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कौवा-बगुला संबाद , भाग- ५ : हिन्दी-बिरोध मा राग ‘ अंधेरिया ‘ कै भूमिका ..



पढ़ैयन का राम राम !!!
आज के संबाद प्रस्तुति मा भारतीय राजनीति के सम्बेदनहीन अउर अवसरबादी चरित का रक्खै कै कोसिस करत
अहन . आपकै राय अपेक्षित अहै . केहू नेता कै नाव लियय कै झंझट नाय उठायन .परसंग लम्बा न हुवै के लिए .
संकेत से समझ मा आय जाये.
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कौवा-बगुला संबाद , भाग- ५ : हिन्दी-बिरोध मा राग ‘ अंधेरिया ‘ कै भूमिका ..
( कौवा आज कालीदीन के ताले पै बगुला से मिलै आवा अहै . बगुला अपनी धुन मा मगन-मन ह्वै के खाये-पिये-
अघाये सांगीतिक डकार लियत अहै …)
बगुला : ( मुंडी हिलाय-हिलाय के गावत अहै …)
             ” ई है बंबई नगरिया तू देख बबुवा .
               नेतवन कै अंधेरिया तू देख बबुवा ..
               … देख बबुवा … रे देख बबुवा … ”
कौवा : राम राम ! साथी ! का राग ‘ अंधेरिया ‘ छेड़े हौ का ?
बगुला : राम राम ! हो , सही फरमायौ . ई हमार पसंदीदा राग आय . सही कहत अही कि पूरी दुनिया मा यहिसे
बढियां और उपयोगी कौनो राग नाहीं न . यहि राग कै जे जेतना बड़ा साधक अहै ऊ वतना बड़ा मनई बनि जात है .
कौवा : यहि राग कै साधै कै योग्यता का है ?
बगुला : सबसे बड़ी योग्यता है सम्बेदनहीनता . ई राग जिन्दगी के साज पै सम्बेदनहीन बने बिना नाहीं गावा जाय
सकत .
कौवा : यहिके गवैया हैं दुनिया मा ?
बगुला : या लेव ! पूरी लंका जरि गै कहत है कुछ धुवां उठा ! अदना से लैके बड़े-बड़े महारथी तक यहि राग कै गवैया
पूरी दुनिया मा भरा परा अहैं . यहि राग कै महान साधकन मा नेता लोगै आवत हैं . ई राग देस – काल की सीमा से
परे अहै . खून मा रंगा लेकिन बाहर से यकदम ‘धवल’ कपड़ा पहिर के ई राग गावा जात है . गवैया कै  साथ दियै के
लिये इंसानी हड्डिन कै बना अउर चमड़न से तना बाजा बजावा जात है . खैर , यहिकै परतख मजा तू का जानौ !
कौवा : यहि राग कै मजा सिरिफ गावै वाले लियत हैं या सुनै वाले भी ?
बगुला : मेन मजा तौ गवैया लियत है , थोर बहुत मजा सुनैया भी लियत है मुला भ्रम वाला मजा . सुनैयन का खून
दियै मा मजा आवत है , राग पै रीझि के ” नाद रीझि तन देत मृग नर धन हेत समेत ” अस है यहि महान राग कै
परभाव .
कौवा : यहि राग कै नाव ‘ अंधेरिया ‘ काहे है ?
बगुला : यहि राग कै लक्ष्य है अँधेरे का बनाये राखब . निपट अँधेरा . रोशनी से साफ बगावत . जेतनै ज्यादा अंधेर
वतनै ज्यादा असरदार हुवत है ई राग . बस यही है यहिके नामकरन कै मूल .
कौवा : तू गावत रहेव … यहि राग कै सम्बन्ध बम्बई नगरिया से कैसे अहै .
बगुला : यहि राग से सम्बंधित बड़ा सुन्दर सो भा रहा बंबई नगरिया मा . बस कुछै दिन पाहिले . बड़ी दिलचस्प रही
नेतन कै अंधेर-पैतरेबाजी . जब बंबई मा यहि राग कै तारसप्तक अररान तौ पूरे देस मा बलबली मचि गै . बस यही
गुनगुनात रहेन जौन तू सुनेव .
कौवा : हुवां तौ हिन्दी अउर हिन्दी पट्टी कै बिरोध कीन गा रहा …
बगुला : अरे ऊ सब तौ बस ऊपरी बाति है . मेन चीज तौ नेतन कै आपन खेल है . हिन्दी बिरोध मा राग अंधेरिया कै
भूमिका  अहै .
कौवा : यहि परसंग मा के – के  गवैया रहे ?
बगुला : यक दूइ हुवैं तौ बताई . जिन्दगी भर नाव लीन करब तब्बो कम परि जाये . बस इहै समझौ कि केंद्र सरकार
से लैके राज्य स्तर तक कै छुट भैया कलाकार भी हाथ साफ करै से नाय चूके . ” अहो रूपं , अहो ध्वनिः ” ! अउर तौ
अउर यहि राग के बिसलेसन कै ठेका लिहे पत्रकारौ तक राग के गावै मा सामिल ह्वै गये . बुद्धिजीवी बौद्धिक तरीके से
गाइन , खालिस अपने अंदाज मा . सबका लाग कि ” मार ले सटाक से लोहा गरम बा ” …
कौवा : यहि राग कै प्रेरना कहाँ से आयी ?
बगुला : वैसे तो यहिके प्रेरना कै बात निरर्थक है . आदिकाल से ई राग अपने वजूद के साथ कायम अहै . कभौ कम तौ
कभौ ज्यादा . हाँ , ई राग साधै कै बेहतरीन ‘स्मार्टनेस’ इन भारतीयन का साठ साल पाहिले  अंग्रेजन से मिली रही  .
”फूट डालो , राज करो” के रूप मा . गुरुदच्छिना मा आजौ यै ”योर मैजेस्ट्री – योर मैजेस्ट्री” चिल्लावा करत हैं, अंग्रेजन
की  खिदमत मा . लैटेस्ट प्रेरना इहै समझौ …
कौवा : यानी हिन्दी मराठी के नाम पै फूट डारै अउर राज करै कै चाल है ई सब …
बगुला : लगभग पहुँचत अहौ 🙂 . मराठी मानुस के उद्धार कै बीड़ा उठाये यक राछस-परिवार अपने पारिवारिक – धरम
कै निर्वाह के नाम पै यहै सब करत अहै … यहिरी आजादी के बाद लगभग समपूरन सासन कै मलाई खाय वाली केंद्र
सरकार ,पूरे देस का आपन जंगल समझ के, औव्वल सातिरपने कै परिचय दियत इन राछसन कै सहयोगौ करत है .
ई सरकार केवल भारतीय ही नाय बल्कि लंका तक के राछसन कै सहयोग कै चुकी है …
कौवा : लंका ?
बगुला : समझ मा न आवत हुवै तौ लंका के आगे ‘श्री’ लगाय दियौ 🙂
कौवा : बहुत बुरा हुवत अहै देस के साथे …
बगुला : कुछ बुरा नाय हुवत अहै . हमै तौ यहै पसंद है . अपने खातिर तरक गढ़े का चाही . तुहिन बताओ कि मराठी
नेतन कै मांग का गैरवाजिब अहै ? हिन्दी-पट्टी वाले उनकी नौकरी पै कबजा कै लियत अहैं . उनके ‘मुंबई’ का आपन
घर  समझि लियत अहैं . हिन्दी के कारन मराठी कमजोर परि जाति अहै . मराठी संसकारन का चोट पहुँचति अहै .का
मराठी कौनौ चीजै न आय . हे मित्र काक ! इन सब बातन मा कौनौ दम नाहीं न ?
कौवा : देखौ , इन बातन मा दम देखब तोहार मजबूरी ह्वै सकत है लेकिन हमार नाय . ‘बम्बई’ यक ‘कास्मोपालिटन’
सहर के रूप मा बना – निरमित भवा , सबके सहजोग से . हियाँ सभी बसि सकत हैं . जैसे दिल्ली सबकै आय वैसे ही
बम्बइऊ .हुवां रहै कै अधिकार संबिधान के तहत मिला अहै.रही बाति कबजा कै तौ जब हिन्दी पट्टी वाले कब्ज़ा किहिन
तौ का मराठिन का सांप सूंघ लिहे रहा . तब लोग का पागल रहे !,नहीं , इंसानी जरूरत रही जिहसे लोग हुवां बसे,सबकी
जानकारी मा , धोखा कैके नाय . काम कैके . केहू भी आपन घर-वतन छोड़ा नाय चाहत .इहै पैसवा खींचत है —” रेलिया
न बैरी, जहजिया न बैरी , इहै पैसवा बैरी हो ” . बिभिन्न परकार कै सम्बन्ध मराठिन कै सीमावर्ती मध्य परदेस वालेन
से अहै , हाँ राजनीति अब नयी पहचान बनावै तो दिक्कत औबै करे . मराठी कै सम्मान जरूर हुवे का चाही लेकिन
कौनो भासा के बिरोध के द्वारा नाय .मराठी कै आपन महत्व है अउर हिन्दी कै आपन .आज कै ई सच है कि हिन्दी
अधिकतर भारत  कै समपरक भासा ह्वै चुकी है . यहि वजह से यहिकै परभाव ज्यादा है . ई कौनौ भासा के लिये समस्या
न आय . हिन्दी बिरोध से मराठी – उद्धार नाय जुड़ा है . बस तोहरी अंधेरिया राग कै सत्ता देखात है इन नेतन की बातन मा .
बगुला : चलौ ठीक अहै तुहूँ बोलि लिहेव , नाहीं तौ कहतेव कि हमार दोस्त हमें बोलहिन नाय देतै . अब आराम चाहत
अही , हमरे प्रिय राग के बीच मा फाट परेव 🙂
कौवा : हमें तौ ई राग यकदम नापसंद है . मजबूरी है कि दुनिया मा यहि राग के वजूद का देखै का परे . हाँ , अब हमहूँ
चला  चाहत अही . फिर मिलब ..
राम राम !
बगुला : राम राम ! भैया !
( यहि तरह कौवा आपन राह पकरत है अउर बगुला अंधेरिया राग मा खोवै कै परयास करत है …)
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 [ आज एतनै , अब अगिले अत्तवार तक हमरौ राम राम !!! ]
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कौवा-बगुला संबाद , भाग- ४ : पैसा कै महिमा

 पढ़ैयन का राम राम !!!
[ भैया ! / आज तौ दिन है कौवा-बगुला संबाद कै .. आज कै बिसय है – ”पैसा कै महिमा” .. यक कविता लिखे रहेन,यही परसंग के अनुकूल जानि के वहू का इन दुइ पच्छिन के माध्यम से कहुवाय दियत अहन .. ]
[ पिछले अंक म — कटा हुवा हरा पेड़ लादे यक टेक्टर यक नये थाना के सीमा म दाखिल हुवत है.. दुइ पुलिस
वाले वाहिका रोकावत हैं.. कौवा-बगुला पास के पेड़ पै बैठि के पूरा माहौल देखत हैं ..]
———- अब आगे कै हाल , आपके सामने है ————
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                        कौवा-बगुला संबाद , भाग- ४ : पैसा कै महिमा
( दुइनिव पच्छी पेड़ पै बैठि के बतलात अहैं..)
कौवा : अरे यार ! पुलिसवै टेक्टरवा काहे रोकावत अहैं ..
बगुला : अरे..हमार पेट केतनौ भरा रहै लेकिन हम मछरी देखि के छोडित  नाय ..बस अइसने समझौ कि चारा सामने आइगा .. आजाद भारत कै आजाद पुलिस वाहिका कैसे छोडिहें ..
कौवा : तुहैं तौ पूरी दुनिया अपनेन लेखा लागत है ..
बगुला : तौ देखि लियौ आगे ..
( दुइनौ देखत हैं कि दुइ पुलिस, ड्राइबर अउर वकरे सथुवा के पास जात हैं , अउर ……..)
                  मेन पुलिस : ”रोक साले ! …साले बहन … रोड तुम्हारे बाप की है जो खेत जैसा जोतते चले आ रहे हो                                     ..साले भोस…हरा  पेड़ काट कर ले जा रहे हो .. साले को बंद कर दो थाने में .. पीसेगा
                                       चक्की ..साला मादर …”
                  दुसरका पुलिस : साहब जाव , आपकै चाय बनी तैयार अहै .. इन हरामजादन का हम देखि लियब ..
                                     ( मेन पुलिस दुकान पै निः सुल्क ब्यवस्था वाली चाय कै मजा लियय लाग ..)
                   ड्राइबर : का साहब .. जौन थाना पार करी ह्वईं पैसा दियय का परे .. ई कहाँ कै रीति आय .. ५००
                                     रुपया हर पेड़ के हिसाब से पहुँचाय दिहेन अपने थाने पै , वहिके बादौ ई सब .. का तुक                                       बनत है ..
                  दुसरका पुलिस : बहस-बाजी न करौ .. नहीं तौ बहसै करै के ताइं कोरट तक दौराय दियब .. होस
                                        पैतड़े ह्वै जाये ..
                  ड्राइबर कै सथुवा : ( दांत चियार के ) अरे साहब ……….
                                                            ” जेहि बिधि होय नाथ हित मोरा |
                                                               करहु  सो  बेगि  दास  मैं  तोरा || ”
                  दुसरका पुलिस : सौ कै गाँधी-छाप निकारि के धै दियौ , फिर जाव जहाँ जाय का हुवै ..
                                        ( ५० रुपया पै सौदा तय भवा . रुपया लै के पुलिस चलता बना ..यहिरी ड्राइबर अपने                                            सथुवा से ..)
                  ड्राइबर : साले .. बहिन .. लियत हैं घूस अउर कहत हैं ..गाँधी-छाप..
( यहितरह , टेक्टर आगे निकरि गा अउर कौवा , बगुला चालू भये ..)
कौवा : पुलिसवै टेक्टरवा का छोड़ि दिहिन …
बगुला : ई सब पैसा कै महिमा है …
कौवा : पैसा कै महिमा … का मतलब …
बगुला : ई कै महिमा बतावै के ताइं यक कविता सुनावत अही .. सुनौ …
                  ” पैसा कै महिमा अपार , रे भैया , पैसा कै महिमा अपार …
                     पैसा कै धाक जमी चौतरफा ,
                                           पैसा है सबकै भतार .. | ..रे भैया , पैसा कै …   …
                     पैसा कै रेल गाडी , पैसा कै खेल गाडी ,
                                           पैसा उड़ावै जहाज ..
                     पैसा  से राह घटै, पैसा से जेब कटै,
                                           पैसा जहर औ’ इलाज ..
                     पैसा से मंत्री , पैसा से संत्री ,
                                           पैसा चलावै सरकार .. || १ || ..रे भैया , पैसा कै …   …
                    पैसा किलट्टर , पैसा रजिस्टर ,
                                           पैसा से ओहदा-रुआब ..
                    पैसा के पावर से जुल्म करैं भैया ,
                                           बने  सरकारी-नबाब ..
                    पैसा वकील बनै,पैसा सिपाही बनै ,
                                           पैसा  बनै थानेदार ..  || २ || ..रे भैया , पैसा कै …   …
                    पैसा से माया, पैसा से काया ,
                                           पैसा से जुरै अनाज ..
                    पैसा से नात-बात,पैसा से जात-पात,
                                          पैसा बिन सूना समाज..
                   पैसा  से सूट जुरै,पैसा से बूट जुरै,
                                         पैसा  से सगरौ सिंगार .. || ३ || ..रे भैया , पैसा कै …   …  
                   पैसा से प्यार हुवे,नाहीं इंकार हुवे,
                                          पैसा सकल-गुन-खान ..
                   पैसा सुरूप करै,नाहीं कुरूप करै ,
                                          पैसा तौ बड़ा सैतान ..
                   पैसा से गर्मी, पैसा बिना नरमी ,
                                          पैसा कै सब खेलुवार .. || ४ || ..रे भैया , पैसा कै …   …”
कौवा : काहे रुकि गयौ .. हमैं याद आवै लाग..यकरे आगेउ कुछ अहै ..ऊ यहि मेर से है ..
               ” पैसा से कर्ज टरै,पैसा से मर्ज टरै,
                                          मुला न टारै ई मौत ..
                 पैसा के चिंता कै, बेचैनी कै पल ,
                                          काटत हैं जैसे सौत ..
                 पैसा बहुत कुछ,मुला नाहीं सब कुछ,
                                          सम्हला हो सोच,बिचार .. || ५ || ..रे भैया , पैसा कै …   …”
बगुला : यहिका यहि लिये नाहीं बताये रहेन कि ये लाइनें हमरे काम कै नाय अहैं ..
कौवा : मुला हमरे काम कै हैं ..
बगुला : अंधेर हुवत अहै .. अब चलै .का चाही ..
कौवा : कालीदीन के ताले पै औबइ अगली मुलाकात के ताइं ..
बगुला : ठीक अहै ..
कौवा : राम राम !!!
( दुइनिव अगली मुलाकात कै वादा कैके आपन-आपन राह पकरत हैं )
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[ आज एतनै ,,,
अगिले अत्तवार का रमई काका पै कुछ सामग्री रखबै …
तब तक के लिये …भैया ! हमरौ राम राम !!! ]      
 छबि-स्रोत:गूगल बाबा

कौवा-बगुला संबाद , भाग- ३ : अकिल कै खजाना …

 [पढ़ैयन का राम राम !!!
आज कै भाग इंसानन की अकिल पै अहै …]


कौवा-बगुला संबाद , भाग- ३ : अकिल कै खजाना …
(दुइनिव टेक्टर-टाली के पीछे जात अहैं | टेक्टर गांव से पक्की सड़क 
के बीच के कच्चे रस्ते का रौंदत जात अहै | खूब धूरि उड़ति अहै |

बड़ा सफेदहूँ माहौल देखि के बगुला कौवा पै जड़ब चालू किहिस ...)

बगुला : ( उड़त उड़त कौवा का तिर्यक देखि के ) यार ! अब तौ तू अतना धूरि से 
लथपथ अउर सफ़ेद ह्वै चुका हौ कि चाहे जेहका धोखा दै सकत हौ …कहौ तौ 
चली ताले के लगे …मछरी मारै सिखाय दी …
कौवा : ( मटमैली पलक उठाय के अउर यक आँख से तरेर के ) अबे ! सरम 
नहीं आवत तुँहका …थोरी देरि पाहिले हम ग़मगीन रहेन अउर जैसे थोरि 
के उबरेन वैसे तू धोखा कै पाठ पढ़ावै चालू किहेव …
बगुला :…..अइसा है कि बगल के पुरवा मा सत्तनरायन कै कथा कुछ पागल 
सुनत अहैं , वहीँ जाव अउर अपने आत्मा का सांती पहुचाओ . लेकिन यक 
सच्चाई हम जनित है अच्छी तरह से कि तू जब-जब इंसानन की दुनिया 
मा गयौ है तब तब संताप लैके लौटेव है | बुरा न मानौ तौ पूछा चाहित हन  
कि इंसानन से ई तोहार बिसेस लगाव काहे अहै … जबकि …
 
”मुंह जारे बिल्लिउ सदा ,
छाछ पियत है फूंकि के |
तू एतना उल्लू अहौ ! ,
सुधरेउ नाहीं चूकि के || ”…


कौवा : ओ भैया ! हम बिसेस लगाव बतायिव दियब तू तब्बौ न समझ पउबो |
मुला पूंछे हौ तौ बताय दियत अहन, नाहीं तौ कहबो कि हम बुरा मानि गयेन …
जब ब्रह्मा इंसानन का बनाइन तब जाने काहे बड़ा खुसी ह्वै गये | मारे 
खुसी के दिमाग जैसी चीजि इंसानन के हवाले कै दिहिन अउर कहिन कि 
यकरी सहायता से तुहैं जियै मा कौनिव दिक्कत न होये | फिर हमरे तरफ देखि के 
कहिन कि ई जीव तोहार सहायता करे | जब तक जीबो तब तक तोहार सनेस 
जथासंभव पहुंचाये अउर जब मरि जाबो तौ पितरपख मा तोहरी तृप्ती कै  
माध्यम बने | हम सर झुकाय के ब्रह्मा जी कै बात स्वीकार कै लिहेन | हमै 
लाग कि धरती पै सेर , भालू , सांप , मगर , बिसखोपड़ी जैसे खतरनाक 
जीवन के बीचे ई निरीह जीव बिना दिमाग के न  रहि पाये | ब्रह्मा जी बड़ा 
नीक किहिन… लेकिन …तब से आज तक जौन देखेन , वहिपै तौ यही सच 
लागत है … …
 
” बिधाता नवाजिन अकिल कै खजाना ,
तू दुनिया मा कोहराम काहे मचायौ ?
मिली जवन ताकत है रच्छा के खातिर ,
तू वाहिका विनासन कै जरिया बनायौ ! ”
 
अस नाय न कि इन्सान अकिल कै दुरुपयोगै करत आवा | 
कइव नीकौ कदम उठाइस | सभ्यता कै विकास किहिस | ख़राब चीज तौ ई किहिस
कि अपने का निर्दुन्द बनाय डारिस | ई समझ लिहिस कि दुनिया मा ‘मछरी-न्याय’ 
सबसे बड़ा सच अहै | यानी जादा ताकतवर कम ताकत वाले का हबक लियै | ऐसा 
नाय न कि औरे जीव यहिके सिकार बने , ई अपने संगी-साथी का भी मौका पाय के
चाटि गवा | ई बाति अभिधा अउर ब्यंजना दुइनिव मा सही अहै | अबहीं कुछ समय 
पाहिले घटा नोयडा कै ‘पंधेर’ वाला मामिला देखि सकत हौ | जाने केतना पंधेरन 
का हम अउर तू अपनी दिब्य आँखिन से  जानित है , जिनका इन्सान कै अकिल 
नाहीं जानि पावत | पंधेर का जब इंसानी अकिल भूलि गै तौ हमहूँ का लाग कि 
वाकही इंसानी अकिल बड़ी ताकतवर है ( ! ) …
अब हम का करी …हम तौ बचन-बद्ध अहन …यहीलिये 
हम इन्सान के बारे मा सोचित है …
बगुला : एतना जादा न सोचा करौ…कम सोचौ…जहाँ जवन मिलै भकोसौ अउर 
जियौ मजे से …इहै इन्सान करत अहै अउर मौका मिलत है तौ हमहूँ करित है …
हम सबका आपन बाति सिरफ मजा लियै खातिर करै का चाही …ठीक संसद 
मा जैसे नेता करत हैं …अब आगे देखौ टेक्टर नये थाना की सीमा मा प्रबेस 
करत अहै …सामने पुलिस इन्द्र के बज्र के नाईं डंडा उठाये वाहिका रोकावत 
अहै …चलौ नवा एपीसोड सुरु हुवै वाला अहै …
कौवा : चलौ …का कही …


( दुइनिव लपक के पास के पेड़ पै 
बैठि के माहौल ताड़ै लागे …)

[ आज एतनै , अब अगिले अत्तवार का
तब तक राम राम !!! ]
                                                        

छबी-स्रोत ; गूगल बाबा























कौवा-बगुला संबाद , भाग-२ : इंसानियत कै घटब अउर पेड़न कै कटब …

[ राम राम भैया ! / संबाद कै सिलसिला (भाग – २ , के रूप मा ) आज ” इंसानियत कै घटब अउर पेड़न कै कटब … ” के रूप मा आप सबन के सामने प्रस्तुत अहै / उम्मीद है आपका रुचे … ]


कौवा-बगुला संबाद , भाग-२ : इंसानियत कै घटब अउर पेड़न कै कटब …

     

( यक ताले के लगे दुइनिव मिलत हैं )  
बगुला : ( कौवा का आकास-मार्ग से आवत देखि के ) आओ दोस्त ! तोहरय इंतिजार करत रहेन …
कौवा : (बगुला के सामने बैठि के ) राम जोहार ! 
बगुला : राम राम ! कुछ ग़मगीन लागत हौ , का बाति है …
कौवा : कुछू नाहीं हो | तू आपन बताओ … 
बगुला : हमार तौ सब चंगा है | हमार सवाल अबहिनौ अपनी जगह बना अहै … का बाति है कि …
कौवा : साथी ! बाति तौ बेसक अहै …मानौ तौ बड़ी नाहीं तौ कुछू नाहीं | 
बगुला : अरे कुछ बोलबो … 
कौवा : यक जनीं बूढ़ा रहीं , वनहिन कै मरे के बादि कै दुर्गति नाय देखि गै हमसे !  
बगुला : जब बूढ़ा मरी गयीं तौ दुनिया अउर दियह छूटि गै उनसे , अब फिर दुखी हुवै कै कौनौ बाति नाय न | हाँ , अगर दुखी हुवै कै सौख लागि हुवै तौ दुसर बाति अहै … 
कौवा : गजब उलटवासी करत हौ … बूढ़ा मरि गयीं तौ का हमहूँ मरि गयन … हम सोचब काहे छोड़ि दी … भले हम वनके घरे नाय पैदा भयेन लेकिन इन्सान कै नेकी भुलावै हमै नाय आवत | इन्सान कै नेकी इंसानै भुलाय सकत है और इहै हमरे दुःख  कै कारन है |
बगुला : सुनत अहन ,बोलत रहौ … 
कौवा : बाति ई तब कै आय जब भारत अंग्रेजन के कब्जे मा रहा | अवध इलाका से बहुत मनई अंग्रेजन की फउज मा रखा गा रहे | यनही सैनिकन मा यक रहे बूढा कै मनसेधू | नाव रहा संकर बकस | संकर बकस कै जहाँ तहां डिउटी लगाइ दीन जाति रही | तब बूढा जवान रहीं | समाज और पिछड़ा रहा | साल डेढ़ साल बीति जाय अउर संकर बकस न आवैं तौ लोग अगल – बगल से बोली काटैं—” संकर बाबू कहूं लडाई मा … का पता चलि बसा हुवैं …भगवान न करै कुछू ख़राब भा हुवै … लेकिन ……” यहि समय बूढ़ा कै दुःख बाटै के बरे केहू नाहीं रहत रहा | 
अंगना मा यक ठौरे नीमी कै पेड़ रहा जिहपै हम बैठि के सब देखत – समझत रहेन | अपने दुःख मा दुखी बूढ़ा हमै देखि के मनै-मन ई कहति रहीं — 
” कागा रे ! जाव वहि देस जहाँ पिया गए …
लै आओ पी कै सनेस कहाँ पिया गए ?  
कागा रे ! …जाव वहि देस … “ 
बूढ़ा कै बेदना दूर करै के ताईं हम संकर बकस कै पता लगाइ के बूढ़ा का सपने मा सब देखुवाय दियत रहेन | वैसे तौ इन्सान छुइ लियै तौ हम सोरहौ व्यंजन त्यागि दी मुला सच्चे मन से बूढ़ा कै दीन भात हम बड़े चाव से खात रहेन | भगवान कै महिमा की बूढ़ा सौ साल पूरा कैके हरा-भरा घर देखि कै मरीं | बूढ़ा खुद कम खाइन – पहिरिन लेकिन गेदहरन का पालि-पोसी के बड़ा किहिन | लायक बनाइन | आज वई बूढ़ा मरी गयीं अउर उनके लरिकन का आवै तक कै जरूरत नाय महसूस भै | लहुरा लरिकवा तौ हदै कै दिहिस | बूढ़ा कै दाह-कर्म के ताईं लकड़िउ नाहीं देखि-सुनि के लाइस | जाने केतना आम कै पेड़ वै लगाये रहीं | लरिकै सब कटाइ डारिन | बेंचि खाइन | यही वजह से बूढ़ा के दाह-कर्म के ताईं लकडी खरीदै का परा | बेचै वाला , खरीदै वाले कै लापरवाही देखि के आम के साथे बबुरौ कै लकडी दै दिहिस | 
आज बबुर के लकडी के साथे बूढ़ा कै अंतिम विदाई देखि के हम रोई दिहेन | यही के ताईं ग़मगीन अहन | तुहिन बताओ – का बूढ़ा का अस विदाई मिलै का रहा … 
बगुला : वैसे तौ अस नाय हुवै का रहा …लेकिन …
कौवा : अतना सब सुनि के भी तोहरे उप्पर कवनिउ फरक नाहीं परा … 
बगुला : देखउ भाई ! हम पहिलेन बताय चुका हन कि ज्यादा सोचित नाय | फर्जी रोउब हमै आवत है लेकिन तोहरे सामने वहिकै कौनौ मतलब नाहीं ना | तोहरी बाति कै असर हमरे उप्पर वतनिन देरि तक रहत है जेतनी देरि आकास मा बिजुरी कै चमक | …फिर अन्धेरै-अंधेर … | लेकिन ई पेड़ कै कटब हमहूँ का ख़राब लागत है | कारन ई है कि पेड़न से हमरौ स्वारथ जुड़ा है | पेड़ कटाई कै सबसे ज्यादा खामियाजा इंसानै भुगते | सबसे बड़ी बाति है कि वातावरन चौपट होइ जात अहै | बरसात कै करम बिगडि गा अहै | सही कही तौ इन्सान पेड़ नाय काटत अहै , आपन गोड़ काटत अहै | आपन साँस काटत अहै | आगे-आगे देखउ का का होए … …
कौवा : ई तौ सही कहत हौ कि इन्सान अपनी जिंदगी के साथ खेलत अहै | वहिके ऊपर ई तुर्रा कि इन्सान धरती पै सबसे स्रेस्ठ अउर बुद्धिमान प्रानी अहै ! …
बगुला : साथी ! सामने देखउ … टेक्टर-टाली पै लोगै कटा पेड़ लै जात अहैं | अगर चला चाहौ तौ देखी कि का मामिला ह्वै रहा है …

कौवा : चलौ चली … … 
( दुइनिउ टेक्टर-टाली के पीछे ह्वै लियत हैं ) 


 
[ आज अतरै, अउर अगिले अत्तवार का … राम राम !!! ] 







 छबि-स्रोत : गूगल बाबा

कौवा-बगुला संबाद , भाग – १ : यक दुसरे से चीन्हि-पहिचानि अउर दोस्ती


पढ़ैयन का राम राम !!!  

आज यहि संबाद कै पहिला भाग आप सबन के सामने रखत अहन | यहिमा दुइनिव पच्छिन(कौवा-बगुला) कै मुलाकात होये | पहिले हम अपनी तरफ से कुछ निबेदन कीन चाहत अही—  


पढ़ैयन से निबेदन– यै दुइनिव पच्छी प्राथमिक रूप से कौवा अउर बगुला हुवैं , मुला कहूँ -कहूँ यै माया के सहारे आपन रूप बदल लियत हैं, हजारन साल पीछे कै बाति जानि लियत हैं , दूर कै खबर जानि जात हैं , आदि-आदि | कौवा का बड़प्पन दीन गा है ,कारन ई है कि यहिकै तन अउर मन यक्कै नाई है | बगुला मा ई बाति नाहीं है | कबि कबीर दास कै इसारउ यही तरफ अहै —” तन मैला मन ऊजरा बगुला कपटी अंग | / तासों तौ कौवा भला तन मन एकहिं रंग || ” लेकिन त्रिगुनात्मक सृस्टी मा बगुलौ कै आपन महत्व है , बावजूद यहिके कि बगुला कै मूल्यन अउर आदर्सन से दुराव अहै | कहूँ – कहूँ ई आपन बगुलाई छोड़े (!) अउर बगुला भगत के रूप मा उपदेसउ दे | आपन रवायतन पेसा ई कहाँ छोडि पाये !  
इन दुनों की बातिन मा कहूँ सपाटपना रहे तौ कहूँ दुंद (द्वंद्व) |  





दुनू पच्छिन से निबेदन – कौवा से – ” दुनिया तौ दीवानी है कोइली कै माधुरी बानी कै / हम तौ तोहरी कांव-कांव कै सच्चाई सुनबै भाई | ” अउर बगुला से – ” हे बगुला ! हम जानित है भीतर से उज्जर होबो ना / लेकिन उपदेसय के जरिये ह्वै पाये तौ सच बोलेउ | ”  
अब आगे ———–  

भाग – १ : यक दुसरे से चीन्हि-पहिचानि अउर दोस्ती  



(यक ताले के किनारे दुइनिव मिलत हैं )

कौवा : (मन मा) अच्छा अहै ई ताल | खाजुल्ला कै ताल पै ना जाय के हियाँ आयन अच्छा किहेन | हियाँ सोर-गुल नाय अहै अउर सुस्ताय कै बिवस्था जादा भले अहै |  
बगुला : (पास मा बैठा कौवा के मन कै बाति जानि के) ठीक सोच रहे हौ , भाई !  
कौवा : तू के हौ भइया अउर ……… बगुला : जाने केतरा सालन से हम हियाँ मछरी मारित अहन … मुला जहाँ तक हमैं समझ मा आवत अहै तू खाजुल्ला कै ताल छोड़ि के हियाँ आवा हौ | 
कौवा : सही कहत हौ | हुवां मेला लाग अहै अउर बहु सोर-गुल हुवत रहा , सो हियाँ चला आयन | मुला तू कैसे जानेउ … बगुला : जइसे तुहैं जानकारी ह्वै जात है वइसे हमहूँ का | हमरेउ लगे माया कै खेल अहै | 
कौवा : ‘ जइसे तुहैं ‘ से का मतलब … 
बगुला : अय इहै कि अतरी दूरि से जानि गयउ कि कालीदीन के ताले पै माहौल बढ़िया है |  
कौवा : अच्छा तौ ई कालीदीन कै ताल आय !  
बगुला : हमहीं से मजाक…माया के खेल मा तू कम माहिर थोरै हौ … 
कौवा : नाहीं भाय… हरदम माया कै सहारा नाय लियै का चाही | जवन चीज आसानी से पता चल जाय वहिके खातिर माया कै सहारा नाय लियै का चाही | 
बगुला : अतरा बिबेक बचाये रहत हौ … हम तौ माया कै सहारा छोड़ि दी तौ जी न पायी |  
कौवा : कइसे … 
बगुला : भरम पैदा न करी तौ जी न पायी | माया त्यागि दी तौ भरम कइसे पैदा कै पाउब | न मछरी फंसे न जीवन चले | यही वजह से भीतर जेतना करिया हन बाहर वतनै सफेद | उज्जर रंग कै पहिचानि हमरे उदाहरन से हुवत है | 
कौवा : हम तौ भइया … जस भीतर तेस बाहेर … वइसे तौ करिया रंग कै मिसाल हमहूँ से दीन जात है … 

बगुला : लेकिन इन्सान तुहसे वतनी प्रेरना नाय लियत जेतनी हमसे… इहै देखव, नेतन का लियौ , यै आज के समय मा सर्बेसर्बा हैं | इनका धरती कै देउता समझौ | यै हमरेन नाई भीतरे के करिखाई कै यक्किव लीक बाहेर नाय आवै देते | कपड़उ हमरेन नाई पहिरत हैं | यहितरह हमार सक्सेज जगजाहिर अहै | 
कौवा : सही कहत हौ | तुहँसे बाति करै मा बड़ा मजा आये | 
बगुला : हमरौ इच्छा अहै कि केहू से बतलावा करी | मछरिन से बतलाई अउर दोस्ती करी तौ खायी केहका..यही से तुहसे दोस्ती करा चाहित अही | 
कौवा : हमैं कवनिव दिक्कत नाय ना |  
बगुला : सुक्रिया दोस्त … 
कौवा : दोस्त अंधियार हुवत अहै …अब चलै का चाही … 
बगुला : हाँ, जल्दी जाव नाहीं तौ तोहार घरैतिन तोहरे उप्पर बिगड़िहैं | 
कौवा : न न न हमरे खियाँ घरैतिन नाहीं ना | 
बगुला : यानी हमरेन नाई … आगे नाथ न पाछे पगहा …दोस्ती जमे … 
कौवा : अच्छा अहै …अब चलब … राम राम !!! 
बगुला : यही ताले पै फिर मिलेउ … राम राम !!!  


( जारी …)  
[ अगिले अत्तवार तक हमरौ राम राम !!! ]  


(छबि-स्रोत-गूगल बाबा)

कौवा-बगुला संबाद : आगामी भागन कै भूमिका



छबी-स्रोत : गूगल बाबा



राम राम भईया !


कभौ गद्य औ कभौ पद्य, साहित्य मा दुइनौ कै उपस्थिति हुवत है| वैसे तो संसकीरत मा पूरे साहित्य का काब्य कहा गा है | मुला आज के समय मा काब्य अउर गद्य मा विधागत अंतर साफ़ देखात है| मोर इरादा तौ इहै है कि दुइनौ विधन से आपन बात रखी| गद्य मा आपन बात रखै खातिर “कौवा-बगुला संबाद” कै माध्यम चुनेन है|
कौवा अउर बगुला जाने केतरा समय से इंसानी कहानिन मा आवत अहैं| विद्यार्थी के लिए जरूरी पाँचों लच्छन मंहसे दुई ठौरे यनही दुइनौ जीवन से खींचा गा अहै–” काक-चेष्टा वकों-ध्यानं” | कौवा केरी चेस्टा अउर बगुला केरा ध्यान | मोर जोजना तौ इहै है कि इन दुइनौ कै चेस्टा अउर ध्यान कै सहारा लइके व्यंगात्मक लहजे मा समय-समाज पै आपन बात रखी |

प्रस्तुति कइव अंकन मा रहे | हर अंक कै सीर्सक अंकन के साथ रहे | पहिल अंक के तौर पै दुइनौ कै जान-पहचान अउर मुलाकात होये | दुइनौ हंसी-खुसी मिलिहैं अउर आगे कै मुलाकात तय कैके बिछुरि जइहैं | यहितरह संतों ! आगामी भाग मा आप लोग देखिहैं दुइनौ कै मुलाकात ——
ई तौ है हमार जोजना, अब आप लोगन कै राय कै इंतज़ार है ……

अब अगिले अत्त्वार तक ..
राम राम …!!!