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काका पय आलेख [१] : आलोचक विश्वनाथ त्रिपाठी

रमई काका अवधी कय सन्नाम कवि हुवयँ। अवधी अनुरागी के नाय जानत उन कय नाव! मुला इहौ सही है कि उन केरी कविताई पर जेतनी बात हुवय क चाही, ओतनी नाहीं होइ पायी हय। यहय सोचिके ‘काका पय आलेख’ कय सिलसिला चालू कीन जात अहय। बहुत लोगन से आग्रह किहेन हयँ कि वइ लिखयँ। कोसिस रहे हर महीना मा दुइ आलेख काका पय यहि बेबसाइट पय रखा जायँ। यहि योजना कय सुरुआती कड़ी ई आय,  प्रख्यात आलोचक विस्वनाथ त्रिपाठी केर आलेख ‘जनता द्वारा मूल्यांकित कवि हैं रमई काका!’ : संपादक
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जनता द्वारा मूल्यांकित कवि हैं रमई काका! : विश्वनाथ त्रिपाठी
                                                                                                                                  

यह ’४८-’४९ की बात है, भारत आजाद हो गया था। मैं बलरामपुर में पढ़ता था। बलरामपुर रियासत थी, अवध की मशहूर तालुकेदारी थी वहाँ, समझिये कि लखनऊ और गोरखपुर के बीच की सबसे बड़ी जगह वही थी। वहीं मैं डी.ए.वी. स्कूल से हाई स्कूल कर रहा था। वहाँ एक बहुत अच्छा स्कूल था, एल.सी. कहलाता था, लॊयल कॊलिजिएट, महाराजा का बनवाया हुआ था और बहुत अच्छा था। उसमें बहुत अच्छे अध्यापक होते थे। संस्कृत के पं. रामप्रगट मणि थे। उर्दू में थे इशरत साहेब जिनको हम गुरू जी कहते थे। वहाँ मुशायरे बहुत अच्छे होते थे, बहुत अच्छे कवि सम्मेलन होते थे। एक बार कवि सम्मेलन हुआ वहाँ, उसी में रमई काका आये हुए थे।

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 रमई काका के साथ एक कवि थे, ‘सरोज’ नाम में था उनके। नये कवि थे, मशहूर थे। लेकिन रमई काका ज्यादा मशहूर थे। तब रमई काका की उमर रही होगी ३५-४० के बीच में। अच्छे दिखते थे, पतले थे। काली शेरवानी पहने थे। पान खाए हुए थे। उन्होंने काव्य-पाठ किया। उन्होंने जो कविताएँ पढ़ीं, तो उसकी पंक्तियाँ सभी को याद हो गईं। अवधी में थी, बैसवाड़ी में। इतना प्रभाव पड़ा उनके काव्य-पाठ का, कि हम लोगों ने एक बार उनका काव्य-पाठ सुना और कविताएँ याद हो गयीं। कवि सम्मेलन समाप्त होने के बाद भी हम लोग उन कविताओं को पढ़ते घूमते।

जो कविता उनकी सुनी थी, उसका शीर्षक था — ध्वाखा होइगा। अभी याद है, इसकी पंक्तियाँ इस तरह हैं:
हम गयन याक दिन लखनउवै , कक्कू संजोगु अइस परिगा
पहिलेहे पहिल हम सहरु दीख , सो कहूँ–कहूँ ध्वाखा होइगा!
जब गएँ नुमाइस द्याखै हम , जंह कक्कू भारी रहै भीर
दुई तोला चारि रुपइया कै , हम बेसहा सोने कै जंजीर
लखि भईं घरैतिन गलगल बहु , मुल चारि दिनन मा रंग बदला
उन कहा कि पीतरि लै आयौ , हम कहा बड़ा ध्वाखा होइगा!
इसमें फिर तमाम स्थितियाँ आती हैं, हम कहाँ-कहाँ गये फिर वहाँ क्या हुआ। एक जो गाँव का ग्रामीण है वह शहर जाता है तो उसे अपरिचित दुनिया मिलती है। उस अपरिचित दुनिया में वह अपने को ढाल नहीं पाता। वहाँ का आचार-विचार-व्यवहार सब अपरिचित होता है। वह भी उस दुनिया में आश्चर्य में रहता है और दूसरे भी उसे लेकर आश्चर्य में पड़ते हैं। इसमें एक जगह है, दुकान में जैसे औरत की मूर्ति बनाकर कपड़े पहना देते हैं तो वह ग्रामीण उसे सचमुच की औरत समझ बैठता है, लोगों के बताने पर समझ में आता है कि ‘ध्वाखा होइगा।’ फिर एक जगह सचमुच की औरत को वह माटी की मूर्ति समझ कर हाथ रख बैठता है, स्थिति इस तरह बन जाती है, ‘उइ झझकि भकुरि खउख्वाय उठीं , हम कहा फिरिव ध्वाखा होइगा!’ बहुत अच्छी कविता है।

रमई काका की कविताएँ देशभक्ति की भावना से भरी हुई हैं। उनकी हर तरह की कविताओं में, चाहे वह हास्य कविताएँ हों, व्यंग्य की कविताएँ हों, शृंगार की कविताएँ हों; सबमें देशभक्ति का भाव रचा-बसा है। एक तो देशभक्ति का भाव दूसरे वे कविताएँ आदमी को बनाने की, संवारने की, कर्तव्य पथ पर लगाने की प्रेरणा देती थीं। एक तरफ तो कविताओं में देशभक्ति का पाठ था दूसरी तरफ वे कविताएँ एक आचार-संहिता भी इससे प्रस्तुत करती थीं; चाहे हास्य से, चाहे व्यंग्य से, चाहे करुणा से, चाहे उत्साह देकर। ये कविताएँ जीवनवादी कविताएँ भी हैं। चूँकि ये कविताएँ अवधी में थीं इसलिए बड़ी आत्मीय थीं। बड़ा फर्क पड़ जाता है, कविता कोई अपनी बोली में हो, कविता कोई राष्ट्रभाषा में हो और कविता कोई विदेशी भाषा में हो। आस्वाद में भी बड़ा अंतर पड़ जाता है।

भारत वर्ष नया नया आजाद हुआ था। उस समय बड़ा उत्साह-आह्लाद था। आशा-आकांक्षा भी थी। हालांकि विभाजन की त्रासदी झेल रहा था देश, और वह भी कविता में व्यक्त होता था। ये जो कविताएँ अवधी में हैं, भोजपुरी में हैं या दूसरी बोलियों में हैं, हम लोग समझते हैं कि इनमें ज्यादातर हास्य या व्यंग्य की ही कविताएँ होती हैं। इन कविताओं के सौंदर्य-पक्ष की कई बातों की हम उपेक्षा कर देते हैं। जैसे ‘बौछार’ की यह कविता अवधी में है, ‘विधाता कै रचना’:
जगत कै रचना सुघरि निहारि
कोयलिया बन-बन करति पुकारि
झरे हैं झर-झर दुख के पात
लहकि गे रूखन के सब गात
डरैयन नये पात दरसानि
पलैयन नये प्वाप अंगुस्यानि
पतौवन गुच्छा परे लखाय
परी है गुच्छन कली देखाय
कली का देखि हँसी है कली
गगरिया अमरित की निरमली
प्रकृति की इतनी सुन्दर कविताएँ निराला को छोड़ दीजिये तो शायद ही खड़ी बोली के किसी कवि के यहाँ मिलें। निराला की भाषा और इस भाषा में कितना अंतर है। एकदम सीधे असर! ‘जगत कै रचना सुघरि निहारि / कोयलिया बन-बन करति पुकारि’ : अब इसका आप विश्लेषण करें तो कोयल जो बोल रही है वह जगत की सुन्दर रचना को निहार करके बोल रही है। यह निहारना क्रिया अद्भुत क्रिया है। इसका उपयुक्त प्रयोग खड़ी बोली में निराला ने किया है। ‘सरोज स्मृति’ में जब सरोज के भाई ने उसे पीटा, दोनों बच्चे थे खेल रहे थे, तो पीट कर मनाने लगे सरोज को — ‘चुमकारा फिर उसने निहार’। बेचारी छोटी बहन है, रो रही है, ये सारी बातें उस निहारने में आ गयीं। ‘निहार’ का अप्रतिम कालजयी उपयोग तुलसीदास ने किया है। जनक के दूत जब दशरथ के यहाँ पहुँचे संदेश ले कर कि दोनों भाई सकुशल हैं, तो दशरथ दूतों से कहते हैं:
भैया, कुसल कहौ दोउ बारे।
तुम नीके निज नैन निहारे॥
‘निहारना’ देखना नहीं है। मन लगा कर देखने को निहारना कहते हैं। कोयलिया बन-बन पुकार रही है। यह तो सीधे लोकगीतों से आया है। हमारे यहाँ अवधी के कवि हैं, बेकल उत्साही, बलरामपुर के हैं, हमारे साथ पढ़ते थे। उनकी पहली कविता जो बहुत मशहूर हुई थी, ‘सखि बन-बन बेला फुलानि’। बन-बन का मतलब सर्वत्र।

ये हमारे जो कवि हैं, अन्य को दोष क्या दूँ मैंने भी नहीं किया यह काम, जिनके अंदर सौंदर्य है उनका विश्लेषण हम लोग नहीं करते। बाकी कविताओं का तो करते हैं। होता यह है कि फिर ये हमारे कवि उपेक्षित रह जाते हैं। जो इनके योग्य है, वह इन्हें मिलता नहीं है। दुर्भाग्य कुछ ऐसा है कि जिन लोगों ने अवधी भाषा को, इसके सौंदर्य को ऊपर उठाने का जिम्मा ले रखा है जोकि अच्छा काम है लेकिन मैं इस अवसर पर जरूर कहना चाहता हूँ कि उन लोगों की गतिविधियों को देख करके ऐसा नहीं लगता कि ये लोग सचमुच किसी उच्च आदर्श से, देशप्रेम से या अवधी के प्रेम से काम कर रहे हैं। कभी-कभी तो यह शक होने लगता है कि वे अपने छोटे-छोटे किसी स्वार्थ से लगे हुए हैं। ऐसे में भी ये कवि उपेक्षित रह जाते हैं। ऐसे ही कवियों में रमई काका भी हैं। वरना जरूरत तो यह है कि बहुत व्यापक दृष्टि से इन कवियों का पुनर्मूल्यांकन क्या कहें, मूल्यांकन ही नहीं हुआ है, यह किया जाय। लेकिन जनता ने इनका मूल्यांकन किया है। अभी भी जहाँ रमई काका की कविताएँ पढ़ी जाती हैं, लोग सुनते हैं, उन पर इनका असर होता है।

(प्रस्तुति: अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी। यह लेख विश्वनाथ त्रिपाठी जी द्वारा ‘बोला’ गया, जिसे बाद में लिपिबद्ध किया गया।)

अवधी साहित्य के शिखर साहित्यकार चंद्रभूषण त्रिवेदी ‘रमई काका’

ई आलेख बिख्यात अवधी साहित्यकार रमई काका के ऊपर लिखा गा हय जौन हमैं नवंबर-१५ मा दोस्त हिमांशु बाजपेयी के जरिये मिला रहा। यानी, काका केरी जन्म-शताब्दी-वर्ष मा। यहिका चित्रलेखा जी लिखिन हँय। हम उन कय आभारी हन। : संपादक
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*चित्रलेखा वर्मा

हिन्दी साहित्य जगत में साहित्यिक प्रतिभा के धनी, अवधी के लोक-नायक, यशस्वी चंद्रभूषण त्रिवेदी का विख्यात नाम ‘रमई काका’ है। आधुनिक अवधी काव्य की परिधि अत्यंत विस्तृत है और रमई काका अवध क्षेत्र के सर्वप्रिय जनकवि हैं।  

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रमई काका

आपका जन्म २ फरवरी १९१५ में जनपद उन्नाव के रावतपुर नामक गाँव में हुआ था। आपके पिता पं. वृंदावन त्रिवेदी फौज में नौकरी करते थे तथा प्रथम विश्व युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुए। उस समय वे केवल एक वर्ष के थे। काका की आत्मकथा से पता चलता है कि पिता की मृत्यु के बाद माँ गंगा देवी को सरकार से कुल तीन सौ रूपए मिलते थे जिनसे वे अपने परिवार को चलाती थीं। इस तरह उनका बचपन संकटों और कष्टों में बीता। पर आपका लालन-पालन इस तरह से हुआ कि ग्राम संस्कृति काका के जीवन का पर्याय बन गयी क्योंकि आपकी प्राथमिक शिक्षा ग्रामीण वातावरण में हुई थी। हाई स्कूल की परीक्षा अटल बिहारी स्कूल से उत्तीर्ण की। इसके पश्चात आपने नियोजन विभाग में निरीक्षक का पद सम्हाला। निरीक्षक पद  का प्रशिक्षण लेने के लिए वे मसौधा-फैजाबाद में कुछ समय रहे। अपने प्रशिक्षण काल में भी आपने अपनी प्रतिभा से प्रशिक्षकों को प्रभावित किया। यहाँ उन्होंने कई कविताएँ लिखीं तथा कई एकांकियों का मंचन भी किया।

‘गड़बड़ स्कूल’ एकांकी ने यहाँ के लोगों का बहुत मनोरंजन किया। यहाँ के बाद उनकी नियुक्ति उन्नाव के बोधापुर केंद्र में हो गयी। यहाँ इन्होंने बहुत मेहनत की। फलतः इनके केंद्र को संपूर्ण लखनऊ कमिश्नरी में प्रथम स्थान मिला। उन्हें गवर्नर की ‘सर हेनरी हेग शील्ड’ प्रदान की गयी। इस केंद्र पर काम करते हुए काका ने एक बैलगाड़ी बनायी जिसमें बालवियरिंग का प्रयोग हुआ था तथा ढलान से उतरते समय उसमें ब्रेक का भी प्रयोग किया जा सकता था।

यद्यपि आपने शास्त्रीय एवं सुगम संगीत का विधिवत प्रशिक्षण नहीं लिया था परंतु अपनी प्रतिभा के ही बल पर शास्त्रीय और सुगम संगीत का ज्ञान प्राप्त किया। २७ वर्ष की उम्र में १९४१ में काका लखनऊ आकाशवाणी में नियुक्त हुए और स्थानीय रूप से लखनऊ में बस गये। काका आकाशवाणी में ६२ वर्ष की आयु तक रहे और १९७७ में सेवानिवृत्त हुए। इसके दो वर्ष बाद दो-दो वर्षों के लिए उनका सेवाकाल बढ़ाया भी गया। सेवानिवृत्ति के बाद भी वे निष्क्रिय नहीं हुए और आकाशवाणी, दूरदर्शन, समाचार पत्र, पत्रिकाओं और कवि सम्मेलनों से जुड़े रहे। आकाशवाणी पर आपने अनेक भूमिकाएँ भी निभायीं। सन्तू दादा, चतुरी चाचा, बहिरे बाबा आदि उनकी भूमिकाएँ थीं। रमई काका के अतिरिक्त उनको बहिरे बाबा के नाम से भी ख्याति मिली। बहिरे बाबा धारावाहिक ने तो प्रसारण का कीर्तिमान स्थापित कर दिया था। यह धारावाहिक २५ से भी अधिक वर्षों तक आकाशवाणी से प्रसारित हुआ।

यद्यपि काका स्थायी रूप लखनऊ में रहे पर उनका संपर्क गाँव से जीवन भर बना रहा। शहर में रहते हुए आपने अपने ग्रामीण मन को बचाए रखा। रमई काका का काव्य अवध के गाँव से बहुत गहराई से जुड़ा होने के कारण आकाशवाणी (पंचायत घर), दूरदर्शन और एच.एम.वी. के रिकार्डर के माध्यम से उनकी कविताएँ अवध अंचल में रच-बस गयीं। ‘मौलवी’ रमई काका की पहली उपलब्ध कविता है। यह कविता उन्होंने ‘पडरी’ के मिडिल स्कूल में पढ़ते हुए लिखी थी। इस कविता पर काका के अपने गुरु पं. गौरीशंकर जी से आशीर्वाद मिला था कि काका एक कवि के रूप में विख्यात होंगे।

रमई काका हास्य-व्यंग्य कवि के रूप में काफी विख्यात रहे। उनकी प्रकाशित तीन कविताओं में ‘फुहार’,‘गुलछर्रा’ तथा ‘हास्य के छींटे’ हास्य-व्यंग्य रचनाओं ही संकलन हैं। ‘बौछार’ उनकी प्रथम और ‘भिनसार’ उनकी दूसरी कृति है। इन दोनों पुस्तकों में अधिकतर व्यंग्य रचनाएँ हैं। इनके बारे में संक्षिप्त जानकारी इसप्रकार है, बौछार १९४४ ई. में छपी। बौछार ग्रामजीवन, प्रकृति-चित्रण, छायावादी काव्य, राष्ट्रप्रेम, सामाजिक भावना और जनवाद से प्रेरित ३० कविताओं का संकलन है। भिनसार में ४२ कविताएँ हैं। इसकी कविताएँ वर्षा की बूँदों से तन-मन को भिगोती हुई हास्य-व्यंग्य की मिठास से भरी हैं। ‘नेता जी’ सुभाषचंद्र बोस पर लिखा गया है। यह आल्ह छंद में लिखा गया है। परंपरागत शैली में लिखा वीर रस का यह अनूठा काव्य है।

‘हरसति तरवारि’ तथा ‘माटी के बोल’ शीर्षक पुस्तकों में अधिकांश गीत रचनाएँ हैं, ये लोकधुनों पर आधारित हैं। हास्य के छींटे, गुलछर्रा, तीर के समान प्रहार करती हुई उत्कृष्ट व्यंग्य उकेरती हुई पाठकों का मनोरंजन करती हैं। ये खड़ी बोली की कविताओं के संकलन हैं। सभी काका के जीवन के उत्तरार्ध में लिखी गयी थीं। शेष सभी संकलनों की भाषा अवधी है।

इनकी पुस्तकें हजारों-लाखों की संख्या में छपीं और बिकीं।

काका की तीन नाट्य-कृतियाँ भी प्रकाशित हुई थीं। ‘रतौंधी’ पुस्तक में आठ तथा ‘बहिरे बोधन बाबा’ शीर्षक पुस्तक में ७ एकांकियाँ-नाटक संकलित हैं। काका की खड़ी बोली की चार एकांकियों का एक संकलन जुगनू नाम से प्रकाशित हुआ था। ‘कलुवा बैल’ एक अवधी उपन्यास भी आपने लिखा पर यह प्रकाशित नहीं हो सका। ‘स्वतंत्र भारत सुमन’ पत्रिका में यह धारावाहिक के रूप में छपा था।

काका की कई गंभीर रचनाओं-लेखों के संकलित रूप का प्रकाशन आज तक नहीं हो पाया, यद्यपि इस संकलन की अधिकांश कविताएँ ‘भिनसार’ और ‘बौछार’ में प्रकाशित हो चुकी थीं। किन्तु अनेक महत्वपूर्ण रचनाएँ अभी भी अप्रकाशित हैं। इन रचनाओं में ‘भोर की किरन’, ‘सुखी कब होहिहै गाँव हमार’, ‘गाँव है हमका बहुत पियार’, ‘छाती का पीपर’ आदि अनेक लोकप्रिय कविताएँ हैं। काका के नाठकों का एक बहुत बड़ा भाग आज भी अप्रकाशित है। ‘हंस किसका है’ शीर्षक एक बालोपयोगी एकांकियों का संकलन है। यह अगर प्रकाशित हो तो बालकों के लिए बहुत महत्वपूर्ण सिद्ध हो सकता है।

वृद्धावस्था में ब्रांकाइटिस रोग से वे पीड़ित थे। अन्त में १९८२ की फरवरी में इतने बीमार हो गये कि फिर सम्हल ही नहीं पाए और अंत में १८ अप्रैल १९८२ की प्रातःकाल को उनका निधन हो गया। उनका गाँव से मोह तो था ही पर वे बहुत सुसंस्कृत नागरिक थे। साधारण रहन सहन वाले चंद्रभूषण त्रिवेदी तुलसी, गांधी और आर्यसमाज के विचारों से प्रभावित थे। उनका गाँव आर्यसमाज का गढ़ था तथा पं. प्रयागदत्त, जो वेदों के प्रकाण्ड पंडित थे, उस गाँव में रहते थे।

वे असाधारण मेधा वाले रचनाकार तो थे ही साथ में उनको लेखक, नाटककार, अभिनेता और संगीतज्ञ के रूप में भी कम सम्मान नहीं मिला। रमई काका के विपुल साहित्य की अनुपलब्धता के कारण उनके साहित्य को पढ़ने का उत्सुक एक बड़ा पाठक समुदाय अधिकांशतः अपने को हताश-निराश और निरुपाय अनुभव करता है। रमई काका के समग्र साहित्य का मूल्यांकन भी होना शेष है। रमई काका का साहित्य सर्वजन को सुलभ हो सके, इसका भी कुछ प्रयास होना चाहिए।

अवधी कविता के शिखर साहित्यकार रमई काका केवल किसानों के कवि नहीं, स्वयं भी कविता के किसान थे जिन्होंने कागज रूपी धरती पर अक्षर बीज बो कर मुस्कान और हास्य की जो फसल तैयार की है वह आज तक पाठकों को हँसाती और गुनगुनाती है।

चित्रलेखा वर्मा

चित्रलेखा वर्मा

इस शताब्दी वर्ष में हास्य के अमर कवि रमई काका के चरणों में अपना शत शत नमन निवेदित करते हुए ईश्वर से यही प्रार्थना करती हूँ कि काका की अमर कृतियों की प्रेरणा से सभी पाठकों व रचनाकारों में हँसाने की क्षमता प्राप्त हो।

(नवंबर-२०१५)

बजार के माहौल मा चेतना कै भरमब .. रमई काका कै कविता ” ध्वाखा ” … …

पढ़ैयन का राम राम !!!
‘ अवधी कै अरघान ‘ की महफ़िल मा आप सबकै स्वागत अहै ..
स्त – व्यस्त जीवन , दौड़ – भाग , यनही सबके बीचे मा ई अवधी ब्लाग पै काफी समय से कुछ नाहीं आय पावा , जात्रा-बरनन चलत रहा पिछली पोस्ट मा , वहकै ‘स’ हिस्सा कै बिधान नहीं बनि पावा अउर अब देखित है तौ यादन कै तल्ली खियाई मिलत है .. अब देखौ कब लिखी वहका ! .. आज फिलहाल प्रिय कवि रमई काका कै यक कविता रखि के आपन बात ख़तम करब .. रमई काका कै कविता ” ध्वाखा ” ( यानी धोखा ) बहुचर्चित कविता है , ई कविता इंटरनेट पै आय जाय , हमार ई कोसिस अहै .. यहि कविता का उपलब्ध करावै मा रमई काका के सपूत अरुण काका कै भूमिका है .. ई कविता के फरमाईस पै वै हमैं यहिका हाथेस लिखि के बाई पोस्ट भेजिन .. अरुण जी का धन्यवाद !
कविता पै : यहि कविता मा लखनऊ के बजार मा यक गाँव कै मनई पहुँचत है , कक्कू संबोधन वही मनई या खुद रमई काका के लिए है .. बजार के माहौल मा मनई कै चित-भ्रम होइ जात है .. वैसउ बजार कै बजार भ्रम पै ज्यादा टिकी अहै .. अइसनै कबीर बजार मा लुकाठी लै के नाहीं पहुँचते , सायद झूठ – भ्रम जलावै कै सूझी हुवै कवि महराज का और चिल्लाय दिहे हुवें कि ‘ जो घर फूंकै आपना चलै हमारे साथ ! ‘ .. बहरहाल .. मनई लखनऊ मा भरम के चलते बार बार उल्लू बनत है .. बजार अनात्मीय माहौल पैदा करत है  .. जहाँ सहज पहिचान मिटत है .. मनई कईव प्रसंगन मा कहै के लिए बाध्य है — ” हम कहा फिरिव ध्वाखा होइगा ” ! .. अचरज हुवत है कि चालीस के दसक मा रमई काका बजारवाद कै केतनी सही नब्ज पकरत रहे .. गाँव की आँख से देखत रहे नए फैसन का , अंगरेजी फैसन का ! .. सुमित्रा नंदन पन्त के तरीके से रमई काका का कहै कै जरूरत नाहीं महसूस हुवत कि  ‘ देख रहा हूँ आज विश्व को मैं ग्रामीण नयन से ‘ ! .. काका कै पूरा काव्य बड़े सहज ढंग से ग्राम-गाथा है , किसान-गाथा है ! .. आज हिन्दी साहित्य मा गाँव अउर किसान कै बिदाई अफ़सोसनाक है ! .. काका की कविता से सुकून मिलत है कि कविता अबहिउं हमैं चेतावत है ! .. अब कविता प्रस्तुत अहै ——— 
कविता : ” ध्वाखा ” 

हम कहा बड़ा ध्वाखा होइगा !

[ १ ] 

हम गयन याक दिन लखनउवै , कक्कू संजोगु अइस परिगा |
पहिलेहे पहिल हम सहरु दीख , सो कहूँ – कहूँ ध्वाखा होइगा —
जब गएँ नुमाइस द्याखै हम , जंह कक्कू भारी रहै भीर | 
दुई तोला चारि रुपइया कै , हम बेसहा सोने कै जंजीर ||
लखि भईं घरैतिन गलगल बहु , मुल चारि दिनन मा रंग बदला |
उन कहा कि पीतरि लै आयौ , हम कहा बड़ा ध्वाखा होइगा || 

[ २ ]

म्वाछन का कीन्हें सफाचट्ट , मुंह पौडर औ सिर केस बड़े |
तहमद पहिरे कम्बल ओढ़े , बाबू जी याकै रहैं खड़े || 
हम कहा मेम साहेब सलाम , उई बोले चुप बे डैमफूल |
‘मैं मेम नहीं हूँ साहेब हूँ ‘ , हम कहा फिरिउ ध्वाखा होइगा || 
[ ३ ] 

हम गयन अमीनाबादै जब , कुछ कपड़ा लेय बजाजा मा |
माटी कै सुघर महरिया असि , जहं खड़ी रहै दरवाजा मा ||
समझा दूकान कै यह मलकिन सो भाव ताव पूछै लागेन |
याकै बोले यह मूरति है , हम कहा बड़ा ध्वाखा होइगा || 

[ ४ ]  

धँसि गयन दुकानैं दीख जहाँ , मेहरेऊ याकै रहैं खड़ी |
मुंहु पौडर पोते उजर – उजर , औ पहिरे सारी सुघर बड़ी ||
हम जाना मूरति माटी कै , सो सारी पर जब हाथ धरा |
उइ झझकि भकुरि खउख्वाय उठीं , हम कहा फिरिव ध्वाखा होइगा || 

————— रमई काका 

आज जब माल-कल्चर हमरी सुध-बुध की लीलति अहै , ई कविता औरउ प्रासंगिक है ! 

भैया , ई रही कविता .. कस लाग ? बतावैं ! 
राम राम !!! 

आभार –
अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी 

कार्टून – गूगल बाबा की मेहरबानी से 

रमई काका के जनम दिन पै यक कविता : ” धरती हमारि ” …

पढ़ैयन का राम राम !!!
‘ अवधी कै अरघान ‘ की महफ़िल मा आप सबकै स्वागत अहै ..
आज रमई काका कै जनम दिन आय .. काका कै जनम २  फरौरी १९१५ मा भा रहा ..  अबहीं कुछ देरि पहिले 
काका जी के सुपुत्र सिरी अरुण त्रिवेदी जी से बात भै , काका के जनम दिन के निस्बते  .. का करी ! .. कीन तौ 
बहुत कुछ चाहित है .. काका जी से जुड़ा जाने केतरा काम करै का बाकी अहै , लेखन के स्तर पै .. मुला बहुत बड़ा दुर्भाग्य पूरे अवध अंचल कै अउर हम – आप जैसे काव्य प्रेमिन कै ई अहै कि यतने दिन बादौ काका यस महान कवि कै ‘ग्रंथावली’ नाय आय पायी अहै .. जाने केतना जने बस कवितन कै सुवाद याद करत हैं लेकिन पढ़ै का नाय पउते .. बस यहै बिनती है भगुवान से कि कैसेउ ई ग्रंथावली आइ जात !!! 
             आज यही मौके पै काका जी कै यक बहुत नीक कविता आप सब के सामने रखा चाहित अहन ..कविता कै सीर्सक है — ” धरती हमारि ” .. हियाँ किसान अउर धरती कै प्यार देखा जाय सकत है .. किसान कै मेहनत देखै लायक है ..
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                                                             कबिता : धरती हमारि 
                                                   
                                     धरती हमारि ! धरती हमारि ! 

है धरती परती गउवन कै औ ख्यातन कै धरती हमारि |

                                      धरती हमारि ! धरती हमारि ! 

हम अपनी छाती के बल से धरती मा फारु चलाइत है |

माटी के नान्हें कन – कन मा , हमही सोना उपजाइत है ||

अपने लोनखरे पसीना ते ,रेती  मा ख्यात बनावा हम  |
मुरदा माटी जिन्दा होइगै,जहँ लोहखर अपन छुवावा हम  ||
कँकरील उसर बीजर परती,धरती भुड़गरि नींबरि जरजरि |
बसि हमरे पौरख के बल ते,होइगै हरियरि दनगरि बलगरि ||
हम तरक सहित स्याया सिरजा , सो धरती है हमका पियारि …
                                         धरती हमारि ! धरती हमारि ! 
हमरे तरवन कै खाल घिसी , औ रकत पसीना एकु कीन |
धरती मइया की सेवा मा , हम तपसी का अस भेसु कीन ||
है सहित ताप बड़ बूँद घात , परचंड लूक कट – कट सरदी |
रोंवन – रोंवन मा रमतु रोजु , चंदनु अस धरती कै गरदी || 
ई धरती का जोते – जोते , केतने बैलन के खुर घिसिगे |
निखवखि,फरुहा,फारा,खुरपी,ई माटी मा हैं घुलि मिलिगे ||
अपने चरनन कै धूरि जहाँ , बाबा दादा धरिगे सम्हारि … 
                                         धरती हमारि ! धरती हमारि ! 
 हम हन धरती के बरदानी ,जहँ मूंठी भरि छाड़ित बेसार |


भरि जात कोंछ मा धरती के,अनगिनत परानिन के अहार||
 ई हमरी मूंठी के दाना , ढ्यालन की  छाती फारि – फारि |
हैं कचकचाय के निकरि परत,लखि पुरुख बल फुर्ती हमारि||
 हमरे अनडिगॆ पैसरम के , हैं साक्षी सूरज  औ अकास  |
परचंड अगिन जी बरसायनि,हमपर दुपहर मा जेठ मास ||
ई हैं रनख्यात  जिन्दगी के ,जिन मा जीतेन हम हारि-हारि … 
                                          धरती  हमारि ! धरती  हमारि !

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(आप चाहैं तौ काका के बारे मा पिछली दुइ पोस्टन का पढि सकत  हैं … ) 

रमई काका कै कबितन कै यक बानगी ..

पढ़ैयन का राम राम !!!
आज कै प्रस्तुति रमई काका कै कबितन कै बानगी के रूप मा अहै  | काका जी कै जीवन-चरित और चित्र के लिए परयास  जारी अहै अउर जैसे ही सफलता मिले यक पोस्ट बनाइ के आप सबके सामने प्रस्तुत करब |
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                                              रमई  काका कै कबितन कै यक बानगी ..
                 रमई काका कै  कबिता पै बरिष्ठ आलोचक डा. राम बिलास सर्मा कै मान्यता गौर करै लायक है —
”उनकी गंभीर रचनाओं में एक विद्रोही किसान का उद्दात्त स्वर है , जो समाज में अपने महत्वपूर्ण स्थान को
पहचान रहा है और अधिकार पाने के लिए कटिबद्ध हो गया है | ‘ धरती हमारि ‘ इसी कोटि की श्रेष्ठ रचना है | ”
‘ धरती हमारि ‘ से कुछ पंक्तिन का  देखब समीचीन होये —
‘ हम हन धरती के बरदानी ,जहँ मूंठी भरि छाड़ित बेसार |
भरि जात कोंछ मा धरती के,अनगिनत परानिन के अहार||
 ई हमरी मूंठी के दाना , ढ्यालन की  छाती फारि – फारि |
हैं कचकचाय के निकरि परत,लखि पुरुख बल फुर्ती हमारि||
 हमरे अनडिगॆ पैसरम के , हैं साक्षी सूरज  औ अकास  |
परचंड अगिन जी बरसायनि,हमपर दुपहर मा जेठ मास ||
ई हैं रनख्यात  जिन्दगी के ,जिन मा जीतेन हम हारि-हारि |
                धरती हमारि ! धरती हमारि ! ”
काका जी कै कबिता अस है कि जौन जन-सामान्य की सीधे समझ मा आय जाय | काका की सफलता कै
रहस्य इहै समझौ | इनकै कबिता चौपाल मा , किसानन के खेत मा , मेलन मा , चौराहन पै सहजै मिलि जात
है | ‘ भिनसार ‘, ‘बौछार ‘,’फुहार ‘,’गुलछर्रा ‘, ‘नेताजी ‘ जैसे काब्य-संग्रह हजारन की संख्या मा छपे अउर बिके |
जन-जुड़ाव इनकी कबिता कै प्रयोजन  रहा —
‘ हिरदय की कोमल पंखुरिन मा,जो भंवरा अस ना गूँजि सकै |
 उसरील  हार  हरियर  न  करै , टपकत  नैना  ना  पोंछि सकै |  
 जेहिका  सुनिकै  उरबंधन  की  बेडी  झनझनन  न  झंझनाय |
 उन  प्रानन  मा  पौरूख  न भरै , जो अपने पथ पर डगमगाय |
अन्धियारू  न दुरवै सबिता बनि, अइसी कबिता ते कौनु लाभ ?”
गांव कै जेतरी सुन्दर तस्बीर काका जी के कबितन मा मिले वतरी सुन्दर कहूँ अउर मुस्किलई से | गांव कै
सांसकिरतिक-बिम्ब देखै के लिये ई कबिता कै दरसन कीन जाय सकत है —
” सुनत मन बिरहा क्यार बिरोग , ख्यात कै ढ्याल चूर ह्वै जायं |
 अगिनी अस आल्हा  कै  ललकारि , कायरौ सुनै , सूर  ह्वै जायं |
 बसे घर – घर मा ‘ तुलसीदास ‘, सिखावै धरम – करम आचार |
 घुसे  हरिजन  के  घरन  कबीर ,  चिकारन  के  घर पलटूदास |
 कन्हैया  नैनू   ढ़ूढत   फिरैं ,  सूर  के  हिरदय  हरस –  हुलास |
 घाघ  हैं  ख्यातन  के रखवार  ,  गांव  है हमका  बहुत पियार |
 करमठी  ये  लोहे  के हाँथ , तड़क्के  छक – छक  चलैं  गंडास |
 तपस्यै  मयिहाँ  बीती जाति , हियाँ  कै यक-यक साँस उसांस |
 अपनहे  हाँथ  अपन  तलवारि ,  गांव है  हमका  बहुत  पियार |”
काका जी कै कबिता कै यक बहुत बड़ी बिसेसता है – प्रकृति कै सहज अउर मर्मस्पर्सी चित्रन | संसकीरत के
कबियन  के नाईं काका  बिराट बिम्बन  कै रचना करत हैं | किरण कै बरनन इतना सहज सायदै कहूँ मिलै —
‘ नीचे उतरि किरिनिया चौका लगाइ दीन्हिसि |
…खटिया तरे लखत हैं लरिका अजब तमासा |
 किरनें  चुवाय  दीन्हिन  हैं  धूप  के  बतासा |
  पूरब  कै  लाल  गैया  नभ  मा पन्हाय  गैहै |
  किरनन  कै धार  दुहिकै  धरती  नहाय  गैहै | ”
हास्य  रस पै तौ काका कै महारथ हासिल अहै  | हास्य भी अस हैं जौन सोचै पै मजबूर करत हैं , महज फुलझड़ी
नाय हैं | यक उदाहरन ठीक परे — लखनऊ मा यक बज्र दिहाती जात है अउर ऊ यक फैसनेबुल नर का नारी
समझ  लियत है , अब देखौ कबिता मा यही बात —
” म्वाछन का कीन्हें सफाचट्ट,मुख पौडर औ सिर केस बड़े |
    लूंगी पहिरे ,  चद्दर  ओढ़े ,  बाबू  जी  बाएँ  रहे  खड़े |
    हम कहेन मेमसाहेब सलाम, उइ कहिन अबे चुप डैमफूल |
                                       हम कहेन फिरिव ध्वाखा ह्वैगा || ”
जात-जात काका जी के कबितन मा ‘उत्प्रेक्षन’ पै आपकै ध्यान दिलावा चाहित है —
०  गिरी थारी अइसी झंनाय ,
    कबौं  छंउकन अइसी खउख्याँय |
    पटाका अइसी दगि – दगि जांय |
०   उइ उछरे लवा मकाई अस |
०   लरिकौनू गर्जैं बादर अस , बहुरेवा तड़पै बिजुरी असि |
०    बिजकुहर बैला अस फन्नआय |
०    उइ लकरी अइसी तुरती हैं , औ उइ चैला अस फारत हैं |
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रमई काका कै कबिता : यह छीछाल्यादरि द्याखौ तो …



पढ़ैयन  का राम राम !!!
    पहिले हम माफी मागत अहन उन लोगन से जे कौवा-बगुला संबाद देखै की आसा से 
    आये होइहैं …अब कारन बतावा चाहित अहन…हमसे कइव जने ई सिकाइत दर्ज किहिन
    कि लगातार संबाद चले से मामिला बड़ा गंभीर ह्वै जात अहै …उनकै कहब रहा कि कुछ 
    रस-बदल भी करै का चाही …भइया ! पंचन के राय कै सम्मान करब भी तौ जरूरी अहै!
   …यही वजह से हम ई फैसला किहेन कि यक अत्तवार का तौ  ‘ कौवा-बगुला संबाद ‘रहे 
   लेकिन यकये ( यानी दुसरके ) अत्तवार का अउर चीजैं…जैसे आज कै प्रस्तुति …

रमई काका कै कबिता : यह छीछाल्यादरि द्याखौ तो …

         [ रमई काका बिस्व-कबि तुलसीदास के बाद सर्बाधिक लोकप्रिय अवधी कै कबि हुवैं |
          इनकी अवधी मा बैसवाड़ी कै छौंक देखी जाय सकत है | आकासवानी से काका जी कै 
          कार्यक्रम सुनै के खातिर जाने केतना जने  रेडियो खरीदिन … काका जी  कै पूरा नाव
        रहा – चंद्रभूसन तिरबेदी | जन्मा रहे – १९१५ मा अउर निधन भवा – १९८२ मा | काका 
           जी कै प्रस्तुत कबिता अंगरेजी के परभाव कै सांसकिरतिक  समीछा करति अहै …]


” लरिकउनू बी ए पास किहिनि, पुतहू का बैरू ककहरा ते।

वह करिया अच्छरू भैंसि कहं, यह छीछाल्यादरि द्याखौ तो।


दिनु राति बिलइती बोली मां, उइ गिटपिट गिटपिट बोलि रहे।

बहुरेवा सुनि सुनि सिटपिटाति, यह छीछाल्यादरि द्याखौ तो।


लरिकऊ कहेनि वाटर दइदे, बहुरेवा पाथर लइ आई।

यतने मा मचिगा भगमच्छरू, यह छीछाल्यादरि द्याखौ तो।


उन अंगरेजी मां फूल कहा, वह गरगु होइगे फूलि फूलि।

उन डेमफूल कह डांटि लीनि, यह छीछाल्यादरि द्याखौ तो।


बनिगा भोजन तब थरिया ता, उन लाय धरे छूरी कांटा।

डरि भागि बहुरिया चउका ते, यह छीछाल्यादरि द्याखौ तो।


लरिकऊ चले असनान करै, तब साबुन का उन सोप कहा।

बहुरेवा लइकै सूप चली, यह छीछाल्यादरि द्याखौ तो। ”
                                     
                                                      ————- रमई काका