाइन, जिव दीन्हिन
छाती पर गोली खाय खाय
जिनके लरिका फांसी चढ़िगे
उनकी अम्मा की हाय हाय

आजादी उनकी और रहे
उनके सपने कुछ रहें और
जिनकी कुर्बानी भई रहे
उनकी कीमत कुछ रहे और

तुम बीच म  फाटेउ बादर अस
बिजुरी अस गिरेउ गरीबन पर
खेती कीन्हेउ तुम लासिन की
लट्‌टू हुइ गएउ अमीरन पर

टाटा बिरला मित्तल होरे
सब देसु टहलि के झारि लिहिनि
सरकारइ तुमरी रहैं खूब
काजरु उनकी बदि पारि दिहिनि

फिरि भइं देवारी दिया बरे
पूंजीपति बर्फी धमकी रहे
जे असिली मा हकदार रहें
उनके घर घुप्प अंधेरु रहे

हम उबरि न पाये रहन तनिकु
उनते बड़खर जल्लाद मिले
उइ कहिन कि दुख सबु हरि लेबा
सब राम भरत अस खूब मिले

चौदह मा भवा इलेक्सन फिरि
वै टीबी पर वाटय मांगिन
कुछ धरम धुरंधर रैलिन मा
सब वादा हमते कई डारिन

बोले अच्छे दिन आय रहे
पुरिखा लहि सब पतियाय गये
जो नये खून के ज्वान रहें
सब बजरंगी बनि छाय गये

को रामकाज मा बिपति बने
तलवार लिए हिन्दू सेना
भगवा का बांधि मुरैठा वै
ककुवा होरे धौंकैं ब्याना

कुछ जन समुझावैं समुझइं ना
ययि हत्यारे हैं मानइं ना
गांधी के गोली मारिन यइ
वै रहे बतावत जानइं ना

यइ अग्रेजन का साथु दिहिन
जब पुरिखा तुमरे लड़त रहें
यइ करिन गुलामी राजन की
जब बप्पा लाठी खाति रहें

यइ जन गण मन ना गाइ सके
जब आजादी के ढोल बजे
यइ कबौ तिरंगा ना थामिन
जब आजादी के साज सजे

ककुवा गुजराती दंगन का
तुम यतनी जल्दी भूलि गयेउ
मंदिर मस्जिद की राजनीति
तुम सांपु आइस सब सूंघि गयेउ

वहु नसा धरम का चढ़ा रहे
यहु किहिस अफीमी अपन काजु
जानै समुझै पर जोरु नहीं
फिरि छाय गवा सब रामराजु

मोदी जी फिर परधान भए
औ अमित साह जोड़ी थामिन
कुछ राजनाथ नेता होरे
सब नई कैबिनिट गढ़ि डारिन

सिच्छा मंत्रालय मनु स्मृति
ईरानी जी का मिला रहे
तौ बात हिंये से सुरू भई
जब शोध वजीफा कटा रहे

दिल्ली मा भवा आंदोलन
सब लरिका लरिकी जुटे रहें
तब रामराज की सरकारी
लाठी पीठिन पर परी रहें

यहु रामराज का नक्सा सबु
हमरी आंखिन का डाहि गवा
जब दाना माझी लासि लिए
कांधे पर पत्नी आय गवा

एक रात रहे आधी आधी
जब नोट बंद का हुकुम भवा
साइकरा पार कइ मरे खूब
लाखन जन का रूजिगार गवा

साहब जी कबौ बताइन ना
क्यतना काला धन निकरा है
जनधन वाले खाता मइहाँ
पंद्रह लाख कब पहुंचा है ?

यतना झेले के बादिउ मा
जनता पर चढ़ी अफीम रही
यूपी मा फिर अधिकार भवा
‘तपसी धनवंत दरिद्र ग्रही’

क्यतने दिन अबही बीते हैं
गोरखधंधा की जग्य भयी
गोरखपुर जनपद मा द्याखौ
केतनी हत्यारिन नदी बही

उन दुधमुंहटन की लासिन का
जो कांधे धरि धरि रोउती हैं
क्यतने हइं फाट हिये उनके
महतारी जउन तड़पती हैं

यह आजादी है कौनि मिली
हम माथु ठोकि के सोचित है
सन सैंतालिस से सत्रह लहि
कफ्फ़न के कपड़ा नोचित है

दै रहे बधाई मुखिया जी
है आजु अट्टिमी कृस्न जलम
हम तुमरे मुंह पार थूकित है
सब नसा हिरन है धरम करम ।

