पाहीमाफी [८] : बियाह-गवन, गीत-गवनई

आशाराम जागरथ रचित ग्रामगाथा ‘पाहीमाफी’ के  “पहिला भाग” ,  “दुसरका भाग”  , तिसरका भाग , चौथा भाग , पंचवाँ भाग , ६-वाँ भाग७-वाँ भागके सिलसिले मा हाजिर हय आज ई ८-वाँ भाग :

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अनायासपन क पहीमाफी कय खासियत समझौ। कौनौ जबरी कय बौद्धिक कसरत न तौ कवि अपने वारी से करे अहय न दुसरे पढ़ैयन से यहि कय माँग करत हय। सादगी मा जागरथ कमाल करत हयँ। कवितन से गुजरत के लागत हय, जे गाँव से अहय वहिका ढेर, कि अरे वाह, ई सब तौ होतय रहा, देखव हम केतना भुलाइ ग अहन। यादन   कय बिजुरी जहाँ-तहाँ चमकय लागत हय। पढ़त के हम हुवयँ पहुँचि जाइत हय जहाँ कय बाति औ बरनन कीन जात हय। मजेदार बाति ई अहय कि जागरथ कविता मा तमाम चीजन कय नाव भर नाहीं गिनौते, ओन का रखय मा कविताई कय छीज-बट्टा हुवय से बचायेउ रहत हयँ। चीजन कय जिक्र, नउनौ, उबियावत नाहीं बल्कि अपने साथे ‘कविताई कय कुतूहल’ लिहे पढ़ैया कय चित्त लोभाय लियत हय। जइसे, फोंफी कय जिक्र वै अस करत हयँ कि कयिउ फोंफी वाले चेहरय आपके निगाही मा नाचि जायँ। फूलगोभी से वहिकय उपमा केतनी नयी अहय :

सोने कै बड़ी- बड़ी फोंफी
जैसन डड़ियाय फूल गोभी

उपमा तौ उपमा, डड़ियाब – क्रियौ आपन ब्यंजक असर छोड़त हय! : संपादक
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  • बियाह-गवन, गीत-गवनई

हमरे घर मा परा बियाह
चहल-पहल औ’ खुसी-उछाह
नात-बाँत औ जात बिरादर
गावैं थरिया-सूप बजाय
घर मा मेहरारुन कै भीर
गावैं लचारी धोबिया गीत
चमकै सेनुर, टिकुली माथे
कमर मा करधन नाके कील
मिल-जुल कै सब रोटी पोवैं
गारी गावैं आड़े मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

कड़ा-छड़ा गोड़े मा लच्छा
काने तरकी लागै अच्छा
केहू के होठे झुलनी झूलै
करियहियाँ चाँदी कै गुच्छा
सोने कै बड़ी- बड़ी फोंफी
जैसन डड़ियाय फूल गोभी
हाथे मा टड़िया गले हवेल
गुलुबन्द–मुनरी औ पहुँची
हँसुली-बिछिया अउर पछेला
पहिरैं कामे काजे मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

बड़के घर मा परा बियाह
बदला मालिक कै व्यवहार
लगा रहैं सब मनई-तनई
बाहर-भीतर नाऊ-कहार
मीठ-मीठ बोलैं बतियावैं
हरवाहे कां काम बतावैं
कबहुं-कबहुं झक्काय जायँ तौ
बड़के बेटवा कां गरियावैं
ई ससुरा अब नाक कटाई
घुसा रहअ थै चूल्ही मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

वनके शादी म बहुतै खरचा
जबकि बेगार करैं परजा
घर से लइकै जनवासे तक
वै साफ करैं लइकै कुचरा
बस खाय के बदले काम करैं
अपने घर काम अकाज करैं
काटैं लकड़ी, चीरैं चइला
नाची ताँईं ढोवैं तखता
चाहे अपुवां भुइयैं सोवैं
खटिया दइ दियैं बराती कां
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

तेलवानी भतवानी बाद
आय वियाहे दिन बारात
हाथी चढ़ि कै दुलहा आय
लइकै साथ पतुरिया नाच
पहिले भवा दुवारे क चार
गायिन समधिन घूँघुट काढ़ि
गाँव कै बिटियै औ मेहरारू
मारैं मिलि बीरा दुइ-चार
परि गै झीन भरे कय जौ
सहिबाला के आँखी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

होत वियाह भवा भिनसार
बड़हारे दिन शिष्टाचार
परिचय पावैं दूनौ पच्छै
जनवासे मा करैं विचार
कुआँ पड़ा केवड़ा-जल महकै
अतर कै खुशबू गम-गम गमकै
मिसिरी, पान, गरी कै गोला
बाटैं मेवा थोड़ा-थोड़ा
हमहूँ टुकुर-टुकुर सब देखी
बइठा यकदम कोने मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

बहुत बाय खजुवात गदोरी
पंडित बाबा दियौ मजूरी
हमहूँ अपने घर कां जाई
ना करवावा बहुत चिरौरी
बड़की बिटिया क गवन ठना बा
घर मा यक्कौ दाना न बा
मिट्टी मा इज्ज़त मिलि जाई
तोहरे दया से जवन बना बा
पाँच जने कुलि अइहैं आनैं
पठइब यक ठू धोती मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

दौरा-दौरा बड़कना आय
बोला कि गयन रहा घासी
बम्बई से मौसा आवत हैं
साथे मा मौसी भी बाटीं
बक्सा मूड़े लादे-लादे
केव आउर बा वनके साथे
चमकौवा कपड़ा लाल-लाल
पहिरे मुनिया बइठी कांधे
घर जल्दी चला बोलाइन हैं
दीदी भेजे बाटीं हमकां
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

बहुतै कम उमर हमार बाय
दादा के सिर पै बोझ बाय
गवने कै चीज जुहान बाय
गोड़े मा चप्पल नाहीं बा
यक तौ डर ऊपर से शरम
हम कहिबै वै ज़रूर डटिहैं
काकी तू कहि द्या दादा से
नीकै-बेकार खरीद लइहैं
माई हमरे ज़िंदा होतीं
ई दिन ना होतै झंखै कां
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

लोक-नृत्य चाहे संगीत
सूद-चमार , निभावैं रीत
अहिरौवा-चमरौवा नाच
धोबी गावैं धोबिया गीत
राम बकस साथिन के साथ
नाचैं खूब कहरवा नाच
डुग-डुग-डुग-डुग हुड़का बोलै
झन-झनाझन बाजै झांझ
कउनौ लोक-कला ना देखा
बाभन-ठाकुर-बनिया मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

धनरोपनी, निरवाई गीत
‘जंतसारा’ जाँता-संगीत
मेर- मेर कय होय गवनई
जइसन मौसम, वइसन रीत
‘मल्लहिया’ मल्लाहे गावैं
गंगा-गीत कै राग सुनावैं
गावैं झूमि चमार ‘चनैनी’
‘नौवा- झक्कड़’ नाऊ गावैं

‘बंजरवा’ औ तान ‘नयकवा’
तेली टेरैं रागी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

__आशाराम जागरथ

[जारी….]

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