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अवधी साहित्य के शिखर साहित्यकार चंद्रभूषण त्रिवेदी ‘रमई काका’

ई आलेख बिख्यात अवधी साहित्यकार रमई काका के ऊपर लिखा गा हय जौन हमैं नवंबर-१५ मा दोस्त हिमांशु बाजपेयी के जरिये मिला रहा। यानी, काका केरी जन्म-शताब्दी-वर्ष मा। यहिका चित्रलेखा जी लिखिन हँय। हम उन कय आभारी हन। : संपादक
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*चित्रलेखा वर्मा

हिन्दी साहित्य जगत में साहित्यिक प्रतिभा के धनी, अवधी के लोक-नायक, यशस्वी चंद्रभूषण त्रिवेदी का विख्यात नाम ‘रमई काका’ है। आधुनिक अवधी काव्य की परिधि अत्यंत विस्तृत है और रमई काका अवध क्षेत्र के सर्वप्रिय जनकवि हैं।  

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रमई काका

आपका जन्म २ फरवरी १९१५ में जनपद उन्नाव के रावतपुर नामक गाँव में हुआ था। आपके पिता पं. वृंदावन त्रिवेदी फौज में नौकरी करते थे तथा प्रथम विश्व युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुए। उस समय वे केवल एक वर्ष के थे। काका की आत्मकथा से पता चलता है कि पिता की मृत्यु के बाद माँ गंगा देवी को सरकार से कुल तीन सौ रूपए मिलते थे जिनसे वे अपने परिवार को चलाती थीं। इस तरह उनका बचपन संकटों और कष्टों में बीता। पर आपका लालन-पालन इस तरह से हुआ कि ग्राम संस्कृति काका के जीवन का पर्याय बन गयी क्योंकि आपकी प्राथमिक शिक्षा ग्रामीण वातावरण में हुई थी। हाई स्कूल की परीक्षा अटल बिहारी स्कूल से उत्तीर्ण की। इसके पश्चात आपने नियोजन विभाग में निरीक्षक का पद सम्हाला। निरीक्षक पद  का प्रशिक्षण लेने के लिए वे मसौधा-फैजाबाद में कुछ समय रहे। अपने प्रशिक्षण काल में भी आपने अपनी प्रतिभा से प्रशिक्षकों को प्रभावित किया। यहाँ उन्होंने कई कविताएँ लिखीं तथा कई एकांकियों का मंचन भी किया।

‘गड़बड़ स्कूल’ एकांकी ने यहाँ के लोगों का बहुत मनोरंजन किया। यहाँ के बाद उनकी नियुक्ति उन्नाव के बोधापुर केंद्र में हो गयी। यहाँ इन्होंने बहुत मेहनत की। फलतः इनके केंद्र को संपूर्ण लखनऊ कमिश्नरी में प्रथम स्थान मिला। उन्हें गवर्नर की ‘सर हेनरी हेग शील्ड’ प्रदान की गयी। इस केंद्र पर काम करते हुए काका ने एक बैलगाड़ी बनायी जिसमें बालवियरिंग का प्रयोग हुआ था तथा ढलान से उतरते समय उसमें ब्रेक का भी प्रयोग किया जा सकता था।

यद्यपि आपने शास्त्रीय एवं सुगम संगीत का विधिवत प्रशिक्षण नहीं लिया था परंतु अपनी प्रतिभा के ही बल पर शास्त्रीय और सुगम संगीत का ज्ञान प्राप्त किया। २७ वर्ष की उम्र में १९४१ में काका लखनऊ आकाशवाणी में नियुक्त हुए और स्थानीय रूप से लखनऊ में बस गये। काका आकाशवाणी में ६२ वर्ष की आयु तक रहे और १९७७ में सेवानिवृत्त हुए। इसके दो वर्ष बाद दो-दो वर्षों के लिए उनका सेवाकाल बढ़ाया भी गया। सेवानिवृत्ति के बाद भी वे निष्क्रिय नहीं हुए और आकाशवाणी, दूरदर्शन, समाचार पत्र, पत्रिकाओं और कवि सम्मेलनों से जुड़े रहे। आकाशवाणी पर आपने अनेक भूमिकाएँ भी निभायीं। सन्तू दादा, चतुरी चाचा, बहिरे बाबा आदि उनकी भूमिकाएँ थीं। रमई काका के अतिरिक्त उनको बहिरे बाबा के नाम से भी ख्याति मिली। बहिरे बाबा धारावाहिक ने तो प्रसारण का कीर्तिमान स्थापित कर दिया था। यह धारावाहिक २५ से भी अधिक वर्षों तक आकाशवाणी से प्रसारित हुआ।

यद्यपि काका स्थायी रूप लखनऊ में रहे पर उनका संपर्क गाँव से जीवन भर बना रहा। शहर में रहते हुए आपने अपने ग्रामीण मन को बचाए रखा। रमई काका का काव्य अवध के गाँव से बहुत गहराई से जुड़ा होने के कारण आकाशवाणी (पंचायत घर), दूरदर्शन और एच.एम.वी. के रिकार्डर के माध्यम से उनकी कविताएँ अवध अंचल में रच-बस गयीं। ‘मौलवी’ रमई काका की पहली उपलब्ध कविता है। यह कविता उन्होंने ‘पडरी’ के मिडिल स्कूल में पढ़ते हुए लिखी थी। इस कविता पर काका के अपने गुरु पं. गौरीशंकर जी से आशीर्वाद मिला था कि काका एक कवि के रूप में विख्यात होंगे।

