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उमेश कुमार सिंह चौहान केर कविता-२ : काहे बुझी सोच कै बाती!

उमेश जी केर कविता कै पहिली किस्त आपके सामने आइ चुकी है। ई दुसरकी किस्त है। इन कवितन मा आज के समय कै बिसंगति, उलझाव, बेचारगी..आदि कै मार्मिक बयान कीन गा है। ग्रामभासा मा नये  उपमानन औ बिंबन  कै रचाव बहुत बढ़िया है। ओजोन-पर्त के नकसान हुवै क धरती  कै बरसाती कहि के  समझाउब जगबै है। अंतिम कविता मा सहर औ गांव के भिनसार कै तुलना कीन गै है, जेहिका पढ़े के बाद आदमी अपने तथाकथित नागर सभ्यता पै भला कौने मुंह से गुमान करै! कवितन कै आस्वाद कीन जाय! (संपादक)

कविता (१) :  काहे बुझी सोच कै बाती

काहे चेहरा है मुरझावा,
काहे बुझी सोच कै बाती?

काहे सूखैं ताल-तलैया?
काहे सूखै नदवा नाला?
काहे सूखैं आम-निबहरी?
काहे सूखै भुइंया झाड़ा?
काहे सूखै बुढ़वा बरगदु?
काहे तुम धरती का चूसेउ
मोटे-मोटे पाइप डारि कै?
काहे यहिका हिया सुखायो?
अब काहे तुम पीटौ छाती?

काहे चेहरा है मुरझावा,
काहे बुझी सोच कै बाती?

काहे गायब भईं गौरैया?
काहे गायब हरहा-गोरू?
काहे गीध-चील भे गायब?
काहे गायब जल ते मछरी?
काहे गायब भईं बटेरैं?
काहे रोवैं मोर-पपीहा?
काहे सिसकैं कोयल-मैना?
काहे जहरु भरेउ कन-कन माँ,
फारेउ धरती कै बरसाती?

काहे चेहरा है मुरझावा,
काहे बुझी सोच कै बाती?

काहे जोति लेहेउ गलियारा?
काहे माली बागु उजारा?
काहे इरखा माँ डूबे सब
काहे म्याड़ैं खायं ख्यात का?
काहे ग्वाबरु-कंडा गायब?
काहे पांसि नहीं झौआ भरि?
काहे अन्नु रसायन बोरे?
काहे होरी के रंग फीके?
नहीं देवारी हमैं सोहाती?

काहे चेहरा है मुरझावा,
काहे बुझी सोच कै बाती? 

कचिता (२) : उनका हालु न पूछौ भैया

उइ पैदा तौ भे रहैं हिंयै
गाँवैं कै कौनिउ सौरि माँ
तेलु-बाती कै उजेरिया माँ
उइ पले-बढ़े रहैं हिंयै
माटी माँ लोटि-पोटि,
भैंसिन का दूधु-माठा
भूड़न के बेर-मकोइया
ओसरिन कै गुल्ली-डंडा
पतौरिन कै लुका-छिपी
अंबहरी कै लोय-लोय
निम्बहरी का सावन-झूला
अरहरिया कै रासु-लीला
दुपहरिया के तास-पत्ता
कैसे बिसराय सबै
उइ ब्वालै लागि अंगरेज़ी
उइ बसे नई दुनिया माँ
उइ रोमु-रोमु बदलि गए
बहुतन के भाग्य-विधाता भे
अबु उनका हालु न पूछौ भैया।

उइ कबौ-कबौ आवति हैं
गर्दा ते मुँहु बिचकावति हैं
पत्नी का नकसा औरु बड़ा
अमरीकी फैशनु खूबु चढ़ा
लरिकन का हिन्दिउ ना आवै
अंगरेजिउ उच्चारनु दूसर
उनका स्वदेसु अब ना भावै
उनकै पैदाइस हुँवै केरि
उनका स्वदेसु अमरीकै भा
देवकी माता जस भारत है,
चाहत माँ कौनिउ कमी नहीं
स्कूलु गाँव माँ खोलि दिहिन
लरिका अंगरेज़ी सीखि रहे
कम्प्यूटरु माँ सीडी ब्वालै
उच्चारनु सीखैं अमरीकी
उनकी इच्छा अब याकै है
अमरीका माफ़िक बनै गाँव
लेकिन अंगद का पांव गाँव
यहु जहाँ रहै, है जमा हुँवै
उइ येहिके लिए बहेतू भे
परदेसी भे, उपदेसी भे,
अबु उनका हालु न पूछौ भैया।

कविता (३) : जउनी गली जाऊँ

जउनी गली जाऊँ, आगि  बरसै मुलुक मां ।

गंगा की धार, रावी, सतलुज की धार मां,
ब्रह्मपुत्र, कृष्णा, कावेरी कछार मां,
इरखा बढ़ी है, खूनु बरसै मुलुक मां ॥

मनई का भारी होइगै, मनई कै देहिया,
लोग भे बनैले, बनु होइगै सारी दुनिया,
जुलुम की आंच द्याहैं झरसैं मुलुक मां ॥

अल्ला, राम बिहंसैं रकतु बरसाए ते,
वाहे गुरू खुश होएं अरथी चढ़ाए ते,
दानवी क्रिया ते देव हरसैं मुलुक मां ॥

पेमु गा बिलाय, सुखु गुलरी का फूलु भा,
धरमु, करमु सबु गुलरी का फूलु भा,
घर के घरौआ बिसु परसैं मुलुक मां ॥

कविता  (४) : शहर कै सुबह बनाम गांव का भोरु 

शहर कै सुबह बड़ी संगीन,
गांव का भोरु बड़ा रंगीन ।

सुरुज आँखी फैलाए ठाढ़,
लखै मनइन कै अदभुद बाढ़,
गली-कूंचा हैं येतने तंग,
हुवां रवि कै है पहुँच अपंग,
सबेरहे हार्न उठे चिल्लाय,
मील का धुवां सरग मंडराय,
जिन्दगी भाग-दौड़ मां लीन,

शहर कै सुबह बड़ी संगीन ॥

सुरुज कै लाली परी देखाय,
बिरछ सब झूमि उठे इठलाय,
कोयलिया रागु सुनावै लागि,
बयरिया तपनि बुझावै लागि,
नदी-तट चहकैं पक्षी-वृन्द,
फिरैं सब लोग बड़े स्वच्छंद,
जिन्दगी प्रेम-सुधा मां लीन,

गांव का भोरु बड़ा रंगीन ॥

सभ्यता उड़ै पंख फैलाय,
कृत्रिमता अंग-अंग दरसाय,
जहाँ पानी तक म्वाल बिकाय,
प्रदूषित वातावरण देखाय,
जहाँ छल-छंदु मचावै रंग,
प्रकृति ते होय नित हुड़दंग,
फिरै सारा समाजु गमगीन,

शहर कै सुबह बड़ी संगीन ॥

किसनवा हर ते धरती फारि,
लाग अमिरुत कै करै फुहार,
हरेरी चूनरि धरती धारि,
किहिसि सब गांवन का सिंगारु,
सुंगन्धै भरिन जंगली लता,
हृदय हुलसायिसि कंचन-प्रभा,
प्रकृति निज सुंदरता मां लीन,

गांव का भोरु बड़ा रंगीन ॥
*** ***

कवि-परिचय : इन कवितन क लिखै वाले कवि उमेश कुमार सिंह चौहान मूल रूप से लखनऊ-अवध से ताल्लुक रखत हैं। यै १९८६ से भारतीय प्रशासनिक सेवा के केरल कैडर के तहत कार्यरत अहैं। यै १९९३-९४ मा जापान सरकार द्वारा आयोजित ‘शिप फॊर वर्ड यूथ’ मा भारतीय जवानन के दल कै नेतृत्व किहिन। यै केरल औ भारत सरकार कै प्रतिनिधि बनिके यू.एस.ए., यू.के., जापान, जर्मनी, स्विटजरलैंड, ग्रीस, यू.ए.ई., सिंगापुर स्रीलंका, मालदीव….आदि देसन कै यात्रौ किहिन। यहि साइत नई दिल्ली मा केरल सरकार के रेजीडेंट कमिस्नर के रूप मा तैनात अहैं। उमेश जी खड़ीबोली-हिन्दी के वर्तमान कविता परिदृश्य कै बड़ा नाम है अउर इनकै कयिउ पुस्तक आय चुकी अहैं। हुजूर कयिउ सम्मानन से नवाजा जाय चुका हैं। इनसे आप umeshkschauhan@gmail.com पै संपर्क कै सकत हैं। मोबाइल नं. है  +91-8826262223

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उमेश कुमार सिंह चौहान केर कविता-१ : भारत भुइं तुम्है बोलाय रही!

कवि उमेश जी से हमैं सात कवितन कै प्राप्ति कुछ रोज पहिले भै रही। सब कवितै सुंदरि हैं, सबमा कथ्य की ताजगी के साथ रूप(फोर्म) कै सधाव बड़ा बढ़िया अहै।  इन सात कवितन का दुइ पोस्टन मा रखै कै योजना है, जेहिके तहत पहिले स्वाधीनता – बर्तमान मा यहिके अरथ अउर आसय – क केंन्द्र मा रखत कवितन क प्रस्तुत कीन गवा है। यहिके बाद दुसरी पोस्ट मा दुसरे मनो-मिजाज कै कविता रहे। (संपादक)

कविता (१) : म्वार देसवा हवै आजाद

म्वार देसवा हवै आजाद,
हमार कोउ का करिहै ।

कालेज ते चार-पाँच डिग्री बटोरिबै,
लड़िबै चुनाव, याक कुरसी पकरिबै,
कुरसी पकरि जन-सेवक कहइबै,
पेट्रोल-पंपन के परमिट बटइबै,

खाली गुल्लक करब आबाद ॥
हमार कोउ का करिहै ।

गाँधी रटबु रोजु आँधी मचइबै,
किरिया करबु गाल झूठै बजइबै,
दंगा मचइबै, फसाद रचइबै,
वोटन की बेरिया लासा लगइबै,

फिरि बनि जइबै छाती का दादु,
हमार कोउ का करिहै ॥

संसद मां बैठि रोजु हल्ला मचइबै,
देसी विदेसी मां भासनु सुनइबै,
घर मां कोऊ स्मगलिंग करिहै,
कोऊ डकैतन ते रिश्ता संवरिहै,

धारि खद्दर बनब नाबाद,
हमार कोउ का करिहै ॥

बहुरी समाजवाद जब हम बोलइबै,
आँखिन मां धूरि झोंकि दारिद छिपइबै,
भारत उठी जब-जब हम उठइबै,
भारत गिरी जब-जब हम गिरइबै,

कोऊ अभिरी करब मुरदाद,
हमार कोउ का करिहै ॥

कविता (२) :  भारत भुइं तुम्है बोलाय रही 

भारत भुइं तुम्है बोलाय रही, ना रुकौ ठिठुकि अब बढ़े रहौ ।
झाखरु कटिगा मुलु ठूंठु ऐसि, अब ना ख्यातन मां खड़े रहौ ॥

सोने कै चिड़िया माटी भै, कुछु मति हमारि अस काटी गै,
सत मंजिला कै बसि नींव सुनौ खाली बरुआ ते पाटी गै,

ढहि गईं मंजिलै अलग न तुम निचली मंजिल मां पड़े रहौ ॥
… … ना रुकौ ठिठुकि अब बढ़े रहौ ।

भुइं मोरि चंदरमा ऐसि रहै, मुलु राहु-केतु सब गांसि लिहिन,
परदेसी चतुर चिरैयन का चुपके लासा मां फांसि लिहिन,

अब इधर बढ़ौ या उधर बढ़ौ, ना चौराहे पर खड़े रहौ ॥
… … ना रुकौ ठिठुकि अब बढ़े रहौ ।

तुम्हरे असि जूनन के द्वारा जो मानवता का बोझु बंधा,
वहु छूटि बिथरि गा मुला तबौ जूना अस ऐंठबु तुम्हैं सधा,

चिलवलि की तितुली जैसे तुम ना हवै हवा मां उड़े रहौ ॥
… … ना रुकौ ठिठुकि अब बढ़े रहौ ।

मंगता कुबेर के लरिका भे, हथिनी के पैदा मूसु भवा,
उइ कांटा पांयन सालि रहे जिनके बेरवा हम खुदै बोवा,

बिनु मढ़े ढोलकिया ना बाजै सो बार-बार तुम मढ़े रहौ ॥
… … ना रुकौ ठिठुकि अब बढ़े रहौ ।

तुम पांच रहौ अब अनगिनतिन, च्यातौ अब तत्व बिचारि लेव,
अपनत्व छूटि गा दुनिया ते, अब आपन स्वत्व संभारि लेव,

तुम गदहा, घोड़ा के संकर, खच्चर पर अब ना चढ़े रहौ ॥
… … ना रुकौ ठिठुकि अब बढ़े रहौ ।

तुम का कुपंथ कै अमरबेलि हरियर बेरवा असि झुरै दिहिसि,
मेहनति तुम्हारि सब फुरि होइगै, बिसु भरा घाव कोउ दुखै दिहिसि,

अब सजग होउ ना माटी के माधौ बनिकै तुम परे रहौ ॥
… … ना रुकौ ठिठुकि अब बढ़े रहौ । 

कविता (३) : पन्द्रह अगस्त का भारत मां

कबहूँ सूखे माँ झूमि मेघ जस सूपन जलु ढरकावत है,
पन्द्रह अगस्त का भारत मां वैसन आजादी आवत है ।

कहुँ झूरा परिगा ख्यातन माँ, कहुँ कुरिया बहिगै बहिया माँ,
असि कीमति वहिकै घटी मनौ लगि राहु-केतु गे रुपया माँ,
जिनका हम समझा कर्णधार, उइ करनी करि घरु भरै लागि,
गांधी-नेहरू कै कसम खाय , व्यापार वोट का करै लागि,

जैसे घनघोर अँधेरिया माँ जुगनू प्रकाश फैलावत हैं,
पन्द्रह अगस्त का ………।

मनई का मनई चूसि रहा, कुछु इरखा-दोखु ऐस बढ़िगा,
जस मेझुकी किरवा लीलत है, मेझुकी का  साँपु चट्ट करिगा,
दुमुही असि जिम्मेदार हियां, जिनका बसि दौलत प्यारी है,
जेतना आगे वोतनै पीछे, इनकै कुछु हालति न्यारी है,

जैसे चम्पा कै झूरि कली सारी बगिया महकावति है,
पन्द्रह अगस्त का ………।

सबु कीन धरा माटी मिलिगा, छल-छंद क्यार रोजगारु चढ़ा,
जस काटे ते हरियाय दूब, वैसय दुइ नम्बरदार बढ़ा,
घर मां अभियान चला अस की, आबादी मां खुब रंग सजे,
जैसे ई पैंसठ बरसन मां, नब्बे करोड़ देवता उपजे,

जैसे चौराहे पर कबौ-कबौ हरि गाड़ी बिरिक लगावत है,
पन्द्रह अगस्त का ………।

अब ‘चंद्रयान’ पूजौ लेकिन पूंजिव का तो कुछु ख्याल करौ,
जो कर्जु चढ़ा हरि मूड़े पर, वोहिका तो तनिक मलाल करौ,
अंग्रेजन यहिका खुब चूसा, दुइजहा देशु यहु भारत है,
परि जाई ज्यादा बोझु अगर, तौ यहिका मरबु यथारथ है,

जैसे स्वाती की बूँदिन ते पपिहा निज प्यास बुझावत है,
पन्द्रह अगस्त का ………।

***  ***

कवि-परिचय : इन कवितन क लिखै वाले कवि उमेश कुमार सिंह चौहान मूल रूप से लखनऊ-अवध से ताल्लुक रखत हैं। यै १९८६ से भारतीय प्रशासनिक सेवा के केरल कैडर के तहत कार्यरत अहैं। यै १९९३-९४ मा जापान सरकार द्वारा आयोजित ‘शिप फॊर वर्ड यूथ’ मा भारतीय जवानन के दल कै नेतृत्व किहिन। यै केरल औ भारत सरकार कै प्रतिनिधि बनिके यू.एस.ए., यू.के., जापान, जर्मनी, स्विटजरलैंड, ग्रीस, यू.ए.ई., सिंगापुर स्रीलंका, मालदीव….आदि देसन कै यात्रौ किहिन। यहि साइत नई दिल्ली मा केरल सरकार के रेजीडेंट कमिस्नर के रूप मा तैनात अहैं। उमेश जी खड़ीबोली-हिन्दी के वर्तमान कविता परिदृश्य कै बड़ा नाम है अउर इनकै कयिउ पुस्तक आय चुकी अहैं। हुजूर कयिउ सम्मानन से नवाजा जाय चुका हैं। इनसे आप umeshkschauhan@gmail.com पै संपर्क कै सकत हैं। मोबाइल नं. है  +91-8826262223