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औपनिवेसिक सत्ता सभ्यता कय भ्रमजाल अउर लोकगीत : बजरंग बिहारी ‘बजरू’

ई आलेख  आकार मा भले थोर लागय मुला निगाह मा बहुत फैलाव औ गहरायी लिहे अहय। कयिउ बाति अस हयँ जौन चेतना का कुरेदयँ। औपनिवेसिक सत्ता के दौरान जौन भरम-जाल रचा गा ऊ गजब रहा। यहिमा सोझैसोझ जे फँसा ते फँसबै भा और जे बिरोध कय जिम्मा उठाये रहा उहौ, आनी-आनी मेर से, फँसि गा। यहि भरमजाल के चलते लोकगीतन (लोकभासन) के साथ जौन असावधानी औ जादती भै, वहिका जहिरावत ई आलेख पढ़य जाय कय माँग करत हय। : संपादक
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औपनिवेसिक सत्ता सभ्यता कय भ्रमजाल अउर लोकगीत : बजरंग बिहारी ‘बजरू’   

तब बच्चा रहेन| प्राइमरी इस्कूल कय बिद्यार्थी| यक बियाहेम गयन रहा| अपनेन गाँव मा| पंडित जी मंत्र पढ़िन| दुलहा से कुछ करय का कहिन| फिर रोकि दिहिन| हमरे बगल मा यक बुजुर्ग बैठा रहे| वय कहिन की अबहीं मेहररुअन कय मंगलगीत सुरू नाहीं भवा| जब तक ऊ न पूर होये पंडितजी आगे ना बढ़ि पैहैं| तब तौ यहि बातिक मर्म समझि नाहीं पायेन| बादि मा धीरे-धीरे अर्थ खुला की समाज जतना महत्त्व (बेद)मंत्र का देत है वतना महत्त्व लोकगीतौ का मिलत है|
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परम्परा से लोकगीत का मौखिक साहित्य या वाचिक साहित्य के अंतर्गत रखा जात है| मानव जाति कय सबसे पुरानि अभिव्यक्ति गीतन मा भई होये| बिद्वानन कय कहब है की लोकगीत औ’ लोककथा सभ्यता के आदिकाल से रची जाति हैं| रचना कय ई दूनौ रूप अलग-अलग औ’ यक-दुसरे मा घुलिमिलि कय बनत हैं| लोकगीत कय यहै परिभाषा है की वहका लोक रचत है| मतलब की वहकै रचनाकार अग्यात रहत है| जैसय कौनौ गीत कय रचनाकार कय नाम पता चलि जात है ऊ लोकगीत के दायरा से बाहर होय जात है| कबीर कय निरगुन लोक मा खूब गावा जात है मगर वहका लोकगीत नाहीं कहा जात है| यहै हालि तमाम भक्त कबियन के गीत, कबिता कय बाटै| भजन लिखै वाले, बिरहा रचै औ गावै वाले लोककवि कहा जात हैं लेकिन उनकै रचना लोकगीत नाहीं कही जाति है| लोकगीत कय असली ठेकाना ताम्रपत्र, भित्तिपत्र, पोथी ना होय| ऊ तौ लोक के कंठे बिराजत है| अपने सुभाव से लोकगीत करिया अच्छर मा ढलै से बचा चाहत है| वहका आजादी चाही| ऊ ‘प्रामाणिकता’ के फेर मा नाहीं पड़त| जब छापाखाना आवा तब्बौ ओपहर ध्यान नाहीं गवा| वहका लिखित रूप बहुत बादि मा दीन जाय लाग| वहकै इतिहास लिखित साहित्य के इतिहास से बहुत पुरान बाटै जद्यपि इतिहास कय चिंता लिखित साहित्य का जादा रहति आई है| लोकगीत केर जड़ समय के अनंत बिस्तार मा फैली बाटै यहीलिए ऊ आपन प्राचीनता साबित करय खातिर परेसान नाहीं होत| लिखित साहित्य तौ मुट्ठी भर लोगन के बीच मा पढ़ा-समझा जात है मगर मौखिक कय पसारा सबके बीच मा रहत आवा है| आधुनिक काल मा जब साक्षरता कय प्रसार भवा तब लिखित साहित्य कय दायरा बढ़ा| ओहके पहिले जनता कय भावधन यही मौखिक साहित्य या लोकगीतन मा यकट्ठा होत औ बहत रहा| पूरे समाज कय सांस्कृतिक जीवन यही जलधार से सींचा जात रहा|

लगभग दुय सौ बरस देस फिरंगी गुलामी मा रहा| यहि दौरान वह पर ‘सभ्यता’ कय अतना दबाव पड़ा की ऊ नकलची लोगन से भरत गा| अपने धरती से, भासा से, भेस से, कथा औ गीत से दूरी बढ़त गय| यक उधार लीन्ह बनावटी जिंदगी हावी होत गय| हिंदी वर्द्धिनी सभा मा भाषण देत भारतेन्दु बाबू याद देवायिन की अंगरेज तौ यहर कय गीत बटोरे जात हैं लेकिन देसबासिन का कौनौ परवाह नाहीं है| फिरंगी हमरे लोकचित्त का परखे लेत हैं औ हम उनके सेक्सपियर या मिल्टन का पढ़िकै गदगद बाटेन| वहि देस कय अनपढ़ किसान, मजूर और घरैतिन का सोचत हैं, उनकय जीवन मूल्य कौने गीतन मा कौने तरह से जाहिर होत है यकरे प्रति हम यकदम उदासीन हन| वय अंगरेज हमरे लोकजीवन मा पैठ बनाय लेहें मगर हम उनके लोकजीवन के सम्बंध मा कुछू ना जानि पाइब-

आल्हा  बिरहहु  को  भयो  अंगरेजी  अनुवाद|
यह लखि लाज ना आवई तुमहिं न होत बिखाद||

भारतेन्दु बाबू ई बाति 1877 मा कहिन रहा| आजव ई वतनय सही लागत अहै| भारतेन्दु के करीब पचास साल बाद रामनरेश त्रिपाठी अवधी लोकगीतन कय संग्रह सुरू किहिन| अपने ग्रामगीत कय भूमिका मा वय हैरानी जताइन की हम लोगन का अपने धरती से अतनी दूर के खींच लयिगा! नई पढ़ाई हासिल कैकै जवन पीढ़ी सामने आवति है ऊ अपने घर-परिवार से, गाँव-जेंवारि से कतना अजनबी होय जाति है| जतनय ऊंच डिग्री वतनय जादा दूरी| रामनरेशजी नई सिच्छा ब्यवस्था कय पैरोकार रहे| खड़ी बोली हिंदी कय कट्टर समर्थक| वय सवाल तौ नीक उठायिन मगर वहकै जबाब तक नाहीं पहुँचे| औपनिवेसिक सत्ता सभ्यता कय जौन भ्र‘मजाल रचिस रहा वहके चक्कर मा ऊ पूरा जुग थोर-बहुत फंसा रहा| यक बिचित्र संजोग के तहत आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी वाली ‘सरस्वती’ पत्रिका खड़ी बोली के पच्छ मा आन्दोलन चलाइस| यहसे तौ कौनौ दिक्कत नाहीं रही मगर ई आन्दोलन अवधी, ब्रजभाषा के खिलाफ खड़ा होइगा! ई प्रचार कीन गा की यहि भासा के ब्यवहार से ‘राष्ट्र’ कय उन्नति ना होय पाये| यहव कहा गा की देहाती भासा मा नवा बिचार नाहीं कहा जाय सकत है| सभ्यता कय मानक बनाय दीन गय खड़ी बोली औ हिंदी कय दूसर बोली हीनतासूचक मानी जाय लागि| 1900 से लैकै 1940 तक जवन जहर बोवा गा वहकय फसल अब लहलहाति बाटै| मैथिली अलग भै, राजस्थानी आपन झंडा उठायिस| अब भोजपुरी अलग होति है| काल्हि का हिंदी कय बाकी हिस्सेदार सामने अइहैं| आगमजानी कबि तुलसीदास ‘मानस’ मा चेताइन रहा-

स्याम सुरभि पय बिसद अति, गुनद करहिं सब पान|
गिरा ग्राम्य सियराम जस, गावहिं सुनहिं सुजान||

बर्णबोध औ भासाबोध दूनौ पूर्वग्रहग्रस्त हैं| यहि दोहम तुलसी पूछत हैं की का करिया गाय कय दूध गोरहरि गाय के दूध से कमतर होत है? अक्सर अस मानि लीन जात है| जबकि असलियत ई है कि करिया गाय के दूधे मा जादा गुण होत है| ऐसे भासा कय मसला है| चहै गाँव कय बोली होय या संस्कृत, वहि भासा मा का कहा गा है, यहसे बाति कय महत्त्व तय होये| कथ्य निर्धारक होत है, भासा नाहीं| महत्त्व रंग से या वर्ण से तय न करौ, पहिले वहकय गुण देखौ| समझदार कय यहै पहचान है| सयान लोग संस्कृत मा रचित रामायण से अवधी मा लिखित रामचरितमानस से भासा के आधार पर छोट-बड़ा ना मनिहैं| वय गुण के कारण दूनौ कय सम्मान करिहैं|

अंगरेजन के सासनकाल मा जवन मानसिकता बनी ऊ अब तक कायम है| लोकगीतन का आजौ स्कूली पाठ्यक्रम मा कौनौ जगह नाहीं मिली है| पहली से लैकै बारहवीं तक बिद्यार्थी कौनौ दर्जा मा अपने इलाका के लोकगीत कय दरसन नाहीं कय सकत हैं| हिंदी मा एम.ए. करय वालन का लोकगीत नाहीं पढ़ावा जात है| हाँ, केऊ-केऊ हिम्मत कय-कय लोकगीत का रिसर्च खातिर चुनत है| यहसे कौनौ खास फरक नाहीं पड़ै वाला है|

जनजीवन बहुत तेजी से बदलत है| लोकगीतन के संग्रह कय तरफ विसेस ध्यान दियब जरूरी है| पूरी सावधानी से उनकय दस्तावेजीकरण होय| जिंदगी तौ अपने गति से चले लेकिन परम्परा से जौन धरोहर हमका मिली है वहका संजोय लेब आवस्यक लागत है| यहि बीच लोकगीतन कय स्वरूप बदला है, उनकय भासा बदली है| वहका बारीकी से समझैक चाही| जागरूक लोग ध्यान देंय, लोक मा काम करय वाली संस्था ध्यान देंय औ सबसे जादा सरकार कय यह पर ध्यान जाय| तब्बै कुछ बाति बनि पाये| सोसल मीडिया अब गाँव-गाँव मा फैलि गय है| यहका रोकब संभव नाहीं है| हाँ, यह स्थिति कय लाभ उठावा जाय सकत है| लोकगीतन कय छेत्रीय बिबिधता का समझय मा नई मीडिया से सहायता लीन्ह जाय सकत है|

अवधी लोकगीतन कय बिसयबस्तु लगभग वहै है जौन हिंदी छेत्र के दोसर जनभासा मा मिलत है| अलगाव दुइ मामला मा देखाय पड़े| पहिल भिन्नता अवधी लोकजीवन मा राम कय मौजूदगी के कारण है औ दोसर वहके मिली-जुली संस्कृति के कारण| मध्यकाल मा मुस्लिम जनता हिंदी प्रदेस के हर भासा-बोली मा रही मगर यहि जमीन से निकले सूफी कबि अवधी का अपने कबिता के लिये चुनिन| 1350 से लैकै 1900 तक लगातार सूफी प्रेम कबिता अवधी मा लिखी गय| यहिकै ई असर पड़ा की अवधी मा मुस्तर्का तहजीब मजबूत होत गय| संत लोग यहि धारा मा खूब जोगदान किहिन| आजादी के आन्दोलन मा अवधीभासी जनता बढ़ि-चढ़ि कय हिस्सा लिहिस| यहि दौरान अवधी मा स्वतंत्रता का लैकै खूब जज्बाती गीत लिखा गा| यहि संग्राम मा अगुआई करै वाले नवा नायक उभरे| लोकगीतन मा वय पूज्य नायक बनावा गे| आजादी मिलय के बाद अवधी लोकगीत मा फिर थोरै तब्दीली आई| अब जनता कय सुख-दुःख का केन्द्रीयता मिलय लागि| धर्मभावना थोरै पीछे पड़ी| सिच्छा औ राजनीति मा लोकगीतन कय रूचि बढ़ै लागि|

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बजरंग बिहारी ‘बजरू’ केर गजल (२) : उठाए बीज कै गठरी सवाल बोइत है!

कवि बजरू के्र गजलन की पहिली कड़ी के बाद ई दूसरि कड़ी आय। पहिली कड़ी  ‘हियाँ’ देखयँ। अब सीधे गजलन से रूबरू हुवा जाय। : संपादक
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[१] 

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कवि बजरू

का बेसाह्यो कस रहा मेला
राह सूनी निकरि गा रेला
बरफ पिघली पोर तक पानी
मजाखैंहस संगसंग झेला।
के उठाए साल भर खर्चा
जेबि टोवैं पास ना धेला।
गे नगरची मुकुटधारी
मंच खाली पूर  भा खेला
बहुत सोयौ राति भरबजरू
अब लपक्यो भोर की बेला।

[२]

जियै कै ढंग सीखब बोलिगे काका
भोरहरे तीर जमुना डोलिगे काका।
आँखि  अंगार  कूटैं  धान  काकी,
पुरनका घाव फिर से छोलिगे काका।
झरैया  हल्ल  होइगे  मंत्र  फूंकत
जहर अस गांव भीतर घोलिगे काका।
निहारैं   खेत   बीदुर  काढ़ि  घुरहू,
हंकारिन पसु पगहवा खोलिगे काका।
बिराजैं   ऊँच   सिंघासन   श्री   श्री
नफा नकसान आपन तोलिगे काका।
भतीजा हौ तौ पहुंचौ घाटबजरू
महातम कमलदल कै झोरिगे काका।

[३]

उठाए बीज कै गठरी सवाल बोइत है
दबाए फूल कै मोटरी बवाल पोइत है।
इन्हैं मार्यौ उन्हैं काट्यौ तबौं प्यास बुझी
रकत डरि कै कहां छिपिगा नसै नसि टोइत है।
जुआठा कांधे पर धारे जबां पर कीर्तिकथा
सभे जानै कि हम जागी असल मा सोइत है
कहूं खोदी कहूं तोपी सिवान चालि उठा
महाजन देखि कै सोची मजूरी खोइत है।
घटाटोप अन्हेंरिया उजाड़ रेह भरी
अहेरी भक्त दरोरैं यही से रोइत है।

[४]

देसदाना भवा दूभर राष्ट्रभूसी अस उड़ी
कागजी फूलन कै अबकी साल किस्मत भै खड़ी।
मिली चटनी बिना रोटी पेट खाली मुंह भरा
घुप अमावस लाइ रोपिन तब जलावैं फुलझड़ी।
नरदहा दावा करै खुसबू कै हम वारिस हियां 
खोइ हिम्मत सिर हिलावैं अकिल पर चादर पड़ी।
कोट काला बिन मसाला भये लाला हुमुकि गे।
बीर अभिमन्यू कराहै धूर्तता अब नग जड़ी।
मिलैं ‘बजरू’ तौ बतावैं रास्ता के रूंधि गा 
मृगसिरा मिरगी औ’ साखामृग कै अनदेखी कड़ी।  
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बजरंग बिहारी ‘बजरू’ केर गजल (१) : गजल मामूली है लेकिन लिहेबा सच्चाई.

bajrang b tपहिल मार्च सन १९७२ क अवध के गोन्डा जिला मा बजरंग बिहारी ‘बजरू’ क्यार जनम भा रहा। देहाती जिंदगी अउर भासा से यनकै सुरुआती जीवन अस सना कि ऊ पूरी उमिर भर कय अटूट हिस्सा होइगा। जइसे सबकै पढ़ाई-लिखाई कय भासा खड़ी बोली-हिन्दी होइ जात हय, अइसनै यनहूँ के साथे भा। मुला जउन बहुतन के साथे हुअत हय ऊ यनके साथे नाय भा! काव? यहय कि बादि मा खड़ी बोली-हिन्दी कय बिख्यात लेखक हुवय के बादौ अपनी मातरीभासा से जुड़ाव नाहीं टूट। मुदा ई जुड़ाव जाहिर कयिसे हुवय? यहिकी ताईं ‘बजरू’, यहि अवधी नाव से यइ अवधी गजलन का लिखै क सुरू किहिन। अउर आजु ई देखि के जिउ बार-बार हरसित ्हुअत हय कि यहि साइत अवधी कबिताई मा जौन आधुनिक चेतना कय कमी इन अवधी गजलन से पुरात हय, वहिके खातिर पूरा अवधी साहित्त यनपै नाज करत हय औ करत रहे। अब अवधी गजलन से रूबरू हुवा जाय। : संपादक
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[१]

