पाहीमाफी [१६] : दीवाली

आशाराम जागरथ रचित ग्रामगाथा ‘पाहीमाफी’ के  “पहिला भाग”,  दुसरका भाग , तिसरका भाग , चौथा भाग , पंचवाँ भाग , ६-वाँ भाग , ७-वाँ भाग , ८-वाँ भाग , ९-वाँ भाग१०-वाँ भाग  , ११-वाँ भाग , १२-वाँ भाग१३-वाँ भाग १४-वाँ भाग , १५-वाँ भाग के सिलसिले मा हाजिर हय आज ई १६-वाँ भाग :

paint-diwali-diyas-lilcreativekidsदीपावली आय आज। दीवाली क लयिके मेर-मेर कै कविता देखय का मिलत हय। ज्योति केरी बड़ाई मा। लोगय लछिमी माई से धन-धान्य से घर भरय कय बिनती करत हयँ। गरीब-गुरबौ अरदास करत हय माई से। मुला माई धनिकन क धन दिहे जाति हयँ। उइ असर्फीलाल बनत जाय हयँ। गरीब लंगोटीलाल बनिके रहि जात हयँ। रमई काका व्यंग्म मा कहे रहे : 
लछिमी धनिकन की देवी हयँ
जिनके उइ सदा सहारे हयँ
दीनन के दीनानाथ बंधु
जिनके उइ सदा पियारे हयँ!
गरीब-कचोट हय उनकी कविता मा — हमरी कुटिया मा न आईं / का चली गयीं ऊंची महलन? जागरथौ कहत अहयँ :
खेती-बारी ऊँची जात
उनके घर लछिमी कै वास!

जागरथ केरी कवितन से दीवाली कय जादा चौड़ी दुनिया देखी जाय सकत हय। पूरा गाँव अहय। जिता-बिरादर मा बंटा। सबके ताईं तिउहार यक्कै नाईं नाहीं ना। यक घर ऊ अहय कि सब गांजा बाय। दूसर घर ऊ अहय कि अकाल बिराजा बाय। दियौ-दियाली लियै कय जोग नाहीं बनत। सामान बेचय आयी मनिहारिन से माई कहत हयँ कि हमरे मोहारे काहे झोली उतारति अहव। हमरे लगे कुछू अहय नाहीं। मनिहारिन कहत हय : 
बोलिन चुरिहारिन पहिरइबै
पइसा रही उधारी मा..

दीवाली कय कहीं जादा चौड़ी, मार्मिक औ हिरदय-छू तस्वीर देखा जात, पाहीमाफी -१६ मा. : संपादक
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  • दीवाली

सीलन से लोनियाई भीत
माई छोपिन माटी नीक
बोलिन आवत बाय देवाली
कोना-आँतर डारी लीपि
दादा भैंसिन कां नहुआइन
तेल नीम कै खूब लगाइन
नवा-नवा पगहा बरि कै वै
बैलन कां घुँघरू पहिराइन
नीबी के पाती कय धुइंहर
फिन सुलगाइन घारी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

मुँह मा पान माथ पे बिंदिया
होंठे झुलनी झूलै बढ़िया
झौली मा चुरिहारिन बेचैं
चुरिया, लाल-बैगनी-करिया
माई आइन दौड़ी-दौड़ी
काहें हयू उतारत झौली
अबकी जाव दुबारा आयू
गाँठी मा ना पइसा-कौड़ी
बोलिन चुरिहारिन पहिरइबै
पइसा रही उधारी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

आधे कातिक दीया-दीवाली
दस दिन अगवैं से तइयारी
फूलि कै कुप्पा गेद-गेदहरे
बड़ा घरौंदा अबकी बारी
चचा कोंहार कोंहारिन चाची
धइकै मूड़े झौवा-खाँची
मेर-मेर माटी कै बरतन
बेचैं चौका-बेलना, घाँटी
लाल- ललछहूँ चमकै गुल्लक
सोंधी खुशबू हाँडी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

भउजी ‘पुरबहा’ मगन घूमैं
अबकी दीवाली ‘वै’ अइहैं
साड़ी-साया हमरी ताईं
लरिकन ताईं कपड़ा लइहैं
बोलिन ‘उतरहा’ तू जेस बाट्यू
बस बनी ठनी बइठी बाट्यू
अइहैं केऊ का छोरि लेई
यक्कौ ना काम करत बाट्यू
छोटकी बोलिस बप्पा अइहैं
पहिली दाईं देखब वनकां
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

बड़कना बहुत ही बात करै
लरिकन के बीच गुमान करै
छुरछुरिया औ हाथी-घोड़ा
बप्पा लइहैं झोरा भरिकै
आये वै दूनौ हाथ मलत
अब काव कही कइसै बोली
हम सोवत रहेन बर्थ उप्पर
सारा समान होइ गय चोरी
धइ ल्या ई रुपिया बचा बाय
जो धरे रहेन हम जेबी मा 
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

खेलैं लरिके, जाँत-जंतोली
बोलैं, तुतलाय बोल बोली
भुरभुरी धूरि मुट्ठी बान्हें
पीसैं पिसान भरि-भरि झोली
का जानी पइसा – कौड़ी हम
दीया-दिवाली रोज अगोरी
कोइला, खड़िया-माटी, गेरू से
खींच-खांच कै बनै रँगोली
लिहें तराजू , पलथी मारे
कंकर तौली राही मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

भोंपू, भरकी , कोसा-कोसिया
दिवली, परई , भुरका , मेलिया
यक जोड़ा माटी कय दवात
दुई आना मा बढ़िया-बढ़िया
ओखरी माँग कै लाइन माई
घपर-घपर घप किहिन कुटाई
बनि कै भै चिउरा तइयार
जड़हन भूजि बनाइन लाई
खइलर लइकै अइया बइठीं
माठा मथैं दुधहंड़ी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

धुँधलहा साँझ, अम्मावस दिन
घाँटी बाजै टिन-टिन-टिन-टिन
दिवली मा बाती-तेल डारि
अँगना बीचे बारी गिन-गिन
डेहरी, कंड़िया, चूल्हा, चाकी
ड्योढ़ी, कोठरी, खेती, बारी
लौ लुपुर-लुपुर लुप-लुप लउकै
कूँआ, खूँटा, चन्नी, घारी
यस जरै तेल कडुवाय आँख
लइ बस्ता पढ़ी ओसारी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

गहरान रात भै अन्हियारा
खेते मा लइकै लुक्काड़ा
आगी से सब खिलवाड़ करैं
नाचैं जइसन कि बनजारा
चहुँवोर दिवाली चकाचक्क
मन ही मन मनवा मसमसाय
जुग-जुगुर-जुगुर जुगुनी चमकै
कुचपुचिया तरई कुचपुचाय
कहुँ आग न पकरि लियै छपरा
जिउ जरै-बुझै अंदेशा मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

दक्खिन टोला, तुम्म–तड़ाका
जोर-जोर गरियावैं काका
घर मा खाय क ठेकाना नाहीं
लरिकै मागैं बम-पड़ाका
खेती-बारी, ऊँची जात
वनके घर लछमी कै वास
छूत मनावैं देवी-देवतै
गोड़ धरे पै मारैं लात
हमरे सब कय दिया-दिवाली
हरवाही – चरवाही  मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

ऊ देखा, ऊ हमरा गाँव
घी कै दीया ठावैं ठावँ
हमरे टोलिया मा अन्हियारा
सोवै रोज पसारे पाँव
वोसे कहिअ थै जात्या बखरी
रहत्या सुख से कोठरी-कोठरी
ऊ बोलअ थै नाहीं जाबै
हुआँ धरा बा गठरी-मोठरी
भागब ना पुश्तैनी घर से
पड़ा रहब सन्नाटे मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

हर खेते दीया जुगुर-जुगुर
ऊपर तरई कै खुसुर-पुसुर
कनफोडू शोर पटाखा कै
गूंजै रहि-रहि, जिउ धुकुर-पुकुर 
चक-चकाचौंध चहुँवोर शोर
कहूँ लुकाने चाँद – चकोर
आपन ‘शुभ-काम’ जगावैं सब
वहि दिन तौ चोरी करैं चोर
गै दिया-दिवाली कोने मा
कुलि बारह रोज डिठौने मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

आँखी अम्मावस कै कजरा
वोरमा मुँह लिहें रहे वोलरा
पूछेन गोहराय काव होय गै
नौकरिहा कहाँ हये पसरा
बोले कि वोई तौ लाय रहे
कुछ खेल-खेलौना यक झोरा
हमरे बुढ़िया कां सउक चढ़ा
ऊ रही दगावत बम-गोला
वै पकरि कै आग छुवाइन जेस
फट गै बम-गोला हाथे मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा..

__आशाराम जागरथ

[जारी….]

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