यक संबाद अवधी के बर्तमान दसा क लयिके

44106521_2751698151522941_1129920941124485120_nअवधी कय आज काहे यतना बे-पहिचान होइगा अहय, यहि बाति क लयिके यक संबाद फेसबुक के अवधी पेज पै भा रहा। संबाद के आधार मा अमरेन्द्र अवधिया कै यक पोस्ट रही। अवधी सीनियरन क संबोधित कीनि गय रही। ओहपै टिप्पनी करत ‘अवधी ज्योति’ अवधी पत्रिका केर संपादक रामबहादुर मिसिर सीनियरन के ऊपर धरे सारे आरोपन के जवाब मा युवा लोगन क बयान बीर औ जाने काव-काव कहिन। वहिके जवाब मा शैलेन्द्र शुक्ल औ अमरेन्द्र अवधिया आपन जवाब रखिन। ई बतकही यक दस्तावेज के रूप मा सहेजी जाति अहय। बाति अवधी पेज पै भय रही। यही आठ अक्टूबर का। पेज से अनुमति लयिके संबाद हियाँ पेस कीन जात अहय। : संपादक 
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  • यक संबाद अवधी के बर्तमान दसा क लयिके

अवधी Awadhi :  ई पोस्ट पढ़ा जाय….. दुसरे के वाल से लीन गय अहय, यहिलिये ओही केरी भासा, खड़ी बोली-हिन्दी मा, अहय! मुला बात मार्के कय कही गय अहय…..

यह सवाल उन अवधी सीनियरों से पूछिए जो आज अवधी युवाओं के सामने आने पर खदबदा जाते हैं, जद्द-बद्द बकते फिरते हैं…पूछिये कि :

जब दिल्ली में मैथिली-भोजपुरी अकादमी बन रही थी तब आपने अपनी अवधी के लिए अवधी अकादमी का सवाल क्यों नहीं उठाया? भारत की राजधानी में आपको अपनी भाषा के लिए अकादमिक प्रतिनिधित्व की जरूरत क्यों नहीं महसूस हुई?

अवध के अमेठी और रायबरेली ने भारतीय राजनीति में कितने प्रधानमंत्री दिए, किससे छुपा है! फिर भी आप राजधानी दिल्ली में अपना भाषिक-सांस्कृतिक प्रतिनिधित्व कभी नहीं सुनिश्चित कर पाए?

तब आप ‘कभी अवधी कभी हिंदी’ का गेम व्यक्तिगत लाभ के लिए खेल रहे थे, तब आप मारीसस, सूरिनाम, रूस…घूमने का मजा ले रहे थे, तब आप पुरस्कारों की घटिया राजनीति कर रहे थे, खास कर उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान में, तब आप यश लोलुप होकर व्यक्ति से आगे बढ़ कर साहित्य की सामाजिक भूमिका नहीं समझा पा रहे थे, सरकार से निजी लाभ ले रहे थे। कुछ तो गांधी-गांधी-गांधी करते पेट्रोल टंकी तक जुगड़िया लिए।

तब आप, अवधी सीनियर, अवधी ग्रंथावली जैसे छद्म-सम्पादकीय-प्रकाशकीय उत्पाद को उस नेता से लोकार्पित करवा रहे थे जिसे अवधी का अ भी नहीं आता। लेकिन वह आपकी लोलुप राजनीति की चिरकुट गोटियों के लिए तो सही था ना!

तो आज जब आप कभी-कभी चिहुंकते हैं कि भोजपुरी वाले फला-फला अवधी को अपना क्लेम कर रहे हैं, तो आप एक जोकर या जमूरे से अधिक कुछ नहीं लगते। आप जैसों का दिया हुआ रूग्ण व गतिहीन परिवेश ही था जिसमें पिछले कई दशकों में अवध की भाषिक-सांस्कृतिक चेतना इतनी खौर-भौर हो गयी कि अवध का व्यक्ति अपनी मातृभाषा भी न पहचान सके। फिर आपका भकुवाना एक स्वांग से अधिक कुछ नहीं कि यह देखो, अवध इलाके का व्यक्ति अपनी मातृभाषा को भोजपुरी काहे बोल रहा है!

