पाहीमाफी [१७] : तिरिया-गाथा (३)

आशाराम जागरथ रचित ग्रामगाथा ‘पाहीमाफी’ के  “पहिला भाग”,  दुसरका भाग , तिसरका भाग , चौथा भाग , पंचवाँ भाग , ६-वाँ भाग , ७-वाँ भाग , ८-वाँ भाग , ९-वाँ भाग१०-वाँ भाग  , ११-वाँ भाग , १२-वाँ भाग१३-वाँ भाग १४-वाँ भाग , १५-वाँ भाग१६-वाँ भाग के सिलसिले मा हाजिर हय आज ई १७-वाँ भाग :

“एक पूरा गुज़रा हुआ संसार प्रकट कर देते हैं आप. गुज़रा हुआ भी क्यों? आज भी यह कही का वर्तमान है बस हम छिटक गये हैं उससे पर हमारे भीतर वह आज भी वर्तमान सा ही मौजूद है.”
शिव मूर्ति 
वरिष्ठ कथाकार

sssss ऊपर दीन कथन बखूबी पहीमाफी कय बिसेसता बतावत हय। ई बात पाहीमाफी कय पढ़ैया महसूस कयि सकत हय। कहा गा बाय कि जौन दुनिया आजौ मौजूद बाय, ऊ काहे नाहीं देखात फिर दुसरी जगह? खुद सिउमूरति जी के हियाँ ई दुनिया अहै, तब्बो का यही तिना देखाति हय? 

बात ई हय कि दुनिया देखाब औ अनूदित रूप मा दुनिया देखाब दुइनौ मा बहुत अंतर अहय। गाँव पै बति करब औ गँवार होइ के गाँव पै बाति करब, दुइनौ मा अंतर होइ जात हय। गाँव पै बाति करब अऊर गंवार होइ के गाँव पै बाति करब दुइनौ मा अंतर हय। बिना होये बाति करय पै लागत हय कि केहू बहिरवासू मनई गाँव पै बाति करत अहय। आशाराम कय खासियत ई हय कि वइ गाँव पै बाति, गंवार होइ के, गाँव केरी भासा मा करत हयँ जेहिसे ऊ पूरा संसार प्रकट होइ जात हय। जेहिकय चरचा सिउ मूर्ति किहे अहयँ। 

तिरिया गाथा के दुइ हिस्सन क आप पढ़ि चुका हयँ। ई तिसरका आय। यहिमा अबरन समाज कय मेहररुवन के बारे मा बयियावा गा अहय। यइ कयिसे जीवन जियत हयँ। सबरन समाज से हियाँ जादा आजादी हय। यइ कम मजबूर हयँ। यइ तनिका बोल्डौ होइ जात हयँ, हौके-मौके। तौ पढ़ा जाय ई भाग : संपादक
_________________________________________________________________________

  • तिरिया गाथा -३ 

ठाँवैं – ठाँव फाटि बाटै
कथरी लायक धोती बाटै
सूई मा डोरा नाय दियौ
हमरे देखात नाहीं बाटै
गोनरी बिछाय हम सोई थै
राती मा गड़े पै रोई थै
रूई वाला गुलगुल गद्दा
सपनेव मा नाहीं देखी थै
यक धोती बची बाय खाली
फूटी कौड़ी नाहीं घर मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

बूढ़ी देहीं मा कवन दम्म
ताले के खाले भंछेन हम
चीरेन सरपत से मूज खींचि
फिरु कासि काटि झुरुवायन हम
यक बड़ी सिकहुली रंगदार
बीचे-खूचे मा फूलदार
बहिनी पुरुवाय लियौ थोरै
दीदा बेकार होइगै हमार
हम रहेन अवांसे नीक-सूक
कनपातर होइगै बीचे मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

भागौ बहिनी कछु ना बोलौ
सुनि ल्या कतहूँ ना किह्यू जिकर
बड़की बखरी मा नधा बाय
दुइ दिन से करकच-दहकच्चर
छोटकी पतोह विधवा बाटै
पेटे मा लिहे पाप बाटै
सासू से लड़त पुरहरे बा
कि तोहरे जाती भै बाटै
ना सूई-फार करब अबकी
करियान रहब हम कोठरी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

नाउन भउजी बखरी कै खास
आइन दौरी वै बदहवास
गोहराय कै बोलिन हमहूँ से
बेवा रानी चलि बसीं आज
गोली से भरी रही पिस्टल
जानिन कि धरी बाय छूछै
खटका दबि गै अनजाने मा
छतिया छलिनी-छलिनी होयगै
देखतै-देखत हमरी आंखी
गिरि परीं धड़ाम जमीनी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

भइंसिया खड़ी बम्मात बाय
गइया नाहीं पगुरात बाय
पिल्लन के साथ कुकुरियौ अब
घर छोड़ि कहूँ कां जात बाय
मुसरी बोलै चू-चू- चू-चू
नरदहा छछुंदर चिक-चाऊं
करखही बिलरिया देखे बा
पंजा मारै माऊं – माऊं
सनपाती पड़िया भोकरत बा
मूड़ी उठाय कै बां-बां- बां-बां
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

बेवा बूआ गुस्सान रहीं
आयीं औ’ चली गयीं जल्दी
बइठका म बइठा घिरा हये
थान्हें कै बड़े दरोगा जी
वै कहअ थैं चीर-फार होई
बड़के मालिक रिरियात हये
केव कहत बा मान गये बाटे
अब खुदै फुकावै जात हये
तर-उप्पर मनई जमा हये
सरसौ ना गिरै जमीनी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

