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पाहीमाफी [१६] : दीवाली

आशाराम जागरथ रचित ग्रामगाथा ‘पाहीमाफी’ के  “पहिला भाग”,  दुसरका भाग , तिसरका भाग , चौथा भाग , पंचवाँ भाग , ६-वाँ भाग , ७-वाँ भाग , ८-वाँ भाग , ९-वाँ भाग१०-वाँ भाग  , ११-वाँ भाग , १२-वाँ भाग१३-वाँ भाग १४-वाँ भाग , १५-वाँ भाग के सिलसिले मा हाजिर हय आज ई १६-वाँ भाग :

paint-diwali-diyas-lilcreativekidsदीपावली आय आज। दीवाली क लयिके मेर-मेर कै कविता देखय का मिलत हय। ज्योति केरी बड़ाई मा। लोगय लछिमी माई से धन-धान्य से घर भरय कय बिनती करत हयँ। गरीब-गुरबौ अरदास करत हय माई से। मुला माई धनिकन क धन दिहे जाति हयँ। उइ असर्फीलाल बनत जाय हयँ। गरीब लंगोटीलाल बनिके रहि जात हयँ। रमई काका व्यंग्म मा कहे रहे : 
लछिमी धनिकन की देवी हयँ
जिनके उइ सदा सहारे हयँ
दीनन के दीनानाथ बंधु
जिनके उइ सदा पियारे हयँ!
गरीब-कचोट हय उनकी कविता मा — हमरी कुटिया मा न आईं / का चली गयीं ऊंची महलन? जागरथौ कहत अहयँ :
खेती-बारी ऊँची जात
उनके घर लछिमी कै वास!

जागरथ केरी कवितन से दीवाली कय जादा चौड़ी दुनिया देखी जाय सकत हय। पूरा गाँव अहय। जिता-बिरादर मा बंटा। सबके ताईं तिउहार यक्कै नाईं नाहीं ना। यक घर ऊ अहय कि सब गांजा बाय। दूसर घर ऊ अहय कि अकाल बिराजा बाय। दियौ-दियाली लियै कय जोग नाहीं बनत। सामान बेचय आयी मनिहारिन से माई कहत हयँ कि हमरे मोहारे काहे झोली उतारति अहव। हमरे लगे कुछू अहय नाहीं। मनिहारिन कहत हय : 
बोलिन चुरिहारिन पहिरइबै
पइसा रही उधारी मा..

दीवाली कय कहीं जादा चौड़ी, मार्मिक औ हिरदय-छू तस्वीर देखा जात, पाहीमाफी -१६ मा. : संपादक
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  • दीवाली

सीलन से लोनियाई भीत
माई छोपिन माटी नीक
बोलिन आवत बाय देवाली
कोना-आँतर डारी लीपि
दादा भैंसिन कां नहुआइन
तेल नीम कै खूब लगाइन
नवा-नवा पगहा बरि कै वै
बैलन कां घुँघरू पहिराइन
नीबी के पाती कय धुइंहर
फिन सुलगाइन घारी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

मुँह मा पान माथ पे बिंदिया
होंठे झुलनी झूलै बढ़िया
झौली मा चुरिहारिन बेचैं
चुरिया, लाल-बैगनी-करिया
माई आइन दौड़ी-दौड़ी
काहें हयू उतारत झौली
अबकी जाव दुबारा आयू
गाँठी मा ना पइसा-कौड़ी
बोलिन चुरिहारिन पहिरइबै
पइसा रही उधारी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

आधे कातिक दीया-दीवाली
दस दिन अगवैं से तइयारी
फूलि कै कुप्पा गेद-गेदहरे
बड़ा घरौंदा अबकी बारी
चचा कोंहार कोंहारिन चाची
धइकै मूड़े झौवा-खाँची
मेर-मेर माटी कै बरतन
बेचैं चौका-बेलना, घाँटी
लाल- ललछहूँ चमकै गुल्लक
सोंधी खुशबू हाँडी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

भउजी ‘पुरबहा’ मगन घूमैं
अबकी दीवाली ‘वै’ अइहैं
साड़ी-साया हमरी ताईं
लरिकन ताईं कपड़ा लइहैं
बोलिन ‘उतरहा’ तू जेस बाट्यू
बस बनी ठनी बइठी बाट्यू
अइहैं केऊ का छोरि लेई
यक्कौ ना काम करत बाट्यू
छोटकी बोलिस बप्पा अइहैं
पहिली दाईं देखब वनकां
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

बड़कना बहुत ही बात करै
लरिकन के बीच गुमान करै
छुरछुरिया औ हाथी-घोड़ा
बप्पा लइहैं झोरा भरिकै
आये वै दूनौ हाथ मलत
अब काव कही कइसै बोली
हम सोवत रहेन बर्थ उप्पर
सारा समान होइ गय चोरी
धइ ल्या ई रुपिया बचा बाय
जो धरे रहेन हम जेबी मा 
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

खेलैं लरिके, जाँत-जंतोली
बोलैं, तुतलाय बोल बोली
भुरभुरी धूरि मुट्ठी बान्हें
पीसैं पिसान भरि-भरि झोली
का जानी पइसा – कौड़ी हम
दीया-दिवाली रोज अगोरी
कोइला, खड़िया-माटी, गेरू से
खींच-खांच कै बनै रँगोली
लिहें तराजू , पलथी मारे
कंकर तौली राही मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

भोंपू, भरकी , कोसा-कोसिया
दिवली, परई , भुरका , मेलिया
यक जोड़ा माटी कय दवात
दुई आना मा बढ़िया-बढ़िया
ओखरी माँग कै लाइन माई
घपर-घपर घप किहिन कुटाई
बनि कै भै चिउरा तइयार
जड़हन भूजि बनाइन लाई
खइलर लइकै अइया बइठीं
माठा मथैं दुधहंड़ी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

धुँधलहा साँझ, अम्मावस दिन
घाँटी बाजै टिन-टिन-टिन-टिन
दिवली मा बाती-तेल डारि
अँगना बीचे बारी गिन-गिन
डेहरी, कंड़िया, चूल्हा, चाकी
ड्योढ़ी, कोठरी, खेती, बारी
लौ लुपुर-लुपुर लुप-लुप लउकै
कूँआ, खूँटा, चन्नी, घारी
यस जरै तेल कडुवाय आँख
लइ बस्ता पढ़ी ओसारी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

गहरान रात भै अन्हियारा
खेते मा लइकै लुक्काड़ा
आगी से सब खिलवाड़ करैं
नाचैं जइसन कि बनजारा
चहुँवोर दिवाली चकाचक्क
मन ही मन मनवा मसमसाय
जुग-जुगुर-जुगुर जुगुनी चमकै
कुचपुचिया तरई कुचपुचाय
कहुँ आग न पकरि लियै छपरा
जिउ जरै-बुझै अंदेशा मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

दक्खिन टोला, तुम्म–तड़ाका
जोर-जोर गरियावैं काका
घर मा खाय क ठेकाना नाहीं
लरिकै मागैं बम-पड़ाका
खेती-बारी, ऊँची जात
वनके घर लछमी कै वास
छूत मनावैं देवी-देवतै
गोड़ धरे पै मारैं लात
हमरे सब कय दिया-दिवाली
हरवाही – चरवाही  मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

ऊ देखा, ऊ हमरा गाँव
घी कै दीया ठावैं ठावँ
हमरे टोलिया मा अन्हियारा
सोवै रोज पसारे पाँव
वोसे कहिअ थै जात्या बखरी
रहत्या सुख से कोठरी-कोठरी
ऊ बोलअ थै नाहीं जाबै
हुआँ धरा बा गठरी-मोठरी
भागब ना पुश्तैनी घर से
पड़ा रहब सन्नाटे मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

हर खेते दीया जुगुर-जुगुर
ऊपर तरई कै खुसुर-पुसुर
कनफोडू शोर पटाखा कै
गूंजै रहि-रहि, जिउ धुकुर-पुकुर 
चक-चकाचौंध चहुँवोर शोर
कहूँ लुकाने चाँद – चकोर
आपन ‘शुभ-काम’ जगावैं सब
वहि दिन तौ चोरी करैं चोर
गै दिया-दिवाली कोने मा
कुलि बारह रोज डिठौने मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

आँखी अम्मावस कै कजरा
वोरमा मुँह लिहें रहे वोलरा
पूछेन गोहराय काव होय गै
नौकरिहा कहाँ हये पसरा
बोले कि वोई तौ लाय रहे
कुछ खेल-खेलौना यक झोरा
हमरे बुढ़िया कां सउक चढ़ा
ऊ रही दगावत बम-गोला
वै पकरि कै आग छुवाइन जेस
फट गै बम-गोला हाथे मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा..

__आशाराम जागरथ

[जारी….]

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पाहीमाफी [१५] : तिरिया-गाथा (२)

आशाराम जागरथ रचित ग्रामगाथा ‘पाहीमाफी’ के  “पहिला भाग”,  दुसरका भाग , तिसरका भाग , चौथा भाग , पंचवाँ भाग , ६-वाँ भाग , ७-वाँ भाग , ८-वाँ भाग , ९-वाँ भाग१०-वाँ भाग  , ११-वाँ भाग , १२-वाँ भाग१३-वाँ भाग १४-वाँ भाग के सिलसिले मा हाजिर हय आज ई १५-वाँ भाग :

Captureई हय पाहीमाफी है १५-वां अउ तिरिया गाथा कै दुसरका भाग। तिरिया गाथा मा गाँव कै आधा दुख बरसि परा अहय। इनका पढ़त के साफ जाहिर हुअत हय कि यक्कै साथे रहय के बावजूद मरदन की दुनिया से औरतन कय दुनिया केतनी अलगि बाय। औरतनौ की दुनिया मा सबर्न औ अबर्न औरतन कै दुनिया अलगि-अलगि बाय। यहिका पढ़त के ई जाना जाय सकत हय। यहिमा ई बतावा गा बाय कि सबर्न मेहररुवै अबर्न मेहररुवन क बेहतर हालत मा बतावत हयँ। अबर्न मेहररुवै सबर्न मेहररुवन का कौनी हालत मा देखति हयँ, कौने मामिले मा बेहतर या बदतर मानति हयँ, संभव हय ई बाति आगे देखय का मिलय। उनके ‘कहन’ मा ई आवय मुमकिन हय। 

तिरिया गाथा मा औरतन के कयिउ अवस्थन कय सच कहा गा बाय। ई नाहीं कि केवल जवानिन कै दसा बतायी जाय। गेदहरा-जवान-बूढ़ : तीनौ पायदान पै खड़ी तिरियन का जागरथ जी लखे अहयँ। इन कबितक के जरिये आपौ इनका लखि सकत हयँ। 

कबिता कय यक-यक बारह-पतिया टुकड़ा अपने मा कंपलीट अहय। ऊ पूरा चित्र सामने उकेर दियत हय। यक-यक चित्र पूरी कहानी कहत देखाये। बिटिया, जवान औ बूढ़ तीनौ जिंदगिन पै अलग-अलग टुकड़य अलग-अलग कहानिव कहत हयँ। यनहीं के बीचे कबिता कय अव्वल सधानौ आपन छटा देखावय लागत हय। जयिसे ई दुइ लाइनन मा, ‘बात’ सबद से कीन खेल बढ़िया हय। ‘बात’ सबद से जुड़े मुहाबरन कय का गजब इस्तेमाल कीन गा अहय : ‘बात निकारैं बात-बात मा / बाती मा बाती कै गूझा.’ : संपादक 
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  • तियिया-गाथा : (२)

घूमौ खुब डारे गलबहियां
तुहकां देखतै परचय देहियाँ
हम खटी अकेलै काम करी
लरिका कां लिहे-लिहे कनियाँ
हेंढ़ा यस भया तुहैं पोसेन
तुहूँसे गोबरे कै छोत नीक
हम फुरै कही थै मान जाव
नाहीं माँगे ना मिली भीख
चेतौ अबहीं सौंकेर बाय
मेहरी आई बा गवने मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

जे करै परिश्रम हाँड़ तोड़
वै खाय बिना मर जात रहे
जेकरे अनाज इफरात रहै
वै खाय-खाय डुडुवात रहे
जे ऊँच रहैं सिंगार करैं
घर के भीतर करियान रहैं
पर सूद चमार कै मेहरारू
खेते मा साथे काम करैं
केउ ओढ़े-बेढ़े बइठ रहै
केव धान बिठावै कनई मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

ठकुराइन कै नीक बहुरिया
लाल बिलाउज धोती करिया
माथे चम-चम टिकुली चमकै
गोरहर हाथ म हरियर चुरिया
सीसा लइकै माँग सोझावैं
क्रीम-पाउडर रोज लगावैं
फरमाइस सब पूर हुवै पर
घर से बाहर निकरि न पावैं
केतना खेत कहाँ पै बाटै
जान न पावैं जिनगी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

राखैं सासू अपने कसि मां
जइसै की गाय रहै बस मा
लागै कुलि बुद्धी चूल्हा मा वै
भोजन नीक पकावैं घर मा
दिन-रात रहत अन्दर-भीतर
कुछ साँवरि भी लागैं गोरहर
देखन मा लाल गुलाब लगैं
केतनौ जंजाल रहै सिर पर
लेकिन नइहर कै नावं लेहे पै
आंसू आवै आँखी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

लेहसुवा-केरमुआ-अमलोनी
सोचिअ थै जाय साग खोंटी
तीनौ कां यक्कै मा मेराय
लहसुन के तड़का से छौंकी
हमरे यक जने तौ यस मनई
तूरैं रोजै सरगे तरई
जाई माँगी ठकुराइन से
सरसौ कय तेल एक परई
गोजई कै हथपोइया रोटी
सेंकब कंडी की आँची मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

चला हटावा मेलिया-मेटवा
खाबै ना बोलत बा पेटवा
थरिया झन-झन बाजत बाटै
छः बिटिया प पइदा भै बेटवा
बहुत अगोरिन पंडित बाबा
कइकै किस्मत से समझौता
घर मा वंश चलावै ताईं
यक बेटवा कै रहा मनौता
धगरिन ढूध पियावैं, रोवै
नन्हा – मुन्ना सौरी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

बेटवा भये सब सोहर गावै
बिटिया होय तौ मुँह बिचकावै
कहैं भवानी आयी बाटीं
झौवा भै खरचा करवावै
‘बेटवा होतिव खूब खियाइत
मूड़े पै बइठाय खेलाइत
हँसी-हँसी मा हँसि कै बोलिन
मरि जातिउ तौ फुरसत पाइत’
बिटिया ताकै कुछू न बोलै
भाई लादे कनियाँ मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

बिटिया ! तू तनी वोनाय जाव
ओढ़ना सीयै बइठी बाटी
सूई मा धागा नाय दियौ
हमरे देखात नाहीं आंखी
ई टुटा खटोला झोल खाय
बनिकै गठरी अब ना सुतिबै
धइ दिहेन उजार-फुजार कै हम
वै बोलिहैं काने सुनि लेबै
यक नीक रजाई पाय रहेन
वोका दइ दिहेन पतोहे कां
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

पहिलउठा भै जुरतै मरि गै
ताना-बोली से जिउ भरि गै
यक ठू बेटवा के चक्कर मा
बिटियै-बिटिया पइदा होइ गै
दूसर मेहरी हमरी नाईं
जा लइ आवा अपनी ताईं
तू दांत चिदोरे खड़ा हया
चिल्लाई थै सुनत्या नाहीं
जाई थै बहि-बिलाय जाबै
धंसि जाबै कूआँ-खाई मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

होते नाहीं लरिका-बच्चा
कानाफूसी से जिउ कच्चा
सब जने कचाहिन केहे हये
दीदी-बहिनी, मरदी-मरदा
मनसेधू हमरे कहत हये
पहिरब-खाबै-पीबै अच्छा
दुनिया औलाद से पटी बाय
काहे तू करत हयू चिन्ता
हम दुवौ परानी ठीक-ठाक
दुसरे-दूसर क्यो बीचे मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

चाटै गइया आपन लेरुआ
हमहूँ क् चाही येक दुलरुआ
ना जाने वै कहाँ से लाये
पाये यक ठू बच्चा परुआ
विधवा दीन-दु:खी महतारी
या तौ कउनौ रही कुँवारी
कठिन करेजे फेंके होई
गड़ही मा झाली के आरी
बहुत रह्यू औलाद कै भूखी
पाय गयन हम सेती मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

कही तौ माई मारी जाई
नाहीं बापू कूकुर खाई
तुंहसे काव कही अब बहिनी !
कहिकै इज्जत खुदै गंवाई
बुढ़ऊ बाहर रंग जमावैं
नीक-नीक परबचन सुनावैं
सासू राती गोड़ न मीजैं
सौ-सौ गारी, झापड़ पावैं
यक दिन तौ कपड़ा निकारि वै
खड़ा कै दिहिन ठण्ढी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

नेम-धरम से रोजै पूजा
वनके लेखे नाहीं दूजा
बात निकारैं बात-बात मा
बाती मा बाती कै गूझा
घूंघुट से बहिरे झाँके पै
डोलै लागअ थै सिंहासन
अपुवां घूमैं कोलिया-कोलिया
मेहरारुन पै पहरा–सासन
छटकत घूमत रहेन नइहरे
जेल भवा ससुरारी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

सइंतौ-माजौ, चूल्हा बारौ
भन्छौ दिन भै जिउ दइ डारौ
घर कै मेहरारुन गाय-भइंस
मारौ–पीटौ खूँटा गाडौ
बिटिया बा नीक पढ़ाकू बा
दरजा मा सबसे अव्वल बा
काव कही औलाद कां अपने
बेटवा तौ गोबर-गणेस बा
खाय-पियै, डुडुवाय जाय ना
बिन मारे इस्कूले मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

सुन लेत्यू बात मोर माई
बापू से कइसै करी ढिठाई
ना छोड़वावा पढ़ै दिया हम
आगे आउर पढ़ब पढ़ाई
खबवा खाव चुपाई मारे
जाड़ हुवत बा जात्यू सोई
बिटियै जादा पढ़-लिखि लेइहैं
तौ बियाह मा दिक्कत होई
खुसुर-फुसुर माई औ’ धीया
बहसैं रात रसोई मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

तू घाम-घमौनी करत हयू
बइठी बाट्यू झोंटा खोले
बड़कऊ उहै आवत बाटे
देखिहैं रहिहैं ना बिन बोले
आवा हमरे सब चला चली
दक्खिन पिछवारे की वोरी
फइलावा वहीं झुरात बाय
लंहगा–साड़ी–साया–चोली
सूदेन कै मेहरी नीक बहुत
घूमैं कुलि खेते-खेते मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

सुन्दर अंखिया यत्’तत-यत्’तत
पातर कै गठी देह गोरहर
धन देखि फलाने नाधि दिहिन
बउदहा से गाँठ जुड़ा वोकर
रोवत बा कहत बाय काकी !
कि जाब दुबारा ना ससुरे
मरि जाबै खाय ज़हर-माहुर
वै बाप बराबर हैं हमरे
समझाई थै मानत नाहीं
बहुतै डर लागत बा हमकां
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

चूल्हा पै चढ़ा रहा अदहन
देवरानी से बतियात रहेन
दलिया होयगै पातर पानी
डारै कां नोन भुलाय गयन
परसा खबवा खाये नाहीं
यक जने काल्हि रिसियाय गये
हम घंटा भर से खड़ी-खड़ी
जब खूब मनायन मान गये
पानी छुई लियौ चलौ जल्दी
ना बइठी रहौ सिवाने मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा.

__आशाराम जागरथ

[जारी….]

पाहीमाफी [१४] : तिरिया-गाथा (१)

आशाराम जागरथ रचित ग्रामगाथा ‘पाहीमाफी’ के  “पहिला भाग”,  दुसरका भाग , तिसरका भाग , चौथा भाग , पंचवाँ भाग , ६-वाँ भाग , ७-वाँ भाग , ८-वाँ भाग , ९-वाँ भाग१०-वाँ भाग  , ११-वाँ भाग , १२-वाँ भाग, १३-वाँ भाग के सिलसिले मा हाजिर हय आज ई १४-वाँ भाग :

village_india_scene_paintings_nature_hut_street_agriculture_farmers_पाहीमाफी कय ई भाग गांव कय ऊ सच कहय कय कोसिस करत है जेहिका बहुत कम कहा गा अहै. यक दलित समाज कय नयी-नबेली बहू कइसे घरे औतय खन काम के चक्की मा पीसि दीन जात है, ई हियाँ देखा जाय सकत है. कइसे औरतय आपस मा यक दूसरे से बतियात हयं ई बड़ी सहजता से हाजिर कीन गा अहै. बात-चीत केरि भंगिमा देखउ हियाँ तनिका:

बहिनी ! खजुवात मूड़ बाटै
सगरौ, घर काम परा बाटै
दइ द्या साबुन यक दाईं भै
बरवा लासियान जट्ट बाटै

नवा नवा बियाह भा हुवै अउ मरद मेहराऊ दूनउ क जीवन-उत्सव से काटि के कामे मा खटावा जाय, ई जिंदगी के साथ पाप आय. गांवन मा ई पाप खूब देखाये! ठकुराना केतनी हनक के साथे, अउ केतनी निर्लज्जता से, यहि पाप-वृत्ति पै उतारू है :

कहि द्या बनठन भूले से भी
ठकुरहना वोरी ना आवै
जेकरे बल पोखना लाग बाय
वोका नाधब हरवाही मा

दुनिया भर के काम के जंजाल मा जिंदगी काटी जाय अउ जियय कै मौकै न मिलै तौ भरी जवानी भार लागै लागत है. केतना बेलाग यथार्थ कहा गा बाय :

हम बोझ सम्हारी कि अँचरा
जिउ धुकुर-पुकुर धुक बोलअ थै
दुई बोझ कुदरती छाती पै
सब बोझन से भारी मोकां

तौ गुजरा जाय पाहिमाफी के यहि चउदहें भाग से. : संपादक
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  • तिरिया-गाथा (1)

दुइ जगह से उबहन टूट रहै
पानी ना यक्कौ घूँट रहै
करिहाँव मा दाबे बात करैं
नीचे से गगरा फूट रहै
‘सीधा-पिसान कुच्छौ ना बा
कलिहैं से चूल्हा बुता बाय
अब काव कही बहिनी तुहुँसे
किस्मतियै ही जब फुटा बाय
कोदौ-सावाँ जउनै मिलितै
दइ देत्यु तनी उधारी मा’
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

बहिनी ! खजुवात मूड़ बाटै
सगरौ, घर काम परा बाटै
दइ द्या साबुन यक दाईं भै
बरवा लासियान जट्ट बाटै
आवा ढीलौ तनि हेर दियौ
औ लीख सुरुक चुट्काय दियौ
धीरे-धीरे मँगियाय बार
नीबी कय तेल लगाय दियौ
तिल कै पाती ना काम करै
गज्झा ना चिकनी माटी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

उठा पतोहा साँस लिया तू
कंड़िया छोडि कै जांत लिया तू
जात हई हम करै मजूरी
सतुआ-ककई फांक लिया तू
घर-भीतर-बाहर काम किहेन
मरदेन कै घुसा-लात सहेन
चुरिया कै धोवन बदा रहा
हम बड़े भाग तुहुंका परछेन
करछुल आछत का हाथ जरै ?
बुढ़िया होइ गयन जवानी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

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परदेसी आये राती मा
मुंह लाल-ललछहूँ लाजी मा
माँगी मा सेंनुर मुस्कियाय
मरकहवा काजर आँखी मा
सोने कै बाली चम-चम-चम
नाकी मा कील तकै तक-तक
झुलनी झमकउवा ओंठे पै
हीलै-डोलै लक-झक लक-झक
ठकुराइन बोलिन ‘का रे, तू !’
पहिचानेन नाहीं मो तोहकां
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

ठाकुर ठकुराइन का ताकैं
चानी न सोहै नाक-कान
कुछ गुनैं-धुनैं कोयर बालैं
उंगुरी कटि गै जब उड़ा ध्यान
बोले, मन बक्कै आँवं-बाँवं
अलही-बलही फगुवा गावै
कहि द्या बनठन भूले से भी
ठकुरहना वोरी ना आवै
जेकरे बल पोखना लाग बाय
वोका नाधब हरवाही मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

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रहि-रहि कै हिचकी आवत बा
छपरा पै कौवा बोलत बा
माई मोहान होइहैं साइद
लागत बा केऊ आवत बा
सौंकेरे से हम छोलिअ थै
तनिकौ मन नाहीं लागत बा
घसिया छक्कान बाय तब्बौ
हमसे नाहीं सँगिरात बाय
अम्मा ! हम घर कां जात हई
केऊ गोहरावत बा हमकां
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

भइया ! तू आया अनवइया
चौवा-चांगर दुइ ठू गइया
जाई सब कइसै छोड़-छाड़
आन्हर बाटीं सासू मइया
घर कै जंजाल बाय माथे
‘बिचउलिया’ दगा किहिन साथे
बस यक्कै चीज नीक बाटै
बहनोई तुहार पढ़त बाटे
वै कहत हये कि सबर करा
सब दिन ना कटी गरीबी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

भइया ! तू हमसे छोट हया
दुःख आपन तुहुँसे काव कही
बस फटही लुगरी इहै बाय
कउनौ खानी तन ढके हई
सावाँ-काकुन हम कूटिअ थै
जांता मा गोजई पीसिअ थै
सब खाय लियैं तब खाइअ थै
परथन कै टिकरी पाइअ थै
गवने कै मेंहदी छूट नाहिं
वै नाधि दिहिन मजदूरी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