भोजपुरियों को अवधी साहित्य कब्जियाने वाला कहना उनके कब्जे से अधिक आपकी अपनी नाकामयाबी, लापरवाही और निजी लाभ तक केंद्रित रहने को दर्शाता है। इसकी ईमानदार समीक्षा के लिए आप अपनी गिरेबान में झांके तो आपको शायद चुल्लू भर पानी की दरकार हो! लेकिन आपका काला दिल-दिमाग यह भी न कर सकेगा।

आभार – Amrendra Nath Tripathi केरी फेसबुल वाल.

तौ भैया, आप सब जरूर यहि बात पै सोचौ.!

रामबहादुर मिसिर  – बनिया के बगचा पै झींगुर दलाल, अइसनै लोग अवधी के बैरी हैं।उनके बरे तौ यहै कहा चाहित है.बतिया हैं करतुतिया नाही, मेहरी हैं घर खटिया नाही।सीनियर्स पै सवाल उठावै के पहिले अपने गिरेबान म झांकै।ई फेसबुकिया पहलवान दूरै से ताल ठोंकत है,आखाड़ा म कूदै क नानी मरत है।25 साल से अवधी कै खालिस पत्रिका हैदरगढ़ से छपि रही है,5-6अंक उनके लगे पठवा मुला वहिकै जिकिर को कहै नाम लेब गुनाह समझिन,अइसनै बयान बहादुर अवधी कै लोटिया बोरै म लाग हैं।जिहसे जौन सपरत है तौन करत है,तुमहू कुछ कैके देखाऊ तौ जानी बस भूसा म लाठी खोंसै जानेउ

Shailendra Kumar Shukla – का हो मिसिर जी तोहरी नजर मा अवधी बनिया कै बगचा है ?

Shailendra Kumar Shukla – “तुम करौ कवितई बंद
बुढ़उनू जगु बदला

तुम तौ पुरान बकवादी
नायिका भेद के आदी
का भूलि गएउ भारत मा
है मनइन का आजादी ?

कविता हुइ गै स्वच्छंद
बुढ़उनू जगु बदला ।”

मृगेश जी कहिन रहे…

रामबहादुर मिसिर – पहिले ई कहकुति कै भाव समझौ,मृगेश कै तू नाव सुने होब्या हम पचासन बैठकी म बतियावा है।ई कविता पर वंशीधर शुकुल दादा उनका अवधी कविता म जौन जबाब दिया हिन रहै वहौ हमरे लगे है

 Shailendra Kumar Shukla – अरे महाराज तू भावै लिखा करौ कहकूति तोहके सोभा न देत है। नेक सुझाव है ई।

Shailendra Kumar Shukla – भाषा कै भाव तोहरे बखार की तौ जजमानी न मानी जाई। बाकी तौ हम समझत अही। भले मनईन के संग 50 बैठकी ते जरूरी नाय है की बैठकबाज महान हुइ जाई। अउर बताई कि चेत जाउ की हम नाव सुनि के तोहरे सीनियरन जैसन बकैती करे वालेन म नाय हन। और न ऐसा नई पीढ़ी म कोई बकैत है।

रामबहादुर मिसिर – जौने तेवर म तू बात करत हौ ऊ उमिर ३० साल। बीते भै।तोहरी नजर म सब पुरनिया बकैत है तौ माना करौ।कूकुर भूंकै हजार, हाथी चलै बजार।अब यही बात कहिके बकैती बंद करत अही

Shailendra Kumar Shukla – अरे मिसिर जी 30 की हमारि उमिर जउन तोहके बड़ी ओछी लागत है। लेकिन असिलियत यह है कि सभ्यता की उमिर म हम तोहसे वहे तीस साल आगे हन जउन तोहके छोट सूझात है। चेत जा महाराज।

Shailendra Kumar Shukla – फिर कहकूति में मनुष्यता विरोधी धृष्टता निखर आई। छोटे लोगों से सीख लो क्या दिक्कत है, लेकिन बड़प्पन का का कीन जाय, ऊ का मानी

Shailendra Kumar Shukla – वंशीधर शुक्ल और मृगेश के बीच कविता में तोहके तोहरे पर्याप्त दिमाग भर दीखी।

Shailendra Kumar Shukla तोहरी हर ‘कहकूति’ तोहरे स्वभाव के खोल देत है प्रभू

Amrendra Nath Tripathi  – रामबहादुर मिसिर जी, अपने करतूत पै एतनौ गुमान नाय हुवय क चाही कि अंगुरी डारि-डारि के देखायौ पै आप आपन दोख न देखि पावैं। अवधी कै भला कौनौ चापलूस, दृष्टिहीन औ स्वारथी नाहीं कयि सकत। ऊ नकारात्मक माहौल भले बनवाय सकत हय। हम इन अवधी के लंपट घाघ बुढ़वन का ललकारित हय, जौन बरदास काहे होये! यहिलिये हम आप लोगन कय छिछलहर-छरछरात प्रतिक्रिया कारण समझित हय।

हां आप अवध ज्योति कै कुछ भाग हमरे लगे भेजे रहे। मुला कयिउ चीजन पै हम नाहीं लिखि सका हन। हमयं जौन तुरंत जादा जरूरी लागत हय, ऊ करय लागित हय। सोचव आप कय निगाह केतनी पतित होइ गय अहय कि अवधी के ताईं केहू कुछ करत अहय, यहिकै आकलन आप यहिसे करिहैं कि ऊ ‘आपकय लिखी चीजन’ पै केतना बोला। हद है यहि स्वार्थीपन कय!

आप यतना संकुचित अवधी बड़प्पन(?) देखावत हव कि कहय क परत हय :
“तुम बड़े भयेव तौ ताड़ भयेव… नाहक खंबा अस ठाढ़ भयौ…!’
यहि बड़प्पन के सामने हम जैसे करतूत-हीन कुकुरमुत्तै कौन खराब अहयं :
“तुम्हते तौ नीकि कुकुरमुत्ता / जो भुइं मा छतुरी गाड़े है…’
(काका केरी कविता क याद के आधार पै लिखित अहन, अनुमान कयि लिहेव!)

आपसे बहुत उम्मीद कयिके सात-आठ साल पहिले मिलत रहेन। बहुत कम लोगन के घरे जाइत हय। आपके गांव आपसे मिलै गा रहे। सोचेव तनिका कि कौन सनेह रहा होये हमरे अंदर आपके ताई! मुला आप तौ हमरे निरदोख मन क थोर चूतिया नाहीं बनायेव। आपसे मांगेन अवधी कै बुनियादी किताबन क कि अच्छे से पढ़ि सकी, आप हमका ‘बौरही कुकुरिया’, कोहड़ा, बिलार पाथर, बज्जर… जैसे लेबल कै चीज दयि के बौरहा बनाये जात रहेव। का आप वहि सनेह कै पात्र रहेव? हम तब कौन गलती किहेन रहा?

जारी … १/३

Amrendra Nath Tripathi – रामबहादुर मिसिर जी, आप अपने साथ के कयिउ मठाधीसन के साथ पिछले कयिउ सालन से मजा मारत अहयं। अपनेन मा बूड़ेव-बाढ़ेव! यहिसे केतनी प्रतिभन क पिछले दसकन मा निकरै कै मौका नाहीं बना, कब्बौ सोचेव! अवधी के चेतना कै अस्तर तुलसीदास के पूजा तक सीमित काहे अहय। बतावत हौ कि पचीस साल से पत्रिका निकारत अहव मुला अवधी के ताईं भासायी पहिचान बनावै के ताई, राजनीतिक प्रशासनिक और सामाजिक, का किहेव? भोजपुरी क बस गरियावो! आठवीं अनुसूची के ताईं हम सब बाति उठाइत हय तौ आपकै, आप जैसे अवधी मठाधीसन कै, कपार फाटय लागत है!

पूछत अहौ कि हम आप कै केतना जिक्र किहेन? सरम नाहीं आवत? हम तौ आपका २०१२ मा लखनऊ मा ‘अवधी-कल, आज और कल’ कार्यक्रम मा सादर बलुवायेन। आयोजकन से हमहीं कहे रहेन कि रामबहादुर जी कै राय जरूर लीनि जाय। ओनका सुनब जरूरी अहय। मुला आप वहि कार्यक्रम मा कौन लच्छन देखायौ। पूरे कार्यक्रम मा हमहिन क जद्द-बद्द सुनावय लागेव। आपन किताब निकारि-निकारि के नुमाइस देखावै लागेव कि जौन किहेन हमहीं किहेन। (जैसे हियौं बोलत अहौ) हमैं कहेव कि हम दिल्ली से आवा नासमझ होई। कहेव कि हमयं अवधी कै कुच्छ नाहीं आवत। काहे से कि आपसे तार्किक मतभेद रक्खत रहेन। आत्मालोचना करै कै बाति करत रहेन। कहेव कि यक ‘लउंडा’ अब हमयं सिखाये! पत्रकार अवनीश अवस्थी बताय सकत हयं, वै हुवां रहे।

हमयं पता नाहीं रहा कि आप अस परफारमेंस करिहौ, नाहीं तौ आपसे पहिलेन से बचय लागित! तब्बो हम बादि मा आपसे बातचीत के मौके पै सहज होइके मिलेन। मुला आपकै ऐंठि मानय वाली कहां। चाहत हौ सब युवा लोगय आपका भगवान मानिके पूजयं। आरती उतारयं। हमसे ई ना होये। कुछ जने करत अहयं। ओनका छापौ अपनी अवधी ज्योति मा। हमयं बख्से रहौ! बस गरियावै कै किरपा किहे रहौ, हमार भला यही से करिहैं आप।

अवध ज्योति क केतनी दाईं आपसे कहेन कि हम खरीदा चाही तौ कहां से खरीदी? कुछ नाहीं बतायेव। छापि के अपने तक धरै कै आदति अहय साइद। जैसे अवधी के तमाम बढ़िया आधुनिक कवियन के साहित्य पै आप सब मठाधीस कुंडली मारे बैठा अहयं, कुछ वैसनै!

जारी….. २/३

Amrendra Nath Tripathi – रामबहादुर मिसिर जी, अब आप लोगन कै छटपटी समझी जाय सकत हय। सोसल मीडिया आये से पहिले के तुलना मा अवधी कै यक बड़ा दायरा बनय लाग। आठवीं अनुसूची के ताईं अवधिउ वाले कुनमुनाय लागे। आप सबकै चौधराहट उपेच्छित हुवय लागि। ‘अपने मुंह ते आपन करनी’ आप बार-बार बजावैं तब्बो यहि बाजा क लोग सुनयं, जरूरी नाय। कठकरेजी के साथ अब लोगय वहि समय मा अवधी के ग्राफ के डाउन हुवय पै बोलय लाग अहयं जौनी समय मा आप सब अवधी के नाम पै केवल मठाधीसी किहेव, अवधी केर चेनता-प्रसार नाहीं किहेव। यहीते सात-आठ करोड़ अवधी जनता अपनी भासै क नाहीं पहिचानि पावति अहय। ऊ भोजपुरी कहि दियत हय तौ आप भोजपुरी क गरियावै लागत हौ। अपने गिरेबान मा नाहीं झकतेव।

आप आज ईमानदार होइके सोचौ, तौ साइद आपौ समझि पावो कि हम अवधी लोगन कै चिन्ता का हय! तब नये सवालन के साथे न्याय कयि पउबो। नाहीं तौ नये युवा लोगन कय पीढ़ी आवति अहय। ऊ बेचैनी से राह खोजे। Shailendra Kumar Shukla जैसे युवा यही पीढ़ी कय प्रतिभासाली नाव हयं, जेहसे आप अनाहूतै क उलझत अहौ। अस समझदार बेटवा अवधी माई केरी कोखी मा बहुत समय बादि जनमा होये! साधनहीन-कठिन जिंदगी जियै के बादौ अवधी पै यतनी दुरुस्त समझ औ अवधी बरे कुछ करै कै जज्बा काव हुअत हय, आप जइसे सीनियरन क यहि सपूत से कुछ सीखेक चाही।

हम कब्बौ सोचे नाहीं रहेन कि हमयं आपसे अस संबाद करेक परे। मुला आप अपनी बुजिर्गियत केरी हनक मा हर जगहीं सामने वाले कय मुंह बंद करवावै कै जेस कोसिस करत हयं ओहसे कहे बिना रहि ना गवा! यतना कहे के बाद हमरे भीतर दुख अहय। अपने भीतर झांका जये, अगर आपकै आत्मा तनिकौ बची होये, तौ यहि दुख क थोर-मोर आपौ समझि पइहैं। आभार!

३/३…..समाप्त।

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