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कविता : मंहगाई (कवि वंशीधर शुक्ल)

कवि वंशीधर शुक्ल  कै नाव परिचय कै मोहताज नही है। उनकै ई  कविता ‘मंहगाई’ भाई पद्म सिंह टाइप कैके अंतर्जाल पै रखिन। उनसे हम कहेन कि यहि कविता का यहि वेबसाइट पै डारि दीन जाय, वै तैयार भये, पहिले कविता हाजिर है फिर ‘भेजवैया’ के तहत उनहिन के सब्दन मा उनके बारेम जानकारी दीन गै है। : संपादक 

कविता : मंहगाई

हमका चूसि रही मंहगाई।
रुपया रोजु मजूरी पाई, प्रानी पाँच जियाई, 
पाँच सेर का खरचु ठौर पर, सेर भरे माँ खाई। 
सरकारी कंट्रोलित गल्ला हम ना ढूँढे पाई, 
छा दुपहरी खराबु करी तब कहूँ किलो भर पाई।
हमका चूसि रही मंहगाई। 

जिनकी करी नउकरी उनते नाजउ मोल न पाई, 
खीसइ बावति फिरी गाँव माँ हारि बजारइ जाई।
लोनु तेलु कपड़न की दुरगति दारि न देखइ पाई 
लरिका घूमइं बांधि लंगोटा जाडु रहा डिड़ियाई।
हमका चूसि रही मंहगाई। 

खेती वाले गल्ला धरि धरि रहे मुनाफा खाई, 
हमरे लरिका भूखे तरसइं उइ देखइं अठिलाई। 
खेती छीने फारम वाले ट्रेक्टर रहे चलाई, 
गन्ना गोहूँ बेंचि बेंचि के बैंकइ रहे भराई। 
हमका चूसि रही मंहगाई। 

सबते ज़्यादा अफसर डाहइं औ डाहइं लिडराई,
पार्टी बंदा अउरउ डाहइं जेलि देइं पहुंचाई। 
बड़ी हउस ते ओटइ दइ दइ राजि पलटि मिलि जाई 
अब खपड़ी पर बइठि कांग्रेस हड्डी रही चबाई। 
हमका चूसि रही मंहगाई। 

ओट देइ के समय पारटी लालच देंय बिछाई 
बादि ओट के अइसा काटइं, जस लौकी चउराई। 
खेती वालन का सरकारउ कर्जु देइ अधिकाई 
हमइं कहूँ ते मिलइ न कर्जा हाय हाय हउहाई। 
हमका चूसि रही मंहगाई।

बढ़िया भुईं माँ जंगल रोपइं ताल झील अपनाई 
गाँव की परती दिहिसि हुकूमत दस फीसदी छोड़ाई। 
देखि न परइ भुम्मि अलबेली खेती करइ न पाई 
ऊसर बंजर जोता चाही चट्ट लेइं छिनवाई। 
हमका चूसि रही मंहगाई।

जो कछु हमरी सुनइ हुकूमत तौ हम बिनय सुनाई 
सबकी खेती नीकि हमइं जंगलइ देत जुतवाई। 
चउगिरदा सब राहइं रूँधी, भागि कहाँ का जाई 
कइसे प्राण बचइं बिन खाए खाना कहाँ ते लाई। 
हमका चूसि रही मंहगाई। 

सुनित रहइ जिमिदार न रहिहइं तब जमीन मिलि जाई 
अब उनके दादा बनि बइठे सभापती दुखदाई। 
खुद सब जोतइं धरती बेंचइं महल रहे उठवाई 
हम भुइंहीन सदा से, खेती हमइ न कोउ दइ पाई। 
हमका चूसि रही मंहगाई। 

हमते कहइं की की भुइं पर कब्जा लेहु जमाई 
फिरी थोरे दिन माँ पटवारी अधिवासी लिखि जाई। 
जिनकी भुइं नीके कस छोड़िहइं कबजा जउ करि पाई 
उनके लरिका हमका कोसिहइं हम बेइमान कहाई। 
हमका चूसि रही मंहगाई।

हम होई बीमार डरन माँ अस्पताल ना जाई 
हुंवउ लगि रही संतति निग्रह इंद्री लेइ कटाई। 
सुवरी कसि छाबरि अफसर की बंसु बढ़इ अधिकाई 
हमरे तीनि जनेन का देखे उनकी फटइं बेवाई। 
हमका चूसि रही मंहगाई। 

नफाखोर मेढुका अस फूलइं हमरा सबु डकराई 
थानेदार जवानी देखे पिस्टल देंइ धराई। 
जो जेत्ता मेहनती वहे के घर वत्ती कंगलाई 
जो जेत्ता बेइमान वत्तिहे तोंदन पर चिकनाई। 
हमका चूसि रही मंहगाई।

पार्टीबिंदी न्याय नीति अउ राजनीति ठगहाई 
कोऊ नहीं सुनइ कोऊ की मउत रही डिड़ियाई।
हे ईसुर यहु सिस्टम बदलउ देउ सयान बनाई 
चाटि जाउ सरकारु आजु की या चाटउ लिडराई। 
हमका चूसि रही मंहगाई। 

__  कवि वंशीधर शुक्ल

सबद-अरथ: नाउज=अनाज, दारि=दाल,डिडियाइ =चीखना, गोहूँ=गेहूं, डाहइं=तंग करना, चउराई=चौलाई, चट्ट=तुरंत, चउगिरदा=चारों ओर, रुँधी=बंद, कोसिहइं=कोसेंगे, छाबरि=झुण्ड, डकराइ=डकार जाना, हजम कर जाना, कंगलाई=कंगाली

भेजवैया : ्नाम – पद्म सिंह “मूल रूप से तहसील कुंडा प्रतापगढ़ के छोटे से गाँव काशीपुर (डेरवा के पास) से, इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक, बिजनेस और फिर UPPCL मा नौकरी। एहि के अलावा संगीत, थियेटर,लेखन और स्वयंसेवक संस्थानन मा सक्रिय रहे हमेशा। वर्तमान मा ब्लागिंग और इन्टरनेट पय अपने लेखन क धार देय और सीखय के प्रक्रिया म छोटा सा प्रयास अहय हमार ब्लॉग http://padmsingh.wordpress.com/ , http://padmsingh.blogspot.com/  ::  शुभकामनाओं सहित / पद्म सिंह 9716973262” 

 
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कविता : अछूत की होरी (कवि वंशीधर शुक्ल)

बिख्यात अवधी कवि वंशीधर शुक्ल कै जनम सन १९०४ मा भा रहा। गाँव : मन्योरा। जिला : खीरी-लखीमपुर/अवध। सुकुल जी के पिता जी कै नाव सिरी ्छेदीलाल शुक्ल रहा। छेदीलाल जी अपने समय क्यार अल्हैत रहे औ दूर-दूर ले आल्हा गावै जात रहे। कवि रहे। छेदीलाल जी कै १९१६ ई. मा असामयिक देहावसान होइ गा। बप्पा के यहि तिना काल कौलित होइ जाये से वंशीधर जी कै पढ़ायिउ-लिखाई भँवर मा पड़ि गै। इस्कूली पढ़ाई अठईं तक किहिन मुला स्वाध्याय के बलबूते संस्कृत-उर्दू-हिन्दी-अंग्रेजी कै ग्यान अर्जित किहिन। कविता करै कै सुरुआत बहुत पहिलेन से सुरू कै दिहे रहे। यहिसे कीरति आस-पड़ोस मा फैलति गै। गाँधी जी के आंदोलन मा सामिल भये। कयिउ बार जेल गये। समाजबादी रुझान कै मनई रहे। गरीबन के ब्यथा औ किसानन के व्यथा से इनकै काव्य भरा पड़ा है। ‘उठो सोने वालों सबेरा हुआ है..’ यनही कै लिखा आय। ‘उठ जाग मुसाफिर भोर भई..’ यनहीं लिखिन। वंशीधर जी लखीमपुर खीरी से बिधानसभा सदस्यौ रहे: १९५९-१९६२ मा। हुजूर केरी रचनावली ‘उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान-लखनऊ’ से आय चुकी है। अपरैल-१९८० मा आजादी केर सिपाही औ अवधी साहित्त कै अनन्य उपासक वंशीधर शुक्ल जी ७६ साल की उमिर मा ई दुनिया छोड़ि दिहिन।

हाजिर है वंशीधर जी कै कविता, ‘अछूत की होरी’।

कविता : अछूत की होरी 

हमैं यह होरिउ झुरसावइ। 
खेत बनिज ना गोरू गैया ना घर दूध न पूत।
मड़ई परी गाँव के बाहर, सब जन कहैं अछूत॥
द्वार कोई झँकइउ ना आवइ।
..हमैं यह होरिउ झुरसावइ।
ठिठुरत मरति जाड़ु सब काटित, हम औ दुखिया जोइ।
चारि टका तब मिलै मजूरी, जब जिउ डारी खोइ॥ 
दुःख कोई ना बँटवावइ।
..हमैं यह होरिउ झुरसावइ।
नई फसिल कट रही खेत मा चिरइउ करैं कुलेल।
हमैं वहे मेहनत के दाना नहीं लोनु न तेल॥
खेलु हमका कैसे भावइ।
..हमैं यह होरिउ झुरसावइ।
गाँव नगर सब होरी खेलैं, रंग अबीर उड़ाय।
हमरी आँतैं जरैं भूख ते, तलफै अँधरी माय॥
बात कोई पूँछइ न आवइ।
..हमैं यह होरिउ झुरसावइ।
सुनेन राति मा जरि गइ होरी, जरि के गई बुझाय।
हमरे जिउ की बुझी न होरी जरि जरि जारति जाय॥
नैन जल कब लैं जुड़वावइ।
..हमैं यह होरिउ झुरसावइ।
हाड़ मास जरि खूनौ झुरसा, धुनी जरै धुँधुवाय।
जरे चाम की ई खलइत का तृष्णा रही चलाय॥
आस पर दम आवइ जावइ।
..हमैं यह होरिउ झुरसावइ।
यह होरी औ पर्ब देवारी, हमैं कछू न सोहाइ।
आप जरे पर लोनु लगावै, आवै यह जरि जाइ॥
कौनु सुखु हमका पहुँचावइ।
..हमैं यह होरिउ झुरसावइ। 
हमरी सगी बिलैया, कुतिया रोजुइ घर मथि जाय।
साथी सगे चिरैया कौवा, जागि जगावैं आय॥
मौत सुधि लेइउ न आवइ।
..हमैं यह होरिउ झुरसावइ।

___कवि वंशीधर शुक्ल, रचनाकाल : १९३६ ई.

सादर/अमरेन्द्र

गजल (~कवि वंशीधर शुक्ल)

अवधी कवि वंशीधर

बिख्यात अवधी कवि वंशीधर शुक्ल कै जनम सन १९०४ मा भा रहा। गाँव : मन्योरा। जिला : खीरी-लखीमपुर/अवध। सुकुल जी के पिता जी कै नाव सिरी ्छेदीलाल शुक्ल रहा। छेदीलाल जी अपने समय क्यार अल्हैत रहे औ दूर-दूर ले आल्हा गावै जात रहे। कवि रहे। छेदीलाल जी कै १९१६ ई. मा असामयिक देहावसान होइ गा। बप्पा के यहि तिना काल कौलित होइ जाये से वंशीधर जी कै पढ़ायिउ-लिखाई भँवर मा पड़ि गै। इस्कूली पढ़ाई अठईं तक किहिन मुला स्वाध्याय के बलबूते संस्कृत-उर्दू-हिन्दी-अंग्रेजी कै ग्यान अर्जित किहिन। कविता करै कै सुरुआत बहुत पहिलेन से सुरू कै दिहे रहे। यहिसे कीरति आस-पड़ोस मा फैलति गै। गाँधी जी के आंदोलन मा सामिल भये। कयिउ बार जेल गये। समाजबादी रुझान कै मनई रहे। गरीबन के ब्यथा औ किसानन के व्यथा से इनकै काव्य भरा पड़ा है। ‘उठो सोने वालों सबेरा हुआ है..’ यनही कै लिखा आय। ‘उठ जाग मुसाफिर भोर भई..’ यनहीं लिखिन। वंशीधर जी लखीमपुर खीरी से बिधानसभा सदस्यौ रहे: १९५९-१९६२ मा। हुजूर केरी रचनावली ‘उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान-लखनऊ’ से आय चुकी है। अपरैल-१९८० मा आजादी केर सिपाही औ अवधी साहित्त कै अनन्य उपासक वंशीधर शुक्ल जी ७६ साल की उमिर मा ई दुनिया छोड़ि दिहिन।

हाजिर है सुकुल जी कै यू गजल: 

गजल (~कवि वंशीधर शुक्ल)

तनी कोई घई निहारउ तौ,

मुदी बाठइँ तनिकु उनारउ तौ।

कवनु समझी नहीं तुम्हइँ अपना,

तनी तिरछी निगाह मारउ तौ।

करेजु बिनु मथे मठा होई,

तनी अपने कने पुकारउ तौ।

कौनु तुमरी भला न बात सुनी,

बात मुँह ते कुछू निकारउ तौ।

सगा तुमका भला न को समुझी,

तनि सगाई कोहू ते ज्वारउ तौ।

हुकुम तुम्हार को नहीं मानी,

सिर्रु मूड़े का तनि उतारउ तौ।

तुमरी बखरी क को नहीं आई,

फूटे मुँह ते तनी गोहारउ तौ।

इसारे पर न कहउ को जूझी,

तनि इसारे से जोरु मारउ तौ।

बिना मारे हजारु मरि जइहैं,

तनि काजर की रेख धारउ तौ।

जइसी चलिहउ हजार चलि परिहैं,

तनी अठिलाइ कदमु धारउ तौ।

हम तुम्हइँ राम ते बड़ा मनिबा,

तनि हमइँ चित्त मा बिठारउ तौ।

(-कवि वंशीधर शुक्ल)

