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मुलाकात : फिल्म निर्देसक अउर अभिनेता डाक्टर चन्द्र प्रकाश द्विवेदी के साथ ..!

चन्द्र प्रकाश द्विवेदी जी..

सोरह मई ( सुम्मार ) क जे.एन.यू. म हम पढ़ैय्या दोस्तन कै मुलाकात सलीमा निर्देसक अउर अभिनेता सिरी चन्द्र प्रकास दूबे से भै। दूबे जी अपनी संजीदगी के चलते सलीमाई भेड़ियाधसान से अलग आपन जगहाँ बनाये अहैं, जेकर दाद उहौ दियत है जे वनसे बिचारधारा कै बिभेदौ रक्खत हैं। ‘चाणक्य’ जइस बड़ुआर धारावाहिक बनाय डारब, अउर वहिमा वही समय कै पूरा पूरा रंग-ढंग/समाज/चरित्तिर/भाव समुवाय दियब, मामूली बाति न आय। देखतै लागत है कि हम यकदम्मै वही समय म अपनी आँखिन के जरिये पहुँचि गयेन। यनही खासियतन के वजह से दूबे जी अलग जीवट कै मनई माना जात हैं। बाद मा दूबे जी ‘पिंजर’ सलीमा कै निर्देसन किहिन तौ वहू म आपन धारा से अलग चलै वाली खासियत का बखूबी बनाये रहि गये। स्टूडेन्ट एक्टिबिटी सेंटर , टेफला म हमार सबकै जौन बाति भै वहिकै बिउरन हियाँ पोस्ट म रखित अहन। दूबे जी के साथे सलीमा समीछक अजय ब्रह्मात्मज अउर अजीत राय जी रहे। वैसे तौ दूबे जी अउतय कहिन कि घर कौनौ दिक्कत है यहिलिये कम समय दै पाउब और वादा करित है कि अगली बार आप सबके बीच आउब तौ बैठि ढेर के बतलाब, लेकिन यहिके बादौ  ४५-५० मिनट के आस-पास सबके बीचे रहे। निधरके सबके सवाल कै जथासंभव जवाब दिहिन। यहि मुलाकात कै बिधान बनावै म अविनास (‘मोहल्ला’ वाले) जी कै खास भूमिका रही, यहिरी से परकास के. रे (‘बरगद’ वाले) कै सहजोग पूरे प्रोग्राम कै सक्लो-सूरत दियै म रहा। भई बातन कै बिउरन सवालन के जबाब के रूप म रहे।

    सलीमा कै सौकीन सायदै केहू बचा हुवै जे पिंजर सलीमा न देखे हुवै। अमिरता प्रीतम के कहानी पै बनी ई फिलिम देस के बटवारा कै मार्मिक झलक देखावति है। मेहनत अउर दूरदीठि (दूरदृष्टि) से बनी ई फिलिम देखैया के ऊपर गहरा प्रभाव छोड़ति है। लरिकै पिंजर से तालुक रखत कयिउ सवाल किहिन, अलग अलग सवालन के जबाब म दूबे जी बताइन:

“पिंजर म यक बड़ा कैनवास अहै। यहिबरे हम वैसनै सेटौ बनायन। यहि फिलिम का यहिके बढ़िया सेट खातिर फिलिम फेयर एवार्डौ दीन गा, अउर लोगै यहिके डाइरेक्सन कै सरहनौ किहिन। मुल ब्यावसायिक चुनौती के सामने ई फिलिम असफल रही, बनावत के वखत हममा बजार कै समझ नाय बन पाई रही। हमैं फिल्मन म ई संतुलन राखेक परे जेहमा मनोरंजन अउर कथा दुइनउ हुवै। हम भारतीय दरसक अउर बजार कै सोझै अनदेखी कैके नाय चल सकतेन। इहै बड़ी चुनौतिउ है। वैसे तौ एकदम समझौतौ नाय कीन जाय सकत, जइसे पिंजर म यक आइटम सांग रखै कै बात कीन गै रही, हिरोइन तय होइगै रही, गानौ, मुल कथा के सुभाव कै उल्टा देखि के ऊ गाना हम सलीमा से निकारि दिहेन। यानी बजार समझब, कथा कै सुभाव ताड़ब अउर फिन वही हिसाबे संतुलन लैके चलब सबसे जरूरी अहै।”

