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पाहीमाफी [७] : परदेसी कै चिट्ठी-पाती

आशाराम जागरथ रचित ग्रामगाथा ‘पाहीमाफी’ के  “पहिला भाग” ,  “दुसरका भाग”  , तिसरका भाग , चौथा भाग , पंचवाँ भाग , ६-वाँ भाग , के सिलसिले मा हाजिर हय आज ई ७-वाँ भाग:

‘पाहीमाफी’ अब काफी उठान पै आइगा बाय। जे रचना से लगातार जुड़ा होइहैँ ते जानत होइहैं कि जौन हियाँ अहै ऊ अन्तै नाहीं। कयिउ उत्साह बढ़ावै वाली टिप्पनिउ मिलति अहयँ। आज हम ऐसनै यक टीप का हियाँ रखित अही, जेहिमा पाहीमाफी के रचनात्मक खूबी का हिगारा गा अहय:
capture-20170319-125648         “बहुतै गंभीर विवेचना क माँग करत है आशाराम जागरथ जी कै इ छोटी सी कविता। ई बतावत है कि ऊँच-नीच, भेद-भाव अउर छुआछूत के जवन धारा हमरे सब के निजी जीवन औ संस्कृति के करिखा अउर जहरीली कीचड़ से बोरत हजारन साल से बहत जात बा, ओकर अंत करै के समय नजदीक आवत बा। एतना गनीमत रहे प्रकृति के कि जेकरे कपड़ा-लत्ता , घर-दुआर के बोरत ई गंदगी के धारा बहावे क जतन किहा गा ओकर कपड़ा गंदा होइ गा मुदा ओकर हृदय बिलकुल साफ सोना एस रहि गा, अउर जे आपन कपड़ा साफ चमाचम राखे खातिर गंदगी दुसरे के तरफ बहाएस ओकर हृदय गंदगी अवर बदबू के घर होइ गा। पाहीमाफी के ई सब कविता कुसुम ओही कीचड़ आ गंदगी के दर्द के बयान हौ। अउर एहि बात के सबूत हौ कि कल जब नये भारत के निर्माण में एही कीचड़ वाले हाथ जुटिहैं तो जौने कुसुम के सुगंध से दिशा दिशा महकी ऊ गंध अब से पहले केहू के नसीब ना रही। जागरथ जी के बहुत बहुत बधाई कि आपन गांव अउर गांव के खुशबू अपने भीतर जिआये हएन।” (टीप-कार : ओमप्रकाश मिश्र

आज जवन अंक हियाँ रखा जात अहय वहिमा रचनाकार अपने चिट्ठी-लिखायी कय अनुभव बाँटे अहय। चिट्ठी के माध्यम से भीतरखाने कय ऊ सच आवा अहय जेहका बहुत कमै देखा गा अहय। रचनाकार कय निजी अनुभव हुवय के कारन बात बहुत पते पै बैठत चली गय हय। ई समझौ कि चिट्ठी लिखी गय है आपके दिलो-दिमाग मा सनेस पहुँचेक्‌ ताईं। : संपादक 
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  • परदेसी कै चिट्ठी-पाती

काहे गुलरी कै फूल भया
लागत बा रस्ता भूलि गया
बहुतै दिन बाद भेटान्या है
का हो काका ! तू भले हया
बोले, कुलि हाल ठीक बाटै
बचि गयन बेमारी से ज़िंदा
अपने घर सुखी हईं बिटियै
यकठू बेटवा कै बा चिंता
सोचिअ थै अबकी पठय देई
कुछ जाय कमाय बम्बई मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

परदेसी परदेस कमायं
लौटैं गाँव बघारैं सान
लाल अँगोछा मूड़े बान्हें
लिहें रेडियो अइठें कान
नई साइकिल, लाल रुमाल
दांत मा सोना, मुँह मा पान 
बम्बहिया लाठी कान्हें पै
विरहा गावैं टेरे तान
तहमद-बंडी पहिर कै घूमैं
चमकै घड़ी कलाई मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

कच्छा तीनै मा पढ़त रहेन
कागज़–पाती सब बचवावैं
पाई न पकरि कलम ढंग से
तब्बौ सब चिट्ठी लिखिवावैं
मुल काव करैं वनहीं सबहीं
पढ़वइया गाँव मा कमै रहे
जे रहा तनी बड़वरकन मा
छोटवरकै जात डेरात रहे
घर आवैं मेल-मेल मनई
भिनसारे–संझा–राती मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

खत लिखा सिरी उपमा जोगे
कि हियाँ पै सब कुछ कुसल बाय
ईस्सर से नेक मनाई थै
वंहकै नीकै उम्मीद बाय
आगे कै हो मालूम हाल
कातिक मा करिया जात हये
वनके हाथे कुछ सर-समान
पइसा–कौड़ी बाटी पठये
पंहुचिहैं तौ जाय कै लइ आयू
वकरे ना रह्यू भरोसे मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

करिया-करिया धगरिन काकी
पहुँचीं लइकै यक पोसकाड
बेटवा कमात बा डिल्ली मा
थोरै मा लिखि द्‌या हाल-चाल
बिचकावत मुंह वै देखि लिहिन 
बोलिन अच्छा हम जाई थै
तू पढ़ा–लिखा बाट्या बचवा !
तब्बै चिट्ठी लिखिवाई थै
हम कहेन बिहान इतवार हुवै
निस्चिंते आयू छुट्टी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

चिट्ठी लिखवावै यस बइठिन
झौवा भै गऊवाई गावैं
आंसू पै आंसू बहा जाय
बोलत–बोलत रोवै लागैं
“हाँड़ी–गगरी ठन-ठन गोपाल
अपुवां कामे नाहीं जाते
पंडित कै लरिका मारे बा
घर हीं लंगड़ात चलत बाटे
कुछ पइसा जल्दी भेजि दिहा
यक्कै धोती बा देहीं मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

जूड़ी बोखार हमरे बाटै
लिखि द्‌या बाकी ठीकै बाटै
भैं’सिया बियानी बा पड़िया
गइया बिकात नाहीं बाटै
सुरसतिया सरियारिग होइ गै
कसि मा नाहीं बाटै हमरे
अब वोकर गवन जरूरी बा
निबकावै क् बा निबरे-पतरे
समधी अबकी मागैं अइहैं
तौ मान जाब हम अगहन मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

पकरे हाथे अन्तरदेसी
मुस्की मारैं नइकी भउजी
चुप्पे अइसन पाती लिखि द्‌या
घर भागा आवैं परदेसी
लिखि द्या कि बहुत अगोरी थै
ससुरे मा नाहीं लागै मन
दस दिन कां ताईं आइ जायँ
नाहीं, चलि जाब नइहरे हम
बुढ़ऊ कै मुंह फूला बाटै
मनिआडर पाइन देरी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

लिखि द्‌या घर कां जब्बै आया
खुब नीक-नीक साड़ी–साया
अन्दर वाली दुइ ठू बंडी
यक लाल लिपिस्टिक लइ आया
सेंनुर औ’ टिकुली ना लइहैं
बस क्रीम-पाउडर लइ अइहैं
महकौवा साबुन यक दरजन
पाये पइहैं तौ लइ अइहैं
यक बहुत खुसी कै बात बाय
लेकिन लिखिबै ना पाती मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

चिट्ठी न केहू कां दिखलाया
ना सास-ससुर कां बतलाया
धइ ल्या किताब के बीचे मा
सीधे डाखाना लइ जाया
वै खड़ी–खड़ी अँगिरायं बहुत
बोलिन अच्छा अब जात हई
चुप्पै बिहान हम दइ जाबै
यक कलम नीक कै धरे हई
माई बोलिन हरजाई बा
ना आया यकरे बाती मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

भउजाई कै गदरान गाल
हथवा-गोड़वा कुल लाल-लाल
बोलैं तौ मुंह से फूल झरै
पायल झनकावत चलैं चाल
चिट्ठी लिखवाइन तब जानेन
अंदरखाने कै बुरा हाल
पहिले खुब छटकत चलत रहीं
अब तौ बिलकुल भीगी बिलार
बैरंग वै पाती लिखवावैं
पइसा नाहीं जब जेबी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

छोटकना पढ़ै नाहीं जातै
बड़कनी सयान हुवत बाटै
गोहूँ सीचै ताईं पइसा
फूटी कौड़ी नाहीं बाटै
घर कै बटवारा भवा बाय
यक ठू पाये बाटी कोठरी
बाटै वोरान रासन-पानी  
कुछ पइसा भेज दियौ जल्दी
बड़कऊ कै नीयत बिगड़ी बाे
वै बहुत सतावत हैं हमकां
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

लेकिन तू फिकर न किह्यौ कभौं
दहकच्चर-करकच झेल लियब
जिउ-जान से ठान लिहे बाटी
लरिकन ताईं अब जियब-मरब
दीवार फोरि कै रहत हई
कोठरी मा दरवज्जा नाहीं
बस साल-खांड़ दिन काटै क् बा
यहि घर मा अब रहिबै नाहीं
माटी कै भीत उठाइब हम
सरिया के बगल जमीनी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

लिखि द्‌या भइया कसि कै लिखि द्‌या
लिखि द्‌या कि जल्दी आइ जांय
अम्मा बीमार अवाची हैं
गटई बोलअ थै सांय-सांय
हम अपने घर लइ आयन हैं
बड़कऊ की वोरी रहत रहीं
अब चला-चली कै बेरा बा
कुच्छै दिन कै मेहमान हईं 
आवा मुंह देखि लिया जीतै
अटका परान बा तूहीं मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा.

__आशाराम जागरथ

[जारी….]

पाहीमाफी [६] : तीज-तिउहार (होली)

आशाराम जागरथ रचित ग्रामगाथा ‘पाहीमाफी’ के  “पहिला भाग” ,  “दुसरका भाग”  , तिसरका भाग , चौथा भाग , पंचवाँ भाग के सिलसिले मा हाजिर हय आज ई ६-वाँ भाग:

ई भाग तिउहार क लयिके रचा गा बाय। होरी क लयिके। होरी के सिलसिले मा जे होलियात हय ऊ बहुत कमय सोचत होये कि समाज कय यक हिस्सा हय जौन होरिउ जेस खुसी कय तिउहार नाहीं मनाय सकत। वहिका कब्बौ ई मौका नाहीं मिला कि सबके साथ वहू जिंदगी के रंग मा रँगि सकय। भेदभाव वाली बेवस्था उल्लासौ मा भेदभाव बनाये रहत हय। मतलब पूरी जिंदगी दुख कय, अपमान कय, जिल्लत कय, दूसर नाव बनी रहय। ‘अछूत की होरी’ लिखत के १९३६ मा वंसीधर सुकुल लिखे रहे:

खेत बनिज ना गोरू गैया ना घर दूध न पूत।
मड़ई परी गाँव के बाहर, सब जन कहैं अछूत॥
द्वार कोई झँकइउ ना आवइ।
..हमैं यह होरिउ झुरसावइ। 

हियाँ आसाराम जागरथ विस्तार से ‘भोगे सच’ क रखे अहयँ। कयिसे दूसर जाति वाले खुसी-उल्लास के मौके पै ई महसूस करावत हयँ कि ‘ई तुहुँहा नाहीं चाही।’

पढ़ा जाय ई भाग। साथे बना रहा जाय रचना के। आपनि राइयु बतावा जाय। : संपादक
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  • तीज-तिउहार (होली)

लइकै उपरी-करसी- कंडा
छोटका- बड़का, लोहरी-लरिका
फागुन म बसन्त पञ्चमी के दिन
गाडैं रेंड़, बनावैं होलिका
उखुड़ी औ आमे कै पाती
सरपत-झाँखर- टिलठा-रहँठा
ढोय- ढाय सब ढूह लगावैं
ऊँचा खूब सजावैं होलिका
बाजै ढोलक रोज ढमाढम
गाना गावैं राती मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

होलिका जरै चाँदनी रात
ऊँची लपटि उठै आकाश
सन्नाटे मा दहकै आग
देहियाँ चुन-चुन लागै आँच
भूज-भाज गोबरे कै छल्ला
गुहि कै, जौ के पेड़ कै बल्ला
सब अपने घर मा लइ आवैं
दरवाजा ऊपर लटकावैं
बोलैं जय होलिका माई कै
फूकैं वन्हैं आगी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

कुछ लरिकै, कुछ बूढ़-ज़वान
सबकै सब दिन भै बौरांय
गावैं कबिरा सा-रा-रा-रा
तनिकौ ना झेपैं, सरमांय
जवन-जवन गारी गरियावैं
केउ मेहरारू सहि न पावैं
कबहुं-कबहुं पंडोहे क पानी
कीचड़-गोबर मारि भगावैं
खीस निपोरे, दांत चियारे
हँसैं लोग मन ही मन मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

जेकरी खेती ऊ बलवान
रहै गाँव कै ऊ धनवान
बाभन-ठाकुर- बनिया के घर
पाकै नीक-नीक पकवान
मेंड़ुवा कै लपसी, गुलबरिया
बनै सोहारी औ दलभरिया
आलू कै पापड़, रसियाव
बरिया अउर फुलौरी-गोझिया
पौनी-परजा खाना पावैं
थरिया भै तिउहारी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

घूमि-घूमि नाचैं सब गावैं
बीच म ढोलिहा ढोल बजावैं
चमरौटी कां छोड़ि कै बाकी
घर-घर जाइ कै फगुआ गावैं
वनकै लरिकै घूमैं साथे
पितरी कै पिचकारी हाथेे
हमरे घर ना रंग-अबीर
टीका काव लगावै माथे
माई बोलिन सेंनुर लइ जा
के देखत बा राती मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

यक साल ‘अबीर’ कै सौक चढ़ा
मांगेन दुई पइसा अइया से
बोलिन जा ! थोरै मांग लिया
बम्बहिया वाले भइया से
हरियर ‘अबीर’ जब पाय गयन
फूटै मन लड्डू अजब-गजब
‘पंडित जी हमैं पढ़ावत हैं
वनकै हम आसिरबाद लियब’
सोचिहैं हमार ई सिस्य हुवै
कम से कम मानअ थै हमकां
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

पुड़िया मा धरे ‘अबीर’ रहेन
पंडित जी राही मिलिन गये
हम हाथ जोरि पैलगी किहेन
बिन बोले वै आसीस दिहे
जब चलेन अबीर लगावै कां
सोचेन मुराद अब मिलि जाई
झट ‘बाभन-माथा’ झिटिक दिहिन
बोले ‘तुहंका नाहीं चाही’
आपन मुँह लइकै खड़ा रहेन
बहुतै देरी तक राही मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा.

__आशाराम जागरथ

[जारी….]

पाहीमाफी [५] : विद्या-विद्यालय-छूतछात

आशाराम जागरथ रचित ग्रामगाथा ‘पाहीमाफी’ के  “पहिला भाग” ,  “दुसरका भाग”  , तिसरका भाग , चौथा भाग , के सिलसिले मा हाजिर हय आज ई ५-वाँ भाग:     16838136_1774772422548857_416297774_n

  • विद्या-विद्यालय-छूतछात

ज्यादा ना गुन गावा साथी
अपने आँखी देखे बाटी
पेड़े-पालव कै जात हुवै पर
मनई मा बस यक्कै जाती
मुला काव कहै अध्यापक कां
स्कूल म जाति कै जड़ खोदैं
ठाकुरे कां वै ‘बावू साहब’
बाभन कां ‘पंडित जी’ बोलैं
सब कहैं ‘मौलवी’ मुसलमान कां
‘मुंशी’ बाकी जाती कां
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

जो जाति-पाँति कै ज़हर रहा
कुलि इस्कूलेन मा भरा रहा
जे पढ़त रहा वोकरे माथे पै
ऊँच-नीच भी लिखा रहा
देखतै हमकां छाती फाटै
तिरछी आँखी रहि-रहि ताकै
‘हमरे बेटवा के बगल बइठ
ई धोबिया सार पढ़त बाटै’
वै तौ कहि कै बस खिसिक लिहिन
यक तीर लाग हमरे दिल मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

देखा यक दिन कि हद होइ गय
कलुवा चमार कै भद पिटि गय
अँजुरी से पानी पियत रहा
यक उंगुरी लोटा मा छुइ गय
कछ्छा दुइ मा ऊ पढ़त रहा
दुनिया-समाज से सिखत रहा
इस्कूले मा हल्ला होइ गय
कि जान-बूझ कै छुवत रहा
झाऊ कै डंडा घपर-घपर-घप
सिच्छा पाइस पीठी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

खुब सुबुक-सुबुक कलुवा रोवै
रहि-रहि मुँह हाथे पोछि लियै
लइकै तख्ती- झोरा-बोरा
पेड़े के नीचे खड़ा रहै
रोवत-सोवत फिर जाग गवा
जइसै कि रस्ता पाय गवा
यक ढेला जोर से पटक दिहिस
औ भूईं थुकि कै भाग गवा
वहि दिन के बाद से ना देखा
वोकाँ कउनौ इसकूले मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

जे जहाँ रहा ऊ वहीँ खड़ा
आतंकी लोटा रहा पड़ा
पिपरे कै चैली बीन-चून
सब ढूह लगाइन बहुत बड़ा
खुब नीक आग दहकाय लिहिन
डंडा से लोटा डारि दिहिन
जब लाल-लाल लोटा होइ गय
बाहर निकारि ठंढाय लिहिन
यक बड़ी समिस्या दूर भवा
जंग जीत लिहिन मैदाने मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

पूछैं सवाल देखैं जब भी
पावैं जवाब वै सही-सही
तब सीधे मुँह बोली बोलैं
केतनौ पढ़बा रहिबा धोबी
जियरा मा सीधै तीर लगै
हम मन मसोस चुप रहि जाई
माई बोलिन यक काम करा
अबसे ना दिहा जवाब सही
नाहीं तौ अइसन नज़र लगी
कि लागी आग पढ़ाई मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

खेतिहर ठकुरे कै यक लरिका
खुद पढ़ै न पढ़ै दियै हमकां
यक दिन कसि कै झगरा होइ गै
बोलिस बाहर पीटब तुंहकां
समझअ थ्या काव तू अपुवां कां
मुंह लाग्या न हम जाईअ थै
जेतना तोहार औकात बाय
वतनां तौ दारू पी लीअ थै
हम रहेन डेरान घरे आयन
माई समझाइन तब हमकां
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

कहूँ से आवत रहा करेठा
हमसे बोला कहौ बरेठा
पढ़ि लेबा के कपड़ा धोई
फांदौ ना किस्मत कै रेखा
बोलेन हम बोली बोलत हौ
जो कहत हया ऊहै करिबै
दस बिगहा खेत नावं लिख द्या
आजै से हम नाहीं पढ़िबै
ऊ बोला बहुत चलांक हवा
अंगारा तोहरे बाती मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

दादा कहैं कि चला घाट पै
बइठा हया बना धमधूसर
तबौ सवेरे करी पढ़ाई
कउनौ काम करी ना दूसर
माई  तब वन्हैं समझावैं
बहुत काम बा वकरे ऊपर
करै द्या वोकां जवन करत बा
गठरी धइ द्या हमरे ऊपर
काम करे के वोकर संती
के जाई  इसकूले मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

तू लिहें किताब खाट तूरा
औ’ काम करैं बूढ़ी-बूढ़ा
खबवा बनि कै तइयार भये
कूँड़ा यस पेट भरा पूरा
पहिरै कां नीक-नीक चाही
काटी उँगरी मुत त्या नाहीं
नोखे मा हया पढ़ैया तू
देहियाँ धुनियात तोर नाहीं
आगम देखात बाटै हमकां
सूअर पलबा तू घारी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

पँचवां दरजा जब पास किहेन
माई कै चेहरा खिला-खिला
बोलिन मेहनत से खूब पढ़ा
औ गाँव छोड़ि बाहर निकरा
यहि गाँव म काव धरा बाटै
सीधे कै मुँह कूकुर चाटै
खेती ना धन-दौलत-पूँजी
खाली गँहकिन कै मुँह ताकै
पढ़ि-लिखि लेत्या दिन बहुरि जात
उजियार हुअत हमरे कुल मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

पढ़वइया नीक रहा साथी
जाती मा नीचे से अछूत
पहिरे फटही जन्घिहा-आगाँ
सथवैं उ जाय रोज इस्कूल
बोला अब कइसै काव करी
गवने आई  बाटीं मेहरी
कच्छा नौ नाहीं पास किहेन
गटई ठेंकुर कै फाँस परी
जिउ कै खंइहस–कपछई बहुत
बाटैं घनघोर गरीबी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

माई तोहार दुलरुवा लरिका
पढ़ी न अबसे लइ ल्या बस्ता
लावा परसा खाना खाई
आज दिमाग बहुत बा खट्टा
कागज़-कलम कां पइसा नाहीं
देहीं ढंग कै कपड़ा नाहीं
बाभन-ठाकुर रहत हैं अइंठे
काव करी घर बइठे-बइठे
जाबै हम परदेश कमाय
आग लगै हरवाही मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

माई रोवैं कहि ना पावैं
अपने शकि भै खुब समझावैं
सोचत रहेन कि पढ़ि-लिखि लेबा
जिनगी  नाहीं  होई  रेंगा
बाप कहैं कुछ करै क चाही
कब तक करिबै हम हरवाही
मुन्नी बोलिस भइया जाया
हम्मै ताईं खेलौना लाया
ठौरिग होय कै सोच लिया तू
दुविधा ना पाल्या मन मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

भिनसारे यक दिन उड़ी हवा
‘तेजू खां’ चुप्पे भाग गवा
मेहरारू घूंघुट मा सुसकै
महतारी बोलै गजब भवा
केव कहै कि लरिका रहा नीक
परदेश चला गै भवा ठीक
पढ़वइया बनत रहे सरऊ
अब जाय क् मागयँ हुवां भीख
केव कहै कहूं न गै होई
गइ होई नाते-बाते मा 
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

__आशाराम जागरथ

[जारी….]

पाहीमाफी [४] : मौज-मस्ती, काम-काज

sssssसिसिलेवार ढंग से पोस्ट कीन जाति, आशाराम ‘जागरथ’ कय रचना, ‘पाहीमाफी’ कय ई चौथा हिस्सा आपके सामने रखा जात अहय। यहिके पहिले केरी कड़ियन क पढ़य खातिर यहिपै क्लिक करैं : “पहिला भाग” ,  “दुसरका भाग”  , तिसरका भाग। तौ आज यहि चौथे हिस्सा कय पाठ कीन जाय औ अपने बिचार से अवगत करावा जाय। : संपादक
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मौज-मस्ती, काम-काज

हल्ला होत भोरहरी होय
दोगला चलै सिंचाई होय
थोरै देर चलाई हमहूँ
देहियाँ खूब पसीना होय
सूख जाय कुछ ताल कै पानी
लइकै धोती मछरी छानी
कनई मा जब पाई सुतुही
जियरा गद-गद काव बखानी
घर सइतै कां चिक्कन माटी
ढोय कै लाई पलरी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

बरहा ऊँच बनावा जाय
ढेंकुर–कूँड़ चलावा जाय
गोहूँ अउर केराव कय खेत
हाथा से हथियावा जाय
अन्नासै काँ दीहन बोय
पानी आवत बाटै रोय
हाली-हाली जाय कै देखा
बरहा कहूँ कटा न होय
कउनौ खानी फसल जो होई
आधा मिली बटाई मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

फरवारे मा दँवरी नाधे
लोगै गोहूँ दाँवै साथे
करैं बैल मिलि घुमरपरैया
मुँह मा जाबा बांधे-बांधे
अखनी-पैना-पाँची-पाँचा
झौवा-झौली-खाँची-खाँचा
बभनन के खरही पै खरही
बोझै-बोझ अलग से गाँजा
बाकी जात बेचारे ताकैं
लेहना पीटैं कोने मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

चलै न पछुवा ना पुरवाई
मारि परौता करी ओसाई
भूसा चमकै ढूह सोहाय
दमकैं अन्नपूर्णा माई
कुचरा लेहें बटोरी  कूँटी
कूँटी मा गूंठी ही गूंठी
छूटै खुलरा ताकै दाना
जब मुंगरी से वोका कूटी
कुछ छिटका कुछ गिरा अनाज
बीन धरी हम मौनी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

गड़ही मा खोदा गय चोंड़ा
फूटा पानी छाती चौड़ा
फरवारे कै बैल पियासा
पानी पीयैं जोड़य-जोड़ा
कोहा भै बारी-फुलवारी
वहमां खूब हुवै तरकारी
ढोय-ढोय चोंड़ा से पानी
सींचैं बेटवा औ महतारी
उज्जर-हरियर अउर बैगनी
भाटा लउकै पाती मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

गरमी कै बेहाल महीना
माथे तल-तल चुवै पसीना
‘ढोलिहा’ साथे भइंस चराई
छाँहे बइठे गप्प लड़ाई
लाठी बजा-बजा वै गावैं
हमहूँ साथे तान भिड़ाई
गोरु चरत दूर जो जावैं
वन्हैं हाँक नगीचे लाई
बगिया सुर्र-कबड्डी खेली
भंइस जुड़ावैं पानी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

गले जुआठा नाक नकेल
हर नाधी औ जोती खेत
‘वा-वा’ कहे दाहिना समझै
‘तता-तता’ से बाँवा बैल
कुर्ह कै मूंठ पकरि यक हाथे
सीधी कूड़ रही हम साधे
पाछे-पाछे गोहूँ बोवत
माई चलैं सिकहुली लादे
दुइयै बाँह जो दियै हेंगाय
चमकै खेत दुपहरी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

सरसइया पै चढ़ै केराव
मेर-मेर कै फूल फुलाय
पोपटा से गदराई छीमी
मौनी लइकै तूरा जाय
आपन खेत रखावा जाय
चिरई हुर्र, उड़ावा जाय
अक्सा अउर केराव कै फुनगी
खोंट-खांट कै खावा जाय
छौंकी घुघुरी, भात-निमोना
रोजै रोज बनै घर मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

चैत माह कटिया भदराय
झुर-झुर-झुर-झुर बहै बयार
बड़े भोरहरी खेते जाई
कुर-कुर-कुर-कुर करी कटाई
ऊपर चटक चनरमा चमकै
दूर-दूर तक गोहूँ दमकै
दुई-यक पहँटा काटी हमहूँ
बोझा बान्ही रसरी लइकै
घर भै मिलि कै खरही गांजी
ढोय-ढोय फरवारे मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

हमरौ छपरा लिऔ छवाय
काव कहत बाट्या तू भाय
हूँड़-भाँड़ मा हमहूँ तोहरे
कामे कबहूँ जाबै आय
बटवारा मा भीत उठाइन
दादा वोकां रहे छवाइन
पाँच साल के उप्पर होई गै
छपरा मा बस बाय कराइन
अबकी नाहीं होई गुजारा
पातर-पुतर पलानी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

ताले बीचे कनई म् जाय
रहंठा दबा के दिहिन भिगाय
भूसा ताईं एक मंडिला
पांडे ऊंचे दिहिन छवाय
पांच जगह रहंठा कै बाती
कौंची अइंठ बनाइन टाटी
गोल-गोल लम्मा कै गोला
आरी-आरी पाटिन माटी
चुरकी वाला टोपा पहिरे
खड़ा मंडिला घामे मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

का हो तू काव करत बाट्या
मेला नाहीं देखै जाब्या
भिनसारे से देखत बाटी
खटिया कै बाध बरत बाट्या
वै झारि कै बिड़वा डारि दिहिन
बोले नियरे आवा बइठा
फिर बोले बोली ना बोलौ
माचिस लइ ल्या बीड़ी दागा
तोहरे माफिक कउनौ हमार
बेटवा कमात ब दिल्ली मा ?
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

घासी ताँईं खेते  जाई
मेंड़े बइठा गाना गायी
सरसौ कै कँड़री तूरि-तूरि
छिलका निकारि कच्चै खाई
‘गुलुरू’ गोहराइंन आय जाव
झौवा लै हमरे खेत चलौ
सरसौ-केराव कां छोड़ि-छोड़ि
अंकरा- बहलोलिया छोल लियौ
सरसइया वोहरी गझिन बाय
थोरै उखारि ल्या सागी कां
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

बिन खाये गयन खेत गोड़य
दुपरिया भये घरे आयन
निकरी बिलार चूल्ही मा से
दरवज्जा खुल्ला हम पायन
बरतन-कुरतन छितरान परा
घर मा ना रहे परानी क्यौ
बटुली बोलिस ठन-ठन गोपाल
कुछ काछि-कूछ कै खाय लियौ
मोटकी रोटिया बा तुहै अगोरत
उप्पर धरी सिकहुली मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा
unnamed गन-गन जेठ दुपहरी बाय
बइठा येक गपोड़ी बाय
आवा, छाँहें बइठ बगल मा
घेरि-घेरि बतियावा जाय
वत्ते चला ना बइठा हीयाँ
गिरत बाय पेड़े से कीयाँ
गोटी खेल ल्या हमरे साथे
धरे हई इमली कय चीयाँ
मजे-मजे अब जूड़ हुवत बा
चलै का चाही घासी कां
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

 __आशाराम जागरथ

[जारी….]

‘पाहीमाफी’ [३] : मन लरिकइयाँ कै नरम-नरम

16002909_368661613493762_7146674138761624111_nसिसिलेवार ढंग से पोस्ट कीन जाति, आशाराम ‘जागरथ’ कय रचना, ‘पाहीमाफी’ कय ई तिसरका हिस्सा आपके सामने रखा जात अहय। यहिके पहिले केरी कड़ियन क पढ़य खातिर यहिपै क्लिक करैं : “पहिला भाग” ,  “दुसरका भाग” । तौ आज यहि तिसरके हिस्सा कय पाठ कीन जाय औ अपने बिचार से अवगत करावा जाय। : संपादक
______________________

मन लरिकइयाँ कै नरम-नरम

गोरहर झुर्री करिया गोदना
आजी कै लम्बा डील-डौल
बित्ता से बेसी यक घेंघा
गटई मा लटकै गोल-गोल
झिर्री यस धोती मारकीन
पहिरे कमीज हरियर-हरियर
चाँदी कै हँसुली पौवा भै
घेंघा म् बाझै करिया-उज्जर
महकै घिउ-दूध-दही गम-गम
बइठी जब वनके गोदी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

बगल धरे कजरौटा-डोकवा
बूढ़ी माई लगावैं बुकवा
कहैं दूध ई गुट कै जाव
नाहीं तौ आ जाई बिगवा
‘कीचर-काचर कौवा खाय
दूध-भात मोर भैया खाय’
दइ कै काजर दूनौ आँखी
एक डिठौना दियैं लगाय
जुरतै भाग हुवां से जाई
खेली धूरी-माटी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

गोड़ मोड़ि आजी बैठावैं
घंता-मंता खूब खेलावैं
गोदी मा दुपकाय लियैं औ
पौंढ़े-पौंढ़े गीत सुनावैं
घोरतइयाँ तांई नंगाई
डांट दियैं तौ चुप होय जाई
सुबुक-सुबुक कै बीदुर काढ़े
रोय-रोय हम करी ढिठाई
गरम जलेबी छनै छना-छन
सपना देखी राती मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

ऊ दिन अबहूँ बाटै याद
मेला देखै कै फरियाद
घर मा फूटी कौड़ी नाही
रोई हम समझी न बात
ना रोवो अब जाओ मान
नाहीं तौ कउवा काटी कान
कनियाँ लइकै बूआ हमकां
उंगुरी-सीध देखावैं चाँद
‘लकड़सुन्घौवा पकरि लेअ थै
मेला वाली राही मा’ 
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

गाँव म् जब केउ परै बेमार
होय जरूरी काम अकाज
खाय-खाय खरखोदवा घर मा
बइठे रोग ठीक होय जाय
लेकिन अगर रोग गंभीर
गलि कै ठठरी हुवै सरीर
कहाँ से लावै पइसा-कौड़ी
दवा से सस्ता मरै फकीर
कहँरै अउर महिन्नौँ झेलै
खटिया लधा ओसारे मा 
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

हमरी आजी जब मरी रहीं
घेंघा मा पाका भवा रहा
कउनौ ना दवा–दवाई भै
बस खाली सेवा भवा रहा
भैया रहे ‘राम लौट’ बड़के
पेटे मा दर्द उठै वनके
रहि-रहि चिल्लायं रात भै वै
रोवैं माई बइठे–बइठे
चलि बसे रोग पथरी लइकै
जिनगी के सोरह साली मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

तप्ता बारि सब सेकैं आँच
हम खेली औ खाई डांट
खूब लगै कसि कै जब जाड़ा
कट-कट-कट-कट बोलै दांत
पैरा बिछै के ओढ़ी कथरी
जाड़ लगै होइ जाई गठरी
टी० बी० रोगी माई खांसैं
पूरी देहियाँ खाली ठठरी
सिकहर टांगी रोटी खाई
स्वाद रहा खुब बासी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

मासा लागैं सोय न जाय
काटैं उडुस बहुत खजुवाय
यक्कै बेना के-के हाँकै
लागै गरमी सहि न जाय
उठी रात खुब पानी पीई
छींटा मारि बिछौना भेई
कबहुं-कबहुं तौ रात म उठि कै
फरवारे मा जाय कै सोई
ढुरुक-ढुरुक कै चलै बयार
रहि – रहि लागै देहीं मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

सूरज का लुकुवावै बदरी
बहुत जोर जब घेरै कजरी
बरसै तड़-तड़, चूवै छप्पर
अरगन टाँगी भीजै कथरी
दस-दस दिन बरखा न जाय
सूखै ना कपड़ा गन्धाय
कीच-काच मा आवत जात
गोड़ कै उंगुरी सरि-सरि जाय
चुवै ओरौनी झर-झर-झर-झर
उठै बुलबुला पानी मा 
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

गौधुरिया घेरै अन्हियार
कंडी लइकै माँगी आग
तान टेर बोलै करकच्ची
हुआँ-हुआँ चिल्लाय सियार
जुगुनू उडै  गिनी हम तरई
बदरा लागै भागत मनई
झूरा परि गै खतम अनाज
सुनतै खून घटा यक परई
पढ़ी तो ढिबरी बुत-बुत जाय
तेल दिया न बाती मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

एक रात अन्हियारी घरिया
गाभिन भइस बियाइस पड़िया
जुगुर-जुगुर ढिबरी मा लौकै
नान्ह कै लेरुआ करिया-करिया
खुटुर-पुटुर कुछ साफ-सफाई
टूटी नींद नाहिं फिर आई
पेउस दूध गारि बल्टी भै
इनरी ढेर बनाइन माई
नेसुहा कोयर बालैं दादा
लाय हरेरा खाँची मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

सुबह-सुबह मकलाय पड़उवा
दूध पियै घरिया मा लेरुआ
घड़- घड़- घड़- घड़ जाँता बोलै
कड़िया मा घप-घप्प पहरूवा
सानी-पानी, हौदी-नादा
तापैं तपता बारे आजा
उखुड़ी छोलै कां गोहरावैं
पहँटैं हँसिया अउर गड़ासा
भुजिया धिकवैं बूढ़ी माई
बुज्जा फूलै हांड़ी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

यक ठू गीत सुनावत बाटी
वोकर अरथ बतावा साथी
वोका-बोका तीन तिलोका
लइया लाठी चन्दन काठी
अमुनिक जमुनी पनिया पचक
खेलैं कुल लरिके मटक-मटक
चिउँटा-चिउँटी, हाथी- घोड़ा
तू का लेबा झट-पट बोला
हाथ पे हाथ धरे तर ऊपर
मूड़ भिड़ाये मूड़ी मा 
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

