पाहीमाफी [१५] : तिरिया-गाथा (२)

आशाराम जागरथ रचित ग्रामगाथा ‘पाहीमाफी’ के  “पहिला भाग”,  दुसरका भाग , तिसरका भाग , चौथा भाग , पंचवाँ भाग , ६-वाँ भाग , ७-वाँ भाग , ८-वाँ भाग , ९-वाँ भाग१०-वाँ भाग  , ११-वाँ भाग , १२-वाँ भाग१३-वाँ भाग १४-वाँ भाग के सिलसिले मा हाजिर हय आज ई १५-वाँ भाग :

Captureई हय पाहीमाफी है १५-वां अउ तिरिया गाथा कै दुसरका भाग। तिरिया गाथा मा गाँव कै आधा दुख बरसि परा अहय। इनका पढ़त के साफ जाहिर हुअत हय कि यक्कै साथे रहय के बावजूद मरदन की दुनिया से औरतन कय दुनिया केतनी अलगि बाय। औरतनौ की दुनिया मा सबर्न औ अबर्न औरतन कै दुनिया अलगि-अलगि बाय। यहिका पढ़त के ई जाना जाय सकत हय। यहिमा ई बतावा गा बाय कि सबर्न मेहररुवै अबर्न मेहररुवन क बेहतर हालत मा बतावत हयँ। अबर्न मेहररुवै सबर्न मेहररुवन का कौनी हालत मा देखति हयँ, कौने मामिले मा बेहतर या बदतर मानति हयँ, संभव हय ई बाति आगे देखय का मिलय। उनके ‘कहन’ मा ई आवय मुमकिन हय। 

तिरिया गाथा मा औरतन के कयिउ अवस्थन कय सच कहा गा बाय। ई नाहीं कि केवल जवानिन कै दसा बतायी जाय। गेदहरा-जवान-बूढ़ : तीनौ पायदान पै खड़ी तिरियन का जागरथ जी लखे अहयँ। इन कबितक के जरिये आपौ इनका लखि सकत हयँ। 

कबिता कय यक-यक बारह-पतिया टुकड़ा अपने मा कंपलीट अहय। ऊ पूरा चित्र सामने उकेर दियत हय। यक-यक चित्र पूरी कहानी कहत देखाये। बिटिया, जवान औ बूढ़ तीनौ जिंदगिन पै अलग-अलग टुकड़य अलग-अलग कहानिव कहत हयँ। यनहीं के बीचे कबिता कय अव्वल सधानौ आपन छटा देखावय लागत हय। जयिसे ई दुइ लाइनन मा, ‘बात’ सबद से कीन खेल बढ़िया हय। ‘बात’ सबद से जुड़े मुहाबरन कय का गजब इस्तेमाल कीन गा अहय : ‘बात निकारैं बात-बात मा / बाती मा बाती कै गूझा.’ : संपादक 
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  • तियिया-गाथा : (२)

घूमौ खुब डारे गलबहियां
तुहकां देखतै परचय देहियाँ
हम खटी अकेलै काम करी
लरिका कां लिहे-लिहे कनियाँ
हेंढ़ा यस भया तुहैं पोसेन
तुहूँसे गोबरे कै छोत नीक
हम फुरै कही थै मान जाव
नाहीं माँगे ना मिली भीख
चेतौ अबहीं सौंकेर बाय
मेहरी आई बा गवने मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

जे करै परिश्रम हाँड़ तोड़
वै खाय बिना मर जात रहे
जेकरे अनाज इफरात रहै
वै खाय-खाय डुडुवात रहे
जे ऊँच रहैं सिंगार करैं
घर के भीतर करियान रहैं
पर सूद चमार कै मेहरारू
खेते मा साथे काम करैं
केउ ओढ़े-बेढ़े बइठ रहै
केव धान बिठावै कनई मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

ठकुराइन कै नीक बहुरिया
लाल बिलाउज धोती करिया
माथे चम-चम टिकुली चमकै
गोरहर हाथ म हरियर चुरिया
सीसा लइकै माँग सोझावैं
क्रीम-पाउडर रोज लगावैं
फरमाइस सब पूर हुवै पर
घर से बाहर निकरि न पावैं
केतना खेत कहाँ पै बाटै
जान न पावैं जिनगी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

राखैं सासू अपने कसि मां
जइसै की गाय रहै बस मा
लागै कुलि बुद्धी चूल्हा मा वै
भोजन नीक पकावैं घर मा
दिन-रात रहत अन्दर-भीतर
कुछ साँवरि भी लागैं गोरहर
देखन मा लाल गुलाब लगैं
केतनौ जंजाल रहै सिर पर
लेकिन नइहर कै नावं लेहे पै
आंसू आवै आँखी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

लेहसुवा-केरमुआ-अमलोनी
सोचिअ थै जाय साग खोंटी
तीनौ कां यक्कै मा मेराय
लहसुन के तड़का से छौंकी
हमरे यक जने तौ यस मनई
तूरैं रोजै सरगे तरई
जाई माँगी ठकुराइन से
सरसौ कय तेल एक परई
गोजई कै हथपोइया रोटी
सेंकब कंडी की आँची मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

चला हटावा मेलिया-मेटवा
खाबै ना बोलत बा पेटवा
थरिया झन-झन बाजत बाटै
छः बिटिया प पइदा भै बेटवा
बहुत अगोरिन पंडित बाबा
कइकै किस्मत से समझौता
घर मा वंश चलावै ताईं
यक बेटवा कै रहा मनौता
धगरिन ढूध पियावैं, रोवै
नन्हा – मुन्ना सौरी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

बेटवा भये सब सोहर गावै
बिटिया होय तौ मुँह बिचकावै
कहैं भवानी आयी बाटीं
झौवा भै खरचा करवावै
‘बेटवा होतिव खूब खियाइत
मूड़े पै बइठाय खेलाइत
हँसी-हँसी मा हँसि कै बोलिन
मरि जातिउ तौ फुरसत पाइत’
बिटिया ताकै कुछू न बोलै
भाई लादे कनियाँ मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

बिटिया ! तू तनी वोनाय जाव
ओढ़ना सीयै बइठी बाटी
सूई मा धागा नाय दियौ
हमरे देखात नाहीं आंखी
ई टुटा खटोला झोल खाय
बनिकै गठरी अब ना सुतिबै
धइ दिहेन उजार-फुजार कै हम
वै बोलिहैं काने सुनि लेबै
यक नीक रजाई पाय रहेन
वोका दइ दिहेन पतोहे कां
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

पहिलउठा भै जुरतै मरि गै
ताना-बोली से जिउ भरि गै
यक ठू बेटवा के चक्कर मा
बिटियै-बिटिया पइदा होइ गै
दूसर मेहरी हमरी नाईं
जा लइ आवा अपनी ताईं
तू दांत चिदोरे खड़ा हया
चिल्लाई थै सुनत्या नाहीं
जाई थै बहि-बिलाय जाबै
धंसि जाबै कूआँ-खाई मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

होते नाहीं लरिका-बच्चा
कानाफूसी से जिउ कच्चा
सब जने कचाहिन केहे हये
दीदी-बहिनी, मरदी-मरदा
मनसेधू हमरे कहत हये
पहिरब-खाबै-पीबै अच्छा
दुनिया औलाद से पटी बाय
काहे तू करत हयू चिन्ता
हम दुवौ परानी ठीक-ठाक
दुसरे-दूसर क्यो बीचे मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

चाटै गइया आपन लेरुआ
हमहूँ क् चाही येक दुलरुआ
ना जाने वै कहाँ से लाये
पाये यक ठू बच्चा परुआ
विधवा दीन-दु:खी महतारी
या तौ कउनौ रही कुँवारी
कठिन करेजे फेंके होई
गड़ही मा झाली के आरी
बहुत रह्यू औलाद कै भूखी
पाय गयन हम सेती मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

कही तौ माई मारी जाई
नाहीं बापू कूकुर खाई
तुंहसे काव कही अब बहिनी !
कहिकै इज्जत खुदै गंवाई
बुढ़ऊ बाहर रंग जमावैं
नीक-नीक परबचन सुनावैं
सासू राती गोड़ न मीजैं
सौ-सौ गारी, झापड़ पावैं
यक दिन तौ कपड़ा निकारि वै
खड़ा कै दिहिन ठण्ढी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

नेम-धरम से रोजै पूजा
वनके लेखे नाहीं दूजा
बात निकारैं बात-बात मा
बाती मा बाती कै गूझा
घूंघुट से बहिरे झाँके पै
डोलै लागअ थै सिंहासन
अपुवां घूमैं कोलिया-कोलिया
मेहरारुन पै पहरा–सासन
छटकत घूमत रहेन नइहरे
जेल भवा ससुरारी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

सइंतौ-माजौ, चूल्हा बारौ
भन्छौ दिन भै जिउ दइ डारौ
घर कै मेहरारुन गाय-भइंस
मारौ–पीटौ खूँटा गाडौ
बिटिया बा नीक पढ़ाकू बा
दरजा मा सबसे अव्वल बा
काव कही औलाद कां अपने
बेटवा तौ गोबर-गणेस बा
खाय-पियै, डुडुवाय जाय ना
बिन मारे इस्कूले मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

सुन लेत्यू बात मोर माई
बापू से कइसै करी ढिठाई
ना छोड़वावा पढ़ै दिया हम
आगे आउर पढ़ब पढ़ाई
खबवा खाव चुपाई मारे
जाड़ हुवत बा जात्यू सोई
बिटियै जादा पढ़-लिखि लेइहैं
तौ बियाह मा दिक्कत होई
खुसुर-फुसुर माई औ’ धीया
बहसैं रात रसोई मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

तू घाम-घमौनी करत हयू
बइठी बाट्यू झोंटा खोले
बड़कऊ उहै आवत बाटे
देखिहैं रहिहैं ना बिन बोले
आवा हमरे सब चला चली
दक्खिन पिछवारे की वोरी
फइलावा वहीं झुरात बाय
लंहगा–साड़ी–साया–चोली
सूदेन कै मेहरी नीक बहुत
घूमैं कुलि खेते-खेते मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

सुन्दर अंखिया यत्’तत-यत्’तत
पातर कै गठी देह गोरहर
धन देखि फलाने नाधि दिहिन
बउदहा से गाँठ जुड़ा वोकर
रोवत बा कहत बाय काकी !
कि जाब दुबारा ना ससुरे
मरि जाबै खाय ज़हर-माहुर
वै बाप बराबर हैं हमरे
समझाई थै मानत नाहीं
बहुतै डर लागत बा हमकां
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

चूल्हा पै चढ़ा रहा अदहन
देवरानी से बतियात रहेन
दलिया होयगै पातर पानी
डारै कां नोन भुलाय गयन
परसा खबवा खाये नाहीं
यक जने काल्हि रिसियाय गये
हम घंटा भर से खड़ी-खड़ी
जब खूब मनायन मान गये
पानी छुई लियौ चलौ जल्दी
ना बइठी रहौ सिवाने मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा.

__आशाराम जागरथ

[जारी….]

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अज्ञेय मिलना चाहते थे, लेकिन जुमई ने उधर रुख नहीं किया!

[हमार पसंदीदा कवि अहीं केशव तिवारी। यह दाईं हम बांदा गा रहेन। हुवां उनसे मुलाकाति भै। वही मुलाकात मा वै आधुनिक अवधी कवि जुमई खां आजाद से अपनी पहिली मुलाकाति कय किस्सा सुनाइन। यादगारी साझा किहिन। हम तब्बै से उनके पीछे लागि गयन कि ई यादगारी लिखि भेजव। आर-टार हुवत रहा, मुला देरय से सही, अब ई सत्य-घटना आपके सामने हाजिर ह्‌वै पावति अहय। हम केसव जी कय बहुत आभारी अहन्‌। : संपादक]
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20842201_1322904504485353_8523803886417688077_n अज्ञेय मिलना चाहते थे, लेकिन जुमई ने उधर रुख नहीं किया!

दिसम्बर के जाड़े के दिन थे, घर गया था। गांव से जिला हेडक्वाटर आना जाना लगा रहता है। बचपन से जुमई खां की कथरी बिल्कुल अपने निपट देहाती जनों से सुनता आ रहा था। आज अचानक गांव के हरकू गडरिया से सुना — कथरी तोहार गुन ऊ जानै जे करै गुजारा कथरी मा। तो फिर तय किया कि आज जुुमई से मिलकर ही लौटूंगा भले बेल्हा में रूकना पडे। खैर मै और मेरा एक रिश्ते का अनुज दोनों निकल पडे।

पहले सुल्तानपुर रोड पर किसी ने बता दिया। वहां झिनका पर लेटे अपने जमाने के नौटंकी के हीरो रामकरन मिले जो दमा के मरीज हो चुके थे। उन्होंने आजाद का पता दिया। हम लैाटे और बिहारगंज से गुबरी गांव के लिये निकल पडे। रास्ते मे पता चला जगेशरगंज स्टेशन के बाहर झगरू की चाय की दुकान पर आजाद का पता चलेगा।

झगरू की दुकान पर पहुंचते ही पता चला कि आजाद आर.पी.से (रायबरेली प्रतापगढ़-संजय पैसेन्जर) से संध्या तक आयेगें, आप चाय पियें, बैठें। हम भी जम गये। झगरू चाय आजाद के नाम लिख लिये और पैसे नही लिये। ये उन्हें आजाद के महमानो के लिये कहा गया था। खैर शाम हुयी और डेली पेसेंन्जर का रेला उतर। उसी मे कमीज पैजामा पहने मझियौले कद का एक व्यक्ति दुकान में घुसा।

झगरू बोले, आजाद ये लेाग चार घंटे से बैठे हैै आपके इंतजार में। वह लपके और गले लग गये। जैसे वर्षो से जान रहे हों। मिलते ही सब अपरिचय छूमंतर हो गया। अब शुरू हुआ बातों का सिलसिला तो एक लडका बोल पडा, आजाद कुछ हुयि जाय। बाबू साहब से तौ तोहार बात चलतइ रही। उन्होंने सहज ही उसकी बात को मान लिया। ये था जन का और उसके कवि का रिश्ता।

जैसे उन्होंने शुरू किया — भरे रे पूंजीपतिया तै रूटिया चोराय चोराय। करीब सौ लोगो का मजमा जुट गया और यातायात बाधित हो गया। धीरे धीरे सब झगरू की दुकान के इर्दगिर्द सिमट आये। ये सम्मान देख मेैं लगभग चकित था और एक दहाडती आवाज गूंज रही थी। अब लोग धीरे धीरे छट चुके थे। शुरू हुआ बातों का सिलसिला।

उसी दौरान बताया कि एक बार काला कांकर के महल में अज्ञेय आये तो धोबियहवा नाच हुआ। पैर मे घुघरू बांधे जब धोबी गाये — बिना काटे भिटवा गडहिया न पटिहैं / अपनी खुसी से धन-धरती न बटिहैं। तुरंत अज्ञेय ने पूछा, यह किसका गीत है? जुमई का लिखा है, यह पता चलते ही स्टेट से एक हरकारा उनका बुलावा लेकर आया। उन दिनों जुमई बहराइच कवि सम्मेलन मे गये थे। लौटे तो पत्र मिला और वाकया पता चला। बोले — “भइया,  ई गीत तौ राजा-महाराजा के खिलाफ अहै। कतउ बुलाइ के गड़ियां न धूप देंय। तव हम न गये।”

जुमई एक समय गरीब-गुरबा की आवाज बन गये थे। उनका किसी गांव ठहर जाना, किसी के दरवाजे खा लेना, एक पूरा का पूरा जनपद उनका घर हो गया था। जुमई खां हम से बोले, तुम्हउ सुनावा। कुछ सुनकर बोले — “बात तो खडी में करत हया पर माटी-पानी सब अपनै अहै।”

keshaw tiwariलेाक के बदलाव के लिये जिस राजनीतिक चेतना की दरकार है, वह अपने जन से द्वन्दात्मक रिश्ता कैसे खोजे, जुमई को यह बात समझ में आ गयी थी। जुमई की कविताई अपने से आगे की कविताई है। भविष्य के लिये एक जमीन तैयार करने का मसला है। जुमई उन कवियों में से थे जो अपनी कविता से अपना जीवन भी चला सकते थे और अपने जन के लिये लड़ भी सकते थे। यही सब उन्हें जुमई बनाता था।

__केशव तिवारी

पाहीमाफी [१४] : तिरिया-गाथा (१)

आशाराम जागरथ रचित ग्रामगाथा ‘पाहीमाफी’ के  “पहिला भाग”,  दुसरका भाग , तिसरका भाग , चौथा भाग , पंचवाँ भाग , ६-वाँ भाग , ७-वाँ भाग , ८-वाँ भाग , ९-वाँ भाग१०-वाँ भाग  , ११-वाँ भाग , १२-वाँ भाग, १३-वाँ भाग के सिलसिले मा हाजिर हय आज ई १४-वाँ भाग :

village_india_scene_paintings_nature_hut_street_agriculture_farmers_पाहीमाफी कय ई भाग गांव कय ऊ सच कहय कय कोसिस करत है जेहिका बहुत कम कहा गा अहै. यक दलित समाज कय नयी-नबेली बहू कइसे घरे औतय खन काम के चक्की मा पीसि दीन जात है, ई हियाँ देखा जाय सकत है. कइसे औरतय आपस मा यक दूसरे से बतियात हयं ई बड़ी सहजता से हाजिर कीन गा अहै. बात-चीत केरि भंगिमा देखउ हियाँ तनिका:

बहिनी ! खजुवात मूड़ बाटै
सगरौ, घर काम परा बाटै
दइ द्या साबुन यक दाईं भै
बरवा लासियान जट्ट बाटै

नवा नवा बियाह भा हुवै अउ मरद मेहराऊ दूनउ क जीवन-उत्सव से काटि के कामे मा खटावा जाय, ई जिंदगी के साथ पाप आय. गांवन मा ई पाप खूब देखाये! ठकुराना केतनी हनक के साथे, अउ केतनी निर्लज्जता से, यहि पाप-वृत्ति पै उतारू है :

कहि द्या बनठन भूले से भी
ठकुरहना वोरी ना आवै
जेकरे बल पोखना लाग बाय
वोका नाधब हरवाही मा

दुनिया भर के काम के जंजाल मा जिंदगी काटी जाय अउ जियय कै मौकै न मिलै तौ भरी जवानी भार लागै लागत है. केतना बेलाग यथार्थ कहा गा बाय :

हम बोझ सम्हारी कि अँचरा
जिउ धुकुर-पुकुर धुक बोलअ थै
दुई बोझ कुदरती छाती पै
सब बोझन से भारी मोकां

तौ गुजरा जाय पाहिमाफी के यहि चउदहें भाग से. : संपादक
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  • तिरिया-गाथा (1)

दुइ जगह से उबहन टूट रहै
पानी ना यक्कौ घूँट रहै
करिहाँव मा दाबे बात करैं
नीचे से गगरा फूट रहै
‘सीधा-पिसान कुच्छौ ना बा
कलिहैं से चूल्हा बुता बाय
अब काव कही बहिनी तुहुँसे
किस्मतियै ही जब फुटा बाय
कोदौ-सावाँ जउनै मिलितै
दइ देत्यु तनी उधारी मा’
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

बहिनी ! खजुवात मूड़ बाटै
सगरौ, घर काम परा बाटै
दइ द्या साबुन यक दाईं भै
बरवा लासियान जट्ट बाटै
आवा ढीलौ तनि हेर दियौ
औ लीख सुरुक चुट्काय दियौ
धीरे-धीरे मँगियाय बार
नीबी कय तेल लगाय दियौ
तिल कै पाती ना काम करै
गज्झा ना चिकनी माटी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

उठा पतोहा साँस लिया तू
कंड़िया छोडि कै जांत लिया तू
जात हई हम करै मजूरी
सतुआ-ककई फांक लिया तू
घर-भीतर-बाहर काम किहेन
मरदेन कै घुसा-लात सहेन
चुरिया कै धोवन बदा रहा
हम बड़े भाग तुहुंका परछेन
करछुल आछत का हाथ जरै ?
बुढ़िया होइ गयन जवानी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

******

परदेसी आये राती मा
मुंह लाल-ललछहूँ लाजी मा
माँगी मा सेंनुर मुस्कियाय
मरकहवा काजर आँखी मा
सोने कै बाली चम-चम-चम
नाकी मा कील तकै तक-तक
झुलनी झमकउवा ओंठे पै
हीलै-डोलै लक-झक लक-झक
ठकुराइन बोलिन ‘का रे, तू !’
पहिचानेन नाहीं मो तोहकां
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

ठाकुर ठकुराइन का ताकैं
चानी न सोहै नाक-कान
कुछ गुनैं-धुनैं कोयर बालैं
उंगुरी कटि गै जब उड़ा ध्यान
बोले, मन बक्कै आँवं-बाँवं
अलही-बलही फगुवा गावै
कहि द्या बनठन भूले से भी
ठकुरहना वोरी ना आवै
जेकरे बल पोखना लाग बाय
वोका नाधब हरवाही मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

******

रहि-रहि कै हिचकी आवत बा
छपरा पै कौवा बोलत बा
माई मोहान होइहैं साइद
लागत बा केऊ आवत बा
सौंकेरे से हम छोलिअ थै
तनिकौ मन नाहीं लागत बा
घसिया छक्कान बाय तब्बौ
हमसे नाहीं सँगिरात बाय
अम्मा ! हम घर कां जात हई
केऊ गोहरावत बा हमकां
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

भइया ! तू आया अनवइया
चौवा-चांगर दुइ ठू गइया
जाई सब कइसै छोड़-छाड़
आन्हर बाटीं सासू मइया
घर कै जंजाल बाय माथे
‘बिचउलिया’ दगा किहिन साथे
बस यक्कै चीज नीक बाटै
बहनोई तुहार पढ़त बाटे
वै कहत हये कि सबर करा
सब दिन ना कटी गरीबी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

भइया ! तू हमसे छोट हया
दुःख आपन तुहुँसे काव कही
बस फटही लुगरी इहै बाय
कउनौ खानी तन ढके हई
सावाँ-काकुन हम कूटिअ थै
जांता मा गोजई पीसिअ थै
सब खाय लियैं तब खाइअ थै
परथन कै टिकरी पाइअ थै
गवने कै मेंहदी छूट नाहिं
वै नाधि दिहिन मजदूरी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

हँसि कै बोलिन वनकै दुलहिन
रोवा जिन तू बनिकै विरहिन
ई कवन पंवारा नाधे हौ
हमसे तौ नीक हयू सब दिन
‘आन्हर सासु, ससुर भी अन्हरा
येक जने वोऊ चकचोन्हरा
पइदा भये न यक्कौ लरिके
घूमिअ थै दइ आँखी कजरा
जा गोड़ धोय द्या भइया कै
पानी भरि लावा थारी मा’
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

भइया ! अबहीं ना जाव आज
दुइ दिन तू आउर रुक जात्या
बा धरा बाध-पावा-पाटी
यक खटिया सालि बीन जात्या
कटिया-पिटिया मा रहेन लाग
लेकिन बिहान नाहीं टारब
उठि बड़े भिन्नहीं नारा मा
टापा लइकै मछरी मारब
तू हीक भै अच्छे खाय लिहा
धइ देबै थोरै झोरा मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

******

सुन्नर नीक पतोहिया तोरी
देखतै थूकै हमरी वोरी
सुनै न ना तौ करै बेगारी
दइ पइबा ना कबहुं उधारी
बोलिस आँख देखाया नाहीं
केहू क् दिया हम खाइत नाहीं
जानै ऊ जे करजा खाइस
घर बिकान घरवाली नाहीं
जउने गाँव कै छोरी होई
जनत्या नाहीं तू हमकां
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

******

घूंघुट निकारि गोहूँ ढोई
रोई आपन दीदा खोई
अकड़ी गटई घरुहान रहै
बेसरम नजर ताकै मोही
‘घौलरा’ कां नाहीं काम-धाम
राही मा बइठ अगोरअ थै
हम बोझ सम्हारी कि अँचरा
जिउ धुकुर-पुकुर धुक बोलअ थै
दुई बोझ कुदरती छाती पै
सब बोझन से भारी मोकां
यकतनहा कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

ऊ पटक बोझ फरवारे मा
बाँहें रसरी करियाहें मा
हिम्मत जुहाय रून्हें गटई
मुंह ढांपे बोलिस सन्हें मा
ना भलमनई ना बड़मनई
तुहरे जाती रस्ता दूभर
होइकै अकच्च मुंह खोलि दियब
इज्ज़त-पानी छीछालेदर
तुहर्’यौ घर माटी कै चूल्हा
घर घुसरि क् देखा भितरी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा.

__आशाराम जागरथ

[जारी….]

कतिपय अवधियों का भोजपुरी-द्वेष

[यक पोस्ट फेसबुक पै डारे रहेन। पोस्ट तनिका लंबी रही, चाहेन कि यहिका हियौं रखि दी, तौ मा रखत अही। हम ऊ बात लोगन से साझा किहे अही जौन हम पिछले कुछ सालन से महसूस किहेन हय। यहिमा हम सबका जनरलाइज नाहीं करत अही मुदा कुछ दिक्कत तौ हय जेहिपर अवधियन क सोचेक अहय। पोस्ट के साथे सम्माननीय सौरभ पाण्डेय जी कय टीपौ इमेज के रूप मा हियां हाजिर हय। उम्मीद अहय कि यहि दिसा मा सोच-बिचार कीन जाये। : संपादक]

कतिपय अवधियों का भोजपुरी-द्वेष

यह बात अफसोस के साथ कह रहा हूँ कि अवधियों में भोजपुरी को लेकर एक तंग नजरिया काफी पहले से दिखता है, जो दुर्भाग्यवश अभी भी जारी है। यह एक नकारात्मकता है जिसे खत्म होना चाहिए। इससे अवधी के भी स्वास्थ्य को खतरा है।

भोजपुरी की ‘अगंभीर छवि’ कब बनी, कैसे बनी, यह शोध का विषय हो सकता है। लेकिन यह छवि बहुत पहले से है जो ढेरों अवधियों में संस्कार की तरह रच-बस गयी है। इस अगंभीर छवि से ग्रस्त भोजपुरिये भी हैं।

अवधी के एक कवि हैं वंशीधर शुक्ल। प्रगतिशील कवि हैं। वे कई बार कविता में उन छवियों या निर्मितियों के प्रति सतर्क रहे हैं जो नकारात्मक हैं। यह एक कवि का काम भी है। लेकिन वंशीधर जी भोजपुरी की इस अगंभीर छवि को लेकर यथास्थितिवादी हैं। वे यहाँ जागरूक नहीं हैं जबकि उन्हें होना चाहिए। वे भोजपुरी के साथ ‘उदमादी’ (यानी उन्मादी) विशेषण का इस्तेमाल करते हैं। ऐसी भाषा जिसमें उन्माद है। संजीदगी नहीं है। कहते हैं, ‘ब्रजभाषा सबकी मुँहचुमनी, भोजपुरी उदमादी’।

यों भी भोजपुरी को ‘ऐली-गैली’ वाली भाषा कह कर अवध और दूसरे इलाकों में भी इसे एक क्षुद्र निगाह से देखा जाता है। खड़ी बोली के मानकीकरण की हनक चढ़ी तो कई लोगों ने इस ‘ऐली-गैली’ की सीमा में अवधी को भी समेट लिया। यानी देहाती भाषा बनाम खड़ी बोली-हिन्दी जैसा समझें। इसी कड़ी में, ऐसे ही संस्कार-प्रभाव में, हिन्दी बनाम अंग्रेजी जुड़ जाय तो क्या आश्चर्य!

शुरुआत में कुछ अवधी सम्मेलनों में गया जहाँ मुझे दो बिन्दु स्पष्ट दिखे : (१) बाबा तुलसी का अतिशय श्रद्धापूर्ण गुणगान (२) भोजपुरी निन्दा अभियान। निन्दा के क्रम में कहा जाता कि भोजपुरी ‘अश्लील भाषा’ है। मैंने इसका सदैव विरोध किया। परिणाम यह हुआ कि फिर कहीं बुलाने लायक मुझे नहीं समझा गया। मजे की बात यह कि भोजपुरी को अश्लील साबित करने के लिए जब निरहुआ आदि गायकों का नाम लिया जाता तभी यह सचेत रूप से भुला दिया जाता कि इसी समय इसी भाषा में कहीं ज्यादा बड़े गायक शारदा सिन्हा, भरत व्यास आदि हैं।

वर्तमान में आठवीं अनुसूची के लिए भोजपुरी का विरोध अवधियों के इसी परंपरागत ‘द्वेष-भाव’ का विस्तार है। अवधिये खुद तो अपनी भाषा की जड़ों से कटे हुए हैं और संख्या-बल व भाखा-प्रेम के आधार पर भोजपुरिये आज आठवीं अनुसूची के दावेदार हो गये हैं तो अब इनका यह ‘द्वेष-भाव’ औंधे मुँह गिर पड़ा है। हर हिकमत लगा रहे हैं ‘ऐली-गैली’ वाली भाषा को आगे न बढ़ने देने के लिए। ‘हिन्दी बचाओ’ के बहाने।

इन अवधियों ने तब क्यों हिन्दी बचाओ का डंका नहीं पीटा जब मैथिली आठवीं अनुसूची में जा रही थी। क्योंकि मैथिली के प्रति वैसा ‘द्वेष-भाव’ नहीं रहा इनमें जैस भोजपुरी के प्रति है।

मैं अवधियों के इस द्वेष-भाव का विरोध करता हूँ। करता रहा हूँ। इसके लिए अवधी मठाधीसों की सांकेतिक समझाइस भी आती रही कि मैं ज्यादा उछलूँ नहीं। पर मैं भी आदत से मजबूर हूँ, क्या करूँ। आपके साहित्तिक-होटल में दो-चार दिन का मुफ्तिया ठहराव व अन्यान्न लाभ हेतु आपकी हां में हां मिलाने वाली जमात में दाखिला लेना मुझे कबूल नहीं। नहीं कबूल मुझे साहित्य और भाषा के सवाल को लूडो और शतरंज की तरह देखना।
—-
मेरी बातों से इससे अलग सोच के किसी अवधी प्रेमी या अवधिये का दिल दुखा है तो माफी चाहता हूँ।
—-
अंत में सौरभ जी का मत :
Screenshot - 8_24_2017 , 11_09_08 PM

कविता : आजादी की बरसी पर (शैलेन्द्र कुमार शुक्ल)

20882701_1151646808268447_4269061318397321434_nआजादी की बरसी पर

करिया अच्छर खुनियाय गये
कागद आंसुन ते गये भीजि
जे कलमइ फांसी दीहिन रहे
बड़ नेता उन पर गए रीझि।

जे देसवा खातिर भिंजरि गये
उनकी उम्मीदय सुलगि रहीं
सपने सब जिनके बिथरि गये
औलादी उनकी रिरिकि रहीं

जे खून बहाइन, जिव दीन्हिन
छाती पर गोली खाय खाय
जिनके लरिका फांसी चढ़िगे
उनकी अम्मा की हाय हाय

आजादी उनकी और रहे
उनके सपने कुछ रहें और
जिनकी कुर्बानी भई रहे
उनकी कीमत कुछ रहे और

तुम बीच म  फाटेउ बादर अस
बिजुरी अस गिरेउ गरीबन पर
खेती कीन्हेउ तुम लासिन की
लट्‌टू हुइ गएउ अमीरन पर

टाटा बिरला मित्तल होरे
सब देसु टहलि के झारि लिहिनि
सरकारइ तुमरी रहैं खूब
काजरु उनकी बदि पारि दिहिनि

फिरि भइं देवारी दिया बरे
पूंजीपति बर्फी धमकी रहे
जे असिली मा हकदार रहें
उनके घर घुप्प अंधेरु रहे

हम उबरि न पाये रहन तनिकु
उनते बड़खर जल्लाद मिले
उइ कहिन कि दुख सबु हरि लेबा
सब राम भरत अस खूब मिले

चौदह मा भवा इलेक्सन फिरि
वै टीबी पर वाटय मांगिन
कुछ धरम धुरंधर रैलिन मा
सब वादा हमते कई डारिन

बोले अच्छे दिन आय रहे
पुरिखा लहि सब पतियाय गये
जो नये खून के ज्वान रहें
सब बजरंगी बनि छाय गये

को रामकाज मा बिपति बने
तलवार लिए हिन्दू सेना
भगवा का बांधि मुरैठा वै
ककुवा होरे धौंकैं ब्याना

कुछ जन समुझावैं समुझइं ना
ययि हत्यारे हैं मानइं ना
गांधी के गोली मारिन यइ
वै रहे बतावत जानइं ना

यइ अग्रेजन का साथु दिहिन
जब पुरिखा तुमरे लड़त रहें
यइ करिन गुलामी राजन की
जब बप्पा लाठी खाति रहें

यइ जन गण मन ना गाइ सके
जब आजादी के ढोल बजे
यइ कबौ तिरंगा ना थामिन
जब आजादी के साज सजे

ककुवा गुजराती दंगन का
तुम यतनी जल्दी भूलि गयेउ
मंदिर मस्जिद की राजनीति
तुम सांपु आइस सब सूंघि गयेउ

वहु नसा धरम का चढ़ा रहे
यहु किहिस अफीमी अपन काजु
जानै समुझै पर जोरु नहीं
फिरि छाय गवा सब रामराजु

मोदी जी फिर परधान भए
औ अमित साह जोड़ी थामिन
कुछ राजनाथ नेता होरे
सब नई कैबिनिट गढ़ि डारिन

सिच्छा मंत्रालय मनु स्मृति
ईरानी जी का मिला रहे
तौ बात हिंये से सुरू भई
जब शोध वजीफा कटा रहे

दिल्ली मा भवा आंदोलन
सब लरिका लरिकी जुटे रहें
तब रामराज की सरकारी
लाठी पीठिन पर परी रहें

यहु रामराज का नक्सा सबु
हमरी आंखिन का डाहि गवा
जब दाना माझी लासि लिए
कांधे पर पत्नी आय गवा

एक रात रहे आधी आधी
जब नोट बंद का हुकुम भवा
साइकरा पार कइ मरे खूब
लाखन जन का रूजिगार गवा

साहब जी कबौ बताइन ना
क्यतना काला धन निकरा है
जनधन वाले खाता मइहाँ
पंद्रह लाख कब पहुंचा है ?

यतना झेले के बादिउ मा
जनता पर चढ़ी अफीम रही
यूपी मा फिर अधिकार भवा
‘तपसी धनवंत दरिद्र ग्रही’

क्यतने दिन अबही बीते हैं
गोरखधंधा की जग्य भयी
गोरखपुर जनपद मा द्याखौ
केतनी हत्यारिन नदी बही

उन दुधमुंहटन की लासिन का
जो कांधे धरि धरि रोउती हैं
क्यतने हइं फाट हिये उनके
महतारी जउन तड़पती हैं

यह आजादी है कौनि मिली
हम माथु ठोकि के सोचित है
सन सैंतालिस से सत्रह लहि
कफ्फ़न के कपड़ा नोचित है

दै रहे बधाई मुखिया जी
है आजु अट्टिमी कृस्न जलम
हम तुमरे मुंह पार थूकित है
सब नसा हिरन है धरम करम ।

__शैलेन्द्र कुमार शुक्ल
[15/08/2017]

पहीमाफी [१३] : दहिजरा कलाही कलपावै

आशाराम जागरथ रचित ग्रामगाथा ‘पाहीमाफी’ के  “पहिला भाग” ,  दुसरका भाग  , तिसरका भाग , चौथा भाग , पंचवाँ भाग , ६-वाँ भाग , ७-वाँ भाग , ८-वाँ भाग , ९-वाँ भाग१०-वाँ भाग  , ११-वाँ भाग , १२-वाँ भाग के सिलसिले मा हाजिर हय आज ई १३-वाँ भाग :

पाहीमाफी कय ई तेरहवाँ भाग हाजिर हय। दुरभिच्छी मा गाँव कय हालत यहिमा बयां कीनि गय हय। अकाल-दुर्भिच्छ कबिता कय बिसय बनत हय तौ यक चुनौती ई हुवत हय कि कहाँ ले विवरण रखा जाय, औ कहाँ ले संवेदना उभारी जाय! कबि कय मंतब्य केतना आवय औ केतना लेगन कय राय आवय! पाहीमाफी कय कवि घटना चुनै के मामिले मा एलर्ट अहय। ऊ अस घटनन का चुनत हय जिनसे घटना कय गतिकी आयि जाय, साथे-साथे घटना खुदै मा कमेंट बनि जाय। कयिउ दाँय तौ कबि-मंतव्य यहि तरह आवत हय कि वहिकय संगति सहजै सोसित पात्र से होइ जाति हय। पात्र बोलय तौ समझौ कबि बोलय, कबि बोलय तौ समझौ पात्र बोलय। मसलन नीचे दीन पँक्ति कविता बिना इनवर्टेड कामा के दीन गै अहयँ, जौन कि ठीकौ अहय : 

यक्कै थैली से जनम लिहेन
बेगानी हम दुई आंखी मा.
ध्वनि/नाद, अनुप्रास, के्र सहायता से काव्यत्व लाउब पाहीमाफी मा कम हुअत हय मुला ्जहाँ हुअत हय बहुत जमि जात हय। अलंकार जब अनायास आवय तब ऊ सबसे ज्यादा सार्थक हुअत हय। जैसे इन पंक्तियन का देखिके यहि बात कय अनुमान कीन जाय : 
बोलौ ना पुक-पुक पुकुर-पुकुर
जिउ धड़कै धुक-धुक धुकुर-धुकुर
मलकिन-सहुवाइन कै भाखा
नाहीं-नाहीं नानुकुर-नुकुर….
आलोचक रामचंद्र सुकुल कय मानब हय कि नाद सौंदर्य से कबिता कय आयु बाढ़त हय। अवधी कबिता मा जब नाद सौंदर्य आवत हय, ऊ अऊर बियासि जाति हय। : संपादक
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  • दहिजरा कलाही कलपावै

येक  साल ना भै बरसात
परा कलाही दिन और रात
खात-खात जिउ जाय कचाय
जोन्हरी क् रोटी कोदई क् भात
मोर भुखिया मोर माई जानैं
भरा कठौता आटा सानैं
यक्कै जूनी मिलै खाय कां
भरि कै पेट खियाय क् मानैं
सड़ा-गला गल्ला बनिया कै
लावैं रोज उधारी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

यक रोज कहारेन के टोला
चूल्ही भीतर झगरा होइ गै
मरदा बोलिस ई पेटकटिनी
भरि पेट न खाना हमैं दियै
उठि कै यक झापड़ मारि दिहिस
गुस्साय कै झोंटा खीचि लिहिस
तब दांत पीसि कै मेहरारू
नीचे से फोता पकरि लिहिस
‘दहिजरऊ मोंछ उखारि लियब
तोहरे पुरखन की दाढ़ी मा’
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

जोरू हमार सोवै जानै
बस आपन पेट भरै जानै
भुखमरी भी अइसन चीज हुवै
बिन लेहें परिच्छा ना मानै
हम फुरै कहिअ थै देखि लियौ
मुड़वारी तोपे धरे रही
राती मा तकिया फारि-फारि
यक कूकुरि रोटी खात रही 
जे सुनै उहै हँसि-हँसि लोटै
केव बोलै ना वकरे हक़ मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

भुखमरी नचावत नाच रहा
रोटी कै बन्दर बाँट रहा
देवरानी अउर जेठानी के
बीचे झगरा होय जात रहा
सब जानिअ थै तू जेस बाट्यू
दुई आँखी काम करत बाट्यू
पातर रोटी सबके आगे
मरदे कां मोट दियत बाट्यू
बनि गयू निर्दयी काव कही
बुद्धी भरभस्ट कलाही मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

संझा – भिन्नहीं रोज आवै
दहिजरा कलाही कलपावै
बनी रोटी चरी-बाजरा कै
टूका-टूका मा बंट जावै
रिरियायं गेदहरे बहुत घरे
महतारिन रोय-रोय डांटैं
भेली-ककई रस घोरि जियैं
जइसै–तइसै सब दिन काटैं
सोना के भाव सुहाय सड़ा
गल्ला मिलि जाय मजूरी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

बोलौ ना पुक-पुक पुकुर-पुकुर
जिउ धड़कै धुक-धुक धुकुर-धुकुर
मलकिन-सहुवाइन कै भाखा
नाहीं-नाहीं नानुकुर-नुकुर
कउनौ ना तरी-तापरी बा
यक्कौ धुर खेती नाहीं बा
अब करै मजूरी कहाँ जाय
सबके घर परा कलाही बा
पी लियौ पसावन चउरे कै
पायन कोटा सरकारी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

खाय बिना घर रगड़ा होइगै
सास-पतोहे म् झगरा होइगै
मिटै न खइंहस रोज रोज कै
चूल्हा मा अलगौझा होइगै
तोर नइहर मोर जाना बाय
नौ सै गदहा बान्हा बाय
खरी बात मौसी कै काजर
कहकुत बहुत पुराना बाय
बूढ़ा सुसकैं भुनभुन-भुनभुन
काकुन कूटैं काँड़ी मा
यकतनहा  कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

कहरैं, खासैं खटिया पकरे
बुढ़ऊ मिनके वलरे-वलरे
भइया कां तनी बोलाय दियौ
तू चली जाव निहुरे-निहुरे
पाँव पसारौ जेतना चादर
बाँटा पूत पड़ोस बराबर
बना चौधरी रह्या जनम भै
घर कै मुरगी साग बराबर
पेटपोछवा यक बेटवा पायन
भांग परि गवा बुद्धी मा
यकतनहा  कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

बेईमान बनियवां सत्तियार
पाथर तउलै धइ बार-बार
गुरबा-गरीब बिसहै आवैं
तौ मूड़ि लियै मूड़े कै बार
मिठुवाय कै नीक-नीक बोलै
कंठी-माला कै जाप करै
दस ढोका नोने के बदले
मउनी भै तीसी तौल लियै
दिन दूनी रात चौगुनी वोकर
लोय लगै दुर्भिच्छी म
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

एड़ी म् नाहीं फटी बेवाई
कइसै जानैं पीर पराई
वनकै बिगड़य रोज हाज़मा
पेट मोर अगियात बा माई
दुई-दुई दाना खरमिटाई
दाम बटोरैं पाई-पाई
छाती चढ़ि कै काम करावैं
हम नाहीं करिबै हरवाही
उखरि परैं मरि जायं निगोड़े
आग लगै खरिहाने मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

जोरू टोवै गठरी-पोटली
मोर माई मुंह खाली अंतड़ी
पहिले चलिकै कुछ खाय लियौ
बहु नीक बनी सेधरी मछरी
गोहूँ क् बाली गदरान बाय
दुई-चार रोज कै कसर बाय
यक लेहना काटिकै लइ आइब
जुग बीता जांत चुपान बाय
जिउ-जान से दयू अगर राखिन
हम खूब कमाब कटाई मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

भइया पाये मोटकी-मोटकी
हमरे आगे रोटी छोटकी
खाई हम मसल कै दाल-भात
वै दूध पियैं कनखी आंखी
हम सिरिज लियब बा मजेदार
आउर ना मांगब बार-बार
बचिगै थरिया मा तरकारी
दइ दियौ थोर बसियान भात
यक्कै थैली से जनम लिहेन
बेगानी हम दुई आंखी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

अपने ढर्रे अलहन बीतै
केतनौ आगे रोवै गावै
सूरज डूबे दिन डूबि जाय
भिन्नहीं उगै लइकै आवै
बड़मनई नाहीं काम करैं
कामे कै ना ही दाम दियैं
जाँगर कै काम कमाय अन्न
आपन जाँगर बरबाद करैं
लाठी भांजैं बिन मतलब कै
धरती के बोझ बयारी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

भूखे पेट कै हँसी निराली
हड्डी टोवैं राम पियारी
झौंसा मुंह दुइ होंठ झुराने
चिपकू गाले दांत चियारी
आंखी मारे बड़े बड़कऊ
ताकिस जइसै वनके वोरी
घर भै चलिकै धान निरावौ
पतरी नीक कमरिया तोरी
टूटै खूब सरापै वोकां
गरियावै मन ही मन मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

अबकी साली करमुन्नन मा
रसियाव कचौड़ी औ’ बरिया
खुब नरमानरम सोहारी-लपसी
देबै मुचौमुच्च थरिया
‘मुंह खोल कै आखत हम मागेंन
रहिगै ना तनिचौ धरम-दया
हाँ-हाँ भरिकै नहकार दिह्‌यू
तोहरे बाती कै कवन थया’
अटका बनिया कै गरज परी
तौ बेंचै माल उधारी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

सासू तोहरे जब जियत रहीं
बहु मान-मनउवल रखत रहीं
चाउर – पिसान औ’ तरकारी
हार्’हे-गार्’हे दइ दियत रहीं
अरहर-केराव-गोहूँ क् घुघुरी
उप्पर से सिखरन यक लोटा
बेझरी कै रोटी मोट-मोट
देसी घिउ कबहुं-कबहुं पोता
पट्ठा खुब नीक जवान रहेन
लढ़िया ठेली दिन-राती मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

बटुली मा दाल चुरत बाटै
जाइत ब उधार तेल माँगे
ईंन्हन चूल्हा म पझान होये
तनिका घुसुकाय दिहौ आगे
गोहूँ क् रोटी छौंकी दलिया
अरहर कै खाये जुग बीता
अक्तान बहुत अमिल्यान हयौ
धीरज धइकै निधरक बइठा
सैगर बाटै घरभै ताईं
कुलि खाबै नाहिं अकेलै मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा.

__आशाराम जागरथ

[जारी….]

आठवीं अनुसूची और अवधी (१) : अवधी अध्येता शैलेन्द्र कुमार शुक्ल का वक्तव्य

‘हिन्दी बचाओ मंच’ नाम कय संस्था जेसस आपन भासाई फासीवाद कय सिकंजा कसति जाति अहय, तेसस हिन्दी पट्टी केर लोकभासा वाले खदबदात जात अहयँ। अवधी के बरे, दुनिया भर मा, अपनी पहिचानि कै झंडा फहरावय वाले जगदीस पीयूस सुत राकेस पान्डे कय यक दसकतिया सच्चाई कय भंडा फूट तौ यक फेसबुकिया बहस सुरू भय। यहि पै सैलेन्द्र सुकुल यक वक्तव्य लिखिन। यही महीनी केरी सत्तरा जुलाई का। ‘खरखैंचा’ पै लगायिन। मुल खरखैचा कै ऊ लेख खुलत नाहीं ना। का जनीं काहे। यहिते ‘आठवीं अनुसूची और अवधी’ लेखमाला कै सुरुआती आलेख के रूप मा यही आलेख रखा जात अहै। : संपादक 
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कूप-मंडूक अवधियों के नाम एक वक्तव्य

20106654_1999555283403902_680498689825182597_nगो-रक्षा आंदोलन और आधुनिक हिंदी का उद्भव एक ही राजनीति एजेंडे के रूप में हमारे सामने आया। गो माता की तरह हिंदी माता के भी महिमा मंडन की प्रक्रिया एक साथ राजनीतिक तौर पर तेज होती गई। उस समय भी अवधिये सबसे ज्यादा कन्फ़्यूज्ड थे- प्रतापनारायण मिश्र इसके उदाहरण है और प्रताप-लहरी इसकी गवाह है। ‘हिंदी-हिन्दू-हिंदुस्तान’ इन्हीं का दिया हुआ नारा है। इन्होंने भी दोनों को साधने की पूरी साधना की है। हिंदी जिन रूपों में मानकीकृत हो कर आई, उस पर महत्वपूर्ण शोध फेंचेसिका आर्सेनी,वसुधा डालमिया और आलोक राय आदि ने तर्क संगत काम किया है। अवधियों की गत न्यारी ही रही है, उनके पास जायसी हैं, तुलसी है, रहीम हैं माने वही ही गौरव और गर्व के केंद्र में थे। तो उनको अब कोई परवाह नहीं, क्योंकि उनके पास गौरवशाली पुरखे हैं। उन्होंने यह कभी नहीं सोचा अरे हम क्या कर रहे हैं, रीतिकाल भर तुम क्या कर रहे थे,आधुनिक युग में पढ़ीस से पूर्व तुमने क्या किया। यह सब उनके सोचने का विषय कभी नहीं रहा। तुम भी सत्ता का राग उसी की भाषा में गा रहे थे और चाटुकारिता कर रहे थे, यह कब तक छुपाओगे! पढ़ीस के बाद नई लीक अवधी में पड़ी लेकिन उस पर अवधी का कौन कवि चला यह किसी से छुपा नहीं। अवधिये अपने पुरातन घमंड में चूर मानस पर कर्मकांड करते रहे और अब अवधी के उद्धार के लिए अवधी होटल खोलने की तैयारी में लगे हैं और अवधी की तीर्थ यात्राएं चालू हैं, और जीवित भाषा की तेरहीं मना कर पोथन्ने छापे जा रहे हैं।

आज भी सबसे ज्यादा अवधी वाले ही कन्फ़्यूज्ड हैं। जब भोजपुरी ने अपनी आवाज उठाई और उससे पहले भी तमाम विसंगतियों के बावजूद जब भोजपुरी बाजार में डिंकने लगी तो स्वनामधन्य अवधिये नींद से जागे तब तक उन्हें नहीं पता था कि अवधी पीछे छूट रही है। खैर, यह भी गज़ब की बात है की अवधियों की नब्बे फीसदी आबादी यह जानती ही नहीं कि वह जो भाषा बोलती है उसका नाम क्या है। और बाकी के अवधिये धार्मिक और सांप्रदायिक कामों में व्यस्त थे, बचे प्रगतिशील लोग तो उनको अपनी बौद्धिकता प्रमाणित करने में अवधी की बात कर के गंवार थोड़ी न होना था। यह राम कहानी है अवधी की। गाँव देहात से जो तनिक भी पढ़ लिख कर या बिना पढ़े-लिखे भी थोड़ा बाबूगिरी टाइप कुछ शहर में मिल गया तो उनके घर में अवधी प्रतिबंधित हो जाती है या घ्रणा की वस्तु समझी जाती रही है। बाकी देहात में भी यदि घर से बाहर सड़क पर पाँव निकाल लिए तो अवधी बोलने में देहातीपन का बड़ा भारी बट्टा लग जाता है। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल भी इस तरह का एक वाकया जो लखनवी मित्र के साथ सांची का स्तूप देखने गये थे, कभी भुला नहीं पाये नहीं। महुए का नाम जानने से बाबू पन में भारी बट्टा लग जाता है। इस तरह अवधियों ने बहुत दिनों तक यह जाना और समझा ही नहीं कि अवधी भी अभिमान की विषयवस्तु है, खैर भोपुरियों का शुक्रिया कि इन्हें ईर्ष्या करने के लिए जगा लिया।

इधर बीच जब भोजपुरी को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने के लिए भोजपुरियों ने साहित्य से लेकर राजनीति तक आवाज उठाई तो साहित्य के स्वनामधन्य नेताओं ने सोचा कि यह क्या, अब इन्द्र का सिंहासन डोलने लगा, ये कौन मनुज हैं जो हमारा आसान छीनने के लिये तप करने लगे हैं। डर भयानक था । उधर कलकत्ता से एक आहात आवाज सुनाई पड़ी त्राहिमाम …..त्राहिमाम । बचाओ प्रभू , बचाओ, अगर सरकार हाकिम ने कहीं भोजपुरी को अनुसूची में शामिल कर लिया, तो हम हिंदी वालों का धंधा कैसे चलेगा, हमारी बाबूगिरी का क्या होगा, हमारे कस्टमर कम हो जाएंगे! हम बर्बाद हो जाएंगे! इस तरह आहात होकर देवतुल्य आचार्य श्री…श्री….108 डॉ. अमरनाथ जी ने हिंदी के अश्वमेघ यज्ञ के आयोजन के लिये गुहार लगाई। और अपनी साम्राज्यवादी शक्तियों को संगठित कर हिंदी को फिर गोरक्षा आंदोलन की याद दिलाई। इस तरह हिंदी के साम्राज्यवादी अश्वमेधीय घोड़े कलकत्ता दिल्ली से होते हुये अवध में आये। मजे की बात यह भी कि इधर फिर से गोरक्षा आंदोलन जब से ज़ोर पकड़ा है तभी से हिंदी बचाओ अभियान भी कुंलांचे भरता हुआ, चिल्लाता हुआ, चीखता हुआ सामने आ ही गया। असल में दोनों का चरित्र एक ही है।

तो यह बात मैं खास कर अवधियों के लिये ही कह रहा हूँ , उधर ही आता हूँ। डॉ. अमरनाथ जी ने जब हिंदी बचाओ मंच नामक संप्रदाय खोला तो उसमें सबसे ज्यादा अवधिये ही शामिल हुये। उनकी ईर्ष्या ज़ोर मार रही थी, हमारे पुरखे तो हाथी पालते थे, हमारे बाबा घोड़े से चलते थे आदि …आदि। लेकिन इन्हें यह खयाल कभी नहीं आया कि हमारी जान तो कुकुर को एक कौर डालने में भी निकलने लगती है, हमने क्या किया, इसकी कोई परवाह नहीं। हिंदी के साहित्यिक घराने में कुछ अवधी जाति के नागरिक हैं जिन्हें अपनी पैदाइश पर बड़ा फ़क्र है। यह विश्वविद्यालयाओं में भी हैं और प्राइमरी स्कूलों में भी। भोजपुरियों को देख इनको भी राजनीति सूझी। तो दो रास्ते नजर आए – या तो अवधी बिना प्रयास के संविधान की अनुसूची में शामिल हो जाए और हम लोग अवधी अकादमी के अध्यक्ष बने फिर अपने चाटुकारों को पुरस्कार बांटें, फंड दें, अवधी होटल खोलें ,भंडारा करें और पोथन्ना छापें। और दूसरा रास्ता यह कि भोजपुरी के खिलाफ खड़े होकर हिंदी बचाओ मंच से जुड़ें और भोजपुरी को अनुसूची में शामिल ही न होने दें। तब मामला बराबर। अवधिये बहुत कन्फ़्यूज्ड हैं। इधर अवधी प्रेम भी प्रदर्शित कर देते हैं और उधर हिंदी बचाओ मंच के उद्धारक देवताओं की पालकी भी ढो रहे हैं। मैं तो कहता हूँ तुम धन्य हो अवधियों ! तुम्हारे कन्फ़्यूजन को धिक्कार है !

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शैलेन्द्र कुमार शुक्ल

आज अवधी के स्वाभाविक और हिम्मती साथी अमरेन्द्रनाथ त्रिपाठी जी ने एक पोस्ट फेसबुक पर मुझे टैग की। पोस्ट देख कर मैंने फिर माथा पकड़ लिया। कोई राकेश पाण्डेय है, अपने को अवधिया मानते हैं । हिंदी को बचाने के लिए और भोजपुरी को अष्टम अनुसूची में शामिल न किया जाय , इसलिये हस्ताक्षर अभियान चला रहे हैं, ऊपर पत्र में मोदी जी से गुहार लगाई गई है, बाकायदा। राकेश जी जैसे अवधी भाषी आप को बहुत से मिल जायेंगे। ये अवधी की बात करते हैं, संस्कृति को मेनटेन करने के लिये विविध आयोजन किया करते हैं। दरअसल इन चीजों से इनका कोई सरोकार नहीं है, ये वर्ग संघर्ष में दूसरे वर्ग से आते हैं -“उयि अउर आहि हम और आन” । इनके पास खूब पैसा है,अच्छी नौकरी है, बच्चे कनवेंट स्कूलों में सालाना लाखों रुपयों की फीस पर पढ़ते हैं, बड़े-बड़े शहरों में अच्छे मुहल्लों में घर हैं इनके। बस थोड़ा इज्जत और शोहरत के लिये देश प्रेम, लोक-प्रेम, भाषा-प्रेम(विद्वता प्रदर्शन के लिये), साहित्य प्रेम, संस्कृति प्रेम का प्रदर्शन कर लेते हैं। ये ऐसे योद्धा हैं जो ठेके पर आंदोलन चलवाते हैं, छठे-छमहे कल्चरल प्रोग्राम करवा देते हैं, सत्ताधारी नेताओं से मिल कर सौ बार चरण बन्दना करते हैं, और सांप्रदायिक दंगों से लेकर मंदिर निर्माण हेतु चंदा देते हैं, और जाहिल इतने कि लाल हरे नगों वाली अंगूठियों से लेकर  लाल-काले कपड़ों में लपटे पंडों और मुल्लाओं की भभूत देह पर सुविधानुसार बांधे रहते हैं। इनकी मूर्खता जग जाहीर है। और एक बात तो छूट ही गई इनकी सबसे बड़ी पहचान यह कविता के बहुत भारी रसिक होते हैं। तो इनके लिये राकेश रंजन की दो पंक्तियाँ याद आ रहीं हैं-

‘तुमरी जय जय कार सुअरवा
तुमको है धिक्कार सुअरवा।’

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