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अवधिउ वाले अइसनै अहयँ!

 संजीव तिवारी छत्तीसगढ़ी कय समर्पित वेब-संपादक हयँ। सबसे बड़ी बाति ई हय कि अपनी भासा और संसकिरिति के ताईं बहुत सक्रिय रहत हयँ। वय ‘अवधी कय अरघान’ क लयिके यक बात लिखे अहयँ जेहका हम हियाँ रखत अहन। उनहिन केरी बात, बिना काट छाँटि के। संजीव जी अवधी के मुकाबले, छत्तीसगढ़ी मा यहि मानसिकता क देखत हयँ कि लोगय हिन्दी मा तौ लिखत हयँ मुला अपनी मादरी जुबान मा नाहीं। उन कय दर्द बहुत सालय वाला हय। सच कही तौ अवधिउ मा ई बाति लागू हुअत हय। छत्तीसगढ़ी के मुकाबले लागि सकत हय कि अवधी मा बेहतर स्थिति अहय, मुला अवधिउ वाले अइसनै अहयँ। अपनी मातरी भासा क लयिके कुंठा औ हीनभावना कय सिकार। नाहीं तौ अवधी कय मौजूदा हालात अऊर हुअत। : संपादक
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”छत्‍तीसगढ़ी की अहमियत__संजीव तिवारी

आज ‘अवधी कै अरघान’ पर ठहरते हुए फिर, बहुत से प्रश्‍न मुह बाये खड़े हुए, बहुत से अनुत्‍तरित प्रश्‍न, चारो तरफ घूमकर वापस मुझ पर, गंदी-भद्दी गालियों के मानिंद पिल पड़े।

खड़ी बोली हिन्‍दी की जगत स्‍थापना हो जाने के बाद भी अवधी भाषा में साहित्‍य रचने वाले साहित्‍यकारों में तरक्कीपसंद कवि त्रिलोचन शास्त्री और रमई काका जैसे अनेक लोग रहे जो मातृ भाषा या क्षेत्रीय भाषा में भी लिखते रहे। ऐसे ही हिन्‍दी के कुछ साहित्‍यकार हैं जो प्रादेशिक भाषा में भी थोड़ा-बहुत रच कर धरती का कर्ज उतारते हैं। ऐसा भारत के सभी प्रदेशों में होता है, नहीं होता तो सिर्फ छत्‍तीसगढ़ में। यहॉं हिन्‍दी का बड़ा साहित्‍यकार छत्‍तीसगढ़ी में रचना तो दूर, उससे अपने आप को अपरिचित रखना ज्‍यादा पसंद करता है।

छत्‍तीसगढ़ हरा-भरा चारागाह होने के कारण यहां चारा चरने देश के अन्‍य हिस्‍से से लोग यहां आते रहे हैं और बड़े पइसेवाले के साथ ही बड़ा साहित्‍यकार भी बनते रहे हैं। छत्‍तीसगढ़ के ये प्रतिष्ठित हिन्‍दी के साहित्‍यकार, जिन्‍हें हिन्‍दी में उंचाईयां मिली हो वे छत्‍तीसगढ़ी के प्रति स्‍नेह ही रख लें तो छत्‍तीसगढ़ी धन्‍य हो जायेगी किन्‍तु कुछेक को छोड़ दें तो, ऐसा नहीं हो रहा है। कैलाश बनवासी एवं डॉ.परदेशीराम वर्मा की रचनायें हिन्‍दी में होते हुए भी जैसे छत्‍तीसगढ़ी में बोलती हैं, उसी तरह ये साहित्‍यकारों की रचनायें बोलने का उद्यम करते भी लगे तो कोई बात थी।

किन्‍तु नहीं, उन्‍हें छत्‍तीसगढ़ी नहीं आती, वे सीखना भी नहीं चाहते क्‍योंकि तुमने उनका तलुआ चांटकर उन्‍हें सदा उंचे ओहदे पर बैठाया है, राज्‍य की सुविधा और सम्‍मान दिलवाया है। जो सम्‍मान-पुरस्‍कार, सुविधा और अधिकार आपको मिल सकता था उसे भी आपने उनको मिलने दिया है, कभी विरोध नहीं किया है। ऐसी बात नहीं है कि वे छत्‍तीसगढ़ी समझते नहीं या बोलते नहीं। यह बात भी नहीं है कि वे छत्‍तीसगढ़ी की इज्‍जत नहीं करते। वे छत्‍तीसगढ़ी की भरपूर इज्‍जत करते हैं, उसकी अहमियत तो बहुत अच्‍छी तरह से समझते हैं क्‍योंकि उनके घरो में कामवाली बाई, नौकर या ड्राईवर भी हैं। छत्‍तीसगढ़ी की अहमियत उनके घरों में और दिलो में, यही है।”

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`पाहीमाफी’ [१] : परिचय, गूँग गवाह औ’ पहिया गाँव-कुदरती ठाँव.

यहि रचना पै अबहीं कुछ तनकीदी तौर पै न कहब। हड़बड़ी होये। रचना पुराय क अहय, कुछय हिस्सन से रूबरू भयेन। यहिकै लगभग पचास इस्टैंजन का देखे के बाद ई जरूर कहब कि अस रचना अबहीं तक नाहीं भै बा। लोकभासा अवधी मा यहिके लिखा जाय कय खास तुक हय जौन आसाराम जागरथ जी नीचे बताये अहयँ। यहि रचना का देखिके हम खुसी से खिलि उठा हन। जोखिम उठाय के एतना जरूर कहा चाहब कि ई रचना अपने बिसय औ सिल्प के लिहाज से आधुनिक अवधी साहित्य कै यक उपलब्धि हुवय कय पूरी चुनौती पेस करति अहय। कयिउ हिस्सन मा आप यहिका पढ़िहैं। कल्ले-कल्ले हाजिर करब। यहिकै इजाजत दियै खातिर आसाराम जागरथ जी कय बहुत आभारी अही। : संपादक

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नीम कय पेड़: पाहीमाफी कय गूँग गवाह.

[पितामह पेड़ नीम का : हमारे बचपन के बुजुर्ग भी अपने बचपन में इस पेड़ को इसी ‘आकार- प्रकार’ का देखा हुआ बताते थे. इसकी उम्र के बारे में कुछ भी नहीं बता पाते थे. यही एक पेड़ है जो 1981 में घाघरा के कटान से जमींदोज हो चुके ‘पाहीमाफी’ गाँव का एकमात्र गवाह बचा है.  इसके पोर-पोर में ग्रामीण जीवन के सदियों के सांस्कृतिक-सामाजिक-आर्थिक दशा के राज छिपे हैं. हर साल बरसात के मौसम में थोड़ा-थोड़ा करके दक्षिणी छोर के खेत खलिहानों को पहले ही काट चुकी नदी 1981 में गाँव पर हमला बोलती है. मैं हाई स्कूल पास कर चुका था और 18 किलोमीटर दूर के एक स्कूल में दाखिला लेना था. कटान को देखते हुये पिता जी के विरोध के वावजूद माँ ने जाने की इजाजत दे दी . मैं सुबह पैदल निकल गया और दाखिला लेकर सीधे नाना के घर सहायता के लिए चला गया. कुल  लगभग 40 किलोमीटर पैदल चल कर ननिहाल पहुंचते-पहुंचाते रात हो गयी. दूसरे दिन सुबह कुछ मददगार आदमियों के साथ जब मैं अपने गाँव पहुंचा तो देखता हूँ कि मेरा घर नहीं था. कटान में कट चुका था. बस केवल उजड़ी हुई ‘चन्नी’ बची थी. और मेरी आँखों के सामने वह भी देखते-देखते जमीदोज हो गयीे. माँ-बाप-भाई-बहन मिलकर जो कुछ सर-सामान बचा पाये थे , इसी पेड़ के नीचे धरा था.

