पाहीमाफी [१४] : तिरिया-गाथा (१)

आशाराम जागरथ रचित ग्रामगाथा ‘पाहीमाफी’ के  “पहिला भाग”,  दुसरका भाग , तिसरका भाग , चौथा भाग , पंचवाँ भाग , ६-वाँ भाग , ७-वाँ भाग , ८-वाँ भाग , ९-वाँ भाग१०-वाँ भाग  , ११-वाँ भाग , १२-वाँ भाग, १३-वाँ भाग के सिलसिले मा हाजिर हय आज ई १४-वाँ भाग :

village_india_scene_paintings_nature_hut_street_agriculture_farmers_पाहीमाफी कय ई भाग गांव कय ऊ सच कहय कय कोसिस करत है जेहिका बहुत कम कहा गा अहै. यक दलित समाज कय नयी-नबेली बहू कइसे घरे औतय खन काम के चक्की मा पीसि दीन जात है, ई हियाँ देखा जाय सकत है. कइसे औरतय आपस मा यक दूसरे से बतियात हयं ई बड़ी सहजता से हाजिर कीन गा अहै. बात-चीत केरि भंगिमा देखउ हियाँ तनिका:

बहिनी ! खजुवात मूड़ बाटै
सगरौ, घर काम परा बाटै
दइ द्या साबुन यक दाईं भै
बरवा लासियान जट्ट बाटै

नवा नवा बियाह भा हुवै अउ मरद मेहराऊ दूनउ क जीवन-उत्सव से काटि के कामे मा खटावा जाय, ई जिंदगी के साथ पाप आय. गांवन मा ई पाप खूब देखाये! ठकुराना केतनी हनक के साथे, अउ केतनी निर्लज्जता से, यहि पाप-वृत्ति पै उतारू है :

कहि द्या बनठन भूले से भी
ठकुरहना वोरी ना आवै
जेकरे बल पोखना लाग बाय
वोका नाधब हरवाही मा

दुनिया भर के काम के जंजाल मा जिंदगी काटी जाय अउ जियय कै मौकै न मिलै तौ भरी जवानी भार लागै लागत है. केतना बेलाग यथार्थ कहा गा बाय :

हम बोझ सम्हारी कि अँचरा
जिउ धुकुर-पुकुर धुक बोलअ थै
दुई बोझ कुदरती छाती पै
सब बोझन से भारी मोकां

तौ गुजरा जाय पाहिमाफी के यहि चउदहें भाग से. : संपादक
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  • तिरिया-गाथा (1)

दुइ जगह से उबहन टूट रहै
पानी ना यक्कौ घूँट रहै
करिहाँव मा दाबे बात करैं
नीचे से गगरा फूट रहै
‘सीधा-पिसान कुच्छौ ना बा
कलिहैं से चूल्हा बुता बाय
अब काव कही बहिनी तुहुँसे
किस्मतियै ही जब फुटा बाय
कोदौ-सावाँ जउनै मिलितै
दइ देत्यु तनी उधारी मा’
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

बहिनी ! खजुवात मूड़ बाटै
सगरौ, घर काम परा बाटै
दइ द्या साबुन यक दाईं भै
बरवा लासियान जट्ट बाटै
आवा ढीलौ तनि हेर दियौ
औ लीख सुरुक चुट्काय दियौ
धीरे-धीरे मँगियाय बार
नीबी कय तेल लगाय दियौ
तिल कै पाती ना काम करै
गज्झा ना चिकनी माटी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

उठा पतोहा साँस लिया तू
कंड़िया छोडि कै जांत लिया तू
जात हई हम करै मजूरी
सतुआ-ककई फांक लिया तू
घर-भीतर-बाहर काम किहेन
मरदेन कै घुसा-लात सहेन
चुरिया कै धोवन बदा रहा
हम बड़े भाग तुहुंका परछेन
करछुल आछत का हाथ जरै ?
बुढ़िया होइ गयन जवानी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

******

परदेसी आये राती मा
मुंह लाल-ललछहूँ लाजी मा
माँगी मा सेंनुर मुस्कियाय
मरकहवा काजर आँखी मा
सोने कै बाली चम-चम-चम
नाकी मा कील तकै तक-तक
झुलनी झमकउवा ओंठे पै
हीलै-डोलै लक-झक लक-झक
ठकुराइन बोलिन ‘का रे, तू !’
पहिचानेन नाहीं मो तोहकां
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

ठाकुर ठकुराइन का ताकैं
चानी न सोहै नाक-कान
कुछ गुनैं-धुनैं कोयर बालैं
उंगुरी कटि गै जब उड़ा ध्यान
बोले, मन बक्कै आँवं-बाँवं
अलही-बलही फगुवा गावै
कहि द्या बनठन भूले से भी
ठकुरहना वोरी ना आवै
जेकरे बल पोखना लाग बाय
वोका नाधब हरवाही मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

******

रहि-रहि कै हिचकी आवत बा
छपरा पै कौवा बोलत बा
माई मोहान होइहैं साइद
लागत बा केऊ आवत बा
सौंकेरे से हम छोलिअ थै
तनिकौ मन नाहीं लागत बा
घसिया छक्कान बाय तब्बौ
हमसे नाहीं सँगिरात बाय
अम्मा ! हम घर कां जात हई
केऊ गोहरावत बा हमकां
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

भइया ! तू आया अनवइया
चौवा-चांगर दुइ ठू गइया
जाई सब कइसै छोड़-छाड़
आन्हर बाटीं सासू मइया
घर कै जंजाल बाय माथे
‘बिचउलिया’ दगा किहिन साथे
बस यक्कै चीज नीक बाटै
बहनोई तुहार पढ़त बाटे
वै कहत हये कि सबर करा
सब दिन ना कटी गरीबी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

भइया ! तू हमसे छोट हया
दुःख आपन तुहुँसे काव कही
बस फटही लुगरी इहै बाय
कउनौ खानी तन ढके हई
सावाँ-काकुन हम कूटिअ थै
जांता मा गोजई पीसिअ थै
सब खाय लियैं तब खाइअ थै
परथन कै टिकरी पाइअ थै
गवने कै मेंहदी छूट नाहिं
वै नाधि दिहिन मजदूरी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

हँसि कै बोलिन वनकै दुलहिन
रोवा जिन तू बनिकै विरहिन
ई कवन पंवारा नाधे हौ
हमसे तौ नीक हयू सब दिन
‘आन्हर सासु, ससुर भी अन्हरा
येक जने वोऊ चकचोन्हरा
पइदा भये न यक्कौ लरिके
घूमिअ थै दइ आँखी कजरा
जा गोड़ धोय द्या भइया कै
पानी भरि लावा थारी मा’
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

भइया ! अबहीं ना जाव आज
दुइ दिन तू आउर रुक जात्या
बा धरा बाध-पावा-पाटी
यक खटिया सालि बीन जात्या
कटिया-पिटिया मा रहेन लाग
लेकिन बिहान नाहीं टारब
उठि बड़े भिन्नहीं नारा मा
टापा लइकै मछरी मारब
तू हीक भै अच्छे खाय लिहा
धइ देबै थोरै झोरा मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

******

सुन्नर नीक पतोहिया तोरी
देखतै थूकै हमरी वोरी
सुनै न ना तौ करै बेगारी
दइ पइबा ना कबहुं उधारी
बोलिस आँख देखाया नाहीं
केहू क् दिया हम खाइत नाहीं
जानै ऊ जे करजा खाइस
घर बिकान घरवाली नाहीं
जउने गाँव कै छोरी होई
जनत्या नाहीं तू हमकां
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

******

घूंघुट निकारि गोहूँ ढोई
रोई आपन दीदा खोई
अकड़ी गटई घरुहान रहै
बेसरम नजर ताकै मोही
‘घौलरा’ कां नाहीं काम-धाम
राही मा बइठ अगोरअ थै
हम बोझ सम्हारी कि अँचरा
जिउ धुकुर-पुकुर धुक बोलअ थै
दुई बोझ कुदरती छाती पै
सब बोझन से भारी मोकां
यकतनहा कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

ऊ पटक बोझ फरवारे मा
बाँहें रसरी करियाहें मा
हिम्मत जुहाय रून्हें गटई
मुंह ढांपे बोलिस सन्हें मा
ना भलमनई ना बड़मनई
तुहरे जाती रस्ता दूभर
होइकै अकच्च मुंह खोलि दियब
इज्ज़त-पानी छीछालेदर
तुहर्’यौ घर माटी कै चूल्हा
घर घुसरि क् देखा भितरी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा.

