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मातरी भासा वाली बात हिन्दी मा भला कहाँ..!


विजयदान देथा राजस्थानी साहित्य   कै बड़वार नाम हुवैं। यै सिरफ राजस्थानिन कै नाय बल्कि संपूर्ण भारतीय साहित्य मा कथा साहित्य के लेखक के तौर पै बड़ा नाम हैं।  यहि बार अस खबर रही कि देथा जी कै रचना नोबल पुरस्कार पावै के दुसरे कदम पै रही। हमरे ताईं यहै खुसी है कि जौने सम्मान के लिये हिन्दी साहित्यकारन कै गिनती नाही होइ पाई, वहिपै लोकभासा आपन चुनौती पेस कै दिहिस। देथा जी लोकभासन की आजादी कै तरफदार हैं, इन्हैं हिन्दी कै ‘बोली’ भै नाही मनते, यहिलिये ई इंटब्यू औरव अहम होइगा कि यहिके कुछ हिस्सन का हम अपने देसभासा के साइट पै रखी। ई पोस्ट यही कोसिस के तहत लिखी जाति अहै। ई इंटब्यू मूलरूप से तहलका साइट से लीन गा है। हम साभार कुछ हिस्सन का ह्वईं से लियत अही। सिसिर खरे के सवालन के जबाब के रूप मा हाजिर देथा जी बातन से रूबरू हुवा जाय । (ई इंटरब्यू औरव लंबा है, हम हियाँ लोकभासा औ देसज संवेदना से जुड़ी चीजन का लिहेन हैं, आप पूरा इंटरब्यू – भाषा की सुंदरता, प्रांजलता, माटी की महक जो राजस्थानी में है वह हिंदी में मुमकिन ही नहीं  – पै जाइ के पढ़ि सकत हैं। यहि इंटब्यू के कुछ हिस्सन के लिये हम तहलका साइट कै आभारी हन। ) :संपादक 

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इस बार आपको नोबेल पुरस्कार की संभावित सूची में शामिल किया गया था. यूरोप के कई सर्वे भी आपको पुरस्कार का प्रबल दावेदार मान रहे थे. मगर जो नतीजा आया उस पर आप क्या कहेंगे?

मुझे नोबेल न मिलने का दुख नहीं है. हां, खुशी तो है ही कि मैंने अपने जीवन में अच्छी किताबें लिखीं और साहित्य जगत में अहम जगह बनाई. नोबेल की संभावित सूची में आने को भी मैंने सामान्य तरीके से ही लिया. मैंने तो कभी किसी पुरस्कार के लिए कोई प्रविष्टि नहीं भेजी. नोबेल के लिए भी नहीं. दुनिया भर की कहानियां पढ़ने के बाद मैं अपनी कहानियों को लेकर आश्वस्त हूं. मुझे मेरी कहानियों की कमजोरियां भी पता हैं और मजबूत पक्ष भी मैं जानता हूं. मैंने अपने बुजुर्गों से सुनी कहानियों को सामाजिक मुद्दों से जोड़कर पेश किया है. यह मेरी खुशकिस्मती है कि राजस्थानी में लिखी मेरी किताबों को एक बड़े फलक पर सराहा गया है.

जब साहित्य आधुनिकता की ओर बढ़ा जा रहा था, आप लोक की तरफ क्यों लौट आए?

कई बार लोक चेतना सामंती और जनविरोधी होती है. इसलिए मैं केवल कथानक के स्तर पर लोक में गया हूं, जबकि दृष्टिकोण या मूल्यबोध के स्तर पर आधुनिकता, प्रगतिशीलता और बहुजन हिताय की चेतना को ही अपनाया है. मैंने कथानक के बुनियादी ढांचे को ज्यों का त्यों रखा है मगर मूल्यबोध बदल दिया है. इसलिए मेरी कहानियां लोक साहित्य का पुनर्लेखन भी नहीं है. इसलिए आपको मेरी कहानियों में फैंटेसी और आधुनिक यथार्थ का ऐसा ताना-बाना मिलेगा जो एक नया रूप संसार सामने लाता है.

आपने हिंदी में भी लिखा. इन दोनों भाषाओं के लेखन में क्या अंतर पाया?

मुझे लगता है वैसी भाषा की सुंदरता, प्रांजलता, माटी की महक जो राजस्थानी में है वह हिंदी में मुमकिन ही नहीं. उसका जायका ही कुछ और है. ऐसा जायका हर मातृभाषा में मिलता है.

आप राजस्थानी भाषा की मान्यता के पक्षधर हैं? 

हां. हिंदी हिंदुस्तान के किसी भूखंड की भाषा नहीं है. जो भी भूखंड है उसकी अपनी मातृभाषा है- अवधी, मैथिली, भोजपुरी, मालवी वगैरह. हिंदी किसी परिवार की भाषा हो सकती है, लेकिन एक बड़े समुदाय की भाषा बिल्कुल नहीं. यह जन्म के साथ नहीं सीखी जाती बल्कि इसकी शिक्षा दी जाती है. हम चाहते हैं कि राजस्थानी भाषियों को भी रोजगार मिले. जो कहते हैं मान्यता के फेर में न पड़ो बस लिखते जाओ या राजस्थानी भी हिंदी ही है तो हमारा सवाल है कि राजस्थानी को हिंदी की किताबों में शामिल क्यों नहीं कर लिया जाता. तब वे कहते हैं भाई यह समझ में नहीं आती. समझ इसलिए नहीं आती कि शब्द-भंडार से लेकर क्रियापद तक राजस्थानी हिंदी से अलग है.

बीते कई सालों से लोक संस्कृति में आए बदलावों को किस तरह देखते हैं?

यह समय विज्ञान और प्रौद्योगिकी का है. इसने लोक संस्कृति को सबसे ज्यादा प्रभावित किया है. अगर प्रौद्योगिकी लोक कथाओं को बच्चों की चेतना में डालकर रख पाती तो अच्छा था. ऐसा होता तो हमारे बच्चे परंपरागत खेलों को भूल नहीं पाते और कई कलाएं मर नहीं जातीं. आज अंग्रेजी के वर्चस्व ने लोक भाषाओं के अस्तित्व पर खतरा पैदा कर दिया है. हर देशज चीज को नकारने की साजिश चल रही है. इसका सीधा असर नयी पीढ़ी में देखने को मिल रहा है. उसकी चेतना में लोक जीवन के लिए कोई स्थान नहीं बचा है. सवाल है कि इस विश्व-ग्राम में हमारी लोक संस्कृति का क्या स्थान होगा. स्त्रास ने बहुत बढि़या कहा था, ‘पिकासो आज नहीं तो हजारों साल बाद पैदा हो जाएगा, मगर जाने-अनजाने परंपरागत सांस्कृतिक विरासत को छोड़ दिया तो उसे कभी प्राप्त नहीं कर सकेंगे.’

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