पहीमाफी [१३] : दहिजरा कलाही कलपावै

आशाराम जागरथ रचित ग्रामगाथा ‘पाहीमाफी’ के  “पहिला भाग” ,  दुसरका भाग  , तिसरका भाग , चौथा भाग , पंचवाँ भाग , ६-वाँ भाग , ७-वाँ भाग , ८-वाँ भाग , ९-वाँ भाग१०-वाँ भाग  , ११-वाँ भाग , १२-वाँ भाग के सिलसिले मा हाजिर हय आज ई १३-वाँ भाग :

पाहीमाफी कय ई तेरहवाँ भाग हाजिर हय। दुरभिच्छी मा गाँव कय हालत यहिमा बयां कीनि गय हय। अकाल-दुर्भिच्छ कबिता कय बिसय बनत हय तौ यक चुनौती ई हुवत हय कि कहाँ ले विवरण रखा जाय, औ कहाँ ले संवेदना उभारी जाय! कबि कय मंतब्य केतना आवय औ केतना लेगन कय राय आवय! पाहीमाफी कय कवि घटना चुनै के मामिले मा एलर्ट अहय। ऊ अस घटनन का चुनत हय जिनसे घटना कय गतिकी आयि जाय, साथे-साथे घटना खुदै मा कमेंट बनि जाय। कयिउ दाँय तौ कबि-मंतव्य यहि तरह आवत हय कि वहिकय संगति सहजै सोसित पात्र से होइ जाति हय। पात्र बोलय तौ समझौ कबि बोलय, कबि बोलय तौ समझौ पात्र बोलय। मसलन नीचे दीन पँक्ति कविता बिना इनवर्टेड कामा के दीन गै अहयँ, जौन कि ठीकौ अहय : 

यक्कै थैली से जनम लिहेन
बेगानी हम दुई आंखी मा.
ध्वनि/नाद, अनुप्रास, के्र सहायता से काव्यत्व लाउब पाहीमाफी मा कम हुअत हय मुला ्जहाँ हुअत हय बहुत जमि जात हय। अलंकार जब अनायास आवय तब ऊ सबसे ज्यादा सार्थक हुअत हय। जैसे इन पंक्तियन का देखिके यहि बात कय अनुमान कीन जाय : 
बोलौ ना पुक-पुक पुकुर-पुकुर
जिउ धड़कै धुक-धुक धुकुर-धुकुर
मलकिन-सहुवाइन कै भाखा
नाहीं-नाहीं नानुकुर-नुकुर….
आलोचक रामचंद्र सुकुल कय मानब हय कि नाद सौंदर्य से कबिता कय आयु बाढ़त हय। अवधी कबिता मा जब नाद सौंदर्य आवत हय, ऊ अऊर बियासि जाति हय। : संपादक
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  • दहिजरा कलाही कलपावै

येक  साल ना भै बरसात
परा कलाही दिन और रात
खात-खात जिउ जाय कचाय
जोन्हरी क् रोटी कोदई क् भात
मोर भुखिया मोर माई जानैं
भरा कठौता आटा सानैं
यक्कै जूनी मिलै खाय कां
भरि कै पेट खियाय क् मानैं
सड़ा-गला गल्ला बनिया कै
लावैं रोज उधारी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

यक रोज कहारेन के टोला
चूल्ही भीतर झगरा होइ गै
मरदा बोलिस ई पेटकटिनी
भरि पेट न खाना हमैं दियै
उठि कै यक झापड़ मारि दिहिस
गुस्साय कै झोंटा खीचि लिहिस
तब दांत पीसि कै मेहरारू
नीचे से फोता पकरि लिहिस
‘दहिजरऊ मोंछ उखारि लियब
तोहरे पुरखन की दाढ़ी मा’
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

जोरू हमार सोवै जानै
बस आपन पेट भरै जानै
भुखमरी भी अइसन चीज हुवै
बिन लेहें परिच्छा ना मानै
हम फुरै कहिअ थै देखि लियौ
मुड़वारी तोपे धरे रही
राती मा तकिया फारि-फारि
यक कूकुरि रोटी खात रही 
जे सुनै उहै हँसि-हँसि लोटै
केव बोलै ना वकरे हक़ मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

भुखमरी नचावत नाच रहा
रोटी कै बन्दर बाँट रहा
देवरानी अउर जेठानी के
बीचे झगरा होय जात रहा
सब जानिअ थै तू जेस बाट्यू
दुई आँखी काम करत बाट्यू
पातर रोटी सबके आगे
मरदे कां मोट दियत बाट्यू
बनि गयू निर्दयी काव कही
बुद्धी भरभस्ट कलाही मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

संझा – भिन्नहीं रोज आवै
दहिजरा कलाही कलपावै
बनी रोटी चरी-बाजरा कै
टूका-टूका मा बंट जावै
रिरियायं गेदहरे बहुत घरे
महतारिन रोय-रोय डांटैं
भेली-ककई रस घोरि जियैं
जइसै–तइसै सब दिन काटैं
सोना के भाव सुहाय सड़ा
गल्ला मिलि जाय मजूरी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

बोलौ ना पुक-पुक पुकुर-पुकुर
जिउ धड़कै धुक-धुक धुकुर-धुकुर
मलकिन-सहुवाइन कै भाखा
नाहीं-नाहीं नानुकुर-नुकुर
कउनौ ना तरी-तापरी बा
यक्कौ धुर खेती नाहीं बा
अब करै मजूरी कहाँ जाय
सबके घर परा कलाही बा
पी लियौ पसावन चउरे कै
पायन कोटा सरकारी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

खाय बिना घर रगड़ा होइगै
सास-पतोहे म् झगरा होइगै
मिटै न खइंहस रोज रोज कै
चूल्हा मा अलगौझा होइगै
तोर नइहर मोर जाना बाय
नौ सै गदहा बान्हा बाय
खरी बात मौसी कै काजर
कहकुत बहुत पुराना बाय
बूढ़ा सुसकैं भुनभुन-भुनभुन
काकुन कूटैं काँड़ी मा
यकतनहा  कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

कहरैं, खासैं खटिया पकरे
बुढ़ऊ मिनके वलरे-वलरे
भइया कां तनी बोलाय दियौ
तू चली जाव निहुरे-निहुरे
पाँव पसारौ जेतना चादर
बाँटा पूत पड़ोस बराबर
बना चौधरी रह्या जनम भै
घर कै मुरगी साग बराबर
पेटपोछवा यक बेटवा पायन
भांग परि गवा बुद्धी मा
यकतनहा  कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

बेईमान बनियवां सत्तियार
पाथर तउलै धइ बार-बार
गुरबा-गरीब बिसहै आवैं
तौ मूड़ि लियै मूड़े कै बार
मिठुवाय कै नीक-नीक बोलै
कंठी-माला कै जाप करै
दस ढोका नोने के बदले
मउनी भै तीसी तौल लियै
दिन दूनी रात चौगुनी वोकर
लोय लगै दुर्भिच्छी म
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

एड़ी म् नाहीं फटी बेवाई
कइसै जानैं पीर पराई
वनकै बिगड़य रोज हाज़मा
पेट मोर अगियात बा माई
दुई-दुई दाना खरमिटाई
दाम बटोरैं पाई-पाई
छाती चढ़ि कै काम करावैं
हम नाहीं करिबै हरवाही
उखरि परैं मरि जायं निगोड़े
आग लगै खरिहाने मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

जोरू टोवै गठरी-पोटली
मोर माई मुंह खाली अंतड़ी
पहिले चलिकै कुछ खाय लियौ
बहु नीक बनी सेधरी मछरी
गोहूँ क् बाली गदरान बाय
दुई-चार रोज कै कसर बाय
यक लेहना काटिकै लइ आइब
जुग बीता जांत चुपान बाय
जिउ-जान से दयू अगर राखिन
हम खूब कमाब कटाई मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