गिरा-अरथ: घई – ओर / बाठइँ – ओंठ / उनारउ – खोलकर / कने – समीप / ज्वारउ – जोड़ना / सिर्रु – पागलपन / गोहारउ – आवाज लगाना

~सादर/अमरेन्द्र अवधिया

कविता : “गाँधी बाबा के बिना” (~कवि वंशीधर शुक्ल)

कवि : वंशीधर शुक्ल

बिख्यात अवधी कवि वंशीधर शुक्ल कै जनम सन १९०४ मा भा रहा। गाँव : मन्योरा। जिला : खीरी-लखीमपुर/अवध। सुकुल जी के पिता जी कै नाव सिरी ्छेदीलाल शुक्ल रहा। छेदीलाल जी अपने समय क्यार अल्हैत रहे औ दूर-दूर ले आल्हा गावै जात रहे। कवि रहे। छेदीलाल जी कै १९१६ ई. मा असामयिक देहावसान होइ गा। बप्पा के यहि तिना काल कौलित होइ जाये से वंशीधर जी कै पढ़ायिउ-लिखाई भँवर मा पड़ि गै। इस्कूली पढ़ाई अठईं तक किहिन मुला स्वाध्याय के बलबूते संस्कृत-उर्दू-हिन्दी-अंग्रेजी कै ग्यान अर्जित किहिन। कविता करै कै सुरुआत बहुत पहिलेन से सुरू कै दिहे रहे। यहिसे कीरति आस-पड़ोस मा फैलति गै। गाँधी जी के आंदोलन मा सामिल भये। कयिउ बार जेल गये। समाजबादी रुझान कै मनई रहे। गरीबन के ब्यथा औ किसानन के व्यथा से इनकै काव्य भरा पड़ा है। ‘उठो सोने वालों सबेरा हुआ है..’ यनही कै लिखा आय। ‘उठ जाग मुसाफिर भोर भई..’ यनहीं लिखिन। वंशीधर जी लखीमपुर खीरी से बिधानसभा सदस्यौ रहे: १९५९-१९६२ मा। हुजूर केरी रचनावली ‘उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान-लखनऊ’ से आय चुकी है। अपरैल-१९८० मा आजादी केर सिपाही औ अवधी साहित्त कै अनन्य उपासक वंशीधर शुक्ल जी ७६ साल की उमिर मा ई दुनिया छोड़ि दिहिन।

प्रस्तुत है वंशीधर जी कै कविता ‘गाँधी बाबा के बिना’ : 

कविता : ‘गाँधीबाबा के बिना’ (लहचारी ध्वनि)

      हमरे देसवा की मँझरिया ह्वैगै सूनि,

      अकेले गाँधी बाबा के बिना। 

कौनु डाटि के पेट लगावै, कौनु सुनावै बात नई,

कौनु बिपति माँ देय सहारा, कौनु चलावै राह नई,

को झँझा माँ डटै अकेले, बिना सस्त्र संग्राम करै,

को सब संकट बिथा झेलि, दुसमन का कामु तमाम करै।

      सत्य अहिंसा की उजेरिया ह्वैगै सूनि,

      अकेले गाँधी बाबा के बिना।

अँगरेजी सासन के हटतै, आई नई विपति भारी,

तब अकेलि जिमिदारी डाहै, अब डाहै सब अँधियारी,

तब चाँदी ताँबे का सिक्का, अब कागज की भरमारी,

तब भुँइ बनी रहै साखिन की, अब अधिवासी भँइधारी।

      हमरी आसा की डगरिया ह्वैगै सूनि,

      अकेले गाँधी बाबा के बिना।

तब तौ पर्वत की मड़इन माँ, होइ न चोरी बटमारी,

अब सहरन मा कठिन जिंदगी, गली गली ठगई भारी,

डाकू लोफर खूँगर बाढ़े, सबै दिसा भै अँधियारी,

न्याय इमान सत्यता उड़िगै, जीवन जन्म भवा भारी।

      सिगरी दुनिया लागै नीरसि धुँवारि,

      अकेले गाँधी बाबा के बिना।

अकिले बाबा के उठतै खन, जानौ भारत भा खाली,

सबके भीतर संका ब्यापी, जनु धरि डहुँकी कंगाली,

कोई न्याय न बिपति सुनैया, डगमग नैया भारत की,

चारिउ वार अराजकता है, लूट फूँक स्वारथ रत की।

      जानौ परिगै सारे साँसन मा भँगारि,

      अकेले गाँधी बाबा के बिना।

(~कवि वंशीधर शुक्ल)

मँझरिया > मड़ैया / भरमारी > भरमार, अधिकता / खूँगर > कत्ल करने वाला / धुँवारि > धुवें से भरी यानी मैली / डहुँकी > गरजी / भँगारि > भाँग के नशे में मस्त 

~सादर/अमरेन्द्र अवधिया