छोटजतियन मा यक चीज बाय
कुछ चीज बहुत ही नीक बाय
मेहरारू मर्द बरोबर हैं
बस बहुत गरीबी–भूख बाय
चूल्हा – चाकी वनके माथे
बाकी मिलि काम करैं साथे
हँसि बोलैं खूब मजाक करैं
मनसेधू लाग रहैं पाछे
बीड़ी दागैं पीयें बिचरैं
घर-बार, खेत-खरिहाने मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

बम-बम बमचक हुम्मी-हुम्मा
घप घपर- घपर घम्मी-घम्मा
कइंचारी से मारै दउरे
तब उहौ उठाय लिहिस गुम्मा
गरियाये पै गरियावै ऊ
वै कहे तुहैं नाहीं राखब
ऊ कहिस खुदै हम भागि जाब
रहि जाबा तू तकतै – ताकत
फिर गये मजूरी करै दुवौ
मनहग होइकै दुइ घंटा मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

कुच्छौ ना खेती-बारी बा
बस खाली खाल्ह मजूरी बा
गै भाग बियहुती नइहर से
जोरू अब बहुत ज़रूरी बा
लूली-लंगडी, कानी-खोदर
धमधूसर – बेवा – बदसूरत
करिया-गोरहर देखबै नाहीं
मिलि जाय कामकाजी औरत
तजबीज धरउवां लाय दियौ
नाते के नात पनाते मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

ना अनवइया ना पठइया
नाहीं आये हमरे भइया
माई कां बहुत मोहान हयन
हमका तू जाय दियौ अइया
तू हयू पतोहा जेस बाट्यू
मानौ पाले बाट्यू चक्कर
दुइ-चार महिन्ना बीतै ना
रट्टा मारौ नइहर-नइहर
जा रात भरे कां चली जाव
जायू ना मुला अकेले मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

परिवार भरा – पूरा बाटै
खाते-पीते घर-बारी हन्
घूंघुट के बहिरे ना देखेन
दुइ लरिका कै महतारी हन्
गरमी मा घुसा रहौ घर मा
बेना हाँकौ तौ जिउ जुड़ाय
जाड़े मा सूरज कै दरसन
पावै तब अँगना मा घमाय
नइहरे के वोर ताकेन नाहीं
आयन जब से हम गवने मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

सूदेन मा सूद यकतौ अछूत
हम जाति हई मेहरारू कै
घर से बहिरे तक रोज खटौ
ना नावं – निहोरा कामे कै
कपड़ा-लत्ता, लरिकन ताईं
पइसा जोरी पाई – पाई
वै काम करैं अवतै गरजैं
गरियाई , मारी हम जाई
पाती बटोरि चूल्हा फूँकी
वै गप्प लड़ावैं मरदेन मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

बढ़इन से बोलिन सहुवाइन
आइन नाहीं घर परताइन
घर मा हमरे लल्ला आये
यक्कौ दिन सोहर ना गाइन
धोय उठइया धोबयिन लाइन
काम किहिन धगरिन निपटाइन
नेग मा धोती–लोटा–थरिया
मागैं नाउन अउर कहायिन
साहू सूम कछू ना बोलैं
बइठा रहैं दुकानी म़ा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

हम जाब चरावै ना छगड़ी
माई ! पिरात बाटै पेटवा
दुई मूका दादा मारिन हैं
औ’ पकरि क् नोंच लिहिन झोंटवा
लत्ता नाहीं यक्कौ बित्ता
फटही-चिटही लुगरी पायन
वै कर्र से फारत देखि लिहिन
पूछे पै नाहीं बतलायन
कपड़ा हाथे से छोरि लिहिन
घमकाइन जोर से पीठी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

कइसै बोली औ काव करी
बस दागै दाग लाग कथरी
दौराइन मारि कुकुरिया कां
जानिन कि उहै रही वोलरी
कुछ काम करै कां जब कहिहैं
तू कह्यू बहुत बीमार बाय
दुई-चार रोज कै रोग महीना
मा जिउ कै जंजाल बाय
लरिका होइत ना छूत हुवत
हम जाइत रोज मंदिरे मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

पूत जनम लै लोलक लइया
बाँटौ धान बटोरौ पइया
ताले भइंसी बोह लियत बा
मेंड़े दूब चरत बा गइया
अड़ुवा बैल बहेड़ुवा पूत
बाप बनैं कां सउक अकूत
लरिका पै लरिका लेहँड़ा भै
मेहरी कै देहियाँ गै सूख
घूमौ लट्ठ बजाओ गाओ
घुसा जमोगा सउरी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

जायं जहाँ भी डाढ़ा रानी
बरसै लागै पाथर पानी
आगी ताईं घर-घर भंछेन
सबकै बोरसी रही बुतानी
दाल बनायन भात बनायन
घोर्रइया कै साग बनायन
खाये नाहीं टिनुक गये वै
अपने सकि भै बहुत मनायन
रात भै सोवा रहे कोरउरे
बासी खाये भिन्नहीं मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

(घोर्रइया : एक तिलहन जौन अब नाहीं बोवा जात / कोरउरे : भूखे / 
भिन्नहीं : सुबह)

चूल्हा-चौका बरतन-कुरतन
गिरहस्ती मा डूबा तन-मन
ब्रत करवा चौथ निराजल छठ
घर-आँगन भजन-भाव- किरतन
दहलीज़ पार लछिमन रेखा
मिटये न मिटै भाग-लेखा 
कोठरी कै रोसनदान खोलिकै
दुलहिन पढयं हाथ-रेखा
कुच कुचुर-पुचुर कुचकुच बोलै
चिरई बखरी के पिंजरा मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा.

__आशाराम जागरथ

[जारी….]

Advertisements

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s