भइया पाये मोटकी-मोटकी
हमरे आगे रोटी छोटकी
खाई हम मसल कै दाल-भात
वै दूध पियैं कनखी आंखी
हम सिरिज लियब बा मजेदार
आउर ना मांगब बार-बार
बचिगै थरिया मा तरकारी
दइ दियौ थोर बसियान भात
यक्कै थैली से जनम लिहेन
बेगानी हम दुई आंखी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

अपने ढर्रे अलहन बीतै
केतनौ आगे रोवै गावै
सूरज डूबे दिन डूबि जाय
भिन्नहीं उगै लइकै आवै
बड़मनई नाहीं काम करैं
कामे कै ना ही दाम दियैं
जाँगर कै काम कमाय अन्न
आपन जाँगर बरबाद करैं
लाठी भांजैं बिन मतलब कै
धरती के बोझ बयारी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

भूखे पेट कै हँसी निराली
हड्डी टोवैं राम पियारी
झौंसा मुंह दुइ होंठ झुराने
चिपकू गाले दांत चियारी
आंखी मारे बड़े बड़कऊ
ताकिस जइसै वनके वोरी
घर भै चलिकै धान निरावौ
पतरी नीक कमरिया तोरी
टूटै खूब सरापै वोकां
गरियावै मन ही मन मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

अबकी साली करमुन्नन मा
रसियाव कचौड़ी औ’ बरिया
खुब नरमानरम सोहारी-लपसी
देबै मुचौमुच्च थरिया
‘मुंह खोल कै आखत हम मागेंन
रहिगै ना तनिचौ धरम-दया
हाँ-हाँ भरिकै नहकार दिह्‌यू
तोहरे बाती कै कवन थया’
अटका बनिया कै गरज परी
तौ बेंचै माल उधारी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

सासू तोहरे जब जियत रहीं
बहु मान-मनउवल रखत रहीं
चाउर – पिसान औ’ तरकारी
हार्’हे-गार्’हे दइ दियत रहीं
अरहर-केराव-गोहूँ क् घुघुरी
उप्पर से सिखरन यक लोटा
बेझरी कै रोटी मोट-मोट
देसी घिउ कबहुं-कबहुं पोता
पट्ठा खुब नीक जवान रहेन
लढ़िया ठेली दिन-राती मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

बटुली मा दाल चुरत बाटै
जाइत ब उधार तेल माँगे
ईंन्हन चूल्हा म पझान होये
तनिका घुसुकाय दिहौ आगे
गोहूँ क् रोटी छौंकी दलिया
अरहर कै खाये जुग बीता
अक्तान बहुत अमिल्यान हयौ
धीरज धइकै निधरक बइठा
सैगर बाटै घरभै ताईं
कुलि खाबै नाहिं अकेलै मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा.

__आशाराम जागरथ

[जारी….]

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आठवीं अनुसूची और अवधी (१) : अवधी अध्येता शैलेन्द्र कुमार शुक्ल का वक्तव्य

‘हिन्दी बचाओ मंच’ नाम कय संस्था जेसस आपन भासाई फासीवाद कय सिकंजा कसति जाति अहय, तेसस हिन्दी पट्टी केर लोकभासा वाले खदबदात जात अहयँ। अवधी के बरे, दुनिया भर मा, अपनी पहिचानि कै झंडा फहरावय वाले जगदीस पीयूस सुत राकेस पान्डे कय यक दसकतिया सच्चाई कय भंडा फूट तौ यक फेसबुकिया बहस सुरू भय। यहि पै सैलेन्द्र सुकुल यक वक्तव्य लिखिन। यही महीनी केरी सत्तरा जुलाई का। ‘खरखैंचा’ पै लगायिन। मुल खरखैचा कै ऊ लेख खुलत नाहीं ना। का जनीं काहे। यहिते ‘आठवीं अनुसूची और अवधी’ लेखमाला कै सुरुआती आलेख के रूप मा यही आलेख रखा जात अहै। : संपादक 
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कूप-मंडूक अवधियों के नाम एक वक्तव्य

20106654_1999555283403902_680498689825182597_nगो-रक्षा आंदोलन और आधुनिक हिंदी का उद्भव एक ही राजनीति एजेंडे के रूप में हमारे सामने आया। गो माता की तरह हिंदी माता के भी महिमा मंडन की प्रक्रिया एक साथ राजनीतिक तौर पर तेज होती गई। उस समय भी अवधिये सबसे ज्यादा कन्फ़्यूज्ड थे- प्रतापनारायण मिश्र इसके उदाहरण है और प्रताप-लहरी इसकी गवाह है। ‘हिंदी-हिन्दू-हिंदुस्तान’ इन्हीं का दिया हुआ नारा है। इन्होंने भी दोनों को साधने की पूरी साधना की है। हिंदी जिन रूपों में मानकीकृत हो कर आई, उस पर महत्वपूर्ण शोध फेंचेसिका आर्सेनी,वसुधा डालमिया और आलोक राय आदि ने तर्क संगत काम किया है। अवधियों की गत न्यारी ही रही है, उनके पास जायसी हैं, तुलसी है, रहीम हैं माने वही ही गौरव और गर्व के केंद्र में थे। तो उनको अब कोई परवाह नहीं, क्योंकि उनके पास गौरवशाली पुरखे हैं। उन्होंने यह कभी नहीं सोचा अरे हम क्या कर रहे हैं, रीतिकाल भर तुम क्या कर रहे थे,आधुनिक युग में पढ़ीस से पूर्व तुमने क्या किया। यह सब उनके सोचने का विषय कभी नहीं रहा। तुम भी सत्ता का राग उसी की भाषा में गा रहे थे और चाटुकारिता कर रहे थे, यह कब तक छुपाओगे! पढ़ीस के बाद नई लीक अवधी में पड़ी लेकिन उस पर अवधी का कौन कवि चला यह किसी से छुपा नहीं। अवधिये अपने पुरातन घमंड में चूर मानस पर कर्मकांड करते रहे और अब अवधी के उद्धार के लिए अवधी होटल खोलने की तैयारी में लगे हैं और अवधी की तीर्थ यात्राएं चालू हैं, और जीवित भाषा की तेरहीं मना कर पोथन्ने छापे जा रहे हैं।

आज भी सबसे ज्यादा अवधी वाले ही कन्फ़्यूज्ड हैं। जब भोजपुरी ने अपनी आवाज उठाई और उससे पहले भी तमाम विसंगतियों के बावजूद जब भोजपुरी बाजार में डिंकने लगी तो स्वनामधन्य अवधिये नींद से जागे तब तक उन्हें नहीं पता था कि अवधी पीछे छूट रही है। खैर, यह भी गज़ब की बात है की अवधियों की नब्बे फीसदी आबादी यह जानती ही नहीं कि वह जो भाषा बोलती है उसका नाम क्या है। और बाकी के अवधिये धार्मिक और सांप्रदायिक कामों में व्यस्त थे, बचे प्रगतिशील लोग तो उनको अपनी बौद्धिकता प्रमाणित करने में अवधी की बात कर के गंवार थोड़ी न होना था। यह राम कहानी है अवधी की। गाँव देहात से जो तनिक भी पढ़ लिख कर या बिना पढ़े-लिखे भी थोड़ा बाबूगिरी टाइप कुछ शहर में मिल गया तो उनके घर में अवधी प्रतिबंधित हो जाती है या घ्रणा की वस्तु समझी जाती रही है। बाकी देहात में भी यदि घर से बाहर सड़क पर पाँव निकाल लिए तो अवधी बोलने में देहातीपन का बड़ा भारी बट्टा लग जाता है। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल भी इस तरह का एक वाकया जो लखनवी मित्र के साथ सांची का स्तूप देखने गये थे, कभी भुला नहीं पाये नहीं। महुए का नाम जानने से बाबू पन में भारी बट्टा लग जाता है। इस तरह अवधियों ने बहुत दिनों तक यह जाना और समझा ही नहीं कि अवधी भी अभिमान की विषयवस्तु है, खैर भोपुरियों का शुक्रिया कि इन्हें ईर्ष्या करने के लिए जगा लिया।

इधर बीच जब भोजपुरी को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने के लिए भोजपुरियों ने साहित्य से लेकर राजनीति तक आवाज उठाई तो साहित्य के स्वनामधन्य नेताओं ने सोचा कि यह क्या, अब इन्द्र का सिंहासन डोलने लगा, ये कौन मनुज हैं जो हमारा आसान छीनने के लिये तप करने लगे हैं। डर भयानक था । उधर कलकत्ता से एक आहात आवाज सुनाई पड़ी त्राहिमाम …..त्राहिमाम । बचाओ प्रभू , बचाओ, अगर सरकार हाकिम ने कहीं भोजपुरी को अनुसूची में शामिल कर लिया, तो हम हिंदी वालों का धंधा कैसे चलेगा, हमारी बाबूगिरी का क्या होगा, हमारे कस्टमर कम हो जाएंगे! हम बर्बाद हो जाएंगे! इस तरह आहात होकर देवतुल्य आचार्य श्री…श्री….108 डॉ. अमरनाथ जी ने हिंदी के अश्वमेघ यज्ञ के आयोजन के लिये गुहार लगाई। और अपनी साम्राज्यवादी शक्तियों को संगठित कर हिंदी को फिर गोरक्षा आंदोलन की याद दिलाई। इस तरह हिंदी के साम्राज्यवादी अश्वमेधीय घोड़े कलकत्ता दिल्ली से होते हुये अवध में आये। मजे की बात यह भी कि इधर फिर से गोरक्षा आंदोलन जब से ज़ोर पकड़ा है तभी से हिंदी बचाओ अभियान भी कुंलांचे भरता हुआ, चिल्लाता हुआ, चीखता हुआ सामने आ ही गया। असल में दोनों का चरित्र एक ही है।

तो यह बात मैं खास कर अवधियों के लिये ही कह रहा हूँ , उधर ही आता हूँ। डॉ. अमरनाथ जी ने जब हिंदी बचाओ मंच नामक संप्रदाय खोला तो उसमें सबसे ज्यादा अवधिये ही शामिल हुये। उनकी ईर्ष्या ज़ोर मार रही थी, हमारे पुरखे तो हाथी पालते थे, हमारे बाबा घोड़े से चलते थे आदि …आदि। लेकिन इन्हें यह खयाल कभी नहीं आया कि हमारी जान तो कुकुर को एक कौर डालने में भी निकलने लगती है, हमने क्या किया, इसकी कोई परवाह नहीं। हिंदी के साहित्यिक घराने में कुछ अवधी जाति के नागरिक हैं जिन्हें अपनी पैदाइश पर बड़ा फ़क्र है। यह विश्वविद्यालयाओं में भी हैं और प्राइमरी स्कूलों में भी। भोजपुरियों को देख इनको भी राजनीति सूझी। तो दो रास्ते नजर आए – या तो अवधी बिना प्रयास के संविधान की अनुसूची में शामिल हो जाए और हम लोग अवधी अकादमी के अध्यक्ष बने फिर अपने चाटुकारों को पुरस्कार बांटें, फंड दें, अवधी होटल खोलें ,भंडारा करें और पोथन्ना छापें। और दूसरा रास्ता यह कि भोजपुरी के खिलाफ खड़े होकर हिंदी बचाओ मंच से जुड़ें और भोजपुरी को अनुसूची में शामिल ही न होने दें। तब मामला बराबर। अवधिये बहुत कन्फ़्यूज्ड हैं। इधर अवधी प्रेम भी प्रदर्शित कर देते हैं और उधर हिंदी बचाओ मंच के उद्धारक देवताओं की पालकी भी ढो रहे हैं। मैं तो कहता हूँ तुम धन्य हो अवधियों ! तुम्हारे कन्फ़्यूजन को धिक्कार है !

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शैलेन्द्र कुमार शुक्ल

आज अवधी के स्वाभाविक और हिम्मती साथी अमरेन्द्रनाथ त्रिपाठी जी ने एक पोस्ट फेसबुक पर मुझे टैग की। पोस्ट देख कर मैंने फिर माथा पकड़ लिया। कोई राकेश पाण्डेय है, अपने को अवधिया मानते हैं । हिंदी को बचाने के लिए और भोजपुरी को अष्टम अनुसूची में शामिल न किया जाय , इसलिये हस्ताक्षर अभियान चला रहे हैं, ऊपर पत्र में मोदी जी से गुहार लगाई गई है, बाकायदा। राकेश जी जैसे अवधी भाषी आप को बहुत से मिल जायेंगे। ये अवधी की बात करते हैं, संस्कृति को मेनटेन करने के लिये विविध आयोजन किया करते हैं। दरअसल इन चीजों से इनका कोई सरोकार नहीं है, ये वर्ग संघर्ष में दूसरे वर्ग से आते हैं -“उयि अउर आहि हम और आन” । इनके पास खूब पैसा है,अच्छी नौकरी है, बच्चे कनवेंट स्कूलों में सालाना लाखों रुपयों की फीस पर पढ़ते हैं, बड़े-बड़े शहरों में अच्छे मुहल्लों में घर हैं इनके। बस थोड़ा इज्जत और शोहरत के लिये देश प्रेम, लोक-प्रेम, भाषा-प्रेम(विद्वता प्रदर्शन के लिये), साहित्य प्रेम, संस्कृति प्रेम का प्रदर्शन कर लेते हैं। ये ऐसे योद्धा हैं जो ठेके पर आंदोलन चलवाते हैं, छठे-छमहे कल्चरल प्रोग्राम करवा देते हैं, सत्ताधारी नेताओं से मिल कर सौ बार चरण बन्दना करते हैं, और सांप्रदायिक दंगों से लेकर मंदिर निर्माण हेतु चंदा देते हैं, और जाहिल इतने कि लाल हरे नगों वाली अंगूठियों से लेकर  लाल-काले कपड़ों में लपटे पंडों और मुल्लाओं की भभूत देह पर सुविधानुसार बांधे रहते हैं। इनकी मूर्खता जग जाहीर है। और एक बात तो छूट ही गई इनकी सबसे बड़ी पहचान यह कविता के बहुत भारी रसिक होते हैं। तो इनके लिये राकेश रंजन की दो पंक्तियाँ याद आ रहीं हैं-

‘तुमरी जय जय कार सुअरवा
तुमको है धिक्कार सुअरवा।’

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पाहीमाफी [१२] : जाति दंस, बड़ा कलंक

आशाराम जागरथ रचित ग्रामगाथा ‘पाहीमाफी’ के  “पहिला भाग” ,  दुसरका भाग  , तिसरका भाग , चौथा भाग , पंचवाँ भाग , ६-वाँ भाग , ७-वाँ भाग , ८-वाँ भाग , ९-वाँ भाग१०-वाँ भाग  , ११-वाँ भाग के सिलसिले मा हाजिर हय आज ई १२-वाँ भाग :

यकतनहा नीम अउर जागरथ

हिन्दी मा पिछले कयिउ सालन से दलित आत्मकथा कय दौरदौरा चलत अहय। ई चलन एतना जोरान अउर फरान कि दलित-लेखन के बहस मा आत्मकथा केंद्र मा आइ गय। खचिन्ना-अस खींच दीन गा कि ऊ दलित-साहित्यकार कउने अरथ मा जेहके लगे आत्मकथै न हुवय। यहिते यह चीज ई भै कि आत्मकथा के नाव पै यक किसिम कय ‘फॊर्म’ कय देखादेखिउ हुवय लागि। यहिमा कौनौ दुइ राय नाहीं न कि इन्हते विमर्स वाले लेखन मा बहुत आसानी भै। मुदा, रचनात्मक इलाका आहिस्ता-आहिस्ता किनरियावा जाय लाग। आशाराम जागरथ कै ई ‘पाहीमाफी’ यहि किनरियाये इलाके कय अनदेखी क लयिके सजगि अहय। जागरथ आत्मकथा के ‘फॊर्म’ कय देखादेखी करय के जगहा पै आपन नवा सिल्प ढूँढ़िन। यहिकय मतलब ई नाहीं कि आत्मकथात्मकता कय भाव छोड़ि दिहिन, बल्कि पकरे अहयँ, उल्टे औरव जरूरी काम किहिन, जौन नहीं कीन जात रहा। पाहीमाफी, भासै नाहीं, अपने सिल्प औ भीतर-बात — दुइनौ के ताईं अहमि अहय। यहि अंक क यहू निगाह से देखि सका जात हय। : संपादक
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  • जाति दंस, बड़ा कलंक

सूअरबाड़ा, उजड़ी कोठरी
चुप्पे घुसरी ग़ुरबत बुजरी
फुटही खपरी मुंह बाये परी
झिलरी खटिया कथरी-गुदरी
चूल्हा आगे टुटही खांची
खांची मा आमे कै पाती
डुडुवायं बिरावैं माँग खायँ
मंगता-जोगी औ’ सन्यासी
कूकुर-बिलार घर ना झाकैं
मुसरी घुसरैं ना डेहरी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

दिन-रात खेत मा खटत रहे
वै बड़न कै सेवा करत रहे
वइसै तौ देश अजाद रहा
पर गाँव कै सूद गुलाम रहे
पैलगी दूर से करत रहैं
परछाँह बचायिके चलत रहैं
बाभन-ठाकुर केव आय जाय
खटिया पर से उठि जात रहैं
जे नीक कै कपड़ा पहिर लियै
ऊ खटकै सबकी आँखी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

मन ही मन मा सोच विचार
बहुत सहैं वै अत्याचार
सेंत-मेंत मा काम करैं बस
हरवाही पै जियैं चमार
सुख कै तूरि ना पावैं कौर
गाँव से बाहर वनकै ठौर
खाय बिना चाहे मर जांय
केहू न झाँकै वनकी ओर
करै मजूरी गाँव मा केऊ
दिल्ली केऊ बम्बई मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

उखुड़ी हमार जे तुरअ थै
जानी थै नावं बाय मुँह मा
हम पँहटत हई कऊ दिन से
रंगे हाथे पकरब वनकां
पकरे, ‘हड्डहा’ चमार मिला
खेती-बारी नाहीं वकरे
ऊ बोला काका माफ करौ
झाँवर कै रोग बाय हमरे
कुछ बूढ़ – पुरनियां कहत हये
सोवा गन्ना के खेते मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

जेकरे खेती वोकरे ऐंड़
खाली बइठ रखावै मेंड़
उखुड़ी छोलै लढ़िया लादै
मजदूरी मा खाली गेंड़
दुई रुपिया औ खरबचाई
दिन भै खोदैं वै बिरवाही
लत्ता-लत्ता लरिके तरसैं
बारहो मास करैं हरवाही
यक दिन जो नागा होय जाय
गारी पावैं सेती मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

कतहूँ-कतहूँ फुंसी-फोड़ा
मूड़े मा ढीलौ-लीख भरा
करिया धागा गटई पहिरे
तन पे झिलरा चीकट कपड़ा
देहीं मा पाले दाद-खाज
किस्मत का कोसै मुस्कियाय
यक बिगहा मुँह फैलाय लियै
जब खबर-खबर खजुली खजुवाय
माई तू काहे जनम दिहू
ई जात-पात की माटी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

सूकन-संती-गोधी-लोकई
औ कुष्ठ रोग पीड़ित तोखई
वै मरा जानवर निकियावैं
गाँवै कै नीबर औ गोगई
ना सीधे मुँह केव बात करै
केव देखतै ही अपमान करै
मेहरारू-बिटियन कै इज्जत
हरदम ही दाँव पे लाग रहै
कामे-काजे काटैं सूअर
तब उड़ै भोज चमरौटी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

टुटहा-जस्ता दुइ-यक बरतन
ज्यों साँझ ढलै बाजै खन-खन
जब खाय का घर मा ना आटै
तब खाँय मरा डांगर जबरन
खरिहान कै गोहूँ खाय-खाय कै
बैल जो गोबर करत रहे
वोका बटोरि सुखवाय लियैं
फिर पीट-पाट कै पीस लियैं
दुःख-वीर दलिद्दर दलित रहे
सब खात रहे मजबूरी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

परै लाग पेटे मा दाना
समझौ सूदे भये उताना
तनिकौ उज्जर कपड़ा देखैं
बड़े-बड़कवै मारैं ताना
हाल-चाल कुलि ठीकै बाय
बीतै समय जवन कटि जाय
‘घातै घात ‘चमरऊ’ पूछैं
मालिक पड़वा नीके बाय’
सुनेन बेमार रहा हम आयन
दउरा हाली-हाली मा 
यकतनहा  कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

नीक-सूक बेसन कै चिल्ला
खाय न झबरा करिया पिल्ला
घुसा रहै बिस्तर के भीतर
हमरे बहुत लाग बा हिल्ला
नोन-पियाज से रोटी खाई
नाहीं तौ उपास रहि जाई
आगे नाथ न पीछे पगहा
बस पिल्ला के दादा-माई
दूनौ जूनी खाय क् मिलअ थै
बन्दीघर सरकारी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

हम तौ ठहरेन खेतिहर मजूर
दुसरे सदियन कै छुआछूत
ग़ुरबत मा रोजै गम खाई
तोहरे घर धन-दौलत अकूत
देहीं खुमार मन मा गुबार
अललाय खमोशी चढ़ि कपार
आँखी से टप-टप खून चुवै
ऐ ! कब्जेदारौँ, खबरदार
अपने राही तू मगन रहौ
पीछे मुड़ि देख्यौ ना हमकां
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

हीलै ना डोलै रहै गड़ा
जइसन खेते मा ऊढ़ खड़ा
सुध-बुध खोये कुछ उड़ा-उड़ा
ऊ सुवर चरावत रहा खड़ा
अन्नासैं कां गरियाय दिहिन
देखतै चन्दन टीकाधारी
तू हया ढिठान बहुत ‘सरऊ’
मन कहत ब लाठी दइ मारी
कउने वोरी से जाई हम
परछाहीं पूरे राही मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

रसरी जरि गै अइठन ना गै
ना अबह्यूं अकिल ठेकाने भै
भुन-भुनभुन-भुनभुन मन ही मन
बोलै – बतुवाय – सुनै अपूवैं
बउदहा तोर बड़का लरिका
लूला – लंगडा बाटै छोटका
पूरे जवार सन्नाम बाय
बिटिया कां छोड़ि दिहिस मरदा
ई जात-पात औ’ ऊंच-नीच
चाटा लइकै तू घर हीं मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

तू बरा रहौ बरियान रहौ
जाती पै खूब गुमान करौ
मनइन के बीचे हम रहिबै
तू ऊँच रहौ सैतान रहौ
खुब पढ़ौ पुरैहिती घोंट-घोंट
बेटवा हमार बी.ए. मा बा
तू उड़ा रहअ थौ का जानौ
बड़कउना दुबई मा गै बा
उजियारे कै आदी मनई
देखते नाहीं अन्हियारे मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

परै मुरदनी चमरौटी मा
कउनौ फरक न बभनौटी मा
केव न जाय फुकावै साथे
मानौ वै ना हये गाँव मा
आपन काम करैं सब सारा
ताकैं बस, कस लियैं किनारा  
बहुत हुवै तौ बोल दियैं कि 
सीधा-सादा रहा बेचारा
बैर-भाव न किहिस केहू से
जुटा रहै बस कामे मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

बड़कन मा केऊ मरि जाय
सूद-अछूत  फुकावै जायँ  
लामे खड़ा रहैं चाहे वै
लेकिन मूड़ गिनावै जायँ
यक्कै गाँव मा येतना जात
देस कै काव करी हम बात 
सब कै आपन रीति-रिवाज़
हर जाती मा यक ठू जात
जात-पात मा अइसन जीयैं
जइसै मूस रहैं बिल मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

गाँव के बाहर बसैं अछूत
कुछ गोरहर कुछ करिया भूत
जइसै तइसै करैं गुजारा
लादे मूड़े बोझ अकूत
कुआँ से पानी भरैं न पावैं
दुसरे गांव से ढोय क लावैं
काम करैं बन मनई-तनई
तब सबकै मनई कहलावैं
जब मागैँ मनई कै दर्जा
गिनती नाहीं मनई मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

बोले गोगई मन बा खट्टा
पानी कै बा बहुत समिस्या
ईंटा पाथै हम जानिअ थै
कुआँ खोदाइब कच्चा-पक्का
सबकै सब मनसाय गये जब
कुछ भलमनई साथ दिहिन तब
देखतै देखत बनिगै कूआँ
जरवइयन कै चेहरा धूआँ
सबसे खुस मेहरारू – लरिकै
धूम मची चमरौटी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा.

__आशाराम जागरथ

[जारी….]

पाहीमाफी [११] : भेदभाव गहिर-घाव

आशाराम जागरथ रचित ग्रामगाथा ‘पाहीमाफी’ के  “पहिला भाग” ,  दुसरका भाग  , तिसरका भाग , चौथा भाग , पंचवाँ भाग , ६-वाँ भाग७-वाँ भाग८-वाँ भाग , ९-वाँ भाग, १०-वाँ भाग  के सिलसिले मा हाजिर हय आज ई ११-वाँ भाग :


जौन चीज कवि जागरथ क दूसर अवधी के गाँव के लिखैयन से अलग करत हय, ऊ हय इन कय ‘दिस्टिकोन’। यानी देखय कय नजरिया। प्वाइंट आफ बिउ। यही से, उहै गांवै वाला नजारा, दिस्टिकोन बदलि जाये से अलग नजारा लागय लागत हय। जैसे कोल्हू के लगे कय नजारा देखौ। दलित दिस्टिकोन से अलग सोचय वाला कौनौ लेखक रहत तौ ऊ हुवाँ मह-मह महकत गुलौरी से निकरा गरम गुड़ चुभलावन-रसरंजन करत वाह-वाह करत निकरि आवत। मुला जागरथ अपने अलग नजरिया के कारन हुआँ ‘घूरे चमार’ कय दुख टिकाय देहे अहयँ, जेहका महसूसे के बाद गरम गुड़ कय महकि औ सुवाद दुइनौ असलील लागय लागत हय :  

सोचैं, ठाढ़े घूरे चमार
हमसे अच्छे कूकुर-बिलार
हरवाही करत लड़कपन से
जिनगी रेंगा होय गै हमार!

यक औरौ चीज जागरथ केरी आज की यहि प्रस्तुति मा जहिरानि अहय। ऊका कहत हयँ, ‘पैराडाक्स’ देखाय के सभ्यता कै चीर-फाड़ करब। यहिकय पाखंड उजागर कयि दियब। पैराडाक्स, यानी बिरोधाभास देखाइ के। जैसे जौने कोल्हू पय घूरे चमार का मिनहां कीन जात अहय कि हर्सि न छुयेव, वही जगह बैलवन क कौनौ मनाही नाहीं ना। मनई से जादा पेवर अहयँ बर्ध। इहय समझि आय जौन आज के दिनन मा गौ-रच्छा के नाव पै मनइन क मौति के घाट पहुँचावति अहय। दूसर पैराडाक्स देखौ कि दोस्त के घर गवा ‘अछूत’ दोस्त केसेस बेरावा जात अहय। वहिका बर्तन तक नाहीं नसीब करावा गा खाय के ताईं। भुइयाँ मा खंता खनिके, केरा कय पाता दुनफर्तियाइ के खाइस ऊ। मुला भिनसारे ऊ का देखिस? देखिस कि जौने थरिया का वहसे बेरावा गा, वहिकै बारी कानी कुकुरिया चाटति बाय। मनई कुकुरौ-बिलार से गवा-गुजरा बनाय दीनि गा, इहै जात-परपंच के कारन। ई देखेक बादि, साथी, दुवा-बंदगी कय औपचारिकता भुलाय दियय तौ ठीकय हय। कम से कम ऊ दुवा-बंदगी के पाखंड से अपनेक्‌ बचायिस : 

फिर नजर परी दालानी मा
ऊ आँख फारि कै देखअ थै
कानी कुतिया मल्लही येक
थरिया कै बारी चाटअ थै
ना दुआ-बंदगी केहू से
चुपचाप चला गै चुप्पे मा….

यहि अंक से अब सीधे रूबरू हुवा जाय। : संपादक
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  • भेदभाव गहिर-घाव 

बोले ठाकुर पीकै दारू
अब चलब-फिरब होय गै भारू
छापी धोती, चप्पल पहिरैं
शूदे-चमार कै मेहरारू
सावां-कोदौ अब अंटकअ थै
मागैं मजूर भरि कै थारी
गोहूँ कै रोटी, दाल-भात
आलू-गोभी कै तरकारी
यक उहौ ज़माना रहा खूब
दिन भर कुलि खटैं बेगारी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

जो कहत हयी भोगे बाटी
हम ज़हर कै घूँट पिये बाटी
भुखमरी – गरीबी – छुआछूत
दूनौ आँखी देखे बाटी
यक जनी जाति से ऊँच रहिन
कूँआ से पानी भरत रहिन
हम झम्म से बल्टी डारि दिहेन
वै आपन पानी फैंकि दिहिन
बोलिन, केतनौ पढ़ि-लिखि लेबा
पर अकिल ना आई जिनगी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

अब आगे मजे कै हाल सुनौ
वनके छपरा मा आगि लाग
हम ह्‌वईं बगलियें खड़ा रहेन
पानी डारैं सब भाग-भाग
देखअ थौ काव तू खड़ा-खड़ा
अगवैं तौ गगरा धरा बाय
झट बोलेन काव करी काकी
हमरे जाती मा छूत बाय
बोलिन वै छूतछात नाहीं
संकट, आफ़त औ’ बीपत मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

मंदिर हरि-कीर्तन होत रहा
औ ढोल मजीरा बजत रहा
हुवयँ बीच थपोड़ी पीट-पीट
गावत मन डूबा मस्त रहा
यक पढ़ा-लिखा नौकरिहा बाभन
दूर से हम्मै देखि लिहिस
गुस्साय कै बोला भाग जाव
औ कान पकरि कै खींच लिहिस
‘अन्हराय गया है सब कै सब
धोबिया बइठा बा बीचे मा’
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

कुछ अच्छे बाभन साथ रहे
वनके घर आवत-जात रहेन
खटिया के गोड़वारी बइठा
हम गीत-कहानी सुनत रहेन
तोनी पै सरकावत धागा
यक ‘मधुरी बानी’ आइ गये
बइठा देखिन खटिया ऊपर
उलटे ही पाँव वै लउट गये
साथी बोला घर जिन आवा
सबकै सब डांटत हैं हमकां
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

बजरंग बली कां बचपन मा
परसाद चढ़ायन भेली कै
लइकै घूमी आगे सबके
केऊ ना लियै हथेली पै
पंडित जी बोले रहै दिऔ
तोहरे हाथे मा छूत बाय
दइ देत्या ‘कहरा’ बाँट दियत
ऊ तुहरे जाति से ऊँच बाय
भेली तौ वही, मिठास वही
परसाद बँटा बहु-जाती मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

इस्कूले साथे पढ़त रहे
जाती मा तनिका ऊँच रहे
वनके घर चला गयन यक दिन
देखतै वै खूब निहाल भये
तख्ता पै गद्दा बिछा रहा
मुड़वारी तकिया धरा रहा
दुइ टुटही कुरुसी परी रही
बइठका नीक खुब बना रहा
वल्ले बुढ़ऊ खांसैं खों-खों
रहे मनबढ़ येक जमाने मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

पितरी के लोटा मा पानी
साथी कै बहिनी लइ आई
हम गट-गट पियत रहेन तइसै
डांटै लागीं बड़की माई
लोटा मा अइसन छूत लगा
घर-भीतर हाहाकार मचा
मितऊ कै महतारी बोलिन
हमरे कामे कै ना लोटा
लइ जा बेटवा! तू घर लइ जा
धइ ल्या तू अपने झोरा मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

कसि कै दाँते काटी रोटी
दुई छूत – अछूत रहे साथी
हे नीम! छाँह मा तोहरे हम
खीसा सच बइठ सुने बाटी
‘छुतऊ’ कै बैल तुराय गवा
साथे – साथे हेरै निकरे
हेरत – हेरत संझा होय गय
घर लौटे बैल दुवौ पकरे
साथी बोला कि रुकि जात्या
कहवाँ जाब्या अब राती मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

राती जब खाना खाय क् भवा
यक बड़ा अड़ंगा बाझि गवा
टुटहा ज़स्ता वाला बरतन
पिछवारे कहूँ लुकाय गवा
घर-मलकिन बोलीं काव करी
बनये हम हई दाल – रोटी
उप्पर से दलियौ पातर बा
केरा कै पाता ना रोकी
हम कहत रहेन कि जाय दिया
तोहरे सब रोकि लिह्या वोकां
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

चुप रहौ कतौ ना करौ फ़िकर
अब्बै जुगाड़ कुछ करिबै हम
बोले बुढ़ऊ बाबा अहीर
बुद्धी मा अबहूँ बा दमख़म
फंड़ियाय कै धोती खटिया से
उतरे लइकै लमका खुरपा
तनिका वहरी से पकरि लियौ
घुसकाइब हम छोटका तख्ता
खोदिन यक बित्ता गड्ढा वै
मड़हा के कोने भूईं मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

केरा कै पाता दोहरियाय
गड्ढा मा हलके से दबाय
तइयार अजूबा भै बरतन
बोले अब मजे से लियौ खाय
ऊ रहा भुखान सवेरे कै
कुछ भुनभुनाय आवाज़ किहिस
इज्ज़त – बेलज्ज़त भूलि गवा
मूड़ी नवाय कै खाय लिहिस
साथी बोला बाहर निकरा
ल्या पानी पिया अँजूरी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

भिनसारे उठि कै चलै लाग
भैंसिया बहुत अफनात रही
पितरी के बड़े ‘पराते’ मा
बसियान खाब ऊ खात रही
फिर नजर परी दालानी मा
ऊ आँख फारि कै देखअ थै
कानी कुतिया मल्लही येक
थरिया कै बारी चाटअ थै
ना दुआ-बंदगी केहू से
चुपचाप चला गै चुप्पे मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

कातिक-अगहन हँसै सिवान
जोतै हर केव काटै धान
चिखुरी चिखुरैं, छोलैं घास
केउ खेते मा फेकै खाद
चटक चाँदनी, आधी रात
गूला भीतर दहकै आग
दूर-दूर तक गम-गम गमकै
खौलै रस जब, फूलै पाग
आलू-सेम कै सुन्दर माला
पाकै टंगा कड़ाहे मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

कोल्हू कै बैल कोल्हारे मा
उखुड़ी पेरैं टुक-टुक ताकैं
सुरती दाबे घूरे चमार
पाछे-पाछे कोल्हू हाकैं
वनकै लरिका ओढ़े चादर
पलथी मारे उखुड़ी दाबै
बइठे- बइठे औंघांय जाय
जे देखि लियै कसि कै डाँटै
लरिकन कै टोली मड़िरियाय
पहिला परसाद मिली सबकां
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

झुलनी झमकावत आय परीं
गोरहरकौ दुलहिन बखरी कै
बोलिन घूंघुट आधा काढ़े
ताजा रस चाही उखुड़ी कै
लरिका कां तनी उठाय दियौ
हम लियब चुहाय खुदै काका!
रस रोपत हई दूर होय जा
दूरै से बैलन कां हांका
भूले से छुया न हर्स – बैल
जब तक रस भरै न बल्टी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

सोचैं, ठाढ़े घूरे चमार
हमसे अच्छे कूकुर-बिलार
हरवाही करत लड़कपन से
जिनगी रेंगा होय गै हमार
उखुड़ी पेरे से रस निकरै
खोहिया भी कामे आवअ थै
हम जाँगर पेरी रोज़-रोज़
तबहूँ सब छूत मनवाअ थै
ई बैला हमसे नीक बाय
ना सोच-विचार रखै मन मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा.

__आशाराम जागरथ

[जारी….]

अवधिउ वाले अइसनै अहयँ!

 संजीव तिवारी छत्तीसगढ़ी कय समर्पित वेब-संपादक हयँ। सबसे बड़ी बाति ई हय कि अपनी भासा और संसकिरिति के ताईं बहुत सक्रिय रहत हयँ। वय ‘अवधी कय अरघान’ क लयिके यक बात लिखे अहयँ जेहका हम हियाँ रखत अहन। उनहिन केरी बात, बिना काट छाँटि के। संजीव जी अवधी के मुकाबले, छत्तीसगढ़ी मा यहि मानसिकता क देखत हयँ कि लोगय हिन्दी मा तौ लिखत हयँ मुला अपनी मादरी जुबान मा नाहीं। उन कय दर्द बहुत सालय वाला हय। सच कही तौ अवधिउ मा ई बाति लागू हुअत हय। छत्तीसगढ़ी के मुकाबले लागि सकत हय कि अवधी मा बेहतर स्थिति अहय, मुला अवधिउ वाले अइसनै अहयँ। अपनी मातरी भासा क लयिके कुंठा औ हीनभावना कय सिकार। नाहीं तौ अवधी कय मौजूदा हालात अऊर हुअत। : संपादक
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”छत्‍तीसगढ़ी की अहमियत__संजीव तिवारी

आज ‘अवधी कै अरघान’ पर ठहरते हुए फिर, बहुत से प्रश्‍न मुह बाये खड़े हुए, बहुत से अनुत्‍तरित प्रश्‍न, चारो तरफ घूमकर वापस मुझ पर, गंदी-भद्दी गालियों के मानिंद पिल पड़े।

खड़ी बोली हिन्‍दी की जगत स्‍थापना हो जाने के बाद भी अवधी भाषा में साहित्‍य रचने वाले साहित्‍यकारों में तरक्कीपसंद कवि त्रिलोचन शास्त्री और रमई काका जैसे अनेक लोग रहे जो मातृ भाषा या क्षेत्रीय भाषा में भी लिखते रहे। ऐसे ही हिन्‍दी के कुछ साहित्‍यकार हैं जो प्रादेशिक भाषा में भी थोड़ा-बहुत रच कर धरती का कर्ज उतारते हैं। ऐसा भारत के सभी प्रदेशों में होता है, नहीं होता तो सिर्फ छत्‍तीसगढ़ में। यहॉं हिन्‍दी का बड़ा साहित्‍यकार छत्‍तीसगढ़ी में रचना तो दूर, उससे अपने आप को अपरिचित रखना ज्‍यादा पसंद करता है।

छत्‍तीसगढ़ हरा-भरा चारागाह होने के कारण यहां चारा चरने देश के अन्‍य हिस्‍से से लोग यहां आते रहे हैं और बड़े पइसेवाले के साथ ही बड़ा साहित्‍यकार भी बनते रहे हैं। छत्‍तीसगढ़ के ये प्रतिष्ठित हिन्‍दी के साहित्‍यकार, जिन्‍हें हिन्‍दी में उंचाईयां मिली हो वे छत्‍तीसगढ़ी के प्रति स्‍नेह ही रख लें तो छत्‍तीसगढ़ी धन्‍य हो जायेगी किन्‍तु कुछेक को छोड़ दें तो, ऐसा नहीं हो रहा है। कैलाश बनवासी एवं डॉ.परदेशीराम वर्मा की रचनायें हिन्‍दी में होते हुए भी जैसे छत्‍तीसगढ़ी में बोलती हैं, उसी तरह ये साहित्‍यकारों की रचनायें बोलने का उद्यम करते भी लगे तो कोई बात थी।

