Category Archives: अवधी गीत

मँय राजा भोली मोरा घर न लुटाय दिहेउ..(कंठ : रजिया बेगम)

 रजिया बेगम कै अवाज अपनी खास खनक के चलते हमैं नीक लागत है। इनके कुछ गानन क सिस्ट समाज भले असालीन कहै, मुल सोझै-सोझ कहै वाली लोक-सैली की वजह से हमैं यै गानय पसंद अहैं! इन कर गावा गाना ‘मँय राजा भोली मोरा घर न लुटाय दिहेउ’ यू-ट्यूब पै अपलोड कै दिहे अहन। यहि गौनई केर सबद यहि तिना हैं:

गाना : मँय राजा भोली मोरा घर न लुटाय दिहे(य)उ

      मँय राजा भोली मोरा घर न लुटाय दिहे(य)उ

      घर न लुटाय दिहेउ दुवार न लुटाय दिहे(य)उ

गोंडा वाली आयी है नखरा-वखरा लायी है,

चुम्मा-वुम्मा लइके मोरी नथुनी न पहिनाय दिहे(य)उ

… … मँय राजा भोली मोरा घर न लुटाय दिहे(य)उ

बस्ती वाली आयी है नखरा-वखरा लायी है,

जानी-वानी कहिके मोरी चुनरी न ओढ़ाय दिहे(य)उ     

… … मँय राजा भोली मोरा घर न लुटाय दिहे(य)उ

लखनऊ वाली आयी है नखरा-वखरा लायी है,

जोबन-वोबन मलि के मोरी चोली न डटाय दिहे(य)उ

… … मँय राजा भोली मोरा घर न लुटाय दिहे(य)उ

कानपुर वाली आयी है नखरा-वखरा लायी है,

धक्का-वक्का दइके मोरा टीका न लगाय दिहे(य)उ

… … मँय राजा भोली मोरा घर न लुटाय दिहे(य)उ

झाँसी वाली आयी है नखरा-वखरा लायी है,

कुन्डी-वुन्डी दइके मोरी खटिया न बिछाय दिहे(य)उ

… … मँय राजा भोली मोरा घर न लुटाय दिहे(य)उ

यहि गाना पै: 

(१) मतलब के तौर पै यहि गाना मा बड़ी आम बाति कही गै है। यक बेही नारि नाहीं चाहति कि वहिकै पति केहू अउर मेहरारू के चक्कर मा फँसैं! यहि खातिर ऊ बारंबार कहति अहै कि ‘हे राजा! हम बहुत भोली अही, इन तमाम दूसरि नखरावालिन के फाँस मा आइ के हमार घर न लुटायउ’!’

(२) लोकभासा केरी कहन सैली कै खासियत हुअत है कि बिना बनाव-बझाव के सीधे-सीधे बाति कही जाति है, ई लोक कै गढ़ै औ रचै कै सहजता आय। हिन्दी साहित्य मा बड़ी कलाकारी के साथ जेहिका मांसल बरबन कहिके पचाय लीन जात है, वही चिजिया क अगर लोक मा सोझै कहि दीन जाय तौ फर्चई-पसंदन (शुद्धातावादीयों) के लिये नाक-भौं सिकोड़ै कै मुद्दा बनि जात है। दरअसल ई दोहरा बिउहार लोकभासान के साथ ढेर कीन जात है। हमरे समाज मा जौन बर्ग सभ्य अउर सालीन हुवै कै ठेका लिहे/दिहे है, ऊ बहुतै पाखन्डी है। यही बर्ग अंगरेजी मा ‘हिप डोन्ट लाई…’ सुनत है, दिनौ-रात अंग्रेजी के सिट-फक से समिस्या नाय महसूस करत, मुला लोक केरी गढ़ै/रचै की सहजता क भदेस/असलील/असालीन जरूर कहत है। केवल हिप्पोक्रेसी! यहिसे कयिउ अच्छे गानन/बानिन के साथे बहुत अन्याय कीन गा है। ‘मँय राजा भोली मोरा घर न लुटाय दिहेउ’ – ई गैनई अपनी सहजता की सुंदरता से मन मोहि लियत है, केहू क भदेस/असलील/असालीन लागै तौ ऊ कुढ़ै की ताईं आजाद अहै 🙂 

