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कविता : कुपंथी औलाद ( रफ़ीक शादानी ) ..

ज अवधी कबि रफीक सादानी कै कबिता “कुपंथी औलाद” आपके सामने है। सादानी जी बर्मा देस मा पैदा भा रहे अउर हुवाँ से परिवार समेत फैजाबाद-अवध आइ गा रहे। अति थोर आमदनी आदि के बावजूद अवधी मा कविता लिखै की चुनौती का स्वीकार किहिन, पुरहरे निभाइन। दुरजोग से पिछले साल फरौरी मा सादानी जी पूर्बांचल के साहित्तिक छितिज का बीरान कैके चला गये। दुरभाग से सादानी जी जैसे बेहद पापुलर अउर काबिल सायर की सायरी कै कौनौ संग्रहौ नाय आय सका है। हमार कोसिस रहे कि हुजूर की कबितन का जैसहूँ बनै, यहि ब्लाग/साइट पै हाजिर करी। हाजिर है कबिता “कुपंथी औलाद” ( आप नीचे यू-टुबही प्रस्तुति मा ई कविता सुनिउ सकत हैं ) :
      
     कबिता : कुपंथी औलाद

“ औरन के कहे मा हम आयेन
काया का अपने तरसायेन
कालिज मा भेजि के भरि पायेन
      तू पढ़ै से अच्छा घरे रहौ,
      चाहे खटिया पै परे रहौ।
हम सोचा रहा लिखि पढ़ि जइहौ
आकास मा एक दिन चढ़ि जइहौ
पुरखन से आगे बढ़ि जइहौ
      अब घर कै खेती चरे रहौ,
      … चाहे खटिया पै परे रहौ।
जबसे तू इस्कूल गयौ
तू फर्ज का अपने भूलि गयौ
तुम क्वारै भैया झूलि गयौ
      भट्ठी मा हबिस के बरे रहौ,
      … चाहे खटिया पै परे रहौ।
तुमसे अच्छा रघुआ हरजन
डिगरी पाइस आधा दर्जन
अस्पताल मा होइगा सर्जन
      तू ऊ …………..करे रहौ,
      … चाहे खटिया पै परे रहौ।
हम सोचा रहा अफसर बनिहौ
या देसभक्त लीडर बनिहौ
का पता रहा लोफर बनिहौ
      अब जेब मा कट्टा धरे रहौ
      … चाहे खटिया पै परे रहौ।
फैसन अस तुमपै छाइ गवा
यक राही धोखा खाइ गवा
हिजड़े का पसीना आइ गवा
      जीते जी भैया मरे रहौ,
      … चाहे खटिया पै परे रहौ।
हर बुरे काम पै अमल किहेउ
कुछ पढ़ेउ न खाली नकल किहेउ
बर्बाद भविस कै फसल किहेउ
      अब बाप कै सब सुख हरे रहौ,
      … चाहे खटिया पै परे रहौ।
हम पुन्न किहा तू पाप किहेउ
हम भजन तू फिल्मी जाप किहेउ
गुंडई मा कालिज टाप किहेउ
      जो मन मा आवै करे रहौ,
      … चाहे खटिया पै परे रहौ।
अइसन जौ बिगाड़े ढंग रहिहौ
बेहूदन के जौ संग रहिहौ
जेस रफीक हैं वैसन तंग रहिहौ
      पूलिस के नजर से टरे रहौ,
      … चाहे खटिया पै परे रहौ।”

           [ ~ अवधी कवि रफीक सादानी ]

सादर;
अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी

पसंघा: डा. अमर कुमार की टीप के चलते अपडेट के रूप मा कुछ जानकारी जोड़ित अहन। सादानी जी कै जनम १९३३ ई. मा बरमा ( आज कै म्यामार ) मा अत्तार दीन इमाम के घर भा रहा। बचपन हुवाँ बीता। बरमा से इनकर बप्पा इधर फैजाबाद आये। हुवाँ वै इत्र बनावै कै काम करत रहे। देस छूटा। नयी जगह पै जमब कठिन। कुछ समय बाद बप्पौ दुनिया छोड़ि दिहिन। रफीक कै जिंदगी बड़ी भंछत-जूझत बीती। बहुत कमै लोग जानत हैं कि सबका अपनी कविता से हसावै वाले, खुसी बाँटै वाले रफीक कै यक भाय अउर यक लरिका ( दुइ लरिकन मा ) तंगहाली मा दुनिया छोड़ि के चला गै रहे। रफीक मजबूरी का आपन ताकत बनाय लिहिन अउर कविता लिखि के खुसी रहै लागे, खुसी करै लागे। ब्यवसाय के छोट हुवै के कारन लोगै “कुँजड़वा” कहि के मजौ लियय से नाय चूके। फिलहाल ९ फरौरी २०१० का मुमताज नगर फैजाबाद कै रहवैया सादानी जी आपन इहलीला समाप्त कै दिहिन। जूझत-टकरात रफीक की किस्ती का किनारा मिलि गा, वनही कै कविता याद आवत है:
“ इनका उनका रफीक का गोहरावत हौ?
जब ऊ चहिहैं मिले किनारा, उल्लू हौ !! ”

यतनी जानकारी रही, साझा किहेन, अउर पता लगाउब, तौ फिर साझा करब। इनकी औरउ कबितन का अबहीं रखब, कल्ले-कल्ले 🙂 
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अन्ना हजारे..जनता कै अदालत..‘जियौ बहादुर खद्दरधारी’(रफीक शादानी)..