हेरित है इतिहास जौन दिन झूठ बदलि कै फुर होइगा
झूर आँख अंसुवात जौन दिन झूठ बदलि कै फुर होइगा।
हंडा चढ़ा सिकार मिले बिनु राजाजी बेफिकिर रहे
बोटी जब पहुंची थरिया मा झूठ बदलि कै फुर होइगा।
बिन दहेज सादी कै चर्चा पंडित जी आदर्स बने
कोठी गाड़ी परुआ1 पाइन झूठ बदलि कै फुर होइगा।
“खाली हाथ चले जाना है” साहूजी उनसे बोले
बस्ती खाली करुआइन जब झूठ बदलि कै फुर होइगा।
‘बजरू’ का देखिन महंथ जी जोरदार परबचन भवा
संका सब कपूर बनि उड़िगै झूठ बदलि कै फुर होइगा।

[२]

चढ़ेन मुंडेर मुल2 नटवर3 न मिला काव करी
भयी अबेर मुल नटवर न मिला काव करी।
रुपैया तीस धरी जेब, रिचार्ज या रासन
पहिलकै ठीक मुल नटवर न मिला काव करी।
जरूरी जौन है हमरे लिए हमसे न कहौ
होत है देर मुल नटवर न मिला काव करी।
माल बेखोट है लेटेस्ट सेट ई एंड्राइड   
नयी नवेल मुल नटवर न मिला काव करी।
रहा वादा कि चटनी चाटि कै हम खबर करब
बिसरिगा स्वाद मुल नटवर न मिला काव करी।

[३]

गजल मामूली है लेकिन लिहेबा सच्चाई
बिथा4 किसान कै खोली कि लाई गहराई।
इस्क से उपजै इसारा चढ़ै मानी कै परत
बिना जाने कसस बोली दरद से मुस्काई।
तसव्वुर दुनिया रचै औ’ तसव्वुफ अर्थ भरै
न यहके तीर हम डोली न यहका लुकुवाई5
धरम अध्यात्म से न काम बने जानित है
ककहरा राजनीति कै, पढ़ी औ’ समझाई।
समय बदले समाज बोध का बदल डारे
बिलाये वक्ती गजल ई कहैम न सरमाई।
चुए ओरौनी जौन बरसे सब देखाए परे
‘बजरू’ कै सच न छुपे दबै कहाँ असनाई।

[४]

चले लखनऊ पहुंचे दिल्ली,
चतुर चौगड़ा6 बनिगा गिल्ली7
हाटडाग सरदी भय खायिन,
झांझर8 भये सुरू मा सिल्ली9
समझि बूझि कै करो दोस्ती,
नेक सलाह उड़ावै खिल्ली।
बब्बर सेर कार मा बैठा ,
संकट देखि दुबकि भा बिल्ली।
‘बजरू’ बचि कै रह्यो सहर मा,
दरकि जाय न पातर झिल्ली।

  1. परुआ= यूँ ही, मुफ्त में
  2. मुल= लेकिन
  3. नटवर= नेटवर्क
  4. बिथा= व्यथा, पीड़ा
  5. लुकुआई= छिपाना
  6. चौगड़ा= खरगोश
  7. गिल्ली= गिलहरी
  8. झांझर= जीर्ण-शीर्ण, कमज़ोर
  9. सिल्ली= शिला, चट्टान

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बजरंग तिवारी ‘बजरू’ केरि अवधी गजल

हंस पत्रिका के जुलाई वाले अंक मा बजरंग बिहारी ‘बजरू’ केर ई अवधी गजल पढ़तै-खन जिउ निहाल होइगा। ‘हंस’ हिन्दी कय जानी-मानी पत्रिका आय, वहिमन लोकभासा के ताईं अस पहल भै, ई बहुत खुसी कै बाति है।  यहि गजल क हियाँ, पाठक लोगन ख़ातिर, हाजिर करत हम ‘हंस’ औ बजरंग भैया केर बहुत आभारी हन्‌। आगेउ अस परयास जारी रहय। निहायत गाँव कै सबदन से आधुनिक चेतना क समाउब, समझौ गाँव-गुलौरी मा नयी आगि-आँच डारब! चुनौती बड़ी मुल निभायी गय है करीने से। 
साभार; हंस-जुलाई’१५

साभार; हंस-जुलाई’१५