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अवधी लोकगीत-३ : कंकर मोहें मार देइहैं ना..(कंठ : शुभा मुद्गल)

   कंकर मोहें मार देइहैं ना..

कंकर लगन की कछु डर नाहीं,

गगर मोरी फूट जइहैं ना..

कंकर मोहें मार देइहैं ना..

गगर फुटन की कछु डर नाहीं,

चुनर मोरी भीज जइहैं ना..

कंकर मोहें मार देइहैं ना..

चुनर भिजन की कछु डर नाहीं,

ननद मोहें ताना देइहैं ना..

कंकर मोहें मार देइहैं ना..

सास ननद के कछु डर नाहीं,

बलम मोसे रूठ जइहैं ना..

कंकर मोहें मार देइहैं ना..

यहि लोकगीत पै: यहि लोकगीत मा पनघट जाये पै का का दिक्कत आवत है, वहिकै चरचा पनघट से पानी लावै वाली नारी करति अहै। पनघट के राह पै कंकर मारै वाले मिलत हैं। नारी कहति है कि पनघट जाये पै लोगै कंकर मारि देइहैं! कंकर लगै कै कौनौ डेरि हमैं नाहीं है लेकिन हमार यू गगरिया फूटि जये! गगरिउ फूटै केरि कौनौ डेरि हमैं नाहीं है, लेकिन हमार यू चुनरिया भीजि जये! यहि चुनरिउ के भीजे कै हमैं कौनौ डेरि नाहीं है, लेकिन हमार ननदिया हमैं ताना मारे! मानि लेउ सासउ-ननदी केरि डेरि न करी हम तब्बो हमार बलम हमसे रूठि जइहैं! यानी बलम कै रूठि जाब सबसे दुखद है! बलम के रूठै कै अनदेखी नाहीं कीन जाय सकत!

अब यहि गीत क सुना जाय सुभा मुद्गल जी केरी अवाज मा:

~सादर/अमरेन्द्र अवधिया