Category Archives: अवधी कविता

पाहीमाफी [१७] : तिरिया-गाथा (३)

आशाराम जागरथ रचित ग्रामगाथा ‘पाहीमाफी’ के  “पहिला भाग”,  दुसरका भाग , तिसरका भाग , चौथा भाग , पंचवाँ भाग , ६-वाँ भाग , ७-वाँ भाग , ८-वाँ भाग , ९-वाँ भाग१०-वाँ भाग  , ११-वाँ भाग , १२-वाँ भाग१३-वाँ भाग १४-वाँ भाग , १५-वाँ भाग१६-वाँ भाग के सिलसिले मा हाजिर हय आज ई १७-वाँ भाग :

“एक पूरा गुज़रा हुआ संसार प्रकट कर देते हैं आप. गुज़रा हुआ भी क्यों? आज भी यह कही का वर्तमान है बस हम छिटक गये हैं उससे पर हमारे भीतर वह आज भी वर्तमान सा ही मौजूद है.”
शिव मूर्ति 
वरिष्ठ कथाकार

sssss ऊपर दीन कथन बखूबी पहीमाफी कय बिसेसता बतावत हय। ई बात पाहीमाफी कय पढ़ैया महसूस कयि सकत हय। कहा गा बाय कि जौन दुनिया आजौ मौजूद बाय, ऊ काहे नाहीं देखात फिर दुसरी जगह? खुद सिउमूरति जी के हियाँ ई दुनिया अहै, तब्बो का यही तिना देखाति हय? 

बात ई हय कि दुनिया देखाब औ अनूदित रूप मा दुनिया देखाब दुइनौ मा बहुत अंतर अहय। गाँव पै बति करब औ गँवार होइ के गाँव पै बाति करब, दुइनौ मा अंतर होइ जात हय। गाँव पै बाति करब अऊर गंवार होइ के गाँव पै बाति करब दुइनौ मा अंतर हय। बिना होये बाति करय पै लागत हय कि केहू बहिरवासू मनई गाँव पै बाति करत अहय। आशाराम कय खासियत ई हय कि वइ गाँव पै बाति, गंवार होइ के, गाँव केरी भासा मा करत हयँ जेहिसे ऊ पूरा संसार प्रकट होइ जात हय। जेहिकय चरचा सिउ मूर्ति किहे अहयँ। 

तिरिया गाथा के दुइ हिस्सन क आप पढ़ि चुका हयँ। ई तिसरका आय। यहिमा अबरन समाज कय मेहररुवन के बारे मा बयियावा गा अहय। यइ कयिसे जीवन जियत हयँ। सबरन समाज से हियाँ जादा आजादी हय। यइ कम मजबूर हयँ। यइ तनिका बोल्डौ होइ जात हयँ, हौके-मौके। तौ पढ़ा जाय ई भाग : संपादक
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  • तिरिया गाथा -३ 

ठाँवैं – ठाँव फाटि बाटै
कथरी लायक धोती बाटै
सूई मा डोरा नाय दियौ
हमरे देखात नाहीं बाटै
गोनरी बिछाय हम सोई थै
राती मा गड़े पै रोई थै
रूई वाला गुलगुल गद्दा
सपनेव मा नाहीं देखी थै
यक धोती बची बाय खाली
फूटी कौड़ी नाहीं घर मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

बूढ़ी देहीं मा कवन दम्म
ताले के खाले भंछेन हम
चीरेन सरपत से मूज खींचि
फिरु कासि काटि झुरुवायन हम
यक बड़ी सिकहुली रंगदार
बीचे-खूचे मा फूलदार
बहिनी पुरुवाय लियौ थोरै
दीदा बेकार होइगै हमार
हम रहेन अवांसे नीक-सूक
कनपातर होइगै बीचे मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

भागौ बहिनी कछु ना बोलौ
सुनि ल्या कतहूँ ना किह्यू जिकर
बड़की बखरी मा नधा बाय
दुइ दिन से करकच-दहकच्चर
छोटकी पतोह विधवा बाटै
पेटे मा लिहे पाप बाटै
सासू से लड़त पुरहरे बा
कि तोहरे जाती भै बाटै
ना सूई-फार करब अबकी
करियान रहब हम कोठरी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

नाउन भउजी बखरी कै खास
आइन दौरी वै बदहवास
गोहराय कै बोलिन हमहूँ से
बेवा रानी चलि बसीं आज
गोली से भरी रही पिस्टल
जानिन कि धरी बाय छूछै
खटका दबि गै अनजाने मा
छतिया छलिनी-छलिनी होयगै
देखतै-देखत हमरी आंखी
गिरि परीं धड़ाम जमीनी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

भइंसिया खड़ी बम्मात बाय
गइया नाहीं पगुरात बाय
पिल्लन के साथ कुकुरियौ अब
घर छोड़ि कहूँ कां जात बाय
मुसरी बोलै चू-चू- चू-चू
नरदहा छछुंदर चिक-चाऊं
करखही बिलरिया देखे बा
पंजा मारै माऊं – माऊं
सनपाती पड़िया भोकरत बा
मूड़ी उठाय कै बां-बां- बां-बां
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

बेवा बूआ गुस्सान रहीं
आयीं औ’ चली गयीं जल्दी
बइठका म बइठा घिरा हये
थान्हें कै बड़े दरोगा जी
वै कहअ थैं चीर-फार होई
बड़के मालिक रिरियात हये
केव कहत बा मान गये बाटे
अब खुदै फुकावै जात हये
तर-उप्पर मनई जमा हये
सरसौ ना गिरै जमीनी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

छोटजतियन मा यक चीज बाय
कुछ चीज बहुत ही नीक बाय
मेहरारू मर्द बरोबर हैं
बस बहुत गरीबी–भूख बाय
चूल्हा – चाकी वनके माथे
बाकी मिलि काम करैं साथे
हँसि बोलैं खूब मजाक करैं
मनसेधू लाग रहैं पाछे
बीड़ी दागैं पीयें बिचरैं
घर-बार, खेत-खरिहाने मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

बम-बम बमचक हुम्मी-हुम्मा
घप घपर- घपर घम्मी-घम्मा
कइंचारी से मारै दउरे
तब उहौ उठाय लिहिस गुम्मा
गरियाये पै गरियावै ऊ
वै कहे तुहैं नाहीं राखब
ऊ कहिस खुदै हम भागि जाब
रहि जाबा तू तकतै – ताकत
फिर गये मजूरी करै दुवौ
मनहग होइकै दुइ घंटा मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

कुच्छौ ना खेती-बारी बा
बस खाली खाल्ह मजूरी बा
गै भाग बियहुती नइहर से
जोरू अब बहुत ज़रूरी बा
लूली-लंगडी, कानी-खोदर
धमधूसर – बेवा – बदसूरत
करिया-गोरहर देखबै नाहीं
मिलि जाय कामकाजी औरत
तजबीज धरउवां लाय दियौ
नाते के नात पनाते मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

ना अनवइया ना पठइया
नाहीं आये हमरे भइया
माई कां बहुत मोहान हयन
हमका तू जाय दियौ अइया
तू हयू पतोहा जेस बाट्यू
मानौ पाले बाट्यू चक्कर
दुइ-चार महिन्ना बीतै ना
रट्टा मारौ नइहर-नइहर
जा रात भरे कां चली जाव
जायू ना मुला अकेले मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

परिवार भरा – पूरा बाटै
खाते-पीते घर-बारी हन्
घूंघुट के बहिरे ना देखेन
दुइ लरिका कै महतारी हन्
गरमी मा घुसा रहौ घर मा
बेना हाँकौ तौ जिउ जुड़ाय
जाड़े मा सूरज कै दरसन
पावै तब अँगना मा घमाय
नइहरे के वोर ताकेन नाहीं
आयन जब से हम गवने मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

सूदेन मा सूद यकतौ अछूत
हम जाति हई मेहरारू कै
घर से बहिरे तक रोज खटौ
ना नावं – निहोरा कामे कै
कपड़ा-लत्ता, लरिकन ताईं
पइसा जोरी पाई – पाई
वै काम करैं अवतै गरजैं
गरियाई , मारी हम जाई
पाती बटोरि चूल्हा फूँकी
वै गप्प लड़ावैं मरदेन मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

बढ़इन से बोलिन सहुवाइन
आइन नाहीं घर परताइन
घर मा हमरे लल्ला आये
यक्कौ दिन सोहर ना गाइन
धोय उठइया धोबयिन लाइन
काम किहिन धगरिन निपटाइन
नेग मा धोती–लोटा–थरिया
मागैं नाउन अउर कहायिन
साहू सूम कछू ना बोलैं
बइठा रहैं दुकानी म़ा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

हम जाब चरावै ना छगड़ी
माई ! पिरात बाटै पेटवा
दुई मूका दादा मारिन हैं
औ’ पकरि क् नोंच लिहिन झोंटवा
लत्ता नाहीं यक्कौ बित्ता
फटही-चिटही लुगरी पायन
वै कर्र से फारत देखि लिहिन
पूछे पै नाहीं बतलायन
कपड़ा हाथे से छोरि लिहिन
घमकाइन जोर से पीठी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

कइसै बोली औ काव करी
बस दागै दाग लाग कथरी
दौराइन मारि कुकुरिया कां
जानिन कि उहै रही वोलरी
कुछ काम करै कां जब कहिहैं
तू कह्यू बहुत बीमार बाय
दुई-चार रोज कै रोग महीना
मा जिउ कै जंजाल बाय
लरिका होइत ना छूत हुवत
हम जाइत रोज मंदिरे मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

पूत जनम लै लोलक लइया
बाँटौ धान बटोरौ पइया
ताले भइंसी बोह लियत बा
मेंड़े दूब चरत बा गइया
अड़ुवा बैल बहेड़ुवा पूत
बाप बनैं कां सउक अकूत
लरिका पै लरिका लेहँड़ा भै
मेहरी कै देहियाँ गै सूख
घूमौ लट्ठ बजाओ गाओ
घुसा जमोगा सउरी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

जायं जहाँ भी डाढ़ा रानी
बरसै लागै पाथर पानी
आगी ताईं घर-घर भंछेन
सबकै बोरसी रही बुतानी
दाल बनायन भात बनायन
घोर्रइया कै साग बनायन
खाये नाहीं टिनुक गये वै
अपने सकि भै बहुत मनायन
रात भै सोवा रहे कोरउरे
बासी खाये भिन्नहीं मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

(घोर्रइया : एक तिलहन जौन अब नाहीं बोवा जात / कोरउरे : भूखे / 
भिन्नहीं : सुबह)

चूल्हा-चौका बरतन-कुरतन
गिरहस्ती मा डूबा तन-मन
ब्रत करवा चौथ निराजल छठ
घर-आँगन भजन-भाव- किरतन
दहलीज़ पार लछिमन रेखा
मिटये न मिटै भाग-लेखा 
कोठरी कै रोसनदान खोलिकै
दुलहिन पढयं हाथ-रेखा
कुच कुचुर-पुचुर कुचकुच बोलै
चिरई बखरी के पिंजरा मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा.

__आशाराम जागरथ

[जारी….]

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पाहीमाफी [१६] : दीवाली

आशाराम जागरथ रचित ग्रामगाथा ‘पाहीमाफी’ के  “पहिला भाग”,  दुसरका भाग , तिसरका भाग , चौथा भाग , पंचवाँ भाग , ६-वाँ भाग , ७-वाँ भाग , ८-वाँ भाग , ९-वाँ भाग१०-वाँ भाग  , ११-वाँ भाग , १२-वाँ भाग१३-वाँ भाग १४-वाँ भाग , १५-वाँ भाग के सिलसिले मा हाजिर हय आज ई १६-वाँ भाग :

paint-diwali-diyas-lilcreativekidsदीपावली आय आज। दीवाली क लयिके मेर-मेर कै कविता देखय का मिलत हय। ज्योति केरी बड़ाई मा। लोगय लछिमी माई से धन-धान्य से घर भरय कय बिनती करत हयँ। गरीब-गुरबौ अरदास करत हय माई से। मुला माई धनिकन क धन दिहे जाति हयँ। उइ असर्फीलाल बनत जाय हयँ। गरीब लंगोटीलाल बनिके रहि जात हयँ। रमई काका व्यंग्म मा कहे रहे : 
लछिमी धनिकन की देवी हयँ
जिनके उइ सदा सहारे हयँ
दीनन के दीनानाथ बंधु
जिनके उइ सदा पियारे हयँ!
गरीब-कचोट हय उनकी कविता मा — हमरी कुटिया मा न आईं / का चली गयीं ऊंची महलन? जागरथौ कहत अहयँ :
खेती-बारी ऊँची जात
उनके घर लछिमी कै वास!

जागरथ केरी कवितन से दीवाली कय जादा चौड़ी दुनिया देखी जाय सकत हय। पूरा गाँव अहय। जिता-बिरादर मा बंटा। सबके ताईं तिउहार यक्कै नाईं नाहीं ना। यक घर ऊ अहय कि सब गांजा बाय। दूसर घर ऊ अहय कि अकाल बिराजा बाय। दियौ-दियाली लियै कय जोग नाहीं बनत। सामान बेचय आयी मनिहारिन से माई कहत हयँ कि हमरे मोहारे काहे झोली उतारति अहव। हमरे लगे कुछू अहय नाहीं। मनिहारिन कहत हय : 
बोलिन चुरिहारिन पहिरइबै
पइसा रही उधारी मा..

दीवाली कय कहीं जादा चौड़ी, मार्मिक औ हिरदय-छू तस्वीर देखा जात, पाहीमाफी -१६ मा. : संपादक
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  • दीवाली

सीलन से लोनियाई भीत
माई छोपिन माटी नीक
बोलिन आवत बाय देवाली
कोना-आँतर डारी लीपि
दादा भैंसिन कां नहुआइन
तेल नीम कै खूब लगाइन
नवा-नवा पगहा बरि कै वै
बैलन कां घुँघरू पहिराइन
नीबी के पाती कय धुइंहर
फिन सुलगाइन घारी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

मुँह मा पान माथ पे बिंदिया
होंठे झुलनी झूलै बढ़िया
झौली मा चुरिहारिन बेचैं
चुरिया, लाल-बैगनी-करिया
माई आइन दौड़ी-दौड़ी
काहें हयू उतारत झौली
अबकी जाव दुबारा आयू
गाँठी मा ना पइसा-कौड़ी
बोलिन चुरिहारिन पहिरइबै
पइसा रही उधारी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

आधे कातिक दीया-दीवाली
दस दिन अगवैं से तइयारी
फूलि कै कुप्पा गेद-गेदहरे
बड़ा घरौंदा अबकी बारी
चचा कोंहार कोंहारिन चाची
धइकै मूड़े झौवा-खाँची
मेर-मेर माटी कै बरतन
बेचैं चौका-बेलना, घाँटी
लाल- ललछहूँ चमकै गुल्लक
सोंधी खुशबू हाँडी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

भउजी ‘पुरबहा’ मगन घूमैं
अबकी दीवाली ‘वै’ अइहैं
साड़ी-साया हमरी ताईं
लरिकन ताईं कपड़ा लइहैं
बोलिन ‘उतरहा’ तू जेस बाट्यू
बस बनी ठनी बइठी बाट्यू
अइहैं केऊ का छोरि लेई
यक्कौ ना काम करत बाट्यू
छोटकी बोलिस बप्पा अइहैं
पहिली दाईं देखब वनकां
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

बड़कना बहुत ही बात करै
लरिकन के बीच गुमान करै
छुरछुरिया औ हाथी-घोड़ा
बप्पा लइहैं झोरा भरिकै
आये वै दूनौ हाथ मलत
अब काव कही कइसै बोली
हम सोवत रहेन बर्थ उप्पर
सारा समान होइ गय चोरी
धइ ल्या ई रुपिया बचा बाय
जो धरे रहेन हम जेबी मा 
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

खेलैं लरिके, जाँत-जंतोली
बोलैं, तुतलाय बोल बोली
भुरभुरी धूरि मुट्ठी बान्हें
पीसैं पिसान भरि-भरि झोली
का जानी पइसा – कौड़ी हम
दीया-दिवाली रोज अगोरी
कोइला, खड़िया-माटी, गेरू से
खींच-खांच कै बनै रँगोली
लिहें तराजू , पलथी मारे
कंकर तौली राही मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

भोंपू, भरकी , कोसा-कोसिया
दिवली, परई , भुरका , मेलिया
यक जोड़ा माटी कय दवात
दुई आना मा बढ़िया-बढ़िया
ओखरी माँग कै लाइन माई
घपर-घपर घप किहिन कुटाई
बनि कै भै चिउरा तइयार
जड़हन भूजि बनाइन लाई
खइलर लइकै अइया बइठीं
माठा मथैं दुधहंड़ी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

धुँधलहा साँझ, अम्मावस दिन
घाँटी बाजै टिन-टिन-टिन-टिन
दिवली मा बाती-तेल डारि
अँगना बीचे बारी गिन-गिन
डेहरी, कंड़िया, चूल्हा, चाकी
ड्योढ़ी, कोठरी, खेती, बारी
लौ लुपुर-लुपुर लुप-लुप लउकै
कूँआ, खूँटा, चन्नी, घारी
यस जरै तेल कडुवाय आँख
लइ बस्ता पढ़ी ओसारी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

गहरान रात भै अन्हियारा
खेते मा लइकै लुक्काड़ा
आगी से सब खिलवाड़ करैं
नाचैं जइसन कि बनजारा
चहुँवोर दिवाली चकाचक्क
मन ही मन मनवा मसमसाय
जुग-जुगुर-जुगुर जुगुनी चमकै
कुचपुचिया तरई कुचपुचाय
कहुँ आग न पकरि लियै छपरा
जिउ जरै-बुझै अंदेशा मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

दक्खिन टोला, तुम्म–तड़ाका
जोर-जोर गरियावैं काका
घर मा खाय क ठेकाना नाहीं
लरिकै मागैं बम-पड़ाका
खेती-बारी, ऊँची जात
वनके घर लछमी कै वास
छूत मनावैं देवी-देवतै
गोड़ धरे पै मारैं लात
हमरे सब कय दिया-दिवाली
हरवाही – चरवाही  मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

ऊ देखा, ऊ हमरा गाँव
घी कै दीया ठावैं ठावँ
हमरे टोलिया मा अन्हियारा
सोवै रोज पसारे पाँव
वोसे कहिअ थै जात्या बखरी
रहत्या सुख से कोठरी-कोठरी
ऊ बोलअ थै नाहीं जाबै
हुआँ धरा बा गठरी-मोठरी
भागब ना पुश्तैनी घर से
पड़ा रहब सन्नाटे मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

हर खेते दीया जुगुर-जुगुर
ऊपर तरई कै खुसुर-पुसुर
कनफोडू शोर पटाखा कै
गूंजै रहि-रहि, जिउ धुकुर-पुकुर 
चक-चकाचौंध चहुँवोर शोर
कहूँ लुकाने चाँद – चकोर
आपन ‘शुभ-काम’ जगावैं सब
वहि दिन तौ चोरी करैं चोर
गै दिया-दिवाली कोने मा
कुलि बारह रोज डिठौने मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

आँखी अम्मावस कै कजरा
वोरमा मुँह लिहें रहे वोलरा
पूछेन गोहराय काव होय गै
नौकरिहा कहाँ हये पसरा
बोले कि वोई तौ लाय रहे
कुछ खेल-खेलौना यक झोरा
हमरे बुढ़िया कां सउक चढ़ा
ऊ रही दगावत बम-गोला
वै पकरि कै आग छुवाइन जेस
फट गै बम-गोला हाथे मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा..

__आशाराम जागरथ

[जारी….]

पाहीमाफी [१५] : तिरिया-गाथा (२)

आशाराम जागरथ रचित ग्रामगाथा ‘पाहीमाफी’ के  “पहिला भाग”,  दुसरका भाग , तिसरका भाग , चौथा भाग , पंचवाँ भाग , ६-वाँ भाग , ७-वाँ भाग , ८-वाँ भाग , ९-वाँ भाग१०-वाँ भाग  , ११-वाँ भाग , १२-वाँ भाग१३-वाँ भाग १४-वाँ भाग के सिलसिले मा हाजिर हय आज ई १५-वाँ भाग :

Captureई हय पाहीमाफी है १५-वां अउ तिरिया गाथा कै दुसरका भाग। तिरिया गाथा मा गाँव कै आधा दुख बरसि परा अहय। इनका पढ़त के साफ जाहिर हुअत हय कि यक्कै साथे रहय के बावजूद मरदन की दुनिया से औरतन कय दुनिया केतनी अलगि बाय। औरतनौ की दुनिया मा सबर्न औ अबर्न औरतन कै दुनिया अलगि-अलगि बाय। यहिका पढ़त के ई जाना जाय सकत हय। यहिमा ई बतावा गा बाय कि सबर्न मेहररुवै अबर्न मेहररुवन क बेहतर हालत मा बतावत हयँ। अबर्न मेहररुवै सबर्न मेहररुवन का कौनी हालत मा देखति हयँ, कौने मामिले मा बेहतर या बदतर मानति हयँ, संभव हय ई बाति आगे देखय का मिलय। उनके ‘कहन’ मा ई आवय मुमकिन हय। 

तिरिया गाथा मा औरतन के कयिउ अवस्थन कय सच कहा गा बाय। ई नाहीं कि केवल जवानिन कै दसा बतायी जाय। गेदहरा-जवान-बूढ़ : तीनौ पायदान पै खड़ी तिरियन का जागरथ जी लखे अहयँ। इन कबितक के जरिये आपौ इनका लखि सकत हयँ। 

कबिता कय यक-यक बारह-पतिया टुकड़ा अपने मा कंपलीट अहय। ऊ पूरा चित्र सामने उकेर दियत हय। यक-यक चित्र पूरी कहानी कहत देखाये। बिटिया, जवान औ बूढ़ तीनौ जिंदगिन पै अलग-अलग टुकड़य अलग-अलग कहानिव कहत हयँ। यनहीं के बीचे कबिता कय अव्वल सधानौ आपन छटा देखावय लागत हय। जयिसे ई दुइ लाइनन मा, ‘बात’ सबद से कीन खेल बढ़िया हय। ‘बात’ सबद से जुड़े मुहाबरन कय का गजब इस्तेमाल कीन गा अहय : ‘बात निकारैं बात-बात मा / बाती मा बाती कै गूझा.’ : संपादक 
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  • तियिया-गाथा : (२)

घूमौ खुब डारे गलबहियां
तुहकां देखतै परचय देहियाँ
हम खटी अकेलै काम करी
लरिका कां लिहे-लिहे कनियाँ
हेंढ़ा यस भया तुहैं पोसेन
तुहूँसे गोबरे कै छोत नीक
हम फुरै कही थै मान जाव
नाहीं माँगे ना मिली भीख
चेतौ अबहीं सौंकेर बाय
मेहरी आई बा गवने मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

जे करै परिश्रम हाँड़ तोड़
वै खाय बिना मर जात रहे
जेकरे अनाज इफरात रहै
वै खाय-खाय डुडुवात रहे
जे ऊँच रहैं सिंगार करैं
घर के भीतर करियान रहैं
पर सूद चमार कै मेहरारू
खेते मा साथे काम करैं
केउ ओढ़े-बेढ़े बइठ रहै
केव धान बिठावै कनई मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

ठकुराइन कै नीक बहुरिया
लाल बिलाउज धोती करिया
माथे चम-चम टिकुली चमकै
गोरहर हाथ म हरियर चुरिया
सीसा लइकै माँग सोझावैं
क्रीम-पाउडर रोज लगावैं
फरमाइस सब पूर हुवै पर
घर से बाहर निकरि न पावैं
केतना खेत कहाँ पै बाटै
जान न पावैं जिनगी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

राखैं सासू अपने कसि मां
जइसै की गाय रहै बस मा
लागै कुलि बुद्धी चूल्हा मा वै
भोजन नीक पकावैं घर मा
दिन-रात रहत अन्दर-भीतर
कुछ साँवरि भी लागैं गोरहर
देखन मा लाल गुलाब लगैं
केतनौ जंजाल रहै सिर पर
लेकिन नइहर कै नावं लेहे पै
आंसू आवै आँखी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

लेहसुवा-केरमुआ-अमलोनी
सोचिअ थै जाय साग खोंटी
तीनौ कां यक्कै मा मेराय
लहसुन के तड़का से छौंकी
हमरे यक जने तौ यस मनई
तूरैं रोजै सरगे तरई
जाई माँगी ठकुराइन से
सरसौ कय तेल एक परई
गोजई कै हथपोइया रोटी
सेंकब कंडी की आँची मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

चला हटावा मेलिया-मेटवा
खाबै ना बोलत बा पेटवा
थरिया झन-झन बाजत बाटै
छः बिटिया प पइदा भै बेटवा
बहुत अगोरिन पंडित बाबा
कइकै किस्मत से समझौता
घर मा वंश चलावै ताईं
यक बेटवा कै रहा मनौता
धगरिन ढूध पियावैं, रोवै
नन्हा – मुन्ना सौरी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

बेटवा भये सब सोहर गावै
बिटिया होय तौ मुँह बिचकावै
कहैं भवानी आयी बाटीं
झौवा भै खरचा करवावै
‘बेटवा होतिव खूब खियाइत
मूड़े पै बइठाय खेलाइत
हँसी-हँसी मा हँसि कै बोलिन
मरि जातिउ तौ फुरसत पाइत’
बिटिया ताकै कुछू न बोलै
भाई लादे कनियाँ मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

बिटिया ! तू तनी वोनाय जाव
ओढ़ना सीयै बइठी बाटी
सूई मा धागा नाय दियौ
हमरे देखात नाहीं आंखी
ई टुटा खटोला झोल खाय
बनिकै गठरी अब ना सुतिबै
धइ दिहेन उजार-फुजार कै हम
वै बोलिहैं काने सुनि लेबै
यक नीक रजाई पाय रहेन
वोका दइ दिहेन पतोहे कां
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

पहिलउठा भै जुरतै मरि गै
ताना-बोली से जिउ भरि गै
यक ठू बेटवा के चक्कर मा
बिटियै-बिटिया पइदा होइ गै
दूसर मेहरी हमरी नाईं
जा लइ आवा अपनी ताईं
तू दांत चिदोरे खड़ा हया
चिल्लाई थै सुनत्या नाहीं
जाई थै बहि-बिलाय जाबै
धंसि जाबै कूआँ-खाई मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

होते नाहीं लरिका-बच्चा
कानाफूसी से जिउ कच्चा
सब जने कचाहिन केहे हये
दीदी-बहिनी, मरदी-मरदा
मनसेधू हमरे कहत हये
पहिरब-खाबै-पीबै अच्छा
दुनिया औलाद से पटी बाय
काहे तू करत हयू चिन्ता
हम दुवौ परानी ठीक-ठाक
दुसरे-दूसर क्यो बीचे मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

चाटै गइया आपन लेरुआ
हमहूँ क् चाही येक दुलरुआ
ना जाने वै कहाँ से लाये
पाये यक ठू बच्चा परुआ
विधवा दीन-दु:खी महतारी
या तौ कउनौ रही कुँवारी
कठिन करेजे फेंके होई
गड़ही मा झाली के आरी
बहुत रह्यू औलाद कै भूखी
पाय गयन हम सेती मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

कही तौ माई मारी जाई
नाहीं बापू कूकुर खाई
तुंहसे काव कही अब बहिनी !
कहिकै इज्जत खुदै गंवाई
बुढ़ऊ बाहर रंग जमावैं
नीक-नीक परबचन सुनावैं
सासू राती गोड़ न मीजैं
सौ-सौ गारी, झापड़ पावैं
यक दिन तौ कपड़ा निकारि वै
खड़ा कै दिहिन ठण्ढी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

नेम-धरम से रोजै पूजा
वनके लेखे नाहीं दूजा
बात निकारैं बात-बात मा
बाती मा बाती कै गूझा
घूंघुट से बहिरे झाँके पै
डोलै लागअ थै सिंहासन
अपुवां घूमैं कोलिया-कोलिया
मेहरारुन पै पहरा–सासन
छटकत घूमत रहेन नइहरे
जेल भवा ससुरारी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

सइंतौ-माजौ, चूल्हा बारौ
भन्छौ दिन भै जिउ दइ डारौ
घर कै मेहरारुन गाय-भइंस
मारौ–पीटौ खूँटा गाडौ
बिटिया बा नीक पढ़ाकू बा
दरजा मा सबसे अव्वल बा
काव कही औलाद कां अपने
बेटवा तौ गोबर-गणेस बा
खाय-पियै, डुडुवाय जाय ना
बिन मारे इस्कूले मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

सुन लेत्यू बात मोर माई
बापू से कइसै करी ढिठाई
ना छोड़वावा पढ़ै दिया हम
आगे आउर पढ़ब पढ़ाई
खबवा खाव चुपाई मारे
जाड़ हुवत बा जात्यू सोई
बिटियै जादा पढ़-लिखि लेइहैं
तौ बियाह मा दिक्कत होई
खुसुर-फुसुर माई औ’ धीया
बहसैं रात रसोई मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

तू घाम-घमौनी करत हयू
बइठी बाट्यू झोंटा खोले
बड़कऊ उहै आवत बाटे
देखिहैं रहिहैं ना बिन बोले
आवा हमरे सब चला चली
दक्खिन पिछवारे की वोरी
फइलावा वहीं झुरात बाय
लंहगा–साड़ी–साया–चोली
सूदेन कै मेहरी नीक बहुत
घूमैं कुलि खेते-खेते मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

सुन्दर अंखिया यत्’तत-यत्’तत
पातर कै गठी देह गोरहर
धन देखि फलाने नाधि दिहिन
बउदहा से गाँठ जुड़ा वोकर
रोवत बा कहत बाय काकी !
कि जाब दुबारा ना ससुरे
मरि जाबै खाय ज़हर-माहुर
वै बाप बराबर हैं हमरे
समझाई थै मानत नाहीं
बहुतै डर लागत बा हमकां
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

चूल्हा पै चढ़ा रहा अदहन
देवरानी से बतियात रहेन
दलिया होयगै पातर पानी
डारै कां नोन भुलाय गयन
परसा खबवा खाये नाहीं
यक जने काल्हि रिसियाय गये
हम घंटा भर से खड़ी-खड़ी
जब खूब मनायन मान गये
पानी छुई लियौ चलौ जल्दी
ना बइठी रहौ सिवाने मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा.

