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अकेलै बढ़ौ हो!

कविवर रवींद्र नाथ टैगोर कै ‘एकला चलो रे’ मनै-मन बहुत सालन से गुनगुनात रहेन। मन का आसा से भरै वाला ई गीत हमैं सुकून दियत है, अइसे बहुतन क दियत होई। आज यहिका मनोज जी के पोस्ट पै जाइके अर्थ से तान भिड़ाइ के सुनेन, किसोर कुमार साहिब की आवाज मा। मन मा आवा कि लाओ यहिकै अवधी अनुवाद करी। जौन बनि परा किहेन। अब पढ़ैया लोगै बतावैं कि केतना बनि पावा है! 

अकेलै बढ़ौ हो!

केउ न सुनै जउ पुकार,
अकेलै बढ़ौ हो!

केउ कहै-सुनै न कुछू,
मुँह फिराइ लेइ।
अस अभागि जागि जाइ,
भय दिखाइ देइ।
अपने मुँहे अपन बाति,
मन मा गहौ हो!
..अकेलै बढ़ौ हो! 

डगर-डगर काँट भरी,
केऊ नहीं पास।
अस अभागि जागि जाइ,
दूर जाँय खास।
राह-राह, काँट-काँट,
रउँदि चलौ हो!
..अकेलै बढ़ौ हो! 

जउ अँजोर केउ न करै,
स्याह राति होइ।
अस अभागि जागि जाइ,
बवंडर झँकोइ।
हिये पीर-अगन कइ,
अँजोर करौ हो!
..अकेलै बढ़ौ हो!

[मूल(बांग्ला) – रवींद्र नाथ टैगोर, ‘एकला चलो रे’ / अनुवाद(अवधी) – अमरेंद्र]

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