हम चुनाव लड़ब तौ हारि जाब। जमानतौ जब्त होइ जाये। आज लोगै १०० रुपया, सराब कै बोतल, साड़ी अउर आन-आन समान लैके मतदान करत अहैं।
जौन मनई आज तक मुखियौ कै चुनाव नाय जीति सका, ऊ यहि बात कै सर्टिफिकेट दे कि फलाने बेइमान हैं या इमानदार? .. चुनाव लड़ौ, जनता के बीच से, फिर कुछ बोलौ, जनता से बड़ी कौनौ अदालत नाय।
~ अन्ना हजारे के ताईं नेता तारिक 
अनवर कै समझाइस
(नीचे यू-टुबहे पीस मा सुना जाय सकत है।)
     अन्ना हजारे बेसक चुनाव प्रक्रिया से जुड़ा नाहीं हैं, मुला भ्रस्टाचार के खिलाफ आवाज उठावै कै हक उन्हैं पूरा है। जनता के अदालत कै बात केतना सही मानी जाय, जब यही अदालत जाने केतना भ्रस्टाचारिन का मुसलसल जितावत रहत है, ई वही अदालत है जेहिका निरच्छर अउर सोच-बिहीन राखि के सदियन से मलाई काटी जाति अहै। यही मलाई मारू तबका कै देन है कि लोगै ईमान की तरह आपन वोटौ बेंचत अहैं, जेहकै सीधी सीधी बात अन्ना जी किहिन हैं। यहि स्थिति मा खद्दरधारी नेतन की जमात से अलग कै केहू नेतन के भ्रस्टाचार पै अंगुरी देखाये तौ इन नेतन का मिरचा लगबै करे, जेहका तारिक अनवर की तिलमिलाहट मा देखा जाय सकत है। ई देस/संविधान/संसद/बिधानसभा कै बदकिस्मती कही जाये कि यही जनता केरी अदालत से जाने केतना खूनी/कतली/बाहुबली/ठेलुहै सफलता के साथ चुनाव जीतत हैं, अपने हथकंडन के चलते। यहिलिये यहि जनता के अदालत कै सीमा है।

     समय अस है कि भ्रस्टाचार संस्कृति कै हिस्सा बनत जात है। दनादन बिकीलीक्स ! लोकतंत्र कै चौथा खम्भा कहावै वाले मीडिया कै धोखेदार चेहरा ! पढ़े – लिखे बुद्धिजीविन तक मा गहरे पैठा स्वारथ ! न केवल राजनीतिक बल्कि अकादमिकौ संस्थन मा ब्यापा परिवार-वाद ! उसूल पै जियय वाला परेसान और मखौल कै हिस्सा भर ! नाहीं समझ मा आवत कि आपन के अउर परावा के ! स्विस बैंक कै नजारा अलगै कहत है कि देसी लोगन से बड़े लुटेरे तौ बिदेसिउ नाय रहे ! यहि मौके पै कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री एच. डी. कुमारस्वामी कै कहब काबिले-गौर है कि “ आज के समय मा अगर महत्मा गाँधिउ जीबित होते तौ या तौ भ्रस्टाचार के जरिये बैंक मा पैसा यकट्ठा करते या फिर राजनीति छोड़ देते।” ऐसे समय मा  अन्ना हजारे कै सबसे बड़ी सफलता ई है कि जहाँ सगरौ कूप मा भाँग परी है, वै कम-से-कम भ्रस्टाचार जैसे मुद्दे पै लोगन का सोचै के तरफ प्रेरित तौ करत अहैं, जन लोकपाल बिल कौनौ फाइनल फतह न आय। ई तौ यक्कै डग है, खामी यहू मा है, मुक भाँग-चेतना वाले माहौल से ई कुनमुनाहट लाख गुना भले अहै!!

     नेतन के चरित पै रफीक सादानी कै ई कबिता ‘ जियौ बहादुर खद्दरधारी ’ सादानी जी के आवाज मा हाजिर है:


     
     चलत चलत यहि यू-टुबहे पीस का देखै कै वकालत करब। यहसे काफी बातैं किलियर होइहैं:

सादर;
अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी