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अवधी कहानी : हम कौनो कै टट्टी नाय खाये रे : नीरज के. गुप्ता

ई  कहानी  नीरज के. गुप्ता  कै लिखी आय।
वै  अयोध्या  फैजाबाद  मा  रहत हयँ। उमिर
पैंतिस साल। अवधी लिखय कै सौक रक्खत
हयँ।  खास  कयिके  डायरी मा। : संपादक
  • अवधी कहानी : हम कौनो कै टट्टी नाय खाये रे
Captureमनोहर यादव दुपहर मा खेत से घरे आइन त देखेन कि ओनके घर पै भीड़ लागि अहै। भीड़ चीर कै जब वै अंदर गइन त देखिन कि ओनकै लरिका जगनवा कै मूड़ फाट अहै, खून कै धार बहति अहै औ मनोहरा क मेहरारू भोकार मार कै रोअ्ति अहै।
“अरे का भय जगनवा कै माई! तनी चुप हो औ बताव ई के किहिस??”
“का बताई हो मालिक! लरिकौना खेलै खातिर गय रहा पुरुब टोला मा… ह्‌वईं चौधरी परधान कै दूनौं लरिकै कौनो बात पै गुम्मा चलाए दिहे्न, बस हमरे बाबू कै कपार फार डारिन कुल निबहुरै! भैया दौरत आइन त हम ई कपड़ा बाँध दिहे हई, तू तनी जाय कै भोला डागदर का बलाय लावा”
“जाइत है हम, तू चुप होइकै बैठा… डागडर आय जांय त पता करी का बात रही जोन मूड़ फोर दिहिन ओन्हने”
मनोहर डागडर भोला का बुलाय कै लै आइन, डागडर आइन… दुई ठो टाँका लगाइन औ पट्टी बाँधि गये जगनवा का… नींद कै गोली खाय कै जगन बाबू सोय गए। ओहर डागडर भोला आपन फीस 200 रुपया लइकै कल्ले मंह चलत बने।
धीरे-धीरे भीड़-ओड़ हटै लागि, के चले आन के लफड़ा महैं आपन गोड़ जोतै…
डागडर के जाय के बाद मनोहरा साईकिल उठाइस औ पहुँच गय परधान रामसूरत चौधरी के इहाँ
“अरे आवा हो मनोहर! कइसन आवै क भय?”
“परधान जी, एक बात कहै क रही”
“हाँ.. हाँ… तौ निसंकोच कहा, बताव का बात बा”
“परधान जी, तोहार दूनो लरिकै हमरे बेटौना कै कपार गुम्मा मार कै फोर दिहे हईन”
“का कहत हया, ओन्हन मुरहा त हईन मुला अइसन करिहैं… अब तू ओरहन लाय हया त बोलाइत हय। हे मानिकचन्द तनी लरिकन का बलाय लावा भितरा से”
लरिकन का बुलाय गय, पेसी भय।
“का बे! तोन्हन जगनवा कै कपार फार दिहे! काहें…”
“अरे बोलबा कि उठाई पनही औ सोंटा… सूँस जइसन खड़ा न रहा हमरे सामने”
मार के डर से बड़का वाला लरिका बोल परा :
“बाबू! ऊ आपका गरियावत रहा”
“काव गरियावत रहा अइसन, कि गुम्मा चलावै क पर गय छोटके परधान” मनोहर कहिन।
“चचा, ऊ कहत रहा कि सरकार गाँव मा 40 टट्टी भेजे रही, लिस्टिया मा हमरौ नांम रहा लेकिन परधनवा पैसा लइकै खाली 12 टट्टी बनवाइस, बकिया 28 टट्टी खाय लिहिस”
“अब बतावा बाबू, आप टट्टी थोरै खात हौ!”
“अरी मोरी माई, परधान तू हमार टट्टी खाय गया… अब ई बात हम पंचायत मा कहब!”
“अरे मनोहरा! हम कौनो कै टट्टी नाय खाये रे, तोर टट्टी हम बनवाय देब, बकिया लिस्ट मा जे बाय वोहू कै मजबूत टट्टी बनावै कै जिम्मेदारी हमार… लरिकन के झगरा मा बात न बिगाड़! ले ई 1000 रुपया रख औ अपने लरिका कै इलाज कराव… तोर टट्टी सबेरे से बनै शुरू होई जाए”…
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टीड़ी महराज कै किस्सा (१) : मातरी भासा

किस्सा : मातरी भासा 

राजा कै दरबार लाग रहा। दरबारिन के संघे आसन पै फक्कड़ सुभाव कै टीड़ी महराजौ बिराजमान रहे। राज मा टीड़ी महराज के दिमागदारी कै चर्चा दूर-दूर ले फैली रही।

यही समय दरबार मा एक मनई आवा। सकल से चतुर लागत रहा।

राजा क देखिके मनइवा कहिस – “हे राजा! तोहरे दरबार मा बड़े दिमागी दरबारी अहैं, जिनकै चर्चा सुनिके हम बड़ी दूर से आयेन हैं। क केहू हमार मातरी भासा बूझि सकत है?”

राजा कहिन – “काहे नाहीं! बिल्कुल!” एतना कहि के बड़े गुरूर से टीड़ी महराज के वारी लखिन।

from a poster in JNU

फिर ऊ मनई ताबड़तोड़ बोलब सुरू किहिस। भोजपुरी भासा बोलै तौ हुवाँ भोजपुरी इलाका के मौजूद लोगन क लागै कि ऊ ओनहिन के इलाके कै आय। बिरिज भासा बोलै तौ लागै कि यहिकै घर वहीं है। जौ अवधी बोलिस तौ सिपाहियन कै कान चौगड़ा अस खड़ा होइगा यहि बिसवास मा कि ई अवध क्यार रहवैया आय। अइसनै ऊ पूरी होसियारी के साथे खड़ी बोली  औ राजस्थानिउ बोलिस।

जब रुका तौ बूझै की कोसिस मा पूरा दरबार सनामन्न होइगा। सब दरबारी चुप्प। राजौ क कुछ नाहीं सूझि परा। सबही टीड़ी महराज के वारी लखै लागे।

टीड़ी महराज यकायक उठे। वहि मनइक लगे गये। फिर वहिके पिछुवाड़े पै यक लात जमाइन। ऊ तनिका सम्हरा तौ यक लात फिर हनिन्‌। ऊ भहराय परा।

मनयवा बेचारा चिल्लाय लाग – ‘‘अरे बाप रे! अरे बाप रे! .. हे राजा! इससे बचाओ। यह आदमी तो मुझे मार ही डालेगा। यह अन्याय क्यों!”

टीड़ी महराज यक सिपाहिस कहिन कि यहि मनई क उठाओ, लाइ के नीकेसूके बैठाओ।

सबही अचंभा म परा रहा, तबै टीड़ी महराज कहिन – “हे राजा! यहिकै मातरी भासा खड़ी बोली  है।”

राजा औ दरबारिन महँसे केहू कुछ कहत यहिके पहिलेन ऊ मनई कहै लाग – “सही कहा, पर आपने जाना कैसे!”

टीड़ी महराज बोले – “हे भाय! पहिले तौ माफ किहेउ! बात अस है कि जब केहू क चोट पहुँचत है, तकलीफ हुअत है, तौ ऊ अपने जबान से दुसरी भासा कै खोल जुरतै उतारि दियत है। ऊ अपने असिल भासा मा बोलै लागत है। ऊ  अपनी मातरी भासा मा अपनी माई, बाप या भगवान क याद करै लागत है। यहै वजह रही जौन हम तुहैं लात मारे रहेन।”

“धन्य हौ टीड़ी महराज! धन्य हौ! हम तोहरे चतुराई के सामने सर झुकावत अही!” – ऊ मनई टीड़ी महराज कै तारीफ करै लाग।

राजा खुस्स होइ गये। अपने गटई से यक माला निसारि के टीड़ी महराज क भेंट के रूप मा दै दिहिन। माहौल खुसनुमा होइगा। चउगिर्दा टीड़ी महराज कै तारीफ हुवै लागि।

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नोट: हम टीड़ी महराज से जुड़ी पहिली कहानी सैंहारेन हैं, कुछ बातन का पहिले कमेंट मा रखत अहन।

~सादर/अमरेन्द्र अवधिया