दूबे जी चाणक्य धारावाहिक म न केवल निर्देसक के तौर पै अपनी काबिलियत कै डंका बजाइन बलुक एक्टिंगियौ कमाल कै किहिन, अस कमाल कि चाणक्य के सब पात्रन पै भारी पड़ि गा। संवाद तौ अइस बोले गये हैं कि जइसे संवेदना का जुबान से चूर म चूर बैठाय के निकारा गा हुवै, मानौ बोलैया खुद जिया हुवै वहिमा! यहू कै सेट कमाल कै है। अक्सर प्राचीन इतिहास या मिथक से जुड़ी चीजि लोगन के सामने रखै म यक जोखिम रहत है, जोखिम है पुन्रुत्थानी कै तमगा नेवाज दीन जाब, ई जोखिम चाणक्य धारावाहिक के साथौ जुड़ा है। यहि वारी से प्रगतिसील लोगै नाक-भौं सिकोड़े सवाल उठावा करत हैं, सो यहि बामपंथिन के इलाका म यहि एंगिल से सवाल आउब लाजिमी रहा। मिथक, इतिहास से जुड़ा आपन इरादा अउर बिचार दूबे जी साफ किहिन:

“चाणक्य की बातन का तत्कालीन रास्ट्रवाद से जोड़ि के देखब बकवास कै बाति है। समुल्ला बकवास! ई हमार समिस्या होइगै है कि हम बातन का, अपने समय समाज का, खाँचन मा बाटि के देखत हन्। हमरे साँसकिरतिक मिथकन क यतना पोलिटिकल बनाय दीन गवा है कि साँसकिरतिक चरचा न कै पाउब यक त्रासदी बनि गा है। का गलती इतिहास कै है? का मिथकन कै है? या हमार है! हमैं सोचय क चही कि कौन बयारि आई है कि लोगै अब अपने बच्चन के नाव के साथ ‘राम’ नाय जोड़ा चहते? समिस्या कहाँ है? चुनौती का है? केतना सामना कीन जात अहै? कैसे सामना कीन जात अहै? सँसकिरिति के साथे कौन कौन सरलीकरण थोपा जात अहै?”

पुरान/इतिहास मा बिचरै के ताईं दूबे जी कै कम खींचाखाँच नाय हुअत। हिन्दी के साहित्यकार जयसंकर परसाद पै अतीत प्रेम के चलते थोर खींचा तानी नाय हुअत रही, जुमला उछारा जात रहा कि ‘परसाद बाबू तौ अतीत कै गड़ा मुरदा उखारा करत हैं’! यही तिना दूबेउ जी पै लोगै कहत हैं कि इनकै अकाल कौलित आतिमा घूम फिराय के अतीतय म बिहरा करत है, यक जने इहै सवाल किहिन, तिहपै दूबे जी कहि परे:

“(केहू की बाति क कोट कैके कहिन) ‘बर्तमान अउर भविस्स, कुछौ नाहीं बचत, बचत है तौ सिरफ भूत!’ भूतै से हमैं अनुभव मिलत है, बीते से हम सबसे ढेर सीखि सकत हन्।”

    हिन्दी सलीमा म बजार अउर कला दुइनौ का साधब बहुत बड़ी चुनौती है। अक्सर कला छोड़ि के बजार साधी जाति है जिहसे सलीमन कै संख्या तौ बढ़त है मुला सारथक चीजन/बातन कै कमी हुअत जात है। दुसरी वारी कला साधै वाले बजार क अछूत समझे रहत हैं, जिहसे भौतिक सच्चाई के चलते यक समय के बाद उनकै रीढ़ि टूटि जाति है अउर बंबइया नगरी म सिरफ बजारै बजार रहि जाति है। गौर करै कै बाति है कि दूबेउ जी यक संतुलन चाहत हैं दुइनौ के बीच। कहूँ इंटरब्यू म दूबे जी कहे रहे कि ‘हमैं सबका एकता कपूरौ से कुछ सिखै क चही!’ यही बात क आगे कै के सवाल पूछा गा तौ दूबे जी आपन बिचार रखिन:

बारता के दौरान दूबे जी, अजय जी अउर अविनाश जी..

“एकता कपूर पै कही हमरी बाति क ब्यंग्य के रूम म लीन जाय। मुला एकता कपूर केरी सफलता से सिखै लायक है कि ब्यावसायिक चुनौती क कैसे स्वीकार कीन जाय! हम पैसे के तर्क क खारिज कैके नाय चल सकतेन। चाणक्य कहे हैं कि जब राजा कै राज-काज माल-पानी के चलते डावाँडोल हुवै लागै तौ वहका देबी-देउतन कै तस्बीर बनुवाय के/बेचि के आपन हालत सुधारै क चाही। यहितरह सकारात्मक ओढ़र के ताईं इमेज बेचै कै बाति बहुत पहिले से स्वीकारी गै है। हिन्दी सलीमा बनवैयन का यहिके लिये जोखिम लियै क परे, फिलिमकार यक टाइप बनि के न रहै। स्याम बेनेगल जैसे निर्देसकन के साथे यक टाइप वाली बात काफी हद तक सही है। आज मार्केटिया फिलिमकार अच्छा लिखै वालेन कै इसकिरिप्ट नाय लीन चहते, ह्वईं दुसरी वारी इनकै कोसिस रहत है बराबर अन्नासै कमाय कै। हमैं थोरक् छूट के साथ दुइनौ म सलगट्टा (सामंजस्य) बैठावै क परे। कामरसियल फिल्मन से कुछ सिखहिउ क परे। हम खुदै अपने दोस्त अजय के साथ दबंग देखै गा रहेन, मुल हुवाँ वहै दिक्कत है कि दिमाग घर छोड़ि के जाय क परत है।”

   जल्दियै दूबे जी कै निर्देसित फिलिम ‘कासी’ पै आवै वाली है। ई फिलिम कासी नाथ सिंघ के उपन्यास ‘काशी का अस्सी’ पै आधारित है। पिंजर बनाये के बाद काफी अंतराल बाद दूबे जी कौनौ फिलिम लावै कै कोसिस किहिन। यहिमा कला के साथ बजार कै संतुलन बैठावै कै कोसिस कीन गै है। सलगट्टा कस बैठा – ई आवै वाला समय बताये! यहिमा सन्नी देवल अउर रबि किसन(भोजपुरी) जइसे पापुलर अभिनेतन से अभिनय करावा गा है, यहिबरे देखब अउर रोमांचक होये कि यक कलात्मक-साहित्तिक रचना के साथ ई संतुलन केस साधा गा है! यहि सलीमा से जुड़े सवालन के जबाब म दूबे जी कै कहब है:

‘कासी का अस्सी’ पै बनी फिलिम म सन्नी देवल..

“इंडिया टूडे मैगजीन म ‘काशी का अस्सी’ के यक कहानी कै जिक्र रहा, जिहिपै सबसे पहिली बार हमार नजर गै। फिर हम पूरी कहानी पता किहेन अउर पढ़ेन। फिर पूरे उपन्यास तक पहुँचेन। फिन कासी नाथ जी से संपर्क किहेन। कयिउ बार उपन्यास पढ़ेन। फिलिम बनावै के सिलिसिले म हम इसकिरिप्ट के तौर पै उपन्यास म काफी परिवर्तनौ किहेन। जइसे उपन्यास कै आखिरी चेप्टर हम छोड़ि दिहेन। यहिलिये आप सबका उपन्यास अउर फिलिम म काफी फरकौ देखाये। यक फिलिम निर्देसक के तौर पै हमैं फिलिम म बहुत कुछ जोड़ै अउर घटावै क परत है! भासा कै जिंदादिली बचावै कै भरपूर कोसिस किहे हन्। भासा क असलील कहि के सेंसर के वारी से समस्या तौ न हुवै क चाही, मुला अगर भै तौ कोरट-कचेहरी तक्का जाब! ..सन्नी देवल का वनकी लोकप्रियता के मद्देनजर चुनेन, मुला निर्देसन म मेहनत कीन गै है, यहिते यहि पिक्चर म आप सबका सन्नी देवल काफी बदले रूम म मिलिहैं, यक अलग रूप म! ..आजै कासी नाथ जी से बात भै रही, जेहिके दौरान वै कहिन कि ध्यान रखे रहेव कि ई फिलिम खालिस आरट फिलिम बनि के न रहि जाय! ..कुछ सूटिंग तौ बनारस म कीन गै बाकी के लिये अलग से सेट बनावै कै जरूरत महसूस भै काहे से कि कथा म जौन बनारस है ऊ पिछले दसकन म बहुत कुछ बदलि गा है। सेट यहि वजह से बनायन कि लोगन क कथा कै बनारस देखै म आज कै बनारस फाँक न पैदा करै, लोगै वहि समय कै कथा वही समय के परिबेस म देखैं! दुसरे, सेट के जरिये कैनवास चौड़ा करै म आसानिउ हुअत है। अक्टूबर ले ई फिलिम आप सबके सामने आइ जाये।”

    अपनी पूरी बतकहीं के दौरान बार बार दूबे जी के भित्तर कै हूकि सामने आवति रही कि वै भारतीय सलीमा म कौनौ ‘भारतीय’ तत्व सिद्दत से देखा चाहत हैं, किरतिन के जरिये या अउरौ भारतीय सलीमन के जरिये वै यहिकै खोज जारी राखे हैं! वै चाहत है कि कौनौ अस चीजि उभर के सामने आवै अउर कही जाय सकै कि ‘ई भारतीय सलीमा है’! सवालन के उत्तर म दूबे जी कहत हैं:

“अगर आप सब पुछिहैं कि हम बिदेसी फिलिम देखित हन्‌ तौ हम कहब कि हम नाहीं देखित। बिदेसी किताबौ नाहीं पढ़ित। मुदा अगर आप पुछिहैं कि हम प्रेमचंद क पढ़े हन्‌ तौ हम कहब कि हाँ, कयिउ बार पढ़े अहन। भौगोलिक, ऐतिहासिक अउर साँसकिरतिक रूपन से रूबरू हुअत भारतीयता खोजै कै हमार कोसिस रहत है। यनही क फिल्मन के जरिये देखै कै इच्छा रहत है। तमाम भारतीय भासन म लिखी बातन से गुजरित है, भारतीयता कै यक तस्बीर खोजै की जुगुत के तहत। भारतीय किरतिन म जहाँ कहूँ सलीमा देखात है, वहिकै गुंजाइस देखात है, वही का गुनै कै कोसिस करित हन्‌। ज्यादातर समय यही परयास म बीतत है।”

दूबे जी के साथ हम ..

  सलीमा के आज के परिदिस्य पै बाति कीन गै तौ दुबेदी जी बचि के निकरै कै कोसिस करत देखाने। केहू पै टीका-टीप करब वन्हैं जमा नाय! यहसे यहू लाग कि वै आज के सलीमाई परिदिस्य से खुस्स नाय हैं। उम्मीद है कि यहि असंतोख भरी धारा से हटा अउर समय की माँगन पै डटा निर्देसक कै भूमिका दूबे जी निभहिहैं। ऊपर पूरी बात म यक बीच कै रस्ता तलासै कै जद्दोजहद क रखै कै जरूरत दूबे जी लगातार बताइन, यहि परयास म खुद दूबे जी केतरा सफल होइहैं, ई देखब अहम रहे। संभावना इहौ है कि कहूँ यहि परयास म दूबे जी परकास झा वाली राह न पकड़ लियैं जे अपने ‘दामुल’ कै सगरौ मूल खतम कैके ब्यावसायिक ‘राजनीति’ के अखाड़े म फाटि परा हैं। दूबे जी से कछु बेहतर कै माँगि है!

   दूबे जी के जाये के बाद हम सबके बीच पधारे अजय ब्रह्मात्मज अउर अजीत राय जी से काफी देर तक बाति भै। अजय जी कै चिन्ता रही कि कैसहूँ हिन्दी सलीमा म बंबई कै हेजीमनी टूटै। छोटे सहरन म सलीमा पहुँचै, बनावै के लेबिल पै। तब ढ़ेर बिबिधता आये। यहिसे जौन बंबई सिनेमा म यक निरंकुसता बनी अहै – उहौ टूटे। तमाम छेत्रीय भासा म सलीमा बनै, सामने आवै। अजय जी सलीमा म कौनौ अंकुस लगावै कै तरफदार नहीं हैं। वहीं अजीत राय जी कै चिन्ता रही कि यक मानकीकरण रहब जरूरी है, यस अल्ल-कै-बल्ल सलीमा बनब सलीमा के भविस्स के ताईं बहुत बढ़ियाँ न होये। मुल मानकीकरण कैसे? – ई लाख टका कै सवाल रहा। बिबादन से भरा। अजय जी कै चिन्ता रही कि बिस्व सलीमा के सामने भारत कै सलीमा बहुतै पीछे है, यहिलिये कंटेंट के लेबल पै काफी सुधार लाउब जरूरी है। गलत ट्रेंड खतम हुवै क चाही!

   प्रकास, समर, बिबेक, धनंजय, सरवन, मुंतजिर…आद लड़िकै-लड़िकियन के सहजोग से बारता कै यक बढ़ियाँ सिलसिला चला। काफी बातैं भईं! देर राति के बाद सबही अपने-अपने ठैरे-ठेकाने गा।