__आशाराम जागरथ

[जारी….]

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कतिपय अवधियों का भोजपुरी-द्वेष

[यक पोस्ट फेसबुक पै डारे रहेन। पोस्ट तनिका लंबी रही, चाहेन कि यहिका हियौं रखि दी, तौ मा रखत अही। हम ऊ बात लोगन से साझा किहे अही जौन हम पिछले कुछ सालन से महसूस किहेन हय। यहिमा हम सबका जनरलाइज नाहीं करत अही मुदा कुछ दिक्कत तौ हय जेहिपर अवधियन क सोचेक अहय। पोस्ट के साथे सम्माननीय सौरभ पाण्डेय जी कय टीपौ इमेज के रूप मा हियां हाजिर हय। उम्मीद अहय कि यहि दिसा मा सोच-बिचार कीन जाये। : संपादक]

कतिपय अवधियों का भोजपुरी-द्वेष

यह बात अफसोस के साथ कह रहा हूँ कि अवधियों में भोजपुरी को लेकर एक तंग नजरिया काफी पहले से दिखता है, जो दुर्भाग्यवश अभी भी जारी है। यह एक नकारात्मकता है जिसे खत्म होना चाहिए। इससे अवधी के भी स्वास्थ्य को खतरा है।

भोजपुरी की ‘अगंभीर छवि’ कब बनी, कैसे बनी, यह शोध का विषय हो सकता है। लेकिन यह छवि बहुत पहले से है जो ढेरों अवधियों में संस्कार की तरह रच-बस गयी है। इस अगंभीर छवि से ग्रस्त भोजपुरिये भी हैं।

अवधी के एक कवि हैं वंशीधर शुक्ल। प्रगतिशील कवि हैं। वे कई बार कविता में उन छवियों या निर्मितियों के प्रति सतर्क रहे हैं जो नकारात्मक हैं। यह एक कवि का काम भी है। लेकिन वंशीधर जी भोजपुरी की इस अगंभीर छवि को लेकर यथास्थितिवादी हैं। वे यहाँ जागरूक नहीं हैं जबकि उन्हें होना चाहिए। वे भोजपुरी के साथ ‘उदमादी’ (यानी उन्मादी) विशेषण का इस्तेमाल करते हैं। ऐसी भाषा जिसमें उन्माद है। संजीदगी नहीं है। कहते हैं, ‘ब्रजभाषा सबकी मुँहचुमनी, भोजपुरी उदमादी’।

यों भी भोजपुरी को ‘ऐली-गैली’ वाली भाषा कह कर अवध और दूसरे इलाकों में भी इसे एक क्षुद्र निगाह से देखा जाता है। खड़ी बोली के मानकीकरण की हनक चढ़ी तो कई लोगों ने इस ‘ऐली-गैली’ की सीमा में अवधी को भी समेट लिया। यानी देहाती भाषा बनाम खड़ी बोली-हिन्दी जैसा समझें। इसी कड़ी में, ऐसे ही संस्कार-प्रभाव में, हिन्दी बनाम अंग्रेजी जुड़ जाय तो क्या आश्चर्य!

शुरुआत में कुछ अवधी सम्मेलनों में गया जहाँ मुझे दो बिन्दु स्पष्ट दिखे : (१) बाबा तुलसी का अतिशय श्रद्धापूर्ण गुणगान (२) भोजपुरी निन्दा अभियान। निन्दा के क्रम में कहा जाता कि भोजपुरी ‘अश्लील भाषा’ है। मैंने इसका सदैव विरोध किया। परिणाम यह हुआ कि फिर कहीं बुलाने लायक मुझे नहीं समझा गया। मजे की बात यह कि भोजपुरी को अश्लील साबित करने के लिए जब निरहुआ आदि गायकों का नाम लिया जाता तभी यह सचेत रूप से भुला दिया जाता कि इसी समय इसी भाषा में कहीं ज्यादा बड़े गायक शारदा सिन्हा, भरत व्यास आदि हैं।

वर्तमान में आठवीं अनुसूची के लिए भोजपुरी का विरोध अवधियों के इसी परंपरागत ‘द्वेष-भाव’ का विस्तार है। अवधिये खुद तो अपनी भाषा की जड़ों से कटे हुए हैं और संख्या-बल व भाखा-प्रेम के आधार पर भोजपुरिये आज आठवीं अनुसूची के दावेदार हो गये हैं तो अब इनका यह ‘द्वेष-भाव’ औंधे मुँह गिर पड़ा है। हर हिकमत लगा रहे हैं ‘ऐली-गैली’ वाली भाषा को आगे न बढ़ने देने के लिए। ‘हिन्दी बचाओ’ के बहाने।

इन अवधियों ने तब क्यों हिन्दी बचाओ का डंका नहीं पीटा जब मैथिली आठवीं अनुसूची में जा रही थी। क्योंकि मैथिली के प्रति वैसा ‘द्वेष-भाव’ नहीं रहा इनमें जैस भोजपुरी के प्रति है।

मैं अवधियों के इस द्वेष-भाव का विरोध करता हूँ। करता रहा हूँ। इसके लिए अवधी मठाधीसों की सांकेतिक समझाइस भी आती रही कि मैं ज्यादा उछलूँ नहीं। पर मैं भी आदत से मजबूर हूँ, क्या करूँ। आपके साहित्तिक-होटल में दो-चार दिन का मुफ्तिया ठहराव व अन्यान्न लाभ हेतु आपकी हां में हां मिलाने वाली जमात में दाखिला लेना मुझे कबूल नहीं। नहीं कबूल मुझे साहित्य और भाषा के सवाल को लूडो और शतरंज की तरह देखना।
—-
मेरी बातों से इससे अलग सोच के किसी अवधी प्रेमी या अवधिये का दिल दुखा है तो माफी चाहता हूँ।
—-
अंत में सौरभ जी का मत :
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कविता : आजादी की बरसी पर (शैलेन्द्र कुमार शुक्ल)

20882701_1151646808268447_4269061318397321434_nआजादी की बरसी पर

करिया अच्छर खुनियाय गये
कागद आंसुन ते गये भीजि
जे कलमइ फांसी दीहिन रहे
बड़ नेता उन पर गए रीझि।

जे देसवा खातिर भिंजरि गये
उनकी उम्मीदय सुलगि रहीं
सपने सब जिनके बिथरि गये
औलादी उनकी रिरिकि रहीं

जे खून बहाइन, जिव दीन्हिन
छाती पर गोली खाय खाय
जिनके लरिका फांसी चढ़िगे
उनकी अम्मा की हाय हाय

आजादी उनकी और रहे
उनके सपने कुछ रहें और
जिनकी कुर्बानी भई रहे
उनकी कीमत कुछ रहे और

तुम बीच म  फाटेउ बादर अस
बिजुरी अस गिरेउ गरीबन पर
खेती कीन्हेउ तुम लासिन की
लट्‌टू हुइ गएउ अमीरन पर

टाटा बिरला मित्तल होरे
सब देसु टहलि के झारि लिहिनि
सरकारइ तुमरी रहैं खूब
काजरु उनकी बदि पारि दिहिनि

फिरि भइं देवारी दिया बरे
पूंजीपति बर्फी धमकी रहे
जे असिली मा हकदार रहें
उनके घर घुप्प अंधेरु रहे

हम उबरि न पाये रहन तनिकु
उनते बड़खर जल्लाद मिले
उइ कहिन कि दुख सबु हरि लेबा
सब राम भरत अस खूब मिले

चौदह मा भवा इलेक्सन फिरि
वै टीबी पर वाटय मांगिन
कुछ धरम धुरंधर रैलिन मा
सब वादा हमते कई डारिन

बोले अच्छे दिन आय रहे
पुरिखा लहि सब पतियाय गये
जो नये खून के ज्वान रहें
सब बजरंगी बनि छाय गये

को रामकाज मा बिपति बने
तलवार लिए हिन्दू सेना
भगवा का बांधि मुरैठा वै
ककुवा होरे धौंकैं ब्याना

कुछ जन समुझावैं समुझइं ना
ययि हत्यारे हैं मानइं ना
गांधी के गोली मारिन यइ
वै रहे बतावत जानइं ना

यइ अग्रेजन का साथु दिहिन
जब पुरिखा तुमरे लड़त रहें
यइ करिन गुलामी राजन की
जब बप्पा लाठी खाति रहें

यइ जन गण मन ना गाइ सके
जब आजादी के ढोल बजे
यइ कबौ तिरंगा ना थामिन
जब आजादी के साज सजे

ककुवा गुजराती दंगन का
तुम यतनी जल्दी भूलि गयेउ
मंदिर मस्जिद की राजनीति
तुम सांपु आइस सब सूंघि गयेउ

वहु नसा धरम का चढ़ा रहे
यहु किहिस अफीमी अपन काजु
जानै समुझै पर जोरु नहीं
फिरि छाय गवा सब रामराजु

मोदी जी फिर परधान भए
औ अमित साह जोड़ी थामिन
कुछ राजनाथ नेता होरे
सब नई कैबिनिट गढ़ि डारिन

सिच्छा मंत्रालय मनु स्मृति
ईरानी जी का मिला रहे
तौ बात हिंये से सुरू भई
जब शोध वजीफा कटा रहे

दिल्ली मा भवा आंदोलन
सब लरिका लरिकी जुटे रहें
तब रामराज की सरकारी
लाठी पीठिन पर परी रहें

यहु रामराज का नक्सा सबु
हमरी आंखिन का डाहि गवा
जब दाना माझी लासि लिए
कांधे पर पत्नी आय गवा

एक रात रहे आधी आधी
जब नोट बंद का हुकुम भवा
साइकरा पार कइ मरे खूब
लाखन जन का रूजिगार गवा

साहब जी कबौ बताइन ना
क्यतना काला धन निकरा है
जनधन वाले खाता मइहाँ
पंद्रह लाख कब पहुंचा है ?

यतना झेले के बादिउ मा
जनता पर चढ़ी अफीम रही
यूपी मा फिर अधिकार भवा
‘तपसी धनवंत दरिद्र ग्रही’

क्यतने दिन अबही बीते हैं
गोरखधंधा की जग्य भयी
गोरखपुर जनपद मा द्याखौ
केतनी हत्यारिन नदी बही

उन दुधमुंहटन की लासिन का
जो कांधे धरि धरि रोउती हैं
क्यतने हइं फाट हिये उनके
महतारी जउन तड़पती हैं

यह आजादी है कौनि मिली
हम माथु ठोकि के सोचित है
सन सैंतालिस से सत्रह लहि
कफ्फ़न के कपड़ा नोचित है

दै रहे बधाई मुखिया जी
है आजु अट्टिमी कृस्न जलम
हम तुमरे मुंह पार थूकित है
सब नसा हिरन है धरम करम ।

__शैलेन्द्र कुमार शुक्ल
[15/08/2017]

पहीमाफी [१३] : दहिजरा कलाही कलपावै

आशाराम जागरथ रचित ग्रामगाथा ‘पाहीमाफी’ के  “पहिला भाग” ,  दुसरका भाग  , तिसरका भाग , चौथा भाग , पंचवाँ भाग , ६-वाँ भाग , ७-वाँ भाग , ८-वाँ भाग , ९-वाँ भाग१०-वाँ भाग  , ११-वाँ भाग , १२-वाँ भाग के सिलसिले मा हाजिर हय आज ई १३-वाँ भाग :

पाहीमाफी कय ई तेरहवाँ भाग हाजिर हय। दुरभिच्छी मा गाँव कय हालत यहिमा बयां कीनि गय हय। अकाल-दुर्भिच्छ कबिता कय बिसय बनत हय तौ यक चुनौती ई हुवत हय कि कहाँ ले विवरण रखा जाय, औ कहाँ ले संवेदना उभारी जाय! कबि कय मंतब्य केतना आवय औ केतना लेगन कय राय आवय! पाहीमाफी कय कवि घटना चुनै के मामिले मा एलर्ट अहय। ऊ अस घटनन का चुनत हय जिनसे घटना कय गतिकी आयि जाय, साथे-साथे घटना खुदै मा कमेंट बनि जाय। कयिउ दाँय तौ कबि-मंतव्य यहि तरह आवत हय कि वहिकय संगति सहजै सोसित पात्र से होइ जाति हय। पात्र बोलय तौ समझौ कबि बोलय, कबि बोलय तौ समझौ पात्र बोलय। मसलन नीचे दीन पँक्ति कविता बिना इनवर्टेड कामा के दीन गै अहयँ, जौन कि ठीकौ अहय : 

यक्कै थैली से जनम लिहेन
बेगानी हम दुई आंखी मा.
ध्वनि/नाद, अनुप्रास, के्र सहायता से काव्यत्व लाउब पाहीमाफी मा कम हुअत हय मुला ्जहाँ हुअत हय बहुत जमि जात हय। अलंकार जब अनायास आवय तब ऊ सबसे ज्यादा सार्थक हुअत हय। जैसे इन पंक्तियन का देखिके यहि बात कय अनुमान कीन जाय : 
बोलौ ना पुक-पुक पुकुर-पुकुर
जिउ धड़कै धुक-धुक धुकुर-धुकुर
मलकिन-सहुवाइन कै भाखा
नाहीं-नाहीं नानुकुर-नुकुर….
आलोचक रामचंद्र सुकुल कय मानब हय कि नाद सौंदर्य से कबिता कय आयु बाढ़त हय। अवधी कबिता मा जब नाद सौंदर्य आवत हय, ऊ अऊर बियासि जाति हय। : संपादक
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  • दहिजरा कलाही कलपावै

येक  साल ना भै बरसात
परा कलाही दिन और रात
खात-खात जिउ जाय कचाय
जोन्हरी क् रोटी कोदई क् भात
मोर भुखिया मोर माई जानैं
भरा कठौता आटा सानैं
यक्कै जूनी मिलै खाय कां
भरि कै पेट खियाय क् मानैं
सड़ा-गला गल्ला बनिया कै
लावैं रोज उधारी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

यक रोज कहारेन के टोला
चूल्ही भीतर झगरा होइ गै
मरदा बोलिस ई पेटकटिनी
भरि पेट न खाना हमैं दियै
उठि कै यक झापड़ मारि दिहिस
गुस्साय कै झोंटा खीचि लिहिस
तब दांत पीसि कै मेहरारू
नीचे से फोता पकरि लिहिस
‘दहिजरऊ मोंछ उखारि लियब
तोहरे पुरखन की दाढ़ी मा’
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

जोरू हमार सोवै जानै
बस आपन पेट भरै जानै
भुखमरी भी अइसन चीज हुवै
बिन लेहें परिच्छा ना मानै
हम फुरै कहिअ थै देखि लियौ
मुड़वारी तोपे धरे रही
राती मा तकिया फारि-फारि
यक कूकुरि रोटी खात रही 
जे सुनै उहै हँसि-हँसि लोटै
केव बोलै ना वकरे हक़ मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

भुखमरी नचावत नाच रहा
रोटी कै बन्दर बाँट रहा
देवरानी अउर जेठानी के
बीचे झगरा होय जात रहा
सब जानिअ थै तू जेस बाट्यू
दुई आँखी काम करत बाट्यू
पातर रोटी सबके आगे
मरदे कां मोट दियत बाट्यू
बनि गयू निर्दयी काव कही
बुद्धी भरभस्ट कलाही मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

संझा – भिन्नहीं रोज आवै
दहिजरा कलाही कलपावै
बनी रोटी चरी-बाजरा कै
टूका-टूका मा बंट जावै
रिरियायं गेदहरे बहुत घरे
महतारिन रोय-रोय डांटैं
भेली-ककई रस घोरि जियैं
जइसै–तइसै सब दिन काटैं
सोना के भाव सुहाय सड़ा
गल्ला मिलि जाय मजूरी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

बोलौ ना पुक-पुक पुकुर-पुकुर
जिउ धड़कै धुक-धुक धुकुर-धुकुर
मलकिन-सहुवाइन कै भाखा
नाहीं-नाहीं नानुकुर-नुकुर
कउनौ ना तरी-तापरी बा
यक्कौ धुर खेती नाहीं बा
अब करै मजूरी कहाँ जाय
सबके घर परा कलाही बा
पी लियौ पसावन चउरे कै
पायन कोटा सरकारी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

खाय बिना घर रगड़ा होइगै
सास-पतोहे म् झगरा होइगै
मिटै न खइंहस रोज रोज कै
चूल्हा मा अलगौझा होइगै
तोर नइहर मोर जाना बाय
नौ सै गदहा बान्हा बाय
खरी बात मौसी कै काजर
कहकुत बहुत पुराना बाय
बूढ़ा सुसकैं भुनभुन-भुनभुन
काकुन कूटैं काँड़ी मा
यकतनहा  कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

कहरैं, खासैं खटिया पकरे
बुढ़ऊ मिनके वलरे-वलरे
भइया कां तनी बोलाय दियौ
तू चली जाव निहुरे-निहुरे
पाँव पसारौ जेतना चादर
बाँटा पूत पड़ोस बराबर
बना चौधरी रह्या जनम भै
घर कै मुरगी साग बराबर
पेटपोछवा यक बेटवा पायन
भांग परि गवा बुद्धी मा
यकतनहा  कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

बेईमान बनियवां सत्तियार
पाथर तउलै धइ बार-बार
गुरबा-गरीब बिसहै आवैं
तौ मूड़ि लियै मूड़े कै बार
मिठुवाय कै नीक-नीक बोलै
कंठी-माला कै जाप करै
दस ढोका नोने के बदले
मउनी भै तीसी तौल लियै
दिन दूनी रात चौगुनी वोकर
लोय लगै दुर्भिच्छी म
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

एड़ी म् नाहीं फटी बेवाई
कइसै जानैं पीर पराई
वनकै बिगड़य रोज हाज़मा
पेट मोर अगियात बा माई
दुई-दुई दाना खरमिटाई
दाम बटोरैं पाई-पाई
छाती चढ़ि कै काम करावैं
हम नाहीं करिबै हरवाही
उखरि परैं मरि जायं निगोड़े
आग लगै खरिहाने मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

जोरू टोवै गठरी-पोटली
मोर माई मुंह खाली अंतड़ी
पहिले चलिकै कुछ खाय लियौ
बहु नीक बनी सेधरी मछरी
गोहूँ क् बाली गदरान बाय
दुई-चार रोज कै कसर बाय
यक लेहना काटिकै लइ आइब
जुग बीता जांत चुपान बाय
जिउ-जान से दयू अगर राखिन
हम खूब कमाब कटाई मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

भइया पाये मोटकी-मोटकी
हमरे आगे रोटी छोटकी
खाई हम मसल कै दाल-भात
वै दूध पियैं कनखी आंखी
हम सिरिज लियब बा मजेदार
आउर ना मांगब बार-बार
बचिगै थरिया मा तरकारी
दइ दियौ थोर बसियान भात
यक्कै थैली से जनम लिहेन
बेगानी हम दुई आंखी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

अपने ढर्रे अलहन बीतै
केतनौ आगे रोवै गावै
सूरज डूबे दिन डूबि जाय
भिन्नहीं उगै लइकै आवै
बड़मनई नाहीं काम करैं
कामे कै ना ही दाम दियैं
जाँगर कै काम कमाय अन्न
आपन जाँगर बरबाद करैं
लाठी भांजैं बिन मतलब कै
धरती के बोझ बयारी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

भूखे पेट कै हँसी निराली
हड्डी टोवैं राम पियारी
झौंसा मुंह दुइ होंठ झुराने
चिपकू गाले दांत चियारी
आंखी मारे बड़े बड़कऊ
ताकिस जइसै वनके वोरी
घर भै चलिकै धान निरावौ
पतरी नीक कमरिया तोरी
टूटै खूब सरापै वोकां
गरियावै मन ही मन मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

अबकी साली करमुन्नन मा
रसियाव कचौड़ी औ’ बरिया
खुब नरमानरम सोहारी-लपसी
देबै मुचौमुच्च थरिया
‘मुंह खोल कै आखत हम मागेंन
रहिगै ना तनिचौ धरम-दया
हाँ-हाँ भरिकै नहकार दिह्‌यू
तोहरे बाती कै कवन थया’
अटका बनिया कै गरज परी
तौ बेंचै माल उधारी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

सासू तोहरे जब जियत रहीं
बहु मान-मनउवल रखत रहीं
चाउर – पिसान औ’ तरकारी
हार्’हे-गार्’हे दइ दियत रहीं
अरहर-केराव-गोहूँ क् घुघुरी
उप्पर से सिखरन यक लोटा
बेझरी कै रोटी मोट-मोट
देसी घिउ कबहुं-कबहुं पोता
पट्ठा खुब नीक जवान रहेन
लढ़िया ठेली दिन-राती मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

बटुली मा दाल चुरत बाटै
जाइत ब उधार तेल माँगे
ईंन्हन चूल्हा म पझान होये
तनिका घुसुकाय दिहौ आगे
गोहूँ क् रोटी छौंकी दलिया
अरहर कै खाये जुग बीता
अक्तान बहुत अमिल्यान हयौ
धीरज धइकै निधरक बइठा
सैगर बाटै घरभै ताईं
कुलि खाबै नाहिं अकेलै मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा.

__आशाराम जागरथ

[जारी….]

आठवीं अनुसूची और अवधी (१) : अवधी अध्येता शैलेन्द्र कुमार शुक्ल का वक्तव्य

‘हिन्दी बचाओ मंच’ नाम कय संस्था जेसस आपन भासाई फासीवाद कय सिकंजा कसति जाति अहय, तेसस हिन्दी पट्टी केर लोकभासा वाले खदबदात जात अहयँ। अवधी के बरे, दुनिया भर मा, अपनी पहिचानि कै झंडा फहरावय वाले जगदीस पीयूस सुत राकेस पान्डे कय यक दसकतिया सच्चाई कय भंडा फूट तौ यक फेसबुकिया बहस सुरू भय। यहि पै सैलेन्द्र सुकुल यक वक्तव्य लिखिन। यही महीनी केरी सत्तरा जुलाई का। ‘खरखैंचा’ पै लगायिन। मुल खरखैचा कै ऊ लेख खुलत नाहीं ना। का जनीं काहे। यहिते ‘आठवीं अनुसूची और अवधी’ लेखमाला कै सुरुआती आलेख के रूप मा यही आलेख रखा जात अहै। : संपादक 
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कूप-मंडूक अवधियों के नाम एक वक्तव्य

20106654_1999555283403902_680498689825182597_nगो-रक्षा आंदोलन और आधुनिक हिंदी का उद्भव एक ही राजनीति एजेंडे के रूप में हमारे सामने आया। गो माता की तरह हिंदी माता के भी महिमा मंडन की प्रक्रिया एक साथ राजनीतिक तौर पर तेज होती गई। उस समय भी अवधिये सबसे ज्यादा कन्फ़्यूज्ड थे- प्रतापनारायण मिश्र इसके उदाहरण है और प्रताप-लहरी इसकी गवाह है। ‘हिंदी-हिन्दू-हिंदुस्तान’ इन्हीं का दिया हुआ नारा है। इन्होंने भी दोनों को साधने की पूरी साधना की है। हिंदी जिन रूपों में मानकीकृत हो कर आई, उस पर महत्वपूर्ण शोध फेंचेसिका आर्सेनी,वसुधा डालमिया और आलोक राय आदि ने तर्क संगत काम किया है। अवधियों की गत न्यारी ही रही है, उनके पास जायसी हैं, तुलसी है, रहीम हैं माने वही ही गौरव और गर्व के केंद्र में थे। तो उनको अब कोई परवाह नहीं, क्योंकि उनके पास गौरवशाली पुरखे हैं। उन्होंने यह कभी नहीं सोचा अरे हम क्या कर रहे हैं, रीतिकाल भर तुम क्या कर रहे थे,आधुनिक युग में पढ़ीस से पूर्व तुमने क्या किया। यह सब उनके सोचने का विषय कभी नहीं रहा। तुम भी सत्ता का राग उसी की भाषा में गा रहे थे और चाटुकारिता कर रहे थे, यह कब तक छुपाओगे! पढ़ीस के बाद नई लीक अवधी में पड़ी लेकिन उस पर अवधी का कौन कवि चला यह किसी से छुपा नहीं। अवधिये अपने पुरातन घमंड में चूर मानस पर कर्मकांड करते रहे और अब अवधी के उद्धार के लिए अवधी होटल खोलने की तैयारी में लगे हैं और अवधी की तीर्थ यात्राएं चालू हैं, और जीवित भाषा की तेरहीं मना कर पोथन्ने छापे जा रहे हैं।

आज भी सबसे ज्यादा अवधी वाले ही कन्फ़्यूज्ड हैं। जब भोजपुरी ने अपनी आवाज उठाई और उससे पहले भी तमाम विसंगतियों के बावजूद जब भोजपुरी बाजार में डिंकने लगी तो स्वनामधन्य अवधिये नींद से जागे तब तक उन्हें नहीं पता था कि अवधी पीछे छूट रही है। खैर, यह भी गज़ब की बात है की अवधियों की नब्बे फीसदी आबादी यह जानती ही नहीं कि वह जो भाषा बोलती है उसका नाम क्या है। और बाकी के अवधिये धार्मिक और सांप्रदायिक कामों में व्यस्त थे, बचे प्रगतिशील लोग तो उनको अपनी बौद्धिकता प्रमाणित करने में अवधी की बात कर के गंवार थोड़ी न होना था। यह राम कहानी है अवधी की। गाँव देहात से जो तनिक भी पढ़ लिख कर या बिना पढ़े-लिखे भी थोड़ा बाबूगिरी टाइप कुछ शहर में मिल गया तो उनके घर में अवधी प्रतिबंधित हो जाती है या घ्रणा की वस्तु समझी जाती रही है। बाकी देहात में भी यदि घर से बाहर सड़क पर पाँव निकाल लिए तो अवधी बोलने में देहातीपन का बड़ा भारी बट्टा लग जाता है। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल भी इस तरह का एक वाकया जो लखनवी मित्र के साथ सांची का स्तूप देखने गये थे, कभी भुला नहीं पाये नहीं। महुए का नाम जानने से बाबू पन में भारी बट्टा लग जाता है। इस तरह अवधियों ने बहुत दिनों तक यह जाना और समझा ही नहीं कि अवधी भी अभिमान की विषयवस्तु है, खैर भोपुरियों का शुक्रिया कि इन्हें ईर्ष्या करने के लिए जगा लिया।

इधर बीच जब भोजपुरी को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने के लिए भोजपुरियों ने साहित्य से लेकर राजनीति तक आवाज उठाई तो साहित्य के स्वनामधन्य नेताओं ने सोचा कि यह क्या, अब इन्द्र का सिंहासन डोलने लगा, ये कौन मनुज हैं जो हमारा आसान छीनने के लिये तप करने लगे हैं। डर भयानक था । उधर कलकत्ता से एक आहात आवाज सुनाई पड़ी त्राहिमाम …..त्राहिमाम । बचाओ प्रभू , बचाओ, अगर सरकार हाकिम ने कहीं भोजपुरी को अनुसूची में शामिल कर लिया, तो हम हिंदी वालों का धंधा कैसे चलेगा, हमारी बाबूगिरी का क्या होगा, हमारे कस्टमर कम हो जाएंगे! हम बर्बाद हो जाएंगे! इस तरह आहात होकर देवतुल्य आचार्य श्री…श्री….108 डॉ. अमरनाथ जी ने हिंदी के अश्वमेघ यज्ञ के आयोजन के लिये गुहार लगाई। और अपनी साम्राज्यवादी शक्तियों को संगठित कर हिंदी को फिर गोरक्षा आंदोलन की याद दिलाई। इस तरह हिंदी के साम्राज्यवादी अश्वमेधीय घोड़े कलकत्ता दिल्ली से होते हुये अवध में आये। मजे की बात यह भी कि इधर फिर से गोरक्षा आंदोलन जब से ज़ोर पकड़ा है तभी से हिंदी बचाओ अभियान भी कुंलांचे भरता हुआ, चिल्लाता हुआ, चीखता हुआ सामने आ ही गया। असल में दोनों का चरित्र एक ही है।

तो यह बात मैं खास कर अवधियों के लिये ही कह रहा हूँ , उधर ही आता हूँ। डॉ. अमरनाथ जी ने जब हिंदी बचाओ मंच नामक संप्रदाय खोला तो उसमें सबसे ज्यादा अवधिये ही शामिल हुये। उनकी ईर्ष्या ज़ोर मार रही थी, हमारे पुरखे तो हाथी पालते थे, हमारे बाबा घोड़े से चलते थे आदि …आदि। लेकिन इन्हें यह खयाल कभी नहीं आया कि हमारी जान तो कुकुर को एक कौर डालने में भी निकलने लगती है, हमने क्या किया, इसकी कोई परवाह नहीं। हिंदी के साहित्यिक घराने में कुछ अवधी जाति के नागरिक हैं जिन्हें अपनी पैदाइश पर बड़ा फ़क्र है। यह विश्वविद्यालयाओं में भी हैं और प्राइमरी स्कूलों में भी। भोजपुरियों को देख इनको भी राजनीति सूझी। तो दो रास्ते नजर आए – या तो अवधी बिना प्रयास के संविधान की अनुसूची में शामिल हो जाए और हम लोग अवधी अकादमी के अध्यक्ष बने फिर अपने चाटुकारों को पुरस्कार बांटें, फंड दें, अवधी होटल खोलें ,भंडारा करें और पोथन्ना छापें। और दूसरा रास्ता यह कि भोजपुरी के खिलाफ खड़े होकर हिंदी बचाओ मंच से जुड़ें और भोजपुरी को अनुसूची में शामिल ही न होने दें। तब मामला बराबर। अवधिये बहुत कन्फ़्यूज्ड हैं। इधर अवधी प्रेम भी प्रदर्शित कर देते हैं और उधर हिंदी बचाओ मंच के उद्धारक देवताओं की पालकी भी ढो रहे हैं। मैं तो कहता हूँ तुम धन्य हो अवधियों ! तुम्हारे कन्फ़्यूजन को धिक्कार है !

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शैलेन्द्र कुमार शुक्ल

आज अवधी के स्वाभाविक और हिम्मती साथी अमरेन्द्रनाथ त्रिपाठी जी ने एक पोस्ट फेसबुक पर मुझे टैग की। पोस्ट देख कर मैंने फिर माथा पकड़ लिया। कोई राकेश पाण्डेय है, अपने को अवधिया मानते हैं । हिंदी को बचाने के लिए और भोजपुरी को अष्टम अनुसूची में शामिल न किया जाय , इसलिये हस्ताक्षर अभियान चला रहे हैं, ऊपर पत्र में मोदी जी से गुहार लगाई गई है, बाकायदा। राकेश जी जैसे अवधी भाषी आप को बहुत से मिल जायेंगे। ये अवधी की बात करते हैं, संस्कृति को मेनटेन करने के लिये विविध आयोजन किया करते हैं। दरअसल इन चीजों से इनका कोई सरोकार नहीं है, ये वर्ग संघर्ष में दूसरे वर्ग से आते हैं -“उयि अउर आहि हम और आन” । इनके पास खूब पैसा है,अच्छी नौकरी है, बच्चे कनवेंट स्कूलों में सालाना लाखों रुपयों की फीस पर पढ़ते हैं, बड़े-बड़े शहरों में अच्छे मुहल्लों में घर हैं इनके। बस थोड़ा इज्जत और शोहरत के लिये देश प्रेम, लोक-प्रेम, भाषा-प्रेम(विद्वता प्रदर्शन के लिये), साहित्य प्रेम, संस्कृति प्रेम का प्रदर्शन कर लेते हैं। ये ऐसे योद्धा हैं जो ठेके पर आंदोलन चलवाते हैं, छठे-छमहे कल्चरल प्रोग्राम करवा देते हैं, सत्ताधारी नेताओं से मिल कर सौ बार चरण बन्दना करते हैं, और सांप्रदायिक दंगों से लेकर मंदिर निर्माण हेतु चंदा देते हैं, और जाहिल इतने कि लाल हरे नगों वाली अंगूठियों से लेकर  लाल-काले कपड़ों में लपटे पंडों और मुल्लाओं की भभूत देह पर सुविधानुसार बांधे रहते हैं। इनकी मूर्खता जग जाहीर है। और एक बात तो छूट ही गई इनकी सबसे बड़ी पहचान यह कविता के बहुत भारी रसिक होते हैं। तो इनके लिये राकेश रंजन की दो पंक्तियाँ याद आ रहीं हैं-

‘तुमरी जय जय कार सुअरवा
तुमको है धिक्कार सुअरवा।’

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पाहीमाफी [१२] : जाति दंस, बड़ा कलंक

आशाराम जागरथ रचित ग्रामगाथा ‘पाहीमाफी’ के  “पहिला भाग” ,  दुसरका भाग  , तिसरका भाग , चौथा भाग , पंचवाँ भाग , ६-वाँ भाग , ७-वाँ भाग , ८-वाँ भाग , ९-वाँ भाग१०-वाँ भाग  , ११-वाँ भाग के सिलसिले मा हाजिर हय आज ई १२-वाँ भाग :

यकतनहा नीम अउर जागरथ

हिन्दी मा पिछले कयिउ सालन से दलित आत्मकथा कय दौरदौरा चलत अहय। ई चलन एतना जोरान अउर फरान कि दलित-लेखन के बहस मा आत्मकथा केंद्र मा आइ गय। खचिन्ना-अस खींच दीन गा कि ऊ दलित-साहित्यकार कउने अरथ मा जेहके लगे आत्मकथै न हुवय। यहिते यह चीज ई भै कि आत्मकथा के नाव पै यक किसिम कय ‘फॊर्म’ कय देखादेखिउ हुवय लागि। यहिमा कौनौ दुइ राय नाहीं न कि इन्हते विमर्स वाले लेखन मा बहुत आसानी भै। मुदा, रचनात्मक इलाका आहिस्ता-आहिस्ता किनरियावा जाय लाग। आशाराम जागरथ कै ई ‘पाहीमाफी’ यहि किनरियाये इलाके कय अनदेखी क लयिके सजगि अहय। जागरथ आत्मकथा के ‘फॊर्म’ कय देखादेखी करय के जगहा पै आपन नवा सिल्प ढूँढ़िन। यहिकय मतलब ई नाहीं कि आत्मकथात्मकता कय भाव छोड़ि दिहिन, बल्कि पकरे अहयँ, उल्टे औरव जरूरी काम किहिन, जौन नहीं कीन जात रहा। पाहीमाफी, भासै नाहीं, अपने सिल्प औ भीतर-बात — दुइनौ के ताईं अहमि अहय। यहि अंक क यहू निगाह से देखि सका जात हय। : संपादक
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  • जाति दंस, बड़ा कलंक

सूअरबाड़ा, उजड़ी कोठरी
चुप्पे घुसरी ग़ुरबत बुजरी
फुटही खपरी मुंह बाये परी
झिलरी खटिया कथरी-गुदरी
चूल्हा आगे टुटही खांची
खांची मा आमे कै पाती
डुडुवायं बिरावैं माँग खायँ
मंगता-जोगी औ’ सन्यासी
कूकुर-बिलार घर ना झाकैं
मुसरी घुसरैं ना डेहरी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

दिन-रात खेत मा खटत रहे
वै बड़न कै सेवा करत रहे
वइसै तौ देश अजाद रहा
पर गाँव कै सूद गुलाम रहे
पैलगी दूर से करत रहैं
परछाँह बचायिके चलत रहैं
बाभन-ठाकुर केव आय जाय
खटिया पर से उठि जात रहैं
जे नीक कै कपड़ा पहिर लियै
ऊ खटकै सबकी आँखी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

मन ही मन मा सोच विचार
बहुत सहैं वै अत्याचार
सेंत-मेंत मा काम करैं बस
हरवाही पै जियैं चमार
सुख कै तूरि ना पावैं कौर
गाँव से बाहर वनकै ठौर
खाय बिना चाहे मर जांय
केहू न झाँकै वनकी ओर
करै मजूरी गाँव मा केऊ
दिल्ली केऊ बम्बई मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

उखुड़ी हमार जे तुरअ थै
जानी थै नावं बाय मुँह मा
हम पँहटत हई कऊ दिन से
रंगे हाथे पकरब वनकां
पकरे, ‘हड्डहा’ चमार मिला
खेती-बारी नाहीं वकरे
ऊ बोला काका माफ करौ
झाँवर कै रोग बाय हमरे
कुछ बूढ़ – पुरनियां कहत हये
सोवा गन्ना के खेते मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

जेकरे खेती वोकरे ऐंड़
खाली बइठ रखावै मेंड़
उखुड़ी छोलै लढ़िया लादै
मजदूरी मा खाली गेंड़
दुई रुपिया औ खरबचाई
दिन भै खोदैं वै बिरवाही
लत्ता-लत्ता लरिके तरसैं
बारहो मास करैं हरवाही
यक दिन जो नागा होय जाय
गारी पावैं सेती मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

कतहूँ-कतहूँ फुंसी-फोड़ा
मूड़े मा ढीलौ-लीख भरा
करिया धागा गटई पहिरे
तन पे झिलरा चीकट कपड़ा
देहीं मा पाले दाद-खाज
किस्मत का कोसै मुस्कियाय
यक बिगहा मुँह फैलाय लियै
जब खबर-खबर खजुली खजुवाय
माई तू काहे जनम दिहू
ई जात-पात की माटी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

सूकन-संती-गोधी-लोकई
औ कुष्ठ रोग पीड़ित तोखई
वै मरा जानवर निकियावैं
गाँवै कै नीबर औ गोगई
ना सीधे मुँह केव बात करै
केव देखतै ही अपमान करै
मेहरारू-बिटियन कै इज्जत
हरदम ही दाँव पे लाग रहै
कामे-काजे काटैं सूअर
तब उड़ै भोज चमरौटी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

टुटहा-जस्ता दुइ-यक बरतन
ज्यों साँझ ढलै बाजै खन-खन
जब खाय का घर मा ना आटै
तब खाँय मरा डांगर जबरन
खरिहान कै गोहूँ खाय-खाय कै
बैल जो गोबर करत रहे
वोका बटोरि सुखवाय लियैं
फिर पीट-पाट कै पीस लियैं
दुःख-वीर दलिद्दर दलित रहे
सब खात रहे मजबूरी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

परै लाग पेटे मा दाना
समझौ सूदे भये उताना
तनिकौ उज्जर कपड़ा देखैं
बड़े-बड़कवै मारैं ताना
हाल-चाल कुलि ठीकै बाय
बीतै समय जवन कटि जाय
‘घातै घात ‘चमरऊ’ पूछैं
मालिक पड़वा नीके बाय’
सुनेन बेमार रहा हम आयन
दउरा हाली-हाली मा 
यकतनहा  कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

नीक-सूक बेसन कै चिल्ला
खाय न झबरा करिया पिल्ला
घुसा रहै बिस्तर के भीतर
हमरे बहुत लाग बा हिल्ला
नोन-पियाज से रोटी खाई
नाहीं तौ उपास रहि जाई
आगे नाथ न पीछे पगहा
बस पिल्ला के दादा-माई
दूनौ जूनी खाय क् मिलअ थै
बन्दीघर सरकारी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

हम तौ ठहरेन खेतिहर मजूर
दुसरे सदियन कै छुआछूत
ग़ुरबत मा रोजै गम खाई
तोहरे घर धन-दौलत अकूत
देहीं खुमार मन मा गुबार
अललाय खमोशी चढ़ि कपार
आँखी से टप-टप खून चुवै
ऐ ! कब्जेदारौँ, खबरदार
अपने राही तू मगन रहौ
पीछे मुड़ि देख्यौ ना हमकां
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

हीलै ना डोलै रहै गड़ा
जइसन खेते मा ऊढ़ खड़ा
सुध-बुध खोये कुछ उड़ा-उड़ा
ऊ सुवर चरावत रहा खड़ा
अन्नासैं कां गरियाय दिहिन
देखतै चन्दन टीकाधारी
तू हया ढिठान बहुत ‘सरऊ’
मन कहत ब लाठी दइ मारी
कउने वोरी से जाई हम
परछाहीं पूरे राही मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

रसरी जरि गै अइठन ना गै
ना अबह्यूं अकिल ठेकाने भै
भुन-भुनभुन-भुनभुन मन ही मन
बोलै – बतुवाय – सुनै अपूवैं
बउदहा तोर बड़का लरिका
लूला – लंगडा बाटै छोटका
पूरे जवार सन्नाम बाय
बिटिया कां छोड़ि दिहिस मरदा
ई जात-पात औ’ ऊंच-नीच
चाटा लइकै तू घर हीं मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

तू बरा रहौ बरियान रहौ
जाती पै खूब गुमान करौ
मनइन के बीचे हम रहिबै
तू ऊँच रहौ सैतान रहौ
खुब पढ़ौ पुरैहिती घोंट-घोंट
बेटवा हमार बी.ए. मा बा
तू उड़ा रहअ थौ का जानौ
बड़कउना दुबई मा गै बा
उजियारे कै आदी मनई
देखते नाहीं अन्हियारे मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

परै मुरदनी चमरौटी मा
कउनौ फरक न बभनौटी मा
केव न जाय फुकावै साथे
मानौ वै ना हये गाँव मा
आपन काम करैं सब सारा
ताकैं बस, कस लियैं किनारा  
बहुत हुवै तौ बोल दियैं कि 
सीधा-सादा रहा बेचारा
बैर-भाव न किहिस केहू से
जुटा रहै बस कामे मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

बड़कन मा केऊ मरि जाय
सूद-अछूत  फुकावै जायँ  
लामे खड़ा रहैं चाहे वै
लेकिन मूड़ गिनावै जायँ
यक्कै गाँव मा येतना जात
देस कै काव करी हम बात 
सब कै आपन रीति-रिवाज़
हर जाती मा यक ठू जात
जात-पात मा अइसन जीयैं
जइसै मूस रहैं बिल मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

गाँव के बाहर बसैं अछूत
कुछ गोरहर कुछ करिया भूत
जइसै तइसै करैं गुजारा
लादे मूड़े बोझ अकूत
कुआँ से पानी भरैं न पावैं
दुसरे गांव से ढोय क लावैं
काम करैं बन मनई-तनई
तब सबकै मनई कहलावैं
जब मागैँ मनई कै दर्जा
गिनती नाहीं मनई मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

बोले गोगई मन बा खट्टा
पानी कै बा बहुत समिस्या
ईंटा पाथै हम जानिअ थै
कुआँ खोदाइब कच्चा-पक्का
सबकै सब मनसाय गये जब
कुछ भलमनई साथ दिहिन तब
देखतै देखत बनिगै कूआँ
जरवइयन कै चेहरा धूआँ
सबसे खुस मेहरारू – लरिकै
धूम मची चमरौटी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा.

__आशाराम जागरथ

[जारी….]

पाहीमाफी [११] : भेदभाव गहिर-घाव

आशाराम जागरथ रचित ग्रामगाथा ‘पाहीमाफी’ के  “पहिला भाग” ,  दुसरका भाग  , तिसरका भाग , चौथा भाग , पंचवाँ भाग , ६-वाँ भाग७-वाँ भाग८-वाँ भाग , ९-वाँ भाग, १०-वाँ भाग  के सिलसिले मा हाजिर हय आज ई ११-वाँ भाग :


जौन चीज कवि जागरथ क दूसर अवधी के गाँव के लिखैयन से अलग करत हय, ऊ हय इन कय ‘दिस्टिकोन’। यानी देखय कय नजरिया। प्वाइंट आफ बिउ। यही से, उहै गांवै वाला नजारा, दिस्टिकोन बदलि जाये से अलग नजारा लागय लागत हय। जैसे कोल्हू के लगे कय नजारा देखौ। दलित दिस्टिकोन से अलग सोचय वाला कौनौ लेखक रहत तौ ऊ हुवाँ मह-मह महकत गुलौरी से निकरा गरम गुड़ चुभलावन-रसरंजन करत वाह-वाह करत निकरि आवत। मुला जागरथ अपने अलग नजरिया के कारन हुआँ ‘घूरे चमार’ कय दुख टिकाय देहे अहयँ, जेहका महसूसे के बाद गरम गुड़ कय महकि औ सुवाद दुइनौ असलील लागय लागत हय :  

सोचैं, ठाढ़े घूरे चमार
हमसे अच्छे कूकुर-बिलार
हरवाही करत लड़कपन से
जिनगी रेंगा होय गै हमार!

यक औरौ चीज जागरथ केरी आज की यहि प्रस्तुति मा जहिरानि अहय। ऊका कहत हयँ, ‘पैराडाक्स’ देखाय के सभ्यता कै चीर-फाड़ करब। यहिकय पाखंड उजागर कयि दियब। पैराडाक्स, यानी बिरोधाभास देखाइ के। जैसे जौने कोल्हू पय घूरे चमार का मिनहां कीन जात अहय कि हर्सि न छुयेव, वही जगह बैलवन क कौनौ मनाही नाहीं ना। मनई से जादा पेवर अहयँ बर्ध। इहय समझि आय जौन आज के दिनन मा गौ-रच्छा के नाव पै मनइन क मौति के घाट पहुँचावति अहय। दूसर पैराडाक्स देखौ कि दोस्त के घर गवा ‘अछूत’ दोस्त केसेस बेरावा जात अहय। वहिका बर्तन तक नाहीं नसीब करावा गा खाय के ताईं। भुइयाँ मा खंता खनिके, केरा कय पाता दुनफर्तियाइ के खाइस ऊ। मुला भिनसारे ऊ का देखिस? देखिस कि जौने थरिया का वहसे बेरावा गा, वहिकै बारी कानी कुकुरिया चाटति बाय। मनई कुकुरौ-बिलार से गवा-गुजरा बनाय दीनि गा, इहै जात-परपंच के कारन। ई देखेक बादि, साथी, दुवा-बंदगी कय औपचारिकता भुलाय दियय तौ ठीकय हय। कम से कम ऊ दुवा-बंदगी के पाखंड से अपनेक्‌ बचायिस : 

फिर नजर परी दालानी मा
ऊ आँख फारि कै देखअ थै
कानी कुतिया मल्लही येक
थरिया कै बारी चाटअ थै
ना दुआ-बंदगी केहू से
चुपचाप चला गै चुप्पे मा….

यहि अंक से अब सीधे रूबरू हुवा जाय। : संपादक
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  • भेदभाव गहिर-घाव 

बोले ठाकुर पीकै दारू
अब चलब-फिरब होय गै भारू
छापी धोती, चप्पल पहिरैं
शूदे-चमार कै मेहरारू
सावां-कोदौ अब अंटकअ थै
मागैं मजूर भरि कै थारी
गोहूँ कै रोटी, दाल-भात
आलू-गोभी कै तरकारी
यक उहौ ज़माना रहा खूब
दिन भर कुलि खटैं बेगारी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

जो कहत हयी भोगे बाटी
हम ज़हर कै घूँट पिये बाटी
भुखमरी – गरीबी – छुआछूत
दूनौ आँखी देखे बाटी
यक जनी जाति से ऊँच रहिन
कूँआ से पानी भरत रहिन
हम झम्म से बल्टी डारि दिहेन
वै आपन पानी फैंकि दिहिन
बोलिन, केतनौ पढ़ि-लिखि लेबा
पर अकिल ना आई जिनगी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

अब आगे मजे कै हाल सुनौ
वनके छपरा मा आगि लाग
हम ह्‌वईं बगलियें खड़ा रहेन
पानी डारैं सब भाग-भाग
देखअ थौ काव तू खड़ा-खड़ा
अगवैं तौ गगरा धरा बाय
झट बोलेन काव करी काकी
हमरे जाती मा छूत बाय
बोलिन वै छूतछात नाहीं
संकट, आफ़त औ’ बीपत मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

मंदिर हरि-कीर्तन होत रहा
औ ढोल मजीरा बजत रहा
हुवयँ बीच थपोड़ी पीट-पीट
गावत मन डूबा मस्त रहा
यक पढ़ा-लिखा नौकरिहा बाभन
दूर से हम्मै देखि लिहिस
गुस्साय कै बोला भाग जाव
औ कान पकरि कै खींच लिहिस
‘अन्हराय गया है सब कै सब
धोबिया बइठा बा बीचे मा’
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

कुछ अच्छे बाभन साथ रहे
वनके घर आवत-जात रहेन
खटिया के गोड़वारी बइठा
हम गीत-कहानी सुनत रहेन
तोनी पै सरकावत धागा
यक ‘मधुरी बानी’ आइ गये
बइठा देखिन खटिया ऊपर
उलटे ही पाँव वै लउट गये
साथी बोला घर जिन आवा
सबकै सब डांटत हैं हमकां
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

बजरंग बली कां बचपन मा
परसाद चढ़ायन भेली कै
लइकै घूमी आगे सबके
केऊ ना लियै हथेली पै
पंडित जी बोले रहै दिऔ
तोहरे हाथे मा छूत बाय
दइ देत्या ‘कहरा’ बाँट दियत
ऊ तुहरे जाति से ऊँच बाय
भेली तौ वही, मिठास वही
परसाद बँटा बहु-जाती मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

इस्कूले साथे पढ़त रहे
जाती मा तनिका ऊँच रहे
वनके घर चला गयन यक दिन
देखतै वै खूब निहाल भये
तख्ता पै गद्दा बिछा रहा
मुड़वारी तकिया धरा रहा
दुइ टुटही कुरुसी परी रही
बइठका नीक खुब बना रहा
वल्ले बुढ़ऊ खांसैं खों-खों
रहे मनबढ़ येक जमाने मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

पितरी के लोटा मा पानी
साथी कै बहिनी लइ आई
हम गट-गट पियत रहेन तइसै
डांटै लागीं बड़की माई
लोटा मा अइसन छूत लगा
घर-भीतर हाहाकार मचा
मितऊ कै महतारी बोलिन
हमरे कामे कै ना लोटा
लइ जा बेटवा! तू घर लइ जा
धइ ल्या तू अपने झोरा मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

कसि कै दाँते काटी रोटी
दुई छूत – अछूत रहे साथी
हे नीम! छाँह मा तोहरे हम
खीसा सच बइठ सुने बाटी
‘छुतऊ’ कै बैल तुराय गवा
साथे – साथे हेरै निकरे
हेरत – हेरत संझा होय गय
घर लौटे बैल दुवौ पकरे
साथी बोला कि रुकि जात्या
कहवाँ जाब्या अब राती मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

राती जब खाना खाय क् भवा
यक बड़ा अड़ंगा बाझि गवा
टुटहा ज़स्ता वाला बरतन
पिछवारे कहूँ लुकाय गवा
घर-मलकिन बोलीं काव करी
बनये हम हई दाल – रोटी
उप्पर से दलियौ पातर बा
केरा कै पाता ना रोकी
हम कहत रहेन कि जाय दिया
तोहरे सब रोकि लिह्या वोकां
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

चुप रहौ कतौ ना करौ फ़िकर
अब्बै जुगाड़ कुछ करिबै हम
बोले बुढ़ऊ बाबा अहीर
बुद्धी मा अबहूँ बा दमख़म
फंड़ियाय कै धोती खटिया से
उतरे लइकै लमका खुरपा
तनिका वहरी से पकरि लियौ
घुसकाइब हम छोटका तख्ता
खोदिन यक बित्ता गड्ढा वै
मड़हा के कोने भूईं मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

केरा कै पाता दोहरियाय
गड्ढा मा हलके से दबाय
तइयार अजूबा भै बरतन
बोले अब मजे से लियौ खाय
ऊ रहा भुखान सवेरे कै
कुछ भुनभुनाय आवाज़ किहिस
इज्ज़त – बेलज्ज़त भूलि गवा
मूड़ी नवाय कै खाय लिहिस
साथी बोला बाहर निकरा
ल्या पानी पिया अँजूरी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

भिनसारे उठि कै चलै लाग
भैंसिया बहुत अफनात रही
पितरी के बड़े ‘पराते’ मा
बसियान खाब ऊ खात रही
फिर नजर परी दालानी मा
ऊ आँख फारि कै देखअ थै
कानी कुतिया मल्लही येक
थरिया कै बारी चाटअ थै
ना दुआ-बंदगी केहू से
चुपचाप चला गै चुप्पे मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

कातिक-अगहन हँसै सिवान
जोतै हर केव काटै धान
चिखुरी चिखुरैं, छोलैं घास
केउ खेते मा फेकै खाद
चटक चाँदनी, आधी रात
गूला भीतर दहकै आग
दूर-दूर तक गम-गम गमकै
खौलै रस जब, फूलै पाग
आलू-सेम कै सुन्दर माला
पाकै टंगा कड़ाहे मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

कोल्हू कै बैल कोल्हारे मा
उखुड़ी पेरैं टुक-टुक ताकैं
सुरती दाबे घूरे चमार
पाछे-पाछे कोल्हू हाकैं
वनकै लरिका ओढ़े चादर
पलथी मारे उखुड़ी दाबै
बइठे- बइठे औंघांय जाय
जे देखि लियै कसि कै डाँटै
लरिकन कै टोली मड़िरियाय
पहिला परसाद मिली सबकां
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

झुलनी झमकावत आय परीं
गोरहरकौ दुलहिन बखरी कै
बोलिन घूंघुट आधा काढ़े
ताजा रस चाही उखुड़ी कै
लरिका कां तनी उठाय दियौ
हम लियब चुहाय खुदै काका!
रस रोपत हई दूर होय जा
दूरै से बैलन कां हांका
भूले से छुया न हर्स – बैल
जब तक रस भरै न बल्टी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

सोचैं, ठाढ़े घूरे चमार
हमसे अच्छे कूकुर-बिलार
हरवाही करत लड़कपन से
जिनगी रेंगा होय गै हमार
उखुड़ी पेरे से रस निकरै
खोहिया भी कामे आवअ थै
हम जाँगर पेरी रोज़-रोज़
तबहूँ सब छूत मनवाअ थै
ई बैला हमसे नीक बाय
ना सोच-विचार रखै मन मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा.

__आशाराम जागरथ

[जारी….]