Category Archives: अवधी गद्य

अज्ञेय मिलना चाहते थे, लेकिन जुमई ने उधर रुख नहीं किया!

[हमार पसंदीदा कवि अहीं केशव तिवारी। यह दाईं हम बांदा गा रहेन। हुवां उनसे मुलाकाति भै। वही मुलाकात मा वै आधुनिक अवधी कवि जुमई खां आजाद से अपनी पहिली मुलाकाति कय किस्सा सुनाइन। यादगारी साझा किहिन। हम तब्बै से उनके पीछे लागि गयन कि ई यादगारी लिखि भेजव। आर-टार हुवत रहा, मुला देरय से सही, अब ई सत्य-घटना आपके सामने हाजिर ह्‌वै पावति अहय। हम केसव जी कय बहुत आभारी अहन्‌। : संपादक]
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20842201_1322904504485353_8523803886417688077_n अज्ञेय मिलना चाहते थे, लेकिन जुमई ने उधर रुख नहीं किया!

दिसम्बर के जाड़े के दिन थे, घर गया था। गांव से जिला हेडक्वाटर आना जाना लगा रहता है। बचपन से जुमई खां की कथरी बिल्कुल अपने निपट देहाती जनों से सुनता आ रहा था। आज अचानक गांव के हरकू गडरिया से सुना — कथरी तोहार गुन ऊ जानै जे करै गुजारा कथरी मा। तो फिर तय किया कि आज जुुमई से मिलकर ही लौटूंगा भले बेल्हा में रूकना पडे। खैर मै और मेरा एक रिश्ते का अनुज दोनों निकल पडे।

पहले सुल्तानपुर रोड पर किसी ने बता दिया। वहां झिनका पर लेटे अपने जमाने के नौटंकी के हीरो रामकरन मिले जो दमा के मरीज हो चुके थे। उन्होंने आजाद का पता दिया। हम लैाटे और बिहारगंज से गुबरी गांव के लिये निकल पडे। रास्ते मे पता चला जगेशरगंज स्टेशन के बाहर झगरू की चाय की दुकान पर आजाद का पता चलेगा।

झगरू की दुकान पर पहुंचते ही पता चला कि आजाद आर.पी.से (रायबरेली प्रतापगढ़-संजय पैसेन्जर) से संध्या तक आयेगें, आप चाय पियें, बैठें। हम भी जम गये। झगरू चाय आजाद के नाम लिख लिये और पैसे नही लिये। ये उन्हें आजाद के महमानो के लिये कहा गया था। खैर शाम हुयी और डेली पेसेंन्जर का रेला उतर। उसी मे कमीज पैजामा पहने मझियौले कद का एक व्यक्ति दुकान में घुसा।

झगरू बोले, आजाद ये लेाग चार घंटे से बैठे हैै आपके इंतजार में। वह लपके और गले लग गये। जैसे वर्षो से जान रहे हों। मिलते ही सब अपरिचय छूमंतर हो गया। अब शुरू हुआ बातों का सिलसिला तो एक लडका बोल पडा, आजाद कुछ हुयि जाय। बाबू साहब से तौ तोहार बात चलतइ रही। उन्होंने सहज ही उसकी बात को मान लिया। ये था जन का और उसके कवि का रिश्ता।

जैसे उन्होंने शुरू किया — भरे रे पूंजीपतिया तै रूटिया चोराय चोराय। करीब सौ लोगो का मजमा जुट गया और यातायात बाधित हो गया। धीरे धीरे सब झगरू की दुकान के इर्दगिर्द सिमट आये। ये सम्मान देख मेैं लगभग चकित था और एक दहाडती आवाज गूंज रही थी। अब लोग धीरे धीरे छट चुके थे। शुरू हुआ बातों का सिलसिला।

उसी दौरान बताया कि एक बार काला कांकर के महल में अज्ञेय आये तो धोबियहवा नाच हुआ। पैर मे घुघरू बांधे जब धोबी गाये — बिना काटे भिटवा गडहिया न पटिहैं / अपनी खुसी से धन-धरती न बटिहैं। तुरंत अज्ञेय ने पूछा, यह किसका गीत है? जुमई का लिखा है, यह पता चलते ही स्टेट से एक हरकारा उनका बुलावा लेकर आया। उन दिनों जुमई बहराइच कवि सम्मेलन मे गये थे। लौटे तो पत्र मिला और वाकया पता चला। बोले — “भइया,  ई गीत तौ राजा-महाराजा के खिलाफ अहै। कतउ बुलाइ के गड़ियां न धूप देंय। तव हम न गये।”

जुमई एक समय गरीब-गुरबा की आवाज बन गये थे। उनका किसी गांव ठहर जाना, किसी के दरवाजे खा लेना, एक पूरा का पूरा जनपद उनका घर हो गया था। जुमई खां हम से बोले, तुम्हउ सुनावा। कुछ सुनकर बोले — “बात तो खडी में करत हया पर माटी-पानी सब अपनै अहै।”

keshaw tiwariलेाक के बदलाव के लिये जिस राजनीतिक चेतना की दरकार है, वह अपने जन से द्वन्दात्मक रिश्ता कैसे खोजे, जुमई को यह बात समझ में आ गयी थी। जुमई की कविताई अपने से आगे की कविताई है। भविष्य के लिये एक जमीन तैयार करने का मसला है। जुमई उन कवियों में से थे जो अपनी कविता से अपना जीवन भी चला सकते थे और अपने जन के लिये लड़ भी सकते थे। यही सब उन्हें जुमई बनाता था।

__केशव तिवारी

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पता नहीं कैसे लिखने वाला स्विच फिर से ऑन हो गया : डॉ. प्रदीप शुक्ल

ई पोस्ट हम यहि मकसद से रखित अहन कि ई पता चलय कि यक रचैया कैसे अपनी मातरी भासा से आपन रचनात्मक रिस्ता बनावत हय। केतना उतार-चढ़ाव आवत हय। दुसरी आपाधापी मा ऊ भाखा-माहौल बिसरि जात हय। फिर जब कौनौ गुंजाइस बनत हय तौ फिर रचनात्मक हरेरी आइ जात हय। दुसरी बात कि ई सनद हमयँ यक दस्तावेजी रूप मा देखाइ परी। डाकटर साहब यहिका हियाँ राखय कय इजाजत दिहिन, यहिते आभार! : संपादक
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अवधी हमारि – अवधी हमारि
हमका सबते जादा पियारि
लारिकईयाँ मा वह दुलराइसि
अब कईसे देई हम बिसारि

अवधी मेरी मातृभाषा है पर अवधी को अभी भाषा का दर्जा नहीं मिल सका है. अब अगर अवधी को हिंदी की बोली कहें तो हिंदी मेरी मातृभाषा हुई. भाषा – बोली के झंझट में न पड़ते हुए मैं ईमानदारी से यह कह सकता हूँ कि खड़ी बोली हिंदी में लिखने के लिए मुझे अक्सर अपनी अवधी की पुरानी गठरी खोल कर शब्दों के भावार्थ तलाशने पड़ते हैं.

मेरे जीवन में अवधी साहित्य या यों कहें कि साहित्य की शुरुआत अम्मा, बुआ की गौनई के बाद तुलसी बाबा की रामचरित मानस से ही हुई होगी, ऐसा मेरा अनुमान है. मैं जब 8 बरस का था और तीसरी क्लास में पढता था, मुझे पूरा सुन्दर काण्ड कंठस्थ था. कुछ सालों तक यह उपलब्धि मेरे परिचय का हिस्सा भी रही. बाद के वर्षों में काफी समय तक अपने गांव में ही नहीं अपितु आस पास के गांवों में भी अखंड रामायण ( रामचरित मानस ) के पाठ करने वाली टीम का मैं एक अभिन्न सदस्य हुआ करता था.

हालाँकि मैं 16 बरस की उम्र में गांव से लखनऊ आ गया था पढने के लिए पर यहाँ भी अवधी मेरी सामान्य बोल चाल की भाषा कई बरसों तक बनी रही. कारण था मेरे गांव का शहर के बहुत पास होना. हर शनिवार की शाम साईकिल से गांव आ जाते और सोमवार की सुबह फ़िर लखनऊ. पर धीरे धीरे अवधी बोलचाल की भाषा के रूप में साथ न दे सकी. शहर में अवधी गंवारों की भाषा समझी जाती है. इस पर एक किस्सा याद आता है.

मैं उन दिनों बी एस सी कर रहा था कान्यकुब्ज कॉलेज से. हमारी मित्र मंडली में एक दीक्षित नाम का लड़का हुआ करता था, उसका मूल नाम भूल रहा हूँ. केमिस्ट्री की लैब में कोई सल्यूशन दीक्षित से कॉपी पर गिर गया था. तभी वहाँ विभागाध्यक्ष प्रकट हो गए. देखते ही दीक्षित के मुँह से निकला, ” सर, ढरक गवा रहै ” फिर तो सर ने जो उसकी क्लास लगाईं कि वह आँसुओं से रो दिया. जाहिल, गंवार, बेवकूफ आदि अनेकानेक उपाधियों से नवाजा गया उसे. अब पूरा क्लास दीक्षित को ‘ ढरक गवा ‘ के नाम से बुलाने लग गया. कुछ दिनों बाद उसने कॉलेज आना ही बंद कर दिया.

गीत मुझे बचपन से ही आकर्षित करते रहे हैं. अपनी कक्षा में पाठ्यपुस्तक से कविता याद कर सबसे पहले सुनाने वाला विद्यार्थी निर्विवाद रूप से मैं ही होता था. इसका श्रेय जाता है मेरे नाना जी को. मेरे नाना जी पं सीताराम त्रिपाठी संस्कृत के विद्वान्, श्रीमद् भागवद्गीता के मर्मग्य और अवधी के कवि थे. मेरे जन्म लेने से पहले ही वह इस संसार से चले गए. मैं अपने भाईयों बहनों में अपने आपको सबसे भाग्यशाली मानता हूँ कि उनके डीएनए में लिखी हुई कविता मेरे हिस्से आई.

पं सीताराम त्रिपाठी ने ‘ महाभारत ‘ को अवधी छंदों में लिखा था. उनके दो या तीन खंड ही प्रकाशित हो पाए थे. उसी दौरान उनके बड़े बेटे का देहांत हो जाने के कारण मेरी नानी ने आगे का प्रकाशन रुकवा दिया था. उस हादसे के बाद इस महाकाव्य की चर्चा पर ही प्रतिबन्ध हो गया था मेरे ननिहाल में. बहुत बाद में गठरी में बंधी हुई पांडुलिपियाँ मैंने भी देखीं थीं. अब मेरे पास उनकी कोई भी किताब या पांडुलिपि नहीं है. मैंने बचपन में पिता जी से उनके अनेकों छंद सुने हैं. पिताजी जब भी कभी खाली होते और मौज में होते तो नाना जी के, और बहुत सारे कवियों के छंदों का सस्वर पाठ करते. रामचरित मानस के तो वह विशेषग्य ही हैं. आज भी मानस प्रवचन उनकी दिनचर्या का हिस्सा है.

