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अवधी साहित्य के शिखर साहित्यकार चंद्रभूषण त्रिवेदी ‘रमई काका’

ई आलेख बिख्यात अवधी साहित्यकार रमई काका के ऊपर लिखा गा हय जौन हमैं नवंबर-१५ मा दोस्त हिमांशु बाजपेयी के जरिये मिला रहा। यानी, काका केरी जन्म-शताब्दी-वर्ष मा। यहिका चित्रलेखा जी लिखिन हँय। हम उन कय आभारी हन। : संपादक
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*चित्रलेखा वर्मा

हिन्दी साहित्य जगत में साहित्यिक प्रतिभा के धनी, अवधी के लोक-नायक, यशस्वी चंद्रभूषण त्रिवेदी का विख्यात नाम ‘रमई काका’ है। आधुनिक अवधी काव्य की परिधि अत्यंत विस्तृत है और रमई काका अवध क्षेत्र के सर्वप्रिय जनकवि हैं।  

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रमई काका

आपका जन्म २ फरवरी १९१५ में जनपद उन्नाव के रावतपुर नामक गाँव में हुआ था। आपके पिता पं. वृंदावन त्रिवेदी फौज में नौकरी करते थे तथा प्रथम विश्व युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुए। उस समय वे केवल एक वर्ष के थे। काका की आत्मकथा से पता चलता है कि पिता की मृत्यु के बाद माँ गंगा देवी को सरकार से कुल तीन सौ रूपए मिलते थे जिनसे वे अपने परिवार को चलाती थीं। इस तरह उनका बचपन संकटों और कष्टों में बीता। पर आपका लालन-पालन इस तरह से हुआ कि ग्राम संस्कृति काका के जीवन का पर्याय बन गयी क्योंकि आपकी प्राथमिक शिक्षा ग्रामीण वातावरण में हुई थी। हाई स्कूल की परीक्षा अटल बिहारी स्कूल से उत्तीर्ण की। इसके पश्चात आपने नियोजन विभाग में निरीक्षक का पद सम्हाला। निरीक्षक पद  का प्रशिक्षण लेने के लिए वे मसौधा-फैजाबाद में कुछ समय रहे। अपने प्रशिक्षण काल में भी आपने अपनी प्रतिभा से प्रशिक्षकों को प्रभावित किया। यहाँ उन्होंने कई कविताएँ लिखीं तथा कई एकांकियों का मंचन भी किया।

‘गड़बड़ स्कूल’ एकांकी ने यहाँ के लोगों का बहुत मनोरंजन किया। यहाँ के बाद उनकी नियुक्ति उन्नाव के बोधापुर केंद्र में हो गयी। यहाँ इन्होंने बहुत मेहनत की। फलतः इनके केंद्र को संपूर्ण लखनऊ कमिश्नरी में प्रथम स्थान मिला। उन्हें गवर्नर की ‘सर हेनरी हेग शील्ड’ प्रदान की गयी। इस केंद्र पर काम करते हुए काका ने एक बैलगाड़ी बनायी जिसमें बालवियरिंग का प्रयोग हुआ था तथा ढलान से उतरते समय उसमें ब्रेक का भी प्रयोग किया जा सकता था।

यद्यपि आपने शास्त्रीय एवं सुगम संगीत का विधिवत प्रशिक्षण नहीं लिया था परंतु अपनी प्रतिभा के ही बल पर शास्त्रीय और सुगम संगीत का ज्ञान प्राप्त किया। २७ वर्ष की उम्र में १९४१ में काका लखनऊ आकाशवाणी में नियुक्त हुए और स्थानीय रूप से लखनऊ में बस गये। काका आकाशवाणी में ६२ वर्ष की आयु तक रहे और १९७७ में सेवानिवृत्त हुए। इसके दो वर्ष बाद दो-दो वर्षों के लिए उनका सेवाकाल बढ़ाया भी गया। सेवानिवृत्ति के बाद भी वे निष्क्रिय नहीं हुए और आकाशवाणी, दूरदर्शन, समाचार पत्र, पत्रिकाओं और कवि सम्मेलनों से जुड़े रहे। आकाशवाणी पर आपने अनेक भूमिकाएँ भी निभायीं। सन्तू दादा, चतुरी चाचा, बहिरे बाबा आदि उनकी भूमिकाएँ थीं। रमई काका के अतिरिक्त उनको बहिरे बाबा के नाम से भी ख्याति मिली। बहिरे बाबा धारावाहिक ने तो प्रसारण का कीर्तिमान स्थापित कर दिया था। यह धारावाहिक २५ से भी अधिक वर्षों तक आकाशवाणी से प्रसारित हुआ।

यद्यपि काका स्थायी रूप लखनऊ में रहे पर उनका संपर्क गाँव से जीवन भर बना रहा। शहर में रहते हुए आपने अपने ग्रामीण मन को बचाए रखा। रमई काका का काव्य अवध के गाँव से बहुत गहराई से जुड़ा होने के कारण आकाशवाणी (पंचायत घर), दूरदर्शन और एच.एम.वी. के रिकार्डर के माध्यम से उनकी कविताएँ अवध अंचल में रच-बस गयीं। ‘मौलवी’ रमई काका की पहली उपलब्ध कविता है। यह कविता उन्होंने ‘पडरी’ के मिडिल स्कूल में पढ़ते हुए लिखी थी। इस कविता पर काका के अपने गुरु पं. गौरीशंकर जी से आशीर्वाद मिला था कि काका एक कवि के रूप में विख्यात होंगे।

रमई काका हास्य-व्यंग्य कवि के रूप में काफी विख्यात रहे। उनकी प्रकाशित तीन कविताओं में ‘फुहार’,‘गुलछर्रा’ तथा ‘हास्य के छींटे’ हास्य-व्यंग्य रचनाओं ही संकलन हैं। ‘बौछार’ उनकी प्रथम और ‘भिनसार’ उनकी दूसरी कृति है। इन दोनों पुस्तकों में अधिकतर व्यंग्य रचनाएँ हैं। इनके बारे में संक्षिप्त जानकारी इसप्रकार है, बौछार १९४४ ई. में छपी। बौछार ग्रामजीवन, प्रकृति-चित्रण, छायावादी काव्य, राष्ट्रप्रेम, सामाजिक भावना और जनवाद से प्रेरित ३० कविताओं का संकलन है। भिनसार में ४२ कविताएँ हैं। इसकी कविताएँ वर्षा की बूँदों से तन-मन को भिगोती हुई हास्य-व्यंग्य की मिठास से भरी हैं। ‘नेता जी’ सुभाषचंद्र बोस पर लिखा गया है। यह आल्ह छंद में लिखा गया है। परंपरागत शैली में लिखा वीर रस का यह अनूठा काव्य है।

‘हरसति तरवारि’ तथा ‘माटी के बोल’ शीर्षक पुस्तकों में अधिकांश गीत रचनाएँ हैं, ये लोकधुनों पर आधारित हैं। हास्य के छींटे, गुलछर्रा, तीर के समान प्रहार करती हुई उत्कृष्ट व्यंग्य उकेरती हुई पाठकों का मनोरंजन करती हैं। ये खड़ी बोली की कविताओं के संकलन हैं। सभी काका के जीवन के उत्तरार्ध में लिखी गयी थीं। शेष सभी संकलनों की भाषा अवधी है।

इनकी पुस्तकें हजारों-लाखों की संख्या में छपीं और बिकीं।

काका की तीन नाट्य-कृतियाँ भी प्रकाशित हुई थीं। ‘रतौंधी’ पुस्तक में आठ तथा ‘बहिरे बोधन बाबा’ शीर्षक पुस्तक में ७ एकांकियाँ-नाटक संकलित हैं। काका की खड़ी बोली की चार एकांकियों का एक संकलन जुगनू नाम से प्रकाशित हुआ था। ‘कलुवा बैल’ एक अवधी उपन्यास भी आपने लिखा पर यह प्रकाशित नहीं हो सका। ‘स्वतंत्र भारत सुमन’ पत्रिका में यह धारावाहिक के रूप में छपा था।

काका की कई गंभीर रचनाओं-लेखों के संकलित रूप का प्रकाशन आज तक नहीं हो पाया, यद्यपि इस संकलन की अधिकांश कविताएँ ‘भिनसार’ और ‘बौछार’ में प्रकाशित हो चुकी थीं। किन्तु अनेक महत्वपूर्ण रचनाएँ अभी भी अप्रकाशित हैं। इन रचनाओं में ‘भोर की किरन’, ‘सुखी कब होहिहै गाँव हमार’, ‘गाँव है हमका बहुत पियार’, ‘छाती का पीपर’ आदि अनेक लोकप्रिय कविताएँ हैं। काका के नाठकों का एक बहुत बड़ा भाग आज भी अप्रकाशित है। ‘हंस किसका है’ शीर्षक एक बालोपयोगी एकांकियों का संकलन है। यह अगर प्रकाशित हो तो बालकों के लिए बहुत महत्वपूर्ण सिद्ध हो सकता है।

वृद्धावस्था में ब्रांकाइटिस रोग से वे पीड़ित थे। अन्त में १९८२ की फरवरी में इतने बीमार हो गये कि फिर सम्हल ही नहीं पाए और अंत में १८ अप्रैल १९८२ की प्रातःकाल को उनका निधन हो गया। उनका गाँव से मोह तो था ही पर वे बहुत सुसंस्कृत नागरिक थे। साधारण रहन सहन वाले चंद्रभूषण त्रिवेदी तुलसी, गांधी और आर्यसमाज के विचारों से प्रभावित थे। उनका गाँव आर्यसमाज का गढ़ था तथा पं. प्रयागदत्त, जो वेदों के प्रकाण्ड पंडित थे, उस गाँव में रहते थे।

वे असाधारण मेधा वाले रचनाकार तो थे ही साथ में उनको लेखक, नाटककार, अभिनेता और संगीतज्ञ के रूप में भी कम सम्मान नहीं मिला। रमई काका के विपुल साहित्य की अनुपलब्धता के कारण उनके साहित्य को पढ़ने का उत्सुक एक बड़ा पाठक समुदाय अधिकांशतः अपने को हताश-निराश और निरुपाय अनुभव करता है। रमई काका के समग्र साहित्य का मूल्यांकन भी होना शेष है। रमई काका का साहित्य सर्वजन को सुलभ हो सके, इसका भी कुछ प्रयास होना चाहिए।

अवधी कविता के शिखर साहित्यकार रमई काका केवल किसानों के कवि नहीं, स्वयं भी कविता के किसान थे जिन्होंने कागज रूपी धरती पर अक्षर बीज बो कर मुस्कान और हास्य की जो फसल तैयार की है वह आज तक पाठकों को हँसाती और गुनगुनाती है।

चित्रलेखा वर्मा

चित्रलेखा वर्मा

इस शताब्दी वर्ष में हास्य के अमर कवि रमई काका के चरणों में अपना शत शत नमन निवेदित करते हुए ईश्वर से यही प्रार्थना करती हूँ कि काका की अमर कृतियों की प्रेरणा से सभी पाठकों व रचनाकारों में हँसाने की क्षमता प्राप्त हो।

(नवंबर-२०१५)

कविता : लछिमी-पूजन (कवि रमई काका)

वधी के आधुनिक कबियन मा सबसे पापुलर कवि रमई काका कै जनम रावतपुर, उन्नाव जिला(अवध) मा दुइ फरौरी सन्‌ १९२५ क भा रहा। काका जी कै पूरा नाव है चंद्रभूसन तिरबेदी। काका केरी कबिताई मा व्यंग्य कै छटा जनता के जबान पै चढ़ि के बोलति रही। आजौ कविता कै उहै असर बरकरार अहै। १९४० से काका जी आकासबानी मा काम करै लागे अउर तब से काका जी कै ख्याति बढ़तै गै। आकासबानी लखनऊ से काका जी कै प्रोग्राम ‘बहिरे बाबा’ बहुतै सराहा गवा। काका जी के कार्यक्रम कै प्रस्तुति बी.बी.सी. लंदन से ह्वै चुकी है। इनकै कबिता चौपाल मा, किसानन के खेतन मा, मेलन मा, चौराहन पै सहजै मिलि जात है। ‘भिनसार’, ‘बौछार’, ‘फुहार’, ‘गुलछर्रा’, ‘नेताजी’ जैसे कयिउ काब्य-संग्रह हजारन की संख्या मा छपे अउर बिके। दूर-दूर तक अपनी लोक-भासा कै जस फैलाय के माटी कै ई सपूत अठारह अपरैल सन्‌ १९८२ क ई दुनिया छोड़ दिहिस!

ई कविता ‘लछिमी-पूजन’ चंद्रशेखर जी के सौजन्य से मिली। यहि कविता मा लछिमी-पूजन के बहाने ‘पैसरमी किसान’ आपन ब्यथा कहत अहै। ऊ जगत की ब्यवस्था पै सवाल करत्‌ अहै कि हमरेन पैसरम से दुनिया जगामग्ग भै मुला हमहीं केतना अभाव झेलित है! आखिर काहे! : संपादक
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 कविता : लछिमी-पूजन (कवि रमई काका) 

लछिमी जी की अगवानी मा,
सबके घर जगमग-जोति जरी।
उतरे धरती पर नखत मनौ,
परकासु फइलिगा गली-गली।
चटके परकास सोनहरे के,
पाँउरा बिछे हैँ ठाँव-ठाँव।
औ लछिमी-लछिमी कै गोहारि,
जब मची सगत्तर गांव-गांव।
तब हमहुँ अंधेरी कुरिया मा,
चटकील सुभग परकासु भरा ।
औ बेकल अनमन हिरदय मा,
अभिलास आस बिसवास भरा।
फिरि सरधा ते जागरन कीन,
औ राह दीख यकटक नयनन।
हमरी कुरिया मा न आईँ,
का चली गईँ ऊँची महलन।
जी की फुलवारी के फुलवा,
अँसवा बनि नयनन ते निकरे।
पर लछिमी जी न दरस दिहिन,
निसफल पिरथी पर सब बिथरे।
लछिमी धनिकन की देवी हैँ,
जिनके उइ सदा सहारे हैँ।
दीनन के दीना नाथ देव,
लछिमी पति नाथ पियारे हैँ।
हमहीं धरती के मालिक हन,
हम पैसरमी तपसी किसान।
धन लछिमी सब कुछु खोय चुकेन,
मुलु हैं अपनेपन का गुमान।
जग का सुखु छइला छहरि-छहरि,
हमरिही दीनता की भुइँ पर।
जग के महलन कैं नीव परी,
हमरिही झोंपड़िन के ऊपर।
उइ धनिक आँय हम निरधनियाँ,
मुलु दीनन ते हैं धनिक बने।
माटी की किनकी-किनकी ते,
हीरा पन्ना मनि मानिक बने।
पथरन के छोटे टुकरन ते,
है परबत का यतना उँचान।
बदरन की नान्हीं बूंदन ते,
सागरु यतना होइगा महान।
हम करित जगत का अन्नु दानु,
ई ख्याल छोडि जो बइठि रही।
लछिमी पति आसनु छोड़ि चलैं,
फिरि लछिमी कै गति कौनि कही।
जौं हम न सही यह धूप ताप,
तौ मिले न सुखु छाहीं जग का।
औ हम न सुखाई रकतु अपन,
तौ मिटै हरापनु पग-पग का।
हम जौ न पसीना अपन बहाई,
जगु कइसे बिसरामु करै।
हम जौ न करी खाली कुरिया,
कइसे संसारु बखारु भरै।
चिकनई पसीना कै हमरे,
डेलिन-डेलिन मा लहकि रहि।
ख्यातन मा सिरजा हम कपास,
जहिके बाति है दहकि रहि।
सब जगतु उजेरिया मा कुलकै,
मुलु हम हन खड़े चिराग तरे।
हम सारे जग के परकासी,
ना पाइत है उजियारु अरे!
हम निरखित खड़े अँधेरे मा,
लछिमी जी तन आसा लगाय।
घुलि जाय अंधेरु उजेरा मा,
सारा जगु एकसाँ जगमगाय।
__ रमई काका
 
