Category Archives: अनूप शुक्ल

बसन्त राजा फ़ूलइ तोरी फ़ुलवारी

आजु बसंत पंचमी है। मौका बढिया है यहु गीत सुनवावा जाये। यहिका लिखिन औ गाइन हैं सीतापुर मां रहै वाले गीतकार लवकुश दीक्षित। लवकुश दीक्षित अवधी के बिख्यात कवि स्व.बलभद्र प्रसाद दीक्षित’पढ़ीस’ के पुत्र हैं। उनक्यार एक गीत टुकुर-टुकुर देवरा निहारै बेईमनवाबहुतै प्रसिद्ध है।चलौ आप यहु बसन्तगीत सुनौ। लवकुश दीक्षित जी की खुद केर आवाज मां। जिनके नेट मां गड़बड़ी है उनके खातिर लिये यहु गीत लिखि के लगावा जा रहा है।

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बसंत

बसन्त राजा फ़ूलइ तोरी फ़ुलवारी
बसन्त राजा फ़ूलइ तोरी फ़ुलवारी

मह-मह महकइ खेतवा कि माटी महकइ कियारी कियारी
बसन्त राजा फ़ूलइ तोरी फ़ुलवारी!

गदराने गोंहुंआ सरसों ठाढी ठुमकै
फ़ूली कुसुमियां पियर रंग दमकै
हरी हरी मटरी की पहरी घेघरिया
अरसी का गोटा किनारी!

बसन्त राजा फ़ूलइ तोरी फ़ुलवारी!

महुआरी महकैं अमंवा बौराने
बेर पके कचनार फ़ुलाने
बेला,चमेली औ फ़ूलइ चंदनियां
लहरै उजरी कारी!

बसन्त राजा फ़ूलइ तोरी फ़ुलवारी!

मदमाते भौंरा कली का मुंह चूमैं
रंग रंगी तितली पराग पी झूमैं
लपटी बेलि गरे बेरवा के
बप्पा की बिटिया दुलारी!

बसन्त राजा फ़ूलइ तोरी फ़ुलवारी!

बिखरी परी बसन्त की माया
बहकैं मन औ बहकैं काया
ज्ञानी गुनी बसन्त मां बहकैं
बहकैं सन्त पुजारी।

बसन्त राजा फ़ूलइ तोरी फ़ुलवारी!

फ़ाग धमार कबीरैं गावैं
ढोल झांझ करताल बजावैं
गाल गुलाल भाल बिच रोरी
होरी खेलैं बनवारी।

बसन्त राजा फ़ूलइ तोरी फ़ुलवारी!

हरि गोपी संग किशन कन्हैया
निरखैं ग्वाल पुकारैं गैया
अन्तर्यामी जसुदा के छैया
कवि लवकुश बलिहारी।

बसन्त राजा फ़ूलइ तोरी फ़ुलवारी!

-लवकुश दीक्षित

 

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लरिकउनू ए.मे. पास किहिनि

बहुत दिनन ते हियां मेम्बरी लिये परे रहन तौ अमरेन्दर बोले कि कुछु लिखहौ-पढिहौ कि खाली मेम्बरै बने रहिहौ! तौ स्वाचा कि कुछु लिखा जाये। द्याखा कि यहिमा(ब्लाग मा) लिखा है ऊ जे ‘पढ़ीस’ का पढ़िस नाय.. ‘बंसीधर’ कै बंसी ना सुनिस.. ‘रमई काका’ मा रमा नाय.. ते का जानी अवधी हमारि..यहै तौ स्वाचा सबसे पहिले पढ़ीसै का पढ़ा जाये-पढ़ावा जाये। तौ द्याखब एक ठौ कविता ’पढ़ीस’ जी केर। या कविता छपी रहै सन 1933 मां उनके कविता संग्रह ‘चकल्लस’ मा जेहिकी भूमिका लिखिन रहैं ‘निराला जी‘।

लरिकउनू ए.मे. पास किहिनि

सबि पट्टी बिकी असट्टयि मा,
लरिकउनू ए.मे. पास किहिनि।
पुरिखन का पानी खूबयि मिला,
लरिकउनू ए.मे. पास किहिनि॥

अल्ला-बल्ला सब बेचि-खोंचि,
दुइ सउ का मनिया-अडरु किहिन।
उहु उड़िगा चाहयि पानी मा,
लरिकउनू ए.मे. पास किहिनि॥

हम मरति-खपति द्याखयि दउरयन,
उइ मित्र मंडली मा नाचयिं।
दीदी-दरसनऊ न कयि पायन,
लरिकउनू ए.मे. पास किहिनि॥

महतारी बिलखयि द्याखयि का,
बिल्लायि म्यहरिया ब्वालयि का,
उयि परे कलपु-घर पाले मा,
लरिकउनू ए.मे. पास किहिनि॥

कालरु, नकटाई, सूटु-हैटु,
बंगला पर पहुंचे सजे-बजे।
न उकरी न पायिनि पांचउ की,
लरिकउनू ए.मे. पास किहिनि॥

अरजी लिक्खिनि अंगरेजी मा,
घातयिं पूंछयि चपरासिन ते।
धिरकालु”पढ़ीस” पढ़ीसी का,
लरिकउनू ए.मे. पास किहिनि॥
घातयिं=तरकीबें,जुगत
-बलभद्र प्रसाद दीक्षित” पढ़ीस”

कविता संग्रह ‘चकल्लस’ -प्रकाशित 1933

नोट : यहि पोस्ट क अनूप सुकुल जी पोस्ट किहे रहे, मुला ब्लागर से वर्डप्रेस पै लावै म तकनीकी वजह से पोस्टेड बाई म उनकै नाव नाहीं आय सका, ब्लागर वाले ब्लाग पै अहै, यहिबरे ई नोट लिखत अहन! सादर; अमरेन्द्र ..