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कविता : ‘तुम चुरौ दालि महरानी’ (~सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’)

कवि निराला

   ई जानब अपने मा अचरज भरा है कि निराला जी अवधी मा कविताई किहे हैं। निराला जी कै दुइ पत्र अवधी मा महाबीर प्रसाद जी के नामे लिखे मिले, लेकिन कविताई नाहीं मिली रही। कवि बोधिसत्व जी अपनी फेसबुक वाल पै यक दलवाही गीत सेयर किहे रहे, वही के सिलसिले मा यहि कविता कै जानकारी भारतेंदु जी दिहिन। यहिके बाद हमहूँ हेरेन निराला ग्रंथावली(यक) मा, मिली कविता, कविता यहि तिना है:

दाल का गीत

[ खास ‘रूपाभ’ के लिये प्रस्तुत ]

तुम   चुरौ  दालि   महरानी !

हरदी   परे  ते   जरदी  आई,

निमक    परे     मुसुक्यानी,

भात-भतार    ते   भेंट   भई,

तब  प्रेम-सहित लिपट्‌यानी !

[‘चकल्लस’, साप्ताहिक, लखनऊ, वर्ष १, अंक २६(जिलाई,१९३८)। असंकलित]”

स्रोत: निराला ग्रंथावली, भाग एक, पृ – ३७९ 

जौन दलवाही गौनई बोधि जी अपने फेसबुक वाल पै सेयर किहे रहे, बिना काट-छाँट के रखत अहन: 

“दाल का गीत

दालि महरानी तू चुरतू नाहीं
हरदी डाले जल्दी हो गई, नून पड़े अलसानी। दालि महरानी।
अमहर डाले समहर हो गई, छौंके से गुर्रानी। दालि महरानी। 

भावार्थ-
हे दाल महारानी तुम पक क्यों नहीं रही। हल्दी डालने से जल्दी हो रही थी, लेकिन नमक पड़ने से तुम अलसा गई हो। आम का अमहर डालने से अच्छी हो गई लेकिन जब छौंक लगाया तो गुर्रा पड़ी। कुछ लोक गायक ‘जल्दी’ को ‘जरदी’ भी गाते हैं।” 

यहिपै हम कमेंट किहे रहेन: 

Bodhi जी, वारे भइया! मजै-मजा! पहिले तौ मोहिस ‘चुरब’ क्रिया! का यहि क्रिया से कौनौ धातुरूप है हिन्दी-संस्कृत मा? ‘चोर’ नहीं चुर! 
पढ़तै-खन आँखिन मा गाँव खिंचा! दल-चुरनी खिंची! जरदही रंग औ हरदही महकि लिहे दालि खिंची! 
केतना जीवन-कर्म से मिला जुला रहा संगीत-साहित्य! यहै चहबो करी। अब तौ बड़ी फाट आइ गै है! हर चीज खंड खंड! 
अउर हमहूँ कहब कि ‘जरदियै’ हुवै क चही। काहेस कि हर्दी के साथ जर्दी कै तुक ढेर बैठत है। अंतहिँउ कहा गा है: ‘…ज्यों जर्दी हर्दी तजै, तजै सफेदी चून!’’

यहि तरह यहू साफ देखात है कि निराला जी कै यू कविता लोक-गानन के ढर्रे पै चली है। 

~सादर/अमरेन्द्र अवधिया 

निराला केर दुइ पाती आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के नाम ! ( १९२३ ई. )