किन्‍तु नहीं, उन्‍हें छत्‍तीसगढ़ी नहीं आती, वे सीखना भी नहीं चाहते क्‍योंकि तुमने उनका तलुआ चांटकर उन्‍हें सदा उंचे ओहदे पर बैठाया है, राज्‍य की सुविधा और सम्‍मान दिलवाया है। जो सम्‍मान-पुरस्‍कार, सुविधा और अधिकार आपको मिल सकता था उसे भी आपने उनको मिलने दिया है, कभी विरोध नहीं किया है। ऐसी बात नहीं है कि वे छत्‍तीसगढ़ी समझते नहीं या बोलते नहीं। यह बात भी नहीं है कि वे छत्‍तीसगढ़ी की इज्‍जत नहीं करते। वे छत्‍तीसगढ़ी की भरपूर इज्‍जत करते हैं, उसकी अहमियत तो बहुत अच्‍छी तरह से समझते हैं क्‍योंकि उनके घरो में कामवाली बाई, नौकर या ड्राईवर भी हैं। छत्‍तीसगढ़ी की अहमियत उनके घरों में और दिलो में, यही है।”

पाहीमाफी [१०] : सधुवाइन कै परबचन

आशाराम जागरथ रचित ग्रामगाथा ‘पाहीमाफी’ के  “पहिला भाग” ,  दुसरका भाग  , तिसरका भाग , चौथा भाग , पंचवाँ भाग , ६-वाँ भाग७-वाँ भाग८-वाँ भाग , ९-वाँ भाग के सिलसिले मा हाजिर हय आज ई १०-वाँ भाग :

jagrath

धरम संस्था कय चीर-फाड़ पाहीमाफी मा हुअत जाति अहय। रचनाकार का बहुत नगीचे से धरम कय भरम समझय कय मौका मिला। वहिका परतख परमान मिला, जैसे कि भाग नौ मा, और वहिका अइसेव लोग मिले जे धरम-भरम का बेपर्द कय दिययँ। जैसे यहि अंक कय सधुवाइन। यइ अहीं तौ सधुवाइन लेकिन बड़ा नजदीकी तजुरबा बतावति अहयँ। समाज मा औरतन के ताईं सब धरमन कय बिउहार यक्कै नाईं अहय। औरत कय सोसन अउर मर्दवाद का मजबूत करब। वैसे तौ ई कमै भा अहय, मुला जहाँ भा अहय हुवाँ अच्छे से देखा जाय सकत हय। काव? इहय कि जब औरतय धरम के घन-चक्कर कय बखिया उधेड़त हयँ तौ ऊ बहुत फुर-वादी रहत हय। हियाँ कय सधुवाइन नास्तिक नाहीं अहयँ, मुला मनई मा औ’ भरमित भगवान-गिरी कय बिरोधी अहयँ : 

नकली मेर-मेर भगवान
वन्हैं मानैं सब नादान
बहुत दूर तक बहुत देर तक
उप्पर देखौ जाबौ जान….

वनकै भगवान क लयिके आपन दरसन अहय। दुनिया के बिराट मा वइ भगवान देखत हयँ। दुकानदारी मा तौ हरगिज नाहीं। आपन बुद्धी सबसे सजग साथी होइ सकत हय। बुद्धी न लगायी जाये तौ कहूँ न कहूँ फँसय क परे। अप्प दीपो भव — कय स्वर हियाँ देखा जाय सकत हय : 

सोचौ-समझौ खुदै विचारौ
दीया बारौ बुद्धी मा….

अंतिम बात ई कि अब पाहीमाफी पखवारी क्रम के बजाय, महिनवारी क्रम से पेस कीन जाये। फिलहाल आज ई दसवाँ भाग पढ़ा जाय औ अपने राय से अवगत करावा जाय। : संपादक 
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  • सधुवाइन कै परबचन

टोलिया मा आइन साधुवाइन
आपन बीती कुलि बतलाइन
बइठाय मरद-मेहरारू कां
कल्ले-कल्ले खुब समझाइन
टेढ़ी कुबरी हाथे पकरे
मरदाना पहिरावा पहिरे
लटकाये झोरा कान्हें पै
मचिया ऊपर बइठिन बहिरे 
माथे चन्दन, मूड़े साफा
चटपटिया पहिरे गोड़े मा 
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

यकदम्मै उमर रही बारी
गवने मा आयन ससुरारी
घूंघुट निकारि करियाय उठेन
जइसै बछिया बान्हीं घारी
यक सांड़ महा कै खुदिहारै
सीन्हीं से वार करै हमपै
हम तूरि-तारि खूंटा-पगहा
राती मा भागि लिहेन जुरतै
भागत-बिड़रत कउनौ खानी
घर पहुँचेन होत भोरहरी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

भौचक देखयँ सब नात-बांत
दादा कै पारा आसमान
तू नाक कटाय दिहू बिटिया!
महतारिउ कै निकरै परान
खपरी कै पेनी, गलफुलनी
हेढ़ना यस पेट लिहे बाट्यू
नोखे मा यक ठू तुहीं हयू
जो  ससुरे-घर नाहीं जाब्यू!
जा! उल्टे गोड़े लउट जाव
नइहर की वोरी झांक्यू ना
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

पकरे जंजीर दरवज्जा कै
चौखट ठाढ़े रोवैं माई
दादा से बोलिन रहै दियौ
जो बदा होई भोगा जाई
सोचत-सोचत पगलाय गयन
हम गयन बहाने से बहिरे
चल दिहेन अजोध्या कां सीधै
बांसे कै कइन हाथ पकरे
मन कहै बूड़ जाई समाय
सरजू माई के गोदी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

लागै दुनिया गै उलट-पलट
बत्ती दिमाग कै जलै-बुझै
काने बाजै तक-ताक-धिना
यक बड़ा बवंडर नाच करै
यतने मा देखेन यक कुतिया
निहचिन्ते टहरत जात रही
कुकुरै आपस मा लड़यँ- भिड़यँ
ऊ दूर बइठ कुंकुवात रही
मानौ हम रस्ता पाय गयन
जीयै कां ठान लिहेन मन मा 
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

हम बदल-बदल मंदिर बदलेन
औ’ बदल दिहेन हाथे क् लकीर
सुख मिला बहुत खायन-पियन
हट्ठी – कट्टी होय गै सरीर
भगवान कै सेवा खूब किहेन
आगे कै गाथा ना गाइब
अन्दरखाने कै हाल-चाल
तोहरी सबकां ना बतलाइब
ई धरम-जाल सब भरम हुवै
कुच्छौ नाहीं बा भक्ती मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

बिन आग रहे ना उठय धुवाँ
हम पानी पीयन कुआँ-कुआँ
खुब अंधा-धुंध दरबार सजा
सब गधै पँजीरी खायँ हुवां
कल्ले-कल्ले कुलि जानि गयन
हमहूँ तब खेल करै लागेन
जे बहुत बनत रहे वनकां
ऊँगरी पै टहरावै लागेन
हम जवन-जवन देखे बाटी
नाचत बाटै कुलि आंखी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

परिसरमी केऊ बिना सरम
पेटे ताईं कुलि मेर करम
मूड़े कै बार सुफेद भवा
गिरहस्ती सबसे बड़ा धरम
जनता बाटै भोली-भाली
बछिया छुवाय पंडय लूटैं
मंदिर ना चढ़य चढ़ावा तौ
बड़के महंत सबकां डाटैं  
अपुवां ना पूजा-पाठ करैं
बस नाधे रहैं पुजारी कां
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