हँसि कै बोलिन वनकै दुलहिन
रोवा जिन तू बनिकै विरहिन
ई कवन पंवारा नाधे हौ
हमसे तौ नीक हयू सब दिन
‘आन्हर सासु, ससुर भी अन्हरा
येक जने वोऊ चकचोन्हरा
पइदा भये न यक्कौ लरिके
घूमिअ थै दइ आँखी कजरा
जा गोड़ धोय द्या भइया कै
पानी भरि लावा थारी मा’
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

भइया ! अबहीं ना जाव आज
दुइ दिन तू आउर रुक जात्या
बा धरा बाध-पावा-पाटी
यक खटिया सालि बीन जात्या
कटिया-पिटिया मा रहेन लाग
लेकिन बिहान नाहीं टारब
उठि बड़े भिन्नहीं नारा मा
टापा लइकै मछरी मारब
तू हीक भै अच्छे खाय लिहा
धइ देबै थोरै झोरा मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

******

सुन्नर नीक पतोहिया तोरी
देखतै थूकै हमरी वोरी
सुनै न ना तौ करै बेगारी
दइ पइबा ना कबहुं उधारी
बोलिस आँख देखाया नाहीं
केहू क् दिया हम खाइत नाहीं
जानै ऊ जे करजा खाइस
घर बिकान घरवाली नाहीं
जउने गाँव कै छोरी होई
जनत्या नाहीं तू हमकां
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

******

घूंघुट निकारि गोहूँ ढोई
रोई आपन दीदा खोई
अकड़ी गटई घरुहान रहै
बेसरम नजर ताकै मोही
‘घौलरा’ कां नाहीं काम-धाम
राही मा बइठ अगोरअ थै
हम बोझ सम्हारी कि अँचरा
जिउ धुकुर-पुकुर धुक बोलअ थै
दुई बोझ कुदरती छाती पै
सब बोझन से भारी मोकां
यकतनहा कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

ऊ पटक बोझ फरवारे मा
बाँहें रसरी करियाहें मा
हिम्मत जुहाय रून्हें गटई
मुंह ढांपे बोलिस सन्हें मा
ना भलमनई ना बड़मनई
तुहरे जाती रस्ता दूभर
होइकै अकच्च मुंह खोलि दियब
इज्ज़त-पानी छीछालेदर
तुहर्’यौ घर माटी कै चूल्हा
घर घुसरि क् देखा भितरी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा.

__आशाराम जागरथ

[जारी….]

पहीमाफी [१३] : दहिजरा कलाही कलपावै

आशाराम जागरथ रचित ग्रामगाथा ‘पाहीमाफी’ के  “पहिला भाग” ,  दुसरका भाग  , तिसरका भाग , चौथा भाग , पंचवाँ भाग , ६-वाँ भाग , ७-वाँ भाग , ८-वाँ भाग , ९-वाँ भाग१०-वाँ भाग  , ११-वाँ भाग , १२-वाँ भाग के सिलसिले मा हाजिर हय आज ई १३-वाँ भाग :

पाहीमाफी कय ई तेरहवाँ भाग हाजिर हय। दुरभिच्छी मा गाँव कय हालत यहिमा बयां कीनि गय हय। अकाल-दुर्भिच्छ कबिता कय बिसय बनत हय तौ यक चुनौती ई हुवत हय कि कहाँ ले विवरण रखा जाय, औ कहाँ ले संवेदना उभारी जाय! कबि कय मंतब्य केतना आवय औ केतना लेगन कय राय आवय! पाहीमाफी कय कवि घटना चुनै के मामिले मा एलर्ट अहय। ऊ अस घटनन का चुनत हय जिनसे घटना कय गतिकी आयि जाय, साथे-साथे घटना खुदै मा कमेंट बनि जाय। कयिउ दाँय तौ कबि-मंतव्य यहि तरह आवत हय कि वहिकय संगति सहजै सोसित पात्र से होइ जाति हय। पात्र बोलय तौ समझौ कबि बोलय, कबि बोलय तौ समझौ पात्र बोलय। मसलन नीचे दीन पँक्ति कविता बिना इनवर्टेड कामा के दीन गै अहयँ, जौन कि ठीकौ अहय : 

यक्कै थैली से जनम लिहेन
बेगानी हम दुई आंखी मा.
ध्वनि/नाद, अनुप्रास, के्र सहायता से काव्यत्व लाउब पाहीमाफी मा कम हुअत हय मुला ्जहाँ हुअत हय बहुत जमि जात हय। अलंकार जब अनायास आवय तब ऊ सबसे ज्यादा सार्थक हुअत हय। जैसे इन पंक्तियन का देखिके यहि बात कय अनुमान कीन जाय : 
बोलौ ना पुक-पुक पुकुर-पुकुर
जिउ धड़कै धुक-धुक धुकुर-धुकुर
मलकिन-सहुवाइन कै भाखा
नाहीं-नाहीं नानुकुर-नुकुर….
आलोचक रामचंद्र सुकुल कय मानब हय कि नाद सौंदर्य से कबिता कय आयु बाढ़त हय। अवधी कबिता मा जब नाद सौंदर्य आवत हय, ऊ अऊर बियासि जाति हय। : संपादक
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  • दहिजरा कलाही कलपावै

येक  साल ना भै बरसात
परा कलाही दिन और रात
खात-खात जिउ जाय कचाय
जोन्हरी क् रोटी कोदई क् भात
मोर भुखिया मोर माई जानैं
भरा कठौता आटा सानैं
यक्कै जूनी मिलै खाय कां
भरि कै पेट खियाय क् मानैं
सड़ा-गला गल्ला बनिया कै
लावैं रोज उधारी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

यक रोज कहारेन के टोला
चूल्ही भीतर झगरा होइ गै
मरदा बोलिस ई पेटकटिनी
भरि पेट न खाना हमैं दियै
उठि कै यक झापड़ मारि दिहिस
गुस्साय कै झोंटा खीचि लिहिस
तब दांत पीसि कै मेहरारू
नीचे से फोता पकरि लिहिस
‘दहिजरऊ मोंछ उखारि लियब
तोहरे पुरखन की दाढ़ी मा’
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

जोरू हमार सोवै जानै
बस आपन पेट भरै जानै
भुखमरी भी अइसन चीज हुवै
बिन लेहें परिच्छा ना मानै
हम फुरै कहिअ थै देखि लियौ
मुड़वारी तोपे धरे रही
राती मा तकिया फारि-फारि
यक कूकुरि रोटी खात रही 
जे सुनै उहै हँसि-हँसि लोटै
केव बोलै ना वकरे हक़ मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

भुखमरी नचावत नाच रहा
रोटी कै बन्दर बाँट रहा
देवरानी अउर जेठानी के
बीचे झगरा होय जात रहा
सब जानिअ थै तू जेस बाट्यू
दुई आँखी काम करत बाट्यू
पातर रोटी सबके आगे
मरदे कां मोट दियत बाट्यू
बनि गयू निर्दयी काव कही
बुद्धी भरभस्ट कलाही मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

संझा – भिन्नहीं रोज आवै
दहिजरा कलाही कलपावै
बनी रोटी चरी-बाजरा कै
टूका-टूका मा बंट जावै
रिरियायं गेदहरे बहुत घरे
महतारिन रोय-रोय डांटैं
भेली-ककई रस घोरि जियैं
जइसै–तइसै सब दिन काटैं
सोना के भाव सुहाय सड़ा
गल्ला मिलि जाय मजूरी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

बोलौ ना पुक-पुक पुकुर-पुकुर
जिउ धड़कै धुक-धुक धुकुर-धुकुर
मलकिन-सहुवाइन कै भाखा
नाहीं-नाहीं नानुकुर-नुकुर
कउनौ ना तरी-तापरी बा
यक्कौ धुर खेती नाहीं बा
अब करै मजूरी कहाँ जाय
सबके घर परा कलाही बा
पी लियौ पसावन चउरे कै
पायन कोटा सरकारी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

खाय बिना घर रगड़ा होइगै
सास-पतोहे म् झगरा होइगै
मिटै न खइंहस रोज रोज कै
चूल्हा मा अलगौझा होइगै
तोर नइहर मोर जाना बाय
नौ सै गदहा बान्हा बाय
खरी बात मौसी कै काजर
कहकुत बहुत पुराना बाय
बूढ़ा सुसकैं भुनभुन-भुनभुन
काकुन कूटैं काँड़ी मा
यकतनहा  कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

कहरैं, खासैं खटिया पकरे
बुढ़ऊ मिनके वलरे-वलरे
भइया कां तनी बोलाय दियौ
तू चली जाव निहुरे-निहुरे
पाँव पसारौ जेतना चादर
बाँटा पूत पड़ोस बराबर
बना चौधरी रह्या जनम भै
घर कै मुरगी साग बराबर
पेटपोछवा यक बेटवा पायन
भांग परि गवा बुद्धी मा
यकतनहा  कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

बेईमान बनियवां सत्तियार
पाथर तउलै धइ बार-बार
गुरबा-गरीब बिसहै आवैं
तौ मूड़ि लियै मूड़े कै बार
मिठुवाय कै नीक-नीक बोलै
कंठी-माला कै जाप करै
दस ढोका नोने के बदले
मउनी भै तीसी तौल लियै
दिन दूनी रात चौगुनी वोकर
लोय लगै दुर्भिच्छी म
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

एड़ी म् नाहीं फटी बेवाई
कइसै जानैं पीर पराई
वनकै बिगड़य रोज हाज़मा
पेट मोर अगियात बा माई
दुई-दुई दाना खरमिटाई
दाम बटोरैं पाई-पाई
छाती चढ़ि कै काम करावैं
हम नाहीं करिबै हरवाही
उखरि परैं मरि जायं निगोड़े
आग लगै खरिहाने मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

जोरू टोवै गठरी-पोटली
मोर माई मुंह खाली अंतड़ी
पहिले चलिकै कुछ खाय लियौ
बहु नीक बनी सेधरी मछरी
गोहूँ क् बाली गदरान बाय
दुई-चार रोज कै कसर बाय
यक लेहना काटिकै लइ आइब
जुग बीता जांत चुपान बाय
जिउ-जान से दयू अगर राखिन
हम खूब कमाब कटाई मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

भइया पाये मोटकी-मोटकी
हमरे आगे रोटी छोटकी
खाई हम मसल कै दाल-भात
वै दूध पियैं कनखी आंखी
हम सिरिज लियब बा मजेदार
आउर ना मांगब बार-बार
बचिगै थरिया मा तरकारी
दइ दियौ थोर बसियान भात
यक्कै थैली से जनम लिहेन
बेगानी हम दुई आंखी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

अपने ढर्रे अलहन बीतै
केतनौ आगे रोवै गावै
सूरज डूबे दिन डूबि जाय
भिन्नहीं उगै लइकै आवै
बड़मनई नाहीं काम करैं
कामे कै ना ही दाम दियैं
जाँगर कै काम कमाय अन्न
आपन जाँगर बरबाद करैं
लाठी भांजैं बिन मतलब कै
धरती के बोझ बयारी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

भूखे पेट कै हँसी निराली
हड्डी टोवैं राम पियारी
झौंसा मुंह दुइ होंठ झुराने
चिपकू गाले दांत चियारी
आंखी मारे बड़े बड़कऊ
ताकिस जइसै वनके वोरी
घर भै चलिकै धान निरावौ
पतरी नीक कमरिया तोरी
टूटै खूब सरापै वोकां
गरियावै मन ही मन मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

अबकी साली करमुन्नन मा
रसियाव कचौड़ी औ’ बरिया
खुब नरमानरम सोहारी-लपसी
देबै मुचौमुच्च थरिया
‘मुंह खोल कै आखत हम मागेंन
रहिगै ना तनिचौ धरम-दया
हाँ-हाँ भरिकै नहकार दिह्‌यू
तोहरे बाती कै कवन थया’
अटका बनिया कै गरज परी
तौ बेंचै माल उधारी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

सासू तोहरे जब जियत रहीं
बहु मान-मनउवल रखत रहीं
चाउर – पिसान औ’ तरकारी
हार्’हे-गार्’हे दइ दियत रहीं
अरहर-केराव-गोहूँ क् घुघुरी
उप्पर से सिखरन यक लोटा
बेझरी कै रोटी मोट-मोट
देसी घिउ कबहुं-कबहुं पोता
पट्ठा खुब नीक जवान रहेन
लढ़िया ठेली दिन-राती मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

बटुली मा दाल चुरत बाटै
जाइत ब उधार तेल माँगे
ईंन्हन चूल्हा म पझान होये
तनिका घुसुकाय दिहौ आगे
गोहूँ क् रोटी छौंकी दलिया
अरहर कै खाये जुग बीता
अक्तान बहुत अमिल्यान हयौ
धीरज धइकै निधरक बइठा
सैगर बाटै घरभै ताईं
कुलि खाबै नाहिं अकेलै मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा.

__आशाराम जागरथ

[जारी….]

पाहीमाफी [१२] : जाति दंस, बड़ा कलंक

आशाराम जागरथ रचित ग्रामगाथा ‘पाहीमाफी’ के  “पहिला भाग” ,  दुसरका भाग  , तिसरका भाग , चौथा भाग , पंचवाँ भाग , ६-वाँ भाग , ७-वाँ भाग , ८-वाँ भाग , ९-वाँ भाग१०-वाँ भाग  , ११-वाँ भाग के सिलसिले मा हाजिर हय आज ई १२-वाँ भाग :

यकतनहा नीम अउर जागरथ

हिन्दी मा पिछले कयिउ सालन से दलित आत्मकथा कय दौरदौरा चलत अहय। ई चलन एतना जोरान अउर फरान कि दलित-लेखन के बहस मा आत्मकथा केंद्र मा आइ गय। खचिन्ना-अस खींच दीन गा कि ऊ दलित-साहित्यकार कउने अरथ मा जेहके लगे आत्मकथै न हुवय। यहिते यह चीज ई भै कि आत्मकथा के नाव पै यक किसिम कय ‘फॊर्म’ कय देखादेखिउ हुवय लागि। यहिमा कौनौ दुइ राय नाहीं न कि इन्हते विमर्स वाले लेखन मा बहुत आसानी भै। मुदा, रचनात्मक इलाका आहिस्ता-आहिस्ता किनरियावा जाय लाग। आशाराम जागरथ कै ई ‘पाहीमाफी’ यहि किनरियाये इलाके कय अनदेखी क लयिके सजगि अहय। जागरथ आत्मकथा के ‘फॊर्म’ कय देखादेखी करय के जगहा पै आपन नवा सिल्प ढूँढ़िन। यहिकय मतलब ई नाहीं कि आत्मकथात्मकता कय भाव छोड़ि दिहिन, बल्कि पकरे अहयँ, उल्टे औरव जरूरी काम किहिन, जौन नहीं कीन जात रहा। पाहीमाफी, भासै नाहीं, अपने सिल्प औ भीतर-बात — दुइनौ के ताईं अहमि अहय। यहि अंक क यहू निगाह से देखि सका जात हय। : संपादक
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  • जाति दंस, बड़ा कलंक

सूअरबाड़ा, उजड़ी कोठरी
चुप्पे घुसरी ग़ुरबत बुजरी
फुटही खपरी मुंह बाये परी
झिलरी खटिया कथरी-गुदरी
चूल्हा आगे टुटही खांची
खांची मा आमे कै पाती
डुडुवायं बिरावैं माँग खायँ
मंगता-जोगी औ’ सन्यासी
कूकुर-बिलार घर ना झाकैं
मुसरी घुसरैं ना डेहरी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

दिन-रात खेत मा खटत रहे
वै बड़न कै सेवा करत रहे
वइसै तौ देश अजाद रहा
पर गाँव कै सूद गुलाम रहे
पैलगी दूर से करत रहैं
परछाँह बचायिके चलत रहैं
बाभन-ठाकुर केव आय जाय
खटिया पर से उठि जात रहैं
जे नीक कै कपड़ा पहिर लियै
ऊ खटकै सबकी आँखी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

मन ही मन मा सोच विचार
बहुत सहैं वै अत्याचार
सेंत-मेंत मा काम करैं बस
हरवाही पै जियैं चमार
सुख कै तूरि ना पावैं कौर
गाँव से बाहर वनकै ठौर
खाय बिना चाहे मर जांय
केहू न झाँकै वनकी ओर
करै मजूरी गाँव मा केऊ
दिल्ली केऊ बम्बई मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

उखुड़ी हमार जे तुरअ थै
जानी थै नावं बाय मुँह मा
हम पँहटत हई कऊ दिन से
रंगे हाथे पकरब वनकां
पकरे, ‘हड्डहा’ चमार मिला
खेती-बारी नाहीं वकरे
ऊ बोला काका माफ करौ
झाँवर कै रोग बाय हमरे
कुछ बूढ़ – पुरनियां कहत हये
सोवा गन्ना के खेते मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

जेकरे खेती वोकरे ऐंड़
खाली बइठ रखावै मेंड़
उखुड़ी छोलै लढ़िया लादै
मजदूरी मा खाली गेंड़
दुई रुपिया औ खरबचाई
दिन भै खोदैं वै बिरवाही
लत्ता-लत्ता लरिके तरसैं
बारहो मास करैं हरवाही
यक दिन जो नागा होय जाय
गारी पावैं सेती मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

कतहूँ-कतहूँ फुंसी-फोड़ा
मूड़े मा ढीलौ-लीख भरा
करिया धागा गटई पहिरे
तन पे झिलरा चीकट कपड़ा
देहीं मा पाले दाद-खाज
किस्मत का कोसै मुस्कियाय
यक बिगहा मुँह फैलाय लियै
जब खबर-खबर खजुली खजुवाय
माई तू काहे जनम दिहू
ई जात-पात की माटी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

सूकन-संती-गोधी-लोकई
औ कुष्ठ रोग पीड़ित तोखई
वै मरा जानवर निकियावैं
गाँवै कै नीबर औ गोगई
ना सीधे मुँह केव बात करै
केव देखतै ही अपमान करै
मेहरारू-बिटियन कै इज्जत
हरदम ही दाँव पे लाग रहै
कामे-काजे काटैं सूअर
तब उड़ै भोज चमरौटी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

टुटहा-जस्ता दुइ-यक बरतन
ज्यों साँझ ढलै बाजै खन-खन
जब खाय का घर मा ना आटै
तब खाँय मरा डांगर जबरन
खरिहान कै गोहूँ खाय-खाय कै
बैल जो गोबर करत रहे
वोका बटोरि सुखवाय लियैं
फिर पीट-पाट कै पीस लियैं
दुःख-वीर दलिद्दर दलित रहे
सब खात रहे मजबूरी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

परै लाग पेटे मा दाना
समझौ सूदे भये उताना
तनिकौ उज्जर कपड़ा देखैं
बड़े-बड़कवै मारैं ताना
हाल-चाल कुलि ठीकै बाय
बीतै समय जवन कटि जाय
‘घातै घात ‘चमरऊ’ पूछैं
मालिक पड़वा नीके बाय’
सुनेन बेमार रहा हम आयन
दउरा हाली-हाली मा 
यकतनहा  कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

नीक-सूक बेसन कै चिल्ला
खाय न झबरा करिया पिल्ला
घुसा रहै बिस्तर के भीतर
हमरे बहुत लाग बा हिल्ला
नोन-पियाज से रोटी खाई
नाहीं तौ उपास रहि जाई
आगे नाथ न पीछे पगहा
बस पिल्ला के दादा-माई
दूनौ जूनी खाय क् मिलअ थै
बन्दीघर सरकारी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

हम तौ ठहरेन खेतिहर मजूर
दुसरे सदियन कै छुआछूत
ग़ुरबत मा रोजै गम खाई
तोहरे घर धन-दौलत अकूत
देहीं खुमार मन मा गुबार
अललाय खमोशी चढ़ि कपार
आँखी से टप-टप खून चुवै
ऐ ! कब्जेदारौँ, खबरदार
अपने राही तू मगन रहौ
पीछे मुड़ि देख्यौ ना हमकां
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

हीलै ना डोलै रहै गड़ा
जइसन खेते मा ऊढ़ खड़ा
सुध-बुध खोये कुछ उड़ा-उड़ा
ऊ सुवर चरावत रहा खड़ा
अन्नासैं कां गरियाय दिहिन
देखतै चन्दन टीकाधारी
तू हया ढिठान बहुत ‘सरऊ’
मन कहत ब लाठी दइ मारी
कउने वोरी से जाई हम
परछाहीं पूरे राही मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

रसरी जरि गै अइठन ना गै
ना अबह्यूं अकिल ठेकाने भै
भुन-भुनभुन-भुनभुन मन ही मन
बोलै – बतुवाय – सुनै अपूवैं
बउदहा तोर बड़का लरिका
लूला – लंगडा बाटै छोटका
पूरे जवार सन्नाम बाय
बिटिया कां छोड़ि दिहिस मरदा
ई जात-पात औ’ ऊंच-नीच
चाटा लइकै तू घर हीं मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

तू बरा रहौ बरियान रहौ
जाती पै खूब गुमान करौ
मनइन के बीचे हम रहिबै
तू ऊँच रहौ सैतान रहौ
खुब पढ़ौ पुरैहिती घोंट-घोंट
बेटवा हमार बी.ए. मा बा
तू उड़ा रहअ थौ का जानौ
बड़कउना दुबई मा गै बा
उजियारे कै आदी मनई
देखते नाहीं अन्हियारे मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

परै मुरदनी चमरौटी मा
कउनौ फरक न बभनौटी मा
केव न जाय फुकावै साथे
मानौ वै ना हये गाँव मा
आपन काम करैं सब सारा
ताकैं बस, कस लियैं किनारा  
बहुत हुवै तौ बोल दियैं कि 
सीधा-सादा रहा बेचारा
बैर-भाव न किहिस केहू से
जुटा रहै बस कामे मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

बड़कन मा केऊ मरि जाय
सूद-अछूत  फुकावै जायँ  
लामे खड़ा रहैं चाहे वै
लेकिन मूड़ गिनावै जायँ
यक्कै गाँव मा येतना जात
देस कै काव करी हम बात 
सब कै आपन रीति-रिवाज़
हर जाती मा यक ठू जात
जात-पात मा अइसन जीयैं
जइसै मूस रहैं बिल मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

गाँव के बाहर बसैं अछूत
कुछ गोरहर कुछ करिया भूत
जइसै तइसै करैं गुजारा
लादे मूड़े बोझ अकूत
कुआँ से पानी भरैं न पावैं
दुसरे गांव से ढोय क लावैं
काम करैं बन मनई-तनई
तब सबकै मनई कहलावैं
जब मागैँ मनई कै दर्जा
गिनती नाहीं मनई मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

बोले गोगई मन बा खट्टा
पानी कै बा बहुत समिस्या
ईंटा पाथै हम जानिअ थै
कुआँ खोदाइब कच्चा-पक्का
सबकै सब मनसाय गये जब
कुछ भलमनई साथ दिहिन तब
देखतै देखत बनिगै कूआँ
जरवइयन कै चेहरा धूआँ
सबसे खुस मेहरारू – लरिकै
धूम मची चमरौटी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा.

__आशाराम जागरथ

[जारी….]

पाहीमाफी [११] : भेदभाव गहिर-घाव

आशाराम जागरथ रचित ग्रामगाथा ‘पाहीमाफी’ के  “पहिला भाग” ,  दुसरका भाग  , तिसरका भाग , चौथा भाग , पंचवाँ भाग , ६-वाँ भाग७-वाँ भाग८-वाँ भाग , ९-वाँ भाग, १०-वाँ भाग  के सिलसिले मा हाजिर हय आज ई ११-वाँ भाग :


जौन चीज कवि जागरथ क दूसर अवधी के गाँव के लिखैयन से अलग करत हय, ऊ हय इन कय ‘दिस्टिकोन’। यानी देखय कय नजरिया। प्वाइंट आफ बिउ। यही से, उहै गांवै वाला नजारा, दिस्टिकोन बदलि जाये से अलग नजारा लागय लागत हय। जैसे कोल्हू के लगे कय नजारा देखौ। दलित दिस्टिकोन से अलग सोचय वाला कौनौ लेखक रहत तौ ऊ हुवाँ मह-मह महकत गुलौरी से निकरा गरम गुड़ चुभलावन-रसरंजन करत वाह-वाह करत निकरि आवत। मुला जागरथ अपने अलग नजरिया के कारन हुआँ ‘घूरे चमार’ कय दुख टिकाय देहे अहयँ, जेहका महसूसे के बाद गरम गुड़ कय महकि औ सुवाद दुइनौ असलील लागय लागत हय :  

सोचैं, ठाढ़े घूरे चमार
हमसे अच्छे कूकुर-बिलार
हरवाही करत लड़कपन से
जिनगी रेंगा होय गै हमार!

यक औरौ चीज जागरथ केरी आज की यहि प्रस्तुति मा जहिरानि अहय। ऊका कहत हयँ, ‘पैराडाक्स’ देखाय के सभ्यता कै चीर-फाड़ करब। यहिकय पाखंड उजागर कयि दियब। पैराडाक्स, यानी बिरोधाभास देखाइ के। जैसे जौने कोल्हू पय घूरे चमार का मिनहां कीन जात अहय कि हर्सि न छुयेव, वही जगह बैलवन क कौनौ मनाही नाहीं ना। मनई से जादा पेवर अहयँ बर्ध। इहय समझि आय जौन आज के दिनन मा गौ-रच्छा के नाव पै मनइन क मौति के घाट पहुँचावति अहय। दूसर पैराडाक्स देखौ कि दोस्त के घर गवा ‘अछूत’ दोस्त केसेस बेरावा जात अहय। वहिका बर्तन तक नाहीं नसीब करावा गा खाय के ताईं। भुइयाँ मा खंता खनिके, केरा कय पाता दुनफर्तियाइ के खाइस ऊ। मुला भिनसारे ऊ का देखिस? देखिस कि जौने थरिया का वहसे बेरावा गा, वहिकै बारी कानी कुकुरिया चाटति बाय। मनई कुकुरौ-बिलार से गवा-गुजरा बनाय दीनि गा, इहै जात-परपंच के कारन। ई देखेक बादि, साथी, दुवा-बंदगी कय औपचारिकता भुलाय दियय तौ ठीकय हय। कम से कम ऊ दुवा-बंदगी के पाखंड से अपनेक्‌ बचायिस : 

फिर नजर परी दालानी मा
ऊ आँख फारि कै देखअ थै
कानी कुतिया मल्लही येक
थरिया कै बारी चाटअ थै
ना दुआ-बंदगी केहू से
चुपचाप चला गै चुप्पे मा….

यहि अंक से अब सीधे रूबरू हुवा जाय। : संपादक
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  • भेदभाव गहिर-घाव 

बोले ठाकुर पीकै दारू
अब चलब-फिरब होय गै भारू
छापी धोती, चप्पल पहिरैं
शूदे-चमार कै मेहरारू
सावां-कोदौ अब अंटकअ थै
मागैं मजूर भरि कै थारी
गोहूँ कै रोटी, दाल-भात
आलू-गोभी कै तरकारी
यक उहौ ज़माना रहा खूब
दिन भर कुलि खटैं बेगारी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

जो कहत हयी भोगे बाटी
हम ज़हर कै घूँट पिये बाटी
भुखमरी – गरीबी – छुआछूत
दूनौ आँखी देखे बाटी
यक जनी जाति से ऊँच रहिन
कूँआ से पानी भरत रहिन
हम झम्म से बल्टी डारि दिहेन
वै आपन पानी फैंकि दिहिन
बोलिन, केतनौ पढ़ि-लिखि लेबा
पर अकिल ना आई जिनगी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

अब आगे मजे कै हाल सुनौ
वनके छपरा मा आगि लाग
हम ह्‌वईं बगलियें खड़ा रहेन
पानी डारैं सब भाग-भाग
देखअ थौ काव तू खड़ा-खड़ा
अगवैं तौ गगरा धरा बाय
झट बोलेन काव करी काकी
हमरे जाती मा छूत बाय
बोलिन वै छूतछात नाहीं
संकट, आफ़त औ’ बीपत मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

मंदिर हरि-कीर्तन होत रहा
औ ढोल मजीरा बजत रहा
हुवयँ बीच थपोड़ी पीट-पीट
गावत मन डूबा मस्त रहा
यक पढ़ा-लिखा नौकरिहा बाभन
दूर से हम्मै देखि लिहिस
गुस्साय कै बोला भाग जाव
औ कान पकरि कै खींच लिहिस
‘अन्हराय गया है सब कै सब
धोबिया बइठा बा बीचे मा’
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

कुछ अच्छे बाभन साथ रहे
वनके घर आवत-जात रहेन
खटिया के गोड़वारी बइठा
हम गीत-कहानी सुनत रहेन
तोनी पै सरकावत धागा
यक ‘मधुरी बानी’ आइ गये
बइठा देखिन खटिया ऊपर
उलटे ही पाँव वै लउट गये
साथी बोला घर जिन आवा
सबकै सब डांटत हैं हमकां
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

बजरंग बली कां बचपन मा
परसाद चढ़ायन भेली कै
लइकै घूमी आगे सबके
केऊ ना लियै हथेली पै
पंडित जी बोले रहै दिऔ
तोहरे हाथे मा छूत बाय
दइ देत्या ‘कहरा’ बाँट दियत
ऊ तुहरे जाति से ऊँच बाय
भेली तौ वही, मिठास वही
परसाद बँटा बहु-जाती मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

इस्कूले साथे पढ़त रहे
जाती मा तनिका ऊँच रहे
वनके घर चला गयन यक दिन
देखतै वै खूब निहाल भये
तख्ता पै गद्दा बिछा रहा
मुड़वारी तकिया धरा रहा
दुइ टुटही कुरुसी परी रही
बइठका नीक खुब बना रहा
वल्ले बुढ़ऊ खांसैं खों-खों
रहे मनबढ़ येक जमाने मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

पितरी के लोटा मा पानी
साथी कै बहिनी लइ आई
हम गट-गट पियत रहेन तइसै
डांटै लागीं बड़की माई
लोटा मा अइसन छूत लगा
घर-भीतर हाहाकार मचा
मितऊ कै महतारी बोलिन
हमरे कामे कै ना लोटा
लइ जा बेटवा! तू घर लइ जा
धइ ल्या तू अपने झोरा मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

कसि कै दाँते काटी रोटी
दुई छूत – अछूत रहे साथी
हे नीम! छाँह मा तोहरे हम
खीसा सच बइठ सुने बाटी
‘छुतऊ’ कै बैल तुराय गवा
साथे – साथे हेरै निकरे
हेरत – हेरत संझा होय गय
घर लौटे बैल दुवौ पकरे
साथी बोला कि रुकि जात्या
कहवाँ जाब्या अब राती मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

राती जब खाना खाय क् भवा
यक बड़ा अड़ंगा बाझि गवा
टुटहा ज़स्ता वाला बरतन
पिछवारे कहूँ लुकाय गवा
घर-मलकिन बोलीं काव करी
बनये हम हई दाल – रोटी
उप्पर से दलियौ पातर बा
केरा कै पाता ना रोकी
हम कहत रहेन कि जाय दिया
तोहरे सब रोकि लिह्या वोकां
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

चुप रहौ कतौ ना करौ फ़िकर
अब्बै जुगाड़ कुछ करिबै हम
बोले बुढ़ऊ बाबा अहीर
बुद्धी मा अबहूँ बा दमख़म
फंड़ियाय कै धोती खटिया से
उतरे लइकै लमका खुरपा
तनिका वहरी से पकरि लियौ
घुसकाइब हम छोटका तख्ता
खोदिन यक बित्ता गड्ढा वै
मड़हा के कोने भूईं मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

केरा कै पाता दोहरियाय
गड्ढा मा हलके से दबाय
तइयार अजूबा भै बरतन
बोले अब मजे से लियौ खाय
ऊ रहा भुखान सवेरे कै
कुछ भुनभुनाय आवाज़ किहिस
इज्ज़त – बेलज्ज़त भूलि गवा
मूड़ी नवाय कै खाय लिहिस
साथी बोला बाहर निकरा
ल्या पानी पिया अँजूरी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

भिनसारे उठि कै चलै लाग
भैंसिया बहुत अफनात रही
पितरी के बड़े ‘पराते’ मा
बसियान खाब ऊ खात रही
फिर नजर परी दालानी मा
ऊ आँख फारि कै देखअ थै
कानी कुतिया मल्लही येक
थरिया कै बारी चाटअ थै
ना दुआ-बंदगी केहू से
चुपचाप चला गै चुप्पे मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

कातिक-अगहन हँसै सिवान
जोतै हर केव काटै धान
चिखुरी चिखुरैं, छोलैं घास
केउ खेते मा फेकै खाद
चटक चाँदनी, आधी रात
गूला भीतर दहकै आग
दूर-दूर तक गम-गम गमकै
खौलै रस जब, फूलै पाग
आलू-सेम कै सुन्दर माला
पाकै टंगा कड़ाहे मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

कोल्हू कै बैल कोल्हारे मा
उखुड़ी पेरैं टुक-टुक ताकैं
सुरती दाबे घूरे चमार
पाछे-पाछे कोल्हू हाकैं
वनकै लरिका ओढ़े चादर
पलथी मारे उखुड़ी दाबै
बइठे- बइठे औंघांय जाय
जे देखि लियै कसि कै डाँटै
लरिकन कै टोली मड़िरियाय
पहिला परसाद मिली सबकां
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

झुलनी झमकावत आय परीं
गोरहरकौ दुलहिन बखरी कै
बोलिन घूंघुट आधा काढ़े
ताजा रस चाही उखुड़ी कै
लरिका कां तनी उठाय दियौ
हम लियब चुहाय खुदै काका!
रस रोपत हई दूर होय जा
दूरै से बैलन कां हांका
भूले से छुया न हर्स – बैल
जब तक रस भरै न बल्टी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

सोचैं, ठाढ़े घूरे चमार
हमसे अच्छे कूकुर-बिलार
हरवाही करत लड़कपन से
जिनगी रेंगा होय गै हमार
उखुड़ी पेरे से रस निकरै
खोहिया भी कामे आवअ थै
हम जाँगर पेरी रोज़-रोज़
तबहूँ सब छूत मनवाअ थै
ई बैला हमसे नीक बाय
ना सोच-विचार रखै मन मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा.

__आशाराम जागरथ

[जारी….]

पाहीमाफी [१०] : सधुवाइन कै परबचन

आशाराम जागरथ रचित ग्रामगाथा ‘पाहीमाफी’ के  “पहिला भाग” ,  दुसरका भाग  , तिसरका भाग , चौथा भाग , पंचवाँ भाग , ६-वाँ भाग७-वाँ भाग८-वाँ भाग , ९-वाँ भाग के सिलसिले मा हाजिर हय आज ई १०-वाँ भाग :

jagrath

धरम संस्था कय चीर-फाड़ पाहीमाफी मा हुअत जाति अहय। रचनाकार का बहुत नगीचे से धरम कय भरम समझय कय मौका मिला। वहिका परतख परमान मिला, जैसे कि भाग नौ मा, और वहिका अइसेव लोग मिले जे धरम-भरम का बेपर्द कय दिययँ। जैसे यहि अंक कय सधुवाइन। यइ अहीं तौ सधुवाइन लेकिन बड़ा नजदीकी तजुरबा बतावति अहयँ। समाज मा औरतन के ताईं सब धरमन कय बिउहार यक्कै नाईं अहय। औरत कय सोसन अउर मर्दवाद का मजबूत करब। वैसे तौ ई कमै भा अहय, मुला जहाँ भा अहय हुवाँ अच्छे से देखा जाय सकत हय। काव? इहय कि जब औरतय धरम के घन-चक्कर कय बखिया उधेड़त हयँ तौ ऊ बहुत फुर-वादी रहत हय। हियाँ कय सधुवाइन नास्तिक नाहीं अहयँ, मुला मनई मा औ’ भरमित भगवान-गिरी कय बिरोधी अहयँ : 

नकली मेर-मेर भगवान
वन्हैं मानैं सब नादान
बहुत दूर तक बहुत देर तक
उप्पर देखौ जाबौ जान….

वनकै भगवान क लयिके आपन दरसन अहय। दुनिया के बिराट मा वइ भगवान देखत हयँ। दुकानदारी मा तौ हरगिज नाहीं। आपन बुद्धी सबसे सजग साथी होइ सकत हय। बुद्धी न लगायी जाये तौ कहूँ न कहूँ फँसय क परे। अप्प दीपो भव — कय स्वर हियाँ देखा जाय सकत हय : 

सोचौ-समझौ खुदै विचारौ
दीया बारौ बुद्धी मा….

अंतिम बात ई कि अब पाहीमाफी पखवारी क्रम के बजाय, महिनवारी क्रम से पेस कीन जाये। फिलहाल आज ई दसवाँ भाग पढ़ा जाय औ अपने राय से अवगत करावा जाय। : संपादक 
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  • सधुवाइन कै परबचन

टोलिया मा आइन साधुवाइन
आपन बीती कुलि बतलाइन
बइठाय मरद-मेहरारू कां
कल्ले-कल्ले खुब समझाइन
टेढ़ी कुबरी हाथे पकरे
मरदाना पहिरावा पहिरे
लटकाये झोरा कान्हें पै
मचिया ऊपर बइठिन बहिरे 
माथे चन्दन, मूड़े साफा
चटपटिया पहिरे गोड़े मा 
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

यकदम्मै उमर रही बारी
गवने मा आयन ससुरारी
घूंघुट निकारि करियाय उठेन
जइसै बछिया बान्हीं घारी
यक सांड़ महा कै खुदिहारै
सीन्हीं से वार करै हमपै
हम तूरि-तारि खूंटा-पगहा
राती मा भागि लिहेन जुरतै
भागत-बिड़रत कउनौ खानी
घर पहुँचेन होत भोरहरी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

भौचक देखयँ सब नात-बांत
दादा कै पारा आसमान
तू नाक कटाय दिहू बिटिया!
महतारिउ कै निकरै परान
खपरी कै पेनी, गलफुलनी
हेढ़ना यस पेट लिहे बाट्यू
नोखे मा यक ठू तुहीं हयू
जो  ससुरे-घर नाहीं जाब्यू!
जा! उल्टे गोड़े लउट जाव
नइहर की वोरी झांक्यू ना
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

पकरे जंजीर दरवज्जा कै
चौखट ठाढ़े रोवैं माई
दादा से बोलिन रहै दियौ
जो बदा होई भोगा जाई
सोचत-सोचत पगलाय गयन
हम गयन बहाने से बहिरे
चल दिहेन अजोध्या कां सीधै
बांसे कै कइन हाथ पकरे
मन कहै बूड़ जाई समाय
सरजू माई के गोदी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

लागै दुनिया गै उलट-पलट
बत्ती दिमाग कै जलै-बुझै
काने बाजै तक-ताक-धिना
यक बड़ा बवंडर नाच करै
यतने मा देखेन यक कुतिया
निहचिन्ते टहरत जात रही
कुकुरै आपस मा लड़यँ- भिड़यँ
ऊ दूर बइठ कुंकुवात रही
मानौ हम रस्ता पाय गयन
जीयै कां ठान लिहेन मन मा 
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

हम बदल-बदल मंदिर बदलेन
औ’ बदल दिहेन हाथे क् लकीर
सुख मिला बहुत खायन-पियन
हट्ठी – कट्टी होय गै सरीर
भगवान कै सेवा खूब किहेन
आगे कै गाथा ना गाइब
अन्दरखाने कै हाल-चाल
तोहरी सबकां ना बतलाइब
ई धरम-जाल सब भरम हुवै
कुच्छौ नाहीं बा भक्ती मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

बिन आग रहे ना उठय धुवाँ
हम पानी पीयन कुआँ-कुआँ
खुब अंधा-धुंध दरबार सजा
सब गधै पँजीरी खायँ हुवां
कल्ले-कल्ले कुलि जानि गयन
हमहूँ तब खेल करै लागेन
जे बहुत बनत रहे वनकां
ऊँगरी पै टहरावै लागेन
हम जवन-जवन देखे बाटी
नाचत बाटै कुलि आंखी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

परिसरमी केऊ बिना सरम
पेटे ताईं कुलि मेर करम
मूड़े कै बार सुफेद भवा
गिरहस्ती सबसे बड़ा धरम
जनता बाटै भोली-भाली
बछिया छुवाय पंडय लूटैं
मंदिर ना चढ़य चढ़ावा तौ
बड़के महंत सबकां डाटैं  
अपुवां ना पूजा-पाठ करैं
बस नाधे रहैं पुजारी कां
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

ओखरी मा चाउर कूटा जाय
सूद – गरीबा लूटा जाय
भूसी – पइया हिगरि जाअ थै
मूरख बाभन पूजा जाय
जइसै करखाना कै मालिक
वइसै लागैं मंदिर-महंत
धइ लिइयं हलोरि चढ़ावा कुलि
बरहोमासा वनकै बसंत
कुछ चेला-चापर खटैं बहुत
दुइ जूनी खाय के बदले मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

भगवान अगर मनई होते
मनई तब मनई ना होते
दुनिया-जहान कुछ ना होतै
जौ रूप-गंध वाले होते
निर्जीव नियामक निर्विकार
ना भाव-भावना कै आदी
वनके पाछे जे भागअ थै
ऊ करै समय कै बरबादी 
भगवान तौ ई ब्रह्माण्ड हुवै
सूरज – चंदा – तारै जेहिमां
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

नकली मेर-मेर भगवान
वन्हैं मानैं सब नादान
बहुत दूर तक बहुत देर तक
उप्पर देखौ जाबौ जान
धरम-करम पाखण्ड न होतै
तब्बौ ई ब्रह्माण्ड तो होतै
नकली मर वोराय सब जाते
तब मरहम कै दरसन होतै
पाप-पुन्न सब यक्कै भाव
बाटै वनके लेखे मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

सृष्टि-चक्र के सुन्दर जोड़ी !
भागौ ना भगवान की वोरी
मनमाफिक मौसम मा अपुवैं
पइदा हूवैं लिल्ली – घोड़ी
दुसरे के ना रह्यौ भरोसे
मिल-जुल कै निपटाओ काज
आपन जांगर प्यार-मोहब्बत
आपन सबसे बड़ा समाज
सोचौ-समझौ खुदै विचारौ
दीया बारौ बुद्धी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा.

__आशाराम जागरथ

[जारी….]