__शैलेन्द्र कुमार शुक्ल
[15/08/2017]

आठवीं अनुसूची और अवधी (१) : अवधी अध्येता शैलेन्द्र कुमार शुक्ल का वक्तव्य

‘हिन्दी बचाओ मंच’ नाम कय संस्था जेसस आपन भासाई फासीवाद कय सिकंजा कसति जाति अहय, तेसस हिन्दी पट्टी केर लोकभासा वाले खदबदात जात अहयँ। अवधी के बरे, दुनिया भर मा, अपनी पहिचानि कै झंडा फहरावय वाले जगदीस पीयूस सुत राकेस पान्डे कय यक दसकतिया सच्चाई कय भंडा फूट तौ यक फेसबुकिया बहस सुरू भय। यहि पै सैलेन्द्र सुकुल यक वक्तव्य लिखिन। यही महीनी केरी सत्तरा जुलाई का। ‘खरखैंचा’ पै लगायिन। मुल खरखैचा कै ऊ लेख खुलत नाहीं ना। का जनीं काहे। यहिते ‘आठवीं अनुसूची और अवधी’ लेखमाला कै सुरुआती आलेख के रूप मा यही आलेख रखा जात अहै। : संपादक 
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कूप-मंडूक अवधियों के नाम एक वक्तव्य

20106654_1999555283403902_680498689825182597_nगो-रक्षा आंदोलन और आधुनिक हिंदी का उद्भव एक ही राजनीति एजेंडे के रूप में हमारे सामने आया। गो माता की तरह हिंदी माता के भी महिमा मंडन की प्रक्रिया एक साथ राजनीतिक तौर पर तेज होती गई। उस समय भी अवधिये सबसे ज्यादा कन्फ़्यूज्ड थे- प्रतापनारायण मिश्र इसके उदाहरण है और प्रताप-लहरी इसकी गवाह है। ‘हिंदी-हिन्दू-हिंदुस्तान’ इन्हीं का दिया हुआ नारा है। इन्होंने भी दोनों को साधने की पूरी साधना की है। हिंदी जिन रूपों में मानकीकृत हो कर आई, उस पर महत्वपूर्ण शोध फेंचेसिका आर्सेनी,वसुधा डालमिया और आलोक राय आदि ने तर्क संगत काम किया है। अवधियों की गत न्यारी ही रही है, उनके पास जायसी हैं, तुलसी है, रहीम हैं माने वही ही गौरव और गर्व के केंद्र में थे। तो उनको अब कोई परवाह नहीं, क्योंकि उनके पास गौरवशाली पुरखे हैं। उन्होंने यह कभी नहीं सोचा अरे हम क्या कर रहे हैं, रीतिकाल भर तुम क्या कर रहे थे,आधुनिक युग में पढ़ीस से पूर्व तुमने क्या किया। यह सब उनके सोचने का विषय कभी नहीं रहा। तुम भी सत्ता का राग उसी की भाषा में गा रहे थे और चाटुकारिता कर रहे थे, यह कब तक छुपाओगे! पढ़ीस के बाद नई लीक अवधी में पड़ी लेकिन उस पर अवधी का कौन कवि चला यह किसी से छुपा नहीं। अवधिये अपने पुरातन घमंड में चूर मानस पर कर्मकांड करते रहे और अब अवधी के उद्धार के लिए अवधी होटल खोलने की तैयारी में लगे हैं और अवधी की तीर्थ यात्राएं चालू हैं, और जीवित भाषा की तेरहीं मना कर पोथन्ने छापे जा रहे हैं।

आज भी सबसे ज्यादा अवधी वाले ही कन्फ़्यूज्ड हैं। जब भोजपुरी ने अपनी आवाज उठाई और उससे पहले भी तमाम विसंगतियों के बावजूद जब भोजपुरी बाजार में डिंकने लगी तो स्वनामधन्य अवधिये नींद से जागे तब तक उन्हें नहीं पता था कि अवधी पीछे छूट रही है। खैर, यह भी गज़ब की बात है की अवधियों की नब्बे फीसदी आबादी यह जानती ही नहीं कि वह जो भाषा बोलती है उसका नाम क्या है। और बाकी के अवधिये धार्मिक और सांप्रदायिक कामों में व्यस्त थे, बचे प्रगतिशील लोग तो उनको अपनी बौद्धिकता प्रमाणित करने में अवधी की बात कर के गंवार थोड़ी न होना था। यह राम कहानी है अवधी की। गाँव देहात से जो तनिक भी पढ़ लिख कर या बिना पढ़े-लिखे भी थोड़ा बाबूगिरी टाइप कुछ शहर में मिल गया तो उनके घर में अवधी प्रतिबंधित हो जाती है या घ्रणा की वस्तु समझी जाती रही है। बाकी देहात में भी यदि घर से बाहर सड़क पर पाँव निकाल लिए तो अवधी बोलने में देहातीपन का बड़ा भारी बट्टा लग जाता है। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल भी इस तरह का एक वाकया जो लखनवी मित्र के साथ सांची का स्तूप देखने गये थे, कभी भुला नहीं पाये नहीं। महुए का नाम जानने से बाबू पन में भारी बट्टा लग जाता है। इस तरह अवधियों ने बहुत दिनों तक यह जाना और समझा ही नहीं कि अवधी भी अभिमान की विषयवस्तु है, खैर भोपुरियों का शुक्रिया कि इन्हें ईर्ष्या करने के लिए जगा लिया।

