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बतकहीं : डॉ. श्यामसुन्दर मिश्र “मधुप” से बातचीत पर आधारित एक संक्षिप्त प्रस्तुति..!

डॉ. श्यामसुन्दर मिश्र “मधुप”

सीतापुर(उ.प्र.) जिले के सरैना-मैरासी ग्राम में सन्‌ १९२६ को जन्मे डॉ. श्यामसुन्दर मिश्र “मधुप” जी समकालीन अवधी साहित्य के विशिष्ट हस्ताक्षर हैं। मधुप जी का पूरा जीवन अवधी भाषा-साहित्य के सेवार्थ समर्पित रहा। इन्होंने रचना और समीक्षा दोनों ही स्तरों पर अवधी को समृद्ध किया। ‘अवधी का इतिहास’ लिखने का श्रेय भी मधुप जी को जाता है। अवधी रचनाओं के कई संग्रह लिख चुके मधुप जी सीतापुर जनपद में रहते हुये अद्यापि सृजनरत हैं। प्रस्तुत पोस्ट मधुप जी से ज्योत्स्ना जी की मुलाकात पर आधारित है। ज्योत्स्ना जी भी सीतापुर की रहनेवाली हैं और इस पोर्टल की सहयोगी भी हैं। मधुप जी से यह बतकहीं इसप्रकार है:

आज के युग में अवधी भाषा का क्या महत्व है?

वर्त्तमान काल भाषाओँ के संरक्षण और परिवर्द्धन का काल है. प्रत्येक राष्ट्र में अपनी संस्कृति अपनी जातीय धरोहर को संचित, संरक्षित, करने की ललक है, अवधी तो हमारे राष्ट्र की एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण भाषा है जिसमें गोस्वामी तुलसीदास जी ने रामचरितमानस जैसा महाकाव्य रच कर विश्व को एक विलक्षण महाग्रंथ दिया है जिस पर आज भी गद्य एवं पद्य में अत्यंत महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ लिखे जा रहे हैं.

अवधी और समकालीन खड़ी बोली साहित्य में आप क्या अंतर पाते हैं?

जहाँ वर्त्तमान काल में खड़ी बोली में प्रबंध महाकाव्य और खण्डकाव्य का अभाव दिखाई देता है वहीँ अवधी में प्रबंध धारा पूर्ण वेग से प्रवाहमान है. कृष्णायन, गांधीचरितमानस, हनुमत विनय, पारिजात, बभ्रुवाहन, ध्रुवचरित आदि आधुनिक अवधी प्रबंध काव्य हैं, जो हिंदी के खजाने को दोनों हाथ भरने में सक्षम हैं.

आधुनिकता के दृष्टिकोण से देखें तो अवधी में खड़ी बोली की समानांतर काव्य धारा पुराने स्वरुप में दिखती है. क्यों?

जहाँ तक समकालीन अवधी काव्यधारा का प्रश्न है, आधुनिक अवधी कवि अच्छा लिख रहे हैं. “घास के घरौंदे”, मेरा काव्य संग्रह आधुनिक काव्य धारा का ही प्रतिनिधित्व करता है. समकालीन अवधी कवियों में प्रमुख रूप से सीतापुर के युवा कवि भूपेन्द्र दीक्षित का नाम उभर कर आया है. “नखत” में उनकी काव्य प्रतिभा की बानगी देखी जा सकती है. मेरे “अवधी का इतिहास” में भी कुछ रचनायें हैं जिन्हें पढकर अवधी काव्य के संदर्भ में नयी अनुभूतियाँ होंगी. इसके अलावा डॉ. भारतेंदु मिश्र, डॉ. ज्ञानवती, सत्यधर शुक्ल आदि आधुनिक अवधी के जाज्ज्वल्यमान नक्षत्र हैं.

अवधी गद्य अवधी पद्य की तुलना में कम है, इसका क्या कारण है?