(३) अक्सर बात-चीत मा हम सब सारथक सब्दन के साथ निररथक सब्दन कै बिउहार कीन करित है, जैसे – खाना-वाना, चाय-वाय..। जौन भासा अपनी बुनावट मा जटिल हुअत है औ आम जन की बोली-बानी से अलग दूरी रखि के चलत है वहिमा अइसे चलते-फिरते सब्दन कै दरसन कम होये। चूँकि लोकभासै कहन-सैली के सबसे नगीचे रहति हैं, यहिलिये लोकभासन से जुड़ी रचनन मा यहि तरह से सब्दन कै रखरखाव खूब मिले। जइसे यहि गाना मा ‘नखरा-वखरा’ , ‘चुम्मा-वुम्मा’ , ‘जानी-वानी’ , ‘जोबन-वोबन’ , ‘धक्का-वक्का’ , ‘कुन्डी-वुन्डी’ सबदन क्यार जोड़ा रखा गा है।

(४) गानन मा जगहन कै नाव लावै कै ठीक-ठाक रेवाज देखात है। अस करै के मूल मा कहूँ कहूँ वहि जगह की खासियत रखै कै कोसिस रहत है तौ कहूँ कहूँ जगह कै नाव लाइ के गाना से लोगन कै जुड़ै कै आधार बनावा जात है। जैसे लोकगायक बलेसर यादव कै गावा गाना है – नीक लागै टिकुलिया ‘गोरखपुर’ कै..‘देवरिया’ कै मरिचा..गावेला बलेसरा ‘अजमगढ़’ कै! अइसनै कोयल-कंठी सारदा सिन्हा गाये अहैं – ‘पटना’ से बैदा बलाय दा, चोलिया ‘मुल्तान’ के, सेनुरा ‘बंगाल’ के! हिन्दी साहित्य मा तौ अस हम नाहीं पायन मुला हिन्दी सलीमा मा नीक-बेकार लोक से जुड़ै कै कोसिस कीन जात है यहिलिये हुवाँ अस मौजूद है – झुमका गिरा रे ‘बरेली’ के बजार में, मेरा नाम है चमेली चली आई मैं अकेली ‘बीकनेर’ से। यहि हिसाबे यहि गाना मा ‘गोन्डा’ , ‘बस्ती’ , ‘लखनऊ’ , ‘कानपुर’ , ‘झाँसी’ जिलन कै नाम देखा जाय सकत है।

(५) यहि गाना मा हम लिखै के क्रम मा ‘दिहेउ’ लिखे हन, गाना मा सायद ‘दियेउ’ या ‘दियउ’ आवा है। मतलब यक्कै है, बिन्यास यक्कै है, बस लहजा कै भेद है जौन कि अक्सर लोकभासन के इलाकन मा मिलतै है।

अब यहि गाना क आप लोग यहि यू-टुबही प्रस्तुति मा सुना जाय:

~सादर/अमरेन्द्र अवधिया 

Advertisements

अवधी लोकगीत-२ : बाज रही पैजनिया.. (कंठ : डा. मनोज मिश्र)

ई गीत ‘बाज रही पैजनिया..’ होरी गीत हुवै। ई उलारा बोला जात है। यू फाग गीत के अंत मा गावा जाय है। यहि गीत मा नयी नबेली दुलहिनी के आवै के बाद वहिके गहना गढ़ावै के बारे मा घर वाले आपन-आपन जिम्मेदारी कै बाति मधुरता औ खुसी के साथे करत अहैं! इहै मिरदुल भाव गाना केरी मधुर परकिति मा उतरि आवा है। बतकहीं कै ढब औ गाना कै लय-गति यक्कै परकिति मा आय जाँय तौ सोनेम सुहागा होइ जात है। यहि गीत मा भारतीय संजुक्त परिवार कै मिलि बटुर के कौनौ चीज/मुद्दा का संहारै-सुगतियावै कै रेवाज देखा जाय सकत है। ई गीत मनोज जी की पोस्ट ‘फागुन का चरम और चैत का आरंभ’ से यहि साइट पै लावा गा है। गीत कै बोल यहि तरह है:

अवधी गीत : बाज रही पैजनिया..

बाज रही पैजनिया छमाछम बाज रही पैजनिया..

के हो गढ़ावै पाँव पैजनिया, के हो गढ़ावै करधनिया ..?/!

… … छमाछम बाज रही पैजनिया!!

के हो गढ़ावै गले कै हरवा, के हो गढ़ावै झुलनिया ..?/!

… … छमाछम बाज रही पैजनिया!!

ससुर गढ़ावैं पाँव पैजनिया, जेठ गढ़ावैं करधनिया ..!

… … छमाछम बाज रही पैजनिया!!

सैयाँ गढ़ावैं गले कै हरवा, देवरा गढ़ावै झुलनिया ..!

… … छमाछम बाज रही पैजनिया!!

कंठ : यहि गीत का आपन समूह मा मेन आवाज दियत मनोज मिसिर जी लोक-तत्व के संरछन के लिहाज से सराहनीय काम किहिन हैं। मनोज जी कबि सरल जी के गीत ‘मन कै अँधेरिया’ अउर पारंपरिक गीत ‘बालम मोर गदेलवा’ का कंठ दै चुका हैं। अब यहि गीत कै यू-टुबही प्रस्तुति आपके सामने है, आप लोग आनंद उठावैं: 

~सादर/अमरेन्द्र अवधिया 

अवधी लोकगीत-१ : बालम मोर गदेलवा..(कंठ : डा. मनोज मिश्र)

ई अवधी गीत ‘बालम मोर गदेलवा’ वहि नारी कै बाति रखत है जेहिकै बियाह गदेला से होइ गा है, यानी वहिकी उमिर से बहुतै कम, कहौ तौ नान्ह लरिका से होइ गा है। ऊ लरिका सग्यान नाय होइ पावा है, घर दुवार वाले वहिका बेहि के नारी लै आये। अब बालम गदेलवा है तौ नारी का तरसै क परत अहै। अइसनै कुछ बाति यक अउर गीत ‘सैंयाँ मिले लरिकैंयाँ’ मा कही गै है। हम गीत का लिखि दियत अहन हियाँ, यहिसे सब अरथ जाहिर होइ जये फिर आप सुनि के आनंद लीन जाय गीत कै! ( यहि गीत का आप मू्ल रूप मा मनोज जी की पोस्ट ‘बालम मोर गदेलवा’ मा देखि सकत हैं, हमरे यहि पोस्ट कै प्रेरना ह्वईं से है। )

अवधी गीत : बालम मोर गदेलवा..

तरसे जियरा मोर-बालम मोर गदेलवा

कहवाँ बोले कोयलिया हो ,कहवाँ बोले मोर 

कहवाँ बोले पपीहरा ,कहवाँ पिया मोर ,

बालम मोर गदेलवा…..

अमवाँ बोले कोयलिया हो , बनवा बोले मोर ,

नदी किनारे पपीहरा ,सेजिया पिया मोर 

बालम मोर गदेलवा…..

कहवाँ कुआँ खनैबे हो ,केथुआ लागी डोर ,

कैसेक पनिया भरबय,देखबय पिया मोर ,

बालम मोर गदेलवा…..

आँगन कुआँ खनाईब हो रेशम लागी डोर ,

झमक के पनिया भरबय, देखबय पिया मोर ,

बालम मोर गदेलवा….

कंठ : यहि बिलुप्त हुअत गीत का आपन कंठ दैके मनोज मिसिर जी लोक-तत्व के संरछन के लिहाज से सराहनीय काम किहिन हैं। मनोज जी कबि सरल जी के गीत ‘मन कै अँधेरिया’ का आपन कंठ दै चुका हैं। अब यहि गीत कै यू-टुबही प्रस्तुति आपके सामने है, आप लोग आनंद उठावैं:

~सादर/अमरेन्द्र अवधिया