Category Archives: अवधी लोकगीत

औपनिवेसिक सत्ता सभ्यता कय भ्रमजाल अउर लोकगीत : बजरंग बिहारी ‘बजरू’

ई आलेख  आकार मा भले थोर लागय मुला निगाह मा बहुत फैलाव औ गहरायी लिहे अहय। कयिउ बाति अस हयँ जौन चेतना का कुरेदयँ। औपनिवेसिक सत्ता के दौरान जौन भरम-जाल रचा गा ऊ गजब रहा। यहिमा सोझैसोझ जे फँसा ते फँसबै भा और जे बिरोध कय जिम्मा उठाये रहा उहौ, आनी-आनी मेर से, फँसि गा। यहि भरमजाल के चलते लोकगीतन (लोकभासन) के साथ जौन असावधानी औ जादती भै, वहिका जहिरावत ई आलेख पढ़य जाय कय माँग करत हय। : संपादक
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औपनिवेसिक सत्ता सभ्यता कय भ्रमजाल अउर लोकगीत : बजरंग बिहारी ‘बजरू’   

तब बच्चा रहेन| प्राइमरी इस्कूल कय बिद्यार्थी| यक बियाहेम गयन रहा| अपनेन गाँव मा| पंडित जी मंत्र पढ़िन| दुलहा से कुछ करय का कहिन| फिर रोकि दिहिन| हमरे बगल मा यक बुजुर्ग बैठा रहे| वय कहिन की अबहीं मेहररुअन कय मंगलगीत सुरू नाहीं भवा| जब तक ऊ न पूर होये पंडितजी आगे ना बढ़ि पैहैं| तब तौ यहि बातिक मर्म समझि नाहीं पायेन| बादि मा धीरे-धीरे अर्थ खुला की समाज जतना महत्त्व (बेद)मंत्र का देत है वतना महत्त्व लोकगीतौ का मिलत है|
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परम्परा से लोकगीत का मौखिक साहित्य या वाचिक साहित्य के अंतर्गत रखा जात है| मानव जाति कय सबसे पुरानि अभिव्यक्ति गीतन मा भई होये| बिद्वानन कय कहब है की लोकगीत औ’ लोककथा सभ्यता के आदिकाल से रची जाति हैं| रचना कय ई दूनौ रूप अलग-अलग औ’ यक-दुसरे मा घुलिमिलि कय बनत हैं| लोकगीत कय यहै परिभाषा है की वहका लोक रचत है| मतलब की वहकै रचनाकार अग्यात रहत है| जैसय कौनौ गीत कय रचनाकार कय नाम पता चलि जात है ऊ लोकगीत के दायरा से बाहर होय जात है| कबीर कय निरगुन लोक मा खूब गावा जात है मगर वहका लोकगीत नाहीं कहा जात है| यहै हालि तमाम भक्त कबियन के गीत, कबिता कय बाटै| भजन लिखै वाले, बिरहा रचै औ गावै वाले लोककवि कहा जात हैं लेकिन उनकै रचना लोकगीत नाहीं कही जाति है| लोकगीत कय असली ठेकाना ताम्रपत्र, भित्तिपत्र, पोथी ना होय| ऊ तौ लोक के कंठे बिराजत है| अपने सुभाव से लोकगीत करिया अच्छर मा ढलै से बचा चाहत है| वहका आजादी चाही| ऊ ‘प्रामाणिकता’ के फेर मा नाहीं पड़त| जब छापाखाना आवा तब्बौ ओपहर ध्यान नाहीं गवा| वहका लिखित रूप बहुत बादि मा दीन जाय लाग| वहकै इतिहास लिखित साहित्य के इतिहास से बहुत पुरान बाटै जद्यपि इतिहास कय चिंता लिखित साहित्य का जादा रहति आई है| लोकगीत केर जड़ समय के अनंत बिस्तार मा फैली बाटै यहीलिए ऊ आपन प्राचीनता साबित करय खातिर परेसान नाहीं होत| लिखित साहित्य तौ मुट्ठी भर लोगन के बीच मा पढ़ा-समझा जात है मगर मौखिक कय पसारा सबके बीच मा रहत आवा है| आधुनिक काल मा जब साक्षरता कय प्रसार भवा तब लिखित साहित्य कय दायरा बढ़ा| ओहके पहिले जनता कय भावधन यही मौखिक साहित्य या लोकगीतन मा यकट्ठा होत औ बहत रहा| पूरे समाज कय सांस्कृतिक जीवन यही जलधार से सींचा जात रहा|

लगभग दुय सौ बरस देस फिरंगी गुलामी मा रहा| यहि दौरान वह पर ‘सभ्यता’ कय अतना दबाव पड़ा की ऊ नकलची लोगन से भरत गा| अपने धरती से, भासा से, भेस से, कथा औ गीत से दूरी बढ़त गय| यक उधार लीन्ह बनावटी जिंदगी हावी होत गय| हिंदी वर्द्धिनी सभा मा भाषण देत भारतेन्दु बाबू याद देवायिन की अंगरेज तौ यहर कय गीत बटोरे जात हैं लेकिन देसबासिन का कौनौ परवाह नाहीं है| फिरंगी हमरे लोकचित्त का परखे लेत हैं औ हम उनके सेक्सपियर या मिल्टन का पढ़िकै गदगद बाटेन| वहि देस कय अनपढ़ किसान, मजूर और घरैतिन का सोचत हैं, उनकय जीवन मूल्य कौने गीतन मा कौने तरह से जाहिर होत है यकरे प्रति हम यकदम उदासीन हन| वय अंगरेज हमरे लोकजीवन मा पैठ बनाय लेहें मगर हम उनके लोकजीवन के सम्बंध मा कुछू ना जानि पाइब-

आल्हा  बिरहहु  को  भयो  अंगरेजी  अनुवाद|
यह लखि लाज ना आवई तुमहिं न होत बिखाद||

भारतेन्दु बाबू ई बाति 1877 मा कहिन रहा| आजव ई वतनय सही लागत अहै| भारतेन्दु के करीब पचास साल बाद रामनरेश त्रिपाठी अवधी लोकगीतन कय संग्रह सुरू किहिन| अपने ग्रामगीत कय भूमिका मा वय हैरानी जताइन की हम लोगन का अपने धरती से अतनी दूर के खींच लयिगा! नई पढ़ाई हासिल कैकै जवन पीढ़ी सामने आवति है ऊ अपने घर-परिवार से, गाँव-जेंवारि से कतना अजनबी होय जाति है| जतनय ऊंच डिग्री वतनय जादा दूरी| रामनरेशजी नई सिच्छा ब्यवस्था कय पैरोकार रहे| खड़ी बोली हिंदी कय कट्टर समर्थक| वय सवाल तौ नीक उठायिन मगर वहकै जबाब तक नाहीं पहुँचे| औपनिवेसिक सत्ता सभ्यता कय जौन भ्र‘मजाल रचिस रहा वहके चक्कर मा ऊ पूरा जुग थोर-बहुत फंसा रहा| यक बिचित्र संजोग के तहत आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी वाली ‘सरस्वती’ पत्रिका खड़ी बोली के पच्छ मा आन्दोलन चलाइस| यहसे तौ कौनौ दिक्कत नाहीं रही मगर ई आन्दोलन अवधी, ब्रजभाषा के खिलाफ खड़ा होइगा! ई प्रचार कीन गा की यहि भासा के ब्यवहार से ‘राष्ट्र’ कय उन्नति ना होय पाये| यहव कहा गा की देहाती भासा मा नवा बिचार नाहीं कहा जाय सकत है| सभ्यता कय मानक बनाय दीन गय खड़ी बोली औ हिंदी कय दूसर बोली हीनतासूचक मानी जाय लागि| 1900 से लैकै 1940 तक जवन जहर बोवा गा वहकय फसल अब लहलहाति बाटै| मैथिली अलग भै, राजस्थानी आपन झंडा उठायिस| अब भोजपुरी अलग होति है| काल्हि का हिंदी कय बाकी हिस्सेदार सामने अइहैं| आगमजानी कबि तुलसीदास ‘मानस’ मा चेताइन रहा-

स्याम सुरभि पय बिसद अति, गुनद करहिं सब पान|
गिरा ग्राम्य सियराम जस, गावहिं सुनहिं सुजान||

बर्णबोध औ भासाबोध दूनौ पूर्वग्रहग्रस्त हैं| यहि दोहम तुलसी पूछत हैं की का करिया गाय कय दूध गोरहरि गाय के दूध से कमतर होत है? अक्सर अस मानि लीन जात है| जबकि असलियत ई है कि करिया गाय के दूधे मा जादा गुण होत है| ऐसे भासा कय मसला है| चहै गाँव कय बोली होय या संस्कृत, वहि भासा मा का कहा गा है, यहसे बाति कय महत्त्व तय होये| कथ्य निर्धारक होत है, भासा नाहीं| महत्त्व रंग से या वर्ण से तय न करौ, पहिले वहकय गुण देखौ| समझदार कय यहै पहचान है| सयान लोग संस्कृत मा रचित रामायण से अवधी मा लिखित रामचरितमानस से भासा के आधार पर छोट-बड़ा ना मनिहैं| वय गुण के कारण दूनौ कय सम्मान करिहैं|

अंगरेजन के सासनकाल मा जवन मानसिकता बनी ऊ अब तक कायम है| लोकगीतन का आजौ स्कूली पाठ्यक्रम मा कौनौ जगह नाहीं मिली है| पहली से लैकै बारहवीं तक बिद्यार्थी कौनौ दर्जा मा अपने इलाका के लोकगीत कय दरसन नाहीं कय सकत हैं| हिंदी मा एम.ए. करय वालन का लोकगीत नाहीं पढ़ावा जात है| हाँ, केऊ-केऊ हिम्मत कय-कय लोकगीत का रिसर्च खातिर चुनत है| यहसे कौनौ खास फरक नाहीं पड़ै वाला है|

जनजीवन बहुत तेजी से बदलत है| लोकगीतन के संग्रह कय तरफ विसेस ध्यान दियब जरूरी है| पूरी सावधानी से उनकय दस्तावेजीकरण होय| जिंदगी तौ अपने गति से चले लेकिन परम्परा से जौन धरोहर हमका मिली है वहका संजोय लेब आवस्यक लागत है| यहि बीच लोकगीतन कय स्वरूप बदला है, उनकय भासा बदली है| वहका बारीकी से समझैक चाही| जागरूक लोग ध्यान देंय, लोक मा काम करय वाली संस्था ध्यान देंय औ सबसे जादा सरकार कय यह पर ध्यान जाय| तब्बै कुछ बाति बनि पाये| सोसल मीडिया अब गाँव-गाँव मा फैलि गय है| यहका रोकब संभव नाहीं है| हाँ, यह स्थिति कय लाभ उठावा जाय सकत है| लोकगीतन कय छेत्रीय बिबिधता का समझय मा नई मीडिया से सहायता लीन्ह जाय सकत है|

अवधी लोकगीतन कय बिसयबस्तु लगभग वहै है जौन हिंदी छेत्र के दोसर जनभासा मा मिलत है| अलगाव दुइ मामला मा देखाय पड़े| पहिल भिन्नता अवधी लोकजीवन मा राम कय मौजूदगी के कारण है औ दोसर वहके मिली-जुली संस्कृति के कारण| मध्यकाल मा मुस्लिम जनता हिंदी प्रदेस के हर भासा-बोली मा रही मगर यहि जमीन से निकले सूफी कबि अवधी का अपने कबिता के लिये चुनिन| 1350 से लैकै 1900 तक लगातार सूफी प्रेम कबिता अवधी मा लिखी गय| यहिकै ई असर पड़ा की अवधी मा मुस्तर्का तहजीब मजबूत होत गय| संत लोग यहि धारा मा खूब जोगदान किहिन| आजादी के आन्दोलन मा अवधीभासी जनता बढ़ि-चढ़ि कय हिस्सा लिहिस| यहि दौरान अवधी मा स्वतंत्रता का लैकै खूब जज्बाती गीत लिखा गा| यहि संग्राम मा अगुआई करै वाले नवा नायक उभरे| लोकगीतन मा वय पूज्य नायक बनावा गे| आजादी मिलय के बाद अवधी लोकगीत मा फिर थोरै तब्दीली आई| अब जनता कय सुख-दुःख का केन्द्रीयता मिलय लागि| धर्मभावना थोरै पीछे पड़ी| सिच्छा औ राजनीति मा लोकगीतन कय रूचि बढ़ै लागि|

सम्पर्क: 
फ्लैट नं.- 204, दूसरी मंजिल, 
मकान नं. T-134/1,
गाँव- बेगमपुर,
डाकखाना- मालवीय नगर,
नई दिल्ली-110 017
फोन- 09868 261895

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बाबा निमिया कै पेड़ जिनि काटेउ

village_india_scene_paintings_nature_hut_street_agriculture_farmers_एक दिन फिर जाता है और सारी स्थितियाँ बदल जाती हैं। विवाह के परोजन में, विदाई के पहले वाली रात तक कितनी चहल-पहल रहती है! जिस दिन कन्या की विदाई होती है, उस दिन का सूरज ही कुछ मायूसी लिए उगता है। कुछ पहर ही बीतते हैं, हालात ‘यू-टर्न’ ले लेते हैं। स्त्रियों के जिन कंठों ने उल्लास में ‘गारियाँ’ गायीं, वे अब बेबस हो कर विरह के दुख को सबद दे रहे होते हैं। विदाई का ऐन वक्त! बुक्का फार कर रोता परिवेश! मानव का सुख-दुख कितना परिवेशी है, जड़-चेतन सब अपनी भाषा में कूकते हैं। गाँवों में लोग ही नहीं, गोरू-बछरू भी इस विदाई के दुख को महसूस करते हैं। वे कान उटेर-उटेर कर पूरे परिवेश को अपने ढ़ंग से समझने की कोशिश करते हैं। वे निराशा के साथ देखते हैं कि इन इंसानी कायदों में उनका कोई दखल नहीं है। विदाई के बाद उनकी आँखें अँसुवाई रहती हैं। कई दिनों तक। एक गाय का सत्याग्रह मुझे याद है जिसने कई दिनों तक पानी की बाल्टी की ओर देखा तक नहीं। वह उन हाथों की प्रतीक्षा में थी जो मेहदी लगा के ससुराल चले गये, जिन्होंने पानी की बाल्टी भर-भर इनकी प्यास बुझाई थी। प्रकृति इतनी कृतघ्न कहाँ हो सकती है!

विदा होती लड़की भी परिवेश के महत्व को खूब जानती है। उसे घर के इन पशुओं का ही नहीं, पेड़ों-पौधों की भी भूमिका का पता है। वह अपने घर के नीम के पेड़ और उस पर आने वाली, कूजने वाली चिड़ियों में जीवन का फैलाव देखती है। उसे अपने विदा होने पर पूरे परिवार की चिन्ता है। खास कर माँ की। बेटियों के बिना घर कितना वीरान होता है, यह वह जानती है। इस वीरानेपन में माँ कितनी अकेली पड़ जाएगी, इसको लेकर वह चिंतित है। विदाई के समय वह अपने पिता से इस नीम के पेड़ को न काटने का अनुरोध करती हुई बड़ी करुणा के साथ कहती है –

बाबा निबिया कै पेड़ जिनि काटेउ,
निबिया चिरैया बसेर, बलैया लेहु बीरन की।
बिटियन जिनि दुख देहु मोरे बाबा,
बिटिया चिरैया की नाँय, बलैया लेहु बीरन की।
बाबा सगरी चिरैया उड़ि जइहैं,
रहि जइहैं निबिया अकेलि, बलैया लेहु बीरन की।
बाबा सगरी बिटियवै जइहैं ससुरे,
रहि जइहैं अम्मा अकेलि, बलैया लेहु बीरन की।

विदा होते हुए अपने कठिन दुख में उसे चिड़ियों की याद आ रही है। चिड़ियों की याद क्यों? ससुराल की चौहद्दी में खुद को सीमित होते देख उसे आकाश में उन्मुक्त उड़ान करने में समर्थ चिड़ियों की याद स्वाभाविक है। उड़ान कहीं की भी हो, बसेरा तो नीम पर ही है। बसेरे से अलग होने में उड़ान भरने का हौसला भी खत्म। इस बात को माँ ही सबसे ज्यादा समझ सकती है क्योंकि पितृसत्ता के क़ायदों से उसने भी कभी अपना आँगन छोड़ा है! अब एक एक करके सारी बेटियों के जाने के बाद यह का नीम का पेड़ और उस पर बसेरा लिये चिड़ियाँ ही उन बेटियों की अनुपस्थिति को भरेंगी। दिल को दिलासा दिलाना होगा कि अब इन चिड़ियों के कूजने, चहचहाने और उड़ने में बेटियों की आरजूएँ भी जाहिर हो रहीं!

लेकिन निरुपायता तो देखिये, आँगन के इस पेड़ के भविष्य पर भी माँ का कोई अधिकार नहीं है। अतः बेटी विदा होते वक्त अपने बप्पा से अनुरोध कर रही है कि बड़ी मेहरबानी करके इसे मत काटियेगा। फिर भी कहीं उसे संशय है। तो क्या किया जाय! पिता का सबसे प्यारा कौन है? कोई बेटी नहीं, बेटा है। तो उसी को आगे करके बात की जाय। बेटी कहती है कि हे पिता जी मैं बीरन(भाई) की बलैया लेती हूँ(यानी, मंगलकामना करती हुई उसके रोग-दोख सबको अपने ऊपर लेती हूँ), लेकिन इस पेड़ को मत काटना। उसे यकीन है कि बेटे के ज़िक्र के बाद इस बात को पिता जी गंभीरता से लेंगे और नीम का पेड़ बचा रहेगा। ‘बिटियन जिनि दुख देहु मोरे बाबा’ – में कितना कातर स्वर है! अब तक जो हुआ, सो हुआ, अब आगे जो बिटियाँ बची हैं और आख़िर उन्हें भी तो चिड़ियों की तरह चली ही जाना है, तो उन्हें इन बचे हुए दिनों में भला क्यों दुख देना।

इस गीत पर थोड़ा रुक कर सोचने पर मन करुणा से भर जाता है। इसमें एक ओर पितृसत्ता के सामने लाचार-सी स्त्रियों की व्यथा है तो दूसरी ओर दुख-दर्द की प्राकृतिक साझेदारी। क्या अब भी यह प्राकृतिक साझेदारी है हमारे बीच? पेड़ों-पक्षियों के साथ आज हमारे रिश्ते कैसे हो गये हैं। हम कितना कट चुके हैं उनसे जो हमारे गाढ़े के साथी रहे और जिन्होंने सदियों से अपनी प्राकृतिक बाहों में हमें संभाले रखा। लोक-रसिक विद्यानिवास मिश्र की इस गीत के प्रसंग में यह टिप्पणी महत्वपूर्ण है कि ‘पेड़ों के साथ उन आदमियों का जो रिश्ता है वह रिश्ता आज हमने तोड़ दिया। पेड़ अब बाज़ार के अंग बन गये हैं। उनकी जो निर्मम कटाई हुई है वह उस प्रज्ञा के विरुद्ध है जो लोगों के अंदर मौजूद है।’ आज शहर हर तरफ़ अपना अपने हाथ-पाँव पसारता जा रहा है, शहरी प्रवृत्तियों का बोलबाला दिनोंदिन बढ़ता जा रहा है। अब ज़रूरत है कि इस स्वभाव और प्रभाव से अलग हट कर गाँवो में, ग्राम-भाषा में और गाँव के परिवेश में जाकर हम फिर से अपने जीवन पर सोचें। यकीनन हमारा हृदय अधिक विशाल होगा और मस्तिष्क अधिक प्रखर।
~अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी

अवधी लोकगीत-३ : कंकर मोहें मार देइहैं ना..(कंठ : शुभा मुद्गल)

   कंकर मोहें मार देइहैं ना..

कंकर लगन की कछु डर नाहीं,

गगर मोरी फूट जइहैं ना..

कंकर मोहें मार देइहैं ना..

गगर फुटन की कछु डर नाहीं,

चुनर मोरी भीज जइहैं ना..

कंकर मोहें मार देइहैं ना..

चुनर भिजन की कछु डर नाहीं,

ननद मोहें ताना देइहैं ना..

कंकर मोहें मार देइहैं ना..

सास ननद के कछु डर नाहीं,

बलम मोसे रूठ जइहैं ना..

कंकर मोहें मार देइहैं ना..

यहि लोकगीत पै: यहि लोकगीत मा पनघट जाये पै का का दिक्कत आवत है, वहिकै चरचा पनघट से पानी लावै वाली नारी करति अहै। पनघट के राह पै कंकर मारै वाले मिलत हैं। नारी कहति है कि पनघट जाये पै लोगै कंकर मारि देइहैं! कंकर लगै कै कौनौ डेरि हमैं नाहीं है लेकिन हमार यू गगरिया फूटि जये! गगरिउ फूटै केरि कौनौ डेरि हमैं नाहीं है, लेकिन हमार यू चुनरिया भीजि जये! यहि चुनरिउ के भीजे कै हमैं कौनौ डेरि नाहीं है, लेकिन हमार ननदिया हमैं ताना मारे! मानि लेउ सासउ-ननदी केरि डेरि न करी हम तब्बो हमार बलम हमसे रूठि जइहैं! यानी बलम कै रूठि जाब सबसे दुखद है! बलम के रूठै कै अनदेखी नाहीं कीन जाय सकत!

अब यहि गीत क सुना जाय सुभा मुद्गल जी केरी अवाज मा:

~सादर/अमरेन्द्र अवधिया  

 

अवधी लोकगीत-२ : बाज रही पैजनिया.. (कंठ : डा. मनोज मिश्र)

ई गीत ‘बाज रही पैजनिया..’ होरी गीत हुवै। ई उलारा बोला जात है। यू फाग गीत के अंत मा गावा जाय है। यहि गीत मा नयी नबेली दुलहिनी के आवै के बाद वहिके गहना गढ़ावै के बारे मा घर वाले आपन-आपन जिम्मेदारी कै बाति मधुरता औ खुसी के साथे करत अहैं! इहै मिरदुल भाव गाना केरी मधुर परकिति मा उतरि आवा है। बतकहीं कै ढब औ गाना कै लय-गति यक्कै परकिति मा आय जाँय तौ सोनेम सुहागा होइ जात है। यहि गीत मा भारतीय संजुक्त परिवार कै मिलि बटुर के कौनौ चीज/मुद्दा का संहारै-सुगतियावै कै रेवाज देखा जाय सकत है। ई गीत मनोज जी की पोस्ट ‘फागुन का चरम और चैत का आरंभ’ से यहि साइट पै लावा गा है। गीत कै बोल यहि तरह है:

अवधी गीत : बाज रही पैजनिया..

बाज रही पैजनिया छमाछम बाज रही पैजनिया..

के हो गढ़ावै पाँव पैजनिया, के हो गढ़ावै करधनिया ..?/!

… … छमाछम बाज रही पैजनिया!!

के हो गढ़ावै गले कै हरवा, के हो गढ़ावै झुलनिया ..?/!

… … छमाछम बाज रही पैजनिया!!

ससुर गढ़ावैं पाँव पैजनिया, जेठ गढ़ावैं करधनिया ..!

… … छमाछम बाज रही पैजनिया!!

सैयाँ गढ़ावैं गले कै हरवा, देवरा गढ़ावै झुलनिया ..!

… … छमाछम बाज रही पैजनिया!!

कंठ : यहि गीत का आपन समूह मा मेन आवाज दियत मनोज मिसिर जी लोक-तत्व के संरछन के लिहाज से सराहनीय काम किहिन हैं। मनोज जी कबि सरल जी के गीत ‘मन कै अँधेरिया’ अउर पारंपरिक गीत ‘बालम मोर गदेलवा’ का कंठ दै चुका हैं। अब यहि गीत कै यू-टुबही प्रस्तुति आपके सामने है, आप लोग आनंद उठावैं: 

~सादर/अमरेन्द्र अवधिया 

अवधी लोकगीत-१ : बालम मोर गदेलवा..(कंठ : डा. मनोज मिश्र)

ई अवधी गीत ‘बालम मोर गदेलवा’ वहि नारी कै बाति रखत है जेहिकै बियाह गदेला से होइ गा है, यानी वहिकी उमिर से बहुतै कम, कहौ तौ नान्ह लरिका से होइ गा है। ऊ लरिका सग्यान नाय होइ पावा है, घर दुवार वाले वहिका बेहि के नारी लै आये। अब बालम गदेलवा है तौ नारी का तरसै क परत अहै। अइसनै कुछ बाति यक अउर गीत ‘सैंयाँ मिले लरिकैंयाँ’ मा कही गै है। हम गीत का लिखि दियत अहन हियाँ, यहिसे सब अरथ जाहिर होइ जये फिर आप सुनि के आनंद लीन जाय गीत कै! ( यहि गीत का आप मू्ल रूप मा मनोज जी की पोस्ट ‘बालम मोर गदेलवा’ मा देखि सकत हैं, हमरे यहि पोस्ट कै प्रेरना ह्वईं से है। )

अवधी गीत : बालम मोर गदेलवा..

तरसे जियरा मोर-बालम मोर गदेलवा

कहवाँ बोले कोयलिया हो ,कहवाँ बोले मोर 

कहवाँ बोले पपीहरा ,कहवाँ पिया मोर ,

बालम मोर गदेलवा…..

अमवाँ बोले कोयलिया हो , बनवा बोले मोर ,

नदी किनारे पपीहरा ,सेजिया पिया मोर 

बालम मोर गदेलवा…..

कहवाँ कुआँ खनैबे हो ,केथुआ लागी डोर ,

कैसेक पनिया भरबय,देखबय पिया मोर ,

बालम मोर गदेलवा…..

आँगन कुआँ खनाईब हो रेशम लागी डोर ,

झमक के पनिया भरबय, देखबय पिया मोर ,

बालम मोर गदेलवा….

कंठ : यहि बिलुप्त हुअत गीत का आपन कंठ दैके मनोज मिसिर जी लोक-तत्व के संरछन के लिहाज से सराहनीय काम किहिन हैं। मनोज जी कबि सरल जी के गीत ‘मन कै अँधेरिया’ का आपन कंठ दै चुका हैं। अब यहि गीत कै यू-टुबही प्रस्तुति आपके सामने है, आप लोग आनंद उठावैं:

~सादर/अमरेन्द्र अवधिया