ऐसा नहीं है की अवधी गद्य लिखा नहीं जा रहा है, वह खूब लिखा जा रहा है, परन्तु प्रकाश में कम आया है. डॉ. ज्ञानवती का “गोमा तीरे” आधुनिक अवधी का प्रथम मौलिक उपन्यास है जो अप्रकाशित है. गोमती नदी की प्रष्ठभूमि पर एक आम आदमी के दुःख दर्द की कहानी, संवेदनहीन राज्यतंत्र, अय्याश नेता और अभावों में छटपटाता जन-जीवन अवध क्षेत्र का रेखाचित्र है गोमा तीरे. ये छपेगा तो तेहेल्का मच जायेगा. वैसे भारतेंदु मिश्र, रश्मिशील, डॉ. राम बहादुर, भूपेन्द्र दीक्षित आदि अवधी में खूब लिख रहे हैं. भविष्य को इनसे बड़ी आशाएं हैं. स्व. दिनेश दादा भी अवधी गद्य का भण्डार भर रहे थे.

अवधी को आज भी उसका उचित स्थान नहीं मिला, इस सन्दर्भ में आप का क्या कहना है?

अवधी को कभी राज्याश्रय नहीं मिला. इतना प्रचुर साहित्य होते हुए भी अन्य भाषाओं के मध्य इसको समुचित स्थान नहीं मिल पाया. जो नेता अवध क्षेत्र मैं है, वे अवधी का दाय नहीं चुका सके हैं. अवधी साहित्याकारों में इतनी गुटबंदी है कि समर्पित साहित्यकार भीड़ में पीछे छिप जाता है. अच्छे रचनाकार को तथाकथित खेमेबाज़ लेकिन साहित्य के दीवालिये उभरने ही नहीं देते. सीतापुर की रचनाधर्मिता तो खासकर इसकी शिकार है. महाविद्यालयों के रिटायर्ड अध्यापक इनके सिरमौर हैं जो इस प्रवृत्ति को बढ़ावा दे रहे हैं.

अवधी प्रेमियों के लिए आपका सन्देश:

प्रतिभा को कोई रोक नहीं सकता, उसका तो विस्फोट होगा ही. अवधी को अवधी के गुटबाजों से खतरा है और किसी से नहीं. अवधी को जातिवाद, क्षेत्रीयतावाद और ओछी मानसिकता से दूर रखना होगा. अवधी का भविष्य उज्ज्वल है.

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मधुप जी के साथ ज्योत्स्ना जी..

मधुप जी के बरवै की कुछ पंक्तियाँ:

नदिया लावइ पानी, पी खुद जाइ।

ख्यात परे सब सूखइँ, तरु कुम्हिलाइ॥

बादर गरजहिं तरपहिं, बरसइँ नाँहि।

पपिहा मरइ पियासा, ताल सुखाँहि॥

किहेउ बिधाता कस यहु, तोरु-मरोरु।

भैंसि वहे की जेहिकी, लाठिम जोरु॥

उगिलइ आगि चँदरमा, सुर्ज अँध्यार।

मछरी बैठि बिरउना, पिक मजधार॥

कागा पूजन देखिक, पिकी उदास।

चहुँ दिसि दधि के रूप म, बिकै कपास॥ 

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कुछ और बरवै:

सून पड़े दफ्तरवा, हाकिम लेट

बात न करें अधीक्षक, बिन कुछ भेंट।

सर बापू तस्बिरिया पंजन केरि

देउ पांच ते कम तौ देबइं फेरि।

सोची हाय सुरजिया का परिनाम

बिकें गरिबवा घर-घर, कस दिन दाम।

मारें मौज बड़कवा, लूटइं देस

मरे भूख ते बुढवा, सूत पर केस।

लूटिन कस परदेसिया भारत देस

लूटइं आज स्वदेसिया जो कुछ सेस।

[स्वराज्य से] 

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