‘पाहीमाफी’ [३] : मन लरिकइयाँ कै नरम-नरम

16002909_368661613493762_7146674138761624111_nसिसिलेवार ढंग से पोस्ट कीन जाति, आशाराम ‘जागरथ’ कय रचना, ‘पाहीमाफी’ कय ई तिसरका हिस्सा आपके सामने रखा जात अहय। यहिके पहिले केरी कड़ियन क पढ़य खातिर यहिपै क्लिक करैं : “पहिला भाग” ,  “दुसरका भाग” । तौ आज यहि तिसरके हिस्सा कय पाठ कीन जाय औ अपने बिचार से अवगत करावा जाय। : संपादक
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मन लरिकइयाँ कै नरम-नरम

गोरहर झुर्री करिया गोदना
आजी कै लम्बा डील-डौल
बित्ता से बेसी यक घेंघा
गटई मा लटकै गोल-गोल
झिर्री यस धोती मारकीन
पहिरे कमीज हरियर-हरियर
चाँदी कै हँसुली पौवा भै
घेंघा म् बाझै करिया-उज्जर
महकै घिउ-दूध-दही गम-गम
बइठी जब वनके गोदी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

बगल धरे कजरौटा-डोकवा
बूढ़ी माई लगावैं बुकवा
कहैं दूध ई गुट कै जाव
नाहीं तौ आ जाई बिगवा
‘कीचर-काचर कौवा खाय
दूध-भात मोर भैया खाय’
दइ कै काजर दूनौ आँखी
एक डिठौना दियैं लगाय
जुरतै भाग हुवां से जाई
खेली धूरी-माटी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

गोड़ मोड़ि आजी बैठावैं
घंता-मंता खूब खेलावैं
गोदी मा दुपकाय लियैं औ
पौंढ़े-पौंढ़े गीत सुनावैं
घोरतइयाँ तांई नंगाई
डांट दियैं तौ चुप होय जाई
सुबुक-सुबुक कै बीदुर काढ़े
रोय-रोय हम करी ढिठाई
गरम जलेबी छनै छना-छन
सपना देखी राती मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

ऊ दिन अबहूँ बाटै याद
मेला देखै कै फरियाद
घर मा फूटी कौड़ी नाही
रोई हम समझी न बात
ना रोवो अब जाओ मान
नाहीं तौ कउवा काटी कान
कनियाँ लइकै बूआ हमकां
उंगुरी-सीध देखावैं चाँद
‘लकड़सुन्घौवा पकरि लेअ थै
मेला वाली राही मा’ 
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

गाँव म् जब केउ परै बेमार
होय जरूरी काम अकाज
खाय-खाय खरखोदवा घर मा
बइठे रोग ठीक होय जाय
लेकिन अगर रोग गंभीर
गलि कै ठठरी हुवै सरीर
कहाँ से लावै पइसा-कौड़ी
दवा से सस्ता मरै फकीर
कहँरै अउर महिन्नौँ झेलै
खटिया लधा ओसारे मा 
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

हमरी आजी जब मरी रहीं
घेंघा मा पाका भवा रहा
कउनौ ना दवा–दवाई भै
बस खाली सेवा भवा रहा
भैया रहे ‘राम लौट’ बड़के
पेटे मा दर्द उठै वनके
रहि-रहि चिल्लायं रात भै वै
रोवैं माई बइठे–बइठे
चलि बसे रोग पथरी लइकै
जिनगी के सोरह साली मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

तप्ता बारि सब सेकैं आँच
हम खेली औ खाई डांट
खूब लगै कसि कै जब जाड़ा
कट-कट-कट-कट बोलै दांत
पैरा बिछै के ओढ़ी कथरी
जाड़ लगै होइ जाई गठरी
टी० बी० रोगी माई खांसैं
पूरी देहियाँ खाली ठठरी
सिकहर टांगी रोटी खाई
स्वाद रहा खुब बासी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

मासा लागैं सोय न जाय
काटैं उडुस बहुत खजुवाय
यक्कै बेना के-के हाँकै
लागै गरमी सहि न जाय
उठी रात खुब पानी पीई
छींटा मारि बिछौना भेई
कबहुं-कबहुं तौ रात म उठि कै
फरवारे मा जाय कै सोई
ढुरुक-ढुरुक कै चलै बयार
रहि – रहि लागै देहीं मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

सूरज का लुकुवावै बदरी
बहुत जोर जब घेरै कजरी
बरसै तड़-तड़, चूवै छप्पर
अरगन टाँगी भीजै कथरी
दस-दस दिन बरखा न जाय
सूखै ना कपड़ा गन्धाय
कीच-काच मा आवत जात
गोड़ कै उंगुरी सरि-सरि जाय
चुवै ओरौनी झर-झर-झर-झर
उठै बुलबुला पानी मा 
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

गौधुरिया घेरै अन्हियार
कंडी लइकै माँगी आग
तान टेर बोलै करकच्ची
हुआँ-हुआँ चिल्लाय सियार
जुगुनू उडै  गिनी हम तरई
बदरा लागै भागत मनई
झूरा परि गै खतम अनाज
सुनतै खून घटा यक परई
पढ़ी तो ढिबरी बुत-बुत जाय
तेल दिया न बाती मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

एक रात अन्हियारी घरिया
गाभिन भइस बियाइस पड़िया
जुगुर-जुगुर ढिबरी मा लौकै
नान्ह कै लेरुआ करिया-करिया
खुटुर-पुटुर कुछ साफ-सफाई
टूटी नींद नाहिं फिर आई
पेउस दूध गारि बल्टी भै
इनरी ढेर बनाइन माई
नेसुहा कोयर बालैं दादा
लाय हरेरा खाँची मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

सुबह-सुबह मकलाय पड़उवा
दूध पियै घरिया मा लेरुआ
घड़- घड़- घड़- घड़ जाँता बोलै
कड़िया मा घप-घप्प पहरूवा
सानी-पानी, हौदी-नादा
तापैं तपता बारे आजा
उखुड़ी छोलै कां गोहरावैं
पहँटैं हँसिया अउर गड़ासा
भुजिया धिकवैं बूढ़ी माई
बुज्जा फूलै हांड़ी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

यक ठू गीत सुनावत बाटी
वोकर अरथ बतावा साथी
वोका-बोका तीन तिलोका
लइया लाठी चन्दन काठी
अमुनिक जमुनी पनिया पचक
खेलैं कुल लरिके मटक-मटक
चिउँटा-चिउँटी, हाथी- घोड़ा
तू का लेबा झट-पट बोला
हाथ पे हाथ धरे तर ऊपर
मूड़ भिड़ाये मूड़ी मा 
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

होत भिनौखा यक ठू भाट
खझरी बजा के गावत जाय
‘उवा सुकौवा भय भिनसार
टटिया खोला हे जजमान
सुन्दर मौनी सुंदर दान
सुन्दर पूत दियैं भगवान’
सोची काहे ई मांगत बा
हट्टा-कट्ठा एक किसान
दादा बोले तू न बुझबौ
भिच्छा यकरे जाती मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

नियति-स्थिति औ लाचारी
लियै परिच्छा बारी-बारी
पीकै घूँट खून कै जब-तब
सोची-समझी अउर विचारी
ऊँच-नीच के दिहिस बनाय़  
धन-धरती कां बाँटिस नाहि
काम करै सगरौ दिन केऊ
केऊ खाली बइठे खाय
कबहूँ कहूँ मिलै ना उत्तर
ढूढ़ी रोज किताबी मा 
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

unnamedपूजेन पहाड़ तब्बौ ना पायन
काव मिला जब हम सधुवायन
कइसे कही झूठ बा दुनिया
दूइ दिन से कुच्छौ ना खायन
‘गीता’ बोलै बस काम करा
फल-वल कै चिंता छोड़ि चला
वहि राही चले बाप – दादा
भुखमरी औ छूआछूत मिला
भेड़िया – धसांन मा ना रहिबै
कूदब ना कूआँ – खाई मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

 __आशाराम जागरथ

[जारी….]

‘पाहीमाफी’ [२] : दसा-दुरदसा औ दयू कै रिसियाब-मानब

उहै निमिया.

उहै निमिया.

सिसिलेवार ढंग से पोस्ट कीन जाति, आशाराम ‘जागरथ’ कय रचना, ‘पाहीमाफी’ कय ई दुसरका हिस्सा आपके सामने रखा जात अहय। यहिके पहिले केरी कड़ी पढ़य खातिर यहिपै क्लिक करैं : “पहिला भाग” । तौ आज यहि दुसरे हिस्सा कय पाठ कीन जाय औ अपने बिचार से अवगत करावा जाय। : संपादक
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  • दसा-दुरदसा

जहाँ जाति बसै हर जाती मा
जाती के बोली – बाती मा
जाने, अनजाने, कारन मा
यक दूजे  के व्यहारन म़ा
जहाँ बसै हिकारत, भेदभाव 
कनखी नजरन की आँखी मा
भुखमरी – गरीबी फरै जहाँ
खेती  के काल – कलाही मा
ऊ गाँव कबहुँ बिसरत नाहीं
जहाँ लोटेन धुरी – माटी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

बसा रहैं चाहे अगल-बगल
पर जाति-जाति कै काम अलग
वइसै देखय मा एक गाँव
पर अन्दर-अन्दर अलग-थलग
केव ऊँच रहै केव नीच रहै
केउ ऊँच-नीच के बीच रहै
केउ सबके बीच मा पूजनीय
केउ सबके लिये अछूत रहै
मरनी-करनी, सादी-ब्याहे
इक कौम दिखै इक जाती मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

नजर-नजर मा बसै हिकारत
पहिया’ भेद-भाव कै भारत
पैदा करैं जाति मेहरारू
मरद वैमनस-इर्खा-स्वारथ
ऊपर देखे मा सदभाव
अन्दर-अन्दर गहिरा घाव
बसै गाँव मा जाति-समूह
सबमा छूत-छात कै भाव
काम न आवैं गैर-बिरादर
सादी अउर बियाहे मा 
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

बाभन-ठाकुर कै धाक रहै
मेहनत कै काम हराम रहै
हर कै मुठिया जौ पकरि लियैं
तौ पूरे गाँव मजाक उडै
खेलैं-कूदैं औ मौज करैं
चुरकी पै बहुत गुमान करैं
दुसरे कै हिस्सा खाय-खाय
कुछ लोगै बहुत मोटान रहैं
कुछ रहैं अकेलै दीन-हीन
बस चन्दन – टीका माथे मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

बढ़ई-धोबी-नाऊ-लोहार
गाँव भरेन कै सेवादार
लेहना अउर तिहाई बदले
काम करैं वै सालौंसाल
बस बिगहा दुइ बिगहा खेत
खेती होय बटइया जोत
भूमिहीन बन रहैं चमार
बभनन के खेतै ही खेत
तेली-तमोली-अहिर-कहार
करैं गुजारा जाती मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

जेतने मा जे जेस जहां रहै
वतनै मा ऊ परेसान रहै
केव कहै बिना घी ना खाबै
केहू के घर ना नोन रहै
तब्बौ लोगै खुसहाल रहैं
हँसि-हँसि कै खूब मजाक करैं
खाना-कपड़ा के आगे वै
कउनौ ना सोच-विचार करैं
भगवान भरोसे जियत रहे 
कोसैं सब खाली किस्मत का
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

धोबी पासी कोरी चमार
वोऊ करैं जाति कै मान
यक दूजे से छूत मनावैं
अपुआँ दियैं ऊँच अस्थान 
अधोगति पै सब चुपचाप
भीतर-भीतर रहैं निरास
बोलै कै हिम्मत ना होय
बाभन-ठाकुर खड़े हों पास
हीन भावना तुनकमिजाजी
बाढ़ै खूब गरीबी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा                   

चूल्हा काव चढ़ा बा माई ?
जात हई खोदै बिरवाही
पेटे मा चूहा कूदत बा
दइ द्या रोटी सुक्खै खाई
बथुआ जाय खोंटि लायू तू
सगपहिता कय दाल बनायू
कोदई क् भात ज्वार कै रोटी
देसी घी से छौंक खियायू
नीक-सूक दिन जल्दी बहुरे
गल्ला होई खेती मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

गाँव-गाँव मा नसा तमाम
बीड़ी-खैनी, गाँजा-भाँग
कहूँ पै गुड़-गुड़ हुक्का बोलै
कहूँ खाय केव दोहरा-पान
एक दसहुनी बाभन गांवै
महुआ-दारू नीक बनावैं
छूत-अछूत कां यक्कै घाटे
खटिया पै बैठाय पियावैं
चिलम-चुनौटी अउर सरौता
झूलै थैली-थैली मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

बरगद तरे मदारी आवा
डुग-डुग-डुग-डुग करै दिखावा
नाचै बानर लाठी लइकै
बंदरिया कै करै मनावा
ना मानें पै लाठी भांजै
हियाँ-हुवाँ बंदरिया भागै
सबके आगे जाय-जाय फिर
लिहें कटोरा पइसा मागै
वोकरे पहले खिसक लेई जब
कौड़ी नाहीं जेबी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

कातिक कै जोता खेत रहा
जाड़ा मन माफिक होत रहा
दुइ गाँव के हुम्मा-हुम्मी मा
वहि रोज कबड्डी होत रहा
हमरी ओरी कै यक पट्ठा
गोड़छन्हिया बहुतै नीक रहा
जेका ऊ पकरि कै छान लियै
समझौ फिर पाला दूर भवा
इरखा मा गोड़वै तूरि दिहिन
यक जने जानि कै खेलत मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

  • दयू रिसियाने – मनाये माने

बोलअ थै चिरई चौं-चौं-चौं
भूँकत बा कुकुरौ भौं-भौं-भौं
पगुराब छोड़ि अनकत बाटे
कनवा पारे बैलै दूनौं
उपराँ बादर बा लाल-लाल
घेरत बा बहुत डरावत बा
लागत बाटै लंगडी आन्हीं
पच्छू वोरी से आवत बा
चूल्हा कै आग बुझाय दियौ
ईंहन धइ लेत्यू छाहें मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

आइस लंगडी आन्हीं चढ़ि कै
खर-खुद्दुर-धुंध-धूलि-धक्कड़
दिन कै उजियारा आन्हर भै
चौतरफा अन्धियारा – अंधड़
टोवैं मनई तगड़े-तगड़े
सूझै ना लगहीं खड़े-खड़े
हमहूँ यक जगहाँ फँसा रहेन
बाँसे के कोठी मा जकड़े
यक पेड़ महा कै उखरि परा
गिरि परा धड़ाम से बगली मा 
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

परलय टरि गै, अन्हियारा कम
बचि गयन मौत के मुंह से हम
पूरे देहीं गर्दय – गरदा
जिउ आन भवा आन्हीं  गै थम
खरिहान से कुलि भूसा उड़ि गै
कपड़ा – लत्ता – खरही – छपरा
गिरि परे तमाम पेड़-पालव
सीवाने मा सारस पटरा
यक बूढ़ा उड़ि कै परी रहिन
डहरी के बगले गड़ही मा 
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

बिजुरी चमकै, गरजै  बादर
बरसै पहिला पानी असाढ़
गड़ही-गुड़हा उफनाय जाय
भरि जाय लबालब खेत-ताल
रतिया बीतै भिन्नहीं होय
लाली वाले सूरज निकरैं
पीयर-पीयर धोती पहिरे
खुब टर्र-टर्र मेघा बोलैं
हफ्तन गूंजै काने अवाज़
बसि जाय नज़ारा आँखी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

पानी ना बरसै सावन जब 
टोटका सब लोग तमाम करैं
लरिकन कै टोली निकरि जाय
सीधा पिसान घर-घर उगहैं
मिलि लोट-पोट गावैं लरिके
उल्टा मेघा हाथे पकरे
काल–कलौटी, उज्जर धोती
कारे मेघा पानी दइ दे’
पोखरा मा जायं नहांय, बनै
भौरी–भर्ता तब बगिया मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

unnamed

कुछ बड़े घरन कै मेहरारू
राती मा खेते हर नाधैं
केव बैल बनै दहिना, बावां
केऊ हर कै मुठिया थाम्हैं
धइ लियैं जुआठा कान्हें पै
जोतैं निकारि कै पहिरावा
‘बड़कऊ’, ‘फलाने’ कहाँ हया
पानी लइकै जल्दी आवा
आये डेरात मुला भागि लिहिन
धइ गगरा दूर जमीनी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

 __आशाराम जागरथ

[जारी….]

`पाहीमाफी’ [१] : परिचय, गूँग गवाह औ’ पहिया गाँव-कुदरती ठाँव.

यहि रचना पै अबहीं कुछ तनकीदी तौर पै न कहब। हड़बड़ी होये। रचना पुराय क अहय, कुछय हिस्सन से रूबरू भयेन। यहिकै लगभग पचास इस्टैंजन का देखे के बाद ई जरूर कहब कि अस रचना अबहीं तक नाहीं भै बा। लोकभासा अवधी मा यहिके लिखा जाय कय खास तुक हय जौन आसाराम जागरथ जी नीचे बताये अहयँ। यहि रचना का देखिके हम खुसी से खिलि उठा हन। जोखिम उठाय के एतना जरूर कहा चाहब कि ई रचना अपने बिसय औ सिल्प के लिहाज से आधुनिक अवधी साहित्य कै यक उपलब्धि हुवय कय पूरी चुनौती पेस करति अहय। कयिउ हिस्सन मा आप यहिका पढ़िहैं। कल्ले-कल्ले हाजिर करब। यहिकै इजाजत दियै खातिर आसाराम जागरथ जी कय बहुत आभारी अही। : संपादक

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नीम कय पेड़: पाहीमाफी कय गूँग गवाह.

[पितामह पेड़ नीम का : हमारे बचपन के बुजुर्ग भी अपने बचपन में इस पेड़ को इसी ‘आकार- प्रकार’ का देखा हुआ बताते थे. इसकी उम्र के बारे में कुछ भी नहीं बता पाते थे. यही एक पेड़ है जो 1981 में घाघरा के कटान से जमींदोज हो चुके ‘पाहीमाफी’ गाँव का एकमात्र गवाह बचा है.  इसके पोर-पोर में ग्रामीण जीवन के सदियों के सांस्कृतिक-सामाजिक-आर्थिक दशा के राज छिपे हैं. हर साल बरसात के मौसम में थोड़ा-थोड़ा करके दक्षिणी छोर के खेत खलिहानों को पहले ही काट चुकी नदी 1981 में गाँव पर हमला बोलती है. मैं हाई स्कूल पास कर चुका था और 18 किलोमीटर दूर के एक स्कूल में दाखिला लेना था. कटान को देखते हुये पिता जी के विरोध के वावजूद माँ ने जाने की इजाजत दे दी . मैं सुबह पैदल निकल गया और दाखिला लेकर सीधे नाना के घर सहायता के लिए चला गया. कुल  लगभग 40 किलोमीटर पैदल चल कर ननिहाल पहुंचते-पहुंचाते रात हो गयी. दूसरे दिन सुबह कुछ मददगार आदमियों के साथ जब मैं अपने गाँव पहुंचा तो देखता हूँ कि मेरा घर नहीं था. कटान में कट चुका था. बस केवल उजड़ी हुई ‘चन्नी’ बची थी. और मेरी आँखों के सामने वह भी देखते-देखते जमीदोज हो गयीे. माँ-बाप-भाई-बहन मिलकर जो कुछ सर-सामान बचा पाये थे , इसी पेड़ के नीचे धरा था.

दो-एक साल इसी पेड़ के बगल एक पाण्डेय जी की जमीन में झोपड़ी धर कर गुजारा किया. फिर परिस्थितियों ने गाँव छुड़वा दिया. जन्म देने वाला गाँव, पाहीमाफी में बचपन के 18 साल गुजरे. परन्तु उमड़ते-घुमड़ते नज़ारे हमेशा नाचते रहते हैं. कुछ लिखने की कोशिश में आत्मकथात्मक शैली में यह अवधी कविता ही बन पा रही है जिसका कुछ अंश आपके सम्मुख हैं.  इसकी रचना अभी भी जारी है और किसी भी अंतिम नतीजे पर नहीं है.  इसलिये यह रचना अपनी लिखावट और बुनावट में किसी भी संशोधन के अधीन है. वैसे मेरी एक कविता-संग्रह  ‘कविता कलाविहीन प्रकाशित हो चुका है जो हिन्दी में  है. परन्तु ‘पाहीमाफी यक गाँव रहा’ मेरी मातृभाषा अवधी में  है. क्योंकि मैं समझता हूँ कि जली-भुनी संवेदनाओं और भावनाओं को उकेरने में यह एक ससक्त माध्यम है। : आशाराम ‘जागरथ’ /19.12.2016]
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  • गूँग गवाह

खाये-पीये खूब अघाये
बीते दिन कै याद सताये
टहनी- टहनी, पाती-पाती
बहुत जने कै राज दबाये
कोऊ आवै, कोऊ जाये
कोऊ छाँहे बइठ छहाँये
काली चौरा के आँगन मा
बिन कुम्हलाये, बिन मुरझाये
जड़े जमाये कऊ दशक से
गड़ा बा गहरी माटी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा.

सुख-दुःख-गम खाय के भयौ बड़ा
हे नीम ! तू काहे हरा-भरा
केव न्याय करै, अन्याय करै
तोहरे बरदास्त कै पेट बड़ा
तोहरे सँग्हरी कै साथी सब
मरि-उखरि परे या झुराय गये
जब काल कै गाल बनी नदिया
जड़-मूल समेत समाय गये
तबहूँ तू हयो मुंह बांधें खडा
केतना कुछ घटा कहानी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

टुकुर-टुकुर यकटक ताकत
हे नीम ! तू पेड़ पुरान भयौ
केउ चोर रहै या साह रहै
सबका पनाह तू देत रह्यौ
तू भयौ पुरनियाँ काव कही
तोहरे बा लेखा और बही
मनहग चाहे रिसियान रहौ
अब तुहैं गवाही दियै क परी
बा मोट-मोट ई हाथ-गोड़
कब आई केकरे कामे मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

केतना लोगै आवा होइहैं
थकि-चूरि पथिक बइठा होइहैं
दुनिया औ देश – जवारी कै
बतकही बहुत गावा होइहैं
मरि गये बहुत पइदा होइकै
अब दियौ बताय बहुत होइगै
यकतरफा धन-धरती बटिगै
कइसै सब छोट-बड़ा होइगै
तू ज्ञान कै हौ भण्डार भरा
सच-सच सच बोलि दियौ सबकां
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

  • पहिया गाँव : कुदरत कय ठाँव

‘पाहीमाफी’ येक था गाँव
‘पहिया’ वोकर दूसर नावं
बस्ती कै तहसील हर्रैया
मेर – मेर कै जाति बसैया
पूरब ‘चन्हा’ व ‘बानेपुर’
ताल किनारे ‘कटकवारपुर’
दक्खिन पुरवा ‘अचकावापुर’
‘पच्छू टोलिया’ औ ‘सरवरपुर’
बहुत दूर से चली डहरिया
मिलै नदी की घाटी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

‘पहिया’ खुब सँचरा गाँव रहा
कुदरत कै सुन्दर ठाँव रहा
खुब महा-महा, पीपर-बरगद
इमली-पाकड़ कै छाँव रहा
पूरब – पच्छू – उत्तर बगिया  
व दक्खिन दूर घाघरा नदिया
चारिउ ओर झाड़ – झंखाड़
गड़ही – गड़हा, ताल – तलैया
केहू कै घर नरिया-खपड़ा
केव करै गुजारा मड़ई मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

सधुवाइन कै सुन्दर कुटिया
थोरै दूर हुआँ से नदिया
अरहर-गंजी-जड़हन-धान
दूर – दूर  फैला मैदान
फरै बकाइन, चिटकै रेड़
गाँव म बत्तिस पीपर-पेड़
खाले-तीरे, डहर किनारे
झरबेरी कै पेडै  पेड़
पीपर-नीचे, सोर पे औंढ़े
नींद लगै पुरवाई मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

गहिर गड़हिया छटा अनोखा
बाँस-कोठि के बीच महोखा
टापैं बगुला, कूदैं मेघा
हरियर घास पै बोंकै-बोंका
बेहया-सरपत कै झलकुट्टी
बनमुर्गी-पड़खी-फुरगुद्दी
नेउर अउर चौगड़ा घूमैं
कहूँ पे सुग्गा कहूँ किलहटी
चालि-चालि कै भिट्ठ लगावैं
मूस-लोखड़ी झाली मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

जामुन के पुलुई मा लुकाय
कोयल कू-कू-कू करै पाठ
कहुँ चोंच मारि कै छेद करै
काटै कठफोड़वा कठिन काठ
झोंका पुरुवाई कै पाये
पीपर कै पाता हरहराय
कहुँ खाय-खाय डांगर डटि कै
डैना फैलाये गिद्ध घमाय
राती मा साही सैर करैं
दिन मा कुलि घुसी रहैं बिल मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

बीनै लोगै लकड़ी-कंडी
कोऊ चेहरै आलू-गंजी
हाथी दूर-दूर से  आवैं
पीपर-टैरा खूब चबावैं
चिक्कन-चौड़ी डहर दूर तक
चली जाय ‘टेल्हा’ के घर तक
देखे बड़ा मनोहर लागै
गोरु-बछरू भागैं सरपट
कडों-कडों जब करैं कड़ाकुल
झुंड कै झुंड सिवाने मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

लागै जब कुटिया कै मेला
भीड़ हुवै खुब ठेलम-ठेला
कँडिया-ओखरी-तवा-पहरूवा
बल्लम-फरसा-आरी-फरूहा
कूँड़ा-हाँड़ी, भुरका-मेलिया
बिकै गड़ासा, खुरपा-हँसिया
पलटा-करछुल, बल्टी-गगरा
पीतल-फूल कै लोटा-थरिया
दिहें मेंहावर, चलैं लजाउर
लरिका दाबे कांखी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

सेंनुर-टिकुली दिहें मेहाउर
दुलहिन थरिया म बीनैं चाउर
बोलिन सासू कां फुसिलाय
थोरै पइसा दइद्या आउर
जाबै हम ‘रमरेखवा’ मेला
खाबै गरम-ज़लेबी, केला
सासू बोलिन भीर हुवअ थै
धक्का-मुक्की ढेलम-ढेला
नाहीं तौ फिर हमहूँ जाबै
तीसी बाँध ल्या गठरी मा 
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

पट्ठे दंगल दाँव लगावैं
लोगै तीतर-भेंड़ लड़ावैं
फुलरा वाला करधन बान्हे
गेद-गेदहरै धावत जावैं
छौना साथे घूमै सुअरी
चलैं झुंड मा भेड़ औ बकरी
उबहन टांगे माई हमरे
चली जायं छलकावत गगरी
कोदइल संग मुरैला नाचैं
रूसा वाले झाली मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

भिटहुर बगल घूर कै गड्ढा
वहीँ किनारे उपरी-कंडा
भीत से चिपकी चिपरी चमकै
जेस तरई कै गोरखधंधा
छपरा चढ़ै देसौरी कोहड़ा
सेम-तरोई-लौकी-कोहड़ा
सरपुतिया-बोंड़ा कै झोप्पा
नेनुवा लटकै खड़ा लड़ेहरा
बथुआ  बहुत लमेरा जामै
गूमा खेते-खेते मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

unnamedहम गयन अजोध्या के मेला
सब पूछैं काव-काव देख्या

बोलेन खाकी वर्दी मा हम
बानर के बीच पुलिस देखा
यक लाल – लाल  टोपी वाला
आगे से डंडा पटक दिहिस
पीछे बांड़ा बानर नेपान
केरा कै झोरा छोरि लिहिस
मनई ही मनई तर-उप्पर
बतकही सुनायन हम सबकां 
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

[जारी….]

 

अलाउद्दीन साबिर केर अवधी गजल : का हुइहै!

अलाउद्दीन साबिर साहब कय ई गजल यहि अवधी ठीहे पै आवय कय गजब कहानी हय। यक दाँय हिमांशु बाजपेयी हमयँ ई गजल सुनाये रहे। सुनायिन तौ हमयँ बहुत नीकि लाग। तब उनका गजल कय पाँचौ सेर याद रहा। हम कहेन लिखाय दियव। कहिन बाद मा। फिर वय बाद मा यक सेर भूलि गये। बाकी बचे चार। पिछले यक साल से उइ, ऊ भूला सेर याद करत अहयँ मुला यादि नाहीं कइ पाइन। हमयँ लाग कि लावो चारै सेर डारि दी; का पता, यक सेर याद करय का छोड़ौ, उइ बाकी चारिउ भूलि जायँ। फिर आज उनका हम धइ दबोचेन, फेसबुक पय। चारौ सेर उइ लिखिन जौन हियाँ दीन जात अहयँ। साबिर साहेब के बारे मा पूछेन तौ वै एतना बतायिन कि साबिर साहेब कानपुर के यक मिल मा मजूर रहे। साच्छर नाहीं रहे। लखनऊ केरी बिक्टोरिया इसट्रीट मा रहत रहे। बादि मा कुछ समय के ताईं बंबयिउ गा रहे। हिमांशु क ई गजल बिलायत जाफरी साहेब सुनाये रहे जे साबिर साहेब के साथे कौनौ प्रोजेक्ट मा काम किहे रहे। यनहूँ से पहिले ई गजल हिमांशु कआबिद हुसैन साहब सुनाये रहे जे साबिर साहेब कय दोस्त रहे। तौ हाजिर हय ई गजल! : संपादक
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का हुइहै! : अलाउद्दीन साबिर

ब्योपार करे जे मज़हब का ऊ साहिबे ईमां का हुइहै
सिख और इसाई का हुइहै, हिन्दू औ मुसलमां का हुइहै।

रहबर जो रहेैं इल्मी हुइगे शाइर जो रहैं  फिल्मी हुइगे
जो आम रहैं कलमी हुइगे अब बारिसे इरफां का हुइहै।

उइ लूटि लिहिन हमरी बगिया उइ खाइ लिहिन सगरी अमिया
बस तन प लंगोटी बाक़ी है, अब चाक गिरेबां का हुइहै।

बरबाद गुलिस्ता करिबे का बस ऐकै उल्लू काफी है
जहां डाल डाल पर उल्लू हैं अंजामे गुलिस्ता का हुइहै।

अवधी गद्य में अनंत शक्ति है : त्रिलोचन

बरवै छंद मा ‘अमोला’ लिखय वाले अवधी अउ हिन्दी कय तरक्कीपसंद कवि तिरलोचन से अवधी कथाकार भारतेन्दु मिसिर बतकही किसे रहे सन्‌ १९९१ मा, जवन १९९९ मा रास्ट्रीय सहारा अखबार के लखनऊ संस्करन मा छपी रही। बाद मा यहय बतकही तिरलोचन केरी ‘मेरे साक्षात्कार’ किताब मा छापी गय। मजेदार लाग कि यहि बतकही कय आधा हिस्सा अवध अउ अवधी से ताल्लुक राखत हय। ई हिस्सा काहे न यहि बेबसाइट पय आवय; इहय सोचिके यहिका हियाँ हाजिर कीन जात अहय। छापय कय अनुमति मिसिर जी दिहिन, यहिते आभारी हन्‌। : संपादक
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वर्तमान हिन्दी कविता पर महानगरीय बोध या कोरी आंचलिकता का प्रभाव है परन्तु आपकी कविताएं अवधी चरित्र से अधिक जुड़ी है इसका मूल कारण क्या है ?
  
नगर में रहने वालों का व्यावहारिकimg_20161111_174813 ज्ञान का स्तर कम होता है क्योंकि गांव वालों का व्यावहारिक प्रत्यक्षीकरण करने का उन्हें सुयोग ही नहीं मिलता। मिलना-जुलना भी बहुत कम होता है। महानगरीय जीवन में फूल-पौधे वन आदि दुर्लभ होते हैं। ये सब गांवों में सुलभ हैं। गांव का बालक किताब पढ़ने में भले ही कमजोर हो वनस्पति ज्ञान में नगर के बालक से आज भी असाधारण है। वह वनस्पति, पशु और मनुष्य के नाना रूपो में चेतना के विकास के साथ-साथ जिसकी चेतना का विकास होता है। रचनाकार होने पर वह जीवों के पारस्परिक सम्बन्धों को भी अच्छी तरह रख सकता हैं। हमारे प्राचीनतम महाकवि न नगर निंदक थे न ग्राम निंदक और न अरण्य जीवन के; इसी कारण वे पूर्ण कवि थे। जीव और जीवन के निकट होने पर ही कोई कवि हो सकता है। मेरी चेतना का विकास या निर्माण अवध के परिवेश में हुआ, यदि अवध को मेरा पाठक मेरी रचना से पहचानता है तो मेरा रचना कार्य सफल ही कहा जाना चाहिए।

भौजी’, ‘उस जनपत का कवि हूं, झापस, नगई महरा तथा चैती मेंकातिकपयान जैसी कविताएं आपकी मौलिकता को रेखांकित करती हैं, आपको इन चरित्रों ने किस प्रकार प्रभावित किया?

मेरी रचनाओं में जो व्यक्ति आए हैं वे इसी भूतल पर मुझे मिले, उनमें से आज कुछ हैं कुछ नहीं हैं। लोग चाहें तो कह सकते हैं कि मेरी अनुभूतियां अवध को नहीं लांघ पातीं लेकिन मैं भारत में जहां कहीं गया हूँ वहां के भाव भी वहां के जीवन के साथ ही मेरी कविताओं में आए हैं। मेरे यहां अवध के शब्द मिलते हैं लेकिन अन्य राज्यों के अनिवार्य शब्दों का आभाव नहीं है। मैं आज भी गांव की नीची जाति के लोगों के साथ बैठकर बात करता हूं। अवध के गांवों को तो मैं विश्वविद्यालय मानता हूं। ‘नगई महरा’ से बहुत कुछ मैंनें सीखा, वह कहार था- गांजा पीता था पर उसे बहुत से कवियों के कवित्त याद थे। सांईदाता सम्प्रदाय तथा बानादास की कविताएं भी उससे सुनी थीं। उसी के कहने से मैं सांईदाता सम्प्रदाय को जान पाया। नगई उस सम्प्रदाय से भी जुड़ा था। उस पर अभी एक खण्ड और है जो लिखना है। अवध में गांव के निरक्षर में भी सैंकड़ों पढ़े-लिखों से अधिक मानवता है। गांवों में शत्रुता या मित्रता का निर्वाह है, यहां ऊपर की मंजिल वाले नीचे की मंजिल वालों को नहीं जानते।

बंसीधर शुक्ल, गुरुभक्त सिंह मृगेश पढ़ीस, रमई काका, चतुर्भुज शर्मा, विश्वनाथ पाठक, दिवाकर आदि के बाद अवधी लेखक में किस प्रकार के परिवर्तन की आवश्यकता है ?

अवधी में पढ़ीस, रमई काका, बंशीधर शुक्ल, चतुर्भुज, विश्वनाथ पाठक आदि उस कोटि के आदरणीय कवि हैं जैसे छायावाद के हैं। निराला ने प्रभावती उपन्यास में तीन पद अवधी में लिखे हैं, एक भोजपुरी पद भी सांध्य काकली में लिखा है। मानसिकता का अंतर मिलता है। गांव में पुस्तकालय हो तो गांव साक्षर हो। मानसिकता, शिक्षा व उनके व्यवहार आदि में विकास हो। मैं समझता हूं कि चेतना के कुछ ऋण होतें हैं उन्हें उतारना चाहिए। मैंने अपने गांव के केवटों को अवधी कविताएं सुनाई, उन कविताओं को सुनकर एक संतवृत्ति के बूढ़े केवट ने कहा ‘यह सब तो क्षणिक हैं।’ दूसरी बार वहां के चरित्रों को लिखा तो उसने पसंद किया। जिसे आज लिखा जा रहा है उसे समझने वाले लोग भी होने चाहिए। गांवों में सदाचार को प्रतिष्ठित करने का काम अवधी से किया जा सकता है। यदि रीतिकालीन कविता पर भक्तों व संतों की कविता का प्रभाव न जमा रहा होता तो गांवों में अशालीनता बढ़ गयी होती अत: सदाचार की प्रतिष्ठा संत कवियों ने ही की। अवधी में इस प्रकार का कार्य अभी भी किया जा सकता है।

अवधी की बोलियों में एकरूपता कैसे बनाई जा सकती है, आपकी दृष्टि में बिरवा की क्या भूमिका हो सकती है?

मेरा कहना है कि जो जिस अंचल का है उसी रूप में उसका लेखन हो। यदि मैं सीखकर लिखूं तो सीतापुर की बोली में भी लिखूंगा पर जो वहां का निवासी कवि है वह अधिक श्रेष्ठ लिखेगा, अत: मेरी दृष्टि में इन्हें एकरूपता देने की अवश्यक्ता नहीं है। वंशीधर जी ने  अवधी में गद्य लिखा है वह मिले तोउसे ‘बिरवा’ में प्रकाशित करना चाहिए। भाषा सपाट नहीं होती रचनाकार की दृष्टि सपाट होती है। अत: कहीं की बोली को स्टैण्डर्ड मानने के बाद वहां की संस्कृति भी सटैण्डर्ड हो जाएगी। इसलिए किसी भी क्षेत्र को स्टैण्डर्ड मत बनाइए। संक्रमण क्षेत्रों की भाषा को भी मानिए। उसका मानवीकरण (Highly Local) हो। तब कोष बने। अवधी के गद्य  में अनन्त शक्ति है, वह शक्ति हिन्दी खड़ी बोली में भी नहीं है। उसमें विभक्तियां हैं। ‘बिरवा’ यदि मानक कोष का स्वरूप तय करना चाहे तो उसके लिए मैं टीम को प्रशिक्षण दे सकता हूं। 

बजरंग बिहारी ‘बजरू’ केर गजल (२) : उठाए बीज कै गठरी सवाल बोइत है!

कवि बजरू के्र गजलन की पहिली कड़ी के बाद ई दूसरि कड़ी आय। पहिली कड़ी  ‘हियाँ’ देखयँ। अब सीधे गजलन से रूबरू हुवा जाय। : संपादक
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[१] 

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कवि बजरू

का बेसाह्यो कस रहा मेला
राह सूनी निकरि गा रेला
बरफ पिघली पोर तक पानी
मजाखैंहस संगसंग झेला।
के उठाए साल भर खर्चा
जेबि टोवैं पास ना धेला।
गे नगरची मुकुटधारी
मंच खाली पूर  भा खेला
बहुत सोयौ राति भरबजरू
अब लपक्यो भोर की बेला।

[२]

जियै कै ढंग सीखब बोलिगे काका
भोरहरे तीर जमुना डोलिगे काका।
आँखि  अंगार  कूटैं  धान  काकी,
पुरनका घाव फिर से छोलिगे काका।
झरैया  हल्ल  होइगे  मंत्र  फूंकत
जहर अस गांव भीतर घोलिगे काका।
निहारैं   खेत   बीदुर  काढ़ि  घुरहू,
हंकारिन पसु पगहवा खोलिगे काका।
बिराजैं   ऊँच   सिंघासन   श्री   श्री
नफा नकसान आपन तोलिगे काका।
भतीजा हौ तौ पहुंचौ घाटबजरू
महातम कमलदल कै झोरिगे काका।

[३]

उठाए बीज कै गठरी सवाल बोइत है
दबाए फूल कै मोटरी बवाल पोइत है।
इन्हैं मार्यौ उन्हैं काट्यौ तबौं प्यास बुझी
रकत डरि कै कहां छिपिगा नसै नसि टोइत है।
जुआठा कांधे पर धारे जबां पर कीर्तिकथा
सभे जानै कि हम जागी असल मा सोइत है
कहूं खोदी कहूं तोपी सिवान चालि उठा
महाजन देखि कै सोची मजूरी खोइत है।
घटाटोप अन्हेंरिया उजाड़ रेह भरी
अहेरी भक्त दरोरैं यही से रोइत है।

[४]

देसदाना भवा दूभर राष्ट्रभूसी अस उड़ी
कागजी फूलन कै अबकी साल किस्मत भै खड़ी।
मिली चटनी बिना रोटी पेट खाली मुंह भरा
घुप अमावस लाइ रोपिन तब जलावैं फुलझड़ी।
नरदहा दावा करै खुसबू कै हम वारिस हियां 
खोइ हिम्मत सिर हिलावैं अकिल पर चादर पड़ी।
कोट काला बिन मसाला भये लाला हुमुकि गे।
बीर अभिमन्यू कराहै धूर्तता अब नग जड़ी।
मिलैं ‘बजरू’ तौ बतावैं रास्ता के रूंधि गा 
मृगसिरा मिरगी औ’ साखामृग कै अनदेखी कड़ी।  
_____

सम्पर्क: 
फ्लैट नं.- 204, दूसरी मंजिल,
मकान नं. T-134/1,
गाँव- बेगमपुर,
डाकखाना- मालवीय नगर,
नई दिल्ली-110 017
फोन- 09868 261895

काका पय आलेख [१] : आलोचक विश्वनाथ त्रिपाठी

रमई काका अवधी कय सन्नाम कवि हुवयँ। अवधी अनुरागी के नाय जानत उन कय नाव! मुला इहौ सही है कि उन केरी कविताई पर जेतनी बात हुवय क चाही, ओतनी नाहीं होइ पायी हय। यहय सोचिके ‘काका पय आलेख’ कय सिलसिला चालू कीन जात अहय। बहुत लोगन से आग्रह किहेन हयँ कि वइ लिखयँ। कोसिस रहे हर महीना मा दुइ आलेख काका पय यहि बेबसाइट पय रखा जायँ। यहि योजना कय सुरुआती कड़ी ई आय,  प्रख्यात आलोचक विस्वनाथ त्रिपाठी केर आलेख ‘जनता द्वारा मूल्यांकित कवि हैं रमई काका!’ : संपादक
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जनता द्वारा मूल्यांकित कवि हैं रमई काका! : विश्वनाथ त्रिपाठी
                                                                                                                                  

यह ’४८-’४९ की बात है, भारत आजाद हो गया था। मैं बलरामपुर में पढ़ता था। बलरामपुर रियासत थी, अवध की मशहूर तालुकेदारी थी वहाँ, समझिये कि लखनऊ और गोरखपुर के बीच की सबसे बड़ी जगह वही थी। वहीं मैं डी.ए.वी. स्कूल से हाई स्कूल कर रहा था। वहाँ एक बहुत अच्छा स्कूल था, एल.सी. कहलाता था, लॊयल कॊलिजिएट, महाराजा का बनवाया हुआ था और बहुत अच्छा था। उसमें बहुत अच्छे अध्यापक होते थे। संस्कृत के पं. रामप्रगट मणि थे। उर्दू में थे इशरत साहेब जिनको हम गुरू जी कहते थे। वहाँ मुशायरे बहुत अच्छे होते थे, बहुत अच्छे कवि सम्मेलन होते थे। एक बार कवि सम्मेलन हुआ वहाँ, उसी में रमई काका आये हुए थे।

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 रमई काका के साथ एक कवि थे, ‘सरोज’ नाम में था उनके। नये कवि थे, मशहूर थे। लेकिन रमई काका ज्यादा मशहूर थे। तब रमई काका की उमर रही होगी ३५-४० के बीच में। अच्छे दिखते थे, पतले थे। काली शेरवानी पहने थे। पान खाए हुए थे। उन्होंने काव्य-पाठ किया। उन्होंने जो कविताएँ पढ़ीं, तो उसकी पंक्तियाँ सभी को याद हो गईं। अवधी में थी, बैसवाड़ी में। इतना प्रभाव पड़ा उनके काव्य-पाठ का, कि हम लोगों ने एक बार उनका काव्य-पाठ सुना और कविताएँ याद हो गयीं। कवि सम्मेलन समाप्त होने के बाद भी हम लोग उन कविताओं को पढ़ते घूमते।

जो कविता उनकी सुनी थी, उसका शीर्षक था — ध्वाखा होइगा। अभी याद है, इसकी पंक्तियाँ इस तरह हैं:
हम गयन याक दिन लखनउवै , कक्कू संजोगु अइस परिगा
पहिलेहे पहिल हम सहरु दीख , सो कहूँ–कहूँ ध्वाखा होइगा!
जब गएँ नुमाइस द्याखै हम , जंह कक्कू भारी रहै भीर
दुई तोला चारि रुपइया कै , हम बेसहा सोने कै जंजीर
लखि भईं घरैतिन गलगल बहु , मुल चारि दिनन मा रंग बदला
उन कहा कि पीतरि लै आयौ , हम कहा बड़ा ध्वाखा होइगा!
इसमें फिर तमाम स्थितियाँ आती हैं, हम कहाँ-कहाँ गये फिर वहाँ क्या हुआ। एक जो गाँव का ग्रामीण है वह शहर जाता है तो उसे अपरिचित दुनिया मिलती है। उस अपरिचित दुनिया में वह अपने को ढाल नहीं पाता। वहाँ का आचार-विचार-व्यवहार सब अपरिचित होता है। वह भी उस दुनिया में आश्चर्य में रहता है और दूसरे भी उसे लेकर आश्चर्य में पड़ते हैं। इसमें एक जगह है, दुकान में जैसे औरत की मूर्ति बनाकर कपड़े पहना देते हैं तो वह ग्रामीण उसे सचमुच की औरत समझ बैठता है, लोगों के बताने पर समझ में आता है कि ‘ध्वाखा होइगा।’ फिर एक जगह सचमुच की औरत को वह माटी की मूर्ति समझ कर हाथ रख बैठता है, स्थिति इस तरह बन जाती है, ‘उइ झझकि भकुरि खउख्वाय उठीं , हम कहा फिरिव ध्वाखा होइगा!’ बहुत अच्छी कविता है।

रमई काका की कविताएँ देशभक्ति की भावना से भरी हुई हैं। उनकी हर तरह की कविताओं में, चाहे वह हास्य कविताएँ हों, व्यंग्य की कविताएँ हों, शृंगार की कविताएँ हों; सबमें देशभक्ति का भाव रचा-बसा है। एक तो देशभक्ति का भाव दूसरे वे कविताएँ आदमी को बनाने की, संवारने की, कर्तव्य पथ पर लगाने की प्रेरणा देती थीं। एक तरफ तो कविताओं में देशभक्ति का पाठ था दूसरी तरफ वे कविताएँ एक आचार-संहिता भी इससे प्रस्तुत करती थीं; चाहे हास्य से, चाहे व्यंग्य से, चाहे करुणा से, चाहे उत्साह देकर। ये कविताएँ जीवनवादी कविताएँ भी हैं। चूँकि ये कविताएँ अवधी में थीं इसलिए बड़ी आत्मीय थीं। बड़ा फर्क पड़ जाता है, कविता कोई अपनी बोली में हो, कविता कोई राष्ट्रभाषा में हो और कविता कोई विदेशी भाषा में हो। आस्वाद में भी बड़ा अंतर पड़ जाता है।

भारत वर्ष नया नया आजाद हुआ था। उस समय बड़ा उत्साह-आह्लाद था। आशा-आकांक्षा भी थी। हालांकि विभाजन की त्रासदी झेल रहा था देश, और वह भी कविता में व्यक्त होता था। ये जो कविताएँ अवधी में हैं, भोजपुरी में हैं या दूसरी बोलियों में हैं, हम लोग समझते हैं कि इनमें ज्यादातर हास्य या व्यंग्य की ही कविताएँ होती हैं। इन कविताओं के सौंदर्य-पक्ष की कई बातों की हम उपेक्षा कर देते हैं। जैसे ‘बौछार’ की यह कविता अवधी में है, ‘विधाता कै रचना’:
जगत कै रचना सुघरि निहारि
कोयलिया बन-बन करति पुकारि
झरे हैं झर-झर दुख के पात
लहकि गे रूखन के सब गात
डरैयन नये पात दरसानि
पलैयन नये प्वाप अंगुस्यानि
पतौवन गुच्छा परे लखाय
परी है गुच्छन कली देखाय
कली का देखि हँसी है कली
गगरिया अमरित की निरमली
प्रकृति की इतनी सुन्दर कविताएँ निराला को छोड़ दीजिये तो शायद ही खड़ी बोली के किसी कवि के यहाँ मिलें। निराला की भाषा और इस भाषा में कितना अंतर है। एकदम सीधे असर! ‘जगत कै रचना सुघरि निहारि / कोयलिया बन-बन करति पुकारि’ : अब इसका आप विश्लेषण करें तो कोयल जो बोल रही है वह जगत की सुन्दर रचना को निहार करके बोल रही है। यह निहारना क्रिया अद्भुत क्रिया है। इसका उपयुक्त प्रयोग खड़ी बोली में निराला ने किया है। ‘सरोज स्मृति’ में जब सरोज के भाई ने उसे पीटा, दोनों बच्चे थे खेल रहे थे, तो पीट कर मनाने लगे सरोज को — ‘चुमकारा फिर उसने निहार’। बेचारी छोटी बहन है, रो रही है, ये सारी बातें उस निहारने में आ गयीं। ‘निहार’ का अप्रतिम कालजयी उपयोग तुलसीदास ने किया है। जनक के दूत जब दशरथ के यहाँ पहुँचे संदेश ले कर कि दोनों भाई सकुशल हैं, तो दशरथ दूतों से कहते हैं:
भैया, कुसल कहौ दोउ बारे।
तुम नीके निज नैन निहारे॥
‘निहारना’ देखना नहीं है। मन लगा कर देखने को निहारना कहते हैं। कोयलिया बन-बन पुकार रही है। यह तो सीधे लोकगीतों से आया है। हमारे यहाँ अवधी के कवि हैं, बेकल उत्साही, बलरामपुर के हैं, हमारे साथ पढ़ते थे। उनकी पहली कविता जो बहुत मशहूर हुई थी, ‘सखि बन-बन बेला फुलानि’। बन-बन का मतलब सर्वत्र।

ये हमारे जो कवि हैं, अन्य को दोष क्या दूँ मैंने भी नहीं किया यह काम, जिनके अंदर सौंदर्य है उनका विश्लेषण हम लोग नहीं करते। बाकी कविताओं का तो करते हैं। होता यह है कि फिर ये हमारे कवि उपेक्षित रह जाते हैं। जो इनके योग्य है, वह इन्हें मिलता नहीं है। दुर्भाग्य कुछ ऐसा है कि जिन लोगों ने अवधी भाषा को, इसके सौंदर्य को ऊपर उठाने का जिम्मा ले रखा है जोकि अच्छा काम है लेकिन मैं इस अवसर पर जरूर कहना चाहता हूँ कि उन लोगों की गतिविधियों को देख करके ऐसा नहीं लगता कि ये लोग सचमुच किसी उच्च आदर्श से, देशप्रेम से या अवधी के प्रेम से काम कर रहे हैं। कभी-कभी तो यह शक होने लगता है कि वे अपने छोटे-छोटे किसी स्वार्थ से लगे हुए हैं। ऐसे में भी ये कवि उपेक्षित रह जाते हैं। ऐसे ही कवियों में रमई काका भी हैं। वरना जरूरत तो यह है कि बहुत व्यापक दृष्टि से इन कवियों का पुनर्मूल्यांकन क्या कहें, मूल्यांकन ही नहीं हुआ है, यह किया जाय। लेकिन जनता ने इनका मूल्यांकन किया है। अभी भी जहाँ रमई काका की कविताएँ पढ़ी जाती हैं, लोग सुनते हैं, उन पर इनका असर होता है।

(प्रस्तुति: अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी। यह लेख विश्वनाथ त्रिपाठी जी द्वारा ‘बोला’ गया, जिसे बाद में लिपिबद्ध किया गया।)