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औपनिवेसिक सत्ता सभ्यता कय भ्रमजाल अउर लोकगीत : बजरंग बिहारी ‘बजरू’

ई आलेख  आकार मा भले थोर लागय मुला निगाह मा बहुत फैलाव औ गहरायी लिहे अहय। कयिउ बाति अस हयँ जौन चेतना का कुरेदयँ। औपनिवेसिक सत्ता के दौरान जौन भरम-जाल रचा गा ऊ गजब रहा। यहिमा सोझैसोझ जे फँसा ते फँसबै भा और जे बिरोध कय जिम्मा उठाये रहा उहौ, आनी-आनी मेर से, फँसि गा। यहि भरमजाल के चलते लोकगीतन (लोकभासन) के साथ जौन असावधानी औ जादती भै, वहिका जहिरावत ई आलेख पढ़य जाय कय माँग करत हय। : संपादक
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औपनिवेसिक सत्ता सभ्यता कय भ्रमजाल अउर लोकगीत : बजरंग बिहारी ‘बजरू’   

तब बच्चा रहेन| प्राइमरी इस्कूल कय बिद्यार्थी| यक बियाहेम गयन रहा| अपनेन गाँव मा| पंडित जी मंत्र पढ़िन| दुलहा से कुछ करय का कहिन| फिर रोकि दिहिन| हमरे बगल मा यक बुजुर्ग बैठा रहे| वय कहिन की अबहीं मेहररुअन कय मंगलगीत सुरू नाहीं भवा| जब तक ऊ न पूर होये पंडितजी आगे ना बढ़ि पैहैं| तब तौ यहि बातिक मर्म समझि नाहीं पायेन| बादि मा धीरे-धीरे अर्थ खुला की समाज जतना महत्त्व (बेद)मंत्र का देत है वतना महत्त्व लोकगीतौ का मिलत है|
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परम्परा से लोकगीत का मौखिक साहित्य या वाचिक साहित्य के अंतर्गत रखा जात है| मानव जाति कय सबसे पुरानि अभिव्यक्ति गीतन मा भई होये| बिद्वानन कय कहब है की लोकगीत औ’ लोककथा सभ्यता के आदिकाल से रची जाति हैं| रचना कय ई दूनौ रूप अलग-अलग औ’ यक-दुसरे मा घुलिमिलि कय बनत हैं| लोकगीत कय यहै परिभाषा है की वहका लोक रचत है| मतलब की वहकै रचनाकार अग्यात रहत है| जैसय कौनौ गीत कय रचनाकार कय नाम पता चलि जात है ऊ लोकगीत के दायरा से बाहर होय जात है| कबीर कय निरगुन लोक मा खूब गावा जात है मगर वहका लोकगीत नाहीं कहा जात है| यहै हालि तमाम भक्त कबियन के गीत, कबिता कय बाटै| भजन लिखै वाले, बिरहा रचै औ गावै वाले लोककवि कहा जात हैं लेकिन उनकै रचना लोकगीत नाहीं कही जाति है| लोकगीत कय असली ठेकाना ताम्रपत्र, भित्तिपत्र, पोथी ना होय| ऊ तौ लोक के कंठे बिराजत है| अपने सुभाव से लोकगीत करिया अच्छर मा ढलै से बचा चाहत है| वहका आजादी चाही| ऊ ‘प्रामाणिकता’ के फेर मा नाहीं पड़त| जब छापाखाना आवा तब्बौ ओपहर ध्यान नाहीं गवा| वहका लिखित रूप बहुत बादि मा दीन जाय लाग| वहकै इतिहास लिखित साहित्य के इतिहास से बहुत पुरान बाटै जद्यपि इतिहास कय चिंता लिखित साहित्य का जादा रहति आई है| लोकगीत केर जड़ समय के अनंत बिस्तार मा फैली बाटै यहीलिए ऊ आपन प्राचीनता साबित करय खातिर परेसान नाहीं होत| लिखित साहित्य तौ मुट्ठी भर लोगन के बीच मा पढ़ा-समझा जात है मगर मौखिक कय पसारा सबके बीच मा रहत आवा है| आधुनिक काल मा जब साक्षरता कय प्रसार भवा तब लिखित साहित्य कय दायरा बढ़ा| ओहके पहिले जनता कय भावधन यही मौखिक साहित्य या लोकगीतन मा यकट्ठा होत औ बहत रहा| पूरे समाज कय सांस्कृतिक जीवन यही जलधार से सींचा जात रहा|

लगभग दुय सौ बरस देस फिरंगी गुलामी मा रहा| यहि दौरान वह पर ‘सभ्यता’ कय अतना दबाव पड़ा की ऊ नकलची लोगन से भरत गा| अपने धरती से, भासा से, भेस से, कथा औ गीत से दूरी बढ़त गय| यक उधार लीन्ह बनावटी जिंदगी हावी होत गय| हिंदी वर्द्धिनी सभा मा भाषण देत भारतेन्दु बाबू याद देवायिन की अंगरेज तौ यहर कय गीत बटोरे जात हैं लेकिन देसबासिन का कौनौ परवाह नाहीं है| फिरंगी हमरे लोकचित्त का परखे लेत हैं औ हम उनके सेक्सपियर या मिल्टन का पढ़िकै गदगद बाटेन| वहि देस कय अनपढ़ किसान, मजूर और घरैतिन का सोचत हैं, उनकय जीवन मूल्य कौने गीतन मा कौने तरह से जाहिर होत है यकरे प्रति हम यकदम उदासीन हन| वय अंगरेज हमरे लोकजीवन मा पैठ बनाय लेहें मगर हम उनके लोकजीवन के सम्बंध मा कुछू ना जानि पाइब-

आल्हा  बिरहहु  को  भयो  अंगरेजी  अनुवाद|
यह लखि लाज ना आवई तुमहिं न होत बिखाद||

भारतेन्दु बाबू ई बाति 1877 मा कहिन रहा| आजव ई वतनय सही लागत अहै| भारतेन्दु के करीब पचास साल बाद रामनरेश त्रिपाठी अवधी लोकगीतन कय संग्रह सुरू किहिन| अपने ग्रामगीत कय भूमिका मा वय हैरानी जताइन की हम लोगन का अपने धरती से अतनी दूर के खींच लयिगा! नई पढ़ाई हासिल कैकै जवन पीढ़ी सामने आवति है ऊ अपने घर-परिवार से, गाँव-जेंवारि से कतना अजनबी होय जाति है| जतनय ऊंच डिग्री वतनय जादा दूरी| रामनरेशजी नई सिच्छा ब्यवस्था कय पैरोकार रहे| खड़ी बोली हिंदी कय कट्टर समर्थक| वय सवाल तौ नीक उठायिन मगर वहकै जबाब तक नाहीं पहुँचे| औपनिवेसिक सत्ता सभ्यता कय जौन भ्र‘मजाल रचिस रहा वहके चक्कर मा ऊ पूरा जुग थोर-बहुत फंसा रहा| यक बिचित्र संजोग के तहत आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी वाली ‘सरस्वती’ पत्रिका खड़ी बोली के पच्छ मा आन्दोलन चलाइस| यहसे तौ कौनौ दिक्कत नाहीं रही मगर ई आन्दोलन अवधी, ब्रजभाषा के खिलाफ खड़ा होइगा! ई प्रचार कीन गा की यहि भासा के ब्यवहार से ‘राष्ट्र’ कय उन्नति ना होय पाये| यहव कहा गा की देहाती भासा मा नवा बिचार नाहीं कहा जाय सकत है| सभ्यता कय मानक बनाय दीन गय खड़ी बोली औ हिंदी कय दूसर बोली हीनतासूचक मानी जाय लागि| 1900 से लैकै 1940 तक जवन जहर बोवा गा वहकय फसल अब लहलहाति बाटै| मैथिली अलग भै, राजस्थानी आपन झंडा उठायिस| अब भोजपुरी अलग होति है| काल्हि का हिंदी कय बाकी हिस्सेदार सामने अइहैं| आगमजानी कबि तुलसीदास ‘मानस’ मा चेताइन रहा-

स्याम सुरभि पय बिसद अति, गुनद करहिं सब पान|
गिरा ग्राम्य सियराम जस, गावहिं सुनहिं सुजान||

बर्णबोध औ भासाबोध दूनौ पूर्वग्रहग्रस्त हैं| यहि दोहम तुलसी पूछत हैं की का करिया गाय कय दूध गोरहरि गाय के दूध से कमतर होत है? अक्सर अस मानि लीन जात है| जबकि असलियत ई है कि करिया गाय के दूधे मा जादा गुण होत है| ऐसे भासा कय मसला है| चहै गाँव कय बोली होय या संस्कृत, वहि भासा मा का कहा गा है, यहसे बाति कय महत्त्व तय होये| कथ्य निर्धारक होत है, भासा नाहीं| महत्त्व रंग से या वर्ण से तय न करौ, पहिले वहकय गुण देखौ| समझदार कय यहै पहचान है| सयान लोग संस्कृत मा रचित रामायण से अवधी मा लिखित रामचरितमानस से भासा के आधार पर छोट-बड़ा ना मनिहैं| वय गुण के कारण दूनौ कय सम्मान करिहैं|

अंगरेजन के सासनकाल मा जवन मानसिकता बनी ऊ अब तक कायम है| लोकगीतन का आजौ स्कूली पाठ्यक्रम मा कौनौ जगह नाहीं मिली है| पहली से लैकै बारहवीं तक बिद्यार्थी कौनौ दर्जा मा अपने इलाका के लोकगीत कय दरसन नाहीं कय सकत हैं| हिंदी मा एम.ए. करय वालन का लोकगीत नाहीं पढ़ावा जात है| हाँ, केऊ-केऊ हिम्मत कय-कय लोकगीत का रिसर्च खातिर चुनत है| यहसे कौनौ खास फरक नाहीं पड़ै वाला है|

जनजीवन बहुत तेजी से बदलत है| लोकगीतन के संग्रह कय तरफ विसेस ध्यान दियब जरूरी है| पूरी सावधानी से उनकय दस्तावेजीकरण होय| जिंदगी तौ अपने गति से चले लेकिन परम्परा से जौन धरोहर हमका मिली है वहका संजोय लेब आवस्यक लागत है| यहि बीच लोकगीतन कय स्वरूप बदला है, उनकय भासा बदली है| वहका बारीकी से समझैक चाही| जागरूक लोग ध्यान देंय, लोक मा काम करय वाली संस्था ध्यान देंय औ सबसे जादा सरकार कय यह पर ध्यान जाय| तब्बै कुछ बाति बनि पाये| सोसल मीडिया अब गाँव-गाँव मा फैलि गय है| यहका रोकब संभव नाहीं है| हाँ, यह स्थिति कय लाभ उठावा जाय सकत है| लोकगीतन कय छेत्रीय बिबिधता का समझय मा नई मीडिया से सहायता लीन्ह जाय सकत है|

अवधी लोकगीतन कय बिसयबस्तु लगभग वहै है जौन हिंदी छेत्र के दोसर जनभासा मा मिलत है| अलगाव दुइ मामला मा देखाय पड़े| पहिल भिन्नता अवधी लोकजीवन मा राम कय मौजूदगी के कारण है औ दोसर वहके मिली-जुली संस्कृति के कारण| मध्यकाल मा मुस्लिम जनता हिंदी प्रदेस के हर भासा-बोली मा रही मगर यहि जमीन से निकले सूफी कबि अवधी का अपने कबिता के लिये चुनिन| 1350 से लैकै 1900 तक लगातार सूफी प्रेम कबिता अवधी मा लिखी गय| यहिकै ई असर पड़ा की अवधी मा मुस्तर्का तहजीब मजबूत होत गय| संत लोग यहि धारा मा खूब जोगदान किहिन| आजादी के आन्दोलन मा अवधीभासी जनता बढ़ि-चढ़ि कय हिस्सा लिहिस| यहि दौरान अवधी मा स्वतंत्रता का लैकै खूब जज्बाती गीत लिखा गा| यहि संग्राम मा अगुआई करै वाले नवा नायक उभरे| लोकगीतन मा वय पूज्य नायक बनावा गे| आजादी मिलय के बाद अवधी लोकगीत मा फिर थोरै तब्दीली आई| अब जनता कय सुख-दुःख का केन्द्रीयता मिलय लागि| धर्मभावना थोरै पीछे पड़ी| सिच्छा औ राजनीति मा लोकगीतन कय रूचि बढ़ै लागि|

सम्पर्क: 
फ्लैट नं.- 204, दूसरी मंजिल, 
मकान नं. T-134/1,
गाँव- बेगमपुर,
डाकखाना- मालवीय नगर,
नई दिल्ली-110 017
फोन- 09868 261895

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अवधी साहित्य की समस्या और आचार्य कवि श्याम सुंदर मिश्र ‘मधुप’

इंटरनेट पै मधुप जी के अवधी अवदान क ध्यान मा रखिके लिखा ई पहिल आलेख आय। यहिते पहिले बस आप  उनके साथ भवा यक इंटब्यू जरूर देखि सकत हँय। यहि आलेख क बड़े लव से युवा अवधी अध्येता सैलेन्दर सुकुल लिखिन हैं। हम उनकय बहुत आभारी हन्‌। : संपादक
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*शैलेन्द्र कुमार शुक्ल

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मधुप जी के साथ शैलेन्द्र शुक्ल

अवधी कविता अपने आप में ही आचार्यत्व की एक खरी कसौटी है। जिस भाषा में जायसी, तुलसी और रहीम जैसे आचार्य कवि हुये हों उस भाषा की कविताई के साथ खिलवाड़ नहीं हो सकती। भाषा का अपना एक चरित्र होता है, इस प्रकार हर भाषा अपने स्वभाव का इतिहास और भूगोल अपनी संस्कृति में रचती है। मध्य काल की प्रारम्भिक अवस्था से ही अवधी का विराट वैभव काशी से कान्यकुब्ज तक दिखाई पड़ता है जब की इसका केंद्र अवध ही था । पं॰दामोदर शर्मा के ग्रंथ ‘उक्ति-व्यक्ति-प्रकरण’ से लेकर जगनिक के आल्ह-खंड तक इसे देखा जा सकता है।इसी भाषा में सूफी कविता की एक स्ंवृद्ध परंपरा मिलती है, जिसकी तुलना विश्व के किसी भी पुराने साहित्यिक और सांस्कृतिक आंदोलनों से की जा सकती है। ऐसा विराट आंदोलन और व्यापक पहल शायद फिर कभी दिखाई नहीं पड़ी। इस काव्यपरंपरा के लगभग सारे कवि मुसलमान थे। इन मुसलमान कवियों ने अवधी की जो साझा संस्कृति रची वह अवधी और हिन्दी में ही नहीं विश्व साहित्य में भी एक महत्वपूर्ण मिसाल के तौर पर पेश की जा सकती है। यह काव्यधारा एक संक्रमण की संस्कृति है, जहां भाषा एंटी-वाइरेस का काम करती है। मानवीय मूल्यों का कलात्मक संरक्षण भाषा के साहित्यिक होने का बड़ा प्रमाण है। एक प्रश्न यहाँ जायज है इन सूफी कवियों ने अवधी भाषा को ही क्यों चुना ?जबकि अवधी के साथ-साथ समय का अनुगमन ब्रज-भाषा भी कर रही थी औरब्रजभाषा का स्वाभाविक चरित्र प्रेम के लिए ज्यादा निकट था, प्रेमगाथाओं के अनुकूल भी ! इसका एक कारण यह भी हो सकता है कि ब्रजभाषा प्रबंध के लिए तैयार न थी और दूसरा यह कि इन सूफी कवियों को केवल प्रेम ही स्थापित करने का लक्ष्य न था । वह जीवन के विविध पक्षों की विराटता लिखना चाहते थे। कुछ सूफी कवि इसी तरह के प्रेमाख्यानक अन्य लोक भाषाओं में भी लिख रहे थे, लेकिन जो ऊंचाई अवधी के प्रेमाख्यानों की है वह अन्यों की नहीं। यह अवधी भाषा के सामर्थ्य का एक जोरदार पहलू है।

डॉ॰ श्याम सुंदर मिश्र ‘मधुप’(1922-2014)अवधी साहित्य के पहले इतिहासकर हैं। वह अवधी के प्रगतिशील कवि और आचार्यत्व के गुणों से परिचित एक प्रबुद्ध आलोचक भी। उनका लोचनात्मक व्यक्तित्व लोक की समाजशास्त्रीय पद्धति के आलोक में दिखाई पड़ता है । उन्होंने अपनी मातृभाषा अवधी में बड़ा काम किया । और यह कम महत्वपूर्ण नहीं कि जब स्थापित खड़ीबोली हिंदी को लेकर एक दूसरे की पीठ सहलाने वाले लोग विद्वता का ढोंग बड़े बड़े के नाम पर सिर्फ हिंदी का ढिढोरा पिटा जा रहा हो, संयुक्त राष्ट्र संघ की भाषाओं में हिंदी को शामिल किए जाने का दबाव बढ़ रहा हो, यह सब जिन लोगों द्वारा किया जा रहा हो उन्हें यह मालूम ही न हो कि हिंदी आखिर है क्या ! इनकी नजर में क्या हिंदी के पहले कवि हरिऔध हैं ! बहरहाल हिंदी के विदूषकों ने यहीं माहौल बना रखा है । हिंदी के महत्वपूर्ण आलोचक डॉ॰ मैनेजर पाण्डेय की यह उक्ति कितनी प्रासंगिक है ‘आजकल भूमंडलीकरण की जो आँधी चल रही है हर बुद्धिजीवी स्थानीय होने से पहले राष्ट्रीय बन जाना चाहता है और राष्ट्रीय होने से पहले अंतरराष्ट्रीय’। इससे हिंदी का कोई हित होने वाला नहीं है यह बात तो तय है । डॉ॰ मधुप ऐसे ही कठिन समय में उस हिंदी के लिए काम करते रहे जो हिंदी जायसी, तुलसी और रहीम की हिंदी थी । जिस हिंदी पर हिंदी साहित्य के इतिहासकारों ने मध्यकाल से ही ताला लगा दिया था । और यह भी विचारणीय तथ्य है कि भक्तिकाल में अवधी हिंदी का स्वर्णयुग रच रही थी,संत और भक्त कवियों की वाणी इसी भाषा का वैभव बनी । इस युग में यह भाषा अपने स्वभाव को और भी स्वाभाविक बना चुकी थी । इसका यह भी बड़ा प्रमाण है कि इस भाषा ने राजदरबारों में जाने से परहेज किया । इस तरह रीतिकाल भर यह भाषा चुप्पी साधे रही यानी ‘रहिमन चुप ह्वै बैठिए देखि दिनन को फेर’ लेकिन यह चुप्पी एक लंबी लड़ाई की तैयारी कर रही थी, जिसकी वही स्वाभाविक धमक और उतनी ही तेज धार आधुनिक युग में दिखाई पड़ती है । डॉ॰ ‘मधुप’ अपने ग्रंथ ‘अवधी साहित्य के इतिहास’ में अवधी की आधुनिक कविता का प्रस्थान बिंदु काशी के बाबू भारतेन्दु हरिश्चंद्र को मानते हैं ।भारतेन्दु के बारे में अपनी बात रखते हुये वह कहते हैं “अपनी काव्यभाषा को ब्रज-भाषा रखते हुये भी उन्होंने अपनी सामयिक रचनाओं के लिए जनभाषा अवधी की सादगी का सहारा लिया”। यहाँ मधुप जी अवधी को जन भाषा इस लिए भी कह रहे हैं क्योंकि अवधी लंबे समय तक हिंदी भाषी प्रान्तों की संपर्क भाषा रही है । इस तथ्य की ओर सुनीति कुमार चटर्जी ने ‘उक्ति-व्यक्ति-प्रकरण’ की भूमिका लिखते हुये इशारा किया था जिसे डॉ॰ रामविलास शर्मा ने काफी उधेड़बुन के बाद स्पष्ट रूप में व्याख्यायित किया है ।

डॉ॰ मधुप का इतिहास ग्रंथ अवधी की पुरानी परंपरा को परखते हुये अवधी की आधुनिक साहित्य परंपरा की एक महत्वपूर्ण खोज है । डॉ॰ मधुप शहरों की साहित्यिक चकाचौंध और विमर्शों के झंडाबरदारों से बचते हुये हिंदी की उस स्वाभाविक परंपरा को साधने का काम किया जिसे विद्वता के अभिमानी दिहाती बोली कह कर छुट्टी ले लेते हैं ।वह पक्के दिहाती थे और दिहाती होना उनकी स्वाभाविक विद्वता का सबसे मजबूत पहलू । उन्होंने अंत तक अपने गाँव मैनासी-सरैयां (सीतापुर) को नहीं छोड़ा । वह आर॰एम॰पी डिग्री कॉलेज, सीतापुरमें अध्यापन कार्य करते हुये खुद को देहाती हिंदी के लिए समर्पित कर दिया । उन्होंने अवधी में बड़ा काम किया । वह मूलतःअवधी कवि थे और कविताई का आचार्यत्व उनमे था । उनके काव्यग्रंथ ‘गाउँ का सुरपुर देउ बनाइ’,‘जगि रहे गांधी केर सपन’,‘खेतवन का देखि-देखि जीउ हुलसइ मोर’ तथा ‘घास के घरौंदे’ अवधी साहित्य की निधि हैं । इन किताबों की कवितायें आज भी बूढ़े किसानों के मुह सीतापुर के आस-पास के गांवों में सुनने को मिल जाएंगी । इसके अतिरिक्त उन्होंने अवधी की उस विरासत को सहेजा, जो बिखरीपड़ी थी उसे संपादित किया । इस तरह के ग्रन्थों में ‘वंशीधर शुक्ल ग्रंथावली’,‘अवधी की राष्ट्रीय कवितायें’, आदि प्रमुख है । उन्होंने अवधी की साहित्य परंपरा को आगे बढ़ाते हुये कई महत्वपूर्ण शोध-ग्रंथ और आलोचना पुस्तकें दीं जिनमें ‘परंपरा के परिपेक्ष्य में आधुनिक अवधी काव्य’,‘आधुनिक अवधी काव्य की प्रमुख प्रवृत्तियाँ’,‘अवधी काव्यधारा’,‘अवधी कविता की नई लीक के प्रवर्तक: बलभद्र प्रसाद दीक्षित ‘पढ़ीस’’, तथा ‘अवधी के आधुनिक कवि’ प्रमुख हैं । इसके अतिरिक्त जिसके आधार पर उन्हें अवधी का रामचन्द्र शुक्ल कहा जाता है वह है ‘अवधी साहित्य का इतिहास’ । इस इतिहास ग्रंथ में उन्होंने जो बहुत ही जटिल और मुश्किल काम को अंजाम दिया वह है आधुनिक अवधी साहित्य की खोज । अवधी के आधुनिक साहित्यकारों का साहित्य जो सहज उपलब्ध नहीं मिलता,क्योंकि यह राजकमल, वाणी, और ज्ञानपीठ से नहीं छपा।इधर हाल ही में जगदीश पीयूष द्वारा संपादित अवधी ग्रंथावली वाणी प्रकाशन से छप चुकी है लेकिन इसमे भी आधुनिक कवियों की सिर्फ एक–एक कविता संग्रहीतहै। यह साहित्य बहुत कुछ आज भी अप्रकाशित ही है और जो भी छपा है वह स्थानीय छोटे-छोटे प्रकाशनों से। इनमें से अधिकांश प्रकाशन अब बंद भी हो गए हैं । और जो चालू हालत में हैं उनके पास पुरानी पुस्तकें उपलब्ध नहीं है और नई छापने की हिम्मत अब उनमें नहीं, क्योंकि बाजार में इनकी मांग नहीं है। अवधी के तमाम साहित्यकार जो इस बदहाली में मर गए, या अपने अंतिम पड़ाव पर जीवित हैं, उनके घर वाले या वे स्वयं किसी अपरिचित को साहित्य देने में संकोच करते हैं,कि कहीं वह इसे अपने नाम से न छपवा ले । कई लोलुपों ने यह किया भी। अवधी की इसी आधुनिक पीढ़ी में मधुप जी भी थे जो जाते-जाते यह महत्वपूर्ण काम कर गए जिसे उनके अलावा कोई मुश्किल से ही कर पता। मधुप जी के पास एक दुर्लभ पुस्तकालय था। इस बात का प्रमाण उनका यह ग्रंथ है।

मधुप जी ने इस किताब में साहित्य के इतिहास लेखन की दृष्टि हिंदी साहित्य के इतिहास से ग्रहण की। और यह ही इस किताब की सबसे बड़ी कमजोरी है। उन्होंने अवधी की आधुनिक काव्यधारा में छायावाद और रहस्यवाद जो दिखाया है वह बेमतलब की चीज है। अवधी की नई लीक के प्रवर्तक बलभद्र दीक्षित ‘पढ़ीस’ अपने प्रारम्भिक अवस्था से ही पूर्णतः प्रगतिशील थे। उनकी कावताओं में प्रगतिशीलता के वह गुण विद्यमान हैं जिन्हे हिंदी कविता की मूल (या बेमूल) धारा में खोजना आज भी मुश्किल है। रही बात रमई काका की जो छायावाद के बाद की उपज हैं। सिर्फ इन दो कवियों के यहाँ मधुप जी ने छायावाद और रहस्यवाद देख लिया और इन दोनों के बीच की कड़ी वंशीधर शुक्ल को सीधे छोड़ दिया क्योंकि यह कवि स्वतन्त्रता आंदोलन के समय क्रांति का अलाव जलाए बैठा था । अब जब अवधी में छायावाद या रहस्यवाद नहीं था तो नहीं था,उसे जबरन ठेल कर पता नहीं क्या प्रमाणित करना चाहते थे । बहरहाल इसके आगे उन्होंने अवधी की प्रगतित्रई की जो स्थापना की और उसकी जो ऐतिहासिक पड़ताल की वह अपने आप में बहुत ही महत्वपूर्ण है । इन कवियों के साथ मधुप जी ने साहित्य की ऐतिहासिक ऊर्जा दिखाई । मधुप जी ने अवधी की प्रगतिशील परंपरा की एक लंबी कतार दिखाई । कवियों के बारे में भी लिखा और कविता के उदाहरण भी दिये । अवधी में हो रहे गजल और नवगीत लेखन को भी रेखांकित किया। इसके अतिरिक्त इस ग्रंथ में उन्होंने अवधी की पुरानी परमम्परा जो दोहा-चौपाई-बरवै की थी वह आधुनिक अवधी में कब तक चलती रही और उसमे क्या-क्या लिखा जाता रहा ,यह सब दिखाया है जो अपने आप में एक इतिहास दृष्टि का मानक है ।

इस प्रकार हम देखते हैं मधुप जी ने लगभग 300 आधुनिक अवधी कवियों का हवाला देते हुये उनकी कविताओं के जिस प्रकार उदाहरण दिये हैं वह अपने आप में एक बहुत ही जटिल और निहायत मुश्किल काम था क्योंकि यह अवधी साहित्य के इतिहास का पहला ग्रंथ है । साहित्य के इतिहास का पहला ग्रंथ लिखना कितना मुश्किल होता है यह बताने अवश्यकता नहीं । मधुप जी नें यह बड़ा काम किया है । जिसके लिए साहित्य प्रेमी उनके सदा ऋणी रहेंगे।

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शैलेन्द्र कुमार शुक्ल
शोधार्थी: म.गां.अं.हिं.वि.वि.,वर्धा (महाराष्ट्र)
मो.07057467780
ई-मेल: shailendrashuklahcu@gmail.com 

काका लोक-करुणा के भी बड़े कवि हैं!

हिमांशु बाजपेयी 

2015 अवधी भाषा के महत्वपूर्ण कवि-नाटककार चन्द्रभूषण त्रिवेदी उर्फ रमई काका का जन्मशताब्दी वर्ष है. पढ़ीस और वंशीधर शुक्ल के साथ रमई काका अवधी की उस अमर ‘त्रयी’ का हिस्सा हैं जिसकी रचनात्मकता ने तुलसी और जायसी की अवधी को एक नई साहित्यिक समृद्धि प्रदान की. यूं अवधी की इस कद्दावर तिकड़ी के तीनों सदस्य बहुत लोकप्रिय रहे लेकिन सुनहरे दौर में आकाशवाणी लखनऊ के साथ सफल नाटककार और प्रस्तोता के बतौर लंबे जुड़ाव और अपने अद्वितीय हास्य-व्यंग्यबोध के चलते रमई काका की लोकप्रियता सचमुच अद्भुत और असाधारण रही है. रेडियो नाटकों का उनका हस्ताक्षर चरित्र ‘बहिरे बाबा’ तो इस कदर मशहूर रहा कि आज भी उत्तर भारत के पुराने लोगों में रमई काका का नाम  भले ही सब न जानें लेकिन बहिरे बाबा सबको अब तक याद हैं.

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अपनी अफसानवी मकबूलियत को रमई काका ने अपने रचनाकर्मी सरोकारों और दायित्वबोध पर कभी हावी नहीं होने दिया. उनके नाटक और कविताएं अपने समय से मुठभेड़ का सशक्त माध्यम बनीं. उनकी भाषा में गजब की सादगी और अपनेपन की सौंधी-सी खुशबू बसी हुई थी. अपने लोगों से अपनी भाषा में अपनी बात कहते हुए उन्होंने अपने समय के ज्वलंत सवालों को संबोधित किया. हालांकि उन्होंने खड़ी बोली में भी लिखा लेकिन उनकी पहचान हमेशा अवधी से जुड़ी रही. हास्य-व्यंग्य के अपने जाने पहचाने रंग में तो वे बेजोड़ रहे ही, उन्होंने दिल में उतर जानेवाली संजीदा कविताएं भी लिखीं. उस दौर में जब खड़ी बोली के कई बड़े साहित्यकार लोकभाषाओं को भाषा नहीं फकत बोली कहकर खड़ीबोली को उन पर तरजीह दे रहे थे और दूसरों से भी उसी में लिखने का आग्रह कर रहे थे उस वक्त रमई काका अवधी में उत्कृष्ट लेखन करते हुए, अपने समय के जरूरी सवालों को उठाते हुए और अत्यधिक लोकप्रिय होते हुए ये सिद्ध कर रहे थे कि अवधी भाषा-साहित्य केवल रामचरितमानस और पद्मावत तक सीमित किसी गुजरी हुई दास्तान का नाम नहीं है, बल्कि ये एक ज़िन्दा कारवान-ए-सुखन का नाम है जो अभी कई मंज़िलें तय करेगा.

उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले के रावतपुर गांव में 2 फरवरी 1915 जन्मे रमई काका कविता तो किशोरावस्था में ही लिखने लगे थे लेकिन उनकी प्रतिभा को सही मकाम 1941 में मिला जब उन्होंने आकाशवाणी के कर्मचारी के बतौर लखनऊ को अपना निवास-स्थान बनाया. नौकरी के लिए गांव छोड़ने के बाद वे जिंदगीभर लखनऊ में ही रहे लेकिन इसके बावजूद उनकी कविताओं में गांव और कृषि प्रधान संस्कृति की मौजूदगी हमेशा बनी रही. गांव का उनका प्रकृति चित्रण अनूठा है लेकिन सबसे महत्वपूर्ण बात ये है कि वे गांव को किसी आउटसाइडर यानी शहरवाले की नजर से नहीं बल्कि एक इनसाइडर के बतौर देखते और बयान करते हैं. दुखिया गिरिस्ती, धरती हमरि, सुखी जब हुइहैं गांव हमार, धरती तुमका टेरि रही है आदि अनेक उत्कृष्ट कविताएं रमई काका ने गांव के जीवन पर लिखी हैं. डाॅ. रामविलास शर्मा ने रमई काका के बारे में लिखा है- ‘उनकी गंभीर रचनाओं में एक विद्रोही किसान का उदात्त स्वर है, जो समाज में अपने महत्वपूर्ण स्थान को पहचानता रहा है और अधिकार पाने के लिए कटिबद्ध हो गया है.’

लोकभाषाओं को पिछड़ेपन की निशानी आैर खुद को प्रगतिशील माननेवालों काे यह जानना बहुत जरूरी है कि रमई काका की अवधी में लिखी गईं ग्राम्य जीवन पर आधारित कविताओं में चौंकानेवाली प्रगतिशीलता और विद्रोह का स्वर मिलता है. इसकी बानगी के तौर पर ‘अनोखा परदा’ और ‘छाती का पीपर’ आदि कविताएं देखी जा सकती हैं. अपने समय के सामाजिक यथार्थ को भी वे पुख्तगी से बयान करते हैं. सामाजिक विसंगतियों और कुरीतियों जैसे परदा प्रथा, जाति प्रथा, बेमेल विवाह, सामंतवाद, सूदखोरी को निशाने पर रखते हुए भी उन्होंने बहुत कुछ लिखा है. यहां इस बात को रेखांकित करना जरूरी हो जाता है कि उनकी कविताओं में हास्य-व्यंग्य की इतनी ज्यादा चर्चा हुई कि उनकी कविता के कई जरूरी और गंभीर पक्ष ठीक से पहचाने नहीं  गए. वैसे भी हास्य-व्यंग्य को, यदि वह ग्रामभाषा का हो तो और भी, गंभीरता से ग्रहण करने की कोशिश प्रायः नहीं होती. रमई काका के लोक-हास्य की खूब तारीफ हुई तो उनकी कविता में निबद्ध लोक-करुणा की अनदेखी भी हुई. निर्विवाद रूप से काका लोक-करुणा के भी बड़े कवि हैं. इस संदर्भ में अवधी के विद्वान डॉ. अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी कहते हैं- ‘रमई काका की कविताओं में व्याप्त लोक-करुणा एक तरफ ग्रामीणों-किसानों-मजदूरों-स्त्रियों का दुख-दर्द कहती है वहीं दूसरी तरफ वह बरतानिया हुकूमत में पराधीनता की व्यथा को भी मार्मिकता के साथ दर्ज करती है. उसमें परबसता की पीड़ा है, ‘सब बुद्धि बिबेकु नसावै परबसता धीरे-धीरे’ तो ‘परबसता’ से मुक्ति के भिनसार (सुबह) की प्रतीक्षा भी, ‘धीर धरु भिनसार होई!’’

संजीदा मिजाज की बेशुमार बेहतरीन कविताएं लिखने के बावजूद काका की पहचान उनकी हास्य व्यंग्य शैली ही है. लिखा भी उन्होंने इसी में सबसे ज्यादा. उनकी हास्य-व्यंग्य कविताओं का एक लोकप्रिय विषय गांव की नजर से शहर को देखने का भी रहा है. इनमें उनकी कविताएं ‘हम कहा बड़ा ध्वाखा हुई गा’ सबसे ज्यादा लोकप्रिय हुईं हैं. कविता की दुनिया में शुरुआती ख्याति उन्हें ‘ध्वाखा’ कविता से ही मिली. इसमें गांव से पहली बार लखनऊ गए एक आदमी के साथ जो कुछ घटित हुआ उसका मजाकिया अंदाज में बयान है. इसके अलावा हास्य व्यंग्य शैली में लिखीं उनकी ई छीछालेदर द्याखौ तौ, नैनीताल, कचेहरी,अंधकार के राजा, नाजुक बरखा, बुढ़ऊ का बियाहु आदि कविताएं भी बहुत मशहूर हुईं.

अपनी इन्हीं कविताओं के माध्यम से रमई काका कई दशकों तक कवि सम्मेलनों में धूम मचाते रहे. उन्होंने अपनी लम्बी साहित्यिक यात्रा के दौरान विपुल साहित्य रचा है, जिसका बहुत सारा हिस्सा अभी भी अप्रकाशित है. उनकी कविताओं का पहला संकलन ‘बौछार’ 1944 में छपा जो बहुत लोकप्रिय रहा. इसके बाद भिनसार, नेताजी, फुहार, गुलछर्रा, हरपाती तरवारि, हास्य के छींटे और माटी के बोल आदि काव्य संकलन आए.
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हिमांशु बाजपेयी

कविता के अलावा नाटकों और एकांकियों में भी रमई काका अवधी के सबसे बड़े नाम हैं. नाटकों की भी उनकी तीन पुस्तकें रतौंधी, बहिरे बोधन बाबा और मि. जुगनू छपी. आकाशवाणी लखनऊ के लिए उन्होंने पचास से ज्यादा लोकप्रिय नाटक लिखे और उनमें अभिनय भी किया. इनमें ‘बहिरे बोधन बाबा’ सबसे मशहूर है. ये आकाशवाणी के इतिहास का सबसे लंबा और लोकप्रिय धारावाहिक नाटक है जो 1957 से 1982 तक लगातार चला. कुल 121 कड़ियोंवाला यही नाटक रमई काका का दूसरा नाम बन चुका है. नाटक की विषयवस्तु ग्राम्य जीवन पर आधारित होती थी एवं ग्रामीण जीवन की समस्याओं एवं मुद्दों को उठाती थी. बहिरे बोधन बाबा के अलावा रमई काका के लिखे मगन मिस्तरी परिवार, जगराना बुआ, चपल चंदू, नटखट नंदू, छोटई लुटई, अफीमी चाचा, खिचड़ी, हरफनमौला, खोखे पंडित, जंतर मंतर, मटरू मामा एवं गदरभ राग आदि रेडियो नाटक भी बहुत लोकप्रिय रहे. गौरतलब है कि रमई काका का लिखा हर नाटक हास्य व्यंग्य शैली का होने के बावजूद किसी न किसी गंभीर सामाजिक समस्या पर केंद्रित होता था. जनसाधारण में रमई काका की लोकप्रियता को देखते हुए आकाशवाणी ने उनसे उस समय की लगभग सभी सामाजिक समस्याओं पर नाटक लिखवाए जिन्होंने अपना व्यापक असर भी दिखाया. कवि और नाटककार के रूप में लोकप्रियता का शिखर पानेवाले रमई काका ने अवधी लेख एवं निबंध भी काफी लिखे जो समय-समय पर पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहे.

काका 1977 में आकाशवाणी से रिटायर हो गए लेकिन रेडियो से उनका जुड़ाव बना रहा. 18 अप्रैल 1982 को लखनऊ के बलरामपुर अस्पताल में उन्होंने अंतिम सांस ली. आकाशवाणी लखनऊ की लोकप्रियता में काका की बड़ी भूमिका रही. 1965 में आकाशवाणी को लिखे गए एक पत्र में मशहूर साहित्यकार अमृतलाल नागर ने लिखा- ‘एक मैं ही नहीं, मेरे मत से आपके केंद्र के असंख्य श्रोता भी एक ही उमंग में सम्मिलित होकर एक स्वर से कहेंगे कि काका रेडियो के अनमोल रत्न हैं.’ 2013 में आकाशवाणी लखनऊ के 75 साल पूरे होने के मौके पर संस्थान ने रमई काका की सेवाओं को याद करते हुए ‘जन-मन के रमई काका’ नाम से एक श्रंखला का प्रसारण किया जो काफी लोकप्रिय रहा.

जन्मशती के मौके पर निहायत जरूरी है कि रमई काका के तमाम प्रकाशित-अप्रकाशित साहित्य को इकट्ठा करके एक समग्र ग्रंथावली के रूप में छापा जाए. क्योंकि उनका बहुत सारा काम अभी तक अप्रकाशित है और ज्यादातर प्रकाशित पुस्तकें भी लंबे वक्त से नए संस्करण न छपने के कारण लगभग अनुपलब्ध हो गईं हैं. इसके साथ ही ज्यादा जरूरी ये है कि उनके साहित्यिक संस्कारों एवं सरोकारों से प्रेरणा प्राप्त की जाए. जैसा कि एक जगह वे कहते हैं-

हिरदय की कोमल पंखुरिन मा, जो भंवरा असि न गूंजि सकै
उसरील वांठ हरियर न करै, डभकत नयना ना पोंछि  सकै
जेहिका सुनतै खन बन्धन की, बेड़ी झन झन न झनझनायं
उन पांवन मां पौरूखु न भरै, जो अपने पथ पर डगमगायं
अंधियारू न दुरवै सबिता बनि, अइसी कविता ते कौनु लाभ!

साभार: तहलका

छपरा कस उठी!

ई निबंध, छपरा कस उठी, भारतेंदु जी कै लिखा आय। भारतेंदु जी अवधी कै, यहि दौर कै, अहम गद्य लेखक हुवैं। इनकै दुइ उपन्यास, ‘नई रोसनी’ औ ‘चंदावती’, आय चुका हैं। यै दिल्ली मा रहत हैं। इनसे आप ०९८६८०३१३८४ पै संपर्क कय सकत हैं।: संपादक
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भारतेन्दु मिश्र

भारतेन्दु मिश्र

 “छपरा कस उठी”__भारतेन्दु मिश्र

जुगु बदलि गवा है। अब कउनेउ ट्वाला मा जाति बिरादरी वाले याक साथ बइठै-क तयार नाई हैं। जी के तीर पैसा है वहेकि ठकुरई। उनका छपरा तौ जस पहिले उठति रहा है, वइसै अबहूँ उठी मुला गरीबन क्यार छपरा को छवाई? जो कउनिउ तना ते छाय ले तौ फिर ऊका उठावै वाले जन कहाँ ते अइहैं।

गरीबी हटावति हटावति कइयौ सरकारै हटि गयीं। गरीब दुखिया जहाँ खड़े रहैं हुआँ ते अउरु पीछे हटि आये, मुला गरीबी न अब लौं हटी है, न जल्दी हटै वाली है। अमीरी-गरीबी के पाटन मा आपसदारी धीरे-धीरे पिसी जाय रही है। तीका कोई इलाजु नाई है।

अब जब नोटन ते रिस्ता जुड़ि गा है तो बेइमानी-बदमासी औ मक्कारी करै मा जो साथु दे, जिहिकी बदौलति नोट मिलैं, वहै रिस्तेदार है, वहे से आपसदारी है। छपरा बिनु आपसदारी, न तौ छावा जाय सकी न उठावा जा सकी औ जौ आगि लागि जाय तौ बुझावौ न जाय सकी। हमरी लरिकईं मइहाँ सब याक दुसरे क्यार छपरा छवावै अउरु उठवावै जाति रहैं। अबहूँ छपरा उठवावै-क न्यउता आवति है मुला अब टाला-टाली कइकै सब अपन जिउ चोरावति हैं। जीके हाथेम लाठी है तीके सगरे काम हुई रहे हैं। कुछ जन तौ तिकड़म ते आपन काम निकारि रहे हैं, तेहूँ गाँव मा अइसन मनई जादा हैं जिनके काम कउनिउ तना नाई हुइ पाय रहे हैं। अइसे टेम मइहाँ उनका छपरा कस उठी?

अब न उइ सैकरन बाँसन वाली बाँसी रहि गई हैं, न छपरा खातिर बाँसै जुहाति हैं। फूस धीरे-धीरे फुर्रु हुइ गवा है। हाँ ऊँखन कै पाती औ झाँखर जरूर मिलि जाति हैं। बड़क्के किसान तौ पक्की हवेली बनवाय रहे हैं छोटकए कच्ची देवालन पर लेसाई लौ नाई कइ पाइ रहे हैं। मजूरी-धतूरी ते जो संझा तके लोनु रोटी जुरि जाय तौ जानौ बड़ी भागि है। कंगाली के साथै मँहगाई मुर्गा बनाये है। लकड़ी कटि-कटि राती-राता सहरन मा जाय रही है। फारेस्ट वाले खाय-पीकै सोय रहे हैं। हमका तुमका तौ थुनिहा औ चियारी तक नाई मिलै वाली है, बाता मइहाँ पगही बाँधे छपरा कै दिन रुकी, अरे रुकी कि ठाढ़ै न होई।

अइसी-वइसी बइठै ते, बीड़ी फूकै ते या सुर्ती मलै ते कुछु काम बनै वाला नाई है। लरिकई-म जब छपरा उठवावै जाइति रहै तौ बड़ा जोसु रहै, गाँव केरी ऊँची-नीची सब जाति क्यार आदमी आवति रहै। “अउरु लगा दे…हैंसा, जोर लगा दे..हैंसा। पुरबह वार खँइचौ रे, दखिनह वार थ्वारा रेलि देव” – ई तना के जुमला यादि आवति हैं। तब मालुम होति रहै गाँव ट्वाला सब कुछु अपनै देसु है।

तब जहाँ चहौ तहाँ चट्ट-पट्ट छपरा धरि दीन जाति रहै। अब न तौ रमजानी अपने ट्वाला ते अइहैं, न सुच्चा सिंह रामपालै केरि उम्मेद है। अइसे बुरे वखत मइहाँ कहाँ मूड़ु दइ मारी।

छपरा, जीमा कइयौ सिकहर लटके होति रहैं, कहूँ-कहूँ छोटकई चिरइया आपन *घरघुच्चु बनउती रहैं, जिनके ऊपर कबहूँ लउकी कबहूँ कदुआ केरि फसलि मिलति रही, जीपर बिलैया टहलती रहैं, जीके तरे जिंदगी-मउत, दीन-दुनिया केरि सब बतकही होति रहै, जीके तरे घरी भरि बइठि कै राहगीरौ जुड़ाति औ सँहताति रहै, जहाँ दुपहरिया मा कबौ किस्सा-कहानी, कबौ सुरबग्घी, औ कबहूँ कोटपीस ख्याला जाति रहै – अब उइ दिन कहाँ? अब जब प्यारु, दुलारु, मोहब्बति औ भइयाचारु नाई रहिगा तौ छपरा छावा जाय चहै न छावा जाय। उठवावा जाय चहै न उठवावा जाय, हमरी बलाय ते।

*घोसला
(‘कस परजवटि बिसारी’ किताब से)