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‘अवधी कामेडी सो’ केरी सुरुआत ‘रमेश दूबे’ से

ई बहुत खुसी केरी बाति हय कि अब अपनी अवधिउ भासा मा, निउ मीडिया मा, ‘कामेडी सो’ केरी सुरुआत होइ गय हय। ई जिम्मा उठाये अहयँ रमेश दूबे ‘रमेश्वा’। यहि आसय कय यक पोस्ट फेसबुक पै लिखे रहेन जेहिका हुयौँ रखित अही। आप सब रमेश दूबे केरी यहि कोसिस क सराहैँ औ ओनकै उत्साह बढ़ावैँ। : संपादक
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रमेश दूबे ‘रमेश्वा’

AWADHI COMEDY SHOW – का पहला प्रयास शुरू हो गया है। हिन्दी और दूसरी भाषाओं में कामेडी शो होते रहते हैं। लेकिन गाँव-देहात की तस्वीर तभी जिन्दा हो पाती है, जब उस परिवेश की भाषा में कामेडी शो किए जाएं। लोकभाषाओं में कामेडी शो हों। अवधी में यह प्रयास शुरू हुआ जो बहुत सराहनीय है।

Ramesh Dubey की एक हास्य-व्यंग्य प्रस्तुति को कुछ दिन पहले मैंने देखा था। प्रस्तुति इतनी मोहक थी कि मैंने, कई दूसरों ने भी, उसे कई-कई बार देखा। नशा यों चढ़ा कि कलाकार से बात करके ही मन माना। बात करने के दौरान मैंने उनसे कहा कि आप ‘अवधी कामेडी शो’ के, नये मीडिया में, आरंभकर्ता हैं, इसे इसी रूप में आगे बढ़ाइये। भाषा की पहचान के साथ आपकी कोशिश और महकेगी। उन्हें बात जमी। अपने अगले एपीसोड (८-वें) को उन्होंने ‘अवधी कामेडी शो’ के साथ पेश किया।

रमेश के कामेडी की सबसे बड़ी खासियत है माहौल को उतार देना। आप थोड़ी देर के लिए भूल जाते हैं कि आप किसी महानगर/नगर के किसी कमरे में हैं। उस वक्त आप वहीं होते हैं, जहाँ कामेडी पेश करने वाला आपको ले जाता है। आपका डूबना (साधारणीकरण) ऐसा होता है कि अगर आप उस माहौल में कभी रहे-जिये हैं तो उन स्मृतियों और चरित्रों को अपने नजदीक धड़कते हुए महसूस करते हैं। फिर, जैसे एक सुन्दर कविता आपसे कहती है कि आप उसे कई-कई बार पढ़ें वैसे ही यह कामेडी भी आपसे कहती है कि इससे फिर-फिर गुजरें।

कंटेंट (अंतर्वस्तु) का नयापन अपनी प्रस्तुतियों में रमेश लाते जा रहे हैं। मुझे उम्मीद है कि अपनी प्रतिभा के दम पर जिस नयी चीज़ को उन्होंने शुरू किया है और जितनी लगन से कर रहे हैं, उसे बहुत आगे ले जाएंगे। दूसरे भी इस तरह के प्रयासों को करने की कोशिश करेंगे।

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हम सबका कर्तव्य है कि रमेश दूबे जो प्रयास कर रहे हैं उसमें उनका उत्साह बढ़ाएँ। उनका सहयोग करें। उनके कामेडी एपीसोड्स को और लोगों तक पहुंचाएँ। कलाकार के लिए जन-जुड़ाव व जन-फैलाव आक्सीजन का काम करता है। इससे रमेश और ऊर्जावान होंगे। The Lallantop ऐसा नया मीडिया चैनल है जो लोक-प्रिय-रंगों को अपने अभियान में शामिल करता रहा है। मेरा अनुरोध है कि जैसे आपने हिन्दी के कामेडी शो वालों के साक्षात्कार आदि किये, उन पर नजर मारी, वैसे ही रमेश दूबे के इस आरंभिक कार्य को लखें। ~अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी.

कल रमेश दूबे का जो अवधी कामेडी शो यू-ट्यूब पर आया है, और वाइरल है, उसे आप सबके देखने के लिए यहाँ रख रहा हूँ। यू-ट्यूब लिंक यह रहा – https://www.youtube.com/watch?v=9f5epJvfwho

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दुखद ई है कि हम खुद अपनी प्यारी भासा का बोलै से हिचकिचात हन ~ ‘पद्म श्री’ बेकल उत्साही

पहिल तुलसी अवध स्री सम्मान से साथ बेकल उत्साही जी..

ई खुसी कै बाति है कि सदा सदा से बेराय दीन गयीं लोकभासन मा यहिरी कुछ सालन से अपने निजीपने का लैके चेतना लौटी है। ‘हिन्दी की बोलियाँ’ कहिके इन आजाद भासन के साथ पिछले कयिउ दसकन से बड़ी हानि कीन गै। संजोग से इस्थिती बदली। बजार ओपन भा, पूँजीवाद आवा, तकनीकी रास्ता बनइस अउर नवा उछाह आवा यहिसे। यनही सबकै नतीजा ई भा कि हाल के कुछ सालन मा लोकभासन के जियै कै नई सुगिस्ता बनत देखाति अहै। इन लोकभासन मा अब सम्मान वगैरा दियै कै उत्साह देखावा जात अहै, जेहिकै अच्छी बात यू है कि यही बहाने कुछ लोकभासौ मा जबान हीलै-डोलै लाग। पिछले महीने की पाँच (अगस्त) तारीख क संत गाडगे सभागार लखनऊ मा अवधी बिकास संस्थान की वारी से बिख्यात कबि बेकल उत्साही जी का पहिला तुलसी अवध स्री सम्मान दीन गा। सम्मान के रूप मा २१ हजार रुपया, तारीफ पत्र अउर यादगारी चिन्ह दीन गवा। बेकल जी कै सम्मानित हुअब हम सबके लिए गौरव कै बाति है। बेकल जी से मुलाकात पै यक पोस्ट हम बनाय चुका हन, जहाँ से कुछ और बातैं जानी जाय सकत हैं।

  सम्मान मिलै के अवसर पै बेकल जी कै कहब रहा : “अवधी भासा के बिकास के लिए सरकारी परयास कै बहुत जरूरत है। जैसे सरकार की तरफ से हिन्दी अउर उरदू के बिकास के ताईं तमाम संस्थै बनायी गयी हैं, वही चाल पै अवधिउ का पहिचान मिलै कै जरूरत है। दुखद ई है कि हम खुद अपनी भासा का बोलै से हिचकिचात हन। हमैं लोगन का यहिके लिए जगावै क चाही। राजनीति अवधी का चौपट किहिस है। हमैं सचेत रहै क चाही। नयी पीढ़ी अवधी क आगे लैके आए, फिलहाल हम इहै सोच के खुस अहन।” बेकल जी केरी बातन मा दर्द जाहिर अहै अवधी की दुर्दसा पै। जौनी राजनीति की चर्चा बेकल जी किहिन हैं वही राजनीति की वारी इसारा मधुप जी यक इंटर्ब्यू मा पहिलेन कै चुका हैं। ई राजनीति सरकार के थोर-मोर परयासन क अउरौ बेअसर करति अहै, मठाधीसी अउर अगुवा लोगन कै निजी सुवारथ बड़ी बाधा है। इनकै दिल भासा के बढ़ावै से ज्यादा खुद क बढ़ावै मा लाग है, यही ताईं यै लोगै अवधी भासिन के ब्यापक संख्या का लैके अबले कुछौ नाहीं कै सका हैं। सै भाठै से कुछ भला नाय हुअत। बेहतर होए कि लोकभासा के नाव पै बंबई दिल्ली कै हवा मौजत यै लोगै ई देखि सकैं कि काहे मा भासा कै भला है। इन इस्थितिन मा बेकल जी की बातैं अउरौ मानीखेज ह्वइ गै हैं। 