जीवन में पहली बार की तुकबंदी मुझे अभी भी याद हैं. याद इसलिए है कि फिर अगले तीस – पैंतीस सालों तक और कुछ लिखा ही नहीं. मैं उस समय कक्षा 7 का विद्यार्थी था. बंथरा में मेरे स्कूल से लगा हुआ एक मात्र इंटर कॉलेज ( लाला राम स्वरुप शिक्षा संस्थान इंटर कॉलेज, बंथरा, लखनऊ ) हुआ करता था. हम लोग उसे लाला वाला स्कूल कहते थे. पढ़ाई न होने के लिए कुख्यात इस कॉलेज में एक नए प्रिंसिपल का आगमन हुआ था उन दिनों. पंक्तियाँ देखें –

“लाला स्कूल तो बना है अब धरमसाला
लरिका तौ घुमतै पर मास्टरौ कुर्सी फारति हैं
पान के बीड़ा धरे मुँह मा चबाय रहे
अउरु बईठ होटल मा चाय उड़ावति हैं
आवा है अब यहु नवा नवा प्रिंसपलु
जहिके मारे उई अब बईठे नहीं पावति हैं
खुद तो न पढ़ि पावैं अँगरेजी क्यार पेपरु
जानै अब लरिकन का उई का पढ़ावति हैं.”

ये पंक्तियाँ मैंने 13 वर्ष की उम्र में लिखीं थीं फिर लिखने वाला स्विच ऑफ हो गया. अगले कई दशकों तक लिखने का ख्याल ही दिमाग में नहीं आया. हाँ कविता पढने और सुनने का मौक़ा कभी नहीं छोड़ता था. पिताजी की किताबों में एक मात्र कविता की पुस्तक जो मुझे याद है, रमई काका की ‘ बौछार ‘ थी. उसकी बहुत सारी कवितायेँ मुझे याद थीं और गाहे बगाहे उन्हें सुना कर वाह वाही लूटता था. अभी इधर 2013 के आखिरी महीनों में पता नहीं कैसे लिखने वाला स्विच फिर से ऑन हो गया है और फिर से तुकबंदियों का सिलसिला शुरू हो गया.
__डॉ. प्रदीप शुक्ल 

सम्पर्क:
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औपनिवेसिक सत्ता सभ्यता कय भ्रमजाल अउर लोकगीत : बजरंग बिहारी ‘बजरू’

ई आलेख  आकार मा भले थोर लागय मुला निगाह मा बहुत फैलाव औ गहरायी लिहे अहय। कयिउ बाति अस हयँ जौन चेतना का कुरेदयँ। औपनिवेसिक सत्ता के दौरान जौन भरम-जाल रचा गा ऊ गजब रहा। यहिमा सोझैसोझ जे फँसा ते फँसबै भा और जे बिरोध कय जिम्मा उठाये रहा उहौ, आनी-आनी मेर से, फँसि गा। यहि भरमजाल के चलते लोकगीतन (लोकभासन) के साथ जौन असावधानी औ जादती भै, वहिका जहिरावत ई आलेख पढ़य जाय कय माँग करत हय। : संपादक
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औपनिवेसिक सत्ता सभ्यता कय भ्रमजाल अउर लोकगीत : बजरंग बिहारी ‘बजरू’   

तब बच्चा रहेन| प्राइमरी इस्कूल कय बिद्यार्थी| यक बियाहेम गयन रहा| अपनेन गाँव मा| पंडित जी मंत्र पढ़िन| दुलहा से कुछ करय का कहिन| फिर रोकि दिहिन| हमरे बगल मा यक बुजुर्ग बैठा रहे| वय कहिन की अबहीं मेहररुअन कय मंगलगीत सुरू नाहीं भवा| जब तक ऊ न पूर होये पंडितजी आगे ना बढ़ि पैहैं| तब तौ यहि बातिक मर्म समझि नाहीं पायेन| बादि मा धीरे-धीरे अर्थ खुला की समाज जतना महत्त्व (बेद)मंत्र का देत है वतना महत्त्व लोकगीतौ का मिलत है|
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परम्परा से लोकगीत का मौखिक साहित्य या वाचिक साहित्य के अंतर्गत रखा जात है| मानव जाति कय सबसे पुरानि अभिव्यक्ति गीतन मा भई होये| बिद्वानन कय कहब है की लोकगीत औ’ लोककथा सभ्यता के आदिकाल से रची जाति हैं| रचना कय ई दूनौ रूप अलग-अलग औ’ यक-दुसरे मा घुलिमिलि कय बनत हैं| लोकगीत कय यहै परिभाषा है की वहका लोक रचत है| मतलब की वहकै रचनाकार अग्यात रहत है| जैसय कौनौ गीत कय रचनाकार कय नाम पता चलि जात है ऊ लोकगीत के दायरा से बाहर होय जात है| कबीर कय निरगुन लोक मा खूब गावा जात है मगर वहका लोकगीत नाहीं कहा जात है| यहै हालि तमाम भक्त कबियन के गीत, कबिता कय बाटै| भजन लिखै वाले, बिरहा रचै औ गावै वाले लोककवि कहा जात हैं लेकिन उनकै रचना लोकगीत नाहीं कही जाति है| लोकगीत कय असली ठेकाना ताम्रपत्र, भित्तिपत्र, पोथी ना होय| ऊ तौ लोक के कंठे बिराजत है| अपने सुभाव से लोकगीत करिया अच्छर मा ढलै से बचा चाहत है| वहका आजादी चाही| ऊ ‘प्रामाणिकता’ के फेर मा नाहीं पड़त| जब छापाखाना आवा तब्बौ ओपहर ध्यान नाहीं गवा| वहका लिखित रूप बहुत बादि मा दीन जाय लाग| वहकै इतिहास लिखित साहित्य के इतिहास से बहुत पुरान बाटै जद्यपि इतिहास कय चिंता लिखित साहित्य का जादा रहति आई है| लोकगीत केर जड़ समय के अनंत बिस्तार मा फैली बाटै यहीलिए ऊ आपन प्राचीनता साबित करय खातिर परेसान नाहीं होत| लिखित साहित्य तौ मुट्ठी भर लोगन के बीच मा पढ़ा-समझा जात है मगर मौखिक कय पसारा सबके बीच मा रहत आवा है| आधुनिक काल मा जब साक्षरता कय प्रसार भवा तब लिखित साहित्य कय दायरा बढ़ा| ओहके पहिले जनता कय भावधन यही मौखिक साहित्य या लोकगीतन मा यकट्ठा होत औ बहत रहा| पूरे समाज कय सांस्कृतिक जीवन यही जलधार से सींचा जात रहा|

