पाहीमाफी [७] : परदेसी कै चिट्ठी-पाती

आशाराम जागरथ रचित ग्रामगाथा ‘पाहीमाफी’ के  “पहिला भाग” ,  “दुसरका भाग”  , तिसरका भाग , चौथा भाग , पंचवाँ भाग , ६-वाँ भाग , के सिलसिले मा हाजिर हय आज ई ७-वाँ भाग:

‘पाहीमाफी’ अब काफी उठान पै आइगा बाय। जे रचना से लगातार जुड़ा होइहैँ ते जानत होइहैं कि जौन हियाँ अहै ऊ अन्तै नाहीं। कयिउ उत्साह बढ़ावै वाली टिप्पनिउ मिलति अहयँ। आज हम ऐसनै यक टीप का हियाँ रखित अही, जेहिमा पाहीमाफी के रचनात्मक खूबी का हिगारा गा अहय:
capture-20170319-125648         “बहुतै गंभीर विवेचना क माँग करत है आशाराम जागरथ जी कै इ छोटी सी कविता। ई बतावत है कि ऊँच-नीच, भेद-भाव अउर छुआछूत के जवन धारा हमरे सब के निजी जीवन औ संस्कृति के करिखा अउर जहरीली कीचड़ से बोरत हजारन साल से बहत जात बा, ओकर अंत करै के समय नजदीक आवत बा। एतना गनीमत रहे प्रकृति के कि जेकरे कपड़ा-लत्ता , घर-दुआर के बोरत ई गंदगी के धारा बहावे क जतन किहा गा ओकर कपड़ा गंदा होइ गा मुदा ओकर हृदय बिलकुल साफ सोना एस रहि गा, अउर जे आपन कपड़ा साफ चमाचम राखे खातिर गंदगी दुसरे के तरफ बहाएस ओकर हृदय गंदगी अवर बदबू के घर होइ गा। पाहीमाफी के ई सब कविता कुसुम ओही कीचड़ आ गंदगी के दर्द के बयान हौ। अउर एहि बात के सबूत हौ कि कल जब नये भारत के निर्माण में एही कीचड़ वाले हाथ जुटिहैं तो जौने कुसुम के सुगंध से दिशा दिशा महकी ऊ गंध अब से पहले केहू के नसीब ना रही। जागरथ जी के बहुत बहुत बधाई कि आपन गांव अउर गांव के खुशबू अपने भीतर जिआये हएन।” (टीप-कार : ओमप्रकाश मिश्र

आज जवन अंक हियाँ रखा जात अहय वहिमा रचनाकार अपने चिट्ठी-लिखायी कय अनुभव बाँटे अहय। चिट्ठी के माध्यम से भीतरखाने कय ऊ सच आवा अहय जेहका बहुत कमै देखा गा अहय। रचनाकार कय निजी अनुभव हुवय के कारन बात बहुत पते पै बैठत चली गय हय। ई समझौ कि चिट्ठी लिखी गय है आपके दिलो-दिमाग मा सनेस पहुँचेक्‌ ताईं। : संपादक 
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  • परदेसी कै चिट्ठी-पाती

काहे गुलरी कै फूल भया
लागत बा रस्ता भूलि गया
बहुतै दिन बाद भेटान्या है
का हो काका ! तू भले हया
बोले, कुलि हाल ठीक बाटै
बचि गयन बेमारी से ज़िंदा
अपने घर सुखी हईं बिटियै
यकठू बेटवा कै बा चिंता
सोचिअ थै अबकी पठय देई
कुछ जाय कमाय बम्बई मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

परदेसी परदेस कमायं
लौटैं गाँव बघारैं सान
लाल अँगोछा मूड़े बान्हें
लिहें रेडियो अइठें कान
नई साइकिल, लाल रुमाल
दांत मा सोना, मुँह मा पान 
बम्बहिया लाठी कान्हें पै
विरहा गावैं टेरे तान
तहमद-बंडी पहिर कै घूमैं
चमकै घड़ी कलाई मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

कच्छा तीनै मा पढ़त रहेन
कागज़–पाती सब बचवावैं
पाई न पकरि कलम ढंग से
तब्बौ सब चिट्ठी लिखिवावैं
मुल काव करैं वनहीं सबहीं
पढ़वइया गाँव मा कमै रहे
जे रहा तनी बड़वरकन मा
छोटवरकै जात डेरात रहे
घर आवैं मेल-मेल मनई
भिनसारे–संझा–राती मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

खत लिखा सिरी उपमा जोगे
कि हियाँ पै सब कुछ कुसल बाय
ईस्सर से नेक मनाई थै
वंहकै नीकै उम्मीद बाय
आगे कै हो मालूम हाल
कातिक मा करिया जात हये
वनके हाथे कुछ सर-समान
पइसा–कौड़ी बाटी पठये
पंहुचिहैं तौ जाय कै लइ आयू
वकरे ना रह्यू भरोसे मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

