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अन्तर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस और बांग्लादेशियों का मातृभाषा-प्रेम

भारत बिबिधता से भरा देस हवै। यहिकी बिबिधता यहिकी बड़नकई है। भासिक बिबिधता के हिसाब से अस देस बिरलै मिलिहैं। मुला दुख हुअत है ई देखिके कि जौनी भासा का आज करोड़न लोग बोलत अहैं , वनकी दसा बहुत नीक नाई है। अवधी , छत्तीसगढ़ी, ब्रजी , भोजपुरी , मगही जइसी कयिउ भासा महत्व नाई पाय सकी हैं। यहि हालात मा अबहीं हालै मा गुजरे ‘अन्तर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस’(२१-फरौरी) कै महत्व भारत मा अउरउ बढ़ि गा है। यही क ध्यान मा रखिके आनंद पांडेय साहिब कै लिखा ई लेख आप सबसे सेयर करत अही। साभार, विस्फोट-साइट से। लेख खड़ी बोली-हिन्दी मा है। : संपादक 

लेख : अन्तर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस और  बांग्लादेशियों का मातृभाषा-प्रेम 

पूंजीवाद का अंतर्राष्ट्रीय वर्चस्व भाषाई भी है. आज भूमंडलीकरण के नाम पर दुनिया को अमेरिका-यूरो केंद्रित बनाने के प्रयास में दुनिया भर में मातृभाषाओं का वध किया जा रहा है. कई छोटी-बड़ी मातृभाषाएं बेमौत मर रही हैं. कइयों का अस्तित्व संकट में है. ऐसे में संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा २१ फरवरी को अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस के रूप में मनाना कई दृष्टियों से विडम्बना का सूचक भी है और महत्वपूर्ण भी.

उल्लेख्नीय है कि बंगलादेश के भाषाई आन्दोलन के शहीदों  की याद में संयुक्त राष्ट्र संघ ने नवम्बर १९९९ में २१ फरवरी को अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा  दिवस के रूम में मनाने की घोषणा की. तब से यह दिन दुनिया भर में मातृभाषा दिवस के रूप में मनाया जाता है लेकिन इस दिन को लेकर जैसा उत्साह और उत्सवधर्मिता तथा जागरूकता एवं आम जनता की भागीदारी बांग्लादेश में दिखाई देती है वैसी अन्यत्र दुर्लभ है. भारत में तो इस दिवस को शायद लोग जानते भी नहीं है. भारतीय जनता के लिए यह दिवस वैसे ही लगभग अनजाना है जैसे अंतर्राष्ट्रीय अहिंसा दिवस (२ अक्टूबर). हो सकता है कि बौद्धिक और शासक वर्ग इन ‘दिवसों’ से परिचित हो लेकिन आम जनता को बिल्कुल इनसे कोई सरोकार नहीं दिखाई देता. उत्सवधर्मिता और उत्साह तो दूर की बातें हैं. ऐसा भी नहीं है कि भारतीय मातृभाषाओं के सामने कोई खतरा मौजूद नहीं है इसलिए भारतवासी इन ‘दिवसों’ की औपचारिकता को अपने लिए निरर्थक मानते हों. और आयोजनों और उत्सवों से दूर रहते हों.

लेकिन, बांग्लादेश में २१ फरवरी का दिन राष्ट्रीय उत्सव की तरह से मनाया जाता है. संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा २१ फरवरी को अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस के रूप में घोषित करने की पृष्ठभूमि में बांग्लादेश है और इसके पीछे बांग्लादेश का १९५२ का मातृभाषा आन्दोलन है. पाकिस्तान की राजभाषा उर्दू हो ऐसा, पूरा पश्चिमी पाकिस्तान और कायदे आजम मानते थे. लेकिन पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) की जनता के लिए उर्दू अजनबी भाषा थी. अपनी भाषा और संस्कृति में रचे-बसे गर्वीले बंगालियों ने इस बात को स्वीकार नहीं किया. संयुक्त पाकिस्तान में बंगाली आबादी का अनुपात अधिक था.

इसलिए बंगाली चाहते थे कि बंगला को भी उर्दू के साथ-साथ राजभाषा बनाया जाय. लेकिन उर्दू उनके ऊपर थोप दी गयी. २१ फरवरी, १९४८ को मोहम्मद अली जिन्नाह ने उर्दू को पश्चिमी और पूर्वी दोनों पाकिस्तानों के लिए एकमात्र राजभाषा घोषित कर दिया. प्रतिरोध स्वरूप पूर्वी पाकिस्तान में बांग्ला को लेकर आन्दोलन तेज हो गया. २१ फरवरी, १९५२ को ढाका विश्विद्यालय के छात्रों ने प्रांतीय (पूरा पूर्वी पाकिस्तान) हड़ताल का आह्वान किया.  इसे रोकने के लिए सरकार ने धारा १४४ के तहत कर्फ़्यू लगा दिया. लेकिन, छात्रों का मनोबल नहीं टूटा. उनके शांति पूर्ण प्रदर्शन पर पाकिस्तानी सरकार ने गोलियाँ चलवाईं जिससे कई छात्र मारे गए. इनमें से चार छात्रों (अब्दुस सलाम, रफीकुद्दीन अहमद, अब्दुल बरकत और अब्दुल जब्बर) का नाम विशेष सम्मान के साथ लिया जाता है. इस दिन को ‘अमर इकुस’ (अमर इक्कीस) के नाम से जाना जाता है और प्रतिवर्ष लोग शहीद मीनार पर लाखों की संख्या में पहुँच कर भाषा आन्दोलन के नायकों और शहीदों को श्रद्धाजंलि देते हैं. प्रतिरोध स्वरुप काले और सफ़ेद कपड़े पहनते हैं. बांग्ला भाषा की वर्णमाला के अक्षरों को दुकानों और बाजारों से लेकर घरों और संस्थाओं में सजाया जाता है. यह दिन बांग्लादेश में राष्ट्रीय पर्व के रूप में मनाया जाता है. यह ऐसा दिन है जब बंगाली समाज अपनी सांस्कृतिक अस्मिता के लिए अपनी प्रतिबद्धता को प्रदर्शित करता है. भारतीय बंगाली भी इसे गौरव से याद करते हैं.

१२.०१ मिनट पर शहीद मीनार पर राष्ट्रपति जिल्लुर रहमान ने श्रद्धांजलि दी. उसके बाद प्रधानमंत्री शेख हसीना वाजेद से लेकर साधारण जनता तक ने पूरे दिन उत्साह से अपनी भावना प्रकट की. समय का चुनाव ही इस दिन के उत्साह को जाहिर कर देता है. रात के १२ बजे सारा देश इसमें शामिल हो जाता है. राष्ट्राध्यक्ष इस समय सार्वजनिक कार्यक्रम में शामिल होते हैं. उनके साथ ही पूरा शासक वर्ग और समाज. भारत में कोई राष्ट्रीय पर्व रात में मनाया जाता हो ऐसा नहीं देखा गया.

बांग्लादेश से हम भारतीय क्या सीख सकते हैं? अपनी मातृभाषा और संस्कृति को लेकर जितना सम्मान का भाव उनमें दिखाई देता है उतना भारतीयों में नहीं. बांग्लादेश भारत की तरह भाषाई विविधता वाला देश नहीं. इसलिए इसे भारत की तरह कई भाषाई समूहों के बीच तालमेल बनाए के लिए संघर्ष नहीं करना पड़ता और अंग्रेजी को बीच में घुसने का मौका नहीं मिलता है. लेकिन सांस्कृतिक उपनिवेशवाद से अपने को बचाए रखने में उसने भारत से अधिक दृढ़ता का परिचय दिया है. यह सायास दृढ़ता यहाँ की सड़कों पर उतरते ही पता चल जाती है. भारतीय समाज क्या मातृभाषा दिवस को एक अवसर के रूप में लेते हुए अपनी भाषाई विविधता और मातृभाषाओं के विकास के लिए आगे आयेगा और औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्ति का रास्ता चुनेगा?

 आनंद पांडेय, जिला अंबेडकर नगर, अवध कै रहवैया हुवैं। जे.एन.यू  से उच्च सिच्छा औ पी.एच.डी हासिल किहिन। इस्टूडेंट पालिटिक्स से जुड़ा रहे। सामाजिक औ साहित्तिक मुद्दन पै आपन राय हौके-मौके रखा करत हैं। इनसे आप  anandpandeyjnu@yahoo.co.in  पै संपर्क कै सकत हैं। 

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