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पाहीमाफी [२०] : लागि कटान, कुल बहि बिलान -१

आशाराम जागरथ रचित ग्रामगाथा ‘पाहीमाफी’ के  “पहिला भाग”,  दुसरका भाग , तिसरका भाग , चौथा भाग , पंचवाँ भाग , ६-वाँ भाग , ७-वाँ भाग , ८-वाँ भाग , ९-वाँ भाग१०-वाँ भाग  , ११-वाँ भाग , १२-वाँ भाग१३-वाँ भाग १४-वाँ भाग , १५-वाँ भाग१६-वाँ भाग , १७-वाँ भाग , १८-वाँ भाग , १९-वाँ भाग के सिलसिले मा हाजिर हय आज ई २०-वाँ भाग :

Gopalganj_flood_1502984559पाहीमाफी गाँव मा बाढ़ि आइ गय हय। पूरा गाँव छर-छर कटान मा कटत-कटत सरजू नदी मा बिलोपि उठा। सरजू माई गाँव लील लिहिन। सब कुछ उछिन्न होइगा :
उच्छिन्न होइ गय पूरा गाँव
ओन्नइस सौ इक्यासी मा!
आशाराम जागरथ बाढ़ कय पूरा विवरन यहि तिना करत अहयँ कि आपौ क वहिकै नजदीकी अहसास हुवय लागे। आहिस्ता-आहिस्ता नदी बाढ़ति जाति अहै। यहि बाति कय घर वालेन मा, गाँव मा, चरिचा हुअति अहय। कवि तब लरिकईं मा अहय। ऊ राति के सोइ जाहीं पावत। ओहकै बालमन ह्वईं अनिस्ट के आसंका मा उलझा रहत हय :
जल्दी न औंघाई आवै
सोची दूर तक राती मा.
गौर करय वाली बाति हय कि जब खोपड़ी पै जल-ताण्डव मचा अहय, तब्बौ जाति व्यवस्था, भेद व्यवस्था, आपन असर देखाये अहय। बावजूद कि ‘न ऊंचनीच न भेदभाव / सबकै घर कटै कटानी मा.’! जहाँ एक तरफ़ बाढ़ कै भुक्तभोगी अंसुवान बिलखत अहय, ह्वईं सवर्न दंभ मौजिउ लियत अहय। : संपादक
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  • लागि कटान, कुल बहि बिलान -१

बरखा कै मौसम जब आवै
काटै नदिया काटत आवै
जेस कउनौ अजगर बहुत बड़ा
मुंह बाय-बाय लीलत जावै
सीवान कटा, मैदान कटा
खेती – बारी, खरिहान कटा
दक्खिन-पुरवा, कुटिया कटि गै
लरिकइयां कै अरमान कटा
घर-गाँव समाकुल बचा बाय
दिन बीतै यही तसल्ली मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

लोगै मिलि गउवाई गावैं
आपस मा बोलैं आवं-बावं
जउने मेली बाटै कटान
अगले साली न बचे गाँव
राती मा जुगुनी जुगुर-जुगुर
ताखा मा ढेबरी लुपुर-लुपुर
हम रहेन छोट कै बात सुनी
जिउ बाहर-भीतर धुकुर-पुकुर
जल्दी ना औंघाई आवै
सोची दूरी तक राती मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

गाँव के गोंइंड़े सरजू माई
करैं तांडव, बनी कसाई
चुप्पे- चुप्पे, कल्ले-कल्ले
काटत आवैं वै हरजाई
हर-हर-हर-हर बोलै धारा
झम-झमाझम गिरै करारा
जनम-भूमि कै नावं-निशान
कटि गय, बहि गय, मिटि गय सारा
उच्छिन्न होय गय पूरा गाँव
वन्नइस सौ यक्क्यासी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

दक्खिन कै टोला कटै लागि
लागै रणभेरी बजै लागि
खुब उमड़-घुमड़ काटै नदिया
धारा मा जइसै धार लागि
दुश्मन कै सेना बढ़त जाय
जंगल-ज़मीन सब कटत जाय
घर-गाँव, खेत-खरिहान कुलै
देखतै ही देखत मिटत जाय
केव काव करै औ कहाँ जाय
सूझै ना अफरा-तफरी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

घर पुश्तैनी नदिया काटै
कुलि देखि-देखि छाती फाटै
सनपाता सब भागैं -बिड़रैं
केऊ न केहू कै दुःख बांटै
वीपत मूड़े भीजै सबके
उजड़त घर दूरै से ताकैं
वै बान्हि करेजे पै तावा
बरतन-कुरतन लइकै भागैं
न ऊँच-नीच ना भेदभाव
सबकै घर कटै कटानी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

अनजानी जगहीं गड़ा रहा
चाँदी कै रुपिया खखरा मा
वै बनिया धनी पुरान रहे
रोवैं, हेरैं, खोदैं घर मा
दीवार गिरी जब आँगन कै
खखरा देखान दौरे पकरै
करिह्याँव छाँन्हि छोटका लरिका
घिसिरावत दूर जकड़ लइगै
तू जान दिहे से का पइबा
हम बहुत कमाबै जिनगी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

खुब कटै कटान करार गिरै
घर आँगन कै दीवार गिरै
लागै कि चिउंटी के बिल मा
फरूहा – कुदार कै वार चलै
टोला कै टोला उजड़ गवा
दस-बीस बोझ मा सिमिट गवा
कोरौ औ बाँस, थाम-थून्ही
कुछ हाथ लगा, कुछ छूट गवा
पहुँची पिछवारे बा नदिया
दादा गोहराये राती मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

संकट कै बादर सिर उप्पर
मन मा हमरे चिंता दूसर
हम नावं लिखावै इंटर मा
कुलि छोड़ि-छाड़ भागेन पैदर
फिर वाल्मीकि इंटर कॉलेज से
नाना के घर चला गयन
कुलि हाल बतायन नानी कां
वहीँ रात भये पै ठहरि गयन
कुछ लोगन कां लइकै साथे
उठि कै चल दिहन भोरहरी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

सोचै, मूड़े कै नस फाटै
रस्ता नाहीं काटे काटै
घर कइसै कही कि पहुँच गयन
देखी थै घर नाहीं बाटै
माई चिल्लाय लगीं देखतै
आंसू पै आंसू बहा जाय
‘नीबी के नीचे, बगिया मा
उजरा घर आपन धरा बाय’
कापी-किताब, बस्ता तोहार
वहिं भरा धरा बा बोरी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

केतनौ हम बहि-बिलान बाटेन
तब्बौ सूदे नाहीं पइहैं
जब पेट बरै लागी कसिकै
मिनकत अइहैं मूड़े चुरिहैं
मूई हाथी नौ लाख बिकै
पैलगी बहुत सम्मान बाय
बनि जाब पुजारी मंदिर कै
घर कथा सुनाइब जाय-जाय
भागा – बिड़रा जे जात हये
फिर लउट कै अइहैं गाँवैं मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

निहचिंते ससुरा बइठा बा
औ’ कहत बा गाँव भले कटिगै
घर कवन खजाना गड़ा रहा
रोना रोई जेका लइकै
बौरान हये मनई – तनई
कउनौ कामे ना आवअ थैं
बिखरा समान सब परा बाय
कुलि देखि मुसुक्की मारअ थैं
तूहूँ बेघर हमहूँ बेघर
बोलअ थैं बोली आड़े मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा.

__आशाराम जागरथ

[जारी….]

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पाहीमाफी [१९] : मजूरी नाहीं, हींसा – २

आशाराम जागरथ रचित ग्रामगाथा ‘पाहीमाफी’ के  “पहिला भाग”,  दुसरका भाग , तिसरका भाग , चौथा भाग , पंचवाँ भाग , ६-वाँ भाग , ७-वाँ भाग , ८-वाँ भाग , ९-वाँ भाग१०-वाँ भाग  , ११-वाँ भाग , १२-वाँ भाग१३-वाँ भाग १४-वाँ भाग , १५-वाँ भाग१६-वाँ भाग , १७-वाँ भाग , १८-वाँ भाग के सिलसिले मा हाजिर हय आज ई १९-वाँ भाग :

Indian woman drawing water from one of several shallow wells in village - October 1962कुछ बात ‘मजूरी नाहीं, हींसा-१’ के संपादकीय मा कहि चुका हन्‌। दुहराउब ना। चारि आना के बदले बारह आना मजूरी क पावै के ताईं जौन संघर्ष सुरू भा ऊ हियाँ अंतिम छंद तक ठकुराने से आपन हिस्सा मांगै के रूप मा खतम हुअत हय। ई हिस्सा कै मांगि सपने मा देखी गय हय। वास्तविकता मा नाहीं घटी। लेकिन चाहत यही कय हय। ठकुराने कय हारौ सपनेन मा हुअत हय। आगे जौन-जौन सामाजिक उलटफेर भा, वहिमन यहि सपने कय, थोरै बहुत सही, पूर हुअब देखा जाय सकत हय। लड़ाई आसान तौ अहय नाहीं, थोरौ पुराब थोर नाहीं अहय। एक बात बढ़िया उठायी गय हय — आंदोलन मा दगा दियय वाले लोगन कय जिक्र। गँवई मजूर आंदोलन के नेता कय भाय बिभीसन कय भूमिका खेलि गा। जबर ताकतै अस बिभीसनन के जरिये अपन काम ख़ूब सिद्ध करति हयँ। यहि जरूरी गँवईं सच का समझय के ताई ई भाग पढ़ा जाय। अऊर जादा जुड़य के ताईं मजूरी नाहीं, हींसा-१’ देखा जाय सकत हय। : संपादक
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  • मजूरी नाहीं, हींसा – २

सूद-अछूत औ’ मुसलमान
छुटजतियन मा छोटे किसान
जमिदारी के चाकी बीचे
गोहूँ साथे घुन हूँ पिसान
मूड़े साफा लाठी कान्हें
गोलियाय उठे अपुवैं पाठे
कुछ भाग बहानेबाज गये
कुछ दगाबाज, दुश्मन साथे
कुछ यहर रहैं कुछ वहर रहैं
कुछ यहरी मा ना वहरी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

अकिल कै आन्हर गाँठ कै पूर
सग्गै भाय बिभीसन गूढ़
चकमा चकाचौंध चम-चम-चम
मियाँ कै जूती मियाँ क् मूड़
खुब ढूढ़ लियौ पत्ता-पत्ता
गोलियान मजूरेन कै छत्ता
धुइंहर कइकै घर फूँक दियौ
जरि जायँ मरैं सब अलबत्ता
ना, खबरदार ! अइसन नाहीं
फटकारिस बुढ़वा बीचे मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

छाँटत हौ सभै कबोधन मिलि
सौ कै सीधी हम बात करी
सच सोरह आना का बोली
मुल पौने सोरह खरी-खरी
अगुवान बना बड़का नेता
मिलि गेंछिकै पकरि लियौ नोटा
यक्कै कां धुनुक दियौ गतिकै
बाकी तौ बिन पेंदी लोटा
ठकुरई मार मारौ अइसन
सुनि परै आदि-औलादी कां
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

काहे अकड़ा अइंठा-गोइंठा
घिर्राय खटोला पै बइठा
पच्छू से सूरज उगा आजु
गुलरी कै फूल भयौ ‘नेता’
बइठे तो करर कर्र पाटी
फुसफुस बतुवात रहे साथी
चारिउ वोरी से घेरि लिहिस
ठकुरेन कै झुंड लिहे लाठी
‘नेता’ भागैं तौ कहाँ जायँ
घुसि गये लुकाय कोठरी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

भै गिध-गोहार हल्ला-गुल्ला
बल्लम फरसा छूरी-छूरा
छपरा पै लाठी घपर-घपर
हूलयं पल्ला हूरै-हूरा
हीलै-डोलै किल्ली खटखट
जब-तब बाहर झाँकै लकझक
चिल्लाय टेंगारी ‘नेता’ कै
घुसि आओ ताजा खून पियब
सब कहैं कि फूँक दियौ छपरा
मुल गोड़ हलै ना भितरी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

कउनौ खानी आये हत्थे
बहु घंटन बाद मसक्कत के
घिर्राय कै भूईं मारैं सब
लाठिन-लाठी लातै-लाते
कुनबा परोस छित्तर-बित्तर
दूरै से बस हुम्मी-हुम्मा
चिल्लायं डेरान गेदहरे कुलि
फेंकुरै मेहरी फेंकै गुम्मा
खाली यक मुसलमान साथी
कूदा लठ लइकै बीचे मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

दूनौं कां मारि वलार दिहिन
अधमरा जानिकै छोड़ दिहिन
नेता कै भाय भिभीषण जब
दुई गोड़ पकरि कै छानि लिहिस
हाय रे ददई ! हाय रे मइया !
अइसन नाहीं जानेन दइया
मुंह काव देखाइब दुनिया कां
मरि गये कहूँ बड़के भइया
बुद्धी भरभस्ट रहा माथे
अपजस कलंक जिनगानी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

चिरई-चुंगा चौवा-चांगर
चौकन्ना कान दिवार खड़ी
कूकुर बिलार कूँ-कूँ माऊं
पुरबी बयार चहुँवोर बही
सग भाय भिभीसन भेदी कै
जब खुली आँख चिल्लाय बहुत
चिरई चुग गै सगरौ खेतवा
ऊ मलै हाथ पछिताय बहुत
पूरे जवार अललाय खबर
कुछ-कुछ हरकत भै थान्हें मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

जोगियै जोगी मुल मठ उजाड़
सोहै नाहीं यक्कौ सिंगार
मानौ जबरी घरहिम् लूटी
मुड़ियाये मूड़ी चलै रांड़
सन्नाटा सायँ-सायँ टोलिया
भौकाल्यू बोलैं ना बोलिया
आखिर दम साथ देवइयौ अब
बगली से नाप लियैं कोलिया
बरसात महिन्ना झमाझम
आगी बुताय ना पानी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

कहँरे नेता मिनके कांखे
हमकां ना जाय दिह्यौ थान्हें
झाकै न जात-बिरादर क्यौ
बड़का सग्गै सब बेगाने
जब नात-बाँत सबका टोयन
तब पलिहर मा मूजा बोयन
अइसनै नाहिं कहकुत बाटै
जिउ-जान जरे आंखी देखेन
लधिकै खटिया कउनौ खानी
नेता उखुड़ी के खेते मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

जुग्गातन घर नाहीं आवा
लापता ‘बहदुरा’ सुनि पावा
थान्हें कै ‘मोस्ट वांटेड’ ऊ
अन्हियारी राती मा आवा
माई रे ! हमका जाई दियौ
मेहरारू नइहर पठय दियौ
समझौ यक ठू बेटवा नाहीं
माथे पै कप्फन बान्हि दियौ
दुस्मने कां कोसै सात पुस्त
सुमिरै महतारी देवतन कां
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

अन्हराय जायँ कोढ़ियाय जायँ
हइजा पकरै निकरै खटिया
पानी बिन घटका लागि रहै
कीयाँ परि जायँ मरत बेरिया
लकवा मारै मुहँ टेढ़ हुवै
माँगे जल्दी ना मउत मिलै
भगवान भगवती माई हो !
कइ द्या उच्छिन्न बंस कुल कै
हम टूटत बहुत सरापत हन्
जिउ जरे डाह भारी मन मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

अइंचा-ताना कोढ़ी–काना
ठट्ठा ठहाका ठकुरहना
अब दियौ बढ़ाय मजूरी सब
चार आना से बारह आना
बाचैं, परधान येक पाती
बागी तुहरे सबकी जाती
परनाम करै जल्दी अइबै
अबहीं हम आज जात बाटी
बौरान ‘बहदुरा’ बमकत बा
बनरे यस घुड़की पाती मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

बहिनी ! कलिहां सपने म् देखेन
मरदेन कै रहै लहास परी
कौववै काँव कौं काँव करैं
गिद्धै ही गिद्ध उड़ैं बखरी
सूदै मिलि ढोल बजावअ थैं
चढ़िकै लहास पै नाचअ थैं
कोठरी करियाय लरिकवन कां
मेहरारुन कां पलझावअ थैं
बोलैं, ‘ठकुराइन मान जाव
हींसा अब खेती-बारी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा.

__आशाराम जागरथ

[जारी….]

पाहीमाफी [१८] : मजूरी नाहीं, हींसा – १

आशाराम जागरथ रचित ग्रामगाथा ‘पाहीमाफी’ के  पहिला भाग”,  दुसरका भाग , तिसरका भाग , चौथा भाग , पंचवाँ भाग , ६-वाँ भाग , ७-वाँ भाग , ८-वाँ भाग , ९-वाँ भाग१०-वाँ भाग  , ११-वाँ भाग , १२-वाँ भाग१३-वाँ भाग १४-वाँ भाग , १५-वाँ भाग१६-वाँ भाग , १७-वाँ भाग के सिलसिले मा हाजिर हय आज ई १८-वाँ भाग :

Village_Life_in_India रचना मा, सोसित वर्ग सोसन कय विरोध करै — ई बड़ी बात तौ हयिन हय, मुला ओहसे बड़ी बात हय कि ई विरोध अपने पूरे पेंच के साथे जहिराय। ई नाहीं कि यक सरलीकरन मा तमतमाय के चीजन का देखाय दीन जाय। यक उदाहरन दीन चाहित हय। अगर केहू देखे हुवय तौ यक फिलिम अहय — हजारों ख्वाहिशें ऐसी। सुधीर मिसिर के निर्देसन मा आयी। यहि फिलिम मा यक जगहीं मजूरन-सोसितन कय विरोध देखावा गा अहय। मुला साथेन यक कमाल कय चीज पकरी गय अहय। ऊ ई कि जब ठाकुर देखत हीं कि अब उनकय विरोध कीन जाये, तौ वइ बेहोस हुवय कय नाटक करय लागत हीं। हियाँ सगरौ ट्‌विस्ट अहय। अब जौन लोगय विरोध करत रहे, वइ लोगय विरोध करब छोड़ि के ठाकुर के सेहत कय चिन्ता करय कागत हयँ। ठाकुर का खटिया पै लेटाय के इलाज के ताई लयि जात हयँ। मतलब ई कि विरोध कय हर सकल, हर कोसिस, सोसकन के धूर्त मंसूबन कय सिकार होइ जात हय। ई जटिलता तौ देखात हय, हर विरोध के लहर के साथे। पाहीमाफी केरी गाँवगाथा मा मजूरन के विरोध कय आवाज, यहितरह से, पहिली दायँ आवति अहय। मजूरी नाहीं, हींसा — के रूप मा। अबही कुछ हिस्सा अगली पोस्टन मा आये। देखेक होये। ई यक बहुत बढ़िया परसंग उठावा गा हय। यहिसे पाहीमाफी कय गतिसील जीवन कय झांकी अपने हकीकत के साथे हाजिर होये। मुला, पाठक खुदै नियाव करयँ कि ऊ जटिलता, या द्वंद्वात्मकता, या ‘टाइलेक्टिक्स’, या ‘क्रिटिक’, पाहीमाफी के यहि प्रसंग मा देखात अहय?/! यहिमा दुइ राय नाहीं कि ई बहुत खास स्थल साबित होये, यहि ग्रामगाथा कय। : संपादक

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  • मजूरी नाहीं, हींसा – १ 

गोहरायन मुला जुहाते नाहीं
फूटी आँख सुहाते नाहीं
सूदै बहुत मोटान हये यक
दाईं कहे वोनाते नाहीं
खर येक वोर से जाम बाय
बीचे-बीचे मा धान बाय
बोलअ थैं खुदै निराय लियौ
हमकां नाहीं पहुँचान बाय
मूड़े पै चढ़ा चला आवत
बाटे कुलि मूर-मुरौवत मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

जमिदारी गये भवा कै दिन
लागत बा आइ गवा दुरदिन
आजा-बाबा से चलि आवा
आसामी काम करैं सब दिन
लावा कुदार जोन्हरी गोड़ी
सुनि लेबै जे केऊ बोलिहैं
जे देखै हँसी उड़ावै खुब
बड़मनई खेत खुदै जोतिहैं
गोड़त-गोड़त गोड़वै कटिगै
कुलि गति होइगै यक कोहा मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

झूठी नाहीं टूटी-फूटी
बतिया मोरी सच्ची-मुच्ची
मेहनत कै काम करैं कइसै
पूरे जवार बोलै तूती
झारत बाटे माटी-कूटी
टाँगे धोती – कुरता खूंटी
देहीं कै मइल पसीने से
बोली संग्हरी अब्बै छूटी
हमरे सबकै बढ़िया निबाह
मेहनतकस मनई-तनई मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

पसियाना अउर चमरटोलिया
छोटजतिया कुल जोरे गंठिया
मिलि कहैं बढ़ाय मजूरी द्या
यक रुपिया उप्पर दुपहरिया
घाऊँ-माऊं चौं-चौं- चाई
चार आना हमकां ना चाही
जे टूका से संतोष करी
पूरी रोटी कइसै पाई
मरि जाबै खाय बिना चाहे
अबकी फइसिला यही दम मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

दक्खिन टोलिया बोली-ताना
भुन भुनभुनाय भुन पसियाना
करिहैं ना काम कहाँ जइहैं
चुन चुनचुनाय चुन ठकुराना
घर से निकरब भारू होइगै
बाहर-भित्तर मेहरारुन कै
चउवा-चांगर अब कहाँ जायं
सीवान-खेत कुलि ठाकुर कै
फेंचकुरी छगड़िया मिनमिनाय
घेंटा घें-घें-घें बाड़ा मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

मरि जात्यौ सभै खाइ माहुर
उल्टा-पुल्टा लटक्यौ गादुर
बोले टेटियाय ‘बहदुरा’ से
मोछी पै ताव दिहे ठाकुर
करिबौ ना काम काव खाबौ
ई गाँव छोड़ि कहवाँ जाबौ
काहे बौरान मतान हयौ
समझाये बिना मान जात्यौ
मिलि बैर किहौ घड़ियाले से
मानौ रहिबौ ना पानी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

मनबढ़ा ‘बहादुर’ बरबराय
समझै ना बात सुनै यक्कौ
बिन रुके बढ़त गै चलत-चलत
ताकै, डेराय नाहीं तन्चौ
ज्यौं चिढ़ी ठकुरई ठाकुर कै
नेकुना रहि-रहि फूलै-पचकै
दउराय कै गटई पकरि लिहिन
घमकाइन मुक्का पीठी पै
भन्नान ‘बहदुरा’ चढ़ि बइठा
दुहराइस सोंटा गोड़े मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

बाबू साहेब लंगड़ात फिरैं
केसे वै कइसै काव कहैं
सूदे से खाये मार रहे
पीरा कइसै बरदास करैं
पटिदारी कै मुच्छड़ काका
बोले तनिकी यहरी ताका
पुरखन कै नावं डुबाय दिहौ
बड़का जमिदार बना बाट्या
मरि जात्या डूबिकै बाप-पूत
भरिकै चुल्लू भै पानी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

यक्कै थैली कै खान-दान
अपसै मा ना झगरौ जवान
इरखा दुसमनी कां समझावै
खतरे मा बाटै आन-बान
सन्हें-सन्हें, काने-काने
गोलबंदी होइगै ठकुरहने
मौके मूड़ी कुचला ना गै
चुकिहै ना पाछे पछिताने
मुंह बान्हें मिलौ-जुलौ सबसे
बतिया ना पहुँचै थाने मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

लुप लुपुर-लुपुर दीया-बाती
नाचै कपार साढ़े साती
बइठका मां सबकां समझावैं
नब्बे साली बेवा आजी
वनहूँ सबके लरिके-बच्चे
वनहूँ के पेटे भूख बाय
आसामी दादा-बाबा कै
हमरे हिल्ले उम्मीद बाय
छिन जाई नाहीं राज-पाट
‘दुपहरिया’ येक रुपल्ली मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

बोले ‘मुंहबोले’ मिन्न-मिन्न
उठिकै भागे तिनमिन-तिनमिन
घर-आँगन कै सासन देखौ
मरदेन के बीचे बोलौ जिन
यक रुपिया माँग मजूरेन कै
सीधे जौ मान लियब वनकै
चढ़ि लेइहैं मनबढ़ मूड़े पै
रहिहैं कुलि खड़ा रोज तनकै
रिरियाने खुला खजाना बा
गुर्राने फूटी कौड़ी ना
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

जोरा – जोरी, सीना – जोरी
चिट भी मोरी पट भी मोरी
सूदन के मुंह अब के लागै
बेवजह करै तोरी – मोरी
जौ बीचे मा परबतिया जौ
धाने जइसन डउंरा – डउंसी
बस तड़े रहौ पहिचान करौ
लंका ढाहे घर कै भेदी
काली थान्हें पूजैं मजूर
हमरे सब पूजब थान्हें मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

भिनसरवैं से छिनरी-बुजरी
‘नेता’ से खूब लड़ै मेहरी
घर-बार बहारै बरबराय
निहुरे-निहुरे लइकै कुचरी
सबकै संती दुसमनी लिहेव
अगुवान हयौ नाहीं सोचेव
मुरदेन कै फउज जुहाये हौ
कामे नाहीं अइहैं यक्कौ
ठकुराइन तुहैं बोलाइन हैं
बेजा नाहीं बा माफी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

बहिन के घर मा भाई कूकुर
ससुरे घरे जमाई कूकुर
मूँछ रखाये कवन नफा जब
पूँछ हिलावै बनिकै कूकुर
सुनिकै अकच्च ताना-बोली
छगड़ी-बकरी जनता भोली
आपन तौ बीत-बिताय गवा
हम ना बोलब तौ के बोली
जिन्नगी नरक वइसनै बाय
मरि जाबै पर-उपकारी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा.

__आशाराम जागरथ

[जारी….]

पाहीमाफी [१७] : तिरिया-गाथा (३)

आशाराम जागरथ रचित ग्रामगाथा ‘पाहीमाफी’ के  “पहिला भाग”,  दुसरका भाग , तिसरका भाग , चौथा भाग , पंचवाँ भाग , ६-वाँ भाग , ७-वाँ भाग , ८-वाँ भाग , ९-वाँ भाग१०-वाँ भाग  , ११-वाँ भाग , १२-वाँ भाग१३-वाँ भाग १४-वाँ भाग , १५-वाँ भाग१६-वाँ भाग के सिलसिले मा हाजिर हय आज ई १७-वाँ भाग :

“एक पूरा गुज़रा हुआ संसार प्रकट कर देते हैं आप. गुज़रा हुआ भी क्यों? आज भी यह कही का वर्तमान है बस हम छिटक गये हैं उससे पर हमारे भीतर वह आज भी वर्तमान सा ही मौजूद है.”
शिव मूर्ति 
वरिष्ठ कथाकार

sssss ऊपर दीन कथन बखूबी पहीमाफी कय बिसेसता बतावत हय। ई बात पाहीमाफी कय पढ़ैया महसूस कयि सकत हय। कहा गा बाय कि जौन दुनिया आजौ मौजूद बाय, ऊ काहे नाहीं देखात फिर दुसरी जगह? खुद सिउमूरति जी के हियाँ ई दुनिया अहै, तब्बो का यही तिना देखाति हय? 

बात ई हय कि दुनिया देखाब औ अनूदित रूप मा दुनिया देखाब दुइनौ मा बहुत अंतर अहय। गाँव पै बति करब औ गँवार होइ के गाँव पै बाति करब, दुइनौ मा अंतर होइ जात हय। गाँव पै बाति करब अऊर गंवार होइ के गाँव पै बाति करब दुइनौ मा अंतर हय। बिना होये बाति करय पै लागत हय कि केहू बहिरवासू मनई गाँव पै बाति करत अहय। आशाराम कय खासियत ई हय कि वइ गाँव पै बाति, गंवार होइ के, गाँव केरी भासा मा करत हयँ जेहिसे ऊ पूरा संसार प्रकट होइ जात हय। जेहिकय चरचा सिउ मूर्ति किहे अहयँ। 

तिरिया गाथा के दुइ हिस्सन क आप पढ़ि चुका हयँ। ई तिसरका आय। यहिमा अबरन समाज कय मेहररुवन के बारे मा बयियावा गा अहय। यइ कयिसे जीवन जियत हयँ। सबरन समाज से हियाँ जादा आजादी हय। यइ कम मजबूर हयँ। यइ तनिका बोल्डौ होइ जात हयँ, हौके-मौके। तौ पढ़ा जाय ई भाग : संपादक
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  • तिरिया गाथा -३ 

ठाँवैं – ठाँव फाटि बाटै
कथरी लायक धोती बाटै
सूई मा डोरा नाय दियौ
हमरे देखात नाहीं बाटै
गोनरी बिछाय हम सोई थै
राती मा गड़े पै रोई थै
रूई वाला गुलगुल गद्दा
सपनेव मा नाहीं देखी थै
यक धोती बची बाय खाली
फूटी कौड़ी नाहीं घर मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

बूढ़ी देहीं मा कवन दम्म
ताले के खाले भंछेन हम
चीरेन सरपत से मूज खींचि
फिरु कासि काटि झुरुवायन हम
यक बड़ी सिकहुली रंगदार
बीचे-खूचे मा फूलदार
बहिनी पुरुवाय लियौ थोरै
दीदा बेकार होइगै हमार
हम रहेन अवांसे नीक-सूक
कनपातर होइगै बीचे मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

भागौ बहिनी कछु ना बोलौ
सुनि ल्या कतहूँ ना किह्यू जिकर
बड़की बखरी मा नधा बाय
दुइ दिन से करकच-दहकच्चर
छोटकी पतोह विधवा बाटै
पेटे मा लिहे पाप बाटै
सासू से लड़त पुरहरे बा
कि तोहरे जाती भै बाटै
ना सूई-फार करब अबकी
करियान रहब हम कोठरी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

नाउन भउजी बखरी कै खास
आइन दौरी वै बदहवास
गोहराय कै बोलिन हमहूँ से
बेवा रानी चलि बसीं आज
गोली से भरी रही पिस्टल
जानिन कि धरी बाय छूछै
खटका दबि गै अनजाने मा
छतिया छलिनी-छलिनी होयगै
देखतै-देखत हमरी आंखी
गिरि परीं धड़ाम जमीनी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

भइंसिया खड़ी बम्मात बाय
गइया नाहीं पगुरात बाय
पिल्लन के साथ कुकुरियौ अब
घर छोड़ि कहूँ कां जात बाय
मुसरी बोलै चू-चू- चू-चू
नरदहा छछुंदर चिक-चाऊं
करखही बिलरिया देखे बा
पंजा मारै माऊं – माऊं
सनपाती पड़िया भोकरत बा
मूड़ी उठाय कै बां-बां- बां-बां
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

बेवा बूआ गुस्सान रहीं
आयीं औ’ चली गयीं जल्दी
बइठका म बइठा घिरा हये
थान्हें कै बड़े दरोगा जी
वै कहअ थैं चीर-फार होई
बड़के मालिक रिरियात हये
केव कहत बा मान गये बाटे
अब खुदै फुकावै जात हये
तर-उप्पर मनई जमा हये
सरसौ ना गिरै जमीनी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

छोटजतियन मा यक चीज बाय
कुछ चीज बहुत ही नीक बाय
मेहरारू मर्द बरोबर हैं
बस बहुत गरीबी–भूख बाय
चूल्हा – चाकी वनके माथे
बाकी मिलि काम करैं साथे
हँसि बोलैं खूब मजाक करैं
मनसेधू लाग रहैं पाछे
बीड़ी दागैं पीयें बिचरैं
घर-बार, खेत-खरिहाने मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

बम-बम बमचक हुम्मी-हुम्मा
घप घपर- घपर घम्मी-घम्मा
कइंचारी से मारै दउरे
तब उहौ उठाय लिहिस गुम्मा
गरियाये पै गरियावै ऊ
वै कहे तुहैं नाहीं राखब
ऊ कहिस खुदै हम भागि जाब
रहि जाबा तू तकतै – ताकत
फिर गये मजूरी करै दुवौ
मनहग होइकै दुइ घंटा मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

कुच्छौ ना खेती-बारी बा
बस खाली खाल्ह मजूरी बा
गै भाग बियहुती नइहर से
जोरू अब बहुत ज़रूरी बा
लूली-लंगडी, कानी-खोदर
धमधूसर – बेवा – बदसूरत
करिया-गोरहर देखबै नाहीं
मिलि जाय कामकाजी औरत
तजबीज धरउवां लाय दियौ
नाते के नात पनाते मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

ना अनवइया ना पठइया
नाहीं आये हमरे भइया
माई कां बहुत मोहान हयन
हमका तू जाय दियौ अइया
तू हयू पतोहा जेस बाट्यू
मानौ पाले बाट्यू चक्कर
दुइ-चार महिन्ना बीतै ना
रट्टा मारौ नइहर-नइहर
जा रात भरे कां चली जाव
जायू ना मुला अकेले मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

परिवार भरा – पूरा बाटै
खाते-पीते घर-बारी हन्
घूंघुट के बहिरे ना देखेन
दुइ लरिका कै महतारी हन्
गरमी मा घुसा रहौ घर मा
बेना हाँकौ तौ जिउ जुड़ाय
जाड़े मा सूरज कै दरसन
पावै तब अँगना मा घमाय
नइहरे के वोर ताकेन नाहीं
आयन जब से हम गवने मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

सूदेन मा सूद यकतौ अछूत
हम जाति हई मेहरारू कै
घर से बहिरे तक रोज खटौ
ना नावं – निहोरा कामे कै
कपड़ा-लत्ता, लरिकन ताईं
पइसा जोरी पाई – पाई
वै काम करैं अवतै गरजैं
गरियाई , मारी हम जाई
पाती बटोरि चूल्हा फूँकी
वै गप्प लड़ावैं मरदेन मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

बढ़इन से बोलिन सहुवाइन
आइन नाहीं घर परताइन
घर मा हमरे लल्ला आये
यक्कौ दिन सोहर ना गाइन
धोय उठइया धोबयिन लाइन
काम किहिन धगरिन निपटाइन
नेग मा धोती–लोटा–थरिया
मागैं नाउन अउर कहायिन
साहू सूम कछू ना बोलैं
बइठा रहैं दुकानी म़ा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

हम जाब चरावै ना छगड़ी
माई ! पिरात बाटै पेटवा
दुई मूका दादा मारिन हैं
औ’ पकरि क् नोंच लिहिन झोंटवा
लत्ता नाहीं यक्कौ बित्ता
फटही-चिटही लुगरी पायन
वै कर्र से फारत देखि लिहिन
पूछे पै नाहीं बतलायन
कपड़ा हाथे से छोरि लिहिन
घमकाइन जोर से पीठी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

कइसै बोली औ काव करी
बस दागै दाग लाग कथरी
दौराइन मारि कुकुरिया कां
जानिन कि उहै रही वोलरी
कुछ काम करै कां जब कहिहैं
तू कह्यू बहुत बीमार बाय
दुई-चार रोज कै रोग महीना
मा जिउ कै जंजाल बाय
लरिका होइत ना छूत हुवत
हम जाइत रोज मंदिरे मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

पूत जनम लै लोलक लइया
बाँटौ धान बटोरौ पइया
ताले भइंसी बोह लियत बा
मेंड़े दूब चरत बा गइया
अड़ुवा बैल बहेड़ुवा पूत
बाप बनैं कां सउक अकूत
लरिका पै लरिका लेहँड़ा भै
मेहरी कै देहियाँ गै सूख
घूमौ लट्ठ बजाओ गाओ
घुसा जमोगा सउरी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

जायं जहाँ भी डाढ़ा रानी
बरसै लागै पाथर पानी
आगी ताईं घर-घर भंछेन
सबकै बोरसी रही बुतानी
दाल बनायन भात बनायन
घोर्रइया कै साग बनायन
खाये नाहीं टिनुक गये वै
अपने सकि भै बहुत मनायन
रात भै सोवा रहे कोरउरे
बासी खाये भिन्नहीं मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

(घोर्रइया : एक तिलहन जौन अब नाहीं बोवा जात / कोरउरे : भूखे / 
भिन्नहीं : सुबह)

चूल्हा-चौका बरतन-कुरतन
गिरहस्ती मा डूबा तन-मन
ब्रत करवा चौथ निराजल छठ
घर-आँगन भजन-भाव- किरतन
दहलीज़ पार लछिमन रेखा
मिटये न मिटै भाग-लेखा 
कोठरी कै रोसनदान खोलिकै
दुलहिन पढयं हाथ-रेखा
कुच कुचुर-पुचुर कुचकुच बोलै
चिरई बखरी के पिंजरा मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा.

__आशाराम जागरथ

[जारी….]

पाहीमाफी [१६] : दीवाली

आशाराम जागरथ रचित ग्रामगाथा ‘पाहीमाफी’ के  “पहिला भाग”,  दुसरका भाग , तिसरका भाग , चौथा भाग , पंचवाँ भाग , ६-वाँ भाग , ७-वाँ भाग , ८-वाँ भाग , ९-वाँ भाग१०-वाँ भाग  , ११-वाँ भाग , १२-वाँ भाग१३-वाँ भाग १४-वाँ भाग , १५-वाँ भाग के सिलसिले मा हाजिर हय आज ई १६-वाँ भाग :

paint-diwali-diyas-lilcreativekidsदीपावली आय आज। दीवाली क लयिके मेर-मेर कै कविता देखय का मिलत हय। ज्योति केरी बड़ाई मा। लोगय लछिमी माई से धन-धान्य से घर भरय कय बिनती करत हयँ। गरीब-गुरबौ अरदास करत हय माई से। मुला माई धनिकन क धन दिहे जाति हयँ। उइ असर्फीलाल बनत जाय हयँ। गरीब लंगोटीलाल बनिके रहि जात हयँ। रमई काका व्यंग्म मा कहे रहे : 
लछिमी धनिकन की देवी हयँ
जिनके उइ सदा सहारे हयँ
दीनन के दीनानाथ बंधु
जिनके उइ सदा पियारे हयँ!
गरीब-कचोट हय उनकी कविता मा — हमरी कुटिया मा न आईं / का चली गयीं ऊंची महलन? जागरथौ कहत अहयँ :
खेती-बारी ऊँची जात
उनके घर लछिमी कै वास!

जागरथ केरी कवितन से दीवाली कय जादा चौड़ी दुनिया देखी जाय सकत हय। पूरा गाँव अहय। जिता-बिरादर मा बंटा। सबके ताईं तिउहार यक्कै नाईं नाहीं ना। यक घर ऊ अहय कि सब गांजा बाय। दूसर घर ऊ अहय कि अकाल बिराजा बाय। दियौ-दियाली लियै कय जोग नाहीं बनत। सामान बेचय आयी मनिहारिन से माई कहत हयँ कि हमरे मोहारे काहे झोली उतारति अहव। हमरे लगे कुछू अहय नाहीं। मनिहारिन कहत हय : 
बोलिन चुरिहारिन पहिरइबै
पइसा रही उधारी मा..

दीवाली कय कहीं जादा चौड़ी, मार्मिक औ हिरदय-छू तस्वीर देखा जात, पाहीमाफी -१६ मा. : संपादक
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  • दीवाली

सीलन से लोनियाई भीत
माई छोपिन माटी नीक
बोलिन आवत बाय देवाली
कोना-आँतर डारी लीपि
दादा भैंसिन कां नहुआइन
तेल नीम कै खूब लगाइन
नवा-नवा पगहा बरि कै वै
बैलन कां घुँघरू पहिराइन
नीबी के पाती कय धुइंहर
फिन सुलगाइन घारी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

मुँह मा पान माथ पे बिंदिया
होंठे झुलनी झूलै बढ़िया
झौली मा चुरिहारिन बेचैं
चुरिया, लाल-बैगनी-करिया
माई आइन दौड़ी-दौड़ी
काहें हयू उतारत झौली
अबकी जाव दुबारा आयू
गाँठी मा ना पइसा-कौड़ी
बोलिन चुरिहारिन पहिरइबै
पइसा रही उधारी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

आधे कातिक दीया-दीवाली
दस दिन अगवैं से तइयारी
फूलि कै कुप्पा गेद-गेदहरे
बड़ा घरौंदा अबकी बारी
चचा कोंहार कोंहारिन चाची
धइकै मूड़े झौवा-खाँची
मेर-मेर माटी कै बरतन
बेचैं चौका-बेलना, घाँटी
लाल- ललछहूँ चमकै गुल्लक
सोंधी खुशबू हाँडी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

भउजी ‘पुरबहा’ मगन घूमैं
अबकी दीवाली ‘वै’ अइहैं
साड़ी-साया हमरी ताईं
लरिकन ताईं कपड़ा लइहैं
बोलिन ‘उतरहा’ तू जेस बाट्यू
बस बनी ठनी बइठी बाट्यू
अइहैं केऊ का छोरि लेई
यक्कौ ना काम करत बाट्यू
छोटकी बोलिस बप्पा अइहैं
पहिली दाईं देखब वनकां
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

बड़कना बहुत ही बात करै
लरिकन के बीच गुमान करै
छुरछुरिया औ हाथी-घोड़ा
बप्पा लइहैं झोरा भरिकै
आये वै दूनौ हाथ मलत
अब काव कही कइसै बोली
हम सोवत रहेन बर्थ उप्पर
सारा समान होइ गय चोरी
धइ ल्या ई रुपिया बचा बाय
जो धरे रहेन हम जेबी मा 
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

खेलैं लरिके, जाँत-जंतोली
बोलैं, तुतलाय बोल बोली
भुरभुरी धूरि मुट्ठी बान्हें
पीसैं पिसान भरि-भरि झोली
का जानी पइसा – कौड़ी हम
दीया-दिवाली रोज अगोरी
कोइला, खड़िया-माटी, गेरू से
खींच-खांच कै बनै रँगोली
लिहें तराजू , पलथी मारे
कंकर तौली राही मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

भोंपू, भरकी , कोसा-कोसिया
दिवली, परई , भुरका , मेलिया
यक जोड़ा माटी कय दवात
दुई आना मा बढ़िया-बढ़िया
ओखरी माँग कै लाइन माई
घपर-घपर घप किहिन कुटाई
बनि कै भै चिउरा तइयार
जड़हन भूजि बनाइन लाई
खइलर लइकै अइया बइठीं
माठा मथैं दुधहंड़ी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

धुँधलहा साँझ, अम्मावस दिन
घाँटी बाजै टिन-टिन-टिन-टिन
दिवली मा बाती-तेल डारि
अँगना बीचे बारी गिन-गिन
डेहरी, कंड़िया, चूल्हा, चाकी
ड्योढ़ी, कोठरी, खेती, बारी
लौ लुपुर-लुपुर लुप-लुप लउकै
कूँआ, खूँटा, चन्नी, घारी
यस जरै तेल कडुवाय आँख
लइ बस्ता पढ़ी ओसारी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

गहरान रात भै अन्हियारा
खेते मा लइकै लुक्काड़ा
आगी से सब खिलवाड़ करैं
नाचैं जइसन कि बनजारा
चहुँवोर दिवाली चकाचक्क
मन ही मन मनवा मसमसाय
जुग-जुगुर-जुगुर जुगुनी चमकै
कुचपुचिया तरई कुचपुचाय
कहुँ आग न पकरि लियै छपरा
जिउ जरै-बुझै अंदेशा मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

दक्खिन टोला, तुम्म–तड़ाका
जोर-जोर गरियावैं काका
घर मा खाय क ठेकाना नाहीं
लरिकै मागैं बम-पड़ाका
खेती-बारी, ऊँची जात
वनके घर लछमी कै वास
छूत मनावैं देवी-देवतै
गोड़ धरे पै मारैं लात
हमरे सब कय दिया-दिवाली
हरवाही – चरवाही  मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

ऊ देखा, ऊ हमरा गाँव
घी कै दीया ठावैं ठावँ
हमरे टोलिया मा अन्हियारा
सोवै रोज पसारे पाँव
वोसे कहिअ थै जात्या बखरी
रहत्या सुख से कोठरी-कोठरी
ऊ बोलअ थै नाहीं जाबै
हुआँ धरा बा गठरी-मोठरी
भागब ना पुश्तैनी घर से
पड़ा रहब सन्नाटे मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

हर खेते दीया जुगुर-जुगुर
ऊपर तरई कै खुसुर-पुसुर
कनफोडू शोर पटाखा कै
गूंजै रहि-रहि, जिउ धुकुर-पुकुर 
चक-चकाचौंध चहुँवोर शोर
कहूँ लुकाने चाँद – चकोर
आपन ‘शुभ-काम’ जगावैं सब
वहि दिन तौ चोरी करैं चोर
गै दिया-दिवाली कोने मा
कुलि बारह रोज डिठौने मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

आँखी अम्मावस कै कजरा
वोरमा मुँह लिहें रहे वोलरा
पूछेन गोहराय काव होय गै
नौकरिहा कहाँ हये पसरा
बोले कि वोई तौ लाय रहे
कुछ खेल-खेलौना यक झोरा
हमरे बुढ़िया कां सउक चढ़ा
ऊ रही दगावत बम-गोला
वै पकरि कै आग छुवाइन जेस
फट गै बम-गोला हाथे मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा..

__आशाराम जागरथ

[जारी….]

पाहीमाफी [१५] : तिरिया-गाथा (२)

आशाराम जागरथ रचित ग्रामगाथा ‘पाहीमाफी’ के  “पहिला भाग”,  दुसरका भाग , तिसरका भाग , चौथा भाग , पंचवाँ भाग , ६-वाँ भाग , ७-वाँ भाग , ८-वाँ भाग , ९-वाँ भाग१०-वाँ भाग  , ११-वाँ भाग , १२-वाँ भाग१३-वाँ भाग १४-वाँ भाग के सिलसिले मा हाजिर हय आज ई १५-वाँ भाग :

Captureई हय पाहीमाफी है १५-वां अउ तिरिया गाथा कै दुसरका भाग। तिरिया गाथा मा गाँव कै आधा दुख बरसि परा अहय। इनका पढ़त के साफ जाहिर हुअत हय कि यक्कै साथे रहय के बावजूद मरदन की दुनिया से औरतन कय दुनिया केतनी अलगि बाय। औरतनौ की दुनिया मा सबर्न औ अबर्न औरतन कै दुनिया अलगि-अलगि बाय। यहिका पढ़त के ई जाना जाय सकत हय। यहिमा ई बतावा गा बाय कि सबर्न मेहररुवै अबर्न मेहररुवन क बेहतर हालत मा बतावत हयँ। अबर्न मेहररुवै सबर्न मेहररुवन का कौनी हालत मा देखति हयँ, कौने मामिले मा बेहतर या बदतर मानति हयँ, संभव हय ई बाति आगे देखय का मिलय। उनके ‘कहन’ मा ई आवय मुमकिन हय। 

तिरिया गाथा मा औरतन के कयिउ अवस्थन कय सच कहा गा बाय। ई नाहीं कि केवल जवानिन कै दसा बतायी जाय। गेदहरा-जवान-बूढ़ : तीनौ पायदान पै खड़ी तिरियन का जागरथ जी लखे अहयँ। इन कबितक के जरिये आपौ इनका लखि सकत हयँ। 

कबिता कय यक-यक बारह-पतिया टुकड़ा अपने मा कंपलीट अहय। ऊ पूरा चित्र सामने उकेर दियत हय। यक-यक चित्र पूरी कहानी कहत देखाये। बिटिया, जवान औ बूढ़ तीनौ जिंदगिन पै अलग-अलग टुकड़य अलग-अलग कहानिव कहत हयँ। यनहीं के बीचे कबिता कय अव्वल सधानौ आपन छटा देखावय लागत हय। जयिसे ई दुइ लाइनन मा, ‘बात’ सबद से कीन खेल बढ़िया हय। ‘बात’ सबद से जुड़े मुहाबरन कय का गजब इस्तेमाल कीन गा अहय : ‘बात निकारैं बात-बात मा / बाती मा बाती कै गूझा.’ : संपादक 
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  • तियिया-गाथा : (२)

घूमौ खुब डारे गलबहियां
तुहकां देखतै परचय देहियाँ
हम खटी अकेलै काम करी
लरिका कां लिहे-लिहे कनियाँ
हेंढ़ा यस भया तुहैं पोसेन
तुहूँसे गोबरे कै छोत नीक
हम फुरै कही थै मान जाव
नाहीं माँगे ना मिली भीख
चेतौ अबहीं सौंकेर बाय
मेहरी आई बा गवने मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

जे करै परिश्रम हाँड़ तोड़
वै खाय बिना मर जात रहे
जेकरे अनाज इफरात रहै
वै खाय-खाय डुडुवात रहे
जे ऊँच रहैं सिंगार करैं
घर के भीतर करियान रहैं
पर सूद चमार कै मेहरारू
खेते मा साथे काम करैं
केउ ओढ़े-बेढ़े बइठ रहै
केव धान बिठावै कनई मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

ठकुराइन कै नीक बहुरिया
लाल बिलाउज धोती करिया
माथे चम-चम टिकुली चमकै
गोरहर हाथ म हरियर चुरिया
सीसा लइकै माँग सोझावैं
क्रीम-पाउडर रोज लगावैं
फरमाइस सब पूर हुवै पर
घर से बाहर निकरि न पावैं
केतना खेत कहाँ पै बाटै
जान न पावैं जिनगी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

राखैं सासू अपने कसि मां
जइसै की गाय रहै बस मा
लागै कुलि बुद्धी चूल्हा मा वै
भोजन नीक पकावैं घर मा
दिन-रात रहत अन्दर-भीतर
कुछ साँवरि भी लागैं गोरहर
देखन मा लाल गुलाब लगैं
केतनौ जंजाल रहै सिर पर
लेकिन नइहर कै नावं लेहे पै
आंसू आवै आँखी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

लेहसुवा-केरमुआ-अमलोनी
सोचिअ थै जाय साग खोंटी
तीनौ कां यक्कै मा मेराय
लहसुन के तड़का से छौंकी
हमरे यक जने तौ यस मनई
तूरैं रोजै सरगे तरई
जाई माँगी ठकुराइन से
सरसौ कय तेल एक परई
गोजई कै हथपोइया रोटी
सेंकब कंडी की आँची मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

चला हटावा मेलिया-मेटवा
खाबै ना बोलत बा पेटवा
थरिया झन-झन बाजत बाटै
छः बिटिया प पइदा भै बेटवा
बहुत अगोरिन पंडित बाबा
कइकै किस्मत से समझौता
घर मा वंश चलावै ताईं
यक बेटवा कै रहा मनौता
धगरिन ढूध पियावैं, रोवै
नन्हा – मुन्ना सौरी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

बेटवा भये सब सोहर गावै
बिटिया होय तौ मुँह बिचकावै
कहैं भवानी आयी बाटीं
झौवा भै खरचा करवावै
‘बेटवा होतिव खूब खियाइत
मूड़े पै बइठाय खेलाइत
हँसी-हँसी मा हँसि कै बोलिन
मरि जातिउ तौ फुरसत पाइत’
बिटिया ताकै कुछू न बोलै
भाई लादे कनियाँ मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

बिटिया ! तू तनी वोनाय जाव
ओढ़ना सीयै बइठी बाटी
सूई मा धागा नाय दियौ
हमरे देखात नाहीं आंखी
ई टुटा खटोला झोल खाय
बनिकै गठरी अब ना सुतिबै
धइ दिहेन उजार-फुजार कै हम
वै बोलिहैं काने सुनि लेबै
यक नीक रजाई पाय रहेन
वोका दइ दिहेन पतोहे कां
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

पहिलउठा भै जुरतै मरि गै
ताना-बोली से जिउ भरि गै
यक ठू बेटवा के चक्कर मा
बिटियै-बिटिया पइदा होइ गै
दूसर मेहरी हमरी नाईं
जा लइ आवा अपनी ताईं
तू दांत चिदोरे खड़ा हया
चिल्लाई थै सुनत्या नाहीं
जाई थै बहि-बिलाय जाबै
धंसि जाबै कूआँ-खाई मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

होते नाहीं लरिका-बच्चा
कानाफूसी से जिउ कच्चा
सब जने कचाहिन केहे हये
दीदी-बहिनी, मरदी-मरदा
मनसेधू हमरे कहत हये
पहिरब-खाबै-पीबै अच्छा
दुनिया औलाद से पटी बाय
काहे तू करत हयू चिन्ता
हम दुवौ परानी ठीक-ठाक
दुसरे-दूसर क्यो बीचे मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

चाटै गइया आपन लेरुआ
हमहूँ क् चाही येक दुलरुआ
ना जाने वै कहाँ से लाये
पाये यक ठू बच्चा परुआ
विधवा दीन-दु:खी महतारी
या तौ कउनौ रही कुँवारी
कठिन करेजे फेंके होई
गड़ही मा झाली के आरी
बहुत रह्यू औलाद कै भूखी
पाय गयन हम सेती मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

कही तौ माई मारी जाई
नाहीं बापू कूकुर खाई
तुंहसे काव कही अब बहिनी !
कहिकै इज्जत खुदै गंवाई
बुढ़ऊ बाहर रंग जमावैं
नीक-नीक परबचन सुनावैं
सासू राती गोड़ न मीजैं
सौ-सौ गारी, झापड़ पावैं
यक दिन तौ कपड़ा निकारि वै
खड़ा कै दिहिन ठण्ढी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

नेम-धरम से रोजै पूजा
वनके लेखे नाहीं दूजा
बात निकारैं बात-बात मा
बाती मा बाती कै गूझा
घूंघुट से बहिरे झाँके पै
डोलै लागअ थै सिंहासन
अपुवां घूमैं कोलिया-कोलिया
मेहरारुन पै पहरा–सासन
छटकत घूमत रहेन नइहरे
जेल भवा ससुरारी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

सइंतौ-माजौ, चूल्हा बारौ
भन्छौ दिन भै जिउ दइ डारौ
घर कै मेहरारुन गाय-भइंस
मारौ–पीटौ खूँटा गाडौ
बिटिया बा नीक पढ़ाकू बा
दरजा मा सबसे अव्वल बा
काव कही औलाद कां अपने
बेटवा तौ गोबर-गणेस बा
खाय-पियै, डुडुवाय जाय ना
बिन मारे इस्कूले मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

सुन लेत्यू बात मोर माई
बापू से कइसै करी ढिठाई
ना छोड़वावा पढ़ै दिया हम
आगे आउर पढ़ब पढ़ाई
खबवा खाव चुपाई मारे
जाड़ हुवत बा जात्यू सोई
बिटियै जादा पढ़-लिखि लेइहैं
तौ बियाह मा दिक्कत होई
खुसुर-फुसुर माई औ’ धीया
बहसैं रात रसोई मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

तू घाम-घमौनी करत हयू
बइठी बाट्यू झोंटा खोले
बड़कऊ उहै आवत बाटे
देखिहैं रहिहैं ना बिन बोले
आवा हमरे सब चला चली
दक्खिन पिछवारे की वोरी
फइलावा वहीं झुरात बाय
लंहगा–साड़ी–साया–चोली
सूदेन कै मेहरी नीक बहुत
घूमैं कुलि खेते-खेते मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

सुन्दर अंखिया यत्’तत-यत्’तत
पातर कै गठी देह गोरहर
धन देखि फलाने नाधि दिहिन
बउदहा से गाँठ जुड़ा वोकर
रोवत बा कहत बाय काकी !
कि जाब दुबारा ना ससुरे
मरि जाबै खाय ज़हर-माहुर
वै बाप बराबर हैं हमरे
समझाई थै मानत नाहीं
बहुतै डर लागत बा हमकां
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

चूल्हा पै चढ़ा रहा अदहन
देवरानी से बतियात रहेन
दलिया होयगै पातर पानी
डारै कां नोन भुलाय गयन
परसा खबवा खाये नाहीं
यक जने काल्हि रिसियाय गये
हम घंटा भर से खड़ी-खड़ी
जब खूब मनायन मान गये
पानी छुई लियौ चलौ जल्दी
ना बइठी रहौ सिवाने मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा.

__आशाराम जागरथ

[जारी….]

पाहीमाफी [१४] : तिरिया-गाथा (१)

आशाराम जागरथ रचित ग्रामगाथा ‘पाहीमाफी’ के  “पहिला भाग”,  दुसरका भाग , तिसरका भाग , चौथा भाग , पंचवाँ भाग , ६-वाँ भाग , ७-वाँ भाग , ८-वाँ भाग , ९-वाँ भाग१०-वाँ भाग  , ११-वाँ भाग , १२-वाँ भाग, १३-वाँ भाग के सिलसिले मा हाजिर हय आज ई १४-वाँ भाग :

village_india_scene_paintings_nature_hut_street_agriculture_farmers_पाहीमाफी कय ई भाग गांव कय ऊ सच कहय कय कोसिस करत है जेहिका बहुत कम कहा गा अहै. यक दलित समाज कय नयी-नबेली बहू कइसे घरे औतय खन काम के चक्की मा पीसि दीन जात है, ई हियाँ देखा जाय सकत है. कइसे औरतय आपस मा यक दूसरे से बतियात हयं ई बड़ी सहजता से हाजिर कीन गा अहै. बात-चीत केरि भंगिमा देखउ हियाँ तनिका:

बहिनी ! खजुवात मूड़ बाटै
सगरौ, घर काम परा बाटै
दइ द्या साबुन यक दाईं भै
बरवा लासियान जट्ट बाटै

नवा नवा बियाह भा हुवै अउ मरद मेहराऊ दूनउ क जीवन-उत्सव से काटि के कामे मा खटावा जाय, ई जिंदगी के साथ पाप आय. गांवन मा ई पाप खूब देखाये! ठकुराना केतनी हनक के साथे, अउ केतनी निर्लज्जता से, यहि पाप-वृत्ति पै उतारू है :

कहि द्या बनठन भूले से भी
ठकुरहना वोरी ना आवै
जेकरे बल पोखना लाग बाय
वोका नाधब हरवाही मा

दुनिया भर के काम के जंजाल मा जिंदगी काटी जाय अउ जियय कै मौकै न मिलै तौ भरी जवानी भार लागै लागत है. केतना बेलाग यथार्थ कहा गा बाय :

हम बोझ सम्हारी कि अँचरा
जिउ धुकुर-पुकुर धुक बोलअ थै
दुई बोझ कुदरती छाती पै
सब बोझन से भारी मोकां

तौ गुजरा जाय पाहिमाफी के यहि चउदहें भाग से. : संपादक
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  • तिरिया-गाथा (1)

दुइ जगह से उबहन टूट रहै
पानी ना यक्कौ घूँट रहै
करिहाँव मा दाबे बात करैं
नीचे से गगरा फूट रहै
‘सीधा-पिसान कुच्छौ ना बा
कलिहैं से चूल्हा बुता बाय
अब काव कही बहिनी तुहुँसे
किस्मतियै ही जब फुटा बाय
कोदौ-सावाँ जउनै मिलितै
दइ देत्यु तनी उधारी मा’
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

बहिनी ! खजुवात मूड़ बाटै
सगरौ, घर काम परा बाटै
दइ द्या साबुन यक दाईं भै
बरवा लासियान जट्ट बाटै
आवा ढीलौ तनि हेर दियौ
औ लीख सुरुक चुट्काय दियौ
धीरे-धीरे मँगियाय बार
नीबी कय तेल लगाय दियौ
तिल कै पाती ना काम करै
गज्झा ना चिकनी माटी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

उठा पतोहा साँस लिया तू
कंड़िया छोडि कै जांत लिया तू
जात हई हम करै मजूरी
सतुआ-ककई फांक लिया तू
घर-भीतर-बाहर काम किहेन
मरदेन कै घुसा-लात सहेन
चुरिया कै धोवन बदा रहा
हम बड़े भाग तुहुंका परछेन
करछुल आछत का हाथ जरै ?
बुढ़िया होइ गयन जवानी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

******

परदेसी आये राती मा
मुंह लाल-ललछहूँ लाजी मा
माँगी मा सेंनुर मुस्कियाय
मरकहवा काजर आँखी मा
सोने कै बाली चम-चम-चम
नाकी मा कील तकै तक-तक
झुलनी झमकउवा ओंठे पै
हीलै-डोलै लक-झक लक-झक
ठकुराइन बोलिन ‘का रे, तू !’
पहिचानेन नाहीं मो तोहकां
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

ठाकुर ठकुराइन का ताकैं
चानी न सोहै नाक-कान
कुछ गुनैं-धुनैं कोयर बालैं
उंगुरी कटि गै जब उड़ा ध्यान
बोले, मन बक्कै आँवं-बाँवं
अलही-बलही फगुवा गावै
कहि द्या बनठन भूले से भी
ठकुरहना वोरी ना आवै
जेकरे बल पोखना लाग बाय
वोका नाधब हरवाही मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

******

रहि-रहि कै हिचकी आवत बा
छपरा पै कौवा बोलत बा
माई मोहान होइहैं साइद
लागत बा केऊ आवत बा
सौंकेरे से हम छोलिअ थै
तनिकौ मन नाहीं लागत बा
घसिया छक्कान बाय तब्बौ
हमसे नाहीं सँगिरात बाय
अम्मा ! हम घर कां जात हई
केऊ गोहरावत बा हमकां
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

भइया ! तू आया अनवइया
चौवा-चांगर दुइ ठू गइया
जाई सब कइसै छोड़-छाड़
आन्हर बाटीं सासू मइया
घर कै जंजाल बाय माथे
‘बिचउलिया’ दगा किहिन साथे
बस यक्कै चीज नीक बाटै
बहनोई तुहार पढ़त बाटे
वै कहत हये कि सबर करा
सब दिन ना कटी गरीबी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

भइया ! तू हमसे छोट हया
दुःख आपन तुहुँसे काव कही
बस फटही लुगरी इहै बाय
कउनौ खानी तन ढके हई
सावाँ-काकुन हम कूटिअ थै
जांता मा गोजई पीसिअ थै
सब खाय लियैं तब खाइअ थै
परथन कै टिकरी पाइअ थै
गवने कै मेंहदी छूट नाहिं
वै नाधि दिहिन मजदूरी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

हँसि कै बोलिन वनकै दुलहिन
रोवा जिन तू बनिकै विरहिन
ई कवन पंवारा नाधे हौ
हमसे तौ नीक हयू सब दिन
‘आन्हर सासु, ससुर भी अन्हरा
येक जने वोऊ चकचोन्हरा
पइदा भये न यक्कौ लरिके
घूमिअ थै दइ आँखी कजरा
जा गोड़ धोय द्या भइया कै
पानी भरि लावा थारी मा’
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

भइया ! अबहीं ना जाव आज
दुइ दिन तू आउर रुक जात्या
बा धरा बाध-पावा-पाटी
यक खटिया सालि बीन जात्या
कटिया-पिटिया मा रहेन लाग
लेकिन बिहान नाहीं टारब
उठि बड़े भिन्नहीं नारा मा
टापा लइकै मछरी मारब
तू हीक भै अच्छे खाय लिहा
धइ देबै थोरै झोरा मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

******

सुन्नर नीक पतोहिया तोरी
देखतै थूकै हमरी वोरी
सुनै न ना तौ करै बेगारी
दइ पइबा ना कबहुं उधारी
बोलिस आँख देखाया नाहीं
केहू क् दिया हम खाइत नाहीं
जानै ऊ जे करजा खाइस
घर बिकान घरवाली नाहीं
जउने गाँव कै छोरी होई
जनत्या नाहीं तू हमकां
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

******

घूंघुट निकारि गोहूँ ढोई
रोई आपन दीदा खोई
अकड़ी गटई घरुहान रहै
बेसरम नजर ताकै मोही
‘घौलरा’ कां नाहीं काम-धाम
राही मा बइठ अगोरअ थै
हम बोझ सम्हारी कि अँचरा
जिउ धुकुर-पुकुर धुक बोलअ थै
दुई बोझ कुदरती छाती पै
सब बोझन से भारी मोकां
यकतनहा कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

ऊ पटक बोझ फरवारे मा
बाँहें रसरी करियाहें मा
हिम्मत जुहाय रून्हें गटई
मुंह ढांपे बोलिस सन्हें मा
ना भलमनई ना बड़मनई
तुहरे जाती रस्ता दूभर
होइकै अकच्च मुंह खोलि दियब
इज्ज़त-पानी छीछालेदर
तुहर्’यौ घर माटी कै चूल्हा
घर घुसरि क् देखा भितरी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा.

__आशाराम जागरथ

[जारी….]