इधर बीच जब भोजपुरी को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने के लिए भोजपुरियों ने साहित्य से लेकर राजनीति तक आवाज उठाई तो साहित्य के स्वनामधन्य नेताओं ने सोचा कि यह क्या, अब इन्द्र का सिंहासन डोलने लगा, ये कौन मनुज हैं जो हमारा आसान छीनने के लिये तप करने लगे हैं। डर भयानक था । उधर कलकत्ता से एक आहात आवाज सुनाई पड़ी त्राहिमाम …..त्राहिमाम । बचाओ प्रभू , बचाओ, अगर सरकार हाकिम ने कहीं भोजपुरी को अनुसूची में शामिल कर लिया, तो हम हिंदी वालों का धंधा कैसे चलेगा, हमारी बाबूगिरी का क्या होगा, हमारे कस्टमर कम हो जाएंगे! हम बर्बाद हो जाएंगे! इस तरह आहात होकर देवतुल्य आचार्य श्री…श्री….108 डॉ. अमरनाथ जी ने हिंदी के अश्वमेघ यज्ञ के आयोजन के लिये गुहार लगाई। और अपनी साम्राज्यवादी शक्तियों को संगठित कर हिंदी को फिर गोरक्षा आंदोलन की याद दिलाई। इस तरह हिंदी के साम्राज्यवादी अश्वमेधीय घोड़े कलकत्ता दिल्ली से होते हुये अवध में आये। मजे की बात यह भी कि इधर फिर से गोरक्षा आंदोलन जब से ज़ोर पकड़ा है तभी से हिंदी बचाओ अभियान भी कुंलांचे भरता हुआ, चिल्लाता हुआ, चीखता हुआ सामने आ ही गया। असल में दोनों का चरित्र एक ही है।

तो यह बात मैं खास कर अवधियों के लिये ही कह रहा हूँ , उधर ही आता हूँ। डॉ. अमरनाथ जी ने जब हिंदी बचाओ मंच नामक संप्रदाय खोला तो उसमें सबसे ज्यादा अवधिये ही शामिल हुये। उनकी ईर्ष्या ज़ोर मार रही थी, हमारे पुरखे तो हाथी पालते थे, हमारे बाबा घोड़े से चलते थे आदि …आदि। लेकिन इन्हें यह खयाल कभी नहीं आया कि हमारी जान तो कुकुर को एक कौर डालने में भी निकलने लगती है, हमने क्या किया, इसकी कोई परवाह नहीं। हिंदी के साहित्यिक घराने में कुछ अवधी जाति के नागरिक हैं जिन्हें अपनी पैदाइश पर बड़ा फ़क्र है। यह विश्वविद्यालयाओं में भी हैं और प्राइमरी स्कूलों में भी। भोजपुरियों को देख इनको भी राजनीति सूझी। तो दो रास्ते नजर आए – या तो अवधी बिना प्रयास के संविधान की अनुसूची में शामिल हो जाए और हम लोग अवधी अकादमी के अध्यक्ष बने फिर अपने चाटुकारों को पुरस्कार बांटें, फंड दें, अवधी होटल खोलें ,भंडारा करें और पोथन्ना छापें। और दूसरा रास्ता यह कि भोजपुरी के खिलाफ खड़े होकर हिंदी बचाओ मंच से जुड़ें और भोजपुरी को अनुसूची में शामिल ही न होने दें। तब मामला बराबर। अवधिये बहुत कन्फ़्यूज्ड हैं। इधर अवधी प्रेम भी प्रदर्शित कर देते हैं और उधर हिंदी बचाओ मंच के उद्धारक देवताओं की पालकी भी ढो रहे हैं। मैं तो कहता हूँ तुम धन्य हो अवधियों ! तुम्हारे कन्फ़्यूजन को धिक्कार है !

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शैलेन्द्र कुमार शुक्ल

आज अवधी के स्वाभाविक और हिम्मती साथी अमरेन्द्रनाथ त्रिपाठी जी ने एक पोस्ट फेसबुक पर मुझे टैग की। पोस्ट देख कर मैंने फिर माथा पकड़ लिया। कोई राकेश पाण्डेय है, अपने को अवधिया मानते हैं । हिंदी को बचाने के लिए और भोजपुरी को अष्टम अनुसूची में शामिल न किया जाय , इसलिये हस्ताक्षर अभियान चला रहे हैं, ऊपर पत्र में मोदी जी से गुहार लगाई गई है, बाकायदा। राकेश जी जैसे अवधी भाषी आप को बहुत से मिल जायेंगे। ये अवधी की बात करते हैं, संस्कृति को मेनटेन करने के लिये विविध आयोजन किया करते हैं। दरअसल इन चीजों से इनका कोई सरोकार नहीं है, ये वर्ग संघर्ष में दूसरे वर्ग से आते हैं -“उयि अउर आहि हम और आन” । इनके पास खूब पैसा है,अच्छी नौकरी है, बच्चे कनवेंट स्कूलों में सालाना लाखों रुपयों की फीस पर पढ़ते हैं, बड़े-बड़े शहरों में अच्छे मुहल्लों में घर हैं इनके। बस थोड़ा इज्जत और शोहरत के लिये देश प्रेम, लोक-प्रेम, भाषा-प्रेम(विद्वता प्रदर्शन के लिये), साहित्य प्रेम, संस्कृति प्रेम का प्रदर्शन कर लेते हैं। ये ऐसे योद्धा हैं जो ठेके पर आंदोलन चलवाते हैं, छठे-छमहे कल्चरल प्रोग्राम करवा देते हैं, सत्ताधारी नेताओं से मिल कर सौ बार चरण बन्दना करते हैं, और सांप्रदायिक दंगों से लेकर मंदिर निर्माण हेतु चंदा देते हैं, और जाहिल इतने कि लाल हरे नगों वाली अंगूठियों से लेकर  लाल-काले कपड़ों में लपटे पंडों और मुल्लाओं की भभूत देह पर सुविधानुसार बांधे रहते हैं। इनकी मूर्खता जग जाहीर है। और एक बात तो छूट ही गई इनकी सबसे बड़ी पहचान यह कविता के बहुत भारी रसिक होते हैं। तो इनके लिये राकेश रंजन की दो पंक्तियाँ याद आ रहीं हैं-

‘तुमरी जय जय कार सुअरवा
तुमको है धिक्कार सुअरवा।’

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अवधी साहित्य की समस्या और आचार्य कवि श्याम सुंदर मिश्र ‘मधुप’

इंटरनेट पै मधुप जी के अवधी अवदान क ध्यान मा रखिके लिखा ई पहिल आलेख आय। यहिते पहिले बस आप  उनके साथ भवा यक इंटब्यू जरूर देखि सकत हँय। यहि आलेख क बड़े लव से युवा अवधी अध्येता सैलेन्दर सुकुल लिखिन हैं। हम उनकय बहुत आभारी हन्‌। : संपादक
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*शैलेन्द्र कुमार शुक्ल

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मधुप जी के साथ शैलेन्द्र शुक्ल

अवधी कविता अपने आप में ही आचार्यत्व की एक खरी कसौटी है। जिस भाषा में जायसी, तुलसी और रहीम जैसे आचार्य कवि हुये हों उस भाषा की कविताई के साथ खिलवाड़ नहीं हो सकती। भाषा का अपना एक चरित्र होता है, इस प्रकार हर भाषा अपने स्वभाव का इतिहास और भूगोल अपनी संस्कृति में रचती है। मध्य काल की प्रारम्भिक अवस्था से ही अवधी का विराट वैभव काशी से कान्यकुब्ज तक दिखाई पड़ता है जब की इसका केंद्र अवध ही था । पं॰दामोदर शर्मा के ग्रंथ ‘उक्ति-व्यक्ति-प्रकरण’ से लेकर जगनिक के आल्ह-खंड तक इसे देखा जा सकता है।इसी भाषा में सूफी कविता की एक स्ंवृद्ध परंपरा मिलती है, जिसकी तुलना विश्व के किसी भी पुराने साहित्यिक और सांस्कृतिक आंदोलनों से की जा सकती है। ऐसा विराट आंदोलन और व्यापक पहल शायद फिर कभी दिखाई नहीं पड़ी। इस काव्यपरंपरा के लगभग सारे कवि मुसलमान थे। इन मुसलमान कवियों ने अवधी की जो साझा संस्कृति रची वह अवधी और हिन्दी में ही नहीं विश्व साहित्य में भी एक महत्वपूर्ण मिसाल के तौर पर पेश की जा सकती है। यह काव्यधारा एक संक्रमण की संस्कृति है, जहां भाषा एंटी-वाइरेस का काम करती है। मानवीय मूल्यों का कलात्मक संरक्षण भाषा के साहित्यिक होने का बड़ा प्रमाण है। एक प्रश्न यहाँ जायज है इन सूफी कवियों ने अवधी भाषा को ही क्यों चुना ?जबकि अवधी के साथ-साथ समय का अनुगमन ब्रज-भाषा भी कर रही थी औरब्रजभाषा का स्वाभाविक चरित्र प्रेम के लिए ज्यादा निकट था, प्रेमगाथाओं के अनुकूल भी ! इसका एक कारण यह भी हो सकता है कि ब्रजभाषा प्रबंध के लिए तैयार न थी और दूसरा यह कि इन सूफी कवियों को केवल प्रेम ही स्थापित करने का लक्ष्य न था । वह जीवन के विविध पक्षों की विराटता लिखना चाहते थे। कुछ सूफी कवि इसी तरह के प्रेमाख्यानक अन्य लोक भाषाओं में भी लिख रहे थे, लेकिन जो ऊंचाई अवधी के प्रेमाख्यानों की है वह अन्यों की नहीं। यह अवधी भाषा के सामर्थ्य का एक जोरदार पहलू है।

डॉ॰ श्याम सुंदर मिश्र ‘मधुप’(1922-2014)अवधी साहित्य के पहले इतिहासकर हैं। वह अवधी के प्रगतिशील कवि और आचार्यत्व के गुणों से परिचित एक प्रबुद्ध आलोचक भी। उनका लोचनात्मक व्यक्तित्व लोक की समाजशास्त्रीय पद्धति के आलोक में दिखाई पड़ता है । उन्होंने अपनी मातृभाषा अवधी में बड़ा काम किया । और यह कम महत्वपूर्ण नहीं कि जब स्थापित खड़ीबोली हिंदी को लेकर एक दूसरे की पीठ सहलाने वाले लोग विद्वता का ढोंग बड़े बड़े के नाम पर सिर्फ हिंदी का ढिढोरा पिटा जा रहा हो, संयुक्त राष्ट्र संघ की भाषाओं में हिंदी को शामिल किए जाने का दबाव बढ़ रहा हो, यह सब जिन लोगों द्वारा किया जा रहा हो उन्हें यह मालूम ही न हो कि हिंदी आखिर है क्या ! इनकी नजर में क्या हिंदी के पहले कवि हरिऔध हैं ! बहरहाल हिंदी के विदूषकों ने यहीं माहौल बना रखा है । हिंदी के महत्वपूर्ण आलोचक डॉ॰ मैनेजर पाण्डेय की यह उक्ति कितनी प्रासंगिक है ‘आजकल भूमंडलीकरण की जो आँधी चल रही है हर बुद्धिजीवी स्थानीय होने से पहले राष्ट्रीय बन जाना चाहता है और राष्ट्रीय होने से पहले अंतरराष्ट्रीय’। इससे हिंदी का कोई हित होने वाला नहीं है यह बात तो तय है । डॉ॰ मधुप ऐसे ही कठिन समय में उस हिंदी के लिए काम करते रहे जो हिंदी जायसी, तुलसी और रहीम की हिंदी थी । जिस हिंदी पर हिंदी साहित्य के इतिहासकारों ने मध्यकाल से ही ताला लगा दिया था । और यह भी विचारणीय तथ्य है कि भक्तिकाल में अवधी हिंदी का स्वर्णयुग रच रही थी,संत और भक्त कवियों की वाणी इसी भाषा का वैभव बनी । इस युग में यह भाषा अपने स्वभाव को और भी स्वाभाविक बना चुकी थी । इसका यह भी बड़ा प्रमाण है कि इस भाषा ने राजदरबारों में जाने से परहेज किया । इस तरह रीतिकाल भर यह भाषा चुप्पी साधे रही यानी ‘रहिमन चुप ह्वै बैठिए देखि दिनन को फेर’ लेकिन यह चुप्पी एक लंबी लड़ाई की तैयारी कर रही थी, जिसकी वही स्वाभाविक धमक और उतनी ही तेज धार आधुनिक युग में दिखाई पड़ती है । डॉ॰ ‘मधुप’ अपने ग्रंथ ‘अवधी साहित्य के इतिहास’ में अवधी की आधुनिक कविता का प्रस्थान बिंदु काशी के बाबू भारतेन्दु हरिश्चंद्र को मानते हैं ।भारतेन्दु के बारे में अपनी बात रखते हुये वह कहते हैं “अपनी काव्यभाषा को ब्रज-भाषा रखते हुये भी उन्होंने अपनी सामयिक रचनाओं के लिए जनभाषा अवधी की सादगी का सहारा लिया”। यहाँ मधुप जी अवधी को जन भाषा इस लिए भी कह रहे हैं क्योंकि अवधी लंबे समय तक हिंदी भाषी प्रान्तों की संपर्क भाषा रही है । इस तथ्य की ओर सुनीति कुमार चटर्जी ने ‘उक्ति-व्यक्ति-प्रकरण’ की भूमिका लिखते हुये इशारा किया था जिसे डॉ॰ रामविलास शर्मा ने काफी उधेड़बुन के बाद स्पष्ट रूप में व्याख्यायित किया है ।

डॉ॰ मधुप का इतिहास ग्रंथ अवधी की पुरानी परंपरा को परखते हुये अवधी की आधुनिक साहित्य परंपरा की एक महत्वपूर्ण खोज है । डॉ॰ मधुप शहरों की साहित्यिक चकाचौंध और विमर्शों के झंडाबरदारों से बचते हुये हिंदी की उस स्वाभाविक परंपरा को साधने का काम किया जिसे विद्वता के अभिमानी दिहाती बोली कह कर छुट्टी ले लेते हैं ।वह पक्के दिहाती थे और दिहाती होना उनकी स्वाभाविक विद्वता का सबसे मजबूत पहलू । उन्होंने अंत तक अपने गाँव मैनासी-सरैयां (सीतापुर) को नहीं छोड़ा । वह आर॰एम॰पी डिग्री कॉलेज, सीतापुरमें अध्यापन कार्य करते हुये खुद को देहाती हिंदी के लिए समर्पित कर दिया । उन्होंने अवधी में बड़ा काम किया । वह मूलतःअवधी कवि थे और कविताई का आचार्यत्व उनमे था । उनके काव्यग्रंथ ‘गाउँ का सुरपुर देउ बनाइ’,‘जगि रहे गांधी केर सपन’,‘खेतवन का देखि-देखि जीउ हुलसइ मोर’ तथा ‘घास के घरौंदे’ अवधी साहित्य की निधि हैं । इन किताबों की कवितायें आज भी बूढ़े किसानों के मुह सीतापुर के आस-पास के गांवों में सुनने को मिल जाएंगी । इसके अतिरिक्त उन्होंने अवधी की उस विरासत को सहेजा, जो बिखरीपड़ी थी उसे संपादित किया । इस तरह के ग्रन्थों में ‘वंशीधर शुक्ल ग्रंथावली’,‘अवधी की राष्ट्रीय कवितायें’, आदि प्रमुख है । उन्होंने अवधी की साहित्य परंपरा को आगे बढ़ाते हुये कई महत्वपूर्ण शोध-ग्रंथ और आलोचना पुस्तकें दीं जिनमें ‘परंपरा के परिपेक्ष्य में आधुनिक अवधी काव्य’,‘आधुनिक अवधी काव्य की प्रमुख प्रवृत्तियाँ’,‘अवधी काव्यधारा’,‘अवधी कविता की नई लीक के प्रवर्तक: बलभद्र प्रसाद दीक्षित ‘पढ़ीस’’, तथा ‘अवधी के आधुनिक कवि’ प्रमुख हैं । इसके अतिरिक्त जिसके आधार पर उन्हें अवधी का रामचन्द्र शुक्ल कहा जाता है वह है ‘अवधी साहित्य का इतिहास’ । इस इतिहास ग्रंथ में उन्होंने जो बहुत ही जटिल और मुश्किल काम को अंजाम दिया वह है आधुनिक अवधी साहित्य की खोज । अवधी के आधुनिक साहित्यकारों का साहित्य जो सहज उपलब्ध नहीं मिलता,क्योंकि यह राजकमल, वाणी, और ज्ञानपीठ से नहीं छपा।इधर हाल ही में जगदीश पीयूष द्वारा संपादित अवधी ग्रंथावली वाणी प्रकाशन से छप चुकी है लेकिन इसमे भी आधुनिक कवियों की सिर्फ एक–एक कविता संग्रहीतहै। यह साहित्य बहुत कुछ आज भी अप्रकाशित ही है और जो भी छपा है वह स्थानीय छोटे-छोटे प्रकाशनों से। इनमें से अधिकांश प्रकाशन अब बंद भी हो गए हैं । और जो चालू हालत में हैं उनके पास पुरानी पुस्तकें उपलब्ध नहीं है और नई छापने की हिम्मत अब उनमें नहीं, क्योंकि बाजार में इनकी मांग नहीं है। अवधी के तमाम साहित्यकार जो इस बदहाली में मर गए, या अपने अंतिम पड़ाव पर जीवित हैं, उनके घर वाले या वे स्वयं किसी अपरिचित को साहित्य देने में संकोच करते हैं,कि कहीं वह इसे अपने नाम से न छपवा ले । कई लोलुपों ने यह किया भी। अवधी की इसी आधुनिक पीढ़ी में मधुप जी भी थे जो जाते-जाते यह महत्वपूर्ण काम कर गए जिसे उनके अलावा कोई मुश्किल से ही कर पता। मधुप जी के पास एक दुर्लभ पुस्तकालय था। इस बात का प्रमाण उनका यह ग्रंथ है।

मधुप जी ने इस किताब में साहित्य के इतिहास लेखन की दृष्टि हिंदी साहित्य के इतिहास से ग्रहण की। और यह ही इस किताब की सबसे बड़ी कमजोरी है। उन्होंने अवधी की आधुनिक काव्यधारा में छायावाद और रहस्यवाद जो दिखाया है वह बेमतलब की चीज है। अवधी की नई लीक के प्रवर्तक बलभद्र दीक्षित ‘पढ़ीस’ अपने प्रारम्भिक अवस्था से ही पूर्णतः प्रगतिशील थे। उनकी कावताओं में प्रगतिशीलता के वह गुण विद्यमान हैं जिन्हे हिंदी कविता की मूल (या बेमूल) धारा में खोजना आज भी मुश्किल है। रही बात रमई काका की जो छायावाद के बाद की उपज हैं। सिर्फ इन दो कवियों के यहाँ मधुप जी ने छायावाद और रहस्यवाद देख लिया और इन दोनों के बीच की कड़ी वंशीधर शुक्ल को सीधे छोड़ दिया क्योंकि यह कवि स्वतन्त्रता आंदोलन के समय क्रांति का अलाव जलाए बैठा था । अब जब अवधी में छायावाद या रहस्यवाद नहीं था तो नहीं था,उसे जबरन ठेल कर पता नहीं क्या प्रमाणित करना चाहते थे । बहरहाल इसके आगे उन्होंने अवधी की प्रगतित्रई की जो स्थापना की और उसकी जो ऐतिहासिक पड़ताल की वह अपने आप में बहुत ही महत्वपूर्ण है । इन कवियों के साथ मधुप जी ने साहित्य की ऐतिहासिक ऊर्जा दिखाई । मधुप जी ने अवधी की प्रगतिशील परंपरा की एक लंबी कतार दिखाई । कवियों के बारे में भी लिखा और कविता के उदाहरण भी दिये । अवधी में हो रहे गजल और नवगीत लेखन को भी रेखांकित किया। इसके अतिरिक्त इस ग्रंथ में उन्होंने अवधी की पुरानी परमम्परा जो दोहा-चौपाई-बरवै की थी वह आधुनिक अवधी में कब तक चलती रही और उसमे क्या-क्या लिखा जाता रहा ,यह सब दिखाया है जो अपने आप में एक इतिहास दृष्टि का मानक है ।

इस प्रकार हम देखते हैं मधुप जी ने लगभग 300 आधुनिक अवधी कवियों का हवाला देते हुये उनकी कविताओं के जिस प्रकार उदाहरण दिये हैं वह अपने आप में एक बहुत ही जटिल और निहायत मुश्किल काम था क्योंकि यह अवधी साहित्य के इतिहास का पहला ग्रंथ है । साहित्य के इतिहास का पहला ग्रंथ लिखना कितना मुश्किल होता है यह बताने अवश्यकता नहीं । मधुप जी नें यह बड़ा काम किया है । जिसके लिए साहित्य प्रेमी उनके सदा ऋणी रहेंगे।

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शैलेन्द्र कुमार शुक्ल
शोधार्थी: म.गां.अं.हिं.वि.वि.,वर्धा (महाराष्ट्र)
मो.07057467780
ई-मेल: shailendrashuklahcu@gmail.com 

कवि श्री युक्तिभद्र दीक्षित ‘पुतान’ की क्रांतिकारी प्रगतिशील चेतना को नमन!

 

 पुतान जी

पुतान जी

बहुत अफसोस कै बाति है कि अवधी कै कवि युक्तिभद्र दीक्षित पुतान अब हमरे बीच नहीं हैं। औरौ अफसोस कै बाति है कि उनके बारे मा मीडिया वगैरह से कौनौ जानकारिव नाही दीन गै। लेकिन उत्साही युवा शैलेन्द्र शुक्ल तमाम खामियन का खतम करत औ हमार जानकारी बढावत ई ‘सरधांजलि’ आलेख भेजिन हैं। हम आभारी हन। : संपादक
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कवि श्री युक्तिभद्र दीक्षित ‘पुतान’ की क्रांतिकारी प्रगतिशील चेतना को नमन! 
__शैलेन्द्र कुमार शुक्ल

युक्तिभद्र दीक्षित “पुतान” आधुनिक अवधी काव्य परम्परा के विशिष्ट हस्ताक्षर हैँ,जिनका पिछले दिनोँ 24 जुलाई को निधन हो गया । ये अवधी की नयी लीक के प्रवर्तक महान क्राँतिकारी कवि बलभद्र प्रसाद दीक्षित पढ़ीस के पुत्र थे । क्रांति और कविता इन्हेँ विरासत मेँ मिली थी । ये सच्चे अर्थोँ मेँ पढ़ीस की परम्परा के उत्तराधिकारी थे ।इन्होँने अपने जीवन मेँ बड़े संघर्ष झेले ,लेकिन समझौते का रास्ता नहीँ अपनाया ,आखिर पुत्र ही ऐसे स्वाभिमानी व्यक्तित्व के थे।पुतान जी आकाशवाणी इलाहाबाद मेँ नौकरी करते थे । वहाँ ये किसानोँ के लिये कार्यक्रम मेँ मतई भइया / मतई काका के नाम से प्रसिद्ध हुये । पुतान जी ने पचीसोँ रेडियो नाटक और नौटंकी अवधी और भोजपुरी मेँ लिखीँ तथा उनमें भूमिका निभाई । वह लोक गीतोँ के बड़े अच्छे पारखी थे .वह बड़े अच्छे लोकगीत रचते और बहुत ही अच्छी लय मेँ गाते थे । मैँ पिछले साल जब इलाहाबाद उनसे जा कर मिला ,तब मैँ पढ़ीस जी के बारे मेँ उनसे जानने-समझनेँ को उत्सुक था ,लेकिन पुतान जी से मिलकर मुझे एक नये अध्याय के बारे मेँ पता चला । पुतान जी ने अपने कुछ गीत और कविताएँ बड़ी संजीदगी से सुनाई। वह आधुनिक अवधी साहित्य से हिँदी वालोँ की उदासीनता से दुखी थे , और अवधी के आधुनिक विद्वानोँ की संकुचित मानसिकता से उन्हेँ बड़ा कष्ट था । जो पूर्णतः जायज था।

उन्होँने अवधी और भोजपुरी दोनोँ मेँ श्रेष्ठतम कविताएँ रचीँ हैँ। उनकी कई काव्य पुस्तकोँ का प्रकाशन बहुत पहले परिमल प्रकाशन से हुआ था जिनका अब कहीँ अता पता नहीँ मिलता । उन्होँने स्वतंत्रता आंदोलन के समय कई महत्वपूर्ण रचनाएँ दी। उनकी कुछ कविताऔँ के उदाहरण डा.मधुप ने अपनी पुस्तक “अवधी साहित्य का इतिहास” मेँ दिया है।

वह प्रगतिवादी चेतना के कवि थे । वह प्राचीन रूढ़िवादी और पूंजीवादी समाज को मिटाकर एक अभिनव समाज की स्थापना करना चहते थे जिसमेँ न कोई शोषक हो न कोई शोषित । शासन व्यवस्था से असंतुष्ट कवि किसानों को क्रांति के लिये ललकारते हुये कहता है-

“रे छोड़ भला अब तो खटिया
दे फूँकि फूस की यह टटिया ।”

देश की खोखली आजादी पर प्रहार करती पुतान जी ये पंक्तियाँ देखिये-

“सब कहेँ मुलुक आजाद भवा
भारत का मिलिगै आजादी ।
मुलु तोरी मुरझुल्ली ठठरी पर
लदि गै और गरू लादी
आजाद भये हैँ संखपती
उइ तोरि करेजी काढ़ि सकैं।
आजाद भये सोँठी साहू
त्वांदन के मेटुका बाढ़ि सकैँ।”

उनके एक और क्रांतिकारी गीत की याद ताजा कीजिये –

“चेतु रे माली फुलबगिया के
बड़ी जुगुति ते साफु कीन तुयि
झंखरझार कटीले ।
दै दै रकतु प्रान रोपे रे
सुँदर बिरिछ छबीले ।
रहि ना जायं गुलाब के धोखे
काँटा झरबेरिया के।।”

हम अपनी माटी के बने अपने लोक कवि श्री युक्तिभद्र दीक्षित पुतान को याद करते हुये श्रद्धांजलि ज्ञापित करते हैँ ! उनकी क्रांतिकारी प्रगतिशील चेतना को नमन !!!

-शैलेन्द्र कुमार शुक्ल