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दसहरा, ईद, तनाव, हमरी रुदौली और आसपास


तहसीन मुनव्वर साहिब
कै लिखा ई अवधी आलेख मूलरूप से उरदू डेली अखबार ‘द इंकिलाब’ [ THE INQUILAB ] मा छपा रहा, लिपि उर्दू रही। ई हियाँ नागरी लिपि मा हाजिर कीन जात अहै, लेखक की इजाजत से, साभार ‘द इंकिलाब’। यहि आलेख मा पिछले महीने फैजाबाद-अवध मा भये मजहबी तनाव पै लेखक कै आपबीती औ तबसिरा दुइनौ अहै। लेख अपने मूलरूप मा अहै, बस कहूँ-कहूँ अवधी ब्याकरन के हिसाब से तनिका-मनिका बदलाव कीन गा है। : संपादक 
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दसहरा, ईद, तनाव, हमरी रुदौली और आसपास

रुदौली मा दसहरे वाले दिन हम अपने बच्चन संग मगरिब की नमाज के बाद नवाब बाजार जात रहेन कि बड़े ईमामबाड़े के नुक्कड़ पर होटल मा हमरे अजीज मिल गये। हम उनसे पूछा का मियां रावण दग गवा? कहिन कहां दगा।

कोई भैलसर के पास वास वाले गांव मा मूर्ति खंडित कर दिहस रहे तो सब `पोशाले’ के हुआँ जाम लगाए हैं कि जब तक मुलजिम न पकड़े जइहैं तब तक न तो मूर्ति विसर्जन होइए न ही रावण दागा जाहिए। इ सुनके हमरे तो पांव के नीचे से जमीनें खिसक गई और हम बाजार न जाइ के उलटे पैर घर लौट पड़े।

हमका जब-जब मौका मिलत है हम अपने बच्चन का अपनी तहजीब के करीब लै जाइ की कोशिश करत हन। दसहरे की छुट्टी होए गई रहे और हम सोचा कि इह अच्छा मौका है काहे न दुइनौ त्यौहारन के जरिये आपसी मोहब्बत और भाईचारे कै दरसन कीन जाए। हम जब ट्रेन मा जात रहेन तो सताब्दी और राजधानी मा पढ़े के लिए दी जाए रही मैगजीन मा हिंदी में बकरीद पर लिखा हमार लेख पढ़त बच्चै बहुत खुशी महसूस कर रहे रहैं। हम ऊ लेख मा दसहरा, ईद और दीवाली समेत सभी त्यौहारन का देस मा एकता से जोड़कर देखे रहेन। हमरे कुछ हिंदू दोस्त फेसबुक पर लिखे भी रहे कि आप जो `अल्ला को प्यारी है कुर्बानी’ में बात कहिन हैं ऊ बहुत अच्छी है और हम सबका त्यौहारन का आपसी मोहब्बत बढ़ावै वाला समझेक चाही। अब आप समझ सकत हैं कि हम कौनी तरह की भावना कै पहाड़ लैके रुदौली मा ईद मनावै पहुंचे रहन।

पूरे कस्बे पर त्यौहारी मौसम छाया रहे। लाउड स्पीकर पर दिनभर माता की भेंट और उसी तरह के धार्मिक भजन आदि का जोर रहे। पांच वक्त की अजान की आवाज भी यही से जुड़ जात रहे। जब अपने आंगन में दोपहर में लेटत रहे तो कहीं दूर से राम चरित मानस की चौपायिन की आवाज इतनी अच्छी लगत रहे कि बताए नहीं सकत हैं।
जापे कृपा राम की होई,
तापे कृपा करे सब कोई।

कबौ-कबौ हमका ई सोर परेसान भी करत रहे मगर हम सोचत रहन कि रमजान मा तीन बजे से हमहूँ लोग सभी का जगाए रखत हन फिर इतना तो आपसी रवादारी मा बर्दास्त करहिन का पड़त है। रुदौली मा हमार टाटा फोटोन का इंटरनेट काम नहीं करत है यहिलिए वहां हम अनूप संघाई जो रामलीला और दुसरे हिंदू धार्मिक आयोजन से जुड़े रहत हैं, के पास जाइ के अपने दुइ-चार इंटरनेट के काम कर लेत हन। ऊ कसबाती मिलीजुली तहजीब का हिस्सा बने रहत हैं जबकि उनका ताल्लुक ऐसी सियासी पार्टी से बतावा जात है जेहिका हम लोग मुस्किल से वोट देत हन। हम उनसे कई बार कहा कि हमका रामलीला देखै जाय क है पर रुदौली मा अब के बिजली का सिलसिला अइसा रहा कि रात का दस बजे आवत रहे और चार बजे सबेरे चली जात रहे। फिर सबेरे नौ बजे आवत रहे और दोपहर दुइ बजे निकल जात रहे। वही मा हम लोगन का सोवै-जागै का वक्त आए जात रहे। रामलीला वैसे तो दुइ जगह हुइ रहे रहै मगर घर से दूर रही तो हम जाए नहीं सके पर हमका मालूम रहे कि हिंदू-मुस्लिम एकता कहीं न कहीं उनमा अपनी झलकी जरूर दिखाए रही होए।

हमरे घर जल्दी वापस आए-जाए से हमरी बेगम चौंक पड़ी। हम तीनों बाप-बेटेन का दस्तूर ई रहे कि हम लोग मगरिब इसा पढ़के रुदौली मा मालिक चचा के होटल से कबाब रोटी या ऐसा ही कुछ खाएके वापस आवत रहन। जब हम उनका बतावा हालात खराब होए रहे हैं तो मुंबई दंगन का डर उनके चेहरे पर दिखाई देगवा। हम इधर-उधर फोन किहेन और मालूम करै की कोशिश किहेन कि रुदौली मा हालात कैसे हैं तो हर कोई तनाव मा दिखाई दिया। पिछले कुछ सालन मा दुर्गा पूजा का लैके पूरब मा काफी जोर बढ़ा है। रुदौली के आसपास होए वाली दुर्गा पूजा के बाद विसर्जन के लिए मूर्तिन का लैके काफी दूर गोमती जावा जात है। ई लोग रुदौली से गुजरत हैं और अकसर उनका 25-30 किलोमीटर चलै का पड़त है। जुलूस बहुत लंबा होए जात है और देर रात तक विसर्जन पूरा होत है। अब हालत ई होए गई रहे कि वो सब पोसाला जो कि हमरे घर से कुछ ही दूर है पर जम गए रहैं। अब जब उन लोग जाम लगाए दिहिन तो तनाव बढ़ै लगा। नेशनल हाइवे पर भी हंगामे की खबर हमरे पास आई रहे। वहीं घर के करीब एक हमरे आरिफ चचा हैं। हम अकसर उनके पास जाइके सेरो-सायरी पर बहस किया करत हन। उनके खुमार बाराबनकवी साहब से अच्छे ताल्लुकात रहे तो सायरी की अच्छी समझ रखत हैं। जब हम उनके पास गए तो परेसान दिखाई दिए। कहिन फैजाबाद में गोली चल गई है। दुइ लोग मारे गए हैं। उनकी बेटी शायद वहीं रहत है। यहिलिए परेसान दिखे। उसके बाद आसपास से आग लगे की खबर आए लगीं। हम रुदौली मा बात किहेन तो सब यही कहन कि हमरी रुदौली मा कुछ गड़बड़ नहीं होए सकत है। हमरे बच्चे जो अब तक इस तरह की खबरन का टीवी-वीवी पर ही देखत-सुनत रहे जब खुद अपने करीब सुनिन तो घबराए लगे। अंदर से तो हम परेसान रहन कि काहे हम सबका लेकर दिल्ली से रुदौली आए गए। लेकिन प्रशासन की समय पर कार्रवाई के बाद कुछ लोग गिरफ्तार होए गए तो विसर्जन का मामला हल हुइ गवा। रात बेचैनी मा गुजरी और अगले दिन शाम का हमरे चचा के बड़े बेटे जो अब बाराबंकी रहे लगे हैं, अपने बच्चन संग आए गए तो हौसला मिल गवा। लेकिन उनसे ही सूचना मिली कि फैजाबाद भदरसा मा आगजनी की वारदात के दौरान एक आदमी चाकू लगे से मर गवा है। भदरसा हमरी ससुराल है मगर इतमिनान ई रहा कि हमरे ससुर आजकल ग्वालियर आए हैं। २५ की साम का एक बार फिर हम लोगन के फोन पर फैजाबाद और आसपास हालात के खराब हुवै की खबर आवै लगी। भदरसे से सटे छोटे-छोटे गांव से आग की खबरें आए लगीं और फैजाबाद मा भी वहि मस्जिद पर हमला कर दिया गवा जहां से एकता की मिसाल बने वाली राम बारात और दुर्गा प्रतिमा पर फूल बरसाए जात रहे। रिश्तेदारन से होई रही बातचीत मा पता लगत रहे कि जैसे साजिस के तहत कुछ लोग हालात बेकाबू करा चाहत हैं। खैर, ईद आवत-आवत हालात कुछ हद तक ठीक होए गए पर हम लोगन के जेहन से खौफ नहीं निकल पावा। हमरी बीवी तो एक रात बकरे के संग डर से जागी भी। दुइनौं का डर लगभग एक-सा ही रहा।

अखिलेस सरकार के आए के बाद ऐसा लगत है कि कुछ लोग या तो सरकार का बदनाम करे की खातिर या फिर उनहन की सह पर सूबे मा फिरकावाराना तनाव बनावा चाहत हैं। रुदौली और आसपास होइ वाली हिंसा के पीछे पुलिस और प्रशासन की नाकामी तो रहबै करी, जो अफसर हटाए गए उनमा साफ पता चल जात है कि एक खास नाम देखकर पुलिस मा जिम्मेदारी दी गई रहे। लोग तो यहां तक कहे लगे हैं कि अखिलेश सरकार के कुछ महीनन मा जिस तरह ऐसी-ऐसी जगह पर फिरकावाराना हिंसा हुई है जहां नब्बे मा हालात खराब होए के बावजूद कुछ नहीं हुआ रहे जो ई बताए रहा है कि वो मुसलमानन की जान और माल की हिफाजत करे में नाकाम होए रहे हैं। अब कहे वाले यहू कहे लगे हैं कि उनसे अच्छी तो बहन जी रहीं। कम से कम हम लोग सुकून से तो सोए लेत रहन। होए सकत है कि ई वक्त मुस्लिम वोटरन की मजबूरी अखिलेश यादव होंय पर को कह सकत है कि अगर ऊ हालात रोके मा यही तरह नाकाम रहे और हिंसा के बाद अफसरन का हटाना ही अपना फर्ज समझते रहे तो लोग उनसे मुंह न मोड़ लें। उनका याद रखेक होए कि मुलायम सिंह यादव देस कै प्रधानमंत्री बनना चाहत हैं मगर उनकी ई लापरवाही कहीं उनके पिता के यहि ख्वाब के पूरा होए मा रुकावट न बन जाए।

खुदा का सुकर है कि अब हालात काबू मा हैं। मगर अब हम लोगन का मोहर्रम की फिक्र सतावै लगी है। ऐसे मा पुलिस तो हर जगह मौजूद नहीं रह सकत है। राज्य सरकार का ई निश्चित करेक होए अगर किसी भी पुलिस थाने के तहत कुछ भी गलत हुइ गवा तो उनको बख्सा न जाहिए। साथ ही हिंदू-मुस्लिम सभन का मिलजुल के देश मा शांति कायम रखे के लिए जागरूक रहे की आवश्यकता है। अगर हम नहीं चाहें तो कोई मां ई हिम्मत न होए सकत है कि हमरे रहते हमरे पड़ोसी की तरफ टेढ़ी आंख से देख ले। हमका उम्मीद है कि मोहर्रम मा हम सबकी ओर से एकता और भाईचारा का ऐसा सबूत दिया जहिए जो हमरे हिंदुस्तानी होए की पहचान है। वैसे भी हमरे अवध मा तो आपसी भाईचारे का गिजरा कल हमे्सा आज से गले मिलकर आवै वाले कल की एकता का मजबूत बुनियाद रहबै किया और आगे अल्ला चाहे तो ऐसा ही होता रहिए।

(लेखक तहसीन मुनव्वर साहब मीडिया बिस्लेसक अउर साहित्यकार हैं। यै रुदौली-अवध से ताल्लुक रखत हैं। फिलहाल नई दिल्ली मा हैं। इनसे आप munawermedia@gmail.com पर संपर्क कै सकत हैं।)

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अन्ना हजारे..जनता कै अदालत..‘जियौ बहादुर खद्दरधारी’(रफीक शादानी)..

हम चुनाव लड़ब तौ हारि जाब। जमानतौ जब्त होइ जाये। आज लोगै १०० रुपया, सराब कै बोतल, साड़ी अउर आन-आन समान लैके मतदान करत अहैं।
जौन मनई आज तक मुखियौ कै चुनाव नाय जीति सका, ऊ यहि बात कै सर्टिफिकेट दे कि फलाने बेइमान हैं या इमानदार? .. चुनाव लड़ौ, जनता के बीच से, फिर कुछ बोलौ, जनता से बड़ी कौनौ अदालत नाय।
~ अन्ना हजारे के ताईं नेता तारिक 
अनवर कै समझाइस
(नीचे यू-टुबहे पीस मा सुना जाय सकत है।)
     अन्ना हजारे बेसक चुनाव प्रक्रिया से जुड़ा नाहीं हैं, मुला भ्रस्टाचार के खिलाफ आवाज उठावै कै हक उन्हैं पूरा है। जनता के अदालत कै बात केतना सही मानी जाय, जब यही अदालत जाने केतना भ्रस्टाचारिन का मुसलसल जितावत रहत है, ई वही अदालत है जेहिका निरच्छर अउर सोच-बिहीन राखि के सदियन से मलाई काटी जाति अहै। यही मलाई मारू तबका कै देन है कि लोगै ईमान की तरह आपन वोटौ बेंचत अहैं, जेहकै सीधी सीधी बात अन्ना जी किहिन हैं। यहि स्थिति मा खद्दरधारी नेतन की जमात से अलग कै केहू नेतन के भ्रस्टाचार पै अंगुरी देखाये तौ इन नेतन का मिरचा लगबै करे, जेहका तारिक अनवर की तिलमिलाहट मा देखा जाय सकत है। ई देस/संविधान/संसद/बिधानसभा कै बदकिस्मती कही जाये कि यही जनता केरी अदालत से जाने केतना खूनी/कतली/बाहुबली/ठेलुहै सफलता के साथ चुनाव जीतत हैं, अपने हथकंडन के चलते। यहिलिये यहि जनता के अदालत कै सीमा है।

     समय अस है कि भ्रस्टाचार संस्कृति कै हिस्सा बनत जात है। दनादन बिकीलीक्स ! लोकतंत्र कै चौथा खम्भा कहावै वाले मीडिया कै धोखेदार चेहरा ! पढ़े – लिखे बुद्धिजीविन तक मा गहरे पैठा स्वारथ ! न केवल राजनीतिक बल्कि अकादमिकौ संस्थन मा ब्यापा परिवार-वाद ! उसूल पै जियय वाला परेसान और मखौल कै हिस्सा भर ! नाहीं समझ मा आवत कि आपन के अउर परावा के ! स्विस बैंक कै नजारा अलगै कहत है कि देसी लोगन से बड़े लुटेरे तौ बिदेसिउ नाय रहे ! यहि मौके पै कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री एच. डी. कुमारस्वामी कै कहब काबिले-गौर है कि “ आज के समय मा अगर महत्मा गाँधिउ जीबित होते तौ या तौ भ्रस्टाचार के जरिये बैंक मा पैसा यकट्ठा करते या फिर राजनीति छोड़ देते।” ऐसे समय मा  अन्ना हजारे कै सबसे बड़ी सफलता ई है कि जहाँ सगरौ कूप मा भाँग परी है, वै कम-से-कम भ्रस्टाचार जैसे मुद्दे पै लोगन का सोचै के तरफ प्रेरित तौ करत अहैं, जन लोकपाल बिल कौनौ फाइनल फतह न आय। ई तौ यक्कै डग है, खामी यहू मा है, मुक भाँग-चेतना वाले माहौल से ई कुनमुनाहट लाख गुना भले अहै!!

     नेतन के चरित पै रफीक सादानी कै ई कबिता ‘ जियौ बहादुर खद्दरधारी ’ सादानी जी के आवाज मा हाजिर है:


     
     चलत चलत यहि यू-टुबहे पीस का देखै कै वकालत करब। यहसे काफी बातैं किलियर होइहैं:

सादर;
अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी