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लोक गाथा [२] : लाची सोनारिन..

ललित सरमा कै कूची : अगिन असनान..
लोकगाथा के सिलसिले मा भरथरी की लोकगाथा के बाद आज लाची सोनारिन पै ई पोस्ट हाजिर है:
      ई लोकगाथा लुपुत हुवै के कगार पै है। कुछै अंस हियाँ दीन जात हैं। करुना यहि लोकगाथा कै इस्थायी भाव है। कौनौ समय यहि लोकगाथा का लोगै अँसुवाय-अँसुवाय पढ़त/सुनत/गुनत/गावत रहे होइहैं, मुल आजु तौ लोगै भुलान बैठा हैं। यहि लोकगाथा मा यक लाची सोनारिन कै कहानी है, जेहिकै बियाह होइ गा रहा अउर यक राजपूत वहिपै मोहित होइ जात है। लाची कै उमिर सोलहै साल कै है। ऊ रजपुतवा समरथ है; लाची कै इमान लूटा चाहत है। ऊ प्रलोभन कै हिकमति लगावत है, मुदा लाची आपन जान दैके वहिकै सिकार बनै से बचि जात है। समाज लाची का सती कै आदर्स मान लियत है। रजपुतवा तौ अभय रहत है; ‘समरथ को नहिं दोष गोसाईं’ ! जाने केतनी बिधियन से औरतैं सतायी गयी हैं, सास्त्र केतना बोलत है, वहिका सास्त्र वाले जानैं, लेकिन लोकवानी तौ साफ साफ कहत है। कुछै अंस मा औरतन की मजबूरी कै ई करुन गाथा आपके सामने है:

लोक गाथा : लाची सोनारिन..

सोरहै बरस कै लचिया सोनरिया रे ना।
लचिया खिड़की बैठि लेय बयरिया रे ना।
घोड़ा चढ़ि चलि आवै रजपुतवा रे ना।
रामा परिगै लाची पे नजरिया रे ना।
चला गवा घोड़वा खिरिकिया रे ना।
रामा बाँधे राजा कदम की डरिया रे ना।
राजा चले गये कुटनी पँच महलिया रे ना।
देबै कुटनी तोहैं पाँच मोहरिया रे ना।
कुटनी लचिया भोरे महला लै आवौ रे ना।
……………….

हिन्दी में भावार्थ: यह लोक गाथा स्त्री की परवशता की मार्मिक अभिव्यक्ति है। इसमें आद्यंत करुणा विद्यमान है। इस लोक गाथा में सोलह वर्ष की वैवाहित लाची सोनारिन का जिक्र है। उपरोक्त नौ पँक्तियों का अर्थ इस प्रकार है- “ सोलह वर्ष की लाची(नामक) सोनारिन खिड़की पर बैठी बयार(हवा) ले रही है। उसी समय घोड़े पर सवार एक राजकुमार/राजा/राजपूत आ जाता है। हे राम, उसकी नजर लाची पर पड़ जाती है। घोड़ा धीरे धीरे खिड़की की ओर बढ़ जाता है। राजा घोड़े को समीपस्थ कदम्ब के पेड़ की एक डाल में बांध देता है। वह वहाँ से सीधे कुटनी पन्च(इसका अर्थ नीचे विस्तार से है) के घर की ओर चल देता है। वह कुटनी को पाँच मोहरें देने की बात करता है, और कहता है कि कल भोर ही लाची को मेरे महल में ले आना। ” अंततः लाची प्राण त्याग देती है और अपने ईमान की रक्षा करती है। लोक-वाणी राजा की निन्दा करती है और लाची का यश गाती है। करुणा यह है कि यह तो एक लाची की कथा है, जाने कितनी स्त्रियाँ बर्बर सामंती दुराचार की शिकार हुई होंगी। सामंत-सत्ता  अभय रही, और स्त्रियाँ मौत की देहरी लाँघती रहीं, दुराचार का शिकार होती रहीं।  
कुटनी: स्त्रियों को बहला फुसलाकर उन्हें परपुरुष से मिलाने वाली स्त्री। दूती। कभी कभी दो लोगों में झगड़ा लगाने वाली स्त्री को भी यही कहते हैं। ‘कुटना’ इसी कर्म को करने वाले पुरुष को कहते हैं। इस क्रिया-कर्म को कुटनाना, कुटनापा या कुटनपन कहते हैं।   
सादर;
अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी
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