__आशाराम जागरथ

[जारी….]

अज्ञेय मिलना चाहते थे, लेकिन जुमई ने उधर रुख नहीं किया!

[हमार पसंदीदा कवि अहीं केशव तिवारी। यह दाईं हम बांदा गा रहेन। हुवां उनसे मुलाकाति भै। वही मुलाकात मा वै आधुनिक अवधी कवि जुमई खां आजाद से अपनी पहिली मुलाकाति कय किस्सा सुनाइन। यादगारी साझा किहिन। हम तब्बै से उनके पीछे लागि गयन कि ई यादगारी लिखि भेजव। आर-टार हुवत रहा, मुला देरय से सही, अब ई सत्य-घटना आपके सामने हाजिर ह्‌वै पावति अहय। हम केसव जी कय बहुत आभारी अहन्‌। : संपादक]
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20842201_1322904504485353_8523803886417688077_n अज्ञेय मिलना चाहते थे, लेकिन जुमई ने उधर रुख नहीं किया!

दिसम्बर के जाड़े के दिन थे, घर गया था। गांव से जिला हेडक्वाटर आना जाना लगा रहता है। बचपन से जुमई खां की कथरी बिल्कुल अपने निपट देहाती जनों से सुनता आ रहा था। आज अचानक गांव के हरकू गडरिया से सुना — कथरी तोहार गुन ऊ जानै जे करै गुजारा कथरी मा। तो फिर तय किया कि आज जुुमई से मिलकर ही लौटूंगा भले बेल्हा में रूकना पडे। खैर मै और मेरा एक रिश्ते का अनुज दोनों निकल पडे।

पहले सुल्तानपुर रोड पर किसी ने बता दिया। वहां झिनका पर लेटे अपने जमाने के नौटंकी के हीरो रामकरन मिले जो दमा के मरीज हो चुके थे। उन्होंने आजाद का पता दिया। हम लैाटे और बिहारगंज से गुबरी गांव के लिये निकल पडे। रास्ते मे पता चला जगेशरगंज स्टेशन के बाहर झगरू की चाय की दुकान पर आजाद का पता चलेगा।

झगरू की दुकान पर पहुंचते ही पता चला कि आजाद आर.पी.से (रायबरेली प्रतापगढ़-संजय पैसेन्जर) से संध्या तक आयेगें, आप चाय पियें, बैठें। हम भी जम गये। झगरू चाय आजाद के नाम लिख लिये और पैसे नही लिये। ये उन्हें आजाद के महमानो के लिये कहा गया था। खैर शाम हुयी और डेली पेसेंन्जर का रेला उतर। उसी मे कमीज पैजामा पहने मझियौले कद का एक व्यक्ति दुकान में घुसा।

झगरू बोले, आजाद ये लेाग चार घंटे से बैठे हैै आपके इंतजार में। वह लपके और गले लग गये। जैसे वर्षो से जान रहे हों। मिलते ही सब अपरिचय छूमंतर हो गया। अब शुरू हुआ बातों का सिलसिला तो एक लडका बोल पडा, आजाद कुछ हुयि जाय। बाबू साहब से तौ तोहार बात चलतइ रही। उन्होंने सहज ही उसकी बात को मान लिया। ये था जन का और उसके कवि का रिश्ता।

जैसे उन्होंने शुरू किया — भरे रे पूंजीपतिया तै रूटिया चोराय चोराय। करीब सौ लोगो का मजमा जुट गया और यातायात बाधित हो गया। धीरे धीरे सब झगरू की दुकान के इर्दगिर्द सिमट आये। ये सम्मान देख मेैं लगभग चकित था और एक दहाडती आवाज गूंज रही थी। अब लोग धीरे धीरे छट चुके थे। शुरू हुआ बातों का सिलसिला।

उसी दौरान बताया कि एक बार काला कांकर के महल में अज्ञेय आये तो धोबियहवा नाच हुआ। पैर मे घुघरू बांधे जब धोबी गाये — बिना काटे भिटवा गडहिया न पटिहैं / अपनी खुसी से धन-धरती न बटिहैं। तुरंत अज्ञेय ने पूछा, यह किसका गीत है? जुमई का लिखा है, यह पता चलते ही स्टेट से एक हरकारा उनका बुलावा लेकर आया। उन दिनों जुमई बहराइच कवि सम्मेलन मे गये थे। लौटे तो पत्र मिला और वाकया पता चला। बोले — “भइया,  ई गीत तौ राजा-महाराजा के खिलाफ अहै। कतउ बुलाइ के गड़ियां न धूप देंय। तव हम न गये।”

जुमई एक समय गरीब-गुरबा की आवाज बन गये थे। उनका किसी गांव ठहर जाना, किसी के दरवाजे खा लेना, एक पूरा का पूरा जनपद उनका घर हो गया था। जुमई खां हम से बोले, तुम्हउ सुनावा। कुछ सुनकर बोले — “बात तो खडी में करत हया पर माटी-पानी सब अपनै अहै।”

keshaw tiwariलेाक के बदलाव के लिये जिस राजनीतिक चेतना की दरकार है, वह अपने जन से द्वन्दात्मक रिश्ता कैसे खोजे, जुमई को यह बात समझ में आ गयी थी। जुमई की कविताई अपने से आगे की कविताई है। भविष्य के लिये एक जमीन तैयार करने का मसला है। जुमई उन कवियों में से थे जो अपनी कविता से अपना जीवन भी चला सकते थे और अपने जन के लिये लड़ भी सकते थे। यही सब उन्हें जुमई बनाता था।

__केशव तिवारी

पाहीमाफी [१४] : तिरिया-गाथा (१)

आशाराम जागरथ रचित ग्रामगाथा ‘पाहीमाफी’ के  “पहिला भाग”,  दुसरका भाग , तिसरका भाग , चौथा भाग , पंचवाँ भाग , ६-वाँ भाग , ७-वाँ भाग , ८-वाँ भाग , ९-वाँ भाग१०-वाँ भाग  , ११-वाँ भाग , १२-वाँ भाग, १३-वाँ भाग के सिलसिले मा हाजिर हय आज ई १४-वाँ भाग :

village_india_scene_paintings_nature_hut_street_agriculture_farmers_पाहीमाफी कय ई भाग गांव कय ऊ सच कहय कय कोसिस करत है जेहिका बहुत कम कहा गा अहै. यक दलित समाज कय नयी-नबेली बहू कइसे घरे औतय खन काम के चक्की मा पीसि दीन जात है, ई हियाँ देखा जाय सकत है. कइसे औरतय आपस मा यक दूसरे से बतियात हयं ई बड़ी सहजता से हाजिर कीन गा अहै. बात-चीत केरि भंगिमा देखउ हियाँ तनिका:

बहिनी ! खजुवात मूड़ बाटै
सगरौ, घर काम परा बाटै
दइ द्या साबुन यक दाईं भै
बरवा लासियान जट्ट बाटै

नवा नवा बियाह भा हुवै अउ मरद मेहराऊ दूनउ क जीवन-उत्सव से काटि के कामे मा खटावा जाय, ई जिंदगी के साथ पाप आय. गांवन मा ई पाप खूब देखाये! ठकुराना केतनी हनक के साथे, अउ केतनी निर्लज्जता से, यहि पाप-वृत्ति पै उतारू है :

कहि द्या बनठन भूले से भी
ठकुरहना वोरी ना आवै
जेकरे बल पोखना लाग बाय
वोका नाधब हरवाही मा

दुनिया भर के काम के जंजाल मा जिंदगी काटी जाय अउ जियय कै मौकै न मिलै तौ भरी जवानी भार लागै लागत है. केतना बेलाग यथार्थ कहा गा बाय :

हम बोझ सम्हारी कि अँचरा
जिउ धुकुर-पुकुर धुक बोलअ थै
दुई बोझ कुदरती छाती पै
सब बोझन से भारी मोकां

तौ गुजरा जाय पाहिमाफी के यहि चउदहें भाग से. : संपादक
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  • तिरिया-गाथा (1)

दुइ जगह से उबहन टूट रहै
पानी ना यक्कौ घूँट रहै
करिहाँव मा दाबे बात करैं
नीचे से गगरा फूट रहै
‘सीधा-पिसान कुच्छौ ना बा
कलिहैं से चूल्हा बुता बाय
अब काव कही बहिनी तुहुँसे
किस्मतियै ही जब फुटा बाय
कोदौ-सावाँ जउनै मिलितै
दइ देत्यु तनी उधारी मा’
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

बहिनी ! खजुवात मूड़ बाटै
सगरौ, घर काम परा बाटै
दइ द्या साबुन यक दाईं भै
बरवा लासियान जट्ट बाटै
आवा ढीलौ तनि हेर दियौ
औ लीख सुरुक चुट्काय दियौ
धीरे-धीरे मँगियाय बार
नीबी कय तेल लगाय दियौ
तिल कै पाती ना काम करै
गज्झा ना चिकनी माटी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

उठा पतोहा साँस लिया तू
कंड़िया छोडि कै जांत लिया तू
जात हई हम करै मजूरी
सतुआ-ककई फांक लिया तू
घर-भीतर-बाहर काम किहेन
मरदेन कै घुसा-लात सहेन
चुरिया कै धोवन बदा रहा
हम बड़े भाग तुहुंका परछेन
करछुल आछत का हाथ जरै ?
बुढ़िया होइ गयन जवानी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

******

परदेसी आये राती मा
मुंह लाल-ललछहूँ लाजी मा
माँगी मा सेंनुर मुस्कियाय
मरकहवा काजर आँखी मा
सोने कै बाली चम-चम-चम
नाकी मा कील तकै तक-तक
झुलनी झमकउवा ओंठे पै
हीलै-डोलै लक-झक लक-झक
ठकुराइन बोलिन ‘का रे, तू !’
पहिचानेन नाहीं मो तोहकां
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

ठाकुर ठकुराइन का ताकैं
चानी न सोहै नाक-कान
कुछ गुनैं-धुनैं कोयर बालैं
उंगुरी कटि गै जब उड़ा ध्यान
बोले, मन बक्कै आँवं-बाँवं
अलही-बलही फगुवा गावै
कहि द्या बनठन भूले से भी
ठकुरहना वोरी ना आवै
जेकरे बल पोखना लाग बाय
वोका नाधब हरवाही मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

******

रहि-रहि कै हिचकी आवत बा
छपरा पै कौवा बोलत बा
माई मोहान होइहैं साइद
लागत बा केऊ आवत बा
सौंकेरे से हम छोलिअ थै
तनिकौ मन नाहीं लागत बा
घसिया छक्कान बाय तब्बौ
हमसे नाहीं सँगिरात बाय
अम्मा ! हम घर कां जात हई
केऊ गोहरावत बा हमकां
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

भइया ! तू आया अनवइया
चौवा-चांगर दुइ ठू गइया
जाई सब कइसै छोड़-छाड़
आन्हर बाटीं सासू मइया
घर कै जंजाल बाय माथे
‘बिचउलिया’ दगा किहिन साथे
बस यक्कै चीज नीक बाटै
बहनोई तुहार पढ़त बाटे
वै कहत हये कि सबर करा
सब दिन ना कटी गरीबी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

भइया ! तू हमसे छोट हया
दुःख आपन तुहुँसे काव कही
बस फटही लुगरी इहै बाय
कउनौ खानी तन ढके हई
सावाँ-काकुन हम कूटिअ थै
जांता मा गोजई पीसिअ थै
सब खाय लियैं तब खाइअ थै
परथन कै टिकरी पाइअ थै
गवने कै मेंहदी छूट नाहिं
वै नाधि दिहिन मजदूरी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

हँसि कै बोलिन वनकै दुलहिन
रोवा जिन तू बनिकै विरहिन
ई कवन पंवारा नाधे हौ
हमसे तौ नीक हयू सब दिन
‘आन्हर सासु, ससुर भी अन्हरा
येक जने वोऊ चकचोन्हरा
पइदा भये न यक्कौ लरिके
घूमिअ थै दइ आँखी कजरा
जा गोड़ धोय द्या भइया कै
पानी भरि लावा थारी मा’
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

भइया ! अबहीं ना जाव आज
दुइ दिन तू आउर रुक जात्या
बा धरा बाध-पावा-पाटी
यक खटिया सालि बीन जात्या
कटिया-पिटिया मा रहेन लाग
लेकिन बिहान नाहीं टारब
उठि बड़े भिन्नहीं नारा मा
टापा लइकै मछरी मारब
तू हीक भै अच्छे खाय लिहा
धइ देबै थोरै झोरा मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

******

सुन्नर नीक पतोहिया तोरी
देखतै थूकै हमरी वोरी
सुनै न ना तौ करै बेगारी
दइ पइबा ना कबहुं उधारी
बोलिस आँख देखाया नाहीं
केहू क् दिया हम खाइत नाहीं
जानै ऊ जे करजा खाइस
घर बिकान घरवाली नाहीं
जउने गाँव कै छोरी होई
जनत्या नाहीं तू हमकां
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

******

घूंघुट निकारि गोहूँ ढोई
रोई आपन दीदा खोई
अकड़ी गटई घरुहान रहै
बेसरम नजर ताकै मोही
‘घौलरा’ कां नाहीं काम-धाम
राही मा बइठ अगोरअ थै
हम बोझ सम्हारी कि अँचरा
जिउ धुकुर-पुकुर धुक बोलअ थै
दुई बोझ कुदरती छाती पै
सब बोझन से भारी मोकां
यकतनहा कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

ऊ पटक बोझ फरवारे मा
बाँहें रसरी करियाहें मा
हिम्मत जुहाय रून्हें गटई
मुंह ढांपे बोलिस सन्हें मा
ना भलमनई ना बड़मनई
तुहरे जाती रस्ता दूभर
होइकै अकच्च मुंह खोलि दियब
इज्ज़त-पानी छीछालेदर
तुहर्’यौ घर माटी कै चूल्हा
घर घुसरि क् देखा भितरी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा.

__आशाराम जागरथ

[जारी….]

कविता : आजादी की बरसी पर (शैलेन्द्र कुमार शुक्ल)

20882701_1151646808268447_4269061318397321434_nआजादी की बरसी पर

करिया अच्छर खुनियाय गये
कागद आंसुन ते गये भीजि
जे कलमइ फांसी दीहिन रहे
बड़ नेता उन पर गए रीझि।

जे देसवा खातिर भिंजरि गये
उनकी उम्मीदय सुलगि रहीं
सपने सब जिनके बिथरि गये
औलादी उनकी रिरिकि रहीं

जे खून बहाइन, जिव दीन्हिन
छाती पर गोली खाय खाय
जिनके लरिका फांसी चढ़िगे
उनकी अम्मा की हाय हाय

आजादी उनकी और रहे
उनके सपने कुछ रहें और
जिनकी कुर्बानी भई रहे
उनकी कीमत कुछ रहे और

तुम बीच म  फाटेउ बादर अस
बिजुरी अस गिरेउ गरीबन पर
खेती कीन्हेउ तुम लासिन की
लट्‌टू हुइ गएउ अमीरन पर

टाटा बिरला मित्तल होरे
सब देसु टहलि के झारि लिहिनि
सरकारइ तुमरी रहैं खूब
काजरु उनकी बदि पारि दिहिनि

फिरि भइं देवारी दिया बरे
पूंजीपति बर्फी धमकी रहे
जे असिली मा हकदार रहें
उनके घर घुप्प अंधेरु रहे

हम उबरि न पाये रहन तनिकु
उनते बड़खर जल्लाद मिले
उइ कहिन कि दुख सबु हरि लेबा
सब राम भरत अस खूब मिले

चौदह मा भवा इलेक्सन फिरि
वै टीबी पर वाटय मांगिन
कुछ धरम धुरंधर रैलिन मा
सब वादा हमते कई डारिन

बोले अच्छे दिन आय रहे
पुरिखा लहि सब पतियाय गये
जो नये खून के ज्वान रहें
सब बजरंगी बनि छाय गये

को रामकाज मा बिपति बने
तलवार लिए हिन्दू सेना
भगवा का बांधि मुरैठा वै
ककुवा होरे धौंकैं ब्याना

कुछ जन समुझावैं समुझइं ना
ययि हत्यारे हैं मानइं ना
गांधी के गोली मारिन यइ
वै रहे बतावत जानइं ना

यइ अग्रेजन का साथु दिहिन
जब पुरिखा तुमरे लड़त रहें
यइ करिन गुलामी राजन की
जब बप्पा लाठी खाति रहें

यइ जन गण मन ना गाइ सके
जब आजादी के ढोल बजे
यइ कबौ तिरंगा ना थामिन
जब आजादी के साज सजे

ककुवा गुजराती दंगन का
तुम यतनी जल्दी भूलि गयेउ
मंदिर मस्जिद की राजनीति
तुम सांपु आइस सब सूंघि गयेउ

वहु नसा धरम का चढ़ा रहे
यहु किहिस अफीमी अपन काजु
जानै समुझै पर जोरु नहीं
फिरि छाय गवा सब रामराजु

मोदी जी फिर परधान भए
औ अमित साह जोड़ी थामिन
कुछ राजनाथ नेता होरे
सब नई कैबिनिट गढ़ि डारिन

सिच्छा मंत्रालय मनु स्मृति
ईरानी जी का मिला रहे
तौ बात हिंये से सुरू भई
जब शोध वजीफा कटा रहे

दिल्ली मा भवा आंदोलन
सब लरिका लरिकी जुटे रहें
तब रामराज की सरकारी
लाठी पीठिन पर परी रहें

यहु रामराज का नक्सा सबु
हमरी आंखिन का डाहि गवा
जब दाना माझी लासि लिए
कांधे पर पत्नी आय गवा

एक रात रहे आधी आधी
जब नोट बंद का हुकुम भवा
साइकरा पार कइ मरे खूब
लाखन जन का रूजिगार गवा

साहब जी कबौ बताइन ना
क्यतना काला धन निकरा है
जनधन वाले खाता मइहाँ
पंद्रह लाख कब पहुंचा है ?

यतना झेले के बादिउ मा
जनता पर चढ़ी अफीम रही
यूपी मा फिर अधिकार भवा
‘तपसी धनवंत दरिद्र ग्रही’

क्यतने दिन अबही बीते हैं
गोरखधंधा की जग्य भयी
गोरखपुर जनपद मा द्याखौ
केतनी हत्यारिन नदी बही

उन दुधमुंहटन की लासिन का
जो कांधे धरि धरि रोउती हैं
क्यतने हइं फाट हिये उनके
महतारी जउन तड़पती हैं

यह आजादी है कौनि मिली
हम माथु ठोकि के सोचित है
सन सैंतालिस से सत्रह लहि
कफ्फ़न के कपड़ा नोचित है

दै रहे बधाई मुखिया जी
है आजु अट्टिमी कृस्न जलम
हम तुमरे मुंह पार थूकित है
सब नसा हिरन है धरम करम ।

__शैलेन्द्र कुमार शुक्ल
[15/08/2017]

पहीमाफी [१३] : दहिजरा कलाही कलपावै

आशाराम जागरथ रचित ग्रामगाथा ‘पाहीमाफी’ के  “पहिला भाग” ,  दुसरका भाग  , तिसरका भाग , चौथा भाग , पंचवाँ भाग , ६-वाँ भाग , ७-वाँ भाग , ८-वाँ भाग , ९-वाँ भाग१०-वाँ भाग  , ११-वाँ भाग , १२-वाँ भाग के सिलसिले मा हाजिर हय आज ई १३-वाँ भाग :

पाहीमाफी कय ई तेरहवाँ भाग हाजिर हय। दुरभिच्छी मा गाँव कय हालत यहिमा बयां कीनि गय हय। अकाल-दुर्भिच्छ कबिता कय बिसय बनत हय तौ यक चुनौती ई हुवत हय कि कहाँ ले विवरण रखा जाय, औ कहाँ ले संवेदना उभारी जाय! कबि कय मंतब्य केतना आवय औ केतना लेगन कय राय आवय! पाहीमाफी कय कवि घटना चुनै के मामिले मा एलर्ट अहय। ऊ अस घटनन का चुनत हय जिनसे घटना कय गतिकी आयि जाय, साथे-साथे घटना खुदै मा कमेंट बनि जाय। कयिउ दाँय तौ कबि-मंतव्य यहि तरह आवत हय कि वहिकय संगति सहजै सोसित पात्र से होइ जाति हय। पात्र बोलय तौ समझौ कबि बोलय, कबि बोलय तौ समझौ पात्र बोलय। मसलन नीचे दीन पँक्ति कविता बिना इनवर्टेड कामा के दीन गै अहयँ, जौन कि ठीकौ अहय : 

यक्कै थैली से जनम लिहेन
बेगानी हम दुई आंखी मा.
ध्वनि/नाद, अनुप्रास, के्र सहायता से काव्यत्व लाउब पाहीमाफी मा कम हुअत हय मुला ्जहाँ हुअत हय बहुत जमि जात हय। अलंकार जब अनायास आवय तब ऊ सबसे ज्यादा सार्थक हुअत हय। जैसे इन पंक्तियन का देखिके यहि बात कय अनुमान कीन जाय : 
बोलौ ना पुक-पुक पुकुर-पुकुर
जिउ धड़कै धुक-धुक धुकुर-धुकुर
मलकिन-सहुवाइन कै भाखा
नाहीं-नाहीं नानुकुर-नुकुर….
आलोचक रामचंद्र सुकुल कय मानब हय कि नाद सौंदर्य से कबिता कय आयु बाढ़त हय। अवधी कबिता मा जब नाद सौंदर्य आवत हय, ऊ अऊर बियासि जाति हय। : संपादक
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  • दहिजरा कलाही कलपावै

येक  साल ना भै बरसात
परा कलाही दिन और रात
खात-खात जिउ जाय कचाय
जोन्हरी क् रोटी कोदई क् भात
मोर भुखिया मोर माई जानैं
भरा कठौता आटा सानैं
यक्कै जूनी मिलै खाय कां
भरि कै पेट खियाय क् मानैं
सड़ा-गला गल्ला बनिया कै
लावैं रोज उधारी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

यक रोज कहारेन के टोला
चूल्ही भीतर झगरा होइ गै
मरदा बोलिस ई पेटकटिनी
भरि पेट न खाना हमैं दियै
उठि कै यक झापड़ मारि दिहिस
गुस्साय कै झोंटा खीचि लिहिस
तब दांत पीसि कै मेहरारू
नीचे से फोता पकरि लिहिस
‘दहिजरऊ मोंछ उखारि लियब
तोहरे पुरखन की दाढ़ी मा’
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

जोरू हमार सोवै जानै
बस आपन पेट भरै जानै
भुखमरी भी अइसन चीज हुवै
बिन लेहें परिच्छा ना मानै
हम फुरै कहिअ थै देखि लियौ
मुड़वारी तोपे धरे रही
राती मा तकिया फारि-फारि
यक कूकुरि रोटी खात रही 
जे सुनै उहै हँसि-हँसि लोटै
केव बोलै ना वकरे हक़ मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

भुखमरी नचावत नाच रहा
रोटी कै बन्दर बाँट रहा
देवरानी अउर जेठानी के
बीचे झगरा होय जात रहा
सब जानिअ थै तू जेस बाट्यू
दुई आँखी काम करत बाट्यू
पातर रोटी सबके आगे
मरदे कां मोट दियत बाट्यू
बनि गयू निर्दयी काव कही
बुद्धी भरभस्ट कलाही मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

संझा – भिन्नहीं रोज आवै
दहिजरा कलाही कलपावै
बनी रोटी चरी-बाजरा कै
टूका-टूका मा बंट जावै
रिरियायं गेदहरे बहुत घरे
महतारिन रोय-रोय डांटैं
भेली-ककई रस घोरि जियैं
जइसै–तइसै सब दिन काटैं
सोना के भाव सुहाय सड़ा
गल्ला मिलि जाय मजूरी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

बोलौ ना पुक-पुक पुकुर-पुकुर
जिउ धड़कै धुक-धुक धुकुर-धुकुर
मलकिन-सहुवाइन कै भाखा
नाहीं-नाहीं नानुकुर-नुकुर
कउनौ ना तरी-तापरी बा
यक्कौ धुर खेती नाहीं बा
अब करै मजूरी कहाँ जाय
सबके घर परा कलाही बा
पी लियौ पसावन चउरे कै
पायन कोटा सरकारी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

खाय बिना घर रगड़ा होइगै
सास-पतोहे म् झगरा होइगै
मिटै न खइंहस रोज रोज कै
चूल्हा मा अलगौझा होइगै
तोर नइहर मोर जाना बाय
नौ सै गदहा बान्हा बाय
खरी बात मौसी कै काजर
कहकुत बहुत पुराना बाय
बूढ़ा सुसकैं भुनभुन-भुनभुन
काकुन कूटैं काँड़ी मा
यकतनहा  कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

कहरैं, खासैं खटिया पकरे
बुढ़ऊ मिनके वलरे-वलरे
भइया कां तनी बोलाय दियौ
तू चली जाव निहुरे-निहुरे
पाँव पसारौ जेतना चादर
बाँटा पूत पड़ोस बराबर
बना चौधरी रह्या जनम भै
घर कै मुरगी साग बराबर
पेटपोछवा यक बेटवा पायन
भांग परि गवा बुद्धी मा
यकतनहा  कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

बेईमान बनियवां सत्तियार
पाथर तउलै धइ बार-बार
गुरबा-गरीब बिसहै आवैं
तौ मूड़ि लियै मूड़े कै बार
मिठुवाय कै नीक-नीक बोलै
कंठी-माला कै जाप करै
दस ढोका नोने के बदले
मउनी भै तीसी तौल लियै
दिन दूनी रात चौगुनी वोकर
लोय लगै दुर्भिच्छी म
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

एड़ी म् नाहीं फटी बेवाई
कइसै जानैं पीर पराई
वनकै बिगड़य रोज हाज़मा
पेट मोर अगियात बा माई
दुई-दुई दाना खरमिटाई
दाम बटोरैं पाई-पाई
छाती चढ़ि कै काम करावैं
हम नाहीं करिबै हरवाही
उखरि परैं मरि जायं निगोड़े
आग लगै खरिहाने मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

जोरू टोवै गठरी-पोटली
मोर माई मुंह खाली अंतड़ी
पहिले चलिकै कुछ खाय लियौ
बहु नीक बनी सेधरी मछरी
गोहूँ क् बाली गदरान बाय
दुई-चार रोज कै कसर बाय
यक लेहना काटिकै लइ आइब
जुग बीता जांत चुपान बाय
जिउ-जान से दयू अगर राखिन
हम खूब कमाब कटाई मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

भइया पाये मोटकी-मोटकी
हमरे आगे रोटी छोटकी
खाई हम मसल कै दाल-भात
वै दूध पियैं कनखी आंखी
हम सिरिज लियब बा मजेदार
आउर ना मांगब बार-बार
बचिगै थरिया मा तरकारी
दइ दियौ थोर बसियान भात
यक्कै थैली से जनम लिहेन
बेगानी हम दुई आंखी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

अपने ढर्रे अलहन बीतै
केतनौ आगे रोवै गावै
सूरज डूबे दिन डूबि जाय
भिन्नहीं उगै लइकै आवै
बड़मनई नाहीं काम करैं
कामे कै ना ही दाम दियैं
जाँगर कै काम कमाय अन्न
आपन जाँगर बरबाद करैं
लाठी भांजैं बिन मतलब कै
धरती के बोझ बयारी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

भूखे पेट कै हँसी निराली
हड्डी टोवैं राम पियारी
झौंसा मुंह दुइ होंठ झुराने
चिपकू गाले दांत चियारी
आंखी मारे बड़े बड़कऊ
ताकिस जइसै वनके वोरी
घर भै चलिकै धान निरावौ
पतरी नीक कमरिया तोरी
टूटै खूब सरापै वोकां
गरियावै मन ही मन मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

अबकी साली करमुन्नन मा
रसियाव कचौड़ी औ’ बरिया
खुब नरमानरम सोहारी-लपसी
देबै मुचौमुच्च थरिया
‘मुंह खोल कै आखत हम मागेंन
रहिगै ना तनिचौ धरम-दया
हाँ-हाँ भरिकै नहकार दिह्‌यू
तोहरे बाती कै कवन थया’
अटका बनिया कै गरज परी
तौ बेंचै माल उधारी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

सासू तोहरे जब जियत रहीं
बहु मान-मनउवल रखत रहीं
चाउर – पिसान औ’ तरकारी
हार्’हे-गार्’हे दइ दियत रहीं
अरहर-केराव-गोहूँ क् घुघुरी
उप्पर से सिखरन यक लोटा
बेझरी कै रोटी मोट-मोट
देसी घिउ कबहुं-कबहुं पोता
पट्ठा खुब नीक जवान रहेन
लढ़िया ठेली दिन-राती मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

बटुली मा दाल चुरत बाटै
जाइत ब उधार तेल माँगे
ईंन्हन चूल्हा म पझान होये
तनिका घुसुकाय दिहौ आगे
गोहूँ क् रोटी छौंकी दलिया
अरहर कै खाये जुग बीता
अक्तान बहुत अमिल्यान हयौ
धीरज धइकै निधरक बइठा
सैगर बाटै घरभै ताईं
कुलि खाबै नाहिं अकेलै मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा.

__आशाराम जागरथ

[जारी….]