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सबका होली कै सुभकामना !! .. “ दिगम्बर खेलैं मसाने में होरी ……. ” ( कंठ : पं. छन्नू लाल मिसिर )

फोटू गिरिजेस जी के बिलाग से..

बसे पहिले तौ सबका होली कै सुभकामना !! यहि मौके पै सुना जाय पं. छन्नू लाल मिसिर कै गावा ई गीत :
दिगम्बर खेलैं मसाने में होरी ..
खेलैं मसाने में होरी
.. दिगम्बर खेलैं मसाने में होरी ..
भूत पिसाच बटोरी ..
.. दिगम्बर खेलैं मसाने में होरी ..
लखि सुन्दर फागुन छ्टा के
मन से रंग गुलाल हटा के
चिता भस्म भरि झोरी ..
.. दिगम्बर खेलैं मसाने में होरी ..
गोप न गोपी स्याम न राधा
न कोई रोक न कौनौ बाधा
न साजन न गोरी ..
.. दिगम्बर खेलैं मसाने में होरी ..
नाचत गावत डमरू धारी
छोड़ै सर्प गरल पिचकारी
पीटैं प्रेत थपोरी ..
.. दिगम्बर खेलैं मसाने में होरी ..
भूतनाथ की मंगल होरी
देखि सिहाँय बिरिज कै छोरी
धन धन नाथ अघोरी ..
.. दिगम्बर खेलैं मसाने में होरी ..

अब सुना जाय यहि गीत कै यू-टुबही प्रस्तुति:

सादर;

अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी 
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आप सबका होली कै ढ़ेरन सुभकामना … होली खेलैं रघुबीरा अवध मा …

                                                                                      
पढ़ैयन का राम राम !!!
‘ अवधी कै अरघान ‘ की महफ़िल मा आप सबकै स्वागत अहै ..
—————– आप सबका होली कै ढ़ेरन सुभकामना ———————- 
                                                                                   
भैया !
जब पुरोहिताई के चन्दन पै सामाजिक-समरसता कै अबीर चढ़ जाय , हलकोर के मल दियय इंसान इंसान का , राम अउर रहीम यक्कै ठाँव बैठि के गोझिया दाबैं , परिवार कै माहौल कुछ अस बनै कि ” फागुन मा बाबा देवर लागैं ” , प्रेम कै ई चरम जब औतरैतब समझौ कि ” होली ” हाजिर है ! 

आज अवध के इलाके मा होली के परकार का बरना चाहित है , वैसे तौ तमाम परकार हैं यहिकै , पर मुख्य रूप से तीन रूप पै ध्यान रखत आगे बढ़ब … यै तीन परकार यहि तरह हैं —- 
१) लखनऊ कै होली .
२) बैसवाड़े कै होली .
३)  अजुध्या कै होली .
……… अब तीनिउ पै थोरा ठहर के बतुवाब ..

(१) लखनऊ कै होली —

” किसोरी संग होली खेलत नंदकिसोर ” – जैसे होली गीत का सुनि के अवध कै नबाब वाजिदअली साह अपने गले कै जंजीर उतार के पुरस्कार के रूप मा दै दिहे रहे ! .. नबाबी – किस्सन से भरी है लखनऊ कै होली .. गंगा – जमुनी संस्कृति के क्रोड मा बसे लखनऊ मा उड़त होली कै अबीर अमीर गरीब कै भेद नाय करत .. सुबह ६-७ बजे से होलिहारन कै टोली निकरि परत है ..लोगै यक-दुसरे का रंग से सराबोर कै दियत हैं .. संकर भोले कै बूटी छनत है … नसे मा झूमत , यक दुसरे का धकियावत , मौजत,अनाफ-सनाफ बकत , लुंठ लुंठ लुन्ठात लोगन कै कारवां देखा जाय सकत है .. दुपहर २ बजे के बाद सभै बन – थान के , इतर-फुलेल मारि के निकरि परत है होली मिलय .. अमीनाबाद पार्क कै होली मिलनोत्सव अपने आप मा अद्भुत रहत है .. सब धरम सम्प्रदाय जाति आपस मा मिलत हैं … 
        लखनऊ कै फगुहार धमार – फाग गावत हैं .. ई फाग हियाँ बहुत गावा जात है ;

” सुदामा , कान्हां भेटन आये , सुदामा कान्हां भेटन आये |
जबहिं सुदामा ग्वैड़े आये , फूल लई समुहे खाये | सुदामा ………….
जबहिं  सुदामा भीतरे आये , भरि-भरि अंग लगाये | सुदामा ………….
जबहिं सुदामा अंगना आये , रूचि-रूचि भोज कराये | सुदामा …………. 
सुदामा , कान्हां भेटन आये , सुदामा कान्हां भेटन आये | |  ” 

(२) बैसवाड़े कै होली — 

बैसवाड़ा अवध कै सान है .. हियाँ कै जिन्दादिली होली का परवान चढ़ाय दियत है .. बसन के दिनन से ही चौपालन मा फाग सुरु होइ जात है , ताक धिना धिन – ताक धिना धिन , निराला फाग जारी रहत है .. बैसवाड़े कै ” बारागाँव ” कै होली तौ बहुत दूर – दूर तक जानी जात है .. बैसवाड़े कै औरतैं बड़ी निर्भीक होलिहार होति हैं , इनकै हंसी – मजाक , ठेलियाब , ऊधम , जिन्दादिली , सब जगहीं सर चढ़ी के बोलत है , मर्द का कै पाए इनकै मुकाबला .. बूढ़ा माई नए फैसन की बिटियन से कहति हैं —” सिखि लियव होली कै गौनई , नहीं तौ हमरे साथ सब चली जाई ! तब का सरग मा अइहौ हमसे सिखय ? / ! ” … मुल के सिखे ! ई सब .. सब तौ अंगरेजी गानन कै दिवानी हुवत जाति है .. 
भला कुछ मेहररुवन का याद है , ई गीत , गनीमत है ;

” गड़ि गे बसंत के ढाह बिना होली तापे न जाबै |
पहिली अनउनी ससुर मोर आये ,
ससुरा लौटि घर जाव , बिना होली तापे न जाबै |
दुसरी अनउनी जेठ मोर आये ,
जेठा लौटि घर जाव , बिना होली तापे न जाबै |
तीसरी अनउनी देवर मोर आये ,
देवरा लौटि घर जाव , बिना होली तापे न जाबै |
 गड़ि गे बसंत के ढाह बिना होली तापे न जाबै | | ” 

(३) अजुध्या कै होली — 

अजुध्या के कौनौ परोजन का हियाँ के मंदिरन से काटि के नाय देखा जाय सकत .. पांच हजार से ढेर  मंदिर हैं हियाँ , ऐसा लोगई बतावत हैं .. होली के समय पै मंदिर के भगवान भला कैसे होली न खेलिहैं ! .. भगवान के ओढर से सब मनई खूब होली खेलत हैं .. लोगई दूर दूर से इहाँ कै होली देखै आवत हैं .. इहाँ कै फाग कै ई गाना तौ सबके दिलो- दिमाग पै चढ़ा रहत है ;

” अवध मा होली खेलैं रघुबीरा , अवध मा होली खेलैं रघुबीरा |
केहि के हाथे कनक पिचकारी , केहि के हाथ अबीरा ,
राम जी के हाथे कनक पिचकारी , लछमन हाथे अबीरा | .. अवध मा होली खेलैं ….. 
केहि के हाथे झांझ ढप सोहै , केहि के हाथे मँजीरा ,
राम जी के हाथे झांझ ढप सोहै , लछमन हाथे मँजीरा | ..  अवध मा होली खेलैं ……
अवध मा होली खेलैं रघुबीरा , अवध मा होली खेलैं रघुबीरा || ‘
.
वैसे तौ बिस्तार से बहुत कुछ लिखा जाय सकत है मुला आज एतने बन पावा है , अब यहि गीत कै मजा लीन जाय जिहमा होली कै उत्साह रंग के तरीके से चढ़ा बाय ! 
                                                                             

आप सबका होली कै खूब सुभकामना !!!!!!
राम राम !!!!!!!!!!!! 

[चित्र : साभार गूगल से]