दो-एक साल इसी पेड़ के बगल एक पाण्डेय जी की जमीन में झोपड़ी धर कर गुजारा किया. फिर परिस्थितियों ने गाँव छुड़वा दिया. जन्म देने वाला गाँव, पाहीमाफी में बचपन के 18 साल गुजरे. परन्तु उमड़ते-घुमड़ते नज़ारे हमेशा नाचते रहते हैं. कुछ लिखने की कोशिश में आत्मकथात्मक शैली में यह अवधी कविता ही बन पा रही है जिसका कुछ अंश आपके सम्मुख हैं.  इसकी रचना अभी भी जारी है और किसी भी अंतिम नतीजे पर नहीं है.  इसलिये यह रचना अपनी लिखावट और बुनावट में किसी भी संशोधन के अधीन है. वैसे मेरी एक कविता-संग्रह  ‘कविता कलाविहीन प्रकाशित हो चुका है जो हिन्दी में  है. परन्तु ‘पाहीमाफी यक गाँव रहा’ मेरी मातृभाषा अवधी में  है. क्योंकि मैं समझता हूँ कि जली-भुनी संवेदनाओं और भावनाओं को उकेरने में यह एक ससक्त माध्यम है। : आशाराम ‘जागरथ’ /19.12.2016]
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  • गूँग गवाह

खाये-पीये खूब अघाये
बीते दिन कै याद सताये
टहनी- टहनी, पाती-पाती
बहुत जने कै राज दबाये
कोऊ आवै, कोऊ जाये
कोऊ छाँहे बइठ छहाँये
काली चौरा के आँगन मा
बिन कुम्हलाये, बिन मुरझाये
जड़े जमाये कऊ दशक से
गड़ा बा गहरी माटी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा.

सुख-दुःख-गम खाय के भयौ बड़ा
हे नीम ! तू काहे हरा-भरा
केव न्याय करै, अन्याय करै
तोहरे बरदास्त कै पेट बड़ा
तोहरे सँग्हरी कै साथी सब
मरि-उखरि परे या झुराय गये
जब काल कै गाल बनी नदिया
जड़-मूल समेत समाय गये
तबहूँ तू हयो मुंह बांधें खडा
केतना कुछ घटा कहानी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

टुकुर-टुकुर यकटक ताकत
हे नीम ! तू पेड़ पुरान भयौ
केउ चोर रहै या साह रहै
सबका पनाह तू देत रह्यौ
तू भयौ पुरनियाँ काव कही
तोहरे बा लेखा और बही
मनहग चाहे रिसियान रहौ
अब तुहैं गवाही दियै क परी
बा मोट-मोट ई हाथ-गोड़
कब आई केकरे कामे मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

केतना लोगै आवा होइहैं
थकि-चूरि पथिक बइठा होइहैं
दुनिया औ देश – जवारी कै
बतकही बहुत गावा होइहैं
मरि गये बहुत पइदा होइकै
अब दियौ बताय बहुत होइगै
यकतरफा धन-धरती बटिगै
कइसै सब छोट-बड़ा होइगै
तू ज्ञान कै हौ भण्डार भरा
सच-सच सच बोलि दियौ सबकां
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

  • पहिया गाँव : कुदरत कय ठाँव

‘पाहीमाफी’ येक था गाँव
‘पहिया’ वोकर दूसर नावं
बस्ती कै तहसील हर्रैया
मेर – मेर कै जाति बसैया
पूरब ‘चन्हा’ व ‘बानेपुर’
ताल किनारे ‘कटकवारपुर’
दक्खिन पुरवा ‘अचकावापुर’
‘पच्छू टोलिया’ औ ‘सरवरपुर’
बहुत दूर से चली डहरिया
मिलै नदी की घाटी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

‘पहिया’ खुब सँचरा गाँव रहा
कुदरत कै सुन्दर ठाँव रहा
खुब महा-महा, पीपर-बरगद
इमली-पाकड़ कै छाँव रहा
पूरब – पच्छू – उत्तर बगिया  
व दक्खिन दूर घाघरा नदिया
चारिउ ओर झाड़ – झंखाड़
गड़ही – गड़हा, ताल – तलैया
केहू कै घर नरिया-खपड़ा
केव करै गुजारा मड़ई मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

सधुवाइन कै सुन्दर कुटिया
थोरै दूर हुआँ से नदिया
अरहर-गंजी-जड़हन-धान
दूर – दूर  फैला मैदान
फरै बकाइन, चिटकै रेड़
गाँव म बत्तिस पीपर-पेड़
खाले-तीरे, डहर किनारे
झरबेरी कै पेडै  पेड़
पीपर-नीचे, सोर पे औंढ़े
नींद लगै पुरवाई मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

गहिर गड़हिया छटा अनोखा
बाँस-कोठि के बीच महोखा
टापैं बगुला, कूदैं मेघा
हरियर घास पै बोंकै-बोंका
बेहया-सरपत कै झलकुट्टी
बनमुर्गी-पड़खी-फुरगुद्दी
नेउर अउर चौगड़ा घूमैं
कहूँ पे सुग्गा कहूँ किलहटी
चालि-चालि कै भिट्ठ लगावैं
मूस-लोखड़ी झाली मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

जामुन के पुलुई मा लुकाय
कोयल कू-कू-कू करै पाठ
कहुँ चोंच मारि कै छेद करै
काटै कठफोड़वा कठिन काठ
झोंका पुरुवाई कै पाये
पीपर कै पाता हरहराय
कहुँ खाय-खाय डांगर डटि कै
डैना फैलाये गिद्ध घमाय
राती मा साही सैर करैं
दिन मा कुलि घुसी रहैं बिल मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

बीनै लोगै लकड़ी-कंडी
कोऊ चेहरै आलू-गंजी
हाथी दूर-दूर से  आवैं
पीपर-टैरा खूब चबावैं
चिक्कन-चौड़ी डहर दूर तक
चली जाय ‘टेल्हा’ के घर तक
देखे बड़ा मनोहर लागै
गोरु-बछरू भागैं सरपट
कडों-कडों जब करैं कड़ाकुल
झुंड कै झुंड सिवाने मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

लागै जब कुटिया कै मेला
भीड़ हुवै खुब ठेलम-ठेला
कँडिया-ओखरी-तवा-पहरूवा
बल्लम-फरसा-आरी-फरूहा
कूँड़ा-हाँड़ी, भुरका-मेलिया
बिकै गड़ासा, खुरपा-हँसिया
पलटा-करछुल, बल्टी-गगरा
पीतल-फूल कै लोटा-थरिया
दिहें मेंहावर, चलैं लजाउर
लरिका दाबे कांखी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

सेंनुर-टिकुली दिहें मेहाउर
दुलहिन थरिया म बीनैं चाउर
बोलिन सासू कां फुसिलाय
थोरै पइसा दइद्या आउर
जाबै हम ‘रमरेखवा’ मेला
खाबै गरम-ज़लेबी, केला
सासू बोलिन भीर हुवअ थै
धक्का-मुक्की ढेलम-ढेला
नाहीं तौ फिर हमहूँ जाबै
तीसी बाँध ल्या गठरी मा 
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

पट्ठे दंगल दाँव लगावैं
लोगै तीतर-भेंड़ लड़ावैं
फुलरा वाला करधन बान्हे
गेद-गेदहरै धावत जावैं
छौना साथे घूमै सुअरी
चलैं झुंड मा भेड़ औ बकरी
उबहन टांगे माई हमरे
चली जायं छलकावत गगरी
कोदइल संग मुरैला नाचैं
रूसा वाले झाली मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

भिटहुर बगल घूर कै गड्ढा
वहीँ किनारे उपरी-कंडा
भीत से चिपकी चिपरी चमकै
जेस तरई कै गोरखधंधा
छपरा चढ़ै देसौरी कोहड़ा
सेम-तरोई-लौकी-कोहड़ा
सरपुतिया-बोंड़ा कै झोप्पा
नेनुवा लटकै खड़ा लड़ेहरा
बथुआ  बहुत लमेरा जामै
गूमा खेते-खेते मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

unnamedहम गयन अजोध्या के मेला
सब पूछैं काव-काव देख्या

बोलेन खाकी वर्दी मा हम
बानर के बीच पुलिस देखा
यक लाल – लाल  टोपी वाला
आगे से डंडा पटक दिहिस
पीछे बांड़ा बानर नेपान
केरा कै झोरा छोरि लिहिस
मनई ही मनई तर-उप्पर
बतकही सुनायन हम सबकां 
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

[जारी….]

 

यादगारी: ‘पहिलका डर’_राघव देवेश

जेठ-असाढ़ कय महीना, गरमी पुराजोर रही। दुपहरिया कय खाना लावय क भुलाय गा रहेन। पेट कोर्रा गिनत रहा। गरमसत एतना रहा कि पूछव न, लसलसी गरमी दिमाग झंड किहे रही। उमसत खूब रहा, बादर घेरे रहा, लागय कि बरसे जरूर। खाना नाहीं खाये रहेन यही के मारा छठयें घंटा मा चहरदेवारी फांदि के इसकूल से चंपत होइ लिहेन। घरे आयेन, अम्मा मिलतय पूछिन –- ‘का रे, इसकूल से काहे एतनी जल्दी भागि आयव?’ हम कहेन –- ‘मास्टर नाहीं आवा रहे, काव करतेन, सोचेन कि घरे चलिके गाय-गोरू कय चारावारा निपटाय ली। अम्मा कहिन –- ‘ठीक बाय लेकिन पहिले खाना खाय लियव अउर बोरिया बिछाइके घर कय काम पूर कै लियव। हँ..अउर खेलय तौ जायव न, नाहिँत काटिके पिठासा धइ दियब।’

कुछ देर बाद पिता जी बजारी से भुट्टा लइ के आये। गुड़िया बहिनी भूजब सुरू किहिन अव सबही मिलि के चबायन। सँझलउख हुअत रहा, बदरियान मौसम मा मुरैलौ बोलत रहे। गौधिरिया देखि के गुड़िया बहिनी लालटेन कय सीसा साफ करब सुरू किहिन। माटिक तेल भरे के बादि मा लालटेन बारि के डुढ़ुई पै धरिन, तीन दाँय संझा-माई क ध्यायिन। दुइ घरी भय नाहीं कि टुपुर-टुपुर बुंदियाय लाग। पता लाग कि लालटेन के किनारे दुइ चार पाँखी लहरियाय लागीँ। यनहीं के लभक्के मा यह दुइ बिहतुइयौ पहुँचि गयीं। नल के चौकी पै पानी छहराय के ह्वईं लालटेन धय दीन गय। ताकि पँखियै वही वारी पानी मा मरयँ-खपयँ। यनहीं के डर से खाई-पिया जल्दी होइ गय। मुल पानी बुँदियाइ के रहिगा। लाइट तनिका भै लुप्प असे भय कि मुन्ना के खेते कय टरांसफारम धाँय से उड़ि गा। लियव भईया, अब तौ बिजलियौ न आये। खाई-पिया होइगय तब सबही आपन-आपन कथरी-गुदरी लइके पक्का(छत) पै पहुँचि गा। पानी बुँदियाय के कारन पक्का ठंढान रहा, नाहीं वइसे तौ जेठ-असाढ़ कय घाम सहिके गरम तावा अस जरा करत हय। सबही पहुँड़ब सुरू किहिस। कुछ देर तौ हम धुरुब तारा औ सप्तरिसी हेरत-हेरत बितायन। यही के बिच्चे कब औंघाय गयन, पतै न लागि।

अबहीं सोये आधव घंटा न भा रहा कि सुकुल के पुरवा की वारी से धाँय-धाँय कय अवाज सुनाय परय लागि। हम अहदंक के मारा उठि-बैठि परेन। माई हमार हाँथ पकरि लिहिन। काहे से कि हम नींद मा कौने वारी ढर्रियाय जाई, पता नाहीं। केहू कहय कि हथगोला दगा तौ केहू कहय कि गोली चली। यक दुसरे के वारी से खेखारा-खेखारी हुवय लाग। अलगू, मास्टर अव सुकुल –- यै सबही सोचतय रहे कि चलि के तनी आरव लीन जाय। सबही आपन लाठी-डंडा सहेजत रहे कि अतनेन मा पुरुब टोला मा हलचल मची कि चड्ढा-बनियाइन गिरोह वाले लाव-लसकर के साथे निकरि परा अहयँ; यही वारि आवत जनाय परत अहयँ। सभय चौकन्ना होइगा अव अपने-अपने छते पै हाथे मा अद्धा लइके खड़ा होइगा। वहि सइती चोरी-चकारी कय अतना अहदंक रहा कि मनई अपनी हिफाजत के ताईं अपने छते के कोने पै रोड़ा-अद्धा कुरियाये रहत रहा। ताकी कौनौ समय जरूरति परय तौ इस्तेमाल कीन जाय। अस जनान कि चड्ढा-बनियाइन गिरोह वाले दुसरी वारी मुँड़ियाय गये। तब तनिका सबके जिउ मा जिउ आवा।

लगभग आधा घंटा के बाद फिन नरक मचा। हलचल भै कि मुँहनोचवै उतरत अहयँ। हउँफा उड़ा रहा कि यहिसाइत मुँहनोचवा अउर मुँड़कटवा उधिरान बाटे जौन कि टीबी के अंटीना से सिगनल लइके अकास से उतरत थीं; यनके खउफ से आरी-पौस्त कय मनई आपन अंटीना परमानेंटली उतारि के धै दिहे रहा…मुँहनोचवा कय बाति सुनतै हमार माई कहिन अंटिनवा तौ दिनै मा उतारि दीन गा रहा, तौ कयिसे!/? तब तक अलगू चिल्लाने कि सुकुल भैया कय लरिकवा आपन लगाय लिहे रहा महाभारत देखै के ताईं। गोहराई-गोहरावा भय। वै सरऊ जल्दी से आपन नट-बुल्ट ढील करिन। तौ सबकै जिउ थोरक्‌ ठन्टुट भा। अतनेन मा मोखड़ी वाली बगिया मा कुछ टारच लपलपाय लागीं। केहू कहिस कि मनई आम बीनत होये, तब तक सुगदेव चिल्लाय परे –- ई तौ सारै चोर बत्ती लिहे बाटे। ई बत्ती गाँव मा केहू के लगे थोरय अहय! यह दाईं फिर सबकै धुकधुकी बढ़ी। हमार तौ भूसी खसक गय रही। जिउ यक सौ पचास के उपरै धुकधुकात रहा। अब मन कहय कि अलगू औ सुगदेव जइसे मनइन का केहू चुप कराय दियै। पर करय के? गाँव भय जब जागि गा तब मनई, केहू लाठी केहू डंडा अऊर गाँव मा दुन जने के लगे बंदूक रही, वहू लाइसेंसी, वहिका लइके तनी आरव लियै बहिरियाने। आगे बंदूक वाले, पाछे डंडा-गोजी वाले। करत-करावत चारि बजिगा। डर के मारे नींद उड़नछू होइगै। घर कय मनई कामकाज मा बाझि गये। हम पाँच बजे भिनसारे डेरात-डेरात सोइ गयेन।

deveshदुसरे दिन दस बजे आँखि मुलमुलावत उठेन। उठेन तौ देखेन सबही बड़ा अफसोसात रहा। भगतिन बैठी रहीं; उनका बस इहै कहत सुनेन कि ‘बेचारे बड़ा नीक मनई रहे, अपना मरे मुला घरे वालेन का बचाय लिहिन।’ सोवय के पहिले अलगू दिमाग खराब किहे रहे अऊर अब भगतिनौ खराब खबर सुनाइन। हम उठतय अपनी बहिनी से पूछेन, तब पता लाग कि सुकुल के पुरवा मा जौन पुजारी कै बाप रहे वै राति मा चोरन का गाँव मा हलत देखि लिहे रहे अउर देखतै गोहरावय लागे –- ‘का हो! के हुवौ! कहाँ जात बाटेव!’ पता नहीं कयिसे वै ताड़ लिहे रहे कि वै सब चड्ढ़ा-बनियाइन गिरोह वाले रहे। औ ठाँवैं जोर-जोर से चिल्लाय लागे कि सबही जागि जाव हो, यह देखौ सारय… …। तब तक वहिमा से यक मिला उनपै हथगोला मारि दिहिस अउर चट्टय उनकय आँती-पोती बहिरियाय गय। खैर… अब काव कीनय जाय सकत हय! मजमा देखिके अलगुवौ मुँहे मा दतुइन कूँचत पहुँचि गये अउर यक नयी खबर सुनाइन कि काल्हि तौ भईया गजब होइगा रहा। पिता जी पूछिन –- काव हो? अलगू कहिन –- अरे भईया कुमारे ताले पै मछरी कय निगरानी करय आवा रहे। सुकुल भईया चोर समझि के बंदूक से निसाना साधि लिहे रहे लेकिन हियात रही कुमारे कय कि सुकुल भईया का सुबहा लागि गय कि कहूँ तलवा पै कुमरवा न हुवै! काहे से कि ऊ रोज तीन से चारि के बीच मा मछरी क दाना डारय आवत हय। हाँ भईया, तौ कुमारे मरत-मरत बचे।

सबका पुजारी के बाप कय बड़ा अफसोस रहा। बाता-कहानी के बाद सबही अपने थाने-पवाने होइ लिहिस। ई हमार पहिलका डर रहा जेहमन हनुमान चालिसव पढ़े से काम न चला। हम भूते क सम्हारि लिहेन पर मुँहनोचवा से हमार जान हलक मा अटकि गय। दुइ दिन तौ बरबस रारि ठानि लिहेन औ इसकूल न गयेन।

राघव देवेश अवधी कय युवा कवि-लेखक हुवयँ। पढ़ाई; जल्दियै ग्रेजुएसन पूर भवा, एम्मे कy तैयारी मा अहयँ। इनसे आप  9910618062 पै संपर्क कय सकत हयँ। 

अवधी साहित्य की समस्या और आचार्य कवि श्याम सुंदर मिश्र ‘मधुप’

इंटरनेट पै मधुप जी के अवधी अवदान क ध्यान मा रखिके लिखा ई पहिल आलेख आय। यहिते पहिले बस आप  उनके साथ भवा यक इंटब्यू जरूर देखि सकत हँय। यहि आलेख क बड़े लव से युवा अवधी अध्येता सैलेन्दर सुकुल लिखिन हैं। हम उनकय बहुत आभारी हन्‌। : संपादक
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*शैलेन्द्र कुमार शुक्ल

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मधुप जी के साथ शैलेन्द्र शुक्ल

अवधी कविता अपने आप में ही आचार्यत्व की एक खरी कसौटी है। जिस भाषा में जायसी, तुलसी और रहीम जैसे आचार्य कवि हुये हों उस भाषा की कविताई के साथ खिलवाड़ नहीं हो सकती। भाषा का अपना एक चरित्र होता है, इस प्रकार हर भाषा अपने स्वभाव का इतिहास और भूगोल अपनी संस्कृति में रचती है। मध्य काल की प्रारम्भिक अवस्था से ही अवधी का विराट वैभव काशी से कान्यकुब्ज तक दिखाई पड़ता है जब की इसका केंद्र अवध ही था । पं॰दामोदर शर्मा के ग्रंथ ‘उक्ति-व्यक्ति-प्रकरण’ से लेकर जगनिक के आल्ह-खंड तक इसे देखा जा सकता है।इसी भाषा में सूफी कविता की एक स्ंवृद्ध परंपरा मिलती है, जिसकी तुलना विश्व के किसी भी पुराने साहित्यिक और सांस्कृतिक आंदोलनों से की जा सकती है। ऐसा विराट आंदोलन और व्यापक पहल शायद फिर कभी दिखाई नहीं पड़ी। इस काव्यपरंपरा के लगभग सारे कवि मुसलमान थे। इन मुसलमान कवियों ने अवधी की जो साझा संस्कृति रची वह अवधी और हिन्दी में ही नहीं विश्व साहित्य में भी एक महत्वपूर्ण मिसाल के तौर पर पेश की जा सकती है। यह काव्यधारा एक संक्रमण की संस्कृति है, जहां भाषा एंटी-वाइरेस का काम करती है। मानवीय मूल्यों का कलात्मक संरक्षण भाषा के साहित्यिक होने का बड़ा प्रमाण है। एक प्रश्न यहाँ जायज है इन सूफी कवियों ने अवधी भाषा को ही क्यों चुना ?जबकि अवधी के साथ-साथ समय का अनुगमन ब्रज-भाषा भी कर रही थी औरब्रजभाषा का स्वाभाविक चरित्र प्रेम के लिए ज्यादा निकट था, प्रेमगाथाओं के अनुकूल भी ! इसका एक कारण यह भी हो सकता है कि ब्रजभाषा प्रबंध के लिए तैयार न थी और दूसरा यह कि इन सूफी कवियों को केवल प्रेम ही स्थापित करने का लक्ष्य न था । वह जीवन के विविध पक्षों की विराटता लिखना चाहते थे। कुछ सूफी कवि इसी तरह के प्रेमाख्यानक अन्य लोक भाषाओं में भी लिख रहे थे, लेकिन जो ऊंचाई अवधी के प्रेमाख्यानों की है वह अन्यों की नहीं। यह अवधी भाषा के सामर्थ्य का एक जोरदार पहलू है।

डॉ॰ श्याम सुंदर मिश्र ‘मधुप’(1922-2014)अवधी साहित्य के पहले इतिहासकर हैं। वह अवधी के प्रगतिशील कवि और आचार्यत्व के गुणों से परिचित एक प्रबुद्ध आलोचक भी। उनका लोचनात्मक व्यक्तित्व लोक की समाजशास्त्रीय पद्धति के आलोक में दिखाई पड़ता है । उन्होंने अपनी मातृभाषा अवधी में बड़ा काम किया । और यह कम महत्वपूर्ण नहीं कि जब स्थापित खड़ीबोली हिंदी को लेकर एक दूसरे की पीठ सहलाने वाले लोग विद्वता का ढोंग बड़े बड़े के नाम पर सिर्फ हिंदी का ढिढोरा पिटा जा रहा हो, संयुक्त राष्ट्र संघ की भाषाओं में हिंदी को शामिल किए जाने का दबाव बढ़ रहा हो, यह सब जिन लोगों द्वारा किया जा रहा हो उन्हें यह मालूम ही न हो कि हिंदी आखिर है क्या ! इनकी नजर में क्या हिंदी के पहले कवि हरिऔध हैं ! बहरहाल हिंदी के विदूषकों ने यहीं माहौल बना रखा है । हिंदी के महत्वपूर्ण आलोचक डॉ॰ मैनेजर पाण्डेय की यह उक्ति कितनी प्रासंगिक है ‘आजकल भूमंडलीकरण की जो आँधी चल रही है हर बुद्धिजीवी स्थानीय होने से पहले राष्ट्रीय बन जाना चाहता है और राष्ट्रीय होने से पहले अंतरराष्ट्रीय’। इससे हिंदी का कोई हित होने वाला नहीं है यह बात तो तय है । डॉ॰ मधुप ऐसे ही कठिन समय में उस हिंदी के लिए काम करते रहे जो हिंदी जायसी, तुलसी और रहीम की हिंदी थी । जिस हिंदी पर हिंदी साहित्य के इतिहासकारों ने मध्यकाल से ही ताला लगा दिया था । और यह भी विचारणीय तथ्य है कि भक्तिकाल में अवधी हिंदी का स्वर्णयुग रच रही थी,संत और भक्त कवियों की वाणी इसी भाषा का वैभव बनी । इस युग में यह भाषा अपने स्वभाव को और भी स्वाभाविक बना चुकी थी । इसका यह भी बड़ा प्रमाण है कि इस भाषा ने राजदरबारों में जाने से परहेज किया । इस तरह रीतिकाल भर यह भाषा चुप्पी साधे रही यानी ‘रहिमन चुप ह्वै बैठिए देखि दिनन को फेर’ लेकिन यह चुप्पी एक लंबी लड़ाई की तैयारी कर रही थी, जिसकी वही स्वाभाविक धमक और उतनी ही तेज धार आधुनिक युग में दिखाई पड़ती है । डॉ॰ ‘मधुप’ अपने ग्रंथ ‘अवधी साहित्य के इतिहास’ में अवधी की आधुनिक कविता का प्रस्थान बिंदु काशी के बाबू भारतेन्दु हरिश्चंद्र को मानते हैं ।भारतेन्दु के बारे में अपनी बात रखते हुये वह कहते हैं “अपनी काव्यभाषा को ब्रज-भाषा रखते हुये भी उन्होंने अपनी सामयिक रचनाओं के लिए जनभाषा अवधी की सादगी का सहारा लिया”। यहाँ मधुप जी अवधी को जन भाषा इस लिए भी कह रहे हैं क्योंकि अवधी लंबे समय तक हिंदी भाषी प्रान्तों की संपर्क भाषा रही है । इस तथ्य की ओर सुनीति कुमार चटर्जी ने ‘उक्ति-व्यक्ति-प्रकरण’ की भूमिका लिखते हुये इशारा किया था जिसे डॉ॰ रामविलास शर्मा ने काफी उधेड़बुन के बाद स्पष्ट रूप में व्याख्यायित किया है ।

डॉ॰ मधुप का इतिहास ग्रंथ अवधी की पुरानी परंपरा को परखते हुये अवधी की आधुनिक साहित्य परंपरा की एक महत्वपूर्ण खोज है । डॉ॰ मधुप शहरों की साहित्यिक चकाचौंध और विमर्शों के झंडाबरदारों से बचते हुये हिंदी की उस स्वाभाविक परंपरा को साधने का काम किया जिसे विद्वता के अभिमानी दिहाती बोली कह कर छुट्टी ले लेते हैं ।वह पक्के दिहाती थे और दिहाती होना उनकी स्वाभाविक विद्वता का सबसे मजबूत पहलू । उन्होंने अंत तक अपने गाँव मैनासी-सरैयां (सीतापुर) को नहीं छोड़ा । वह आर॰एम॰पी डिग्री कॉलेज, सीतापुरमें अध्यापन कार्य करते हुये खुद को देहाती हिंदी के लिए समर्पित कर दिया । उन्होंने अवधी में बड़ा काम किया । वह मूलतःअवधी कवि थे और कविताई का आचार्यत्व उनमे था । उनके काव्यग्रंथ ‘गाउँ का सुरपुर देउ बनाइ’,‘जगि रहे गांधी केर सपन’,‘खेतवन का देखि-देखि जीउ हुलसइ मोर’ तथा ‘घास के घरौंदे’ अवधी साहित्य की निधि हैं । इन किताबों की कवितायें आज भी बूढ़े किसानों के मुह सीतापुर के आस-पास के गांवों में सुनने को मिल जाएंगी । इसके अतिरिक्त उन्होंने अवधी की उस विरासत को सहेजा, जो बिखरीपड़ी थी उसे संपादित किया । इस तरह के ग्रन्थों में ‘वंशीधर शुक्ल ग्रंथावली’,‘अवधी की राष्ट्रीय कवितायें’, आदि प्रमुख है । उन्होंने अवधी की साहित्य परंपरा को आगे बढ़ाते हुये कई महत्वपूर्ण शोध-ग्रंथ और आलोचना पुस्तकें दीं जिनमें ‘परंपरा के परिपेक्ष्य में आधुनिक अवधी काव्य’,‘आधुनिक अवधी काव्य की प्रमुख प्रवृत्तियाँ’,‘अवधी काव्यधारा’,‘अवधी कविता की नई लीक के प्रवर्तक: बलभद्र प्रसाद दीक्षित ‘पढ़ीस’’, तथा ‘अवधी के आधुनिक कवि’ प्रमुख हैं । इसके अतिरिक्त जिसके आधार पर उन्हें अवधी का रामचन्द्र शुक्ल कहा जाता है वह है ‘अवधी साहित्य का इतिहास’ । इस इतिहास ग्रंथ में उन्होंने जो बहुत ही जटिल और मुश्किल काम को अंजाम दिया वह है आधुनिक अवधी साहित्य की खोज । अवधी के आधुनिक साहित्यकारों का साहित्य जो सहज उपलब्ध नहीं मिलता,क्योंकि यह राजकमल, वाणी, और ज्ञानपीठ से नहीं छपा।इधर हाल ही में जगदीश पीयूष द्वारा संपादित अवधी ग्रंथावली वाणी प्रकाशन से छप चुकी है लेकिन इसमे भी आधुनिक कवियों की सिर्फ एक–एक कविता संग्रहीतहै। यह साहित्य बहुत कुछ आज भी अप्रकाशित ही है और जो भी छपा है वह स्थानीय छोटे-छोटे प्रकाशनों से। इनमें से अधिकांश प्रकाशन अब बंद भी हो गए हैं । और जो चालू हालत में हैं उनके पास पुरानी पुस्तकें उपलब्ध नहीं है और नई छापने की हिम्मत अब उनमें नहीं, क्योंकि बाजार में इनकी मांग नहीं है। अवधी के तमाम साहित्यकार जो इस बदहाली में मर गए, या अपने अंतिम पड़ाव पर जीवित हैं, उनके घर वाले या वे स्वयं किसी अपरिचित को साहित्य देने में संकोच करते हैं,कि कहीं वह इसे अपने नाम से न छपवा ले । कई लोलुपों ने यह किया भी। अवधी की इसी आधुनिक पीढ़ी में मधुप जी भी थे जो जाते-जाते यह महत्वपूर्ण काम कर गए जिसे उनके अलावा कोई मुश्किल से ही कर पता। मधुप जी के पास एक दुर्लभ पुस्तकालय था। इस बात का प्रमाण उनका यह ग्रंथ है।

मधुप जी ने इस किताब में साहित्य के इतिहास लेखन की दृष्टि हिंदी साहित्य के इतिहास से ग्रहण की। और यह ही इस किताब की सबसे बड़ी कमजोरी है। उन्होंने अवधी की आधुनिक काव्यधारा में छायावाद और रहस्यवाद जो दिखाया है वह बेमतलब की चीज है। अवधी की नई लीक के प्रवर्तक बलभद्र दीक्षित ‘पढ़ीस’ अपने प्रारम्भिक अवस्था से ही पूर्णतः प्रगतिशील थे। उनकी कावताओं में प्रगतिशीलता के वह गुण विद्यमान हैं जिन्हे हिंदी कविता की मूल (या बेमूल) धारा में खोजना आज भी मुश्किल है। रही बात रमई काका की जो छायावाद के बाद की उपज हैं। सिर्फ इन दो कवियों के यहाँ मधुप जी ने छायावाद और रहस्यवाद देख लिया और इन दोनों के बीच की कड़ी वंशीधर शुक्ल को सीधे छोड़ दिया क्योंकि यह कवि स्वतन्त्रता आंदोलन के समय क्रांति का अलाव जलाए बैठा था । अब जब अवधी में छायावाद या रहस्यवाद नहीं था तो नहीं था,उसे जबरन ठेल कर पता नहीं क्या प्रमाणित करना चाहते थे । बहरहाल इसके आगे उन्होंने अवधी की प्रगतित्रई की जो स्थापना की और उसकी जो ऐतिहासिक पड़ताल की वह अपने आप में बहुत ही महत्वपूर्ण है । इन कवियों के साथ मधुप जी ने साहित्य की ऐतिहासिक ऊर्जा दिखाई । मधुप जी ने अवधी की प्रगतिशील परंपरा की एक लंबी कतार दिखाई । कवियों के बारे में भी लिखा और कविता के उदाहरण भी दिये । अवधी में हो रहे गजल और नवगीत लेखन को भी रेखांकित किया। इसके अतिरिक्त इस ग्रंथ में उन्होंने अवधी की पुरानी परमम्परा जो दोहा-चौपाई-बरवै की थी वह आधुनिक अवधी में कब तक चलती रही और उसमे क्या-क्या लिखा जाता रहा ,यह सब दिखाया है जो अपने आप में एक इतिहास दृष्टि का मानक है ।

इस प्रकार हम देखते हैं मधुप जी ने लगभग 300 आधुनिक अवधी कवियों का हवाला देते हुये उनकी कविताओं के जिस प्रकार उदाहरण दिये हैं वह अपने आप में एक बहुत ही जटिल और निहायत मुश्किल काम था क्योंकि यह अवधी साहित्य के इतिहास का पहला ग्रंथ है । साहित्य के इतिहास का पहला ग्रंथ लिखना कितना मुश्किल होता है यह बताने अवश्यकता नहीं । मधुप जी नें यह बड़ा काम किया है । जिसके लिए साहित्य प्रेमी उनके सदा ऋणी रहेंगे।

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शैलेन्द्र कुमार शुक्ल
शोधार्थी: म.गां.अं.हिं.वि.वि.,वर्धा (महाराष्ट्र)
मो.07057467780
ई-मेल: shailendrashuklahcu@gmail.com 

काका लोक-करुणा के भी बड़े कवि हैं!

हिमांशु बाजपेयी 

2015 अवधी भाषा के महत्वपूर्ण कवि-नाटककार चन्द्रभूषण त्रिवेदी उर्फ रमई काका का जन्मशताब्दी वर्ष है. पढ़ीस और वंशीधर शुक्ल के साथ रमई काका अवधी की उस अमर ‘त्रयी’ का हिस्सा हैं जिसकी रचनात्मकता ने तुलसी और जायसी की अवधी को एक नई साहित्यिक समृद्धि प्रदान की. यूं अवधी की इस कद्दावर तिकड़ी के तीनों सदस्य बहुत लोकप्रिय रहे लेकिन सुनहरे दौर में आकाशवाणी लखनऊ के साथ सफल नाटककार और प्रस्तोता के बतौर लंबे जुड़ाव और अपने अद्वितीय हास्य-व्यंग्यबोध के चलते रमई काका की लोकप्रियता सचमुच अद्भुत और असाधारण रही है. रेडियो नाटकों का उनका हस्ताक्षर चरित्र ‘बहिरे बाबा’ तो इस कदर मशहूर रहा कि आज भी उत्तर भारत के पुराने लोगों में रमई काका का नाम  भले ही सब न जानें लेकिन बहिरे बाबा सबको अब तक याद हैं.

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अपनी अफसानवी मकबूलियत को रमई काका ने अपने रचनाकर्मी सरोकारों और दायित्वबोध पर कभी हावी नहीं होने दिया. उनके नाटक और कविताएं अपने समय से मुठभेड़ का सशक्त माध्यम बनीं. उनकी भाषा में गजब की सादगी और अपनेपन की सौंधी-सी खुशबू बसी हुई थी. अपने लोगों से अपनी भाषा में अपनी बात कहते हुए उन्होंने अपने समय के ज्वलंत सवालों को संबोधित किया. हालांकि उन्होंने खड़ी बोली में भी लिखा लेकिन उनकी पहचान हमेशा अवधी से जुड़ी रही. हास्य-व्यंग्य के अपने जाने पहचाने रंग में तो वे बेजोड़ रहे ही, उन्होंने दिल में उतर जानेवाली संजीदा कविताएं भी लिखीं. उस दौर में जब खड़ी बोली के कई बड़े साहित्यकार लोकभाषाओं को भाषा नहीं फकत बोली कहकर खड़ीबोली को उन पर तरजीह दे रहे थे और दूसरों से भी उसी में लिखने का आग्रह कर रहे थे उस वक्त रमई काका अवधी में उत्कृष्ट लेखन करते हुए, अपने समय के जरूरी सवालों को उठाते हुए और अत्यधिक लोकप्रिय होते हुए ये सिद्ध कर रहे थे कि अवधी भाषा-साहित्य केवल रामचरितमानस और पद्मावत तक सीमित किसी गुजरी हुई दास्तान का नाम नहीं है, बल्कि ये एक ज़िन्दा कारवान-ए-सुखन का नाम है जो अभी कई मंज़िलें तय करेगा.

उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले के रावतपुर गांव में 2 फरवरी 1915 जन्मे रमई काका कविता तो किशोरावस्था में ही लिखने लगे थे लेकिन उनकी प्रतिभा को सही मकाम 1941 में मिला जब उन्होंने आकाशवाणी के कर्मचारी के बतौर लखनऊ को अपना निवास-स्थान बनाया. नौकरी के लिए गांव छोड़ने के बाद वे जिंदगीभर लखनऊ में ही रहे लेकिन इसके बावजूद उनकी कविताओं में गांव और कृषि प्रधान संस्कृति की मौजूदगी हमेशा बनी रही. गांव का उनका प्रकृति चित्रण अनूठा है लेकिन सबसे महत्वपूर्ण बात ये है कि वे गांव को किसी आउटसाइडर यानी शहरवाले की नजर से नहीं बल्कि एक इनसाइडर के बतौर देखते और बयान करते हैं. दुखिया गिरिस्ती, धरती हमरि, सुखी जब हुइहैं गांव हमार, धरती तुमका टेरि रही है आदि अनेक उत्कृष्ट कविताएं रमई काका ने गांव के जीवन पर लिखी हैं. डाॅ. रामविलास शर्मा ने रमई काका के बारे में लिखा है- ‘उनकी गंभीर रचनाओं में एक विद्रोही किसान का उदात्त स्वर है, जो समाज में अपने महत्वपूर्ण स्थान को पहचानता रहा है और अधिकार पाने के लिए कटिबद्ध हो गया है.’

लोकभाषाओं को पिछड़ेपन की निशानी आैर खुद को प्रगतिशील माननेवालों काे यह जानना बहुत जरूरी है कि रमई काका की अवधी में लिखी गईं ग्राम्य जीवन पर आधारित कविताओं में चौंकानेवाली प्रगतिशीलता और विद्रोह का स्वर मिलता है. इसकी बानगी के तौर पर ‘अनोखा परदा’ और ‘छाती का पीपर’ आदि कविताएं देखी जा सकती हैं. अपने समय के सामाजिक यथार्थ को भी वे पुख्तगी से बयान करते हैं. सामाजिक विसंगतियों और कुरीतियों जैसे परदा प्रथा, जाति प्रथा, बेमेल विवाह, सामंतवाद, सूदखोरी को निशाने पर रखते हुए भी उन्होंने बहुत कुछ लिखा है. यहां इस बात को रेखांकित करना जरूरी हो जाता है कि उनकी कविताओं में हास्य-व्यंग्य की इतनी ज्यादा चर्चा हुई कि उनकी कविता के कई जरूरी और गंभीर पक्ष ठीक से पहचाने नहीं  गए. वैसे भी हास्य-व्यंग्य को, यदि वह ग्रामभाषा का हो तो और भी, गंभीरता से ग्रहण करने की कोशिश प्रायः नहीं होती. रमई काका के लोक-हास्य की खूब तारीफ हुई तो उनकी कविता में निबद्ध लोक-करुणा की अनदेखी भी हुई. निर्विवाद रूप से काका लोक-करुणा के भी बड़े कवि हैं. इस संदर्भ में अवधी के विद्वान डॉ. अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी कहते हैं- ‘रमई काका की कविताओं में व्याप्त लोक-करुणा एक तरफ ग्रामीणों-किसानों-मजदूरों-स्त्रियों का दुख-दर्द कहती है वहीं दूसरी तरफ वह बरतानिया हुकूमत में पराधीनता की व्यथा को भी मार्मिकता के साथ दर्ज करती है. उसमें परबसता की पीड़ा है, ‘सब बुद्धि बिबेकु नसावै परबसता धीरे-धीरे’ तो ‘परबसता’ से मुक्ति के भिनसार (सुबह) की प्रतीक्षा भी, ‘धीर धरु भिनसार होई!’’

संजीदा मिजाज की बेशुमार बेहतरीन कविताएं लिखने के बावजूद काका की पहचान उनकी हास्य व्यंग्य शैली ही है. लिखा भी उन्होंने इसी में सबसे ज्यादा. उनकी हास्य-व्यंग्य कविताओं का एक लोकप्रिय विषय गांव की नजर से शहर को देखने का भी रहा है. इनमें उनकी कविताएं ‘हम कहा बड़ा ध्वाखा हुई गा’ सबसे ज्यादा लोकप्रिय हुईं हैं. कविता की दुनिया में शुरुआती ख्याति उन्हें ‘ध्वाखा’ कविता से ही मिली. इसमें गांव से पहली बार लखनऊ गए एक आदमी के साथ जो कुछ घटित हुआ उसका मजाकिया अंदाज में बयान है. इसके अलावा हास्य व्यंग्य शैली में लिखीं उनकी ई छीछालेदर द्याखौ तौ, नैनीताल, कचेहरी,अंधकार के राजा, नाजुक बरखा, बुढ़ऊ का बियाहु आदि कविताएं भी बहुत मशहूर हुईं.

अपनी इन्हीं कविताओं के माध्यम से रमई काका कई दशकों तक कवि सम्मेलनों में धूम मचाते रहे. उन्होंने अपनी लम्बी साहित्यिक यात्रा के दौरान विपुल साहित्य रचा है, जिसका बहुत सारा हिस्सा अभी भी अप्रकाशित है. उनकी कविताओं का पहला संकलन ‘बौछार’ 1944 में छपा जो बहुत लोकप्रिय रहा. इसके बाद भिनसार, नेताजी, फुहार, गुलछर्रा, हरपाती तरवारि, हास्य के छींटे और माटी के बोल आदि काव्य संकलन आए.
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हिमांशु बाजपेयी

कविता के अलावा नाटकों और एकांकियों में भी रमई काका अवधी के सबसे बड़े नाम हैं. नाटकों की भी उनकी तीन पुस्तकें रतौंधी, बहिरे बोधन बाबा और मि. जुगनू छपी. आकाशवाणी लखनऊ के लिए उन्होंने पचास से ज्यादा लोकप्रिय नाटक लिखे और उनमें अभिनय भी किया. इनमें ‘बहिरे बोधन बाबा’ सबसे मशहूर है. ये आकाशवाणी के इतिहास का सबसे लंबा और लोकप्रिय धारावाहिक नाटक है जो 1957 से 1982 तक लगातार चला. कुल 121 कड़ियोंवाला यही नाटक रमई काका का दूसरा नाम बन चुका है. नाटक की विषयवस्तु ग्राम्य जीवन पर आधारित होती थी एवं ग्रामीण जीवन की समस्याओं एवं मुद्दों को उठाती थी. बहिरे बोधन बाबा के अलावा रमई काका के लिखे मगन मिस्तरी परिवार, जगराना बुआ, चपल चंदू, नटखट नंदू, छोटई लुटई, अफीमी चाचा, खिचड़ी, हरफनमौला, खोखे पंडित, जंतर मंतर, मटरू मामा एवं गदरभ राग आदि रेडियो नाटक भी बहुत लोकप्रिय रहे. गौरतलब है कि रमई काका का लिखा हर नाटक हास्य व्यंग्य शैली का होने के बावजूद किसी न किसी गंभीर सामाजिक समस्या पर केंद्रित होता था. जनसाधारण में रमई काका की लोकप्रियता को देखते हुए आकाशवाणी ने उनसे उस समय की लगभग सभी सामाजिक समस्याओं पर नाटक लिखवाए जिन्होंने अपना व्यापक असर भी दिखाया. कवि और नाटककार के रूप में लोकप्रियता का शिखर पानेवाले रमई काका ने अवधी लेख एवं निबंध भी काफी लिखे जो समय-समय पर पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहे.

काका 1977 में आकाशवाणी से रिटायर हो गए लेकिन रेडियो से उनका जुड़ाव बना रहा. 18 अप्रैल 1982 को लखनऊ के बलरामपुर अस्पताल में उन्होंने अंतिम सांस ली. आकाशवाणी लखनऊ की लोकप्रियता में काका की बड़ी भूमिका रही. 1965 में आकाशवाणी को लिखे गए एक पत्र में मशहूर साहित्यकार अमृतलाल नागर ने लिखा- ‘एक मैं ही नहीं, मेरे मत से आपके केंद्र के असंख्य श्रोता भी एक ही उमंग में सम्मिलित होकर एक स्वर से कहेंगे कि काका रेडियो के अनमोल रत्न हैं.’ 2013 में आकाशवाणी लखनऊ के 75 साल पूरे होने के मौके पर संस्थान ने रमई काका की सेवाओं को याद करते हुए ‘जन-मन के रमई काका’ नाम से एक श्रंखला का प्रसारण किया जो काफी लोकप्रिय रहा.

जन्मशती के मौके पर निहायत जरूरी है कि रमई काका के तमाम प्रकाशित-अप्रकाशित साहित्य को इकट्ठा करके एक समग्र ग्रंथावली के रूप में छापा जाए. क्योंकि उनका बहुत सारा काम अभी तक अप्रकाशित है और ज्यादातर प्रकाशित पुस्तकें भी लंबे वक्त से नए संस्करण न छपने के कारण लगभग अनुपलब्ध हो गईं हैं. इसके साथ ही ज्यादा जरूरी ये है कि उनके साहित्यिक संस्कारों एवं सरोकारों से प्रेरणा प्राप्त की जाए. जैसा कि एक जगह वे कहते हैं-

हिरदय की कोमल पंखुरिन मा, जो भंवरा असि न गूंजि सकै
उसरील वांठ हरियर न करै, डभकत नयना ना पोंछि  सकै
जेहिका सुनतै खन बन्धन की, बेड़ी झन झन न झनझनायं
उन पांवन मां पौरूखु न भरै, जो अपने पथ पर डगमगायं
अंधियारू न दुरवै सबिता बनि, अइसी कविता ते कौनु लाभ!

साभार: तहलका

मुआवजा (कहानी) : डॉ० ज्ञानवती दीक्षित

आजु अवधी साहित्यकार डॉ० ज्ञानवती दीक्षित की कहानी मुआवजा आप सब के तांय प्रस्तुत है. ज्ञानवती जी सहगल कालेज, नैमिषारण्य मां हिन्दी केरी व्याख्याता हैं. १३ अगस्त १९६६ मां जन्मी ई लेखिका हिन्दी औ अवधी दोनौ मां साहित्यरत हैं. इनकेरे लिखे कइयो कहानी संग्रह, उपन्यास, खंड काव्य औ प्रबंध काव्य प्रकाशित हुइ चुके हैं, कुछ अबहीं प्रेस मां हैं. ईके अलावा इनकेर कहानी, कविता, लेख, आलोचना, व समीक्षा आदि समय-समय पर बिभिन्न पत्र-पत्रिकन मां छपत रहत हैं…

मुआवजा

बरसन बाद रामनगर लौटे हन. नौकरी केरी बंदिस देस के अलग-अलग सहरन मां लइ जाति रही. यहि क्रम मां आपन गाँव कहूँ पीछे छूटत गा. अब तौ पता नाय बरसन पहिले देखे चेहरा पहिचाने जइहैं या नांय. जैसेन गाँव जाय वाली पगडंडी पर मुड़ेन– एक अबूझ आवेग तेरे हृदय धड़कै लगा. हमार गाँव– पियारा गाँव– जहाँ केरी माटी हमरी सांसन मां महकत है– जहाँ केरा एक-एक पेड़ हमार पहिचाना है . आय गए हन हमरे पियारे गाँव–
आय गए हन तुमसे मिलै के लिए. हमार आँखी भरि आयीं.

सामने लछिमी काकी केरा घर रहै . अरे यौ एतना टूटि-फूटि गा. कबहूँ यौ गाँव केरा सबसे खूबसूरत घर हुआ करति रहै. हरी-भरी फलिन केरी बेलन से ढका, माटी से लीपा-पोता, चीकन-चमचमात घर. माटी से बने कच्चे घर केतने खूबसूरत हुइ सकत हैं—-यहिका उदाहरन रहै लछिमी काकी केरा घर . बड़ी मेहनती रहै लछिमी काकी. भोरहें से सफाई मां जुटि जातीं. उनकी धौरी गइयौ उतनै साफ़-सुथरी रहती रहै, जेतना गोबर से लीपा उनका आँगन. घर के समुंहे खूब साफ- सुथरा रहत रहै. हम बच्चा लोग हूंआ खेलै जाई, तौ धौरी गइया केर बढ़िया दूधौ पियैक मिलत रहै. कबहूँ काकी मट्ठा बनउतीं, तौ ताजा लाल- लाल मट्ठौ पियैक मिलत रहै. गाँव केरे दूध, दही अउर मट्ठे केरा स्वाद तौ गाँवै वाले जानि सकत हैं. सहरन मां वहिकी कल्पनौ दुस्कर है.

हम धीरे से आवाज दिहेन– काकी- – –

अंदर से कांपत भई आवाज बाहर आई, खांसी के धौंसा के साथ– कउन है?

— हम हन, काकी. अर्जुन- – -.
हमार दिल धड़कि उठा . हमरे सामने मूर्तिमान दरिद्रता खड़ी रहै– फटे-पुरान कपड़ा, चेहरा पर असंख्य झुर्री– मानौ सरीर के हर अंग पर रोग कब्जा कै लिहिन होय . लछिमी काकी केरा अइस हाल होइगा ?
वा पहिले केरी सम्पन्नता कहूँ देखाय नाय परत है. घर केरी खस्ता हालत दूरि से आपन परिचय दै रही रहै.

— अर्जुन हौ ? रामचन्न दद्दा के लरिका ?
बूढ़ी कोटरन मां धंसी आंखी हमार बारीक पर्यवेक्षण कै रही रहैं.

—हाँ ! काकी .
हमरे मुँह से सब्द जैसे कठिनाई से रस्ता बनाय पाय रहे रहै .

—तुम्हार अइसन हाल काकी ? घर मां सब कहाँ गे ? औ सरद कहाँ है ?

— तुम्हरे काका के साथै , सब बिलाय गा, बचुआ.
काकी धम्म से आँगन मां परे पुरान तखत पर बैठि गईं. बरसा मां भीजि के तखत केरी लकड़ी फूलि आई रहै .

—बड़ा फूला-फला रहै यौ आँगन कबहूँ. आजु खाली हुइगा बचुआ. तुम्हरे काका के आंखि मुंदतै सारा जहान बैरी हुइ गवा. सरद का पुलिस पकरि लै गई …. ऊ .. जेल्ह मां है बचुआ .
काकी आँचर से आँखी पोंछइ लगीं .

— जेल मां ??? काहे ?? का किहिस ऊ….?

— कुछ किहिस होत तौ का गम रहै…. बचुआ.. ? निरपराध हमार लरिका जेल्ह मां बंद है . सूबा मां अइसी सरकार है भइया, जौ दलितन की बहू-बिटियन के साथ कुछ होइ जाय ऊँच-नीच, तौ हजारन केरा मुआवजा बाँटत है. गाँव मां हरिजन टोला मां अब रोज केरा तमासा होइ गवा है. हल्ला मचाय के कोई सवर्ण का फंसाय देव. कोई सुनवाई नाय. तुरतै हरिजन एक्ट लागि जात है. सिकायत करइ वाली का मुआवजा दीन्ह जात है. हमार सरद — बेवा केरी अकेल औलाद रहै— उनकी पइसन केरी हवस केर नेवाला बनिगा . हमार सवर्ण होब गुनाह होइगा बचुआ. हमरे साथ खड़ा होवइया कोई नाय रहै. कोई जांच, कोई फ़रियाद नाय सुनी गई. हमार मासूम लरिका, जौ कोई गाँव केरी मेहरुआ की ओर आँखी उठाय के देखतौ नाय रहै—ऊ… जेल्ह मां सरि रहा है — बलात्कार केरे आरोप मां.

लछिमी काकी आँखिन पर आँचर धरि के रोवै लागीं. हम अवाक खड़े रहि गेन. यहु हमार वहै गाँव रहै– जहाँ केरी बहू-बेटी दुसरे गाँव मां ब्याही होतीं तौ बड़े-बुजुर्ग वै गाँव केरा पानी नांय पियत रहैं, कि लडकियैं तौ गाँव भर की सांझी बिटिया भई. वै गाँव मां अइसा घटै लगा पइसन के लिए? तौ का तालाब केरा पानी गंदी राजनीति केरी लाठी से फटिगा …? यहै संविधान रचा गा रहै, हमरे देस केरे लिए ..?

बूढी काकी केरी हिचकियैं हमरे बेजान कदमन केरा पीछा कै रही रहैं. हम धीरे-धीरे चलत भये गाँव केरा गलियारा पार कियेन. सामने हरिजन टोला रहै. धुत सराब पिए भैंरों काका जमीन पर लुढके पड़े रहैं. पास मां काला कुत्ता बइठा पूंछ हिलाय रहा रहै. दुइ किसोरी सिर पर घड़ा लिए पानी लेय जाय रही रहैं. छप्पर के अंदर से कोई मेहरुआ गन्दी-गन्दी गारी दै रही रहै. गारिन के साथ-साथ वहिके घर से मारापीटी की आवाजौ आय रही रहै. ई मारपीट मां छः सात छोटे बच्चा बिलखि-बिलखि के रोय रहे रहैं. पासै बजबजात, कूड़ा से पटी नाली रहै, वहे नाली मां एक सराबी लुढका पड़ा रहै. वहिके ऊपर माछी भिन-भिन करि रहि रहैं. हम राम सुमिरन का बड़ी मुश्किल से पहिचानेन. वौ हमरे साथ पढ़त रहै, अपरिचय के भाव लिए ऊ पास आवा. सिर के बाल खिचड़ी होइगे रहैं. चेहरा पर आश्चर्य के भाव रहैं.

—अरे! बाबू जी, आप ?

— का बाबू जी, बाबू जी कै रहा है….. अरे! हमहन अरजुन- – .हम हंसिके कहेन .

—आव, घरै चलौ.
ऊ सकुचात भवा बढ़ा. चारपाई पर बैठत-बैठत हम देखेन ऊका घर पक्का बनिगा रहै. बाहर हैंडपंपौ लगा रहै.

—और सुनाव का हाल है ?

—हाल देखि तौ रहे हौ, भैया. नाली मां पड़ा है . यहु मुरारी है . भैंरों कक्का केरा लरिका . पीके नाली मां परा है हरामी. गाँव के पंडित टोला के लरिका पर अपनी बिटिया से मुकदमा कराय दिहिस….. बलत्कार कर. मुआवजा मिला है. हैलीकाप्टर से पुलिस के बड़े साहब आये रहैं. दै गे हैं. बस! दारू मुरगा उड़ि रहा है दूनौ बखत…..

—का कहत हौ …? झूठै…?

—अरे भइया!!!!!! पइसे के लिए का-का नाय होत है हियां. महिमां तौ खाली रिपोट लिखवावै की है. एस० ओ० हरिजन है. आधा-आधा पइसा बटिगा ….पब्लिक पुलिस केर पुरान रिलेसन.
राम सुमिरन केरी आवाज दुःख मां डूबी रहै.

—तौ तुम इनका समझावत काहे नांय ? तुम तौ पढ़े-लिखे हौ…

—हमरे कहै से कोई काहे सुनै और मानै ..? हम मेहनत करइक कहित है… जब हराम केरा मिलि रहा है, तौ मेहनत को करी. एक-एक मेहरुआ केरे आठ- आठ , नौ-नौ लरिका हैं, एतनी योजना चलि रही हैं, आबादी बढाए जाव बस!
हम गाँव से निकरेन तौ मन बहुत दुखी रहै. का होइगा है हमरे प्यारे गाँव का…? पहिले कइस भाईचारा रहै …? अदब , लिहाज, शर्मोहया सब नष्ट होइगा. घर पंहुचेन तौ लड़िका-बच्चा घेरि लिहिन.—

—पापा! पापा! गाँव से हमरे लिए का लाएव?
का बताइत, का लइके आयेहन. मन बहुत दुखी रहै. सोचेन टी० वी० देखी. टी० वी० खोलेन तौ आगी केरी लपटन मां धधकत एक घर देखाई पड़ा. कुछ गुंडा कूदि-कूदि के आगी लगाय रहे रहै. नेपथ्य से उदघोषक केरी आवाज आय रही रहै—– “जी हाँ! यह वही घर है…. जहाँ पं० जवाहर लाल नेहरू रहा करते थे……. जब वे पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष थे. आज वर्त्तमान अध्यक्ष के बयान से क्रुद्ध होकर सत्ताधारी दल के समर्थकों ने इसे फूँक दिया है. अध्यक्ष को हरिजन एक्ट के तहत गिरफ्तार कर जेल में ठूंस दिया गया है. विरोध प्रदर्शन जारी है….”

हम टी० वी० बंद कै दियेन. सामाजिक परिवर्तन, न्याय, और समानता केरे नाम पर नई-नई पार्टी खड़ी भई हैं. हम सोचि रहे रहन इनका लोकतंत्र केरे कौने अध्याय मां पढ़ावा जाई ..??

डॉ० ज्ञानवती दीक्षित
सीतापुर

भूपेंद्र दीक्षित : " जमाना जालिम है "

होली के अवसर पर सीतापुर जाय का मौका लगा तौ अवधी के नाम चीन्ह कवि लोगन से मुलाकात भई. उनहीं मा एक युवा कवि पुरवा दासा पुर जिला-सीतापुर निवासी कवि भूपेंद्र दीक्षित हैं , जिन केर जन्म ३० जून १९६६ मां भवा रहै , उइ आजु काल्हि समाज सेवा औ स्वतंत्र लेखन मां व्यस्त रहत हैं, इनकेर अवधी काव्य संग्रह “दुइ पात” अबहीं प्रेस मां है , यहि के अलावा भूपेंद्र जी केर निरी रचनाएँ पत्र पत्रिकन मां छपती रहती हैं. इनकेर समसामयिक कविता हिंदी औ अवधी दोनौं मां सुनै का मिलति हैं, एक बानगी देखै…

जमाना जालिम है

है जबर्दस्त सरकार , जमाना जालिम है .
शासन करैं हैलीकाप्टर औ कार, जमाना जालिम है.

हर चौराहे पर लगे मुखौटा,
दीन दुखिन का कोऊ न साथी ,
का करैं आपन सिक्का खोटा ,
लात चलावैं घोड़ा- हाथी ,
लुच्चे लफंगे बनिगे सब ,
जनता के पहिरेदार , जमाना जालिम है ..

गाँवन का है बुरा हाल ,
कोऊ न उनका पुरसा हाल.
जेबैं भरैं , भरैं घर कोठी ,
जनता कै कौन उठावैं सवाल .
छूंछे खम्भा ठाढ़ ,
ना बिजली ना है तार, जमाना जालिम है .

भ्रष्टाचारिन का है बोलबाला ,
ईमान-धरम का है मुँह है काला .
वर्दी वाले गुंडा घूमैं ,
आम आदमी के घर पर ताला .
अपराधी छुट्टा घूमैं.
अपराध करत चहुँवार , जमाना जालिम है .

सत्य अहिंसा पर जो चलिहैं
वाहिका घर फूंका जाई ,
बात न्याय की जो करिहे ,
जेल मां ऊ ठूंसा जाई ,
गर- बिटवन की इज्ज़त ,
तौ रोजै होय तार – तार , जमाना जालिम है .

– भूपेंद्र दीक्षित
१६९, प्रतिभा निवास , सीतापुर , (उ.प्र.)

 

नोट : यहि पोस्ट क ज्योत्स्ना पांडेय जी पोस्ट किहे रहीं, मुला ब्लागर से वर्डप्रेस पै लावै म तकनीकी वजह से पोस्टेड बाई म उनकै नाव नाहीं आय सका, ब्लागर वाले ब्लाग पै अहै, यहिबरे ई नोट लिखत अहन! सादर; अमरेन्द्र ..