यै पत्र अवधी पत्र-साहित्त कै धरोहर हुवैं। १९२३ ई. की जानी कौनी घड़ी मा लिखा गा रहे है! इनसे ई बात जानी जाय सकत है कि वहि समय गद्य मा खड़ी बोली कै धूम-धड़ाका न रहत तौ का जनीं केतना लेखन अवधी मा आइ जात! यई निराला पढ़ीस केर अवधी कबिताई का सराहत रहे, खुदौ पत्र लिखिन, मुल जाने कौन वजह रही कि खुद अवधी मा कविताई नाहीं किहिन! करते तौ नीक रहत! बहरहाल निराला केर ई दुई पाती हमरे सामने अहैं:
————————————————–
[ १ ]
महावीर प्रसाद द्विवेदी को
“मतवाला” कार्यालय।
बालकृष्ण प्रेस,
२२, शंकरघोष लेन,
कलकत्ता, २७/१०/१९२३
श्री १०८ कमलचरणनमां
            विजया क असंख्य भूमिष्ठ
                                     प्रणाम।
बाबा
      लिखा रहै, कतों जाब। मुलो जाब नहीं भा। हियैं रहि गयन। कलकत्ते की पूजा दीख। ८-मी के दिन बाबू मैथिलीशरण ते भेट भै, राय कृष्णदास के साथ आये रहैं। ३/४ दिन कउनव माड़वारी की कोठी मं [ मँ ] रहे रहैं। स्वभाव के तो बड़े अच्छे हैं। एक एक ‘अनामिका’ दूनो जनेन का दीन। तब पढ़ि कै सुनावा। प्रसन्न खूब भे। कहेन पहिलेहे रचना बड़ी अच्छी जानि परी मुलो छंद समुझ मं [ मँ ] नहीं आवा। हम कहा, हमरी समुझ मं [ मँ ] यहि छंद ते तुम्हरे वीरांगना के अनुवाद के छंद मं [ मँ ] बहुत थ्वारै फर्क है; वह बेतुका कवित्व छंद है औ यहि मां कतों कवित्व छंद की ३/४, कतों १/२, कतों १/३ लाइन आवति है। महादेव बाबू हमरे परिचय मं [ मँ ] तुम्हार संबंध जोरेन तौ मैथिलीशरण कहेन कि हमका तौ वई बनायन हैं। यही तना की बहुतेरी बातैं होती रहीं। हमारि इच्छा है, अनामिका एक दईं तुमका पढ़ि कै सुनाई।
      ‘मतवाला’ की कविता औ समालोचना पढ़ि कै लिख्यो। भूल कतों होति होई तो सुधारब। ‘निराला’ की कविता मं [ मँ ] कहां का करैक चही, लिख्यो। यह सम्मति हमरेहे लगे रही।
      आशा है अच्छे हौ औ घर मां अच्छी भलाई है। चि० कमला किशोर कस हैं,कानपुर कब जइहौ, घरवालेन क मलेरिया छूट की नहीं, सब लिख्यो।
        दास
सूर्य्यकान्त त्रिपाठी
      हम रहित हियैं हैं [ है ] । चहै समन्वय के पते पर लिख्यो चाहे मतवाला के पते पर चिट्ठी हमका मिलि जाई।
    दास
सूर्य्यकान्त
[ पता : ]
           Shreeman
                Pandit Mahavir Prasad ji
                         Dwiwedi maharaaj
                    Daulatpur ( Raebareli )
[ पत्र दौलतपुर से जुहू कलां, कानपुर भेजा गया। ]
[ २ ]
महावीर प्रसाद द्विवेदी को
६/११/२३
श्री चरणेषु—
      कृपापत्र पढ़ा। मतवाला कै संख्या दीख। सरस्वती संपादक के नोटन मं [ मँ ], न समुझि सकेन, भूलै काहे नहिंन। कारण लिखि देत्यो तो समुझि जाइत। अबै तो मतवाला की समालोचना के पुष्ट कारण ते भूलै जानि परत है।
      सरस्वती सम्पादक के विषय मं [ मँ ] लिखै बैठेन तो हमहूँ ५/६ पृष्ठ लिखि डारा। मुलो पीछे जब जाना कि तुम्हारा समय अकारण नष्ट होई तब फारि डारा। याकन कहा, ‘द्विवेदी जी का प्रत्यक्ष नहिंन तो का भा सरस्वती ते परोक्ष सम्बन्ध तो है; उइ अपनी बिदाई मं [ मँ ] यह बात स्वीकार करि चुके हैं। अतएव सरस्वती का पक्ष उइ लेबे करिहैं। औ वहिका वई बनायन है [ हैं ] तो अपने रहत उइ वहिकै उल्टी समालोचना देखि सकत हैं?’ कुछो होय हमका युक्ति ते काम। बात युक्तिपूर्ण होई तो चित्त मं [ मँ ] बैठि जाई, न होई, अलग ह्वइ जाई।
      हम जो रामायण पाठ आदि मं [ मँ ] बनियई क भाव राखा होब – अर्थात्‌ लोग हमका अच्छा कहैं औ हम नामी ह्वइ जाई – बड़े सच्चरित्र साधु महापुरुष कहाई – हे राम हम तुम्हार नाव लेइत है बदले मं [ मँ ] तुमहूँ कुछ दियव, तो जउन यहु ह्वय रहा है यहु ठीक है। यही तना का विपरीप [ विपरीत ] फल मिलत है। औ लोग प्रकृति का एक अध्याय पढ़ि कै समुझै वाली बहुती बातै पाय सकत हैं।
— दास सूर्य्यकान्त।

[ साभार : निराला की साहित्य साधना-३/ संकलन: राम विलास शर्मा/ पृष्ठ: २७५-२७६ / राजकमल प्रकाशन ] 
सादर;
अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी