Category Archives: जात्रा-बरनन

हिम के आँचर से ताँक-झाँक [ ब ] ,,,,,,,

पढ़ैयन का राम राम !!!
‘ अवधी कै अरघान ‘ की महफ़िल मा आप सबकै स्वागत अहै ..
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जे न पढ़े हुवैं अउर उनकै इच्छा हुवै तौ पिछला — भाग [ अ ] , देखि सकत हैं .. आज भाग [ ब ] आप सबके सामने रखत अहन ..
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                                  हिम के आँचर से ताँक-झाँक [ ब ] ,,,,,,, 
                        पहाड़न के सौन्दर्य पै लहालोट हुअत आखैं यकायक ठहरि जात हैं – पहाड़न पै बड़ी उचाई पै चरत गोरुवन का देखि के ! .. वही समय याद आवत है खड़ी  बोली – हिन्दी के कवि आलोक धन्वा कै कविता ”बकरियां” कै .. अब यहि कविता का आप सबन के सामने रखि दी ताकि आपौ सब यहि कविता कै आस्वाद करैं — 
”अगर अनंत में झाडियाँ होतीं तो बकरियां 

अनंत में भी हो आतीं
भर पेट पत्तियां तूंग कर वहाँ से
फिर धरती के किसी परिचित बरामदे में
लौट आतीं

जब मैं पहली बार पहाड़ों में गया
पहाड़ की तीखी चढाई पर भी बकरियों से मुलाक़ात हुई
वे काफी नीचे के गांवों से चढ़ती हुई ऊपर आ जाती थीं
जैसे जैसे हरियाली नीचे से उजड़ती जाती
गर्मियों में

लेकिन चरवाहे कहीँ नहीं दिखे
सो रहे होंगे
किसी पीपल की छाया में
यह सुख उन्हें ही नसीब है।” 

    [ आलोक धन्वा ]

                ऊपर के चित्र का खींचत के माहौल कुछ मद्धिम रहा , वैसे तौ यहि माहौल का बहुत लोगै ‘डिपरेसनी’ मौसम कहत हैं , लेकिन यहि मौसम मा हमैं पहाड़ के सौन्दर्य का देखे मा अउर मजा आवा .. दूर – दूर देखे पै पहाड़ के तरंगन मा बल खात छितिज कै दरसन हुअत रहा .. पहाड़न के बीच के स्थान का आकास ऐसे भरत रहा जैसे सद्गुनन से भरे व्यक्तित्व मा आकासधरमा संतोख गुनन के बीच कै जगह भरि दियत है .. सब कुछ एकमेक हुअत सा लागत है जैसे सौन्दर्य तौ यक है बस वहिकै कयिउ रूप हैं जहां तहां छिटका-छिटका .. जब मनई जबरकी सुन्दरता कै दरसन करै लागत है तब वहके अन्दर अद्वैत कै भावना भरै लागत है .. कवि जय शंकर प्रसाद कै ‘मनु’ पहाड़न पै बैठा-बैठा कहै लागत है – ” एक तत्व की ही प्रधानता / कहो उसे जड़ या चेतन | ”
                          ऊपर के चित्र मा पहाड़न के सीढ़ीदार खेतन कै नजारा खींचा गा है .. खेती-किसानी के नाव पै लोगन कै व्यस्तता इनहीं खेतन मा रहत है .. पीढी दर पीढी इनकी खेतही विरासत हैं यै सीढ़ीदार खेत ! .. बड़ी हिकमत लगाय के बनाये जात हैं ये .. ढाल कै तीव्रता कम कीन जात है अउर भरसक कोसिस कीन जात है कि माटी अउर मटिही नमी छीज-बट्टा न हुवे पावै .. यहि तरह कईउ पट्टियन का बनावा जात है ..इन पट्टियन का स्कंध-बंध(soulder bounds ) की सहायता से मजबूती दीन जात है .. पहाडी इलाकन के लगभग तैतिस फीसदी तक के ढाल का सीढ़ीदार खेतन के रूप में बदला जाय सकत है .. इन खेतन का दूर से देखै मा बड़ा नीक लागत है !   
                   ई है पहाड़न कै गाँव .. पहाड़न पै घर बनाउब पहाड़ ! .. लेकिन अस नाहीं न .. जहां मनाई रहै लागै हुवाँ जियय कै आसान तरीका अख्तियार कै लियत है .. यहि वजह से हियाँ के घरन कै छत पहाड़न की पट्टियन से बना मिले .. लिंटरदार घरौ मिलत हैं हर गाँव मा , नये फैसन कै बानगी पेस करत ! .. पहाड़ पै बसा गाँव अपने आपै मन मोह लियत है जैसे भगवान बहुत बड़ा कंडा कै भीट लगाय दिए हुवें यानी गाँव-गोबर्घन ! .. देवालन के पीछे बच्चन कै लुका-लुकैया कै खेल मानौ पहाड़ की खामोस सफ़ेद चादर पै चंचल-सितारा टाँकत हुवै ! .. एक जगह देखेन कि एक लड़का बैठा है कि बगल वाले पहाडी गाँव से आवै वाली बयार वहके खातिर यक गुलाबी रुमाल लावत होये ! ..
                     यहि फोटू मा ऊपर यक मंदिर देखात अहै .. यहि मंदिर का देखतै कईउ बातन कै ध्यान हुवै लाग .. हियाँ कै लोग गाँवन से थोड़ी दूर पै मन्दिरन कै निर्माण करब ज्यादा उचित समझत हैं ( सायद भगवान का उंचाई पै राखै कै इच्छा  यकरे मूल मा हुवे ) , भले पूजा – अर्चना करै बरे जाय – आवै मा ज्यादा समय अउर सक्ति खरच हुवै .. मंदिर के चारौ ओर कै हरियाली बड़ा नयन-लुभाऊ दृस्य बनाये रही .. मंदिर कै बनावट से यक बात कै ध्यान अउर आवा – पहाड़न की सिल्प कला से जुडी पैगोडा सैली कै .. चीन , जापान , कोरिया , वियतनाम अउर भारत समेत एसिया के औरौ हिस्सन मा ई सैली बहुतायत से पाई जात है .. ज्यादातर धार्मिक काम से जुड़े निर्माण मा यहि सैली कै दर्शन हुअत है .. बौद्ध निर्माणन मा ई सैली खूब देखी जाय सकत है .. इन आधुनिक पैगोडा निर्माणन का प्राचीन भारतीय स्तूपन कै विकास माना जात है .. यहिकै मेन खासियत है संकु के आकार मा उठत तल्ले , ई पखना के तरीके से देखात है , अन्दर यक मजबूत आधार रहत है .. बौद्ध निर्माणन मा तौ कईउ – कईउ तल्ले देखैहैं  .. लेकिन अन्य मन्दिरन मा वतने तल्ले न देखैहैं .. यहि चित्र वाले मंदिरौ मा चौड़ाई लियत तल्ला साफ़ देखा जाय सकत है ..
                   जात – जात रेणुका झील कै यक बहुत हरेर – हरेर फोटू आपके लिए प्रस्तुत अहै — 
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अब चलत अहन अउर भाग [ स ] लैके फिर आउब , तब तक के लिए आप सबका राम राम ! 

                                                                                       

हिम के आँचर से ताँक-झाँक [अ] ,,,,,,

                                          हिम के आँचर से ताँक-झाँक [अ] ,,,,,,
पढ़ैयन का राम राम !!!

‘ अवधी कै अरघान ‘ की महफ़िल मा आप सबकै स्वागत अहै ..
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अजीब हुअत है जब केहू से बाति करौ अउर ऊ मन का बिना बताये पढि लियय .. कुछ अइसने भा यक 
दिन हमरे हिमाचली दोस्त मनोज से बाति करै के दौरान .. कहिन कि बस चला आओ हम तोहार इंतिजार 
करत अहन अउर काल्हि कै ‘डिनर’ तोहरे साथे करब .. हमहूँ तुरंत राजी भयेन .. अगले दिन पहुँच गयन
सिरमौर जिला , हिमाचल .. हिमाचल के बारे मा सिरी मनोज मिसिर जी कै कहब रहा कि ‘अपनी चमक 
खो रहे हैं पहाड़’ .. सोचेन कि देखी तौ ज़रा .. वैसे जायका-बदल करब मेन मकसद रहा जाहे खातिर दोस्त 
हमैं बलाए रहे .. पर लगे हाथ चारै दिन मा औरौ कुछ जानै का मिला ..
                                     बाएं से सुरुआत मा हम अउर मनोज कै बाबू – अम्मा ,मनोज

                 मित्र  मनोज  हिमाचल सरकार कै यक कुसल अधिकारी हैं .. बानी कै मधुर हैं .. अधिकारौ बड़े 
मधुरता के साथ देखावत हैं .. कहूँ हमैं कौनौ दिक्कत नाय उठावै दिहिन .. अपने घरे टिकाइन .. घर कै हर 
केहू वतनै सरीफ .. ‘नाहन’ मा घर है बंधुवर कै .. हुवाँ कै बजार घूमेन , बजार मा बड़ी सांती रही , हमैं आपन
कुचेरा  बजार याद आवै लाग जहां एतनी देर मा कम-से-कम दुइ जगह झगरा हुवत मिलि जात .. इहाँ यक 
तरह कै सराफत दिखी लोगन मा .. सोचै लागेन कि एतरा  धैर्य काहे है हियाँ के लोगन मा .. हमैं लाग कि 
 सुभाव  कै  ताल्लुक भौगोलिक बनावट से भी हुवत है .. पहाड़ पै बिना धैर्य के जीवन कैसे कटे ! .. बिसम भूमि 
पै तौ चलहिन का परे तौ बेहतर है कि ठंढेपन का सुभाव कै स्थायी-धरम बनाय लीन जाय .. 
                 

        हिमाचल के सिरमौर जिला कै रेनुका झील पै काफी समय बितायन .. ई झील हिमाचल कै सबसे बड़ी झील है  .. यहिकै नाव परसुराम जी की माता  
जी के नाव पै रखा गा अहै .. पूरी झील कै बनावट यक लेटी  स्त्री के  आकार मा है .. यहीं सरकार के तरफ से परसुराम ताल बनावा गा अहै .. यहि चित्र मा मनोज भाई के साथ वहिकै नाव देखा जाय सकत  है .. 

साम के मंदिर से उठै वाला स्वर झील के पानी के साथ मिल के जलतरंग-सुर  कै अहसास करावत रहा .. 

यही झील की नजदीकै रुकय-ठहरय कै इन्तिजाम भा रहा .. सिरी दीप सर्मा जी कै बिवस्था मा कौनौ कोर – कसर नाय रही .. रात के साथे भोजन-पानी कीन गा .. अस लगबै नाय भा कि अपरिचत के बीच आवा अहन .. उदासी अउर प्रसान्ति कै अंतर जानै का हुवे तौ पहाड़ – दरसन सबसे सटीक परे .. कुछ लोग पहाडन का उदास इलाका बोलत हैं बरु हम यहका  प्रसान्ति इलाका कहब ज्यादा सही मानित है .. यहि चित्र मा बाएं से हम, दीप जी अउर मनोज भाई ..  


लौटानी मा गिरि नदी के साथ बड़ी देर तक चलत रहेन .. दोस्त कै आपन कार रही जिहसे मन-मुवाफिक                    
ढंग से आउब-जाब ह्वै पावा .. जहां चाहा गा , हुवाँ रुका गा .. सीढ़ीदार खेतन कै खूब दरसन कीन गा .. पहाडन पै लोगन कै गाँव देखै मा अलग सुन्दरता बनावत रहे .. जिन्दगी कठिन है पै हियाँ के लोगन मा जिजीविसा वतनै ज्यादा है .. बीच बीच मा लोगन  से बात करत रहेन .. इधर के लोगन मा ( जे आदिवासी मतिन जीवन जियत अहैं , उनमा ) आजौ यक से अधिक 
पति कै परथा चलति अहै .. यक समूह है जौन अपने का पांडव की थाती से जोड़त है .. घूमै पै कई चीजन कै नई जानकारी मिलत है .. यहि चित्र मा किनारे हम अही अउर बाकी गिरि नदी कै पूरा प्रांगन … फोटू मनोज भाई खीचिन जिनके मन मा सदैव ई बसा रहत रहा कि हम उनकै नीक फोटू नाय खीचित .. 🙂 
               
                               प्राइमरी इस्कूल मा जाय कै ख्वाहिस रही हमार .. पहाड़ के यक प्राइमरी इस्कूल पै गयेन  , वहीं , जहाँ पै मित्र तहसीलदार के पद पै तैनात अहैं .. सारी बिवस्था वनहीं  कराइन .. तस्वीरन से गुजरब भले रहे .. 
                                                                                        ई है प्राथमिक विद्यालय , संगडा .. अउर ई हैं हियाँ के मेन महट्टर .. नाव है सिरी भगवान सिंह .. ‘सेंटरल हेड टीचर’ कै कमान यन्ही के हाथे माँ है , जिहसे यई बहुत दुखी अहैं .. पूछे पै कहिन कि ”सरकार,हमारे ऊपर ज्यादा लोड डाल दे रही है . मिड दे मील का रजिस्टर ढोने का काम सौंप कर डाकिया समझ रखा है . इस वजह से मैं बच्चों को पर्याप्त समय नहीं दे पा रहा हूँ …. ” हम कहें कि तौ का कीन जाय तौ बताइन कि सरकार का यक अलग व्यक्ति का हर प्राइमरी इस्कूल 
पै  तैनात करै का चाही यहिके खातिर , यद्यपि अंतिम नियन्त्रन यनहीं के हाथे मा चाही , ऐसी हसरत भी बताये बिना न रहे ….
    




ई दुइ मास्टरनी हैं जिनका जिम्मेदारी सौंपी गई है कि ई मिड दे मील कै रजिस्टर बनाओ .. यई यही मा परेसान हैं ..






ई है भोजनालय .. जहां की भंडारी आजौ परम्परानुसार इस्तिरी – सक्ति ही है .. मास्टर साहब हमैं लै गये हुवाँ ले .. वहीं बड़े प्यार से चाय पिलवाइन .. खिचरी के बीच मा चाय चढाय के निकारि लीन गै , कुछ पतै नाय चला .. चाय के चुस्की लियत के मास्टर साहब बताइन कि हियाँ हर डेढ़ किलोमीटर पै यक स्कूल है , अउर 
                                    
स्कूलन  मा मास्टरन कै पूरी  भरती कीन गै है .. 

  



अउर ई हैं देस कै भविस्य .. नौनिहाल गेदहरै .. यक्कै कमरा मा तीन किलास कै गेदहरै बैठावा गा अहैं .. मास्टर यक्कौ नाहीं न .. सब कै डिउटी इन गेदाहरन के भोजन का लै के अहै .. सोचौ ,,, इनके पढ़ाई कै रामै मालिक हैं !!!                                                             


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             यहि तरह आज कै महफ़िल आपके हवाले करत अहन .. [अ] हिस्सा आज रखि दिहेन .. [ब] हिस्सा के लिए अगली महफ़िल का लैके फिर आउब .. तब तक के लिए राम राम !!!