  बेकल जी मानत हैं कि जौनी सायरी मा माटी कै महक न होये ऊ खतम होइ जाए। बेकल जी खुदौ अपनी सायरी के दुनिया मा गाँव-सेवान के माटी कै महकि बित के डाय दिहे अहैं। वै हिन्दी/उरदू मा जौन सायरी लिखे हैं वहू मा यहि चीज कै ध्यान रखे हैं। आज बेकल जी कै यक रचना हियाँ दियत अहन, जेहिमा गाँव-गिराँव कै सुधि पिरोयी अहै:

गीत : बलम बम्बइया न जायो..

खारा पानी बिसैली बयरिया

    बलम बम्बइया न जायो..

रोज हुआँ सुना चक्कू चलत हैं

बड़ि मनइन  कै  दादा पलत हैं

टोना मारति है फिल्मी गुजरिया,

    बलम बम्बइया न जायो..

लागि  रहत  फुटपथिया  मेला

गलियन मा बिन भाव झमेला

मारै बिल्डिंग गगन का नजरिया,

    बलम बम्बइया न जायो..

दूनौ जने हियाँ करिबै मजूरी

घरबारी से  रहियये  न  दूरी

हियैं पक्की बनइबै बखरिया,

    बलम बम्बइया न जायो..

निरधन है पर मन के धनी है

हमरे गाँव  मा  कौन  कमी  है

स्वर्ग लागत है हमरी नगरिया,

    बलम बम्बइया न जायो..

[ ~ “पद्म श्री” बेकल उत्साही ]

आभार : कार्यक्रम कै सूचना भेजै मा चंदर भैया कै महती भूमिका रही, हम चंदर भैया कै आभारी हन! 

लोकभासा के नाव पै सरकारी संस्था कै झूठ दुखद है..!

यहिरी यक आधुनिक किसिम कै चलन चला अहै, कि लोकभासा/लोक-संसकिरिति/लोक के बारे मा कुछौ अगंभीर होइके बोलि दीन जात है और इन सभ्य लोगन के दुवारा अँखमुदिया सेलिबरेसन मनावा जात है। ई चलन लोकभासा/लोक-संसकिरिति/लोक का रखै/उठावै के नाव पै चला अहै, मुल ई मगजमारी कुल मिलाइ के लोकभासा/लोक-संसकिरिति/लोक कै बंटाधारै करत है। यहिसे लोक से जे जे जुड़ा अहैं उनका ई बात बड़ी गंभीरता से समझै का चाही कि लोकभासा/लोक-संसकिरिति/लोक के नाव पै जौन कुछ कहुँवौ कीन जात हुवै वहिकै ठहर के परख करैं, काहे से कि लोकभासा/लोक-संसकिरिति/लोक अमीरन क्यार हँसी-हँसारव भर न आय। यहिकी आत्मा का अगर जे न उतार सकै या जेस चाही तेस उतारै कै परयासौ न करै तौ वहिका हरगिज यहिसे खेलुवार करै कै कौनौ हक नाय है। अइसनै कुछ बड़ा काहिल परयास देखान उर्मिल कुमार थपड़ियाल के रंग-निर्देसन मा, अउर वहिपै संगीत नाटक अकादमी कै धोखाधड़ी जौन ‘अवधी प्ले’ कहिके चलाय दीन गै। 

    २९ जुलाई २०११ का संगीत नाटक अकादमी, कमानी आडीटोरियम मा ‘बहादुर कलारिन’ नाव केर यक खेला कराइस। सूचना दिहिस – ‘ए प्ले इन अवधी’। हम कुछ लोग यही सोच के गयन कि ई नाटक अवधी भासा मा खेला जये। हुवाँ गयन तौ खेला कुछ अउरै होइगा। पूरा नाटक देखे के बाद बड़ी तितकोप भै कि पूरे नाटक मा बड़ी मुश्किल से पाँच परसेन्ट अवधी बोली गै होये, नाहीं तौ कुल हिन्दिन बोली गै। यही से यहू जाहिर भवा कि केवल लोकभासा क्यार कोरम पूरा कीन गा अकादमी की तरफ से। अस काहिली दुखद है अउर सही माइने मा ई धोखाधड़ी कही जाये, जहाँ सबका लोकभासा कै खुसबू सुँघावै के बहाने बलावा जात है, औ’ हुवाँ अउरै नखड़ा देखावा जात है। यकाध पात्रन से हिन्दी बोलुवायी जात तौ ई माना जात कि चलौ जथारथ लावै के ताईं अस कीन गा होये, मुदा नाटक मा वतरौ अवधी नाहीं बोलुवाई गै जेतरी अवधी हिन्दी सिनेमा मा बंबैया लोगै बोलुवाय दियत हैं। गाना मा अवधी पुट रखि के चलावै कै परयास कीन गा जौन नाटक के साथ मिलिउ नाय पाइस। न तौ पात्रन कै कपड़ै-लत्ता वहि कसौटी पै खरा रहा, यहू मा नगर कै आभा जबरिया समोयी गै रही। सबसे दुखद ई है कि अब आगे यै संस्थै लोकभासा अवधी/भोजपुरी/छत्तीसगढ़ी आद-आद कहि के बलावा चहिहैं तौ देखैया कौने भरोसे जाये! 

    बाकी कुल मिलाइके नाटक असफलै रहा हर मेर से, जेहिपै हम ढेर न कहब, यहिके खातिर आप लोग कुणाल भाई के लेख – “हबीबी-लकीर लाँघने की असफल कोशिश : बहादुर कलारिन” – का देखि सकत हैं, जिनकी बातन से हमार सहमति है कि यक बोल्ड बिसय (‘ईडिपस कॉम्प्लेक्स’ और आत्मरति ग्रंथि यानि ‘न्यूरोसिस कॉम्प्लेक्स’) के साथ नियाव नाय कीन गा।  

रामनवमी पै हार्दिक बधाई..यक सोहर ( कंठ : शकुंतला श्रीवास्तव )..

सबका रामनवमी पै हमरी तरफ से हार्दिक बधाई ! 

आजै के दिन राजा दसरथ कै अँगना लरिकन से चहकि गा रहा। बहुत इंतिजार के बाद अवध-नरेस का लरिकन कै सुख मिला, यहि सुख मा पूरी अजुध्या सामिल है। तीनौ रानिन की खुसी कै सीमा नाय है। कौसिल्या के हरस पै तुलसीदास जी कहिन:
“ भये प्रकट कृपाला दीनदयाला कौसिल्या हितकारी
हरषित महतारी मुनि मन हारी अद्भुत रूप बिचारी। ”
संतान पैदा भये पै सोहर हुअत है। यही सोच के ई सोहर आपके सुनै खातिर रखत अहन, जेहिका सकुंतला स्रीवास्तव जी आपन कंठ दिहे हैं। सोहर मा दसरथ के अँगना के खुसी मा आपौ नहावा जाय !! सोहर सुना जाय:

अन्ना हजारे..जनता कै अदालत..‘जियौ बहादुर खद्दरधारी’(रफीक शादानी)..

हम चुनाव लड़ब तौ हारि जाब। जमानतौ जब्त होइ जाये। आज लोगै १०० रुपया, सराब कै बोतल, साड़ी अउर आन-आन समान लैके मतदान करत अहैं।
जौन मनई आज तक मुखियौ कै चुनाव नाय जीति सका, ऊ यहि बात कै सर्टिफिकेट दे कि फलाने बेइमान हैं या इमानदार? .. चुनाव लड़ौ, जनता के बीच से, फिर कुछ बोलौ, जनता से बड़ी कौनौ अदालत नाय।
~ अन्ना हजारे के ताईं नेता तारिक 
अनवर कै समझाइस
(नीचे यू-टुबहे पीस मा सुना जाय सकत है।)
     अन्ना हजारे बेसक चुनाव प्रक्रिया से जुड़ा नाहीं हैं, मुला भ्रस्टाचार के खिलाफ आवाज उठावै कै हक उन्हैं पूरा है। जनता के अदालत कै बात केतना सही मानी जाय, जब यही अदालत जाने केतना भ्रस्टाचारिन का मुसलसल जितावत रहत है, ई वही अदालत है जेहिका निरच्छर अउर सोच-बिहीन राखि के सदियन से मलाई काटी जाति अहै। यही मलाई मारू तबका कै देन है कि लोगै ईमान की तरह आपन वोटौ बेंचत अहैं, जेहकै सीधी सीधी बात अन्ना जी किहिन हैं। यहि स्थिति मा खद्दरधारी नेतन की जमात से अलग कै केहू नेतन के भ्रस्टाचार पै अंगुरी देखाये तौ इन नेतन का मिरचा लगबै करे, जेहका तारिक अनवर की तिलमिलाहट मा देखा जाय सकत है। ई देस/संविधान/संसद/बिधानसभा कै बदकिस्मती कही जाये कि यही जनता केरी अदालत से जाने केतना खूनी/कतली/बाहुबली/ठेलुहै सफलता के साथ चुनाव जीतत हैं, अपने हथकंडन के चलते। यहिलिये यहि जनता के अदालत कै सीमा है।

     समय अस है कि भ्रस्टाचार संस्कृति कै हिस्सा बनत जात है। दनादन बिकीलीक्स ! लोकतंत्र कै चौथा खम्भा कहावै वाले मीडिया कै धोखेदार चेहरा ! पढ़े – लिखे बुद्धिजीविन तक मा गहरे पैठा स्वारथ ! न केवल राजनीतिक बल्कि अकादमिकौ संस्थन मा ब्यापा परिवार-वाद ! उसूल पै जियय वाला परेसान और मखौल कै हिस्सा भर ! नाहीं समझ मा आवत कि आपन के अउर परावा के ! स्विस बैंक कै नजारा अलगै कहत है कि देसी लोगन से बड़े लुटेरे तौ बिदेसिउ नाय रहे ! यहि मौके पै कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री एच. डी. कुमारस्वामी कै कहब काबिले-गौर है कि “ आज के समय मा अगर महत्मा गाँधिउ जीबित होते तौ या तौ भ्रस्टाचार के जरिये बैंक मा पैसा यकट्ठा करते या फिर राजनीति छोड़ देते।” ऐसे समय मा  अन्ना हजारे कै सबसे बड़ी सफलता ई है कि जहाँ सगरौ कूप मा भाँग परी है, वै कम-से-कम भ्रस्टाचार जैसे मुद्दे पै लोगन का सोचै के तरफ प्रेरित तौ करत अहैं, जन लोकपाल बिल कौनौ फाइनल फतह न आय। ई तौ यक्कै डग है, खामी यहू मा है, मुक भाँग-चेतना वाले माहौल से ई कुनमुनाहट लाख गुना भले अहै!!

     नेतन के चरित पै रफीक सादानी कै ई कबिता ‘ जियौ बहादुर खद्दरधारी ’ सादानी जी के आवाज मा हाजिर है:


     
     चलत चलत यहि यू-टुबहे पीस का देखै कै वकालत करब। यहसे काफी बातैं किलियर होइहैं:

सादर;
अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी

सबका होली कै सुभकामना !! .. “ दिगम्बर खेलैं मसाने में होरी ……. ” ( कंठ : पं. छन्नू लाल मिसिर )

फोटू गिरिजेस जी के बिलाग से..

बसे पहिले तौ सबका होली कै सुभकामना !! यहि मौके पै सुना जाय पं. छन्नू लाल मिसिर कै गावा ई गीत :
दिगम्बर खेलैं मसाने में होरी ..
खेलैं मसाने में होरी
.. दिगम्बर खेलैं मसाने में होरी ..
भूत पिसाच बटोरी ..
.. दिगम्बर खेलैं मसाने में होरी ..
लखि सुन्दर फागुन छ्टा के
मन से रंग गुलाल हटा के
चिता भस्म भरि झोरी ..
.. दिगम्बर खेलैं मसाने में होरी ..
गोप न गोपी स्याम न राधा
न कोई रोक न कौनौ बाधा
न साजन न गोरी ..
.. दिगम्बर खेलैं मसाने में होरी ..
नाचत गावत डमरू धारी
छोड़ै सर्प गरल पिचकारी
पीटैं प्रेत थपोरी ..
.. दिगम्बर खेलैं मसाने में होरी ..
भूतनाथ की मंगल होरी
देखि सिहाँय बिरिज कै छोरी
धन धन नाथ अघोरी ..
.. दिगम्बर खेलैं मसाने में होरी ..

अब सुना जाय यहि गीत कै यू-टुबही प्रस्तुति:

सादर;

अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी 

सबका जलचढ़ी ( शिवरात्रि ) केरि सुभकामना ..

मोहारे के सिवाले पै माई..
सिव द्रोही मम दास कहावा।
सो नर सपनेहुँ मोहि न पावा॥
सैव-बैसनौ के बीचे रारि अपनी आँखी अपने इलाका मा नाहीं देखेन। होइ सकत है कि कौनौ समय रहत रही हुवै, तौ तुलसी बाबा यक दुसरे कै अस मेल करायिन कि रामै कहत हैं – सिउ निन्दक हमैं सपनौ मा नाहीं पाय सकत, भले अपने का हमार दास कहावत हुवै। राम के इलाके मा सिव कै खूब पुजैती है। लोगै यहौ कहत मिलि जैहैं – ‘देवन मैहाँ संकर बाटे / नदियन मैहाँ गंगा।’ गाँउ मा हर घर मा तुलसी क्यार बिरवा मिले अउर वहिके तरे छोटे-छोटे पथरन के रूप मा संकर जी मिलिहैं, यतने सस्ते मा भला अउर देउता कहाँJ
  गाँउ मा जलचढ़ी आवै के पहिलेन औरतै यक-दुसरे से पूछै लागति हैं – ’जलचढ़ी कहिया?’। जब ई दिन आइ जात है तौ भिनसारेन से तैयारी चालू होइ जात है। सुकर है कि यहि दिन कुछ खिचरी के बादौ न नहाय वाले जड़है नहाय तौ लियत हैंJ पूजा-अरचन कै समान यकट्ठा कीन जात है। संकर जी के देउथाने पै गाँउ भै जल चढ़ावत है, यही ताईं साइद जलचढ़ी बोलत हैं। संझलौके से सिउ-पूजा चालू रहति है – जथा सकती, तथा भकती। लोगै जागत हैं अउर गीत गावत हैं। यक ठवर गीत यहि तरह है:

सिउ भोले न जागैं जगाय हारी।
बरम्हा जगावैं , बिस्‌नू जगावैं ,
नारद जगावैं बजाय तारी ॥ सिउ भोले ० ॥
गंगा जगावैं , जमुना जगावैं ,
सरजू जगावैं लहर मारी ॥ सिउ भोले ० ॥
राधा जगावैं , रुकमिन जगावैं ,
गौरा जगावैं हिलाय दाढ़ी ॥ सिउ भोले ० ॥

लोक कै पुजिहर देउता सिउ के यहि तिउहार पै आप सबका हमार सुभकामना !!

जात-जात लोक गायक हीरालाल यादव कै गायी ई सिउ अस्तुति सुना जाय: 

नोट: ई गीत हमैं दीपांकर मिसिर के किरपा से मिला, यहिते दीपांकर का सुक्रिया !

सादर;
अमरेन्दर..