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कविता : ‘भौकाली’ (कवि: प्रभांसु)

ई बहुत खुसी कै बाति है कि नयी युवा पीढ़ी से कुछ उत्साही युवा अवधी के महत्व क लैके सजग हुअत अहैं। इस्कूलन मा पढ़त लड़िकै अवधी से लगाव रखत अहैं, भले संख्या मा कम लेकिन ओतनै समर्पित भाव से! आज दिल्ली युनवस्टी के किरोड़ीमल कालेज से बी.ए. आनर्स(दुसरा-साल) कै स्टूडेन्ट प्रभांसु मिलै आवा रहे, अपनी अवधी जिग्यासा के साथ! साथेन अवधी म बतकहीं भै, आनंद आइ गा! तनिका देर के ताईं दिल्ली अवधियाय गा! प्रभांसु प्रतिभावान विद्यार्थी हुवै के साथ अवधी कै कवि भी हैं। भविस्य मा इनसे बहुत उम्मीद है। इनकै दुइ कविता सुनै के क्रम मा रिकार्ड कै लिहे रहेन, बारी बारी कैके उनका इंटरनेट पै लाइ दियब। पहिले प्रस्तुत है इनकै कविता: ‘भौकाली’! ई कविता आप पोस्ट के साथ दिये यू-टुबही प्रस्तुति मा सुनिउ सकत हैं। : संचालक   

कविता : भौकाली

अहा भाय पक्का भौकाली!

जनता कै मुँह सूख के नेनुआ,

तोहरे छाई लाली!

..अहा भाय पक्का भौकाली!

सचिवालय से सौचालय तक, तोहरै चला कुसासन हो,

हमका बुद्धू बनवै खातिर, लंबा लंबा भासन हो,

करत चिरउरी मुँह खियाय गा, छोड़्या नाहीं आसन हो,

सड़ा अनाज गोदामी मा औ हमका नाहीं रासन हो,

तू तौ मोहन भोग लगावा,

हम झेली कंगाली!

..अहा भाय पक्का भौकाली!

आस्वासन कै कौरा जिन द्या, जनता नाय कौरही हो,

सब जाना थै, सब बूझा थै, नाही अहै बौरही हो,

अपने रच्छा खातिर रजऊ, बनए अहा सिपहिया हो,

मुल तू हमका बल भै लूट्या, हमसे किह्या उगहिया हो,

हम तौ तोहका राँझा समझे,

निकल्या मगर मवाली!

..अहा भाय पक्का भौकाली!

हमका नीमर जिन जान्या, औकात बतावै जानी थै,

सुखे दुखे मा खड़ा रहै जे ओका नेता मानी थै,

मंदिर मस्जिद गिरिजाघर से ऊपर उठि के बोले जे,

औ बिकास के मड़ही क हमरे खातिर खोले जे,

राजनीति माटी मा मिलउब,

किह्या अगर चौचाली!

..अहा भाय पक्का भौकाली!

— प्रभांसु 

  कवि के सब्दन मा कवि कै परिचय: ‘‘हमार नाव प्रभासु अहै भइया! एह समय किरोड़ीमल कालेज, दिल्ली युनवस्टी मा हिन्दी साहित्य के बी.ए.-आनर्स कै दुसरा साल अहै। अपने कालेज कै संस्कृति सचिव अही, भासन, बाद-विवाद औ बतकहीं बड़ी नीक लागा थै। एन्हन मा लगभग २०० इनाम जीते अही। जिला प्रतापगढ़-यूपी. कै रहवैया अही। prabhansukmc@gmail.com के नाम से आप सबका फेसबुकौ पै मिलि जाब।”~प्रभांसु 

अब सुना जाय प्रभांसु केरी कविता उनहिन के आवाज मा:

अब सुना जाय प्रभांसु भाई क्यार दूसर कविता ‘कूकुर’:

 

सादर/अमरेंद्र अवधिया

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