Category Archives: awadhi translation

मनहँग मन हर दवाई ले बढ़िके है!

काल्हि-परौं, ई  खबर तेजी से फैली कि नोबल सम्मानित गाबरियल गार्सिया मार्खेस इसमिरिति लोप की बेरामी कै सिकार  हुअत जात अहैं। ई बात मार्खेस कै भाय बताइन। यहिके पहिलेव मार्खेस के बारे मा अफवाहन के रूप मा खबरै आय चुकी हैं, लेकिन यहि खबर कै सच्चाई यहि बात से होइ सकत है कि ई खबर उनकै भाय खुदै बतावत अहैं। उनके भाय कै यहौ कहब है कि वै हँसत-खेलत सुभाव नाहीं छोड़े अहैं, पहिलेन की नाईं ह्यूमर देखावत अहै।  हम सब मार्खेस के बढ़िया तबियत के ताईं भगवान से बिनती करित है। मार्खेस के कुछ चुनिन्दा कथनन कै अवधी अनुवाद: 

मनहँग मन हर दवाई ले बढ़िके है। 

हमेसा कुछ न कुछ प्यार के हिस्से बचिन जात है।

जौन महसूस करौ तौन कहौ। जौन सोचौ तौन करौ..।

असिल दोस्त ऊ है जे बाँह थाम्हे रहै औ करेज छुये रहै।

मनई कै तीन जिंदगी हुअत है; सबका देखाइ के, निजी बनाइ के, सबसे छुपाइ के।

तोहरे साथ काव बीती, यहिसे ज्यादा अहम यू बात है कि तू जिंदगी मा वहिका केतना औ कैसे सुधियात हौ। 

यू गलत बात है कि मनई बुढ़ाय लागत है तौ खुआबन क लैके उदासीन हुवै लागत है, बलुक यहि खुआबी उदासीनता से मनई बुढ़ाय लागत है।

[ अवधी अनुवाद : अमरेन्द्र ] 

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कविता : हम का पढ़उबै (निजार कब्बानी)

कविता : हम का  पढ़उबै  (निजार कब्बानी)

हम का पढ़उबै 
तुहैं प्रेम-पोथी !/? 
        मछरिया क तैरै 
        भला के सिखाइस 
        चिरैया क बिचरै 
        भला के बताइस. 
हम का पढ़उबै 
तुहैं प्रेम-पोथी !/? 
        अपनेन भरोसे 
        पनिया म लहरौ 
        अपनेन भरोसे 
        अकसवा म छहरौ. 
हम का पढ़उबै 
तुहैं प्रेम-पोथी !/? 
        किताबै सिखाइन 
        कब ढाई-आखर? 
        तारीखी आसिक 
        भये  हैं निरच्छर. 
हम का पढ़उबै 
तुहैं प्रेम-पोथी !/?

[ मूल : निजार कब्बानी केरि  कविता / अनुवाद : अमरेन्द्र ] 

अकेलै बढ़ौ हो!

कविवर रवींद्र नाथ टैगोर कै ‘एकला चलो रे’ मनै-मन बहुत सालन से गुनगुनात रहेन। मन का आसा से भरै वाला ई गीत हमैं सुकून दियत है, अइसे बहुतन क दियत होई। आज यहिका मनोज जी के पोस्ट पै जाइके अर्थ से तान भिड़ाइ के सुनेन, किसोर कुमार साहिब की आवाज मा। मन मा आवा कि लाओ यहिकै अवधी अनुवाद करी। जौन बनि परा किहेन। अब पढ़ैया लोगै बतावैं कि केतना बनि पावा है! 

अकेलै बढ़ौ हो!

केउ न सुनै जउ पुकार,
अकेलै बढ़ौ हो!

केउ कहै-सुनै न कुछू,
मुँह फिराइ लेइ।
अस अभागि जागि जाइ,
भय दिखाइ देइ।
अपने मुँहे अपन बाति,
मन मा गहौ हो!
..अकेलै बढ़ौ हो! 

डगर-डगर काँट भरी,
केऊ नहीं पास।
अस अभागि जागि जाइ,
दूर जाँय खास।
राह-राह, काँट-काँट,
रउँदि चलौ हो!
..अकेलै बढ़ौ हो! 

जउ अँजोर केउ न करै,
स्याह राति होइ।
अस अभागि जागि जाइ,
बवंडर झँकोइ।
हिये पीर-अगन कइ,
अँजोर करौ हो!
..अकेलै बढ़ौ हो!

[मूल(बांग्ला) – रवींद्र नाथ टैगोर, ‘एकला चलो रे’ / अनुवाद(अवधी) – अमरेंद्र]