लगभग दुय सौ बरस देस फिरंगी गुलामी मा रहा| यहि दौरान वह पर ‘सभ्यता’ कय अतना दबाव पड़ा की ऊ नकलची लोगन से भरत गा| अपने धरती से, भासा से, भेस से, कथा औ गीत से दूरी बढ़त गय| यक उधार लीन्ह बनावटी जिंदगी हावी होत गय| हिंदी वर्द्धिनी सभा मा भाषण देत भारतेन्दु बाबू याद देवायिन की अंगरेज तौ यहर कय गीत बटोरे जात हैं लेकिन देसबासिन का कौनौ परवाह नाहीं है| फिरंगी हमरे लोकचित्त का परखे लेत हैं औ हम उनके सेक्सपियर या मिल्टन का पढ़िकै गदगद बाटेन| वहि देस कय अनपढ़ किसान, मजूर और घरैतिन का सोचत हैं, उनकय जीवन मूल्य कौने गीतन मा कौने तरह से जाहिर होत है यकरे प्रति हम यकदम उदासीन हन| वय अंगरेज हमरे लोकजीवन मा पैठ बनाय लेहें मगर हम उनके लोकजीवन के सम्बंध मा कुछू ना जानि पाइब-

आल्हा  बिरहहु  को  भयो  अंगरेजी  अनुवाद|
यह लखि लाज ना आवई तुमहिं न होत बिखाद||

भारतेन्दु बाबू ई बाति 1877 मा कहिन रहा| आजव ई वतनय सही लागत अहै| भारतेन्दु के करीब पचास साल बाद रामनरेश त्रिपाठी अवधी लोकगीतन कय संग्रह सुरू किहिन| अपने ग्रामगीत कय भूमिका मा वय हैरानी जताइन की हम लोगन का अपने धरती से अतनी दूर के खींच लयिगा! नई पढ़ाई हासिल कैकै जवन पीढ़ी सामने आवति है ऊ अपने घर-परिवार से, गाँव-जेंवारि से कतना अजनबी होय जाति है| जतनय ऊंच डिग्री वतनय जादा दूरी| रामनरेशजी नई सिच्छा ब्यवस्था कय पैरोकार रहे| खड़ी बोली हिंदी कय कट्टर समर्थक| वय सवाल तौ नीक उठायिन मगर वहकै जबाब तक नाहीं पहुँचे| औपनिवेसिक सत्ता सभ्यता कय जौन भ्र‘मजाल रचिस रहा वहके चक्कर मा ऊ पूरा जुग थोर-बहुत फंसा रहा| यक बिचित्र संजोग के तहत आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी वाली ‘सरस्वती’ पत्रिका खड़ी बोली के पच्छ मा आन्दोलन चलाइस| यहसे तौ कौनौ दिक्कत नाहीं रही मगर ई आन्दोलन अवधी, ब्रजभाषा के खिलाफ खड़ा होइगा! ई प्रचार कीन गा की यहि भासा के ब्यवहार से ‘राष्ट्र’ कय उन्नति ना होय पाये| यहव कहा गा की देहाती भासा मा नवा बिचार नाहीं कहा जाय सकत है| सभ्यता कय मानक बनाय दीन गय खड़ी बोली औ हिंदी कय दूसर बोली हीनतासूचक मानी जाय लागि| 1900 से लैकै 1940 तक जवन जहर बोवा गा वहकय फसल अब लहलहाति बाटै| मैथिली अलग भै, राजस्थानी आपन झंडा उठायिस| अब भोजपुरी अलग होति है| काल्हि का हिंदी कय बाकी हिस्सेदार सामने अइहैं| आगमजानी कबि तुलसीदास ‘मानस’ मा चेताइन रहा-

स्याम सुरभि पय बिसद अति, गुनद करहिं सब पान|
गिरा ग्राम्य सियराम जस, गावहिं सुनहिं सुजान||

बर्णबोध औ भासाबोध दूनौ पूर्वग्रहग्रस्त हैं| यहि दोहम तुलसी पूछत हैं की का करिया गाय कय दूध गोरहरि गाय के दूध से कमतर होत है? अक्सर अस मानि लीन जात है| जबकि असलियत ई है कि करिया गाय के दूधे मा जादा गुण होत है| ऐसे भासा कय मसला है| चहै गाँव कय बोली होय या संस्कृत, वहि भासा मा का कहा गा है, यहसे बाति कय महत्त्व तय होये| कथ्य निर्धारक होत है, भासा नाहीं| महत्त्व रंग से या वर्ण से तय न करौ, पहिले वहकय गुण देखौ| समझदार कय यहै पहचान है| सयान लोग संस्कृत मा रचित रामायण से अवधी मा लिखित रामचरितमानस से भासा के आधार पर छोट-बड़ा ना मनिहैं| वय गुण के कारण दूनौ कय सम्मान करिहैं|

अंगरेजन के सासनकाल मा जवन मानसिकता बनी ऊ अब तक कायम है| लोकगीतन का आजौ स्कूली पाठ्यक्रम मा कौनौ जगह नाहीं मिली है| पहली से लैकै बारहवीं तक बिद्यार्थी कौनौ दर्जा मा अपने इलाका के लोकगीत कय दरसन नाहीं कय सकत हैं| हिंदी मा एम.ए. करय वालन का लोकगीत नाहीं पढ़ावा जात है| हाँ, केऊ-केऊ हिम्मत कय-कय लोकगीत का रिसर्च खातिर चुनत है| यहसे कौनौ खास फरक नाहीं पड़ै वाला है|

जनजीवन बहुत तेजी से बदलत है| लोकगीतन के संग्रह कय तरफ विसेस ध्यान दियब जरूरी है| पूरी सावधानी से उनकय दस्तावेजीकरण होय| जिंदगी तौ अपने गति से चले लेकिन परम्परा से जौन धरोहर हमका मिली है वहका संजोय लेब आवस्यक लागत है| यहि बीच लोकगीतन कय स्वरूप बदला है, उनकय भासा बदली है| वहका बारीकी से समझैक चाही| जागरूक लोग ध्यान देंय, लोक मा काम करय वाली संस्था ध्यान देंय औ सबसे जादा सरकार कय यह पर ध्यान जाय| तब्बै कुछ बाति बनि पाये| सोसल मीडिया अब गाँव-गाँव मा फैलि गय है| यहका रोकब संभव नाहीं है| हाँ, यह स्थिति कय लाभ उठावा जाय सकत है| लोकगीतन कय छेत्रीय बिबिधता का समझय मा नई मीडिया से सहायता लीन्ह जाय सकत है|

अवधी लोकगीतन कय बिसयबस्तु लगभग वहै है जौन हिंदी छेत्र के दोसर जनभासा मा मिलत है| अलगाव दुइ मामला मा देखाय पड़े| पहिल भिन्नता अवधी लोकजीवन मा राम कय मौजूदगी के कारण है औ दोसर वहके मिली-जुली संस्कृति के कारण| मध्यकाल मा मुस्लिम जनता हिंदी प्रदेस के हर भासा-बोली मा रही मगर यहि जमीन से निकले सूफी कबि अवधी का अपने कबिता के लिये चुनिन| 1350 से लैकै 1900 तक लगातार सूफी प्रेम कबिता अवधी मा लिखी गय| यहिकै ई असर पड़ा की अवधी मा मुस्तर्का तहजीब मजबूत होत गय| संत लोग यहि धारा मा खूब जोगदान किहिन| आजादी के आन्दोलन मा अवधीभासी जनता बढ़ि-चढ़ि कय हिस्सा लिहिस| यहि दौरान अवधी मा स्वतंत्रता का लैकै खूब जज्बाती गीत लिखा गा| यहि संग्राम मा अगुआई करै वाले नवा नायक उभरे| लोकगीतन मा वय पूज्य नायक बनावा गे| आजादी मिलय के बाद अवधी लोकगीत मा फिर थोरै तब्दीली आई| अब जनता कय सुख-दुःख का केन्द्रीयता मिलय लागि| धर्मभावना थोरै पीछे पड़ी| सिच्छा औ राजनीति मा लोकगीतन कय रूचि बढ़ै लागि|

सम्पर्क: 
फ्लैट नं.- 204, दूसरी मंजिल, 
मकान नं. T-134/1,
गाँव- बेगमपुर,
डाकखाना- मालवीय नगर,
नई दिल्ली-110 017
फोन- 09868 261895

अवधी गद्य में अनंत शक्ति है : त्रिलोचन

बरवै छंद मा ‘अमोला’ लिखय वाले अवधी अउ हिन्दी कय तरक्कीपसंद कवि तिरलोचन से अवधी कथाकार भारतेन्दु मिसिर बतकही किसे रहे सन्‌ १९९१ मा, जवन १९९९ मा रास्ट्रीय सहारा अखबार के लखनऊ संस्करन मा छपी रही। बाद मा यहय बतकही तिरलोचन केरी ‘मेरे साक्षात्कार’ किताब मा छापी गय। मजेदार लाग कि यहि बतकही कय आधा हिस्सा अवध अउ अवधी से ताल्लुक राखत हय। ई हिस्सा काहे न यहि बेबसाइट पय आवय; इहय सोचिके यहिका हियाँ हाजिर कीन जात अहय। छापय कय अनुमति मिसिर जी दिहिन, यहिते आभारी हन्‌। : संपादक
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वर्तमान हिन्दी कविता पर महानगरीय बोध या कोरी आंचलिकता का प्रभाव है परन्तु आपकी कविताएं अवधी चरित्र से अधिक जुड़ी है इसका मूल कारण क्या है ?
  
नगर में रहने वालों का व्यावहारिकimg_20161111_174813 ज्ञान का स्तर कम होता है क्योंकि गांव वालों का व्यावहारिक प्रत्यक्षीकरण करने का उन्हें सुयोग ही नहीं मिलता। मिलना-जुलना भी बहुत कम होता है। महानगरीय जीवन में फूल-पौधे वन आदि दुर्लभ होते हैं। ये सब गांवों में सुलभ हैं। गांव का बालक किताब पढ़ने में भले ही कमजोर हो वनस्पति ज्ञान में नगर के बालक से आज भी असाधारण है। वह वनस्पति, पशु और मनुष्य के नाना रूपो में चेतना के विकास के साथ-साथ जिसकी चेतना का विकास होता है। रचनाकार होने पर वह जीवों के पारस्परिक सम्बन्धों को भी अच्छी तरह रख सकता हैं। हमारे प्राचीनतम महाकवि न नगर निंदक थे न ग्राम निंदक और न अरण्य जीवन के; इसी कारण वे पूर्ण कवि थे। जीव और जीवन के निकट होने पर ही कोई कवि हो सकता है। मेरी चेतना का विकास या निर्माण अवध के परिवेश में हुआ, यदि अवध को मेरा पाठक मेरी रचना से पहचानता है तो मेरा रचना कार्य सफल ही कहा जाना चाहिए।

भौजी’, ‘उस जनपत का कवि हूं, झापस, नगई महरा तथा चैती मेंकातिकपयान जैसी कविताएं आपकी मौलिकता को रेखांकित करती हैं, आपको इन चरित्रों ने किस प्रकार प्रभावित किया?

मेरी रचनाओं में जो व्यक्ति आए हैं वे इसी भूतल पर मुझे मिले, उनमें से आज कुछ हैं कुछ नहीं हैं। लोग चाहें तो कह सकते हैं कि मेरी अनुभूतियां अवध को नहीं लांघ पातीं लेकिन मैं भारत में जहां कहीं गया हूँ वहां के भाव भी वहां के जीवन के साथ ही मेरी कविताओं में आए हैं। मेरे यहां अवध के शब्द मिलते हैं लेकिन अन्य राज्यों के अनिवार्य शब्दों का आभाव नहीं है। मैं आज भी गांव की नीची जाति के लोगों के साथ बैठकर बात करता हूं। अवध के गांवों को तो मैं विश्वविद्यालय मानता हूं। ‘नगई महरा’ से बहुत कुछ मैंनें सीखा, वह कहार था- गांजा पीता था पर उसे बहुत से कवियों के कवित्त याद थे। सांईदाता सम्प्रदाय तथा बानादास की कविताएं भी उससे सुनी थीं। उसी के कहने से मैं सांईदाता सम्प्रदाय को जान पाया। नगई उस सम्प्रदाय से भी जुड़ा था। उस पर अभी एक खण्ड और है जो लिखना है। अवध में गांव के निरक्षर में भी सैंकड़ों पढ़े-लिखों से अधिक मानवता है। गांवों में शत्रुता या मित्रता का निर्वाह है, यहां ऊपर की मंजिल वाले नीचे की मंजिल वालों को नहीं जानते।

बंसीधर शुक्ल, गुरुभक्त सिंह मृगेश पढ़ीस, रमई काका, चतुर्भुज शर्मा, विश्वनाथ पाठक, दिवाकर आदि के बाद अवधी लेखक में किस प्रकार के परिवर्तन की आवश्यकता है ?

अवधी में पढ़ीस, रमई काका, बंशीधर शुक्ल, चतुर्भुज, विश्वनाथ पाठक आदि उस कोटि के आदरणीय कवि हैं जैसे छायावाद के हैं। निराला ने प्रभावती उपन्यास में तीन पद अवधी में लिखे हैं, एक भोजपुरी पद भी सांध्य काकली में लिखा है। मानसिकता का अंतर मिलता है। गांव में पुस्तकालय हो तो गांव साक्षर हो। मानसिकता, शिक्षा व उनके व्यवहार आदि में विकास हो। मैं समझता हूं कि चेतना के कुछ ऋण होतें हैं उन्हें उतारना चाहिए। मैंने अपने गांव के केवटों को अवधी कविताएं सुनाई, उन कविताओं को सुनकर एक संतवृत्ति के बूढ़े केवट ने कहा ‘यह सब तो क्षणिक हैं।’ दूसरी बार वहां के चरित्रों को लिखा तो उसने पसंद किया। जिसे आज लिखा जा रहा है उसे समझने वाले लोग भी होने चाहिए। गांवों में सदाचार को प्रतिष्ठित करने का काम अवधी से किया जा सकता है। यदि रीतिकालीन कविता पर भक्तों व संतों की कविता का प्रभाव न जमा रहा होता तो गांवों में अशालीनता बढ़ गयी होती अत: सदाचार की प्रतिष्ठा संत कवियों ने ही की। अवधी में इस प्रकार का कार्य अभी भी किया जा सकता है।

अवधी की बोलियों में एकरूपता कैसे बनाई जा सकती है, आपकी दृष्टि में बिरवा की क्या भूमिका हो सकती है?

मेरा कहना है कि जो जिस अंचल का है उसी रूप में उसका लेखन हो। यदि मैं सीखकर लिखूं तो सीतापुर की बोली में भी लिखूंगा पर जो वहां का निवासी कवि है वह अधिक श्रेष्ठ लिखेगा, अत: मेरी दृष्टि में इन्हें एकरूपता देने की अवश्यक्ता नहीं है। वंशीधर जी ने  अवधी में गद्य लिखा है वह मिले तोउसे ‘बिरवा’ में प्रकाशित करना चाहिए। भाषा सपाट नहीं होती रचनाकार की दृष्टि सपाट होती है। अत: कहीं की बोली को स्टैण्डर्ड मानने के बाद वहां की संस्कृति भी सटैण्डर्ड हो जाएगी। इसलिए किसी भी क्षेत्र को स्टैण्डर्ड मत बनाइए। संक्रमण क्षेत्रों की भाषा को भी मानिए। उसका मानवीकरण (Highly Local) हो। तब कोष बने। अवधी के गद्य  में अनन्त शक्ति है, वह शक्ति हिन्दी खड़ी बोली में भी नहीं है। उसमें विभक्तियां हैं। ‘बिरवा’ यदि मानक कोष का स्वरूप तय करना चाहे तो उसके लिए मैं टीम को प्रशिक्षण दे सकता हूं। 

यादगारी: ‘पहिलका डर’_राघव देवेश

जेठ-असाढ़ कय महीना, गरमी पुराजोर रही। दुपहरिया कय खाना लावय क भुलाय गा रहेन। पेट कोर्रा गिनत रहा। गरमसत एतना रहा कि पूछव न, लसलसी गरमी दिमाग झंड किहे रही। उमसत खूब रहा, बादर घेरे रहा, लागय कि बरसे जरूर। खाना नाहीं खाये रहेन यही के मारा छठयें घंटा मा चहरदेवारी फांदि के इसकूल से चंपत होइ लिहेन। घरे आयेन, अम्मा मिलतय पूछिन –- ‘का रे, इसकूल से काहे एतनी जल्दी भागि आयव?’ हम कहेन –- ‘मास्टर नाहीं आवा रहे, काव करतेन, सोचेन कि घरे चलिके गाय-गोरू कय चारावारा निपटाय ली। अम्मा कहिन –- ‘ठीक बाय लेकिन पहिले खाना खाय लियव अउर बोरिया बिछाइके घर कय काम पूर कै लियव। हँ..अउर खेलय तौ जायव न, नाहिँत काटिके पिठासा धइ दियब।’

कुछ देर बाद पिता जी बजारी से भुट्टा लइ के आये। गुड़िया बहिनी भूजब सुरू किहिन अव सबही मिलि के चबायन। सँझलउख हुअत रहा, बदरियान मौसम मा मुरैलौ बोलत रहे। गौधिरिया देखि के गुड़िया बहिनी लालटेन कय सीसा साफ करब सुरू किहिन। माटिक तेल भरे के बादि मा लालटेन बारि के डुढ़ुई पै धरिन, तीन दाँय संझा-माई क ध्यायिन। दुइ घरी भय नाहीं कि टुपुर-टुपुर बुंदियाय लाग। पता लाग कि लालटेन के किनारे दुइ चार पाँखी लहरियाय लागीँ। यनहीं के लभक्के मा यह दुइ बिहतुइयौ पहुँचि गयीं। नल के चौकी पै पानी छहराय के ह्वईं लालटेन धय दीन गय। ताकि पँखियै वही वारी पानी मा मरयँ-खपयँ। यनहीं के डर से खाई-पिया जल्दी होइ गय। मुल पानी बुँदियाइ के रहिगा। लाइट तनिका भै लुप्प असे भय कि मुन्ना के खेते कय टरांसफारम धाँय से उड़ि गा। लियव भईया, अब तौ बिजलियौ न आये। खाई-पिया होइगय तब सबही आपन-आपन कथरी-गुदरी लइके पक्का(छत) पै पहुँचि गा। पानी बुँदियाय के कारन पक्का ठंढान रहा, नाहीं वइसे तौ जेठ-असाढ़ कय घाम सहिके गरम तावा अस जरा करत हय। सबही पहुँड़ब सुरू किहिस। कुछ देर तौ हम धुरुब तारा औ सप्तरिसी हेरत-हेरत बितायन। यही के बिच्चे कब औंघाय गयन, पतै न लागि।

अबहीं सोये आधव घंटा न भा रहा कि सुकुल के पुरवा की वारी से धाँय-धाँय कय अवाज सुनाय परय लागि। हम अहदंक के मारा उठि-बैठि परेन। माई हमार हाँथ पकरि लिहिन। काहे से कि हम नींद मा कौने वारी ढर्रियाय जाई, पता नाहीं। केहू कहय कि हथगोला दगा तौ केहू कहय कि गोली चली। यक दुसरे के वारी से खेखारा-खेखारी हुवय लाग। अलगू, मास्टर अव सुकुल –- यै सबही सोचतय रहे कि चलि के तनी आरव लीन जाय। सबही आपन लाठी-डंडा सहेजत रहे कि अतनेन मा पुरुब टोला मा हलचल मची कि चड्ढा-बनियाइन गिरोह वाले लाव-लसकर के साथे निकरि परा अहयँ; यही वारि आवत जनाय परत अहयँ। सभय चौकन्ना होइगा अव अपने-अपने छते पै हाथे मा अद्धा लइके खड़ा होइगा। वहि सइती चोरी-चकारी कय अतना अहदंक रहा कि मनई अपनी हिफाजत के ताईं अपने छते के कोने पै रोड़ा-अद्धा कुरियाये रहत रहा। ताकी कौनौ समय जरूरति परय तौ इस्तेमाल कीन जाय। अस जनान कि चड्ढा-बनियाइन गिरोह वाले दुसरी वारी मुँड़ियाय गये। तब तनिका सबके जिउ मा जिउ आवा।

लगभग आधा घंटा के बाद फिन नरक मचा। हलचल भै कि मुँहनोचवै उतरत अहयँ। हउँफा उड़ा रहा कि यहिसाइत मुँहनोचवा अउर मुँड़कटवा उधिरान बाटे जौन कि टीबी के अंटीना से सिगनल लइके अकास से उतरत थीं; यनके खउफ से आरी-पौस्त कय मनई आपन अंटीना परमानेंटली उतारि के धै दिहे रहा…मुँहनोचवा कय बाति सुनतै हमार माई कहिन अंटिनवा तौ दिनै मा उतारि दीन गा रहा, तौ कयिसे!/? तब तक अलगू चिल्लाने कि सुकुल भैया कय लरिकवा आपन लगाय लिहे रहा महाभारत देखै के ताईं। गोहराई-गोहरावा भय। वै सरऊ जल्दी से आपन नट-बुल्ट ढील करिन। तौ सबकै जिउ थोरक्‌ ठन्टुट भा। अतनेन मा मोखड़ी वाली बगिया मा कुछ टारच लपलपाय लागीं। केहू कहिस कि मनई आम बीनत होये, तब तक सुगदेव चिल्लाय परे –- ई तौ सारै चोर बत्ती लिहे बाटे। ई बत्ती गाँव मा केहू के लगे थोरय अहय! यह दाईं फिर सबकै धुकधुकी बढ़ी। हमार तौ भूसी खसक गय रही। जिउ यक सौ पचास के उपरै धुकधुकात रहा। अब मन कहय कि अलगू औ सुगदेव जइसे मनइन का केहू चुप कराय दियै। पर करय के? गाँव भय जब जागि गा तब मनई, केहू लाठी केहू डंडा अऊर गाँव मा दुन जने के लगे बंदूक रही, वहू लाइसेंसी, वहिका लइके तनी आरव लियै बहिरियाने। आगे बंदूक वाले, पाछे डंडा-गोजी वाले। करत-करावत चारि बजिगा। डर के मारे नींद उड़नछू होइगै। घर कय मनई कामकाज मा बाझि गये। हम पाँच बजे भिनसारे डेरात-डेरात सोइ गयेन।

deveshदुसरे दिन दस बजे आँखि मुलमुलावत उठेन। उठेन तौ देखेन सबही बड़ा अफसोसात रहा। भगतिन बैठी रहीं; उनका बस इहै कहत सुनेन कि ‘बेचारे बड़ा नीक मनई रहे, अपना मरे मुला घरे वालेन का बचाय लिहिन।’ सोवय के पहिले अलगू दिमाग खराब किहे रहे अऊर अब भगतिनौ खराब खबर सुनाइन। हम उठतय अपनी बहिनी से पूछेन, तब पता लाग कि सुकुल के पुरवा मा जौन पुजारी कै बाप रहे वै राति मा चोरन का गाँव मा हलत देखि लिहे रहे अउर देखतै गोहरावय लागे –- ‘का हो! के हुवौ! कहाँ जात बाटेव!’ पता नहीं कयिसे वै ताड़ लिहे रहे कि वै सब चड्ढ़ा-बनियाइन गिरोह वाले रहे। औ ठाँवैं जोर-जोर से चिल्लाय लागे कि सबही जागि जाव हो, यह देखौ सारय… …। तब तक वहिमा से यक मिला उनपै हथगोला मारि दिहिस अउर चट्टय उनकय आँती-पोती बहिरियाय गय। खैर… अब काव कीनय जाय सकत हय! मजमा देखिके अलगुवौ मुँहे मा दतुइन कूँचत पहुँचि गये अउर यक नयी खबर सुनाइन कि काल्हि तौ भईया गजब होइगा रहा। पिता जी पूछिन –- काव हो? अलगू कहिन –- अरे भईया कुमारे ताले पै मछरी कय निगरानी करय आवा रहे। सुकुल भईया चोर समझि के बंदूक से निसाना साधि लिहे रहे लेकिन हियात रही कुमारे कय कि सुकुल भईया का सुबहा लागि गय कि कहूँ तलवा पै कुमरवा न हुवै! काहे से कि ऊ रोज तीन से चारि के बीच मा मछरी क दाना डारय आवत हय। हाँ भईया, तौ कुमारे मरत-मरत बचे।

सबका पुजारी के बाप कय बड़ा अफसोस रहा। बाता-कहानी के बाद सबही अपने थाने-पवाने होइ लिहिस। ई हमार पहिलका डर रहा जेहमन हनुमान चालिसव पढ़े से काम न चला। हम भूते क सम्हारि लिहेन पर मुँहनोचवा से हमार जान हलक मा अटकि गय। दुइ दिन तौ बरबस रारि ठानि लिहेन औ इसकूल न गयेन।

राघव देवेश अवधी कय युवा कवि-लेखक हुवयँ। पढ़ाई; जल्दियै ग्रेजुएसन पूर भवा, एम्मे कy तैयारी मा अहयँ। इनसे आप  9910618062 पै संपर्क कय सकत हयँ।