रमई काका हास्य-व्यंग्य कवि के रूप में काफी विख्यात रहे। उनकी प्रकाशित तीन कविताओं में ‘फुहार’,‘गुलछर्रा’ तथा ‘हास्य के छींटे’ हास्य-व्यंग्य रचनाओं ही संकलन हैं। ‘बौछार’ उनकी प्रथम और ‘भिनसार’ उनकी दूसरी कृति है। इन दोनों पुस्तकों में अधिकतर व्यंग्य रचनाएँ हैं। इनके बारे में संक्षिप्त जानकारी इसप्रकार है, बौछार १९४४ ई. में छपी। बौछार ग्रामजीवन, प्रकृति-चित्रण, छायावादी काव्य, राष्ट्रप्रेम, सामाजिक भावना और जनवाद से प्रेरित ३० कविताओं का संकलन है। भिनसार में ४२ कविताएँ हैं। इसकी कविताएँ वर्षा की बूँदों से तन-मन को भिगोती हुई हास्य-व्यंग्य की मिठास से भरी हैं। ‘नेता जी’ सुभाषचंद्र बोस पर लिखा गया है। यह आल्ह छंद में लिखा गया है। परंपरागत शैली में लिखा वीर रस का यह अनूठा काव्य है।

‘हरसति तरवारि’ तथा ‘माटी के बोल’ शीर्षक पुस्तकों में अधिकांश गीत रचनाएँ हैं, ये लोकधुनों पर आधारित हैं। हास्य के छींटे, गुलछर्रा, तीर के समान प्रहार करती हुई उत्कृष्ट व्यंग्य उकेरती हुई पाठकों का मनोरंजन करती हैं। ये खड़ी बोली की कविताओं के संकलन हैं। सभी काका के जीवन के उत्तरार्ध में लिखी गयी थीं। शेष सभी संकलनों की भाषा अवधी है।

इनकी पुस्तकें हजारों-लाखों की संख्या में छपीं और बिकीं।

काका की तीन नाट्य-कृतियाँ भी प्रकाशित हुई थीं। ‘रतौंधी’ पुस्तक में आठ तथा ‘बहिरे बोधन बाबा’ शीर्षक पुस्तक में ७ एकांकियाँ-नाटक संकलित हैं। काका की खड़ी बोली की चार एकांकियों का एक संकलन जुगनू नाम से प्रकाशित हुआ था। ‘कलुवा बैल’ एक अवधी उपन्यास भी आपने लिखा पर यह प्रकाशित नहीं हो सका। ‘स्वतंत्र भारत सुमन’ पत्रिका में यह धारावाहिक के रूप में छपा था।

काका की कई गंभीर रचनाओं-लेखों के संकलित रूप का प्रकाशन आज तक नहीं हो पाया, यद्यपि इस संकलन की अधिकांश कविताएँ ‘भिनसार’ और ‘बौछार’ में प्रकाशित हो चुकी थीं। किन्तु अनेक महत्वपूर्ण रचनाएँ अभी भी अप्रकाशित हैं। इन रचनाओं में ‘भोर की किरन’, ‘सुखी कब होहिहै गाँव हमार’, ‘गाँव है हमका बहुत पियार’, ‘छाती का पीपर’ आदि अनेक लोकप्रिय कविताएँ हैं। काका के नाठकों का एक बहुत बड़ा भाग आज भी अप्रकाशित है। ‘हंस किसका है’ शीर्षक एक बालोपयोगी एकांकियों का संकलन है। यह अगर प्रकाशित हो तो बालकों के लिए बहुत महत्वपूर्ण सिद्ध हो सकता है।

वृद्धावस्था में ब्रांकाइटिस रोग से वे पीड़ित थे। अन्त में १९८२ की फरवरी में इतने बीमार हो गये कि फिर सम्हल ही नहीं पाए और अंत में १८ अप्रैल १९८२ की प्रातःकाल को उनका निधन हो गया। उनका गाँव से मोह तो था ही पर वे बहुत सुसंस्कृत नागरिक थे। साधारण रहन सहन वाले चंद्रभूषण त्रिवेदी तुलसी, गांधी और आर्यसमाज के विचारों से प्रभावित थे। उनका गाँव आर्यसमाज का गढ़ था तथा पं. प्रयागदत्त, जो वेदों के प्रकाण्ड पंडित थे, उस गाँव में रहते थे।

वे असाधारण मेधा वाले रचनाकार तो थे ही साथ में उनको लेखक, नाटककार, अभिनेता और संगीतज्ञ के रूप में भी कम सम्मान नहीं मिला। रमई काका के विपुल साहित्य की अनुपलब्धता के कारण उनके साहित्य को पढ़ने का उत्सुक एक बड़ा पाठक समुदाय अधिकांशतः अपने को हताश-निराश और निरुपाय अनुभव करता है। रमई काका के समग्र साहित्य का मूल्यांकन भी होना शेष है। रमई काका का साहित्य सर्वजन को सुलभ हो सके, इसका भी कुछ प्रयास होना चाहिए।

अवधी कविता के शिखर साहित्यकार रमई काका केवल किसानों के कवि नहीं, स्वयं भी कविता के किसान थे जिन्होंने कागज रूपी धरती पर अक्षर बीज बो कर मुस्कान और हास्य की जो फसल तैयार की है वह आज तक पाठकों को हँसाती और गुनगुनाती है।

चित्रलेखा वर्मा

चित्रलेखा वर्मा

इस शताब्दी वर्ष में हास्य के अमर कवि रमई काका के चरणों में अपना शत शत नमन निवेदित करते हुए ईश्वर से यही प्रार्थना करती हूँ कि काका की अमर कृतियों की प्रेरणा से सभी पाठकों व रचनाकारों में हँसाने की क्षमता प्राप्त हो।

(नवंबर-२०१५)