ओखरी मा चाउर कूटा जाय
सूद – गरीबा लूटा जाय
भूसी – पइया हिगरि जाअ थै
मूरख बाभन पूजा जाय
जइसै करखाना कै मालिक
वइसै लागैं मंदिर-महंत
धइ लिइयं हलोरि चढ़ावा कुलि
बरहोमासा वनकै बसंत
कुछ चेला-चापर खटैं बहुत
दुइ जूनी खाय के बदले मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

भगवान अगर मनई होते
मनई तब मनई ना होते
दुनिया-जहान कुछ ना होतै
जौ रूप-गंध वाले होते
निर्जीव नियामक निर्विकार
ना भाव-भावना कै आदी
वनके पाछे जे भागअ थै
ऊ करै समय कै बरबादी 
भगवान तौ ई ब्रह्माण्ड हुवै
सूरज – चंदा – तारै जेहिमां
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

नकली मेर-मेर भगवान
वन्हैं मानैं सब नादान
बहुत दूर तक बहुत देर तक
उप्पर देखौ जाबौ जान
धरम-करम पाखण्ड न होतै
तब्बौ ई ब्रह्माण्ड तो होतै
नकली मर वोराय सब जाते
तब मरहम कै दरसन होतै
पाप-पुन्न सब यक्कै भाव
बाटै वनके लेखे मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

सृष्टि-चक्र के सुन्दर जोड़ी !
भागौ ना भगवान की वोरी
मनमाफिक मौसम मा अपुवैं
पइदा हूवैं लिल्ली – घोड़ी
दुसरे के ना रह्यौ भरोसे
मिल-जुल कै निपटाओ काज
आपन जांगर प्यार-मोहब्बत
आपन सबसे बड़ा समाज
सोचौ-समझौ खुदै विचारौ
दीया बारौ बुद्धी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा.

__आशाराम जागरथ

[जारी….]

पाहीमाफी [९] : उलौहल-कनफुसौवल

आशाराम जागरथ रचित ग्रामगाथा ‘पाहीमाफी’ के  “पहिला भाग” ,  “दुसरका भाग”  , तिसरका भाग , चौथा भाग , पंचवाँ भाग , ६-वाँ भाग७-वाँ भाग८-वाँ भाग के सिलसिले मा हाजिर हय आज ई ९-वाँ भाग :   17439871_399423837084206_1780308018_n

अछूते अहसासन क समाउब पाहीमाफी-कार कय खूबी हय। धरम-परपंच, बिरादराना अहंकार, सासन-सत्ता कय नाकामी जईस बातन कय चर्चा तौ आये दिन होतिन रहत हय मुला संवेदना के धरातल पै नये अहसासन से  यहिकय मर्म रखय कय काम खासी चुनौती से भरा अहय। ई चुनौती जागरथ स्वीकार करत हयँ। हियाँ इन बिसयन पै जौने प्रसंगन कय चर्चा कीन गय अहय; वय केहू गाँव के रहवैया कय सच होइ सकत हयँ। यहि प्रस्तुति के स्टैंजन क पढ़त के कयिउ चेहरै आप केरी आंखी के तरे से गुजरि जैहैँ। कयिउ चपरहन कय नाव याद आवय लागे। यहि बिन्यास मा ई सब आउब अवध सहित समूच्चै भारत कय संवेदना क झकझोरब आय। ढेर का कहा जाय, आप सीधे कविता से रूबरू हुआ जाय। : संपादक

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  • उलौहल-कनफुसौवल

तू वनके साथे खड़ी रह्यू
हँसि-हँसि काहे बतियात रह्यू
बोलिस, बड़कऊ तू चला जाव
नाहीं पइबा मुँह भरि कै तू
घूमौ तू  बाग़-बगीचे  मा
मुँह देख लिहौ तनि सीसे मा
जो करत हया ऊ करत रहौ
बोल्यो  जिन हमरे बीचे मा
सब जानअ थै तू काव हया
हल्ला बा देश-जवारी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

‘भागौ तू बहिनी नीक हयू
हमरे बारे मा बात कह्यू !’
वोरहन लइकै ‘उतरहा’ गयिन
काहे तू अइसन कहत रह्यू ?
‘नाहीं कुछ बोलेन मान जाव
तुहुँसे ना कउनौ बैर-भाव’
तब कहिन कि गंगा जल लइकै
बड़के बेटवा कै कसम खाव
बोलिस ‘पहिले वन्हैं लावा जे
आग लगाइस बीचे मा’
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

हम कहत हई कि झूठ हुवै
हमारौ भी कहा मान जात्यू
सतुवा-पिसान लइकै हमरे
पीछे तू बहुत परी बाट्यू
यक्कै बेटवा हमरे बाटै
वोकर किरिया हम ना खाबै
वनकां हम ढंग से जानिअ थै
जे कान तोहार भरत बाटै
अल्गट्टे मिल्यू तो बतलायिब
जिन आयू वनके बाती मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

अब काव कही मन हुलरत बा
बतिया पेटवा मा पचत न बा
बइठब ना बहिनी जाय दियौ
बटुली मा अदहन खौलत बा
काने मा कइकै खुसुर-पुसुर
वै हुवां से जल्दी भाग लिहिन
ठोकैं माई माथा आपन
सुनतै ही खड़े झुराय गइन
यक बिटिया रही कुँवारी लेकिन
लरिका वोकरे पेटे मा
यक तनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

भूले नहीं भुलाये जात
काली थान्हें वाली बात
जहाँ पे राही सीस झुकावैं
लोगै जल कै धार चढ़ावैं
चढ़ै कड़ाही पूड़ी-लपसी
लोगै जाय मनौती मानैं
लाल लँगोटी चन्दन धारी
गाँवै कै यक सुन्दर नारी
दूनौ जन माई के कोठरी
राती के अन्हियारी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

हल्ला होय गय कानो-कान
लोगै बोलैं दबी जुबान
पकरि गयीं वै रंगे हाथन
काव करैं जब रहीं जवान
महादेव कां धार चढ़ावैं
धरम-करम कै पाठ पढ़ावैं
भीतर पाकै खूब गुलगुला
बाहर छूआछूत मनावैं
के मनई बान्ही कुदरत कां
जात – पात के रसरी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

बहिनी ! अब तुहुंसे काव कही
यक बात सुनेन अपने काने
हरवाहे साथे भागि रहीं
बइठाई बाटीं वै थाने
घर तरी-तापड़ी, नगद धरा
लइ भागा, हाथ सफा कइगै
उप्पर से नमक हराम चपरहा
पाँव बहुत भारी कइगै
अब होई काव दयू जानै
भै काम बुरा नादानी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

ऊ सुवर चरावै आय रही
पेड़े के तरे छहाँत रही
लहचोरा, पिपरे कै गोदा
चटकारा दइकै खात रही
यक बड़ा-बड़कवा आय गये
सन्हें से सनकारै लागै
जब बात सुनिस नाहीं वनकै
छपकी लइकै मारै लागे
बोले तू हियाँ से भाग जाव
फिर गोड़ धरिव न खेते मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

बतिया मन-भीतर धरे रही
बस खाली मौका तड़त रही
रोवाँ केवांच कै पुड़िया मा
धोती-कोने गठियाये रही
ऊ रहा, चपरहा जात रहा
मुँह-दाबे पान चबात रहा
कपड़ा निकारि जुट्टा उप्पर
ताले मा खूब नहात रहा
चल दिहिस पहिरि उज्जर कपड़ा
खजुवाय लाग कुछ देहीं मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

यक जने बहुत उधिरान रहे
परिसहिजै खेत चराय लियैं
लुलिउ-लंगड़ी कां ना छोडै
वै छेड़ दियैं, गरियाय दियैं
बउदही, कलूटी, मति-मारी
गन्धाय उमर यकदम बारी
चितपावन पंडित जी अधेड़
भुखमरी म पाँव किहिन भारी
तब्बौ सब वनकै गोड़ छुवैं
वै कथा सुनावैं घर-घर मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा.

__आशाराम जागरथ

[जारी….]