पाहीमाफी [६] : तीज-तिउहार (होली)

आशाराम जागरथ रचित ग्रामगाथा ‘पाहीमाफी’ के  “पहिला भाग” ,  “दुसरका भाग”  , तिसरका भाग , चौथा भाग , पंचवाँ भाग के सिलसिले मा हाजिर हय आज ई ६-वाँ भाग:

ई भाग तिउहार क लयिके रचा गा बाय। होरी क लयिके। होरी के सिलसिले मा जे होलियात हय ऊ बहुत कमय सोचत होये कि समाज कय यक हिस्सा हय जौन होरिउ जेस खुसी कय तिउहार नाहीं मनाय सकत। वहिका कब्बौ ई मौका नाहीं मिला कि सबके साथ वहू जिंदगी के रंग मा रँगि सकय। भेदभाव वाली बेवस्था उल्लासौ मा भेदभाव बनाये रहत हय। मतलब पूरी जिंदगी दुख कय, अपमान कय, जिल्लत कय, दूसर नाव बनी रहय। ‘अछूत की होरी’ लिखत के १९३६ मा वंसीधर सुकुल लिखे रहे:

खेत बनिज ना गोरू गैया ना घर दूध न पूत।
मड़ई परी गाँव के बाहर, सब जन कहैं अछूत॥
द्वार कोई झँकइउ ना आवइ।
..हमैं यह होरिउ झुरसावइ। 

हियाँ आसाराम जागरथ विस्तार से ‘भोगे सच’ क रखे अहयँ। कयिसे दूसर जाति वाले खुसी-उल्लास के मौके पै ई महसूस करावत हयँ कि ‘ई तुहुँहा नाहीं चाही।’

पढ़ा जाय ई भाग। साथे बना रहा जाय रचना के। आपनि राइयु बतावा जाय। : संपादक
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  • तीज-तिउहार (होली)

लइकै उपरी-करसी- कंडा
छोटका- बड़का, लोहरी-लरिका
फागुन म बसन्त पञ्चमी के दिन
गाडैं रेंड़, बनावैं होलिका
उखुड़ी औ आमे कै पाती
सरपत-झाँखर- टिलठा-रहँठा
ढोय- ढाय सब ढूह लगावैं
ऊँचा खूब सजावैं होलिका
बाजै ढोलक रोज ढमाढम
गाना गावैं राती मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

होलिका जरै चाँदनी रात
ऊँची लपटि उठै आकाश
सन्नाटे मा दहकै आग
देहियाँ चुन-चुन लागै आँच
भूज-भाज गोबरे कै छल्ला
गुहि कै, जौ के पेड़ कै बल्ला
सब अपने घर मा लइ आवैं
दरवाजा ऊपर लटकावैं
बोलैं जय होलिका माई कै
फूकैं वन्हैं आगी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

कुछ लरिकै, कुछ बूढ़-ज़वान
सबकै सब दिन भै बौरांय
गावैं कबिरा सा-रा-रा-रा
तनिकौ ना झेपैं, सरमांय
जवन-जवन गारी गरियावैं
केउ मेहरारू सहि न पावैं
कबहुं-कबहुं पंडोहे क पानी
कीचड़-गोबर मारि भगावैं
खीस निपोरे, दांत चियारे
हँसैं लोग मन ही मन मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

जेकरी खेती ऊ बलवान
रहै गाँव कै ऊ धनवान
बाभन-ठाकुर- बनिया के घर
पाकै नीक-नीक पकवान
मेंड़ुवा कै लपसी, गुलबरिया
बनै सोहारी औ दलभरिया
आलू कै पापड़, रसियाव
बरिया अउर फुलौरी-गोझिया
पौनी-परजा खाना पावैं
थरिया भै तिउहारी मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

घूमि-घूमि नाचैं सब गावैं
बीच म ढोलिहा ढोल बजावैं
चमरौटी कां छोड़ि कै बाकी
घर-घर जाइ कै फगुआ गावैं
वनकै लरिकै घूमैं साथे
पितरी कै पिचकारी हाथेे
हमरे घर ना रंग-अबीर
टीका काव लगावै माथे
माई बोलिन सेंनुर लइ जा
के देखत बा राती मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा पाहीमाफी मा

यक साल ‘अबीर’ कै सौक चढ़ा
मांगेन दुई पइसा अइया से
बोलिन जा ! थोरै मांग लिया
बम्बहिया वाले भइया से
हरियर ‘अबीर’ जब पाय गयन
फूटै मन लड्डू अजब-गजब
‘पंडित जी हमैं पढ़ावत हैं
वनकै हम आसिरबाद लियब’
सोचिहैं हमार ई सिस्य हुवै
कम से कम मानअ थै हमकां
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा

पुड़िया मा धरे ‘अबीर’ रहेन
पंडित जी राही मिलिन गये
हम हाथ जोरि पैलगी किहेन
बिन बोले वै आसीस दिहे
जब चलेन अबीर लगावै कां
सोचेन मुराद अब मिलि जाई
झट ‘बाभन-माथा’ झिटिक दिहिन
बोले ‘तुहंका नाहीं चाही’
आपन मुँह लइकै खड़ा रहेन
बहुतै देरी तक राही मा
यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह
बचा बा ‘पाहीमाफी’ मा.

__आशाराम जागरथ

[जारी….]

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