होत भिनौखा यक ठू भाट
खझरी बजा के गावत जाय
‘उवा सुकौवा भय भिनसार
टटिया खोला हे जजमान
सुन्दर मौनी सुंदर दान
सुन्दर पूत दियैं भगवान’
सोची काहे ई मांगत बा
हट्टा-कट्ठा एक किसान
दादा बोले तू न बुझबौ
भिच्छा यकरे जाती मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

नियति-स्थिति औ लाचारी
लियै परिच्छा बारी-बारी
पीकै घूँट खून कै जब-तब
सोची-समझी अउर विचारी
ऊँच-नीच के दिहिस बनाय़  
धन-धरती कां बाँटिस नाहि
काम करै सगरौ दिन केऊ
केऊ खाली बइठे खाय
कबहूँ कहूँ मिलै ना उत्तर
ढूढ़ी रोज किताबी मा 
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

unnamedपूजेन पहाड़ तब्बौ ना पायन
काव मिला जब हम सधुवायन
कइसे कही झूठ बा दुनिया
दूइ दिन से कुच्छौ ना खायन
‘गीता’ बोलै बस काम करा
फल-वल कै चिंता छोड़ि चला
वहि राही चले बाप – दादा
भुखमरी औ छूआछूत मिला
भेड़िया – धसांन मा ना रहिबै
कूदब ना कूआँ – खाई मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

 __आशाराम जागरथ

[जारी….]

‘पाहीमाफी’ [२] : दसा-दुरदसा औ दयू कै रिसियाब-मानब

उहै निमिया.

उहै निमिया.

सिसिलेवार ढंग से पोस्ट कीन जाति, आशाराम ‘जागरथ’ कय रचना, ‘पाहीमाफी’ कय ई दुसरका हिस्सा आपके सामने रखा जात अहय। यहिके पहिले केरी कड़ी पढ़य खातिर यहिपै क्लिक करैं : “पहिला भाग” । तौ आज यहि दुसरे हिस्सा कय पाठ कीन जाय औ अपने बिचार से अवगत करावा जाय। : संपादक
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  • दसा-दुरदसा

जहाँ जाति बसै हर जाती मा
जाती के बोली – बाती मा
जाने, अनजाने, कारन मा
यक दूजे  के व्यहारन म़ा
जहाँ बसै हिकारत, भेदभाव 
कनखी नजरन की आँखी मा
भुखमरी – गरीबी फरै जहाँ
खेती  के काल – कलाही मा
ऊ गाँव कबहुँ बिसरत नाहीं
जहाँ लोटेन धुरी – माटी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

बसा रहैं चाहे अगल-बगल
पर जाति-जाति कै काम अलग
वइसै देखय मा एक गाँव
पर अन्दर-अन्दर अलग-थलग
केव ऊँच रहै केव नीच रहै
केउ ऊँच-नीच के बीच रहै
केउ सबके बीच मा पूजनीय
केउ सबके लिये अछूत रहै
मरनी-करनी, सादी-ब्याहे
इक कौम दिखै इक जाती मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

नजर-नजर मा बसै हिकारत
पहिया’ भेद-भाव कै भारत
पैदा करैं जाति मेहरारू
मरद वैमनस-इर्खा-स्वारथ
ऊपर देखे मा सदभाव
अन्दर-अन्दर गहिरा घाव
बसै गाँव मा जाति-समूह
सबमा छूत-छात कै भाव
काम न आवैं गैर-बिरादर
सादी अउर बियाहे मा 
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

बाभन-ठाकुर कै धाक रहै
मेहनत कै काम हराम रहै
हर कै मुठिया जौ पकरि लियैं
तौ पूरे गाँव मजाक उडै
खेलैं-कूदैं औ मौज करैं
चुरकी पै बहुत गुमान करैं
दुसरे कै हिस्सा खाय-खाय
कुछ लोगै बहुत मोटान रहैं
कुछ रहैं अकेलै दीन-हीन
बस चन्दन – टीका माथे मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

बढ़ई-धोबी-नाऊ-लोहार
गाँव भरेन कै सेवादार
लेहना अउर तिहाई बदले
काम करैं वै सालौंसाल
बस बिगहा दुइ बिगहा खेत
खेती होय बटइया जोत
भूमिहीन बन रहैं चमार
बभनन के खेतै ही खेत
तेली-तमोली-अहिर-कहार
करैं गुजारा जाती मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

जेतने मा जे जेस जहां रहै
वतनै मा ऊ परेसान रहै
केव कहै बिना घी ना खाबै
केहू के घर ना नोन रहै
तब्बौ लोगै खुसहाल रहैं
हँसि-हँसि कै खूब मजाक करैं
खाना-कपड़ा के आगे वै
कउनौ ना सोच-विचार करैं
भगवान भरोसे जियत रहे 
कोसैं सब खाली किस्मत का
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

धोबी पासी कोरी चमार
वोऊ करैं जाति कै मान
यक दूजे से छूत मनावैं
अपुआँ दियैं ऊँच अस्थान 
अधोगति पै सब चुपचाप
भीतर-भीतर रहैं निरास
बोलै कै हिम्मत ना होय
बाभन-ठाकुर खड़े हों पास
हीन भावना तुनकमिजाजी
बाढ़ै खूब गरीबी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा                   

चूल्हा काव चढ़ा बा माई ?
जात हई खोदै बिरवाही
पेटे मा चूहा कूदत बा
दइ द्या रोटी सुक्खै खाई
बथुआ जाय खोंटि लायू तू
सगपहिता कय दाल बनायू
कोदई क् भात ज्वार कै रोटी
देसी घी से छौंक खियायू
नीक-सूक दिन जल्दी बहुरे
गल्ला होई खेती मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

गाँव-गाँव मा नसा तमाम
बीड़ी-खैनी, गाँजा-भाँग
कहूँ पै गुड़-गुड़ हुक्का बोलै
कहूँ खाय केव दोहरा-पान
एक दसहुनी बाभन गांवै
महुआ-दारू नीक बनावैं
छूत-अछूत कां यक्कै घाटे
खटिया पै बैठाय पियावैं
चिलम-चुनौटी अउर सरौता
झूलै थैली-थैली मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

बरगद तरे मदारी आवा
डुग-डुग-डुग-डुग करै दिखावा
नाचै बानर लाठी लइकै
बंदरिया कै करै मनावा
ना मानें पै लाठी भांजै
हियाँ-हुवाँ बंदरिया भागै
सबके आगे जाय-जाय फिर
लिहें कटोरा पइसा मागै
वोकरे पहले खिसक लेई जब
कौड़ी नाहीं जेबी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

कातिक कै जोता खेत रहा
जाड़ा मन माफिक होत रहा
दुइ गाँव के हुम्मा-हुम्मी मा
वहि रोज कबड्डी होत रहा
हमरी ओरी कै यक पट्ठा
गोड़छन्हिया बहुतै नीक रहा
जेका ऊ पकरि कै छान लियै
समझौ फिर पाला दूर भवा
इरखा मा गोड़वै तूरि दिहिन
यक जने जानि कै खेलत मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

  • दयू रिसियाने – मनाये माने

बोलअ थै चिरई चौं-चौं-चौं
भूँकत बा कुकुरौ भौं-भौं-भौं
पगुराब छोड़ि अनकत बाटे
कनवा पारे बैलै दूनौं
उपराँ बादर बा लाल-लाल
घेरत बा बहुत डरावत बा
लागत बाटै लंगडी आन्हीं
पच्छू वोरी से आवत बा
चूल्हा कै आग बुझाय दियौ
ईंहन धइ लेत्यू छाहें मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

आइस लंगडी आन्हीं चढ़ि कै
खर-खुद्दुर-धुंध-धूलि-धक्कड़
दिन कै उजियारा आन्हर भै
चौतरफा अन्धियारा – अंधड़
टोवैं मनई तगड़े-तगड़े
सूझै ना लगहीं खड़े-खड़े
हमहूँ यक जगहाँ फँसा रहेन
बाँसे के कोठी मा जकड़े
यक पेड़ महा कै उखरि परा
गिरि परा धड़ाम से बगली मा 
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

परलय टरि गै, अन्हियारा कम
बचि गयन मौत के मुंह से हम
पूरे देहीं गर्दय – गरदा
जिउ आन भवा आन्हीं  गै थम
खरिहान से कुलि भूसा उड़ि गै
कपड़ा – लत्ता – खरही – छपरा
गिरि परे तमाम पेड़-पालव
सीवाने मा सारस पटरा
यक बूढ़ा उड़ि कै परी रहिन
डहरी के बगले गड़ही मा 
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

बिजुरी चमकै, गरजै  बादर
बरसै पहिला पानी असाढ़
गड़ही-गुड़हा उफनाय जाय
भरि जाय लबालब खेत-ताल
रतिया बीतै भिन्नहीं होय
लाली वाले सूरज निकरैं
पीयर-पीयर धोती पहिरे
खुब टर्र-टर्र मेघा बोलैं
हफ्तन गूंजै काने अवाज़
बसि जाय नज़ारा आँखी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

पानी ना बरसै सावन जब 
टोटका सब लोग तमाम करैं
लरिकन कै टोली निकरि जाय
सीधा पिसान घर-घर उगहैं
मिलि लोट-पोट गावैं लरिके
उल्टा मेघा हाथे पकरे
काल–कलौटी, उज्जर धोती
कारे मेघा पानी दइ दे’
पोखरा मा जायं नहांय, बनै
भौरी–भर्ता तब बगिया मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

unnamed

कुछ बड़े घरन कै मेहरारू
राती मा खेते हर नाधैं
केव बैल बनै दहिना, बावां
केऊ हर कै मुठिया थाम्हैं
धइ लियैं जुआठा कान्हें पै
जोतैं निकारि कै पहिरावा
‘बड़कऊ’, ‘फलाने’ कहाँ हया
पानी लइकै जल्दी आवा
आये डेरात मुला भागि लिहिन
धइ गगरा दूर जमीनी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

 __आशाराम जागरथ

[जारी….]

`पाहीमाफी’ [१] : परिचय, गूँग गवाह औ’ पहिया गाँव-कुदरती ठाँव.

यहि रचना पै अबहीं कुछ तनकीदी तौर पै न कहब। हड़बड़ी होये। रचना पुराय क अहय, कुछय हिस्सन से रूबरू भयेन। यहिकै लगभग पचास इस्टैंजन का देखे के बाद ई जरूर कहब कि अस रचना अबहीं तक नाहीं भै बा। लोकभासा अवधी मा यहिके लिखा जाय कय खास तुक हय जौन आसाराम जागरथ जी नीचे बताये अहयँ। यहि रचना का देखिके हम खुसी से खिलि उठा हन। जोखिम उठाय के एतना जरूर कहा चाहब कि ई रचना अपने बिसय औ सिल्प के लिहाज से आधुनिक अवधी साहित्य कै यक उपलब्धि हुवय कय पूरी चुनौती पेस करति अहय। कयिउ हिस्सन मा आप यहिका पढ़िहैं। कल्ले-कल्ले हाजिर करब। यहिकै इजाजत दियै खातिर आसाराम जागरथ जी कय बहुत आभारी अही। : संपादक

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नीम कय पेड़: पाहीमाफी कय गूँग गवाह.

[पितामह पेड़ नीम का : हमारे बचपन के बुजुर्ग भी अपने बचपन में इस पेड़ को इसी ‘आकार- प्रकार’ का देखा हुआ बताते थे. इसकी उम्र के बारे में कुछ भी नहीं बता पाते थे. यही एक पेड़ है जो 1981 में घाघरा के कटान से जमींदोज हो चुके ‘पाहीमाफी’ गाँव का एकमात्र गवाह बचा है.  इसके पोर-पोर में ग्रामीण जीवन के सदियों के सांस्कृतिक-सामाजिक-आर्थिक दशा के राज छिपे हैं. हर साल बरसात के मौसम में थोड़ा-थोड़ा करके दक्षिणी छोर के खेत खलिहानों को पहले ही काट चुकी नदी 1981 में गाँव पर हमला बोलती है. मैं हाई स्कूल पास कर चुका था और 18 किलोमीटर दूर के एक स्कूल में दाखिला लेना था. कटान को देखते हुये पिता जी के विरोध के वावजूद माँ ने जाने की इजाजत दे दी . मैं सुबह पैदल निकल गया और दाखिला लेकर सीधे नाना के घर सहायता के लिए चला गया. कुल  लगभग 40 किलोमीटर पैदल चल कर ननिहाल पहुंचते-पहुंचाते रात हो गयी. दूसरे दिन सुबह कुछ मददगार आदमियों के साथ जब मैं अपने गाँव पहुंचा तो देखता हूँ कि मेरा घर नहीं था. कटान में कट चुका था. बस केवल उजड़ी हुई ‘चन्नी’ बची थी. और मेरी आँखों के सामने वह भी देखते-देखते जमीदोज हो गयीे. माँ-बाप-भाई-बहन मिलकर जो कुछ सर-सामान बचा पाये थे , इसी पेड़ के नीचे धरा था.

दो-एक साल इसी पेड़ के बगल एक पाण्डेय जी की जमीन में झोपड़ी धर कर गुजारा किया. फिर परिस्थितियों ने गाँव छुड़वा दिया. जन्म देने वाला गाँव, पाहीमाफी में बचपन के 18 साल गुजरे. परन्तु उमड़ते-घुमड़ते नज़ारे हमेशा नाचते रहते हैं. कुछ लिखने की कोशिश में आत्मकथात्मक शैली में यह अवधी कविता ही बन पा रही है जिसका कुछ अंश आपके सम्मुख हैं.  इसकी रचना अभी भी जारी है और किसी भी अंतिम नतीजे पर नहीं है.  इसलिये यह रचना अपनी लिखावट और बुनावट में किसी भी संशोधन के अधीन है. वैसे मेरी एक कविता-संग्रह  ‘कविता कलाविहीन प्रकाशित हो चुका है जो हिन्दी में  है. परन्तु ‘पाहीमाफी यक गाँव रहा’ मेरी मातृभाषा अवधी में  है. क्योंकि मैं समझता हूँ कि जली-भुनी संवेदनाओं और भावनाओं को उकेरने में यह एक ससक्त माध्यम है। : आशाराम ‘जागरथ’ /19.12.2016]
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  • गूँग गवाह

खाये-पीये खूब अघाये
बीते दिन कै याद सताये
टहनी- टहनी, पाती-पाती
बहुत जने कै राज दबाये
कोऊ आवै, कोऊ जाये
कोऊ छाँहे बइठ छहाँये
काली चौरा के आँगन मा
बिन कुम्हलाये, बिन मुरझाये
जड़े जमाये कऊ दशक से
गड़ा बा गहरी माटी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा.

सुख-दुःख-गम खाय के भयौ बड़ा
हे नीम ! तू काहे हरा-भरा
केव न्याय करै, अन्याय करै
तोहरे बरदास्त कै पेट बड़ा
तोहरे सँग्हरी कै साथी सब
मरि-उखरि परे या झुराय गये
जब काल कै गाल बनी नदिया
जड़-मूल समेत समाय गये
तबहूँ तू हयो मुंह बांधें खडा
केतना कुछ घटा कहानी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

टुकुर-टुकुर यकटक ताकत
हे नीम ! तू पेड़ पुरान भयौ
केउ चोर रहै या साह रहै
सबका पनाह तू देत रह्यौ
तू भयौ पुरनियाँ काव कही
तोहरे बा लेखा और बही
मनहग चाहे रिसियान रहौ
अब तुहैं गवाही दियै क परी
बा मोट-मोट ई हाथ-गोड़
कब आई केकरे कामे मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

केतना लोगै आवा होइहैं
थकि-चूरि पथिक बइठा होइहैं
दुनिया औ देश – जवारी कै
बतकही बहुत गावा होइहैं
मरि गये बहुत पइदा होइकै
अब दियौ बताय बहुत होइगै
यकतरफा धन-धरती बटिगै
कइसै सब छोट-बड़ा होइगै
तू ज्ञान कै हौ भण्डार भरा
सच-सच सच बोलि दियौ सबकां
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

  • पहिया गाँव : कुदरत कय ठाँव

‘पाहीमाफी’ येक था गाँव
‘पहिया’ वोकर दूसर नावं
बस्ती कै तहसील हर्रैया
मेर – मेर कै जाति बसैया
पूरब ‘चन्हा’ व ‘बानेपुर’
ताल किनारे ‘कटकवारपुर’
दक्खिन पुरवा ‘अचकावापुर’
‘पच्छू टोलिया’ औ ‘सरवरपुर’
बहुत दूर से चली डहरिया
मिलै नदी की घाटी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

‘पहिया’ खुब सँचरा गाँव रहा
कुदरत कै सुन्दर ठाँव रहा
खुब महा-महा, पीपर-बरगद
इमली-पाकड़ कै छाँव रहा
पूरब – पच्छू – उत्तर बगिया  
व दक्खिन दूर घाघरा नदिया
चारिउ ओर झाड़ – झंखाड़
गड़ही – गड़हा, ताल – तलैया
केहू कै घर नरिया-खपड़ा
केव करै गुजारा मड़ई मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

सधुवाइन कै सुन्दर कुटिया
थोरै दूर हुआँ से नदिया
अरहर-गंजी-जड़हन-धान
दूर – दूर  फैला मैदान
फरै बकाइन, चिटकै रेड़
गाँव म बत्तिस पीपर-पेड़
खाले-तीरे, डहर किनारे
झरबेरी कै पेडै  पेड़
पीपर-नीचे, सोर पे औंढ़े
नींद लगै पुरवाई मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

गहिर गड़हिया छटा अनोखा
बाँस-कोठि के बीच महोखा
टापैं बगुला, कूदैं मेघा
हरियर घास पै बोंकै-बोंका
बेहया-सरपत कै झलकुट्टी
बनमुर्गी-पड़खी-फुरगुद्दी
नेउर अउर चौगड़ा घूमैं
कहूँ पे सुग्गा कहूँ किलहटी
चालि-चालि कै भिट्ठ लगावैं
मूस-लोखड़ी झाली मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

जामुन के पुलुई मा लुकाय
कोयल कू-कू-कू करै पाठ
कहुँ चोंच मारि कै छेद करै
काटै कठफोड़वा कठिन काठ
झोंका पुरुवाई कै पाये
पीपर कै पाता हरहराय
कहुँ खाय-खाय डांगर डटि कै
डैना फैलाये गिद्ध घमाय
राती मा साही सैर करैं
दिन मा कुलि घुसी रहैं बिल मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

बीनै लोगै लकड़ी-कंडी
कोऊ चेहरै आलू-गंजी
हाथी दूर-दूर से  आवैं
पीपर-टैरा खूब चबावैं
चिक्कन-चौड़ी डहर दूर तक
चली जाय ‘टेल्हा’ के घर तक
देखे बड़ा मनोहर लागै
गोरु-बछरू भागैं सरपट
कडों-कडों जब करैं कड़ाकुल
झुंड कै झुंड सिवाने मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

लागै जब कुटिया कै मेला
भीड़ हुवै खुब ठेलम-ठेला
कँडिया-ओखरी-तवा-पहरूवा
बल्लम-फरसा-आरी-फरूहा
कूँड़ा-हाँड़ी, भुरका-मेलिया
बिकै गड़ासा, खुरपा-हँसिया
पलटा-करछुल, बल्टी-गगरा
पीतल-फूल कै लोटा-थरिया
दिहें मेंहावर, चलैं लजाउर
लरिका दाबे कांखी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

सेंनुर-टिकुली दिहें मेहाउर
दुलहिन थरिया म बीनैं चाउर
बोलिन सासू कां फुसिलाय
थोरै पइसा दइद्या आउर
जाबै हम ‘रमरेखवा’ मेला
खाबै गरम-ज़लेबी, केला
सासू बोलिन भीर हुवअ थै
धक्का-मुक्की ढेलम-ढेला
नाहीं तौ फिर हमहूँ जाबै
तीसी बाँध ल्या गठरी मा 
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

पट्ठे दंगल दाँव लगावैं
लोगै तीतर-भेंड़ लड़ावैं
फुलरा वाला करधन बान्हे
गेद-गेदहरै धावत जावैं
छौना साथे घूमै सुअरी
चलैं झुंड मा भेड़ औ बकरी
उबहन टांगे माई हमरे
चली जायं छलकावत गगरी
कोदइल संग मुरैला नाचैं
रूसा वाले झाली मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

भिटहुर बगल घूर कै गड्ढा
वहीँ किनारे उपरी-कंडा
भीत से चिपकी चिपरी चमकै
जेस तरई कै गोरखधंधा
छपरा चढ़ै देसौरी कोहड़ा
सेम-तरोई-लौकी-कोहड़ा
सरपुतिया-बोंड़ा कै झोप्पा
नेनुवा लटकै खड़ा लड़ेहरा
बथुआ  बहुत लमेरा जामै
गूमा खेते-खेते मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

unnamedहम गयन अजोध्या के मेला
सब पूछैं काव-काव देख्या

बोलेन खाकी वर्दी मा हम
बानर के बीच पुलिस देखा
यक लाल – लाल  टोपी वाला
आगे से डंडा पटक दिहिस
पीछे बांड़ा बानर नेपान
केरा कै झोरा छोरि लिहिस
मनई ही मनई तर-उप्पर
बतकही सुनायन हम सबकां 
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

[जारी….]