सौजन्य : चंद्रशेखर जी लखनऊ-अवध क्यार रहवैया हैं। (अवधी)साहित्य से खासी दिलचस्पी राखत हैं। इनसे आप http://www.facebook.com/s.chandrasekhar06  पै संपर्क कै सकत हैं।

कविता : पुरानि चुनरी (कवि रमई काका)

अवधी के आधुनिक कबियन मा सबसे पापुलर कवि रमई काका कै जनम रावतपुर, उन्नाव जिला(अवध) मा दुइ फरौरी सन्‌ १९२५ क भा रहा। काका जी कै पूरा नाव है चंद्रभूसन तिरबेदी। काका केरी कबिताई मा व्यंग्य कै छटा जनता के जबान पै चढ़ि के बोलति रही। आजौ कविता कै उहै असर बरकरार अहै। १९४० से काका जी आकासबानी मा काम करै लागे अउर तब से काका जी कै ख्याति बढ़तै गै। आकासबानी लखनऊ से काका जी कै प्रोग्राम ‘बहिरे बाबा’ बहुतै सराहा गवा। काका जी के कार्यक्रम कै प्रस्तुति बी.बी.सी. लंदन से ह्वै चुकी है। इनकै कबिता चौपाल मा, किसानन के खेतन मा, मेलन मा, चौराहन पै सहजै मिलि जात है। ‘भिनसार’, ‘बौछार’, ‘फुहार’, ‘गुलछर्रा’, ‘नेताजी’ जैसे कयिउ काब्य-संग्रह हजारन की संख्या मा छपे अउर बिके। दूर-दूर तक अपनी लोक-भासा कै जस फैलाय के माटी कै ई सपूत अठारह अपरैल सन्‌ १९८२ क ई दुनिया छोड़ दिहिस!

प्रस्तुत है रमई काका कै कविता, ‘पुरानि चुनरी’! 

कविता : पुरानि चुनरी

      यह चुनरी बड़ी पुरानी।

बूटा-बूटा मा यहिके,
झलकत अम्मा का दुलारु।
लाली मा घुला मिला है,
बप्पा का चटका पियारु।
यह यादि धरावति छोटे,
भैय्या कै तितुली बोली।
सिकुरन मा लुकी छिपी है,
सब बचपन की हमजोली।

      है मइके केरि निसानी,
      यह चुनरी बड़ी पुरानी।

दरसात माँग मा सेंदुर,
है यहिमा उइ सुभ दिन का।
जब बँधा रहै खूँटे मा,
पटुकवा पियरका उनका।
है अजहूँ देति गवाही,
गठि बंधन प्रेम परन कै।
यह धरी सँजोई पोथी,
पति सेवा नेम धरम कै।

      पावन सोहाग मा सानी,
      यह चुनरी बड़ी पुरानी।

इक दिवस भोर कै लोही,
यहिका अपने रँग रँगिगै।
सुरजन कै किरन सोनहरी,
कोंछे मा आसिस भरिगै।
सब भेंटेनि दुइ-दुइ अँसुआ,
जिनते धागा हैं सीझे।
अपने अँसुवन के पानी,
आँचर के टिपका भीजे।

      है आवति यादि भुलानी,
      यह चुनरी बड़ी पुरानी।

यहि की जूड़ी छाँहीं मा,
है प्रेम बेलि अँगुस्यानी।
सजि-सजि सुघरीले फूलन,
बहु छहरि-छहरि फलियानी।
आँचर मा पोंछि सुखावा,
केतने दुख सुख का पानी।
ई घरी उसिलतै उसिलैं,
पहिले की सबै कहानी।

      जस कलियन पखै लुकानी,
      यह चुनरी बड़ी पुरानी। 

__कवि रमई काका  

सादर/अमरेन्द्र 

कविता : बुढ़ऊ का बियाहु (~कवि रमई काका)

  अवधी के आधुनिक कबियन मा सबसे पापुलर कवि रमई काका कै जनम रावतपुर, उन्नाव जिला(अवध) मा दुइ फरौरी सन्‌ १९२५ क भा रहा। काका जी कै पूरा नाव है चंद्रभूसन तिरबेदी। काका केरी कबिताई मा व्यंग्य कै छटा जनता के जबान पै चढ़ि के बोलति रही। आजौ कविता कै उहै असर बरकरार अहै। १९४० से काका जी आकासबानी मा काम करै लागे अउर तब से काका जी कै ख्याति बढ़तै गै। आकासबानी लखनऊ से काका जी कै प्रोग्राम ‘बहिरे बाबा’ बहुतै सराहा गवा। काका जी के कार्यक्रम कै प्रस्तुति बी.बी.सी. लंदन से ह्वै चुकी है। इनकै कबिता चौपाल मा, किसानन के खेतन मा, मेलन मा, चौराहन पै सहजै मिलि जात है। ‘भिनसार’, ‘बौछार’, ‘फुहार’, ‘गुलछर्रा’, ‘नेताजी’ जैसे कयिउ काब्य-संग्रह हजारन की संख्या मा छपे अउर बिके। दूर-दूर तक अपनी लोक-भासा कै जस फैलाय के माटी कै ई सपूत अठारह अपरैल सन्‌ १९८२ क ई दुनिया छोड़ दिहिस!

हाजिर है रमई काका क्यार कबिता ‘बुढ़ऊ का बियाहु’! यहि कबिता मा हँसी-बियंग के द्वारा वहि त्रासदी का देखावा गा है जेहिके चलते लोगै धनैत मनई का हुल्कारि-हुल्कारि के अधिक उमर हुवै के बावजूदौ बियाह करुवाय दियत रहे। यहिसे पैदा भै बिसंगति का सामने रखति है ई कबिता:  

कविता : बुढ़ऊ का बियाहु

      बात न हमते जाति कही॥

जब पचपन के घरघाट भयन,

तब देखुआ आये बड़े – बड़े।

हम सादी से इनकार कीन,

सबका लौटारा खड़े – खड़े॥

      सम्पति सरगौ मा राह करै,

      कुछु देखुआ घूमि घूमि आये।

      अपनी लड़की के ब्याहै का,

      दस पाँच जने हैं मुँह बाये॥

पर सबते ज्यादा लल्लबाइ,

भे सिउसहाय अचरजपुर के।

उइ साथ सिपारिस लइ आये,

दुइ चार जने सीपतपुर के॥

      सुखदीन दुबे चिथरू चौबे,

      तिरबेदी आये घुन्नर जी।

      कुन्जी पण्डित निरघिन पाँड़े,

      बड़कये अवस्थी खुन्नर जी॥

संकर उपरहितौ बोलि परे,

तुम्हरे तौ तनिकौ ग्यान नहिन।

यह सम्पति को बैपरी भला,

तुम्हरे याकौ सन्तान नहिन॥

      तब अकिल न ठीक रही।

      बात न हमते जाति कही॥

म्वाँछन का जर ते छोलि छोलि,

देहीं के र्‌वावाँ छारि दीन।

भौँहन की क्वारैं साफि भईं,

मूड़े मा पालिस कारि कीन॥

      देहीं मा उबटनु लगवावा,

      फिर कीन पलस्तर साबुन का।

      अब चमक-दमक मा मातु कीन,

      हम छैल चिकनिया बाबुन का॥

दीदन मा काजरु वँगवावा,

माथे मा टिकुवा कार-कार।

देहीं मा जामा डाटि लीन,

मूड़े मा पगिया कै बहार॥

      फिर गरे मा कंठा हिलगावा,

      जंजीर लटकि आयी छाती।

      मानौ अरहरि की टटिया मा,

      लटका है ताला गुजराती॥

सब कीन्ह्यौं रसम सही।

बात न हमते जाति कही॥

      जब सँझलउखे पहुँची बरात,

      कुछु जन आये हमरे नेरे।

      बइसाखी मुसकी छाँड़ि-छाँड़ि,

      बतलाय लाग अस बहुतेरे॥

दुलहा कि दुलहा का बाबा,

जेहिं मूड़े मौरु धरावा है।

यहु करै बियाहु हियाँ कइसे,

मरघट का पाहुनु आवा है॥

      ओंठें पर याकौ म्वाछ नहिंन,

      यहिं सफाचट्टु करवावा है।

      बसि जाना दुसरी दुलहिन कै,

      यहु तेरहीं कइके आवा है॥

पीनस चढ़ि अइसे सोहि रहे,

मानौ मिलिगा कैदी हेरान।

कैधों बिरवा के जलथुर ते,

यहु झाँकत है खूसट पुरान॥

      बसि यही तिना अपमान भरी,

      कानन मा परीं बहुत बोली।

      जी हमरे जी मा च्वाट किहिन,

      जइसे बंदूकन की गोली॥

अब जियरा मा जिरजिरी बढ़ी,

यहि संकर पण्डित के ऊपर।

जो बहुबिधि ते समझाय बुझै,

लइ आवा अइसि बिपति हमपर॥

      की जइसि न जाति सही।

      बात न हमते जाति कही॥

जब पहरु छा घरी राति बीती,

तब भँवरिन कै बारी आई।

सब कामु रतऊँधिन नासि कीन,

दीदन आगे धुँधुरी छाई॥

      पण्डितवैं बाति बनाय कहा,

      हमरे कइती दस्तूरु यहै।

      भँवरिन मा बरु के साथ साथ

      नेगी दुइ एकु जरूर रहै॥

उपरहितैं अँगदरु कामु कीन,

वहिं दुइ नेगिन का ठढ़ियावा।

जिन हमका पकरि पौखरा ते,

फिर सातौ भँवरी घुमवावा॥

      सतईं भँवरी मा पाँव म्वार,

      परिगा बेदी के गड़वा मा।

      जरि गयन जोर ते उचकि परेन,

      अधपवा अइस भा तरवा मा॥

हम बका झिका कहि दीन अरे,

ई नेगी हैं बिन आँखिन के।

वसि यतना कहतै हमरे मुँह,

कुछु घुसिगे पखना पाँखिन के॥

      हम हरबराय के थूकि दीन,

      उइ अखना पखना रहैं जौन।

      सब गिरिगे नेगिन के ऊपर,

      ई करैं रतउँधी चहै जौन॥

नेगी बोले यह बात कइसि,

तुम हमरे ऊपर थूकि दिहेउ।

हम कहा कि बदला लीन अबै,

तरवा हमार तुम फूँकि दिहेउ॥

      ई बिधि ते लाज रही।

      बात न हमते जात कही॥

जब परा कल्यावा सँझलउखे,

तब फिर बिपदा भारी आयी।

छत्तीसा लइगा चउकै मुलु,

पाँयन ते पाटा छिछुवायी॥

      भगवान कीन पाटा मिलिगा,

      मुलु खम्भा मा भा मूड़ु भट्ट।

      बटिया सोहराय अड़उखे मा,

      पाटा मा बइठेन झट्ट पट्ट॥

पर मुँह देवाल तन कइ बइठेन,

बिन दीदन सोना माटी है।

तब परसनहारी बोलि परी,

बच्चा पाछे यह टाठी है॥

      हम कहा कि हमरेव आँखी हैं,

      चहुँ अलँग निगाहैं फेरि रहेन।

      है बड़ी सफेदि पोताई यह,

      सो हम देवाल तन हेरि रहेन॥

बसि ई बिधि कइके बतबनाव,

टाठी कोधी समुहाय गयेन।

बिनु दाँतन चाभी कौरु ककसु,

सब पानी घूँट नघाय रहेन॥

      जब दूधु बिलारीं अधियावा,

      तब परसनहारी हाँकि कहिसि।

      मरिगइली नथियागाड़ी यह,

      ऊपर कै साढ़ी चाटि लिहिसि॥

हम कहा बकौ न जानि बूझि,

ना हम यहिका दुरियावा है।

घरहू मा सदा बिलारिन का,

हम साथेन दूधु पियावा है।

      ऊपर ते ऊपरचुपरु कीन,

      भीतर ते जियरा जिरजिरान

      जब जाना साढी नहीं रही,

      तब तौ सूखे आधे परान॥

पर परसनहारी टाठी मा,

जब हाथे ते पूरी डारा।

हम जाना आई फिरि बिलारि,

मूड़े मा पाटा दइ मारा॥

      सीमेण्ट उखरिगै मूड़े कै,

      तब रसोइँदारिन रोई है।

      सब भेदु रतउँधिन का खुलिगा,

      चालाकी सारी खोई है॥

ना कच्ची हँड़िया बार-बार,

कोहू ते चढ़ै चढ़ाये ते।

अधभूखे भागेन समझि गयेन,

ना बनिहै बात बनाये ते॥

      अब बिगरी रही सही।

      बात ना हमते जाति कही॥

(~कवि रमई काका)

घरघाट > निकट / लल्लबाइ > आकर्षित / वँगवावा > लगवाया / सँझलउखे > सायंकाल / अँगदर > बहुत बड़ा / अड़उखे > आड़ / ऊपरुचुपरु > ऊपरी बातें / जिरजिरान > कोपित हुआ।

~सादर/अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी

कवि रमई काका कै रचा बिरह-गीत : “कोयलिया सुनिकै तोरि पुकार री..!”

अवधी कवि रमई काका

अवधी के आधुनिक कबियन मा सबसे पापुलर कवि रमई काका कै जनम रावतपुर, उन्नाव जिला(अवध) मा दुइ फरौरी सन्‌ १९२५ क भा रहा। काका जी कै पूरा नाव है चंद्रभूसन तिरबेदी। काका केरी कबिताई मा व्यंग्य कै छटा जनता के जबान पै चढ़ि के बोलति रही। आजौ कविता कै उहै असर बरकरार अहै। १९४० से काका जी आकासबानी मा काम करै लागे अउर तब से काका जी कै ख्याति बढ़तै गै। आकासबानी लखनऊ से काका जी कै प्रोग्राम ‘बहिरे बाबा’ बहुतै सराहा गवा। काका जी के कार्यक्रम कै प्रस्तुति बी.बी.सी. लंदन से ह्वै चुकी है। इनकै कबिता चौपाल मा, किसानन के खेतन मा, मेलन मा, चौराहन पै सहजै मिलि जात है। ‘भिनसार’, ‘बौछार’, ‘फुहार’, ‘गुलछर्रा’, ‘नेताजी’ जैसे कयिउ काब्य-संग्रह हजारन की संख्या मा छपे अउर बिके। दूर-दूर तक अपनी लोक-भासा कै जस फैलाय के माटी कै ई सपूत अठारह अपरैल सन्‌ १९८२ क ई दुनिया छोड़ दिहिस!

प्रस्तुत है रमई काका जी कै रचा यक बिरह-गीत, जौन काका जी के काब्य-संग्रह ‘बौछार’ से लीन गा है:

बिरह-गीत : “कोयलिया सुनिकै तोरि पुकार री..!”  

सुनिकै तोरि गोहार कोयलिया,

सुनिकै तोरि पुकार री……!

बनके पात पुरान झरे सब, आई बसन्त बहार,

मोरी आँखिन ते अँसुवन कै, होति अजहुँ पतझार।

कोयलिया सुनिकै तोरि पुकार री॥

डारैं सजीं बौर झौंरन ते, भौंर करैं गुँजार,

मोर पिया परदेस बसत हैं, कापर करौं सिंगार।

कोयलिया सुनिकै तोरि पुकार री॥

भरौं माँग मा सेंदुर कइसे, बिन्दी धरौं सँवारि,

अरी सेंधउरा मा तौ जानौ, धधकै चटक अँगार।

कोयलिया सुनिकै तोरि पुकार री॥

चुनरी दिखे बँबूका लागै, राख्यों सिरिजि पेटार,

कूकनि तोरि फूँक जादू कै, दहकै गहन हमार।

कोयलिया सुनिकै तोरि पुकार री॥

अरी जहरुई तोरे बोले, बिस कै बही बयारि,

अब न कूकु त्वै, देखु तनिकुतौ, ढाँखन फरे अँगार।

कोयलिया सुनिकै तोरि पुकार री॥

हउकनि मोरि कंठ मा भरिले, ले टेसुन का हार,

कूकि दिहे पहिराय गरे मा, अइहैं कंत हमार।

कोयलिया सुनिकै तोरि पुकार री॥

(~रमई काका) 

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