पाहीमाफी [१८] : मजूरी नाहीं, हींसा – १

आशाराम जागरथ रचित ग्रामगाथा ‘पाहीमाफी’ के  पहिला भाग”,  दुसरका भाग , तिसरका भाग , चौथा भाग , पंचवाँ भाग , ६-वाँ भाग , ७-वाँ भाग , ८-वाँ भाग , ९-वाँ भाग१०-वाँ भाग  , ११-वाँ भाग , १२-वाँ भाग१३-वाँ भाग १४-वाँ भाग , १५-वाँ भाग१६-वाँ भाग , १७-वाँ भाग के सिलसिले मा हाजिर हय आज ई १८-वाँ भाग :

Village_Life_in_India रचना मा, सोसित वर्ग सोसन कय विरोध करै — ई बड़ी बात तौ हयिन हय, मुला ओहसे बड़ी बात हय कि ई विरोध अपने पूरे पेंच के साथे जहिराय। ई नाहीं कि यक सरलीकरन मा तमतमाय के चीजन का देखाय दीन जाय। यक उदाहरन दीन चाहित हय। अगर केहू देखे हुवय तौ यक फिलिम अहय — हजारों ख्वाहिशें ऐसी। सुधीर मिसिर के निर्देसन मा आयी। यहि फिलिम मा यक जगहीं मजूरन-सोसितन कय विरोध देखावा गा अहय। मुला साथेन यक कमाल कय चीज पकरी गय अहय। ऊ ई कि जब ठाकुर देखत हीं कि अब उनकय विरोध कीन जाये, तौ वइ बेहोस हुवय कय नाटक करय लागत हीं। हियाँ सगरौ ट्‌विस्ट अहय। अब जौन लोगय विरोध करत रहे, वइ लोगय विरोध करब छोड़ि के ठाकुर के सेहत कय चिन्ता करय कागत हयँ। ठाकुर का खटिया पै लेटाय के इलाज के ताई लयि जात हयँ। मतलब ई कि विरोध कय हर सकल, हर कोसिस, सोसकन के धूर्त मंसूबन कय सिकार होइ जात हय। ई जटिलता तौ देखात हय, हर विरोध के लहर के साथे। पाहीमाफी केरी गाँवगाथा मा मजूरन के विरोध कय आवाज, यहितरह से, पहिली दायँ आवति अहय। मजूरी नाहीं, हींसा — के रूप मा। अबही कुछ हिस्सा अगली पोस्टन मा आये। देखेक होये। ई यक बहुत बढ़िया परसंग उठावा गा हय। यहिसे पाहीमाफी कय गतिसील जीवन कय झांकी अपने हकीकत के साथे हाजिर होये। मुला, पाठक खुदै नियाव करयँ कि ऊ जटिलता, या द्वंद्वात्मकता, या ‘टाइलेक्टिक्स’, या ‘क्रिटिक’, पाहीमाफी के यहि प्रसंग मा देखात अहय?/! यहिमा दुइ राय नाहीं कि ई बहुत खास स्थल साबित होये, यहि ग्रामगाथा कय। : संपादक

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  • मजूरी नाहीं, हींसा – १ 

गोहरायन मुला जुहाते नाहीं
फूटी आँख सुहाते नाहीं
सूदै बहुत मोटान हये यक
दाईं कहे वोनाते नाहीं
खर येक वोर से जाम बाय
बीचे-बीचे मा धान बाय
बोलअ थैं खुदै निराय लियौ
हमकां नाहीं पहुँचान बाय
मूड़े पै चढ़ा चला आवत
बाटे कुलि मूर-मुरौवत मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

जमिदारी गये भवा कै दिन
लागत बा आइ गवा दुरदिन
आजा-बाबा से चलि आवा
आसामी काम करैं सब दिन
लावा कुदार जोन्हरी गोड़ी
सुनि लेबै जे केऊ बोलिहैं
जे देखै हँसी उड़ावै खुब
बड़मनई खेत खुदै जोतिहैं
गोड़त-गोड़त गोड़वै कटिगै
कुलि गति होइगै यक कोहा मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

झूठी नाहीं टूटी-फूटी
बतिया मोरी सच्ची-मुच्ची
मेहनत कै काम करैं कइसै
पूरे जवार बोलै तूती
झारत बाटे माटी-कूटी
टाँगे धोती – कुरता खूंटी
देहीं कै मइल पसीने से
बोली संग्हरी अब्बै छूटी
हमरे सबकै बढ़िया निबाह
मेहनतकस मनई-तनई मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

पसियाना अउर चमरटोलिया
छोटजतिया कुल जोरे गंठिया
मिलि कहैं बढ़ाय मजूरी द्या
यक रुपिया उप्पर दुपहरिया
घाऊँ-माऊं चौं-चौं- चाई
चार आना हमकां ना चाही
जे टूका से संतोष करी
पूरी रोटी कइसै पाई
मरि जाबै खाय बिना चाहे
अबकी फइसिला यही दम मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

दक्खिन टोलिया बोली-ताना
भुन भुनभुनाय भुन पसियाना
करिहैं ना काम कहाँ जइहैं
चुन चुनचुनाय चुन ठकुराना
घर से निकरब भारू होइगै
बाहर-भित्तर मेहरारुन कै
चउवा-चांगर अब कहाँ जायं
सीवान-खेत कुलि ठाकुर कै
फेंचकुरी छगड़िया मिनमिनाय
घेंटा घें-घें-घें बाड़ा मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

मरि जात्यौ सभै खाइ माहुर
उल्टा-पुल्टा लटक्यौ गादुर
बोले टेटियाय ‘बहदुरा’ से
मोछी पै ताव दिहे ठाकुर
करिबौ ना काम काव खाबौ
ई गाँव छोड़ि कहवाँ जाबौ
काहे बौरान मतान हयौ
समझाये बिना मान जात्यौ
मिलि बैर किहौ घड़ियाले से
मानौ रहिबौ ना पानी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

मनबढ़ा ‘बहादुर’ बरबराय
समझै ना बात सुनै यक्कौ
बिन रुके बढ़त गै चलत-चलत
ताकै, डेराय नाहीं तन्चौ
ज्यौं चिढ़ी ठकुरई ठाकुर कै
नेकुना रहि-रहि फूलै-पचकै
दउराय कै गटई पकरि लिहिन
घमकाइन मुक्का पीठी पै
भन्नान ‘बहदुरा’ चढ़ि बइठा
दुहराइस सोंटा गोड़े मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

बाबू साहेब लंगड़ात फिरैं
केसे वै कइसै काव कहैं
सूदे से खाये मार रहे
पीरा कइसै बरदास करैं
पटिदारी कै मुच्छड़ काका
बोले तनिकी यहरी ताका
पुरखन कै नावं डुबाय दिहौ
बड़का जमिदार बना बाट्या
मरि जात्या डूबिकै बाप-पूत
भरिकै चुल्लू भै पानी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

यक्कै थैली कै खान-दान
अपसै मा ना झगरौ जवान
इरखा दुसमनी कां समझावै
खतरे मा बाटै आन-बान
सन्हें-सन्हें, काने-काने
गोलबंदी होइगै ठकुरहने
मौके मूड़ी कुचला ना गै
चुकिहै ना पाछे पछिताने
मुंह बान्हें मिलौ-जुलौ सबसे
बतिया ना पहुँचै थाने मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

लुप लुपुर-लुपुर दीया-बाती
नाचै कपार साढ़े साती
बइठका मां सबकां समझावैं
नब्बे साली बेवा आजी
वनहूँ सबके लरिके-बच्चे
वनहूँ के पेटे भूख बाय
आसामी दादा-बाबा कै
हमरे हिल्ले उम्मीद बाय
छिन जाई नाहीं राज-पाट
‘दुपहरिया’ येक रुपल्ली मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

बोले ‘मुंहबोले’ मिन्न-मिन्न
उठिकै भागे तिनमिन-तिनमिन
घर-आँगन कै सासन देखौ
मरदेन के बीचे बोलौ जिन
यक रुपिया माँग मजूरेन कै
सीधे जौ मान लियब वनकै
चढ़ि लेइहैं मनबढ़ मूड़े पै
रहिहैं कुलि खड़ा रोज तनकै
रिरियाने खुला खजाना बा
गुर्राने फूटी कौड़ी ना
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

जोरा – जोरी, सीना – जोरी
चिट भी मोरी पट भी मोरी
सूदन के मुंह अब के लागै
बेवजह करै तोरी – मोरी
जौ बीचे मा परबतिया जौ
धाने जइसन डउंरा – डउंसी
बस तड़े रहौ पहिचान करौ
लंका ढाहे घर कै भेदी
काली थान्हें पूजैं मजूर
हमरे सब पूजब थान्हें मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

भिनसरवैं से छिनरी-बुजरी
‘नेता’ से खूब लड़ै मेहरी
घर-बार बहारै बरबराय
निहुरे-निहुरे लइकै कुचरी
सबकै संती दुसमनी लिहेव
अगुवान हयौ नाहीं सोचेव
मुरदेन कै फउज जुहाये हौ
कामे नाहीं अइहैं यक्कौ
ठकुराइन तुहैं बोलाइन हैं
बेजा नाहीं बा माफी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

बहिन के घर मा भाई कूकुर
ससुरे घरे जमाई कूकुर
मूँछ रखाये कवन नफा जब
पूँछ हिलावै बनिकै कूकुर
सुनिकै अकच्च ताना-बोली
छगड़ी-बकरी जनता भोली
आपन तौ बीत-बिताय गवा
हम ना बोलब तौ के बोली
जिन्नगी नरक वइसनै बाय
मरि जाबै पर-उपकारी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा.

__आशाराम जागरथ

[जारी….]

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