करिया-करिया धगरिन काकी
पहुँचीं लइकै यक पोसकाड
बेटवा कमात बा डिल्ली मा
थोरै मा लिखि द्‌या हाल-चाल
बिचकावत मुंह वै देखि लिहिन 
बोलिन अच्छा हम जाई थै
तू पढ़ा–लिखा बाट्या बचवा !
तब्बै चिट्ठी लिखिवाई थै
हम कहेन बिहान इतवार हुवै
निस्चिंते आयू छुट्टी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

चिट्ठी लिखवावै यस बइठिन
झौवा भै गऊवाई गावैं
आंसू पै आंसू बहा जाय
बोलत–बोलत रोवै लागैं
“हाँड़ी–गगरी ठन-ठन गोपाल
अपुवां कामे नाहीं जाते
पंडित कै लरिका मारे बा
घर हीं लंगड़ात चलत बाटे
कुछ पइसा जल्दी भेजि दिहा
यक्कै धोती बा देहीं मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

जूड़ी बोखार हमरे बाटै
लिखि द्‌या बाकी ठीकै बाटै
भैं’सिया बियानी बा पड़िया
गइया बिकात नाहीं बाटै
सुरसतिया सरियारिग होइ गै
कसि मा नाहीं बाटै हमरे
अब वोकर गवन जरूरी बा
निबकावै क् बा निबरे-पतरे
समधी अबकी मागैं अइहैं
तौ मान जाब हम अगहन मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

पकरे हाथे अन्तरदेसी
मुस्की मारैं नइकी भउजी
चुप्पे अइसन पाती लिखि द्‌या
घर भागा आवैं परदेसी
लिखि द्या कि बहुत अगोरी थै
ससुरे मा नाहीं लागै मन
दस दिन कां ताईं आइ जायँ
नाहीं, चलि जाब नइहरे हम
बुढ़ऊ कै मुंह फूला बाटै
मनिआडर पाइन देरी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

लिखि द्‌या घर कां जब्बै आया
खुब नीक-नीक साड़ी–साया
अन्दर वाली दुइ ठू बंडी
यक लाल लिपिस्टिक लइ आया
सेंनुर औ’ टिकुली ना लइहैं
बस क्रीम-पाउडर लइ अइहैं
महकौवा साबुन यक दरजन
पाये पइहैं तौ लइ अइहैं
यक बहुत खुसी कै बात बाय
लेकिन लिखिबै ना पाती मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

चिट्ठी न केहू कां दिखलाया
ना सास-ससुर कां बतलाया
धइ ल्या किताब के बीचे मा
सीधे डाखाना लइ जाया
वै खड़ी–खड़ी अँगिरायं बहुत
बोलिन अच्छा अब जात हई
चुप्पै बिहान हम दइ जाबै
यक कलम नीक कै धरे हई
माई बोलिन हरजाई बा
ना आया यकरे बाती मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

भउजाई कै गदरान गाल
हथवा-गोड़वा कुल लाल-लाल
बोलैं तौ मुंह से फूल झरै
पायल झनकावत चलैं चाल
चिट्ठी लिखवाइन तब जानेन
अंदरखाने कै बुरा हाल
पहिले खुब छटकत चलत रहीं
अब तौ बिलकुल भीगी बिलार
बैरंग वै पाती लिखवावैं
पइसा नाहीं जब जेबी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

छोटकना पढ़ै नाहीं जातै
बड़कनी सयान हुवत बाटै
गोहूँ सीचै ताईं पइसा
फूटी कौड़ी नाहीं बाटै
घर कै बटवारा भवा बाय
यक ठू पाये बाटी कोठरी
बाटै वोरान रासन-पानी  
कुछ पइसा भेज दियौ जल्दी
बड़कऊ कै नीयत बिगड़ी बाे
वै बहुत सतावत हैं हमकां
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

लेकिन तू फिकर न किह्यौ कभौं
दहकच्चर-करकच झेल लियब
जिउ-जान से ठान लिहे बाटी
लरिकन ताईं अब जियब-मरब
दीवार फोरि कै रहत हई
कोठरी मा दरवज्जा नाहीं
बस साल-खांड़ दिन काटै क् बा
यहि घर मा अब रहिबै नाहीं
माटी कै भीत उठाइब हम
सरिया के बगल जमीनी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

लिखि द्‌या भइया कसि कै लिखि द्‌या
लिखि द्‌या कि जल्दी आइ जांय
अम्मा बीमार अवाची हैं
गटई बोलअ थै सांय-सांय
हम अपने घर लइ आयन हैं
बड़कऊ की वोरी रहत रहीं
अब चला-चली कै बेरा बा
कुच्छै दिन कै मेहमान हईं 
आवा मुंह देखि लिया जीतै
अटका परान बा तूहीं मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा.

__आशाराम जागरथ

[जारी….]

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3 responses to “पाहीमाफी [७] : परदेसी कै चिट्ठी-पाती

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